टोनी-राडिया ने भाजपा तक को फिक्स कर दिया था

आलोक तोमर: अरुण शौरी ने जो कहा और सुना : अरुण शौरी से बड़े बड़े नहीं निपट पाए। इंदिरा गांधी नहीं निपट पाईं, राजीव गांधी नहीं निपट पाएं और जब झगड़ा हो गया था तो महाबली रामनाथ गोयनका भी नहीं निपट पाए थे। अब भाजपा के सबसे हास्यास्पद चरित्र वैंकेया नायडू अरुण शौरी को निपटाने में लगे है और अब तक का इतिहास गवाह है कि शौरी को निपटाने वाले निपट जाते है।

अरुण शौरी ने बहुत धमाकेदार पत्रकारिता करके बहुतों की बोलतियां बंद की और कई की कुर्सियां छीन ली। फिर खास तौर पर अटल बिहारी वाजपेयी की पहल पर शौरी को भाजपा में बुलाया गया और सरकार बनी तो सीधे योजना आयोग और उसके बाद विनिवेश और सिर्फ संचार मंत्रालय की जिम्मेदारियां थमा दी गई। अरुण शौरी राजनीति में लालच के तहत नहीं आए थे। उन्हें विश्व बैंक से तीन लाख रुपए मासिक की टैक्स फ्री पेंशन मिलती है। हर साल दो किताबें लिखते हैं जो हाथों हाथ बिक जाती है। कहीं भाषण देने जाते हैं तो उसका भी पैसा मिलता है। दिल्ली में एक बस्ती में आलीशान घर है। पत्नी और एक बेटा है जिसके शारीरिक दुर्भाग्य से शौरी परिवार भी जूझ रहा है।

इन्हीं अरुण शौरी ने जब यह खुलासा किया कि 2009 में बजट पर राज्यसभा में बहस उन्हें शुरू करनी थी। यह पार्टी का फैसला था। अरुण शौरी ने तैयारी कर ली थी मगर शायद बजट को कॉमेडी सर्कस बनाने के लिए वैंकेया नायडू को पहल करने का मौका दिया गया। संदर्भ नीरा राडिया वाले टेपों का ही था जिसमें मुकेश अंबानी का खास तौर पर जिक्र किया गया था। सबको पता था कि अरुण शौरी को मुकेश अंबानी के बारे में बहुत कुछ पता है और वे बोलेंगे ही।

अरुण शौरी के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़े और प्रधानमंत्री के तौर पर अटल बिहारी वाजपेयी के सचिव रहे नंद कुमार सिंह स्वीकार करते हैं कि शौरी का नाम पीछे धकेलने के पीछे उनका भी दिमाग था। अरुण शौरी ने तो पहले ही कह दिया था कि वे मुकेश अंबानी को छोड़ने वाले नहीं है। राडिया के साथ गुप्तचर एजेंसियों ने जो टेप बनाए हैं उनमें राडिया और नंद कुमार उर्फ एनके सिंह की भी बातचीत है। एनके सिंह तो राडिया को यह कहते पाए गए हैं कि अरुण शौरी से अनिल अंबानी ने वायदा कर दिया है कि कैसे भी कर के वे श्री शौरी को राज्यसभा में वापस लाएंगे। श्री सिंह यह वायदा अंबानी के रिलायंस के वाइस प्रेसीडेंट टोनी जेसुदासन के जरिए किया हुआ बता रहे थे। हालांकि अरुण शौरी ने अपने पुराने दोस्त एनके सिंह की आवाज एक बार सुन कर ही पहचान ली थी लेकिन मीडिया को एनके सिंह शायद इतने महत्वपूर्ण कभी नहीं लगे कि उनका जिक्र भी किया जाता।

