महाश्वेता का ‘हिंदुस्तान’ में कालम लिखने से इनकार

: वरिष्ठ पत्रकारों को निकाले जाने से खफा हैं महाश्वेता : शोभना भरतिया को पत्र लिख छंटनी के तरीके पर आपत्ति जताई : हिंदी की प्रख्यात लेखिका और सोशल एक्टिविस्ट महाश्वेता देवी ने हिंदुस्तान अखबार में स्तंभ लिखना बंद करने का फैसला किया है. इस बारे में उन्होंने हिंदुस्तान और हिंदुस्तान टाइम्स को संचालित करने वाली कंपनियों की चेयरपर्सन शोभना भरतिया को पत्र लिखा है.

पत्र में महाश्वेता देवी ने कहा है कि हिंदुस्तान में हाल के दिनों में जिस तरह से प्रमोद जोशी और अरुण त्रिपाठी जैसे सीनियर जर्नलिस्टों को निर्ममतापूर्वक-असम्मानजनक तरीके से निकाला गया है, वह काफी दुखदायी है. ऐसी स्थिति में वे हिंदुस्तान अखबार में स्तंभ नहीं लिख सकतीं.

महाश्वेता देवी ने पत्र में यह भी याद दिलाया है कि उन्होंने हिंदुस्तान अखबार में कालम लिखना तत्कालीन मुख्य संपादक मृणाल पांडेय के अनुरोध पर शुरू किया और कालम लिखते उन्हें चार साल हो गए. पर जब उन्हें पता चला कि हिंदुस्तान में कई वरिष्ठ पत्रकारों को अचानक निकाल दिया गया तो उन्होंने कालम न लिखने का फैसला किया है. महाश्वेता देवी ने शोभना भरतिया को पत्र में कहा है कि वरिष्ठ पत्रकार को असम्मानजनक तरीके से निकाले जाने जैसी घटनाओं से उनकी ही कंपनी की छवि खराब होती है.

उल्लेखनीय है कि मशहूर लेखिका और सोशल एक्टिविस्ट महाश्वेता देवी हिंदुस्तान अखबार में प्रत्येक रविवार को परख नामक कालम लिखती हैं. उनका लिखा यह कालम आनंद बाजार पत्रिका भी बांग्ला में प्रकाशित करता है. इस कालम में महाश्वेता देश-समाज-जन के मुद्दों पर अपनी बात बेबाक तरीके से रखती-लिखती हैं. कुछ महीनों पहले उन्होंने इसी कालम में वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह को भारतीय डाक, चिट्ठियों के इतिहास, डाकियों पर केंद्रित किताब लिखने के लिए बधाई दी थी और पत्रों के घटते चलन को एक गंभीर सांस्कृतिक खतरा बताया था. अरविंद पर केंद्रित महाश्वेता देवी के उस कालम को भड़ास4मीडिया पर भी प्रकाशित गया था, ‘अरविंद को महाश्वेता देवी ने दी बधाई‘ शीर्षक से. कह सकते हैं कि हिंदुस्तान अखबार में पिछले कुछ वर्षों से जो कुछ चल रहा है, उस कुकृत्य की चर्चा अब मीडिया जगत के बाहर भी होने लगी है और महाश्वेता देवी जैसी लेखिका के प्रतिष्ठित कालम से हिंदुस्तान अखबार को हाथ धोना पड़ रहा है.  कल हिंदुस्तान अखबार में महाश्वेता देवी का परख कालम देखने को नहीं मिलेगा. शोभना भरतिया को लिखा महाश्वेता देवी के पत्र की एक प्रति भड़ास4मीडिया के पास भी है जिसे हम यहां हूबहू प्रकाशित कर रहे हैं.

