बुरे फंसते जा रहे हैं करमवीर और बृजलाल

: हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने इनके खिलाफ याचिका को इलाहाबाद हाईकोर्ट को सौंपा : इलाहाबाद हाईकोर्ट में पहले से ही है इनके खिलाफ एक याचिका : अब दोनों याचिकाओं की एक साथ शुरू होगी सुनवाई : आईआरडीएस की तरफ से शीलू-दिव्या प्रकरणों में हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में दायर रिट याचिका पर आज याची के वकील अशोक पांडे ने तर्क पेश किये.

जस्टिस अब्दुल मतीन और जस्टिस वाई के संगल की बेंच के सामने वकील अशोक पांडेय के तर्कों के जवाब में प्रतिवादी शासकीय अधिवक्ता ने बताया कि इन्हीं मामलों में ऐसी ही एक रिट याचिका पहले से उच्च न्यायालय के इलाहाबाद हाईकोर्ट में दायर है. अतः यह उचित होगा कि इस रिट याचिका को भी उस याचिका के साथ जोड़ दिया जाये जिससे पूरे मामले की एक साथ बहस हो सके. इन तर्कों के आधार पर जस्टिस प्रदीप कान्त और जस्टिस वेद पाल की बेंच ने इस रिट याचिका को भी पूर्व में शीलू और दिव्या से जुड़े इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित रिट याचिका के साथ संदर्भित किया है और यह आदेशित किया है कि आगे इन दोनों याचिका को एक साथ सुना जाए.

ज्ञात हो कि स्वयंसेवी संगठन इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च एंड डोक्यूमेंटेशन इन सोशल साइंसेज (आईआरडीएस) की तरफ से दायर याचिका में कहा गया है कि करमवीर सिंह और बृज लाल ने अपनी सोची-समझी सक्रियता और निष्क्रियता के जरिये गलत साक्ष्य बनाने, एफआईआर दर्ज नहीं होने देने और असल अपराधियों को बचाने का कार्य किया. याचिका में इनकी पुष्टि के लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 36, जो वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की शक्ति और कर्तव्य के विषय में है और पुलिस एक्ट की धारा  4 तथा धारा 23, जो डीजीपी को प्रदेश पुलिस के सक्षम नियंत्रण और प्रशासन के लिए उत्तरदायी बनाते हैं, के उल्लेख किये गए. साथ ही  अपने कर्तव्यों में लोप सम्बन्धी पुलिस एक्ट की धारा 29 तथा अपने कर्तव्य में अवहेलना एवं जान-बूझ कर विधि के निर्देशों का पालन नहीं करके किसी व्यक्ति तो क्षति पहुचाने सम्बंधित आईपीसी की धारा 166 का भी उल्लेख किया गया. साथ ही आईपीसी की धारा 32, जो अवैध लोप से सम्बंधित है, को भी सामने रखा गया.

इन कानूनी तथ्यों के आधार पर आईआरडीएस की सचिव डॉ नूतन ठाकुर ने याचिका में कहा कि यह करमवीर सिंह और बृज लाल की सीधी जिम्मेदारी थी कि वे विधि के अनुरूप अपना कर्तव्य करते और न्यायोचित कदम उठाते. डॉ ठाकुर का मानना है कि आज जब इन अधिकारियों को जिले के अधिकारियों से प्रात-कालीन ब्रीफिंग, इंटेलिजेंस विभाग की रिपोर्टें, एक अंत्यंत सक्रीय मीडिया, 24×7  न्यूज़ चैनल तथा स्वयं डीजीपी कार्यालय में एक जन सूचना अधिकारी (पीआरओ) उपलब्ध हैं तो यह मानना असंभव है कि इन दोनों अधिकारियों को इन दोनों घटनाओं के बारे में सही सूचनाएं नहीं मिल सकी होंगी.  ऐसे में यह उनकी न्यूनतम जिम्मेदारी थी कि वे इन मामलों में सही मार्गदर्शन करते और दिव्या प्रकरण में कानपुर पुलिस पर इतनी सारी उँगलियों के उठने के कारण इसे तत्काल सीबी-सीआईडी के सुपुर्द करते. इसी प्रकार शीलू प्रकरण में कम से कम एफआईआर दर्ज कराना उनका विधिक कर्तव्य था. 

याचिका मे कहा गया कि उत्तर प्रदेश पुलिस के इन दोनों मुखिया करमवीर सिंह और बृजलाल पर कर्तव्य की लापरवाही तथा जानबूझ कर लिए गए अवैध कृत्य और विधिक कृत्यों के विलोप के सम्बन्ध में गहराई से जांच कराई जाए. याचिका में यह अनुरोध किया गया कि सीबी-सीआईडी इस सम्बन्ध में अपने ही वरिष्ठ अधिकारियों के विरुद्ध जांच करने में सक्षम नहीं हो सकेगी. अतः इन दोनों प्रकरणों एवं इनसे सम्बंधित पुलिस वालों के खिलाफ दर्ज कराये गए या आगे दर्ज होने वाले सभी प्रकरणों की विवेचना सीबीआई के सुपुर्द की जाए अथवा एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) बनायी जाए और इसके साथ एक न्यायिक जांच समिति बनायीं जाए जो डीजीपी और एडीजी (अपराध) सहित पुलिस के वरिष्ठ अफसरों की भूमिका की जांच के साथ-साथ सभी पीड़ितों को दिए जाने वाले क्षतिपूर्ति और किस-किस व्यक्ति से ये क्षतिपूर्ति की भरपाई हो के बारे में अपनी रिपोर्ट प्रेषित करे.

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