नौनिहाल और मामूली रिक्शे वाले का साला

नौनिहाल शर्मा: भाग 35 : नौनिहाल बहुत भोले स्वभाव के थे। उन्होंने हैंड कंपोजिंग से शुरूआत की थी। बात उन्हीं दिनों की है जब वे जागरण में काम कर रहे थे। जागरण के पत्रकार ही नहीं, दर्जनों हैंड कंपोजिटर भी उनके चेले थे। उन्हें ट्रेडल मशीनों की भी बहुत अच्छी जानकारी थी। कई बार कंपोजिटर या मशीनमैन कहीं फंस जाते।

ऐसे में वह भागकर नौनिहाल के पास आता। उन सबको नौनिहाल के सभी ठिकानों की जानकारी थी। यहां तक कि कभी हम कहीं चाय पीने जाते, तो वहां पहले से नौनिहाल के कुछ चेले बैठे दिख जाते। कोई पेशेवर समस्या बताता, तो कोई निजी। नौनिहाल सबकी शंकाओं का समाधान करते। कई बार खूब मजेदार बातें भी हो जातीं। एक बार हम रोडवेज अड्डे पर गये। वहां हम हर हफ्ते जाते थे। व्हीलर के स्टॉल पर पत्रिकाएं देखने के लिए। मंगलवार या बुधवार को वहां सभी पत्रिकाओं के नये अंक मिल जाते थे। वहां से कई पत्रिकाएं खरीदी जातीं। फिर हम सदर बाजार जाते। वहां बड़े तारघर में राजू का चाय का ठेला था। राजू भी नौनिहाल का भक्त था। एक बार ऐसी ही एक ‘यात्रा’ पर हम राजू के ठेले पर पहुंचे। वहां दो लड़के पहले से खड़े थे। हम साइकिलों से उतरे ही थी कि उन्होंने आगे बढ़कर नौनिहाल की साइकिल थाम ली और इशारे से उनसे बात करने लगे।

‘सलाम भाई जान।’

‘सलाम। कैसा है नफीस? बहुत दिन बाद दीदार दिये?’

‘क्या बताऊं उस्ताद, नून-तेल-लकड़ी के चक्कर में ई फंसा हूं।’

‘चल, चाय पी जाये।’

‘चाय-वाय तो होती रैहगी उस्ताद। फिलहाल तो एक मुश्किल हल करो।’

‘बोल यार। क्या बात है?’

‘उस्ताद, ये मेरा साला है। रईस। गांव में रहता है। बागपत के पास है इसका गांव। मतलब मेरी ससुराल। वहां इन लोगों का झगड़ा हो गया। पड़ोसियों से। इसने दो को लहू-लुहान कर दिया। उन लोगों के घरवालों ने इसे धमकी दी है कि गांव में दिखायी दिया, तो छोड़ेंगे नईं…’

‘तो मैं उनसे लडऩे जाऊं क्या तेरी ससुराल?’

‘नई उस्ताद। तुम्है तो पता ई है। मैं लड़ाई-झगड़े सै कोस्सो दूर रहू हूं। इसै कुछ काम करवाना है।’

‘कुछ काम जानता है?’

‘जानै तो बस खेत्ती ई है। तुम्हारा हाथ लग जागा तो लौंडा खा-कमा लैगा कुछ। अर यां महफूज बी रहवैगा।’

‘अबे, तू भी अजीब चीज है। कुछ काम नहीं जानता, तो मैं कैसे और क्या करा सकता हूं?’

‘उस्ताद याद ना है, तुमने ई तो मेरे भाई को होटल मैं लगवाया था आबू लेन पै। इस पै बी ऐसा ई हाथ लगा दो।’

‘अपने भाई के पास ही होटल में लगवा दे इसे।’

‘होटल का काम ना करना चाहवै है। लिखा-पढ़ा है।’

‘कितनी पढ़ाई की है?’

‘दस तक। इसै तो कोई ऐसा काम दिला दो, जिसमें कुछ पढ़ाई काम आ जा।’

‘ठीक है। चलते हैं अभी। पहले राजू की चाय पी ली जाये।’

हमने चाय पी। इस बीच नौनिहाल ने मुझे नफीस के बारे में बताया। वह इस्लामाबाद में रहता था। रिक्शा चलाता था। एक बार नौनिहाल को सपरिवार सदर में अपनी ससुराल जाना था। सुभाष नगर के बाहर उन्होंने नफीस का रिक्शा लिया। थापर नगर के पास जाकर उसके रिक्शे की चेन टूट गयी। उसने दूसरा रिक्शा पकडऩे को कहा। नौनिहाल परिवार सहित वहीं खड़े रहे। उनका तर्क था- तुझे पैसे दिये बिना हम जायेंगे नहीं। और दूसरे रिक्शे के लिए, मतलब दोहरा खर्चा करने का पैसा हमारे पास है नहीं।

नफीस को करीब आधा घंटा लगा अपना रिक्शा कराने में। इस बीच नौनिहाल अपनी पत्नी और दोनों लड़कों सहित उसके साथ-साथ ही रहे। और उसी के रिक्शे में बैठकर अपनी ससुराल पहुंचे। पहले उसे पानी पिलवाया। फिर चाय। उसका पता-ठिकाना पूछ लिया। अपना भी बता दिया। यहां तक कि नफीस को उनके सारे ठिकानों का पता चल गया। जब दिल करता या कोई जरूरत होती, तो पहुंच जाता उनसे मिलने। इस तरह, मेरठ के हर मोहल्ले में नौनिहाल के दोस्त थे। और वे सभी उनके परिवार की तरह ही थे।

