पत्रकारिता में चापलूसी के नए-नए आयाम देखे हैं मैंने : सुधांशु गुप्त

भड़ास4मीडिया पर लंबे समय से बंद ”इंटरव्यू” के स्तंभ को फिर शुरू कर रहे हैं, लेकिन नए दर्शन-फार्मेट के साथ. अब महान महान संपादकों-पत्रकारों के इंटरव्यू प्रकाशित करने की जगह हम उन लोगों को प्राथमिकता देंगे जो मीडिया इंडस्ट्री में चुपचाप लंबे समय से कार्यरत हैं या रहे हैं. ऐसे पर्दे के पीछे के हीरोज को सामने लाना ज्यादा बड़ा दायित्व है, बनस्पति उनके जो हर मोर्चों, मंचों, माध्यमों पर प्रमुखता से प्रकाशित प्रसारित मंचित आलोकित होते रहते हैं.

इसी कड़ी में हम शुरुआत सुधांशु गुप्त का इंटरव्यू देकर कर रहे हैं, जिन्होंने अभी हाल में ही हिंदुस्तान, दिल्ली से इस्तीफा दिया. अगला किसका इंटरव्यू लिया जाए, इसके लिए आप संबंधित व्यक्ति का नाम, मोबाइल नंबर और मेल हमें भेज सकते हैं. सभी प्रस्तावों, सुझावों का दिल से सम्मान व स्वागत किया जाएगा और उन्हें स्वीकार कर उन पर कार्रवाई की जाएगी. इसका यह मतलब भी नहीं है कि हम स्थापित लोगों के इंटरव्यू नहीं प्रकाशित करेंगे. उनका भी करेंगे. पर इंटरव्यू सेक्शन को अब आम पत्रकारों के लिए भी खोल दिया गया है.

डेस्क पर लंबे समय से कार्यरत वो पत्रकार जो कई दशकों तक अपनी ईमानदार सेवा देने के बाद चुपचाप विदाई ले लेते हैं, उनका इंटरव्यू क्यों नहीं प्रकाशित किया जाना चाहिए, क्योंकि इसलिए के वे नामधारी न हुए, बहुत अजीब तर्क है, और इस स्थिति की तरफ कुछ मित्रों ने ध्यान दिलाया तो तभी तय कर लिया था कि इंटरव्यू कालम के जरिए हम लोग उन्हें सामने लाएंगे जो नामधारी पत्रकारों के मुकाबले अपने निजी जीवन में ज्यादा ईमानदार और मीडिया की आंतरिक स्थितियों-जानकारियों से भरे हैं. आपके सुझावों का इंतजार रहेगा.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

मेल: yashwant@bhadas4media.com


मीडिया को भी चाहिए एक जनलोकपाल

सुधांशु गुप्त

: मैंने पत्रकारिता में इतने साल काम करने के बाद मीडिया के कई आयामों को जानने की कोशिश की, जिसमें मैंने चापलूसी के नये-नये आयाम देखे, मैंने देखा कि किस तरह जब एक साहित्यिक रुचियों का व्यक्ति संपादक बनता है, तो अखबार के घोर गैर-साहित्यिक लोग भी साहित्यिक खबरों को प्राथमिकता देने लगते हैं, कैसे संपादक के बदलते ही दूसरे वरिष्ठ लोगों के विचार, उनके काम करने का तरीका, सोचने का नजरिया, उनकी बॉडी लैंग्वेज संपादकों की सोच और विजन के अनुरूप बदल जाती है, यही चीजें मुझे पत्रकारिता में हमेशा से बहुत अपमानजनक लगीं :

-कृपया अपने जन्म, परिवार, बचपन, पत्नी, बच्चों आदि के बारे में बताएं?

