त्वरित न्याय का गंगाजल

अमिताभ“पापा, पता नहीं आप सारे पुलिस वाले गंगाजल फिल्म इतना पसंद क्यों करते हैं? मैंने यही हाल रांची में देखा, पटना में भी और आपको भी देखती हूँ.” बेटी तनया ने कल रात जब यह बात कही तो मुझे लगा बात में कुछ दम है. मैं औरों का तो नहीं जानता पर यह सही है कि जब भी यह फिल्म टीवी पर आती है तो मैं उसे हर बार देखने लगता हूँ, जबकि पत्नी नूतन और दोनों बच्चे इसका विरोध करते हैं. फिर सोचता हूँ कि ऐसी क्या बात है इस फिल्म में जो बार-बार मुझे इसकी ओर सम्मोहित कर देती है.

आगे बढ़ने के पहले मैं इतना बता दूँ कि गंगाजल 2003 की प्रकाश झा की फिल्म है, जिसमे अजय देवगन ने अमित कुमार नाम के बिहार के एक काल्पनिक जिले के ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ एसपी की भूमिका बखूबी निभायी थी. फिल्म के कुल मिला कर दो मुख्य प्लाट थे- एक तो साधू यादव नाम के एक माफिया नेता और उससे जुड़े काले कारनामों का चित्रण और दूसरा पुलिस थाने में आँखों में तेज़ाब डाल कर कुछ अपराधी तत्वों को अंधा बना देने का प्रकरण. ये दूसरा मामला बिहार के ही कुचर्चित भागलपुर आंखफोड़वा कांड से प्रभावित था.

अब ये फिल्म मुझे क्यों पसंद आई इसके कई कारण हैं. पहला तो ये कि कई दूसरी हिंदी फिल्मों की तुलना में इस फिल्म में पुलिस विभाग से जुडी तमाम बाते, जानकारियाँ, सब-कल्चर, माहौल, वेश-भूषा, बात-चीत, कार्य-पद्धति काफी हद तक स्वाभाविक जान पड़ती थीं. ऐसा दिख जाता था कि इस फिल्म के निर्माण में किसी न किसी अंदर के आदमी का योगदान है. मैंने विकिपीडिया पर पाया कि वहां इस फिल्म को महेंद्र लालका की दिमागी उपज दर्शाया गया था. महेंद्र लालका हमारे यूपी कैडर के ही अवकाश प्राप्त आईपीएस अधिकारी हैं और मैं इस जानकारी से सहमत दिखता हूँ, क्योंकि उनकी शुरू से ही कलात्मक कार्यों में अभिरुचि रही थी. कई-कई चीज़ें तो जैसे मुझे एकदम से उन दिनों में ले जाते थे, जब मैं भी किसी जिले में एसपी हुआ करता था. मसलन रात के समय दिखाया गया एसपी का बँगला, वहाँ खड़ी साइकिल-मोटर साइकिल आदि तथा सामने संतरी पहरे पर सिपाही. इसी प्रकार से एसपी का ऑफिस, थानों के माहौल, कई पुलिस वाले पात्रों के चेहरे-मोहरे, भाव-भंगिमाएं. कुछ तो मुझे ऐसे लग रहे थे जैसे उन्होंने मेरे साथ भी कहीं-ना-कहीं काम किया हो. जाहिर है कि इस प्रकार की समानताएं खुद ही किसी को भी एक फिल्म की ओर आकर्षित कर देती हैं.

पर मैं यहाँ फिल्म के गुण-अवगुण के विश्लेषण के स्थान पर प्रकाश झा की इस फिल्म में जो मूल मुद्दा उठाया गया है उसकी चर्चा करना चाहूँगा. फिल्म में कुछ अभियुक्तों को पुलिस थाने के अंधा कर देने और उसके बाद उत्पन्न हुई स्थितियों और क्रिया-प्रतिक्रया का विषद विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है. यह एक ऐसा मुद्दा है जिससे हम सभी लोग प्रभावित हैं और जिसके प्रति एक अजीब किस्म की बेचैनी भी रहती है. इस प्रकरण पर राय-विचार अलग-अलग किस्म के मिल जायेंगे. कई लोग कहेंगे कि यह तो क्रूरता और बर्बरता की पराकाष्ठा है, पर यह भी उतना ही कटु सत्य है कि एक बड़ी भारी संख्या में लोग हमें मिल जायेंगे जो खुले-आम ऐसे तात्कालिक न्याय का पुरजोर समर्थन करेंगे.

