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पॉवर-पुलिस

दरवाज़ा खोला तो सामने गोविंदाचार्य थे

अमिताभजीआज जब लोक सत्ता अभियान के सुरेन्द्र बिष्ट हमारे लखनऊ स्थित घर आये तो मुझे यह नहीं मालूम था कि उनके साथ कोई और भी खास व्यक्ति होगा. इसीलिए जब मैंने घंटी बजने पर घर का दरवाज़ा खोला तो सामने अचानक गोविन्दाचार्य जी को देख कर दंग रह गया. गोविन्दाचार्य जी आज एक किम्वदंती हैं इस बात से कोई इनकार नहीं करेगा. उनके राजनीति और सामाजिक कार्यों में योगदान के विषय में भी हम बहुत कुछ जानते हैं और साथ ही उनके तमाम राजनितिक झडपों को भी. यह भी हम जानते हैं कि अब वे अपने तरीके से देश में एक नया अलख जगाने में लगे हुए हैं.

अमिताभजीआज जब लोक सत्ता अभियान के सुरेन्द्र बिष्ट हमारे लखनऊ स्थित घर आये तो मुझे यह नहीं मालूम था कि उनके साथ कोई और भी खास व्यक्ति होगा. इसीलिए जब मैंने घंटी बजने पर घर का दरवाज़ा खोला तो सामने अचानक गोविन्दाचार्य जी को देख कर दंग रह गया. गोविन्दाचार्य जी आज एक किम्वदंती हैं इस बात से कोई इनकार नहीं करेगा. उनके राजनीति और सामाजिक कार्यों में योगदान के विषय में भी हम बहुत कुछ जानते हैं और साथ ही उनके तमाम राजनितिक झडपों को भी. यह भी हम जानते हैं कि अब वे अपने तरीके से देश में एक नया अलख जगाने में लगे हुए हैं.

चूँकि मेरी कत्तई ऐसी स्थिति या कृत्य नहीं हैं कि उनकी शख्सियत का कोई आदमी मेरे पास आता, अतः मैं उनको एकदम से सामने पाकर अचंभित हो गया. पर गोविन्दाचार्य जी ने इतनी सहजता और सादगी के साथ अपने आप को प्रस्तुत किया कि मैं उसका कायल हुए बगैर नहीं रह सका. मैं दावे से कह सकता हूँ कि जितनी खुशी मुझे अपने सामने गोविन्दाचार्य जी को देख कर हुई, उसका दसवां हिस्सा भी बॉलीवुड के खानों और क्रिकेट के धोनी को देख कर नहीं होती (यह नहीं कह रहा हूँ कि वे लोग मेरे जैसे ऐरे-गैरे नत्थू खैरे के घर चले ही आ रहे हों).

परिचय के साथ ही बातों का सिलसिला शुरू हुआ. मेरी बातचीत और मेरे अंदाज़ से वे एकदम समझ गए के कि मैं कहाँ का हूँ और हमारे तरफ कैसी बोली है. फिर तो वे एकदम ठेठ बिहारी में वैसे ही बात करने लगे जैसा हम लोग आमतौर पर शब्दों को कुछ खींच कर बोलते हैं. बल्कि मैं कई सालों से यूपी में रहने के कारण भूल गया हूँ पर उन्हें क्या कुछ भूल सकता है? फिर मालूम चला कि वे हिंदी की लगभग सभी बोलियों के अलावा मलयालम, तमिल, तेलुगु, कन्नड, बंगाली, मराठी, ओडिया और अन्य तमाम भारतीय भाषाएँ जानते हैं.

भाषा सिखने के बारे में उनका बहुत सीधा सा सिद्धांत है- “आप हिंदी या अंग्रेजी में बोलना छोड़ दीजिए और जहां गए हों, वहीं की भाषा बोलने लगिये, अपने आप बोलना सीख जायेंगे.” और लिखने के बारे में -“वह तो और भी आसान है. आप सबसे पहले दुकानों और आस पास के बोर्ड पर लिखी बातें देखिये और इससे पूरा अंदाजा मिल जाएगा.” मैं सोचता हूँ कि क्या यह वाकई इतना आसान है या फिर चूँकि वे गोविन्दाचार्य हैं इसीलिए बाकियों की तुलना में वे कई गुणा जल्दी यह सब समझ लेते हैं.