अब मुझे यह कौतूहल था कि नफीस के साले रईस को नौनिहाल कहां और क्या काम दिलायेंगे। मैं और नौनिहाल अपनी-अपनी साइकिल पर और रईस को बैठाकर नफीस अपने रिक्शे पर चले। सबसे आगे नौनिहाल। सदर से थापर नगर… और ये क्या, नौनिहाल तो बच्चा पार्क होते हुए बुढ़ाना गेट की ओर बढ़ गये। मुझे कौतूहल होने लगा कि वे कहां जा रहे हैं। वे पहुंचे बुढ़ाना गेट के पीछे कागज बाजार में। यहां छपाई का कागज और स्टेशनरी मिलती है। यहां भला गांव से आये और खेती के अलावा कुछ भी काम न जानने वाले को क्या काम मिल सकता है?

तो हम रुके कागज बाजार में एक दुकान के सामने। गल्ले पर बैठे सेठजी ने नौनिहाल को देखते ही खड़े होकर हाथ जोड़े।

‘आओ महाराज। कैसे रास्ता भूल गये आज?’

‘गुप्ताजी आज एक काम से आया हूं आपके पास।’

‘बोलो महाराज। तुम्हारे किसी काम को भला मैं मना कर सकता हूं?’

‘गुप्ताजी काम ये है कि एक बच्चे को काम दिलाना है।’

‘किसे?’

(नौनिहाल ने रईस को आगे किया) ‘इसे।’

‘तुम जानते हो इसे?’

‘इसे तो नहीं जानता। पर इसके जीजा को जानता हूं। नेक आदमी है।’

‘तुम कह रहे हो तो फिर शक की कोई गुंजाइश ही नहीं। अब ये बताओ, काम क्या कर लेगा?’

‘जो भी दोगे, कर लेगा।’

‘रिक्शा पर माल दे आयेगा पार्टी को?’

यह सवाल सेठजी ने रईस की ओर देखकर किया था। वह जरा झिझका। नफीस ने हाथ जोड़कर कहा, ‘हजूर, रिक्शा चलाने को छोड़कर कोई भी काम कर लेगा।’

‘क्यों, रिक्शा क्यों हीं चलायेगा?’

‘लिखा-पढ़ा है हजूर।’

‘अच्छा? कितना?’

‘दस तक।’

‘हिसाब लिख सकता है?’

अब रईस मुखातिब हुआ,’हां। लिख लूंगा।’

‘ठीक है। कल से आ जा काम पर। 300 रुपये मिलेंगे। तेरी जिम्मेदारी नौनिहालजी की। मैं ये नहीं कह रहा कि ईमानदारी से काम करना। मैं कह रहा हूं कि इनके भरोसे को मत तोडऩा।’

‘जी साहब। पूरे दिल से काम करूंगा। शिकायत का कभी कोई मौका नहीं दूंगा। और काम आज से ही शुरू करता हूं।’

नौनिहाल ने उसकी पीठ थपथपाई। सेठजी ने एक पैड पर से निकालकर कोई आठ-दस पर्चियां उसे दीं। उन पर पार्टियों के नाम, कागज की मात्रा, दर और कीमत लिखी थी। उसे एक रजिस्टर देकर उन्होंने वे सारे हिसाब उस पर तरतीब से लिखने को कहा। उसने सबसे ऊपर ‘786’ लिखा और तारीख डालकर लिखना शुरू कर दिया। माशाअल्ला! क्या हैंड राइटिंग थी उसकी। खुद नौनिहाल की हैंड राइटिंग बहुत सुंदर थी। इसलिए किसी और की अच्छी राइटिंग देखकर वे बहुत खुश होते थे। उन्होंने रईस को गले लगा लिया। उसे अपनी जेब से पैन निकालकर दे दिया। इस तरह वे एक मामूली रिक्शा वाले के साले को नौकरी दिलाकर ही उस दुकान से हटे।

यह बात उन्होंने बाद में बतायी कि जब वे बुढ़ाना गेट पर एक प्रिंटिंग प्रेस में काम करते थे, तो उन्हें कभी-कभी कागज लिवाने इस दुकान पर जाना पड़ता था। तभी गुप्ताजी से उनका भुवेंद्र त्यागीपरिचय हुआ था। यह नौनिहाल के व्यक्तित्व की खूबी थी कि जिससे भी उनका वास्ता पड़ जाता था, वह हमेशा के लिए उनका प्रशंसक बन जाता था। और ऐसे प्रशंसकों से उन्होंने अपने लिए कभी कुछ नहीं मांगा। हां, वे इस तरह दूसरों का काम कराने में कभी नहीं हिचकते थे। और कभी किसी ने उनका काम करने से मना भी नहीं किया। आज तो ऐसा करने वाली प्रजाति लुप्तप्राय है।

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क bhuvtyagi@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

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Comments on “नौनिहाल और मामूली रिक्शे वाले का साला

  • mahandra singh rathore says:

    shri bhuvendra tyagi ji nonihal ji ke bere mai jana. jo bhasha vartalap mai istmal hui hai wo thik bolne jeese hai. kya kamal hai. mene pura nahi padha hai per tippni ker di. nonihal ji aab kahna hai?

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