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Comments on “महाश्वेता का ‘हिंदुस्तान’ में कालम लिखने से इनकार

  • jyitiprakash says:

    इसमें कोई दो राय नहीं कि महाश्वेता देवी के कालम के कारण हिंदुस्तान की प्रतिष्ठा बढ़ती थी लेकिन यदि उन्होंने स्तंभ लिखना बंद किया है तो इसके लिए मौजूदा संपादक शशिशेखर ही दोषी हैं। वे जिस भी अखबार में जाते हैं, इसी तरह तानाशाही कायम करते हैं और विचारवान लोगों को हटा देते हैं। उनके यहां विचार की कोई जगह नहीं। जब वे अमर उजाला में थे तो यही किया। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद उस अखबार को सांप्रदायिक बना दिया। भारतीय प्रेस परिषद ने भी इस कारण उन्हें दोषी ठहराया। ऐसे सांप्रदायिक, बल्कि अपराधी किस्म के व्यक्ति को हिन्दुस्तान मैनेजमेंट क्यों बर्दाश्त कर रहा है? महाश्वेता दीदी ने इस मामले पर जिस तरह स्टैंड लिया है, क्या हिन्दी के लेखक इससे कुछ सबक लेंगे? —ज्योति प्रकाश, पटना

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  • अनिल यादव says:

    आपकी नौकरी रहे न रहे। आप भाड़ में जाएं या भड़भूजे के चम्मच उर्फ भूनन-दंड हो जाएं- इस संवेदनहीन रवैये वाले दौर में महाश्वेता आश्वस्त करती हैं कि आदमियत और वाजिब की पक्षधऱता हमेशा रहेगी। उन्हें प्रणाम और बधाई।

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  • मृणाल पांडे जी ने भी कई बड़े पत्रकारों को निर्ममता पूर्वक निकाला था क्या उसका महाश्वेता जी ने संज्ञान लिया था. शायद नहीं. मैडम मीडिया का यही उसूल है. जो सत्ता में होता है उसकी चलती है.

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  • anami sharan babal says:

    mahashweta devi {md} ne ye fir sabit kiya h ki we har us mauke par khadi ho jati jaha par log sankat ya musibat me hote h magar yaha par md ki ladai safedposh mafia kism ke ligo se h md yadi colom nahi likhengi to ht group ya sbharatia ya sshekhar par koi asar nahi padne wala md shayad janti hongi ki ht ke bahar ht se nikale gaye 450 staff mahino strugle karke nirash ho gaye fir b sobhna bharatia ki zid ke chalte 450 log bekar ho gaye ab ht ki pahle wali image, shaan nahi rahi kyuki pehle media ka jo mission tha vo aab corporate sector ka roop le chuka hai yaha pr jis tarah sr. journalists ko puri tarah se beizzat karke s.shekhar nikal bahar kr rhe hain wahi s.bharatia mrinal pandey ko bhi puri tarah apmaanjanak tarike se sampadak ki gaadi se hata diya tha mrinal k baad s.shekhar yaha ke chief editor ban gye . ye mahode amar ujala, aaj se lekr aajtak mei bhi kch samay rahe hain aur inka rawaiya bhi hitlor se kaam nhi hai. hitlor editor k roop mei kookhyat s.shekhar k aatank se ht gruop k saare hindi journalist apne naukari ko lekar aatankit hain. mahashweta devi ji aapne apna column band krke kaam se kaam viradh to dikhaya hai ye journalist k sammaan k liye kaafi hai kyuki ek writer hone k naatey isse bada balidaan aur kch nahi aap de skti hai magar iss baar apki ladai safedposh writers editors & management se hain jo itne ghaagh hai jinke liye emotions ki koi value nahi hai fir bhi hum hindi k tamaam patrakar aur writers ki taraf se apko salute krte hain ki kaam se kaam apne apna nuksaan hone k baavjood writers k lye awaaz to uthayi hai

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  • madan kumar tiwary says:

    बहुत – बहुत बधाई एक शुरुआत तो हुई । मेरे जैसे लोग बहुत पहले से व्यवसायिक घरानो के द्वारा अपने व्यवसाय को आगे बढाने के लिए अखबारों के दुरुपयोग के मामले को उठाते रहे हैं।

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  • shiv prasad narayan singh says:

    महाश्वेता जी के प्रति असम्मान का भाव अपराध की श्रेणी में आता है सो वो तो मैं कर नहीं सकता। लेकिन कुछ बाते सोचने के लिए छोड़ना चाहता हूं। जब से महाश्वेता जी कालम लिख रही हैं, एक दिन में १० लोग तक विदा हुए, तब उन्होंने न पत्र लिखा न कालम बंद किया। दरअसल महाश्वेता जी का कालम जिन सज्जन की मेल पर आता था जो उसे हिन्दी में तैयार करते थे, उनके प्रति महाश्वेता जी का अनुराग स्वाभाविक है। ये चिठ्ठी-पत्री उन सज्जन के हिन्दुस्तान में न रहने की उपज है। कृपया इसे क्रांति के साथ जोड़कर न देखे। एक संवेदनशील लेखिका ने उन साहब के प्रति अपने स्नेह को जाहिर करते हुए पत्र लिखा। महाश्वेता जी इतनी सरल हैं कि रवीद्र कालिया के पक्ष में भी हस्ताक्षर जारी कर चुकी हैं। संस्थानों से किसे किस तरह से रखा या निकाला जाए यह एक सवाल है, िजसपर बात होनी चाहिए, इससे कोई भी इंकार नहीं करता है।

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  • मेरे कैरियर की शुरुआत अमर उजाला अखबार से हुई , उस समय शशिशेखर जी संपादक हुआ करते थे । दो चार दिन हुआ अभी हुआ ही था की उन्होंने एक हिटलरी फरमान जारी किया की कोई भी कर्मी आपस में बात नहीं कर सकते यानी ऑफीस के बाहर भी लोगों पर नजर पर जाती थी तो उसकी तो खैर नही इस तरह के हैं हमारे शेखर जी . रही महाश्वेता देवी जी का तो उन्होंने तो खैर नहीं

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  • ashutosh upreti says:

    महाशवेता देवी को अरुण त्रिपाठी और प्रमोद जोशी के जाने से ही क्यो कष्ट हुआ है? इनसे पहले भी तमाम गजब के पत्रकारों को मृणालपांडे और जोशी जैसे घटिया पत्रकारों ने निकाल दिया था तब महाश्वता देवी जी ने लिखने संबंधी कोई फैसला नहीं लिया था। सवाल उठता है कि शशि शेखर को बुरा-भला कहने का मतलब क्या है। क्या जोशी और अरुण त्रिपाठी हिन्दुस्तान में पुराने लोगों के ऊपर मोटी सैलरी पर नहीं लाए गए थे। हिन्दुस्तान में आने से पहले इन्हें कौन जानता था ?

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  • Nageshwar singh says:

    ye koi nai bat nahi hai. mahasweta devi ko sirph bade hi journlist ki yad aa rahi hai. mandi k dauran kai logon ko hataya gaya. kai logon ke bacho ki padai band ho gai. tab mahasewta ji pata nahi chala. sashi shekhar ki jagah koi dusra aayega to wah bhi yahi karega.

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  • avinash aacharya says:

    महाश्वेता जी को प्रणाम करते हुए याद दिलाना चाहूंगा कि दो साल पहले मी़डिया घरानों ने मंदी के नाम पर लोगों को नोकरी से निकालने का काम किया था। इसमें चपरासी से लेकर संपादक तक शामिल थे। लेकिन किसी बड़े लेखक ने अखबार मालिकों को पोस्टकाडॆ तक नहीं लिखा। प्रमोद जोशी एक साल पहले विदा हुए है। अरूण त्रिपाठी ताजातरीन केस हैं। इस मामले में ताज्जुब यह है कि महाश्वेता जी ने ५ को शोभना जी को पत्र लिखा, ६ को मीडिया वेबसाइट्स पर अपडेट हो गया। पत्र की प्रति लिए कुछ लोग घूम भी रहे है।

