घूसखोर आईजी, ऐय्याश एडीजी, हत्यारा डीजीपी… लंबी है ये कहानी, सुनो कुमार सौवीर की जुबानी

दिल्ली में आलोक तोमर के होने को मैं एक विलक्षण परिघटना मानता रहा, क्योंकि आलोक तोमर अप्रत्याशित थे, अनमैनेजबल थे, वे वो लिख देते थे, जिसे कहने भर में कई लोगों को पसीने छूट जाते थे. वो वह कर देते थे, जिसके बारे में सोचने में कई लोगों की थूक सरक जाती थी. वो केवल प्यार से जीते जा सकते थे, प्रलोभन और दबंगई से नहीं.

वे कमजोरों के लिए संरक्षक और सहयोगी वाला भाव रखते थे. वे हरामखोरों के लिए विध्वसंक की भावभंगिमा लिए रहते थे… आलोक तोमर को कुछ शब्दों, वाक्यों में व्याख्यायित नहीं किया जा सकता. उनके गुजर जाने के बाद दिल्ली खाली-वीरान सी लगती है. यहां का पत्रकार या तो नौकरी कर रहा है या दलाली. बीच में कोई नहीं है. कुछ एक हैं तो वे होने बने रहने के लिए चुप साधकर शीर्षासन कर रहे हैं. हालांकि पुण्य प्रसून बाजपेयी जैसे पत्रकार, रवीश कुमार जैसे पत्रकार उम्मीद जगाते हैं. सच-सच बोलने का साहस कई खतरे उठाकर कर जाते हैं. पर आलोक तोमर में जो बात थी, वो इनमें भी नहीं. आलोक तोमर ने अपने जीवर के आखिरी दशक में बिना किसी बैनर और मंच के सिर्फ न्यू मीडिया के जरिए जो पहचान बनाई, जो लेखन किया, जो प्रेरणा युवाओं को दी, जो आग अपने अंदर दिखाई, वो बेमिसाल है.

यह सब इसलिए लिख रहा क्योंकि मुझे कुमार सौवीर के बारे में थोड़ा-सा बताना था. लखनऊ का यह पत्रकार, कुमार सौवीर, अपने करियर में 11 बरस, लगातार बेरोजगार रहा. इनके नाम लखनऊ से लेकर बनारस तक में इतने किस्से हैं कि आप सुनते जाएं और सोचते जाएं कि क्या ऐसा पत्रकार भी आज के दौर में है. दुस्साहस और ईमानदारी, दो चीजें इनमें इतनी भारी मात्रा में भरी हुई हैं कि आज के दौर में आरडीएक्स माने जाने वाले इन दोनों चीजों के कारण उन्हें बराबर तकलीफ, बेरोजगारी, अकेलापन, तनाव, मिसफिट होने जैसी स्थितियों से गुजरना पड़ता है.

इन दिनों भी वे अकेलेपन में हैं. महुआ न्यूज के यूपी ब्यूरो चीफ पद से कई कारणों के चलते इस्तीफा देने के बाद से वे अभी किसी संस्थान से जुड़े नहीं हैं. पर वे यह चाहते भी नहीं कि चुप साधकर बैठे रहें. सो, भड़ास पर उन्होंने जोरदार ढंग से लिखना शुरू कर दिया है. मैं उनका दिल से इस्तकबाल करता हूं. अफसरों और मंत्रियों के आगे पूंछ हिलाने के इस दौर में कुमार सौवीर लखनऊ के ऐसे पत्रकार हैं जो बिना नतीजे की परवाह किए अफसरों और मंत्रियों-नेताओं से वही पूछते हैं जो बिलकुल खरा, सटीक और सामयिक होता है. भले ही उनके सवाल से अफसर और नेता की स्थिति खराब हो जाए, बगलें झांकने लगें.