  • मेरा जन्म 13 नवंबर 1962 को सहारनपुर में हुआ। मेरे जन्म के कुछ ही दिन बाद हमारा परिवार दिल्ली आ गया। सहारनपुर में मेरे दादा का अपना प्रेस हुआ करता था, जो क्रांतिकारियों को समर्थन देने के कारण जब्त हो गया था। मेरे पिता योगेश गुप्त अच्छे उपन्यासकार, कहानीकार रहे हैं। हिंदी में वे कुछ उन गिने चुने लोगों में हैं, जिन्होंने जिंदगी को अपनी शर्तों पर जिया है। जाहिर है इसका उनके परिवार पर भी बहुत गहर असर हुआ। आर्थिक संकट हमारे लिए दोस्त की तरह थे, जो घर से कभी विदा नहीं होते थे। पिताजी का एक सिद्धांत मुझे हमेशा याद रहता है। वह कहा करते थे कि संकट इनसान से लेता कम है उसे देता ज्यादा है, इसलिए मैं संकट बाजार से खरीद भी लाता हूं। इसलिए घोर संकटों में मेरा बचपन बीता है। लेकिन पिता एक ने एक ही बात सिखायी कि घर में खाना हो या ना हो, लेकिन पढ़ने की आदत बनाये रखो। इसलिए वह आदत आज तक छूट नहीं पाई है। मां एक घरेलू महिला हैं, उनकी जीवन भी इतना संकटों में बीता है कि उन्हें हमेशा लगता है कि साहित्यकारों को शादी नहीं करनी चाहिए। बावजूद इसके उन्होंने हिंदी का लगभग सारा साहित्य पढ़ा है। आज 75 साल की उम्र में भी वह हर रोज नयी किताब की मांग करती हैं। पिताजी की वजह से ही अधिकांश बड़े साहित्यकार घर आया-जाया करते थे-कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, मृदुला गर्ग। यानी घर महफिल हमेशा जमी ही रहा करती थी। मेरे अवचेतन में भी कहीं साहित्य और साहित्यकारों के प्रति आकर्षण पैदा हो गया। मैं दसवीं क्लास से ही कहानियां लिखने लगा। मेरी पत्नी कविता घरेलू लेकिन बेहद समझदार महिला हैं। मैं अपने घर से जो भी काम कर पाता हूं, उसके पीछे मेरी पत्नी की ही प्रेरणा होती है। दरअसल पूरे घर को मैनेज वही कर पाती है, मैं तो बहुत गैर दुनियादार व्यक्ति हूं। मैं पूरा घर कविता के भरोसे ही छोड़े रखता हूं। मेरे दो बेटे हैं। बड़ा दिल्ली यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर साइंस ऑनर्स कर रहा है और छोटा दसवीं क्लास में है। दोनों बच्चे बेहद समझदार और सेंसटिव हैं।

-करियर की शुरुआत कैसे की? मीडिया में किस तरह आ गए?

  • घर में साहित्यिक माहौल था, लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से ही था। बारहवीं पास करने के बाद ही मैं जाने-अनजाने अखबारों के लिए लिखने लगा था। हालांकि तब तक मन में यह तय नहीं था कि पत्रकारिता की दुनिया में जाना है। सरकारी स्कूल में पढ़ाई लिखाई की और बारहवीं के बाद ही कई छोटी-छोटी नौकरियां करने लगा। मैंने 2 रुपए प्रतिदिन पर टॉफी बनाने वाली फैक्टरी में काम किया। इसके अलावा ऑल पिन बनाने वाली फैक्टरी में भी मैंने कुछ दिन काम किया। लेकिन इन नौकरियों के साथ ही मैं रेडियो पर प्रोग्राम देने लगा था और मेरे लेख आदि अखबारों में प्रकाशित होने लगे थे। इसके बाद मैं दिल्ली प्रेस में नौकरी करने लगा। वहीं रहते हुए मैंने अपनी ग्रेजुएशन पूरी की। वहां काम करते-करते ही मेरे भीतर पत्रकार होने का बोध पैदा हुआ। उस समय मुझे लगा था कि पत्रकारिता में रहते हुए साहित्य के ज्यादा करीब पहुंचा जा सकता है। बस इसी तरह मैं पत्रकारिता की दुनिया में आ गया। और पत्रकारिता की दुनिया में भटकते-भटकते ही पहले मैं दिनमान टाइम्स पहुंचा और फिर मित्र प्रकाशन की पत्रिका माया में सालों तक काम करने के बाद हिंदुस्तान पहुंचा।

-आप इस दुनिया से विदा लेने के बाद किस रूप में याद रखा जाना पसंद करेंगे.

  • मैं एक अच्छे इनसान के रूप में ही याद रखा जाना पसंद करूंगा, लेकिन अगर मैं साहित्य में कुछ अच्छा लिख पाऊंगा तो मुझे और भी अच्छा लगेगा।

-फिल्मों का कितना शौक है. खाने-पीने और संगीत के शौक के बारे में भी बता सकें तो ठीक रहेगा.