मानवाधिकारों के प्रति सजग एक व्यक्ति के रूप में मैं यह तो कहूँगा कि वहाँ जो कुछ भी पुलिस ने लिया वह पूरी तरह गलत, निंदनीय और आपराधिक था, पर एक समाजशास्त्री के रूप में इस सच्चाई से कैसे मुंह मोड सकता हूँ कि जिस प्रकार से तेजपुर की जनता ने पुलिस के उस गुंडा-न्याय को हाथों-हाथ लिया था, वह सब लोगों के लिए एक ऐसा विचारणीय प्रश्न है जिसे हम सिरे से खारिज नहीं कर सकते. अपने स्वयं के निजी अनुभवों से भी मैं यह कह सकता हूँ कि ऐसा वास्तविक जीवन में भी देखने को मिल जाता है. कम से कम दो ऐसी घटनाएं मेरे कार्यकाल में मुझे बखूबी याद हैं जब उत्तेजित भीड़ ने अभियुक्तों के मकान पुलिस वालों को धत्‍ता बता कर जला दिया था, क्योंकि उनका मानना था कि इन अभियुक्तों के साथ कोई अन्य न्याय तो होगा नहीं, वो कुछ भीड़ अपने हाथों कर देगी, वही न्याय होगा.

यही वह मानसिक अवस्था है जो गंभीर और खतरनाक हैं. वास्तव में खतरनाक. क्योंकि कोई भी समाज जब एक विधिक न्यायिक प्रणाली से अपना विश्वास उठा कर इस प्रकार के त्वरित न्यायों की ओर आकर्षित होने लगता है, तब वहाँ के हालातों को लेकर गंभीर प्रश्न खुद-ब-खुद पैदा हो जाते हैं.

और तो और मैंने यह प्रवृत्ति स्वयं पत्रकार बिरादरी में भी देखा है और इन्हें भी इस मानसिकता से बहुत अलग नहीं पाया है. मैं यहाँ एक घटना का जिक्र करूँगा जिसका केन्द्रीय पात्र मैं ही था. यह घटना गोंडा जिले के करनैलगंज थाने की है. हुआ यह था कि वहाँ बाल-श्रम के विरुद्ध काम करने वाले कैलाश सत्यार्थी कई इलेक्ट्रोनिक मीडिया के पत्रकारों के साथ एक सर्कस स्थल पर पहुँच गए थे. सर्कस का मालिक कुछ बदमाश किस्म का था- उसने इन लोगों से हाथापाई कर ली और उसमे सत्यार्थी का सर भी फूट गया. मुझे सूचना हुई, मैं पहुंचा. एक क्रोध, उन्माद और खौफ का मिला-जुला माहौल था. उनमें एक विदेशी महिला भी थी. मैंने उन लोगों को कहा कि मैं इसके साथ “तात्कालिक न्याय” करूँगा, लेकिन यह शर्त है कि कोई भी अपना कैमरा नहीं चलाएगा. और मेरे सामने ही उस समय के सारे बड़े-बड़े चैनलों के बड़े-बड़े पत्रकारों ने अपने कैमरे बंद कर लिए और उस विदेशी महिला से भी ऐसा करवा दिया. सभी का मत था कि आगे तो कुछ होगा नहीं जो न्याय होना है अभी हो जाए. और मैंने जितना भी “न्याय’ किया उतना सब वे मन्त्र-मुग्ध भाव से देखते रहे और बाद तक उसकी प्रशंसा करते रहे.

यदि बड़े-बड़े पत्रकारों और मानवाधिकार संरक्षकों की यह सोच है तो आप समझ सकते हैं कि आम आदमी की क्या सोच बन गयी होगी. और यही बात समाज की व्यवस्था के लिए दुखद और भयावह है. अब मूल प्रश्न यह है कि इन स्थितियों से निजात कैसे हो और क्या रास्ता है?  इस बात पर मुझे चीन के महानायक माओत्से-तुंग याद आते हैं, जिन्होंने एक समय चीन में यह आदेशित कर दिया था कि हमारे सारे बुद्धिजीवी कुछ समय के लिए कॉलेज और विश्वविद्यालय छोड़ कर देहातों में जाएँ और वहाँ की स्थितियों को ऊपर उठायें. यानी कि परिस्थितियों के अनुरूप नीतियां और नियम बदलते रहते हैं. आज की न्यायिक व्यवस्था में भी इस प्रकार के सोच की जरूरत जान पड़ती है, जहां न्याय के साथ-साथ उसका शीघ्र निस्तारण अधिक जरूरी हो गया है. उदाहरण के तौर पर सोचे तो एक अदालत में यदि साल भर में सौ मुकदमें आये और उनमे चालीस से पचास मुकदमें ही निस्तारित हो सके (जो संभवतः वर्तमान स्थिति है) तो साल भर में पचास मुकदमे लंबित हो गए. दो साल में दोगुना और तीन साल में तीन गुना और देखते ही देखते सारी व्यवस्था ही जाम हो जाए. इसके बाद फिर अराजकता, कुव्यवस्था और अनियंत्रित स्थिति ही बच जाती है. ऐसे में दामिनी फिल्म का चर्चित संवाद “तारीख पर तारीख” ही दिखता रह जाता है और कुछ नहीं.