वैंकेया नायडू से बात की तो वे बोले कि मैं तो पार्टी के फैसले के हिसाब से चल रहा था। पार्टी का फैसला तो अजीबो गरीब तरीके से यह था कि चूंकि वैंकेया नायडू पार्टी के अध्यक्ष रह चुके हैं इसलिए उन्हें पहले बोलने का मौका दिया जाना चाहिए। यह तब है जब नायडू चुटकुले सुनाने के अलावा किसी गंभीर बात के लिए नहीं जाने गए। मगर अरुण शौरी ने साबित कर दिया है कि भाजपा में भी फैसले फिक्स होते हैं और नीरा राडिया की आज भी वहां तक पहुंच है।

यहां जिस टोनी जेसुदासन का जिक्र किया गया है वह बहुत जगह भटकते हुए रिलायंस तक पहुंचे हैं। केरल के रहने वाले हैं। भारत के अमेरिकी दूतावास के मीडिया विभाग में काम करते हैं और जिस भी पत्रकार में जरा भी संभावना दिखी, उसे दो महीने का अमेरिका दौरा करवा दिया। शुरुआत टोनी ने मुकेश के रिश्ता प्रबंधक के तौर पर की थी और इतनी वफादारी तो उनमें हैं कि एनरॉन से बहुत मोटे पैसे का ऑफर मिलने के बावजूद उन्होंने मुकेश को इस बारे में बताया भी नहीं। दिल्ली के फिक्सर्स में टोनी शायद मैरिट लिस्ट में आएंगे। हंसमुख हैं, प्यार से बात करते हैं और देश के बड़े बड़े संपादकों तक उनकी पहुंच है। राजनीति में भी उनका काफी वैसे भी काफी अच्छा दखल है और एक बार तो राज्यसभा में तक कहा गया था कि मनमोहन सिंह को हटा कर टोनी जेसुदासन तीसरा मोर्चा भी बनवा सकते हैं और एक नई सरकार लाने में भी मददगार साबित हो सकते हैं।

टोनी अमेरिकी दूतावास के जमाने से अपने मित्र हैं और जिस जमाने में टेलीफोन होना सपने की बात हुआ करती थी तब उनके सैनिक फार्म्स वाले घर पर फोन तत्कालीन संचार मंत्री अर्जुन सिंह से कह कर मैंने ही लगवाया था। तब मोबाइल का जमाना नहीं था। फिर तो टोनी का ऑफिस मैरिडियन होटल टॉवर्स में एक पूरी मंजिल पर हुआ और फिर आजकल औरंगजेब रोड पर दो राजदूतावासों के बीच में वे ऑफिस चलाते हैं।  लेकिन यह समझ में नहीं आता कि श्रेय टोनी और राडिया जैसे लोगों को दिया जाए या भाजपा जैसी चाल, चरित्र और चिंतन का दावा करने वाली पार्टियों पर सवाल खड़ा किया जाए। आखिर अगर भाजपा तक नीरा राडिया और टोनी जेसुदासन दोनों की पहुंच है और दोनों ही फैसले बदलवा सकते हैं तो जाहिर है कि हमारी राजनीति और हमारा लोकतंत्र मैनेज किए जाने लायक है और हमारा आपका वोट तो निमित्त मात्र है, असल में तो बड़े बड़े महारथी नेता मैनेज होते ही हैं।

अरुण शौरी मैनेज नहीं हुए इसलिए किनारे लग गए। आजकल दिल्ली की बजाय पुणे में रहते हैं मगर दिल्ली आते जाते रहते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी के राजनैतिक दृश्य से बाहर हो जाने के बाद अरुण शौरी को भाजपा में कोई ज्यादा संभावना नजर नहीं आती और राजनैतिक प्राणी तो वे कभी नहीं थे। बहुत कहा जाता है कि राजनीति में अच्छे लोगों को आना चाहिए मगर अच्छे या बुरे जैसे भी हों, राजनीति में आ रहे हैं उन सबको अरुण शौरी से एक बार बात जरूर कर लेनी चाहिए।

लेखक आलोक तोमर जाने-माने पत्रकार हैं.

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