  • फिल्मों का एक लंबे समय तक मुझे बहुत शौक रहा है। गुरुदत्त और राजकपूर की फिल्में मैं बड़े शौक से देखता रहा हूं। संगीत का मेरा शौक आम आदमी के शौक जैसा ही है। बैठकबाजी का मुझे खूब शौक है। ड्रिंक्स भी मैं कर लेता हूं।

-कई कविता या गीत सुनाना चाहेंगे जो आपको काफी प्रिय हो.

  • इब्ने इंशा की एक कविता मुझे बेहद पसंद है। कविता इस प्रकार हैः

एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों
एक मेले में पहुंचा हुमकता हुआ
जी मचलता था, इक इक शै पर मगर 
जेब खाली थी कुछ मोल ले ना सका
लौट आया लिये सैकड़ों हसरतें
खैर महरूमियों के वो दिन तो गये
आज मेला लगा है उसी शान से
आज चाहूं तो इक इक मकां मोल लूं
आज चाहूं तो सारा जहां मोल लूं
ना रसाई का जी मैं वह धड़का कहां
पर वह अल्हड़ सा मासूम सा लड़का कहां।

इसके अलावा एक शेर मुझे बहुत अच्छा लगता हैः

मुझमें ही कुछ कमी थी बेहतर मैं उनसे था
मैं शहर में किसी के बराबर नहीं रहा।

-आप खुद में क्या बुराइयां पाते हैं. कोई पांच बुराई और अच्छाइ गिनाने को कहा जाए तो क्या क्या बताएंगे?

  • मेरी पांच बुराइयां। मुझे लगता है कि मेरी आक्रामकता, बहुत ज्यादा भावुक होना, लोगों पर विश्वास करना, दूसरों की मदद करना और व्यावहारिक ना होना मेरे अवगुण हैं। जो मुझे आगे बढ़ने से रोकती हैं। मैं बहुत सहज किस्म का इंसान हूं, कुछ भी नया सीखने के लिए हमेशा तैयार रहता हूं, पढ़ना मेरा जुनून है, मैं बहुत सहयोगी प्रवृत्ति का हूं, नये लोगों को मैं हमेशा प्रेरित करता हूं, काम को लेकर मैं बेपनाह प्रतिबद्ध हूं। खेलों में भी मेरी गहरी रुचि है।

-हिंदुस्तान अखबार से इस्तीफे की वजह क्या रही?

  • हर काम के पीछे कोई न कोई कारण होता है। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ लेकिन मैं किसी को कोई दोष नहीं दे रहा हूं, न ही देना चाहता हूं। दरअसल,  मैं काफी समय से जॉब छोड़ने की सोच कुछ और नया करने का मन बना रहा था। वैसे भी मुझे लगता है काम के लंबे अंतराल के बाद ब्रेक लेना बहुत जरूरी है, जिससे आप नई चीजों की पहल कर सकें और अन्य नए लोगों से जुड़ सकें। मेरा मानना है कि पत्रकारिता की नयी तहजीब के बीच मुझे खुद को फिट रखने के लिए एक नए सिरे से अपने को तैयार करना होगा, ताकि मैं पत्रकारिता की दुनिया में और बेहतर काम कर सकूं और कुछ ऐसे कामों को अंजाम दे सकूं, जिन्हें करने का मेरा सपना है और जो काम अधूरे हैं। इन सब पहलुओं के चलते मैंने जीवन का सबसे अहम समय बिताने वाले संस्थान को अलविदा कहना ज्यादा बेहतर समझा।

-वो पल, जब आपको मीडिया में आने के बाद सबसे ज्यादा खुशी महसूस हुई?

  • 1989 में मैंने दिनमान टाइम्स में काम करना शुरू कर दिया था, लेकिन मुझे नियुक्ति पत्र नहीं मिला था। यह उस समय की बात है जब दिनमान टाइम्स को साप्ताहिक अखबार में बदला गया था। घनश्याम पंकज जी इसके संपादक थे। हम लोग बृहस्पतिवार को पेज छोड़ा करते थे। मई के महीने में, एक दिन, बृहस्पतिवार को ही देर रात घनश्याम पंकज जी ने मुझे अपने कमरे में बुलाया और नियुक्ति पत्र दिया। उस पल मुझे लगा कि मैंने जीवन में अपने कैरियर की एक सीढ़ी पार कर ली है। मेरे लिए यह नियुक्ति पत्र इसलिए भी बहुत ज्यादा अहमियत रखता था, क्योंकि दिल्ली प्रेस में काम करने से पहले भी मैं अखबारों और पत्रिकाओं में कई जगह लिख चुका था लेकिन मुझे पत्रकार के रूप में काम करने का अवसर ठीक तरह से नहीं मिल पाया था।

-और वह पल जब आपको काफी बुरा लगा, अपमानजनक लगा या आपको ग्लानि हुई?

