बहादुर बृजलाल के हाथ-पांव क्यों बंध गए?

: शाह बुखारी, पत्रकार और लखनऊ पुलिस : शाह अहमद बुखारी दिल्ली के जामा मस्जिद के इमाम हैं और इस रूप में अपने आप में बहुत प्रभावी व्यक्ति हैं. इस देश के शायद बाकी बहुत सारे ताकतवर लोगों की तरह शाह बुखारी को भी लगता है कि इस देश के नियम और कानून औरों के लिए हैं, साधारण लोगों के लिए हैं, गरीबों और कमजोरों  के लिए हैं.

उनके जैसे शक्ति संपन्न और बड़े आदमी के लिए नहीं. यदि ऐसा नहीं होता तो क्या इमाम बुखारी इतनी हिमाकत करते कि वे और उनके लोग लखनऊ में पत्रकार वार्ता बुलाकर एक पत्रकार की जम कर पिटाई की होती. जैसा कि अब हम सभी जानते हैं लखनऊ के वीकली अखबार दास्तान ए अवध के पत्रकार अब्दुल वहीद चिश्ती कल इमाम बुखारी द्वारा बुलाए गए पत्रकार सम्मेलन में गए थे. जानकारी के अनुसार बाहरी रंग-रूप से ही यह समझ लेने के कारण कि इमाम और पत्रकार महोदय अलग अलग सम्प्रदाय के हैं, इमाम साहब उनकी उपस्थिति मात्र से ही नाराज़ हो गए. फिर जब वहीद साहब ने यह सवाल पूछ लिया कि जब हाईकोर्ट ने अयोध्या मामले में फैसला कर दिया है तो इमाम साहब मुसलमानों को क्यूँ बरगला रहे हैं, इमाम बुखारी एकदम से भड़क गए और अब्दुल वहीद को गाली-गलौज भी किया और उसके बाद सार्वजनिक रूप से उनकी पिटाई की गयी.

बाद में इमाम साहब उन्हें कांग्रेस का एजेंट बताते हुए अपनी बात सही करार देते नज़र आये. यदि उनमें क़ानून का भय होता, देश के नियम-कायदे से मतलब होता, अदालत और पुलिस का भय और उसके प्रति इज्ज़त होती तो क्या वे सबके सामने एक पत्रकार की इस तरह से पिटाई और गाली-गलौज करते और उसके बाद भी शान से अपनी ही बात कहते नज़र आते. उन्हें अपने बर्ताव पर शर्म आती, कुछ डर सा पैदा होता या किसी प्रकार की ग्लानि का अनुभव होता लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. वे अपनी ताकत और रसूख के बल पर अपनी ही बात करते नज़र आये और सीना ठोक कर यह कह रहे थे- “मैं मर्द का बच्चा हूँ, तुम्हारे जैसे आदमी को औकात दिखा दूँगा”.

और वे गलत भी तो नहीं हैं. अब्दुल वहीद क्या थे- मात्र एक अदने से पत्रकार, वह भी एक साप्ताहिक अखबार के. फूँक देने पर उड़ जाते और वही हुआ भी. बेचारे वहीद साहब हज़रतगंज थाने पहुंचे, उनका मुक़दमा लिख दिया गया और उसके बाद बस बात खतम. कार्यवाही का आश्वासन दे दिया और फिर थाने से विदाई. उसके बाद उत्तर प्रदेश के सबसे दमदार और प्रभावशाली पुलिस अधिकारी बृजलाल का बयान आया, जो एकदम से रटा-रटाया सा था- “हाँ मुकदम दर्ज हो गया है, जांच चल रही है. जो भी दोषी पाए जायेंगे, उन्हें बख्शा नहीं जाएगा और उन पर कड़ी कार्यकाही होगी.” साफ़ जाहिर था कि इमाम साहब पर कार्यवाही नहीं होगी, टाल दी जायेगी कुछ और बड़ी-बड़ी बातें कह दी जायेंगी और लोगों को भरमा कर मामला ठन्डे बस्ते में डाल दिया जाएगा. और ऐसा क्यों होगा?