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  • sumit yadav says:

    jin logon ko mahasweta ji ki akasmat pratikriya se pareshani ho rahi hai, unhen main yaad dila doon ki is bina wajah ki chhatni aur media ke badalte mahaul se sabhi kafi samay se pareshan hain. aaj jab ek senior mahila aage aakar koi stand le rahin hain to humen unke is kadam ka samarthan karna chahiye. aur mahasweta ji ne toh apna saara jeevan hi logon ke liya ladte hue bitaya hai. aaj bhi ve yahi kar rahin hain. unpar ungli uthana sahi nahin hai. politics ka criminalisation toh ho chuka hai aur ab media ka bhi wahi hashr hota nazar aa raha hai. kya kal ka samaj chor dakait hi chalayenge? kam se kam ek akhbar ke daftar ka mahaul toh samajhdar aur academic hona chahiye. sampadak ek badi soch wala vyakti hona chahiye kyonki uske nazariya se hi samaj khudko dekhta aur samajhta hai. Hindustan mein filhaal in cheezon ka abhav hai.

    sumit yadav

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  • SHUBHAM KASANA says:

    pashchim bangal ki dayankari vaam-morcha sarkarki aavaz buland karne wali`n mahan lekhika mahashweta devi ko mediake daman ke khilf aavaz uthaane ke liye badhai. iss umra mein unka yeh tyaag aur sahas hindi ke tamaam lekhakon aur patrakaron ke liye prerna dene waala hai patrakarita property dealing aur kisi tarah se raajnaitik satta paane ka naam nahi hai vah loktantra ko majboot karne aur anyay ke khilaaf awaz uthane waali sansthan hain wah corrupt rajnetaon aur officers ki naukriyan va padd chhenti rahi hai lekin aaj kuchh logon ne use sir ke bal khada kar diya hai aaj media moolyahiin logon se saanth gaanth kar apne unhi saathiyon ka gala ghont rahi hain jo kahin secular democracy aur social justice ki awaz rahi hai arun tripathi ki patrakarita inhi gunon ke karan chamakdar rahi hai unhe hataana unse jyada patrakarita ki kshati hai

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  • SHUBHAM KASANA says:

    bengal mein vammorcha ke daman ke khilaf awaj buland karne ke bad mahan lekhika mahashweta devi ko media gharanon ke daman ke khilaf awaj uthane ke liye badhai. Is umra mein unka yah tyag aur sahas hindi ke tamam lekhkon va patrakaron ke liye prerna dene wala hai. patrakarita corrupt netaon va afsaron ko hatvane ke liye jani jati rahi hai. par aaj vah unhin logon se milkar apne un sathiyon ka gala ghont rahi hai jo secular democracy aur social justice ki awaj bante rahe hain.Arun Tripathi ki patrakarita inhin gunon ke liye sarahi jati rahi hai. unhe hatana patrakarita ki kshati hai

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  • अरविंद कुमार सिंह says:

    श्री अरुण त्रिपाठी आधुनिक हिंदी पत्रकारिता के उन गिने चुने लोगों में हैं जिन्होंने तमाम आर्थिक दबावों को नजरंदाज करते हुए ईमानदारी से गणेशशंकर विद्यार्थी की परंपरा को आगे बढ़ाया है। ऐसे व्यक्ति को निश्चय ही हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में एक सम्मानजनक जगह मिलनी तय है। वे हिंदी और अंग्रेजी पत्रकारिता दोनों में समान दखल रखते हैं और युवा पत्रकारों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत हैं। अगर किसी अखबार ने उनकी हैसियत को नहीं समझा तो वह अखबार अभागा है। देश के बड़े से बड़े पत्रकार की कभी न कभी विदाई होती रहती है। पर उसका तरीका सम्मानजनक होना चाहिए। जहां तक इस मामले पर महाश्वेता देवी जी जैसी महान लेखिका और समाजसेवी द्वारा विरोध करने का सवाल है तो मेरा मानना है कि उन्होंने बहुत सही समय पर सही कदम उठाया है। उनके इस कदम का उन सभी लेखकों और पत्रकारों को समर्थन करना चाहिए जो पत्रकारिता की गरिमा और गौरव बचाए रखना चाहते हैं। श्री अरुण त्रिपाठी के लिए हजार दरवाजे खुले हुए हैं।

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  • shyam singhal says:

    yah baat sahee hai ki jis tarah se patrakaaron ko hataya jaa raha hai, wah durbhagyapoorna hai aur nindaneey bhi. Lekin Hindi patrakaaron ko bhi samajhna hoga ki unhen naye jamaane ke saath chalna hoga. Bina kaam kiye ab patrakarita sambhaw naheen hai. aap ek hi saath patrakaar aur activist naheen ho sakte.