  • देखिये, मैं हमेशा से मानता हूं कि निजी अपमान और निजी स्तर पर हुई ग्लानि निजी ही होती है। लेकिन उसका समाज से कोई सरोकार नहीं होता। मैंने पत्रकारिता में इतने साल काम करने के बाद पत्रकारिता को कई आयामों में जानने की कोशिश की, जिसमें मैंने चापलूसी के नये-नये आयाम देखे, मैंने देखा कि किस तरह जब एक साहित्यिक रुचियों का व्यक्ति संपादक बनता है, तो अखबार के घोर गैर-साहित्यिक लोग भी साहित्यिक खबरों को प्राथमिकता देने लगते हैं, कैसे संपादक के बदलते ही दूसरे वरिष्ठ लोगों के विचार, उनके काम करने का तरीका, सोचने का नजरिया, उनकी बॉडी लैंग्वेज संपादकों की सोच और विजन के अनुरूप बदल जाती है, यही चीजें मुझे पत्रकारिता में हमेशा से बहुत अपमानजनक लगीं। पत्रकारिता में जब नये लोगों को रखने की बात आती है तो कहा जाता है-हमें सोचने-समझने वाले लोग नहीं चाहिए, हमें ऐसे लोग चाहिए, जो वही करें, जो उनसे कहा जा रहा है। हो सकता है, इस सोच के बहुत कम लोग हों, लेकिन सैद्धांतिक रूप से यह बात पत्रकारिता के खिलाफ है। क्या हम ऐसे पत्रकार तैयार कर रहे हैं, जिनमें सोचने-समझने का माद्दा ना हो, क्या हम ऐसे पत्रकार तैयार कर रहे हैं, जो सिर्फ बॉस लोगों की हां में हां मिलाना जानते हों? ये सब बातें मुझे हमेशा से ही खराब लगी हैं। एक और बात, जो मुझे हमेशा खराब लगी। पत्रकारिता में अब आपके काम से ज्यादा आपका व्यवहार देखा जाता है। मैं खराब व्यवहार का पक्षधर नहीं हूं, लेकिन क्या किसी के सिर्फ अच्छे व्यवहार की वजह से ही उसे आगे बढ़ने के अवसर मिलने चाहिए? आज पत्रकारिता में बहुत से ऐसे लोग हैं, जो सिर्फ इसलिए आगे बढ़ रहे हैं, क्योंकि वे बहुत अच्छे चापलूस हैं या जी हुजूरी करने में माहिर है और अच्छे कपड़े पहनते हैं, अच्छा परयूम लगाते हैं, उनके चेहरों पर हमेशा मुस्कारहट चिपकी रहती है, वे किसी बात का विरोध नहीं कर सकते, हमेशा विनम्र बने रहते है फिर चाहे कोई घोर अपमान भी क्यों न सहना पड़े, उनका व्यवहार बहुत अच्छा है, लिखने-पढ़ने से उनका कोई वास्ता नहीं होता…ये तमाम चीजें मुझे बहुत अपमानजनक लगती हैं। मैं हमेशा सोचता हूं कि हम पत्रकारिता की कैसी दुनिया तैयार कर रहे हैं? और संभवतः पत्रकारिता की दुनिया ही मुझे एक ऐसी दुनिया लगी, जहां अयोग्यता भी ऊंचे दामों पर बिकती है। अयोग्य व्यक्ति जरूरत से ज्यादा विनम्र होता है, क्योंकि उसके पास अपनी कोई सोच नहीं होती, इसलिए वह कभी किसी चीज का विरोध नहीं करता और सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि उससे कभी किसी वरिश्ठ आदमी को कोई खतरा नहीं होता। इसलिए अधिकांश लोग उसे ही प्रमोट करते हैं, ये सारी स्थितियां मुझे ज्यादा अपमानजनक लगती रही हैं।

-पत्रकारिता में आपके रोल मॉड्ल कौन रहे हैं और समकालीन दौर में आप किसे बेहतर मानते हैं?