बृज लाल जैसा बहादुर पुलिस वाला, जो तत्काल कार्यवाही में विश्वास रखता है, वह जांच और अन्वेषण के रास्ते क्यूँ चलना चाहेगा, यह भी बहुत ही साफ़ है. पहला यह कि मामला किसी सत्ताधारी, रसूखदार व्यक्ति से सम्बंधित नहीं है बल्कि एक साधारण से पत्रकार का है जिसकी शायद कोई खास आवाज़ नहीं है. फिर दूसरा मामला राजनीती और वोट से जुड़ा हो सकता है. आम धारणा के अनुसार इमाम साहब अपने आप में वोट बनाने और बिगाड़ने का माद्दा रखते हैं और इसीलिए इनके खिलाफ कार्यवाही नुकसानदेह हो सकती है. यानि कुल मिला कर अपराध का सीधा रिश्ता वोट से, आदमी के सामजिक स्तर से- चाहे अभियुक्त हो या भुक्तभोगी और पूरे सामजिक और राजनैतिक हालत से. अपराध से नहीं, अपराध की श्रेणी और गंभीरता से नहीं. एक मामले में घटना घटने के घंटे भर के अंदर तुरंत उठा कर ले आयेंगे और दस डंडा मार के गुंडा एक्ट और गैंगस्टर एक्ट लगा देंगे और फिर खुद की पीठ थपथपाएंगे- उसी प्रेस को बुला कर जिसका सदस्य पीटा गया है, अपना बखान करेंगे. लेकिन यदि सामने कोई पहाड़ होगा तो तुरंत न्यायालय बन जायेंगे और जांच और सत्यान्वेषण की बाते करने लगेंगे.

जाहिर है ऐसी ही बातें लोगों को यह बताती रहती हैं कि अपने देश में एक नहीं अनेक कानून हैं. मैं मौके पर नहीं थी पर जिस प्रकार से खबरें आई हैं, उनसे साफ़ दिखता है कि अन्याय हुआ है, पत्रकार को मारा गया है, पुलिस सब जानती है और इमाम साहब अपने बारे में पूरी तरह आश्वस्त हैं. साथ ही यह गंभीर बात भी सामने आती है कि सबों के लिए न्याय दिलाने में सजग पत्रकार बंधू अपने स्वयं के मामलों में कितने असहाय हैं.

डॉ नूतन ठाकुर

संपादक

पीपल’स फोरम

लखनऊ

Comments on “बहादुर बृजलाल के हाथ-पांव क्यों बंध गए?

  • Dr. Sanjeev chauhan says:

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  • shravan shukla says:

    नूतन जी. आज के पत्रकारों में इतना दम नहीं रह गया है की वो अपनी बात कही स्वतंत्र रूप से रख सके. १० महीने से मै खुद झेल रहा हू..जिसका दोषी हमारे परिवार का कोई भी सदस्य नहीं है वह दंड हम भुगत रहे है…आपकी यह लाइन काफी है –आयेंगे और दस डंडा मार के गुंडा एक्ट और गैंगस्टर एक्ट लगा देंगे और फिर खुद की पीठ थपथपाएंगे,यही हुआ है हमारे साथ..१० महीने हो जायेंगे २१ को..तब से एक बेक़सूर ऐसी ही पुलिसिया जुर्म का शिकार है…जिसका न तो कोई आपराधिक रिकार्ड है और न ही कुछ..बावजूद मेरे भाई के ऊपर गैंगस्टर एक्ट लगा दिया गया है. यह बात सभी पत्रकार जानते है ..मगर दूसरों के मामलो में हाथ नहीं डालना चाहते..आपभी हमारे ही बिरादरी की वरिष्ठ सदस्य है..आपने भी यह लिंक पढ़ा होगा-http://www.bhadas4media.com/dukh-dard/6564-journalist-help.html . लेकिन बाकी सबकी तरह आपने भी कभी आवाज नहीं उठाई और न ही कोई मदद की,

