चार युवा पत्रकारों का संघर्ष

: पिछले दो साल से लड़ रहे हैं भास्‍कर के खिलाफ अदालती लड़ाई : 2008 में जब वैश्विक आर्थिक मंदी के दौर में पूरा देश और समूचा विश्व परेशान था, ऐसे समय में अकारण ही नौकरी से वंचित होकर परेशान होने वालों की लंबी फेहरिस्त में दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे महानगरों और भोपाल, पूना जैसे सेमी मेट्रो के साथ ही छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जैसे छोटे से शहर में समाज और मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिये कलम चलाने वाले पत्रकार भी शामिल थे.

सच कहे तो आर्थिक मंदी दरअसल महज एक बहाना था. जिस तरह से पत्रकारों और कमोबेश फोटोग्राफरों व अन्य मीडियाकर्मियों को बाहर का रास्ता दिखाया गया, उसके पीछे ऐसे अखबार समूहों की साजिश थी, जो कम दाम में अधिक काम की मानसिकता से ग्रस्त थे. पहले स्थापित होने के लिये उन लोगों ने भले ही पर्याप्त कर्मचारियों की नियुक्ति कर ली थी, लेकिन उसके बाद कम वेतन देना पड़े इसलिये उन्होंने आर्थिक मंदी का बहाना बनाकर कर्मचारियों के साथ पत्रकारों को भी ठिकाने लगाना शुरू कर दिया.

दिन-रात एक कर अपने हिस्से के भी समय को समाज और देश के नाम करते हुये लोगों के अधिकार, सामाजिक समस्याओं, सरकारी तंत्र की कमजोरियों और उसकी नाकामियों के खिलाफ कलम चलाने वाले कलम के सिपाहियों की हालत और उनकी स्थिति हालांकि अब किसी से छिपी नहीं है, लेकिन आज भी आम लोग पत्रकारों पर होने वाले अत्याचार और उनके शोषण की कहानी नहीं जानते. समय-समय पर अखबारों में नहीं पर पत्रकारिता के कुछ अन्य माध्यम (वेबपोर्टल) के माध्यम से पत्रकारों पर होने वाले अत्याचार और उनके खिलाफ रची जाने वाली साजिश का पर्दाफाश होता रहा है. इसके लिये ऐसे माध्यम साधुवाद के पात्र तो हैं, लेकिन एक बड़ा संकट यह भी है कि आखिर केवल प्रकाशित करने से या इंटरनेट पर अपने सुधी पाठकों तक ऐसी सामग्री पहुंचाकर क्या दैनिक भास्कर जैसे अखबार समूह का कुछ बिगाड़ा जा सकता है.

वैश्विक आर्थिक मंदी का बहाना बनाकर पत्रकारों को निकाले जाने के इस प्रकरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ में दरार पड़ चुकी है. क्योंकि इस चौथे स्तंभ पर अब चंद पूंजीपतियों का जैसे मालिकाना हक है. उन्हें न पढ़ना-लिखना आता है और न ही उन्हें देश की जनता और उनकी पीड़ा से ही कोई लेना-देना है. वे तो गरीबों की भूख, औरतों के बलात्कार और बच्चों की कुपोषण से मौत की खबर भी केवल इसलिए छापते हैं क्योंकि उन्हें इससे पूंजी कमाना है. अखबारों का यह पूंजीवादी स्वरूप 21वीं सदी की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है. आम जनता आज भी अखबार में लिखा हुआ को सच मानती है जबकि सच तो यह है कि छपता वहीं है जो पूंजीपति छपवाना चाहते हैं.