  • कहने को रोल मॉडल वही है जिससे आप प्रभावित हो, जिसकी सोच आपसे मिलती हो। मैं प्रभाष जोशी, राजेंद्र माथुर, जवाहर कौल, जितेंद्र गुप्त, टीवी आर  शेनॉय, मधुसूदन आनंद को पसंद करता हूं। समकालीन लोगों में मुझे राजदीप सरदेसाई, पुण्य प्रसून वाजपेयी, यशवंत व्यास, अर्णव गोस्वामी, ओम थानवी और लोकमित्र बेहद पसंद हैं। और भी बहुत से लोग हैं, जो अच्छा और युवाओं को प्रेरित करने वाला काम कर रहे हैं, और कुछ नया करने का, अलग सोचने का माद्दा रखते है।

-इस दौर की पत्रकारिता अब पूंजी की हो गयी है और जनता से कटती जा रही है, यह कितना सच है?

  • यह सच है कि पत्रकारिता पर आज पूंजी और बाजार बुरी तरह से हावी होता जा रहा है, लेकिन दुनिया का कोई भी बाजार जनता से कटे बिना सर्वाइव नहीं कर सकता। इसलिए मैं इस बात से बहुत ज्यादा इत्तेफाक नहीं रखता कि आज की पत्रकारिता जनता से कट रही है। जनता से जुडे़ तमाम मुद्दे पत्रकारिता के जरिये ही सामने आते हैं। आप अन्ना हजारे के आंदोलन को ही देख लीजिए पूरा मीडिया चौबीसों घंटे अन्ना की फुटेज दिखा रहा है। मुझे लगता है कि पत्रकारिता में सरोकारों और प्रतिबद्धता वाले लोगों की कमी हो गयी है। यह कमी भी धीरे-धीरे दूर हो जाएगी। साथ ही एक और बात मुझे लगती है कि मीडिया में भी एक खास तरह की जन लोकपाल समिति होनी चाहिए, जो मीडिया में चल रहे भ्रष्टाचार, बेइमानियों और अनाचार पर रोक लगा सके। सिविल सोसायटी को अखबारों को मॉनिटर करने के लिए कोई बॉडी तैयार करनी चाहिए, जो यह देख सके कि कौन सा अखबार जनविरोधी है, कौन सा अखबार प्लांटेड खबरें दे रहा है, किस अखबार में जनता से जु़ड़े मुद्दों की अनदेखी हो रही है। अगर सिविल सोसायटी अखबारों पर कोई दबाव बना पाती है तो यह प्रिंट मीडिया के लिए एक शुभ संकेत हो सकता है।

-साहित्य में कितनी रुचि है, किसको पसंद करते हैं, ताजा क्या पढ़ा?

  • साहित्य में मेरी शुरू से ही बहुत गहरी रुचि रही है। मैंने दोस्तोव्स्की, टॉलस्टॉय, चेखव, कामू, काका, गोगोल, बालजाक, लू शुन, पर्ल एस बक, शोलोखोव और पोउलो कोएला के अलावा जापानी, इटैलियन, ब्राजिलियन, अमेरिकीन, ब्रिटिश, अफ्रीकी साहित्य भी खूब पढ़ा है। दोस्तोव्स्की मेरे पसंदीदा लेखक हैं। हाल ही मैंने मिस्र की लेखिका नवल अल सादवी का ‘वुमन एट प्वाइंट जीरो’ पढ़ा है, जो मुझे बेहद पसंद आया। पढ़ने का मुझमें इतना अधिक जुनून है कि मैं अक्सर कोई नयी किताब पढ़ने के लिए ऑफिस से छुट्टी तक ले लिया करता था। और आज भी मैं हर माह कोई ना कोई नयी किताब खरीदना पसंद करता हूं।

-नये लोग जो पत्रकारिता में आ रहे हैं, उनकी अच्छाइयां और कमियां क्या हैं?