कुमार सौवीर कलम और हाथ, दोनों का बखूबी इस्तेमाल करना जानते हैं. तभी वो दलाली और लायजनिंग के इस दौर में कथित बड़े बड़े अफसरों, नेताओं और पत्रकारों के लिए दहशत की तरह होते हैं. उनकी कुख्याति के किस्से अगर कोई लिखे तो लाखों पत्रकारों का दिल-दिमाग खुले. लेकिन मेरे लिए कुमार सौवीर रोल माडल की तरह हैं. और, एक बड़े संबल की तरह, की मेरे साथ कोई खड़ा नहीं होगा तो कुमार सौवीर खड़े होंगे. ऐसा इसलिए कह रहा हूं कि इस टाइमलेस एंड एक्स्ट्रीम सेलफिश दौर में अपनों के लिए कुमार सौवीर के पास खूब टाइम होता है. और यही उनकी एकमात्र पूंजी है.

लीजिए, कुमार सौवीर का एक ताजा राइटअप पढ़ें और आखिर में उनके कुछ लिखे के लिंक. उनका लेखन भड़ास4मीडिया पर जारी रहेगा. उनका फिर से मैं स्वागत करता हूं. आजकल कुमार सौवीर अपनी मेल आईडी में सिग्नेचर के बाद अपनी व्याख्या, अपनी स्थिति का बखान कुछ इन शब्दों में करते हैं- ”कुमार सौवीर- स्‍वतंत्र पत्रकार हूं, और आजादी की एक नयी और बेहतरीन सुबह का साक्षी भी। आप भी आइये ना।  प्रतीक्षा में ही तो हूं आपकी।”

यशवंत

एडिटर, भड़ास4मीडिया

[email protected]

 


 

सियासत है अजब शतरंज यारों, जिसमें वजीरों को प्‍यादा मारता है…

कुमार सौवीर

-कुमार सौवीर-

मुख्‍तार अंसारी के गुर्गों से जूझने के लिए जान हथेली पर रखकर एके-47 जैसे अत्‍याधुनिक हथियार बरामद करने वाले सीओ डीके राय के निलम्‍बन को खत्‍म करने के लिए सर्वोच्‍च न्‍यायालय तक ने साफ आदेश दिया, लेकिन उसका क्रियान्‍वयन कई बरसों तक नहीं हुआ, जबकि पत्रकारों पर हजरतगंज में सड़क पर सरेआम लाठियां बरसाने वाले लखनऊ के एएसपी सिटी डॉ बीपी अशोक की 20 दिन बाद ही प्राइज पोस्टिंग दे दी गयी। इन दोनों घटनाओं में फर्क सिर्फ यह रहा कि डीके राय पर एक राजनीतिक दल के वरदहस्‍त का आरोप था, जबकि दूसरा सत्‍ताधारी दल का खासमखास था। सत्‍ता से जुड़ा होने के चलते ही एक आला अफसर डीजीपी की कुर्सी तक पा जाता है, जबकि उसके खिलाफ पचीस साल पहले अपने ही एक डिप्‍टी एसपी की हत्‍या एक मुठभेड़ में करने का मामला सीबीआई जांच रही होती है। एक डीजीपी ने तो अपने और अपने से पुराने बैच के किसी भी अफसर को डीजीपी पद पर प्रोन्‍नत ही नहीं होने दिया, ताकि उनकी कुर्सी पर कोई खतरा न आ जाए।

अपनी नौकरी के बीस साल बाद भी एक आईपीएस अफसर कैट की बेहद कड़ी प्रवेश परीक्षा पास कर लखनऊ आईआईएम में पढ़ना चाहता है, मगर आला अफसर अपनी निजी खुन्‍नस के चलते न तो उसे अवकाश देते हैं, और न ही तीन साल तक वेतन। अर्जी लगी कैट और हाईकोर्ट में, तो पाया गया कि उसके साथ ज्‍यादती हुई। सरकार को कड़ी फटकार के बाद ही उसे बकायों का भुगतान हो पाता है। अब वह इस बात की लड़ाई लड़ रहा है कि आखिर किस तर्क पर उसके साथ के लोग आईजी बनाये गये लेकिन वह अभी तक एसपी ही है। उधर एक नहीं दर्जनों उदाहरण ऐसे हैं कि सत्‍ता की करीबी के चलते उन अफसरों को हमेशा प्राइज पोस्टिंग मिलती है, भले ही वह कितना भी बेइमान, लुटेरा, कायर और ऐयाश रहा हो।