अब न प्रेमचंद है और न महावीर प्रसाद द्विवेदी, माधव राव सप्रे की भी पत्रकारिता का अंत हो चुका है. अब तो पेड न्यूज का विरोध करने वाले प्रभाष जोशी भी इस दुनिया में नहीं है और नांदगांव के मुक्तिबोध भी इस संसार से विदा हो चुके हैं. अब तो ऐसे संपादक, अखबार मालिक पत्रकारिता की जमीन पर उग आये हैं, जो बातें तो जनता की समस्याओं के बारे में करते हैं लेकिन उनका पूरा ध्यान पावर प्लांट लगाने, कोलवाशरी चलाने और शराब का ठेका, पेट्रोल पंप के लाइसेंस से लेकर मकान बनाने में रहता है. साफ-साफ कहे तो दलाल, बिल्डर, उद्योगपति, शराब ठेकेदार, भू-माफिया, नेताओं के चमचे और न जाने किस-किस बिरादरी के कैसे-कैसे लोग अखबारों के धंधे में शामिल हो चुके हैं. कलम की धार कमजोर क्या पूरी तरह खतम हो चली है, यहां साथी वी.वी.रमण किरण की बहुचर्चित कविता बरबस ही याद आती है- कलम टूटकर लकड़ी बन गई, रोटी सेंकने का साधन बन गई.

पत्रकारों पर अत्याचार और उनके शोषण की कहानी कोई नई नहीं है. यह तो इमरजेंसी और इमरजेंसी के पहले से चली आई है पर 2008 में मीडिया के क्षेत्र में जो कुछ हुआ उसने पूरे पत्रकारिता जगत में उथल-पुथल मचा दी. छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर से लेकर दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे महानगरों के पत्रकार भी इससे प्रभावित हुये बिना नहीं रह सके. 2008 में आर्थिक मंदी की आड़ में सैकड़ों की तादाद में पत्रकारों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. और सोचने वाली बात यह है कि ये सभी ऐसे अखबारों में थे जो देश में खुद को नंबर वन, नंबर टू या नंबर थ्री कहकर गौरान्वित महसूस करते हैं.

बिलासपुर में पत्रकारों के खिलाफ साजिश और उन्हें मानसिक प्रताड़ना देने की शुरुआत का श्रेय दैनिक भास्कर के उस कार्यालय को जाता है, जिसका दफ्तर रवींद्र नाथ टैगोर चौक से गांधी चौक जाने वाले मार्ग पर माननीय उच्च न्यायालय भवन के ठीक सामने गुंबर काम्पलेक्स में स्थित है. यदि मैं गलत नहीं हूं और मेरी स्मृति को कुछ नहीं हुआ है तो वह 20 दिसंबर 2008 को सुबह 11 बजे की बात है, उस समय संपादकीय विभाग की मीटिंग होती थी और अब भी होती है. वरिष्ठ पत्रकार शैलेंद्र पांडेय, मोहम्मद यासीन अंसारी, सुनील शर्मा और फोटो जर्नलिस्ट वी.वी. रमण किरण दैनिक भास्कर के दफ्तर पहुंचे. जैसे ही वे रिसेप्शन से होकर गुजरने लगे उन सभी को रिसेप्शनिस्ट ने यह कहकर रोक दिया कि उसे आदेश है कि आप लोगों को अंदर न आने दिया जाये.

हेड सुपरवाइजर श्री झा ने भी रिसेप्शनिस्ट की बात को दोहराया. पत्रकारों ने उनसे पूछा कि आखिर ऐसा क्या हो गया जो उनके साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा है? श्री झा ने उनसे कहा कि वे पता करके आते हैं, तब तक आप लोग वेटिंग रूम में चाहे तो इंतजार कर सकते है. पत्रकारों को इस अपमान और इस व्यवहार से बेहद पीड़ा हुई लेकिन वे बगैर कारण जाने कुछ नहीं कर सकते थे. बिलासपुर में पत्रकारों के साथ अपने ही दफ्तर में होने वाले दुर्व्यवहार की यह पहली घटना थी जिसे किसी भी सूरत में सामान्य नहीं लिया जा सकता था.