    अजी छोडिये ऐसी ढकोसलेबाजी को..यह सब लिखना बंद करिये की कोई किसी के मदद को आगे नहीं आया…हा मर्द लोग है अभी भी.जैसे की खुद यशवंत-आज ४०% मुश्किल से अगर मै निकल पाया हू तो उसमे सबसे बड़ा हाथ यशवंत जी का है..और काफी सारे पत्रकार लोग गए थे.लेकिन किसी में आगे बढ़ने की हिम्मत न हुई..आपने तो कभी जानने की कोशिस भी नहीं की..तो फिर यह ढकोसले बाजी क्यों??????????????

    नूतन जी कहते है न जब आग यहाँ दिल में लगी हो तो उसपर फूंक मारने से वो बुझती नहीं बल्कि और भी तेज़ी से जलती है. ५ नवंबर कोई भाई का जन्मदिन है . मगर आर्थिक रूप से कमजोर होने की सजा हमारे परिवार को मिल रही है न..ठीक वैसे ही अगर वहीद शहब की बात कोई नहीं सुन रहा तो इसके पीछे भी यही कारण है…..किसी में हिम्मत हो तो आपको हाथ लगाकर दिखाए…कोई नहीं हाथ लगायेगा…सबको पता है अमिताभ जी और आपके बारे में..यशवंत जी पर कोई हाथ उठाये…है किसी में हिम्मत..?…और रही मेरी बात तो मेरे जैसेलोग रोज घर परिवार और दोस्तों में धकियाए जाते है..यह कहा जाता की अपने भाई को तो छुडा न सके चले है पत्रकार बन्ने..इससे ज्यादा शर्म की बात और क्या हो सकती???????

    कल जो बात शिवशंकर जी के साथ हुई , उससे पहले विशाल के साथ हुई. अब वहीद के साथ हुई..इन सबका सबसे बड़ा कारण यही है की कोई किसी के साथ खड़ा नहीं होना चाहता..फर्क सिर्फ इससे नहीं पड़ता की आप वह थी या नहीं…फर्क इससे पड़ता है की आप जानते हुए भी सिर्फ यहाँ पब्लिसिटी के लिए लिख रही है और झूठा अफ़सोस जाता रही है….सिर्फ सी को अगर पत्रकारिता कहते है तो मै खुद को भी शर्मनाक स्थिति में प् रहा हू ……..

    एक विनती है सबसे..की सिर्फ कमेन्ट लिखने के लिए या अपनी भड़ास उतारने के लिए भड़ास का एक माध्यम न बनाया जाए……………और बुखारी जैसे लोग के बारे में डॉ शब्द—-बुखारी ने जो कुकृत्य किया है उससे एकबार फिर सबको मौका मिल गया है मुस्लिम समाज पर ऊँगली उठाने का .. अब वक्त आ गया है की सभी लोग बुखारी और तोगारिया जैसे धर्म के नाम पर राजनीति करने वालो के मुह पर जूते मारे..और एक विकसित विचारधारा को जन्म दे,,,जहा जात=पात-. धर्म-क्षेत्र की भावना न होकर सबको साथ लेकर चलने की भारतीय विचारधारा हो..
    खुद को यही विराम देता हू…

    दिल में दर्द है कितना मै दिखा नहीं सकता.
    आग बहुत है इस सीने में..मगर अफ़सोस अकेला दिया मै जला नहीं सकता.

    श्रवण शुक्ल
    shravan.kumarshukla@gmail.com
    ९७१६६८७२८३

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  • shravan shukla says:

    एक और बात कहना चाहता हू की अकेला चना भाद नहीं फोड सकता, यही बात यशवंत जी के ऊपर भी लागू होती है. आपके ऊपर भी..मेरे ऊपर भी..और बुखारी जैसे लोगो के ऊपर भी..अगर मुस्लिम समाज बुखारी को नकार दे तो उनके अकेले बयां देने से कुछ नहीं होगा..ठीक उलटे में इसी तरह अगर सभी लोग वहीद जी के साथ खड़े हो तो निश्चय हू बुखारी को भागना पड़ेगा..पुलिस भी कार्यवाही करेगी…यही बात यशवंत जी के ऊपर भी…सिर्फ यशवंत जी ने कोशिस की साथ देने की तो ४०% खींच ले गए..अकेले में ४०% से आगे नहीं बढ़ पाए..मगर यही अगर यशवंत जी के साथ और लोग भी खड़े होते जो वह कथित पत्रकार लोग गए थे तो जो बेक़सूर आज जेल के अंदर है वो बाहर आ गया होता..