पीपीएस से प्रोन्‍नत होकर रिटायर हुए एक आईजी तो वसूली में इतना कुख्‍यात रहा कि उसके पास बुलाये जाने वाले दारोगा और सीओ तक अपना पर्स और अंगूठी-जेवर तक बाहर सिपाहियों के पास रखवा देते थे। एडीजी रहा एक ऐयाश अफसर तो अपनी शौकीन मिजाजी के चलते तीन-टंगा के नाम से पहचाना जाता था। अभी हाल ही में मध्‍य-पश्चिमी जोन के एडीजी रहे अफसर की तो यहां तक हेकड़ी चलती थी कि उन्‍होंने अपनी पत्‍नी तक को एक आयोग में नामित करा दिया। लखनऊ के मडियांव थाने की महिला एसओ एक मामले में थाने की जीडी और अपनी सर्विस रिवाल्‍वर समेत भागीं, तो उस पर कोई कार्रवाई ही नहीं हुई। कई बदनाम महिलाएं और दारोगा उनके ही संरक्षण में आज भी खुलेआम अपने ही अफसरों को धौंसियाते घूम रहे हैं। हालांकि अब इन अफसर का उबाल उतार पर है, लेकिन मीडिया में बने रहने के लिए वे आजकल रेलवे स्‍टेशनों पर सिपाहियों की कवायद कराते अक्‍सर दिख जाते हैं। कई साल पहले बनारस में डीआईजी रहे एक अफसर की पत्‍नी ने आत्‍महत्‍या कर ली तो मामला दबाने के लिए पति ने वेश्‍याओं के खिलाफ अभियान छेड़ दिया ताकि आत्‍महत्‍या का मामला दब जाए।

तो किस्‍सा-कोताह यह कि सभी राजनीतिक दलों ने पूरी नौकरशाही को अपनी रखैल बना रखा है। और इन रखैलों ने अपने मातहतों को जरखरीद गुलाम। जहां न सोचने की आजादी है और न ही खुद कुछ करने की। किसी ने आपात हालत में कुछ कर भी दिया तो भी अफसर खफा कि हमसे पूछा क्‍यों नहीं। हर राजनीतिक दल का अपना-अपना अफसर है जो अपने आका की सरकार में आते ही हौवा बन जाता है और सरकार जाते ही गीदड़। ऐसे में पोलिसिंग हो तो कैसे। एक दौर था जब भटनागर नाम के डीजी ने आदेश जारी किया था कि हर गली-मोहल्‍ले में पुलिस गणमान्‍य लोगों के बीच जाएगी ताकि उसका खौफ लोगों के दिमाग से उतर सके और सूचनाएं फौरन मिल जाएं। लेकिन उनके जाते ही यह काम दफन हो गया। डेढ़ साल पहले डीजीपी का आदेश आया कि थाने में आने वालों की इंट्री तत्‍काल की जाए, वरना सख्‍त कार्रवाई होगी। लेकिन हाल ही थानों पर हुईं बलात्‍कार और मौतों की घटनाएं इस नियम की धज्जियां उड़ाने के चलते ही हुईं।

आम आदमी तो दूर, खुद पुलिस के मध्‍यम और छोटे कर्मचारियों तक का शोषण होता है। ट्रांसफर-पोस्टिंग की रकम फिक्‍स है। कोई जांच शुरू हो गयी तो हर हाजिरी पर साहब की रकम तय है। मामला छोड़ने का पैसा अलग। अब अपनी जेब से तो कोई घूस देगा नहीं, सो रकम उगाही जाती है जनता की जेब से। इससे बचने के लिए ही पुलिसवाले राजनीतिकों के दर पर माथा टेकते हैं। अतर सिंह यादव। यह नाम तब उछला जब गेस्‍टहाउस कांड हुआ। तब की सरकार में तो उसकी इतनी हनक रही कि उसे डिप्‍टी सीएम कहा जाने लगा था। एक अफसर तो हाकिम के पैर की जूती तक साफ करते सुर्खियों में आ गये। जो ऐसा नहीं कर पाते, वे जनता पर लाठी-गाली लेकर टूट पड़ते हैं, अंदाज यूं होता है जैसे अपने अफसरों पर भड़ास निकाल रहे हों। जो यह भी नहीं कर पाते वे बरेली के सिटी मैजिस्‍ट्रेट के आवास पर भूख से दम तोड़ देते हैं।