दाण्डिक न्याय प्रणाली प्रसिद्ध न्यायविद ब्लैकस्टोन के शब्दों में-“कई गुनाहगार का छूट जाना एक बेगुनाह की सजा से बेहतर है” पर हमारी पूरी व्यवस्था आधारित है. मैं आज के इन जमीनी हालातों के अनुरूप इसमें कुछ परिवर्तन करने की बात निम्न शब्दों में करता हूँ- “सारे लम्बित मामलों का निस्तारण, सभी मामलों में पूर्ण न्याय देने से बेहतर है.” क्योंकि यदि एक बार इस भारी लंबित मुकदमों का बोझा हट गया तो फिर आगे चल कर नए सिरे से चीजों को देखा जा सकता है. इसे हर हाल में हर कोर्ट के स्तर तक सुनिश्चित करना आज अनिवार्य सा जान पड़ता है. अन्यथा तो जनता का इस प्रकार के गंगाजल के प्रति आकर्षण बढ़ता ही जाएगा जो किसी भी दशा में देश और समाज के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता.

लेखक अमिताभ ठाकुर पुलिस अधिकारी हैं. इन दिनों अवकाश लेकर शोध, लेखन और घुमक्कड़ी के काम में व्यस्त हैं. उनसे संपर्क amitabhthakurlko@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

Comments on “त्वरित न्याय का गंगाजल

  • deepak srivastav, gorakhpur says:

    बहुत खूब लिखा है भैया, इसे आगे भी जारी रखें……….

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  • Rahul Chouksey says:

    sir apke dwara karnellganj mein kiye nyay ki mein khule dil sarahna karta hu…..mein apki kartavyanishtha ko bhi salam karta hu ki aapne is khule manch par iska ullekh bhi kiya….ummid karta hu ki police tantra mei vyapt bhrashtachar ki samasya par sujhav va samadhan sahit lekh padhne ko shighra milega….

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  • धनंजय सिंह says:

    भाई,अच्छा लिखतें हैं.ये लेखन ब्रेक के बाद भी चलता रहे…
    शुभकामनाएं!

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  • ittfaque se maine pichle dino hi gangajal dekhi hai… apka lekh film ko dekhne ke bed uthne wale prshno ki uttar de rha h……… apne aise hi vichar jin me aap ke anubhav bhi ho, aage bhi share krte rahiyega…….

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  • Your article is very impressive , written on realistic ground. Really people are fed up with present system of judicary . If our court is unable to dispose of pending cases , they must deploy some agencies to look after that as consultant duly authorise &appointed by judicary . Undue delay in justice , people are bound to have attraction on movie Ganga Jal & Damini .
    I appreciating heartily your appealing approach towards this burning issue of present scenerio of law and remedies.
    Jai Hind_ Jai Bharat.

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  • मदन कुमार तिवारी says:

    “सारे लंबित माम्लों का निस्तारण सभी मामलों में पूर्ण न्याय देने से बेहतर है” समस्या का समाधान नही है। । और एक की कीमत पर दुसरे को हासिल करने की बात समस्या का निदान कभी नही हो सकती। सिर्फ़ न्यायिक देरी कारण नही है। व्यवस्था से पैदा हुआ आक्रोश , फ़टाफ़ट न्याय और नक्सलवाद को जन्म देता है। हम ऐसी स्थिति में पहुंच चुके हैं। जहां सुधार की बात बेमानी है। ३० प्रतिशतत आबादी भ्रष्ट हो चुकी है और ५० प्रतिशत होने के कगार पर है। सिवाय पाप स्विकार के अब रास्ता क्हां बचता। कोई लाल बहादुर शास्त्री तो रहा नही कि रेल दुर्घटना हो और ईस्तीफ़ा दे दे। यहां तो खुद दोषी है और चिल्ला रहे हैं कि दोषियों को बख्शा नही जायेगा।

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