    उम्मीद है आगे से कुछ होगा..जय यश..जय यशस्वी.
    यश नाम कमाने के लिए..
    यशस्वी गलत का विरोध करने के लिए..

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  • Dr.Hari Ram Tripathi says:

    I agree to the contents of this article and appreciate the feelings of the writer.
    At the same time I strongly condemn all those newsmen who were there but did not react and protest.They should have boycotted the press conference and accompanied the victim to the police station.I also was invited to that PC but did not attend =H,R,Tripathi,Editor-triveninews.Lucknow.

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  • bhabhi namste aap ne bilkul thik kaha brijlal ji achanak itna shant kase ho gaye aur to mai vaha moujood tha magar partkaaro ne bhi vahid bhi ki madad nahi ki humlog thane jakar unki report darj karwayi magar karyai kaya hoga pata nai

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  • नूतन जी, जनतंत्र एक विकृत परम्परा है। यहां जन की कीमत सिर्फ मत है, वोट है। सारे मत बेवकूफाना हैं। वह जनशक्ति नहीं है। जबतक जनशक्ति नहीं है, जनविचार नहीं है-जनवाद नहीं है, तबतक हर कोई पददलित है। पुलिस मारेगी-पदाधिकारी मारेंगे-सत्ता मारेगी-माफिया मारेंगे। जन सिर्फ मार खाने को है, क्योंकि वह अकेला है। कहने को उसका तंत्र है, परंतु वह तंत्र में नहीं है। उसे हाथी कुचलेगा-घोड़ा कुचलेगा-नीति कुचलेगी-राजनीति रौंदेगी। मौलाना बुखारी जन नहीं है, वह तंत्र का हिस्सा है, राजनीति का हिस्सा है, सत्ता का पायदान है। इस्लामिक कट्टरपंथियों का वह आदर्श है। कहने को मस्जिद में बैठता है-इबादतगाह में चौबीस घंटे रहता है, लेकिन अंततोगत्वा वह बाबर की औलाद है। उसके लिए धर्म सिर्फ राजनीति है, सत्तासुख का रास्ता है। शठे शाठ्यम समाचरेत के अनुसार, चाहिए तो था कि उसे वहीं रौंदा जाता-दाढ़ी नोची जाती-सिर गंजा करके नग्नवदन बैशाखपंचम की सवारी करवाई जाती, परंतु जन सरोकारों से जुड़े होने के कारण पत्रकार शांत रह गए। यह काम पत्रकारों का था भी नहीं, क्योंकि वे आजभी तंत्र का हिस्सा नहीं बन पाए हैं। जन से जुड़े होने के कारण मार खाना लाजिमी है। श्रवण शुक्ल की वेदना उचित है। निःसंदेह वह पीड़ा से गुजर रहा है। उसकी मदद की जानी चाहिए। यह छोटी सी परंतु सही दिशा में शुरुआत होगी। बुखारी से जो लोग कुपित हों-उसके आचरण को अनुचित मान रहे हों, उन्हें चाहिए कि कानूनी प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार करें, न्याय न मिले तो एक तिथि निश्चित करें। उस दिन सभी लोग जामा मस्जिद के सामने इकट्ठे हों, पहले बुखारी को स्वयं बाहर आने की चेतावनी दें, न आए तो मस्जिद में घुसकर उसे जुतिआएं। जान से न मारें। जिंदा छोड़ दें ताकि वह प्रायश्चित कर सके। काम कठिन हो तो उसका पुतला बनाकर जलाएं।

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