तभी अचानक बातचीत के क्रम में उनकी निगाह वहीं रखी बागमती नदी के ऊपर लिखी एक पुस्तक पर गयी, जो एक अन्य जीनियस डॉ. दिनेश कुमार मिश्र द्वारा लिखी है, जिन्होंने आईआईटी खड़गपुर की पढ़ाई के बाद अपनी पूरी जिंदगी उत्तरी बिहार में बाढ़ की समस्या पर बिता दी है. मैंने डॉ. दिनेश का नाम बताया तो चहक पड़े- “अरे, वो तो बहुत ही अच्छे आदमी हैं. उनका बहुत नाम सुना है.” मैंने उनसे बात कराने को पूछा तो एकदम तैयार हो गए और फिर जो बात हुई तो लगता था कि दोनों बरसों पुराने मित्र हों.

गोविंदाचार्य

इसी तरह की तमाम अन्य बातें भी हुईं पर जो बात मुझे सबसे अलग किस्म की लगी वह यह कि जब मैंने अपने बच्चों तनया और आदित्य को इस महान शख्सियत से मिलाने के लिए बुलाया तो वे तुरंत बातचीत का क्रम बदल कर आइसक्रीम और स्टडी पर आ गए. फिर मेरी पत्नी नूतन आयीं और गोविन्दाचार्य जी ने उनके पटना और हाजीपुर के घर के आसपास की तमाम बातें बता दी.

जब विदा होने का अवसर आया तो उन्होंने तुरंत नूतन को आदेश दिया- “अगली बार आऊंगा तो तुम्हारे घर पर भोजन करूँगा.” फिर वे बिहार में मिथिलांचल के भोजन पर ही शुरू हो गए- तरुआ, भरुआ, तिलौरी, अदौरी, बचका और न जाने क्या-क्या.

इमरजेंसी के दिनों का एक बहुत मजेदार किस्सा उन्होंने बताया. उस समय बिहार के सबसे बड़े हिंदी अखबार आर्यावर्त के संपादक के लड़के उनके मित्र थे. उन्होंने एक दिन गोविन्दाचार्य जी को कहा कि वे एक ऐसा उपाय जानते हैं जिससे वे थोड़ा मेहनत करके गोरे हो जायेंगे और कई दिनों तक गोरापन बना रहेगा. इससे कोई उन्हें पहचान नहीं पायेगा और आराम से बचे रहेंगे. वे इसके लिए तैयार हो गए और मित्र ने मुंह रंग दिया. फिर कहा कि अब आप पन्द्रह दिन के लिए निश्चिन्त हो गए. चेक करने को भी कहा. गोविन्दाचार्य जी ने बाथरूम में जा कर पानी से चेहरा धोया और रंग एक बार में ही झर-झर करके गिरने लगा. तब उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि अच्छा हुआ अभी ही पता चल गया नहीं तो बाद में बड़ी भद्द होती.

तब अपनी गिरफ्तारी से बचने के लिए गोविंदाचार्य ने इंस्‍पेक्‍टर से झूठ बोला था : गोविन्दाचार्य एक बहुत बड़े आदमी है यह तो मैं बहुत समय से जानता था पर वे एक अनूठे व्यक्ति हैं, एकदम से अलग, विशिष्ट गुणों से युक्त यह बात मैं आज जान सका. गोविंदाचार्य जी ने आज अन्य बातों के अलावा अपने पुलिस सम्बंधित अनुभव भी सुनाये. यह तब शुरू हुआ जब मैंने पूछा कि वे कभी गिरफ्तार हुए थे या नहीं. उन्होंने बताया कि वे दो बार गिरफ्तार हुए थे, दोनों इमरजेंसी के समय. इसमें दूसरे बार की घटना काफी मजेदार थी.

हुआ यह था कि उस समय वे भागलपुर गए हुए थे जहां श्री रामजी सिंह के चुनाव प्रचार के सिलसिले में एक मीटिंग थी. उन्हें कुछ शंका सी तो थी कि उनका कोई नजदीकी पुलिस को सुराग दे रहा है पर फिर भी जाना जरूरी था, इसीलिए गए. यहाँ जैसे ही वह बोल रहे थे कि मालूम हुआ पुलिस आ रही है, तुरंत भाषण देना छोड़ कर सुनने वालों में चले आये और वर्तमान में बिहार के वरिष्ठ मंत्री अश्विनी चौबे को आगे भाषण देने को कह दिया.