खैर, पत्रकार अपमान का घूंट पीते हुये वेटिंग रूम में इंतजार करने लगे लेकिन दो घंटे तक इंतजार करवाने के बाद स्थानीय संपादक संदीप सिंह ठाकुर और क्षेत्रीय प्रबंधक देवेश सिंह ने उन्हें अगले दिन आने का संदेश चपरासी के माध्यम से भिजवा दिया. दूसरे दिन जब सुबह 11 बजे पत्रकार पहुंचे तो उन्हें फिर से वेटिंग रूम में डेढ़-दो घंटे तक इंतजार करवाया गया और उसके बाद उनके हाथों में एक-एक पत्र थमा दिया गया, जो दरअसल उनका स्थानांतरण आदेश- पत्र था. स्थानांतरण आदेश देखकर पत्रकार हतप्रभ रह गये. पत्र पढकर पता चला कि शैलेंद्र पांडेय का अंबिकापुर, मोहम्मद यासीन अंसारी का रायगढ़, सुनील शर्मा का जशपुर और वी.वी. रमण किरण का रायगढ़ ब्यूरो दफ्तर में स्थानांतरण कर दिया गया है. देखते ही देखते पत्रकारों के सामने विकट परिस्थिति आ खड़ी हुई. उन्हें समझ में ही नहीं आ रहा था कि वे क्या करें? उन्होंने जब इसका कारण पूछा तो उन्हें इसका कारण भी नहीं बताया गया.

दफ्तर के अन्य साथियों से पता चला कि उन्हें उनके एक सप्ताह के अवकाश पर चले जाने के कारण यह सजा दी गई है. जबकि सच्चाई यह थी कि अखबार समूह इस छोटी सी गलती की सजा नहीं दे रहा था, बल्कि पत्रकारों को निकाल बाहर करने की योजना बना चुका था. साजिश रची जा चुकी थी और प्रबंधन जानता था कि पत्रकार इतनी कम तनख्वाह में दूसरे शहर नहीं जायेंगे और वे नौकरी छोड़ देंगे. और ऐसा उसने केवल बिलासपुर में नहीं किया, अपने अन्य एडिशन में भी इस अखबार ने यही किया, जिसका कवरेज भड़ास4मीडिया ने किया था.
पत्रकारों के सामने दो ही विकल्प थे, पहला उतने ही वेतनमान में ट्रांसफर पर जायें या फिर नौकरी छोड़ दें. पत्रकारों ने प्रबंधन को पत्र लिखकर अपनी आर्थिक, सामाजिक एवं पारिवारिक समस्याओं का जिक्र करते हुये स्थानांतरण रद्द करने की मांग भी की, लेकिन बात नहीं बनी.

दोनों ही विकल्प पर विचार करने के पश्चात पत्रकारों ने तीसरे विकल्प की तलाश की, जो उन्हें न्याय की देहरी पर अर्थात अदालत पर ले गई, जहां पत्रकारों ने न्याय की गुहार लगाई. साजिश का शिकार हुये पत्रकारों ने सिविल कोर्ट में परिवाद दायर कर स्थानांतरण रद्द करने की मांग की. उन्हें अंतरिम रूप से न्याय भी मिला. संबंधित अदालत ने मामले के निराकरण तक यथास्थिति बनाये रखने का आदेश देते हुये पत्रकारों को दैनिक भास्कर के बिलासपुर कार्यालय पर ही काम पर रखने का आदेश प्रबंधन को दिया.

इसके बाद पीडि़त पत्रकारों ने नौकरी ज्वाइन की. नौकरी ज्वाइन करने के महज कुछ ही दिनों बाद प्रबंधन ने ऊपरी अदालत से एक अंतरिम आदेश का हवाला देते हुये पत्रकारों को पुन: काम से निकाल दिया. यदि वास्तव में देखा जाये, तो यथास्थिति का तात्पर्य ऐसा नहीं था, बल्कि यथास्थिति का मतलब तो यहीं होता है कि जो पत्रकार जिस स्थिति में यहां के कार्यालय में काम कर रहे हैं, उन्हें वहां उसी स्थिति में काम करने दिया जाये. फिर निचली अदालत के जिस आदेश का परिपालन हो चुका था, उसे कैसे वापस लिया जा सकता था? बहरहाल प्रबंधन ने ऊपरी अदालत के जिस आदेश की त्रुटिपूर्ण व्याख्या करके छलपूर्वक व्यवहार करते हुये पत्रकारों को काम से निकाल दिया. इस मामले को लेकर पीडि़त पत्रकारों ने पुन: अदालत में गुहार लगाई, जिस पर सुनवाई चल रही है. मामला फिलहाल लंबित है और पीडि़त पत्रकार किसी तरह तंगहाली में गुजर-बसर कर रहे हैं.