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  • Sumit Yadav says:

    shyam singhal ji, activist hona kisi ko kaise akarmanya bana deta hai, yeh meri samajh ke bahar hai. lekin mujhe lagta hai ki aaapka kehna ekdum sahi hai.In bade patrakaron ko samay ke saath samaj ki buraiyon ko apnana hoga aur jaisa aapka kehna hai, kaam karna hoga yani, beimaani karni hogi. Iske bina ab patrakarita sambhav nahin dikhti.

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  • पत्रकारों के अपमाजनक विदाई पर महाश्वेता जी के विरोध को प्रणाम। उन्होंने इस मामले पर एक स्टैंड लेकर यह एक बार फिर साबित कर दिया है कि लोग उन्हें महान लेखिका क्यों कहते हैं। दरअसल, ज्यादातर लेखकों के साथ समस्या यही है कि वे अपने लेखन में तो बहुत बड़ी-बड़ी बातें करते हैं लेकिन उनका जीवन लेखन से बेहद जुदा होता है। महाश्वेता देवी ने हिंदुस्तान के कॉलम को लात मारकर यह साबित किया है कि उनके लेखन और जीवन में कोई खास फर्क नहीं है।

    कुछ लोग कह रहे हैं कि पहले भी पत्रकारों की छंटनी हो रही थी तो महाश्वेता देवी ने उस वक्त क्यों नहीं कुछ बोला? इसे दूसरे तरह से देखना चाहिए। समस्या के पैदा होते ही उसके समाधान के रास्ते निकलने नहीं शुरू हो जाते बल्कि जब ऐसा लगने लगता है कि समस्या बहुत बड़ी हो गई है तब ही विरोध के स्वर फूटते हैं। पर दुख इस बात का है कि ऐसे वक्त में हिंदी के तथाकथित महान साहित्यकारों और लेखकों के लब से बोल क्यों नहीं फूट रहे? किसी भी देश में जब लेखक रीढ़विहीन हो जाए तो समझना चाहिए कि समस्या गंभीर है।

    महाश्वेता जी पर आरोप लग रहा है कि वे अपने प्रिय पत्रकारों को संस्थान छोड़ने को मजबूर किए जाने पर ही पत्रकारों के अपमानजनक विदाई का सवाल उठा रही हैं। आरोप लगाने वालों को इस बात से अंदाजा हो जाना चाहिए कि जिन लोगों की विदाई ने महाश्वेता जी जैसी महान लेखिका को कॉलम नहीं लिखने का फैसला लेने को मजबूर दिया, उन लोगों की अहमियत क्या होगी।

    ताजा मामला अरुण कुमार त्रिपाठी का है। ईमानदारी से बताऊं तो हिंदी के जिन पत्रकारों के लेखों का मुझे इंतजार रहता है उनमें से एक अहम नाम है अरुण त्रिपाठी। इन नामों में कुछ जनसत्ता के हैं और कुछ स्वतंत्र तौर पर लिखने वाले। अरुण त्रिपाठी पर टीका-टिप्पणी करने वाले लोगों को पहले उनके लेखन को जान लेना चाहिए। मैं इस बात का दावा कर सकता हूं कि हिंदी अखबारों के ज्यादातर संपादक अरुण त्रिपाठी के सामने नहीं टिकते। न तो बौद्धिक स्तर पर और न ही लेखन के मामले में।

    जब सत्ता समर्थक पत्रकारिता की आंधी चल रही हो और हर कोई चम्मच से ज्यादा बेलचा बनने को आतुर हो तो ऐसे में सीमित गुंजाइश के बावजूद व्यवस्था विरोधी पत्रकारिता करने की साहस कितने पत्रकारों में है। यह हिंदी पत्रकारिता का दुर्भाग्य है कि ऐसे लोगों के साथ इस तरह का अपमानजनक व्यवहार किया जा रहा है।