  • पत्रकारिता में जो नये लोग आ रहे हैं, उनकी सबसे अच्छी बात यह है कि उनके गोल एकदम क्लियर हैं। और खराब बात यह है कि उनके ये सारे गोल निजी सफलता पर आधारित हैं। यानी भौतिक रूप से उन्हें पत्रकारिता में रहते हुए क्या-क्या हासिल करना है, यह उन्हें पता है। लेकिन पढ़ाई-लिखाई के संस्कार, मेहनत से वे बचना चाहते हैं। वे लोग शॉर्ट कट पर यकीन करते हैं, और ग्लैमर की दुनिया की तरफ खिंचे चले जा रहे हैं (लेकिन इन बातों को जनरलाइज ना किया जाए)। हां, इसके अलावा भी पत्रकारिता में एक ऐसा वर्ग आ रहा है, जो कुछ करने का दम रखता है, लेकिन उन्हें कोई सही मार्गदर्शन देने वाला नहीं है।

-आजकल जिस तरह के लोग संपादक के पद पर आसीन हो रहे हैं, उससे पत्रकारिता का कितना भला होगा?

  • मुझे लगता है कि जो भी पत्रकार बिना किसी विचार और विजन के जोड़ तोड़ से संपादक बने हैं, उनका समय बहुत ज्यादा नहीं है। वे पत्रकारिता का भला करें ना करें, लेकिन माहौल को खराब करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं और निभायेंगे। खासतौर से ऐसे संपादक, जो चीजों और स्थितियों को सिर्फ मैनेज करना ही संपादक का एकमात्र दायित्व मानते हैं। विडंबना की बात है कि आज बड़े-बड़े संस्थानों में ऐसे लोग बैठे हुए हैं, जिन्होंने जीवन में शायद ही कभी कोई लेख लिखा हो, अब सवाल यह उठता है कि ये लोग क्यों वरिश्ठ पदों पर आसीन हैं और आखिर ये अखबारों के दतर में करते क्या हैं? एक और बात हमेशा मुझे परश्षान करती है। अधिकांश बड़े पदों पर काम करने वाले भी अपने बच्चों को पत्रकारिता में नहीं आने देना चाहते, इसीलिये कि उनसे बेहतर इस बात को कोई नहीं जानता कि पत्रकारिता की दुनिया में अब माहौल पहले जैसा नहीं रहा।

-कोई ऐसी बात जिसे आपने आज तक किसी से शेयर ना किया हो?

  • मैं बहुत ही खुली मानसिकता का व्यक्ति हूं। मुझे चीजों को सीक्रेट रखना पसंद नहीं। मुझे नहीं लगता कि मेरे जीवन ऐसी कोई बात हुई हो, जिसे मैंने किसी से शेयर न किया हो। इसलिए बहुत याद करने पर भी मैं ऐसी बात याद नहीं कर पाया, जो मैंने पहले किसी से शेयर ना की हो।

-अब आपकी क्या योजना है?

  • अभी जीवन में मुझे बहुत कुछ करना है। जैसा मैंने पहले कहा, मैं कुछ नए काम करना चाहता हूं। जिससे मैं अपने आपको रचनात्मक रूप से संतुष्ट महसूस कर सकूं। फिलहाल मैं रेडियो और टेलीविजन धारावाहिकों के लिए लेखन कार्य में व्यस्त हूं लेकिन जल्द ही मैं कुछ चीजों की प्लानिंग कर उनको योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दूंगा। इसके अलावा कुछेक संस्थानों से डायरेक्ट-इंडायरेक्ट रूप से जुड़ने की योजना भी है। मैं कुछ कहानियों पर भी काम कर रहा हूं और एक उपन्यास लिखने की दिशा में भी कदम बढ़ा रहा हूं।

सुधांशु गुप्त से यह बातचीत भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह ने की. आप सुधांशु गुप्त से संपर्क या उनके इस इंटरव्यू पर अपने विचार gupt9sudhanshu@gmail.com के जरिए उन तक पहुंचा सकते हैं.

Comments on “पत्रकारिता में चापलूसी के नए-नए आयाम देखे हैं मैंने : सुधांशु गुप्त

  • Haresh Kumar says:

    वरिश्ठ,परश्षान – वरिष्ठ, परेशान जैसी कुछ गलतियां रह गई है, कृप्या इसे सुधार लें। वैसे इंटरव्यू काफी अच्छा है।

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  • adarsh prakash singh says:

    bahut achha,aj ki patrikarita me chaplooson ka hi bolbala hai, kam ki koi puch nahi hai. congratulation to yashwant for a good interview

    Reply
  • adarsh prakash singh says:

    bahut achha, ajkal ki patrakarita me chaplooson ka hi bolbala hai, jo yah sab nahi kar sakta is line me survive nahi kar sakta.sudhansu gupta ji se mai parichit nahi lekin unki baton me dam hai.yaswant ko is interview ke liye badhai- adarsh p singh, news editor jansandesh times lucknow

    Reply
  • sir aapne hindustan par khulkar nahi bola. jabki aapke paas bolne ko bahut kuch tha. hindustan me to patrkarita ki aadharik jankari na rakhne wala bhi resident editpr ban jate hain.