श्री मिश्रा नामक एक इन्स्पेक्टर साहब आये. उन्होंने आते ही सभी लोगों से गोविन्दाचार्य जी की उपस्थिति के बारे में पूछा. सभी लोगों ने मना कर दिया. इस पर उन्होंने एक-एक आदमी से उसका पूरा हाल-हुलिया पूछना शुरू किया. जब गोविन्दाचार्य जी का नंबर आया तो ये बड़े शांत भाव से खड़े हो गए.
नाम?- हजूर, राम स्वरुप तिवारी

पिता का नाम? – राम भरोस तिवारी

कहाँ रहते हो? – सरकार, फलां गाँव, फलां पोस्ट, आरे जिला (यानी आरा, भोजपुर)

का करते हो? – हजूर, प्राइमरी में माहटर हईं.

इहाँ कहाँ आ गए? – सरकार यही मनई घींच लाहीन. हम जान रहे थे इहाँ लफड़ा होगा.

“अच्छा, ठीक है” कह कर इंस्पेक्टर साहब वहाँ से मुतमईन हो कर चल दिए कि गोविन्दाचार्य यहाँ नहीं हैं. जब गाड़ी के पास पहुंचे तो मुखबिर ने कहा- मिल गए ना.

इंस्‍पेक्टर साहेब बोले-“वो नहीं थे.” मुखबिर ने कहा बिलकुल हैं और दुबारा वहाँ ले कर चला. वहाँ गोविन्दाचार्य जी ने उसको देखा और समझ गए कि अब गिरफ्तारी हो गयी.

जब वे पुलिस जीप में बैठे तो इंस्पेक्टर तमतमाया हुआ था-. छूटते ही कहा-“आप इतने बड़े आदमी हैं. आप को झूठ बोलते शर्म नहीं आई.”

गोविन्दाचार्य जी ने कहा- “चलिए झूठ बोला तो आप पकड़ तो नहीं पाए.” फिर थाने आये तो इंस्पेक्टर ने चाय-नाश्ता मंगाया और बात खत्म हो गयी.

उन्होंने यह भी बताया कि कैसे भारी पुलिस व्यवस्था के बावजूद वे लगभग रोज नज़रबंद जयप्रकाश नारायण जी से मिल लेते थे. दरअसल वे सुबह सवा छह बजे सिपाहियों के न्यूज़ सुनने जाने का इन्तजार करते, धीरे से घर में घुसते. फिर जब दुबारा सिपाही साढ़े नौ बजे का रेडियो समाचार सुनने बाहर जाते तो धीरे से निकल लेते और पूरी सुरक्षा व्यवस्था के रहते हुए अपना काम करते रहते.

ये सब किस्सा सुना कर गोविन्दाचार्य जी ने हंस कर कहा-“अमिताभ जी, आपकी पुलिस से बचना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है. आदमी को बस अपना एंटीना खुला रखना चाहिए.”

लेखक अमिताभ ठाकुर आईपीएस अधिकारी हैं. इन दिनों लखनऊ में पदस्थ हैं.

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0 Comments

  1. Rajendara Hada

    February 26, 2011 at 11:06 am

    govindacharyaji nek bhale insan hain. mujhe 1985 me das din niranter unke sath jaipur aik ayojan ki taiyari me rahne ka sobhagya mil chuka hai. ajmer bhi khub aate the. bahut kuchh sikhne ko mila. un se mile sanskar aaj bhi kam aa rahen hain.
    -Rajendara Hada, Ajmer

  2. surendra pandey

    March 6, 2011 at 3:44 pm

    amitabh sir,
    govind ji ko bahut karib se janne, sunne ka muka mila hai. aap ka sansmaran padh kar yad taja ho gai.
    surendra pandey. reporter basti

  3. यश

    June 5, 2011 at 1:47 pm

    अमिताभ जी गोविंदाचार्यजी का तो मैं भी कायल हूँ ! लेकिन आपको डर नहीं लगा आपने माया के राज मे गोविंदाचार्य के बारें मे लेख लिखा ?

  4. Dr. S. K. Pandey

    June 6, 2011 at 5:52 pm

    Govindacharya’s simplicity is artificial.

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