सात साल पहले बनारस के डीआईजी ने जौनपुर में अफसरों की मीटिंग ली। आदत के मुताबिक वे एक एसओ पर भड़क उठे, खूब लताड़ा, गालियां दीं और नौकरी खा जाने की धमकी दी। पानी नाक से ऊपर जाते देख दारोगा ने अपनी टोपी डीआईजी की ओर फेंक मारी और बैठक छोड़कर यह कहता हुआ चला गया कि कम से कम तुमसे तो मैं लाख दर्जा ईमानदार हूं। बाद में आला अफसरों ने बीचबचाव कर मामला सुलटाया। हाल ही कानपुर में आईजी की बैठक में एक सीओ ट्रफिक में फंसने के चलते देर से पहुंचा तो उसे कड़ी फटकार लगी। समझाने पर भी बड़े साहब नहीं माने तो उसने भी मुंहतोड़ जवाब दे दिया। बोला कि शासकीय विमान दिलवा दीजिए तो लोग वक्‍त पर आ जाएंगे।

पुलिस की ताजा हालत का अंदाजा लगाना हो तो डेढ़ साल पहले चित्रकूट के राजेपुर गांव में डाकू घनश्‍याम केवट मुठभेड़-कांड से बेहतर और कोई नजीर नहीं हो सकती। वहां मौजूद एक बड़े अफसर पर एक मातहत ने शेर पढ़ दिया:-

हजरते चिरकीन का मुठभेड़ में जब जाना हुआ,
पहले तो दिल धड़का, फिर धड़ से पाखाना हुआ।

दरअसल यह एक करारा व्‍यंग्‍य था, उस हालत पर जिसमें पुलिस के इंस्‍पेक्‍टर समेत चार लोग मारे गये थे और तीन आईपीएस अफसरों को गोलियां लगी थीं। यह अलग बात है कि पुलिसिया इतिहास के लिए इतनी शर्मनाक मुठभेड़ शायद ही पहले कभी हुई हो।

ऐसा भी नहीं है कि पुलिसिया कामकाज में सुधार के लिए किसी ने सोचा न हो। हर साल छह महीने में यूपी पुलिस सुधार आयोग बनता है, मुख्‍य सचिव स्‍तर का वह सेवानिवृत्‍त अफसर इसका अध्‍यक्ष बनता है जिसकी राजनीतिक पकड़ होती है। लेकिन भारी-भरकम खर्चों के बावजूद इस आयोग ने आज तक अपनी कोई भी जिम्‍मेदारी नहीं निभाई। और‍ निभाई भी हो तो कौन जाने, क्‍योंकि ऐसी कोई भी रिपोर्ट न तो शासन तक पहुंची और न ही उस पर कभी कोई अमल ही हुआ।

तो अब अगर आम आदमी को लोकतंत्र का मसीहा मानकर देखा जाए तो यह शेर कितना मौजू हो जाता है:-

सियासत है अजब शतरंज यारों,
जिसमें वजीरों को प्‍यादा मारता है।

उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार कुमार सौवीर की रिपोर्ट. उनसे संपर्क [email protected] या 09415302520 के जरिए किया जा सकता है. कुमार सौवीर की अन्य रिपोर्ट, लेखों, उनसे जुड़ी खबरों को इन लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं-

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Comments on “घूसखोर आईजी, ऐय्याश एडीजी, हत्यारा डीजीपी… लंबी है ये कहानी, सुनो कुमार सौवीर की जुबानी

  • नूतन ठाकुर says:

    यशवंत जी और सौवीर जी,

    मैं चाहूंगी कि इस लेख पर पहला कमेन्ट मेरा हो. पहले तो मैं एक मिनट के लिए हल्का सा डरी थी कि चूँकि इस लेख में मेरे पति का भी सन्दर्भ है अतः एक मिनट का हिचक था. फिर मैंने सोचा कि जब यशवंत जी कभी नहीं डरे, सौवीर साहब ने डरना छोड़ दिया (मतलब यह मत निकालिएगा कि पहले डरते थे) और जिन आलोक तोमर की बात हो रही है वे ताउम्र निडर रहे तो थोड़ी बहुत ताकत मैं भी ले लूँ और सौवीर जी को उनके मुठभेड़ वाले शेर के लिए खास कर के दाद दे दूँ. उन्होंने बातचीत में बताया है कि यह शेर उत्तर प्रदेश के किस जांबाज़ आईपीएस अधिकारी के बारे में है और किस घटनास्थल पर हुआ था, जब स्वयं सौवीर जी और उनकी लाडली बेटी इस आईपीएस अधिकारी के विपरीत अदम्य साहस दिखा रहे थे.
    लेकिन सबसे अच्छी बात यह है कि सौवीर जी अब आज़ाद पंछी की बानी बोलने लगे हैं और हमें उम्मीद है कि अब उनसे भी वही आवाज़ निकलेगी जो यशवंत जी ने दिवंगत आलोक तोमर के लिए लिखा है.
    बधाई हो सौवीर जी

    डॉ नूतन ठाकुर

    Reply
  • नूतन ठाकुर says:

    बस एक बात और कहनी है कि सौवीर जी अपना एक ऐसा फोटो भेजें जो आपकी गरजती हुई आवाज़ और शब्दों के अनुकूल हो. पता नहीं कुछ ऐसा लग रहा है फोटो देख कर कि दोनों तरफ से बन्दुक ताना हुआ है और आप एकदम सीधे देखने को बाध्य हैं, कि जहा सिर हिलाया वहीँ गोली लगी.
    जैसी गरजती हुई आवाज़ वैसा ही फोटो.

    डॉ नूतन ठाकुर
    मेरठ

    Reply
  • pratul mishra says:

    एक ” सच्चाई ” जिसको झुठलाया नहीं जा सकता ………….

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  • Abhishek sharma says:

    bahut hi umda lekh hai…. thane bechne wale ips aur chakla gharo ke daily ke khaki ke customers ko lataad lagane ki kuwat kalam ke gayab ho rahi hai.. hathras ki ek ghatna hai jaha sp ne mahila daroga ko hatakar mahila sipahi ko thana saunp rakha tha.. samjha ja sakta hai aisa kyu…. lekin nootan ji aap apne pad ka galat prayog kar rahi hai…yashwant ji priority se comment dala kare pad aur khyati ka usme prayog karna dusro ko chhota sabit karna hai.

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  • Siddharth Kalhans says:

    बेहद उम्दा। काफी दिनों से सौवीर भाई प्रेस वार्ता में अपने बेबाक सवालों से अफसरों को दहला रहे थे। टीवी चैनल की कुछ सीमाएं होती हैं। लेकिन अब उन्हें यहां अक्सर पढ़ने को मिलेगा। हाल ही में अनिल यादव की किताब क्योंकि वेश्याएं अखबार नही पढ़ती छपी है। बनारस वाले मसले पर। उसे पहले भड़ास पर पढ़ चुका हूं। उम्मीद है हिट होगी। सौवीर भाई एसे ही बखिया उधड़ते रहिए।

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  • sahi likha hai aapne, lekin mushkil ye hai ki sare media sansthan bike hue hai. kya koi funda hai inke changul se janta ko nikaal kar ek naya media platform dene kaa,bhadaas par likhte likhte hi mar jayenge hum

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  • Kumar Shrish says:

    Very well written. There is no doubt that the writer is simply the best amongst all the lots of journalists. Thanks to Yashwant Ji to design such a great platform to make us aware of the works of such great and courageous journalists in just one click. Saanweer Ji is really a source of inspiration for the journalists like us.
    Thanks so much!!

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