उक्त मामले में एक बात तो स्पष्ट है कि पत्रकारों के लिये आज भी जीवन-यापन की अनिश्चितता बनी हुई है. वे लोगों के लिये आवाज उठाकर, संघर्ष करके भले ही उन्हें न्याय दिलाने में सहयोग करते हैं. यथासंभव वे इसमें सफल भी होते हैं, लेकिन वे खुद अपने लिये कुछ नहीं कर पाते. उनके मामलों में शासन के पास भी कोई निश्चित और कारगर नीति नहीं है.
दैनिक भास्कर ने उक्त पत्रकारों को प्रताडि़त करने का कोई मौका नहीं छोड़ा और उनके न्याय के लिये कोर्ट जाने को अपनी संस्था का अपमान समझा. पत्रकार अपनी लड़ाई में विजयी होंगे या नहीं, यह तो कहा नहीं जा सकता, लेकिन छत्तीसगढ़ के इतिहास में दैनिक भास्कर जैसे मीडिया समूह के खिलाफ पत्रकारों द्वारा अदालत की लड़ाई लड़ने के इस पहले मामले को लेकर युवा पत्रकारों में जोश और उत्साह का जरूर संचार हुआ है.

मीडिया में रुचि रखने वाले स्थानीय लोगों में इन पत्रकारों व उनके परिजनों के प्रति सहानुभूति भी है. साथ ही इस पूरे मामले से एक बात और साफ हो गई कि पत्रकार को अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी पड़ती है. उसके कंधे का इस्तेमाल भले ही कोई कर ले लेकिन जब उसे सहारे की जरूरत पड़ती है तो गैर व्यवसाय के लोगों के साथ ही पत्रकारिता के व्यवसाय से जुड़े वरिष्ठजनों का भी कंधा झुका हुआ दिखाई देता है. और आखिर में एक बात जब तक दम में दम है, ये पत्रकार लड़ते रहेंगे. चाहे इसके लिए उन्हें कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े.

लेखक सुनील शर्मा भी भास्‍कर के खिलाफ इस संघर्ष में शामिल हैं.

Comments on “चार युवा पत्रकारों का संघर्ष

  • [b]सुनील जी सघर्ष कंहा नहीं है मै नवोदित पत्रकर हू मै अभी सारी सुखभोगी काम को छोड़ कर पत्रकारिता को चुना है डर तो लगता है देखिये आगे क्या होता है [b][/b][/b]

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  • सुनील जी सघर्ष कंहा नहीं है मै नवोदित पत्रकर हू मै अभी सारी सुखभोगी काम को छोड़ कर पत्रकारिता को चुना है डर तो लगता है देखिये आगे क्या होता है

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  • mazharuddeen khan says:

    sunil ji
    aapne sirf bhaskar ke baare mein likha hai. sabhi news paper mein aisa hota hai. rajasthan patrika ne bhi yahi raasta apnaya tha.isliye kisi ek media group ko galat mat kahiye. yahan to hamam mein to sabhi nange hain. main bhi isi saajish ka shikar ho chuka hoon.

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  • vikash kumar says:

    सुनील जी ईसी का नाम जिंदगी है, मजा लीजिए, ये सौभाग्य भी सभी को नहीं मिलता, आखिर जो खुद को छोड़कर बाकि सबके लिए सोंचता है उसी को यह सौभाग्य प्राप्त होता है

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