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  • मुझे याद है..मेरी पहली नौकरी थी कुबेर टाइम्स में…मैं पड़ोसी होने के नाते आपसे मिला था. तब आपने मुझे बहुत निराश किया था और मेरे अखबार का मजाक भी उडाया था। खैर आपके संघर्ष के लिए आपको बधाई…आप और नई उपलब्धियां अर्जित करें ऐसी कामना है..

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  • seema sharma says:

    [b][b]swabhiman ke sath jeena jyada acha hota hai aur hamesha swabhiman ke sath he kam karna chaye.apne aatm samman ko marker aur swabhiman ko khatm karke noukri karne ka koi fayda nahi.ek shaswat satye hai jo hum sab ko yaad rakhna chaye sansthan kitna hi bada kun na ho per vyakti se bada nahi hota.

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  • Mridula Bhardwaj says:

    nice interview u sir…..aur aapne sirf sach bola hai……aur sach ke siwa kuch nahi……jaisa ki aap hamesha bolte hai…..hame aap par garv hai aur hamsha rahega……all the best……….

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  • shrikrishna prasad,munger, Bihar says:

    A lot of thanks to the editor for starting this kind of series in the portal news.The present article is relevant and it must draw the attention of the union and the state governments of the country to initiate the formation of the Lokpal to look into the corruptions in the media.I support his demand whole heartedly.
    my best wishes are with Mr.Gupta for his proposed plan.
    Thanks ,
    ShriKrishna Pd,Munger,Bihar

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  • A perfect saying by a man of press….. 🙂 nice interview uncle 🙂 nice thoughts in an abridge ” it’s wonderfull” 🙂

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  • Anirudh kumar says:

    सर आपको बधाई, वह इसलिए कि आपने अपने इन्टरव्यू में बहुत हीं वेवाक तरीके से सही बातों को रखा है। मुझे तो सबसे अच्छा यह लगा कि आप अपने उस दिनों को भी आमलोगों के पास रखने में नहीं हिचकिचाया जब आर्थिक परेशानियों की दौर से अपका परिवार गुजर रहा था। आज पत्रकारिता में ऐसे शख्सों की भरमार हो गई है, जो आज कुछ पैसा क्या कमा लिया अपने पुराने दिनों को याद करने में ग्लानी महसूस कर रहे हैं। आप जैसे पत्रकारों को मेरा प्रणाम।
    अनिरूद्व कुमार
    http://www.insighttvnews.com

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  • RAMESH TIWARI RAIPUR..C.G says:

    ]पत्रकारिता का कितना भला होगा?

    लगता है कि जो भी पत्रकार बिना किसी विचार और विजन के जोड़ तोड़ से संपादक बने हैं, उनका समय बहुत ज्यादा नहीं है। वे पत्रकारिता का भला करें ना करें, माहौल को खराब करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं . मैनेज करना ही संपादक का एकमात्र दायित्व हैं। आज बड़े-बड़े संस्थानों में ऐसे लोग बैठे हुए हैं, जिन्होंने जीवन में शायद ही कभी कोई लेख लिखा हो, .. ये क्यों ? वरिश्ठ पदों पर हैं ? और आखिर ये अखबारों के दतर में करते क्या हैं ?

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  • rajkumar chandra says:

    mere bade bhai sudhanshu gupt ji ko mera namaskar. aapka sakshatkar bharas par padha. ab se kareeb 10 saal pahle maine hindustan ki ncr desk per kam kiya tha. tab aap se rubaru hine ka mauka aksar milta rahta tha. aap sujeet vajpey ke saath aksar guftgu karne ke liye aate the. aap shayad muzhe bhool bhi gaye honge, magar main aapko aaztak bhi nahi bhoola hoon. aapke vichar jaise pahle the aaz bhi vahi hain. aap jaise bade bhai hi hamare jaise patrkaron ke liye prernna shrot hain. namaskar,

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