    अब अरुण त्रिपाठी के मन के किसी कोने में यह लगता होगा कि अंग्रेजी पत्रकारिता में ही बने रहते तो अच्छा होता। क्योंकि अंग्रेजी में अब भी हिंदी से कई गुना अच्छी हालत है। हिंदुस्तान टाइम्स बिल्डिंग के जिस गलियारे में अरुण त्रिपाठी बैठते थे उसी गलियारे में हिंदुस्तान टाइम्स के कई वरिष्ठ पत्रकार भी बैठते हैं। वह चाहे पंकज वोरा हों या फिर विनोद शर्मा। ये पत्रकार सालों से हिंदुस्तान टाइम्स में हैं। इनका कद काफी बड़ा है। इस बीच हिंदुस्तान टाइम्स में संपादक भी बदले लेकिन किसी भी संपादक ने अपनी हिटलरशाही के लिए इन पत्रकारों की छुट्टी नहीं की।

    यही फर्क है अंग्रेजी और हिंदी वालों में। हिंदी के संपादक अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए राजनीति करने में पूरा ध्यान लगाते हैं और इसका नतीजा होता है दोयम दर्जे का अखबार निकालना। राजनीति अंग्रेजी में भी होती है लेकिन सबका जोर बेहतर अखबार निकालने पर होता है।

    आज जिन लोगों ने अरुण त्रिपाठी को धकिया कर बाहर निकलने को मजबूर कर दिया है, कल उनकी भी बारी आएगी। क्योंकि हिंदुस्तान के संपादकों ने ही इस कुप्रथा का बीज बोया है। मृणाल पांडेय की विदाई भी अजय उपध्याय स्टाईल में हुई थी और शशि शेखर के साथ भी आज नहीं तो कल ऐसा होगा ही। क्योंकि मालकिन को यह मालिक है कि हिंदी के तथाकथित मैनेजरनुमा संपादक कितने खोखले हैं।

    पर अहम सवाल यह है कि हिंदी पत्रकारिता की टहनी पर बैठकर उसे काटने का काम कर रहे पत्रकारों को यह बात कब समझ में आएगी। शायद तब, जब चाहकर भी हम कुछ बचा नहीं पाएंगे और हमेशा अंग्रेजी के सामने हर मामले में दोयम दर्जे के बने रहने के अलावा और कोई चारा नहीं रहेगा। अरुण त्रिपाठी का जाना इस बात को भी साबित करता है कि हिंदी में ज्ञान, समझ और काम के प्रति पैशन का कोई महत्व हिंदी पत्रकारिता में नहीं रहा। इससे युवा पत्रकारों को अब इस दिशा में सोचना चाहिए कि या तो समय रहते पत्रकारिता छोड़ किसी और क्षेत्र में हाथ आजमाएं या फिर अंग्रेजी पत्रकारिता का रुख करें।

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  • पत्रकारों के अपमाजनक विदाई पर महाश्वेता जी के विरोध को प्रणाम। उन्होंने इस मामले पर एक स्टैंड लेकर यह एक बार फिर साबित कर दिया है कि लोग उन्हें महान लेखिका क्यों कहते हैं। दरअसल, ज्यादातर लेखकों के साथ समस्या यही है कि वे अपने लेखन में तो बहुत बड़ी-बड़ी बातें करते हैं लेकिन उनका जीवन लेखन से बेहद जुदा होता है। महाश्वेता देवी ने हिंदुस्तान के कॉलम को लात मारकर यह साबित किया है कि उनके लेखन और जीवन में कोई खास फर्क नहीं है। कुछ लोग कह रहे हैं कि पहले भी पत्रकारों की छंटनी हो रही थी तो महाश्वेता देवी ने उस वक्त क्यों नहीं कुछ बोला? इसे दूसरे तरह से देखना चाहिए। समस्या के पैदा होते ही उसके समाधान के रास्ते निकलने नहीं शुरू हो जाते बल्कि जब ऐसा लगने लगता है कि समस्या बहुत बड़ी हो गई है तब ही विरोध के स्वर फूटते हैं। पर दुख इस बात का है कि ऐसे वक्त में हिंदी के तथाकथित महान साहित्यकारों और लेखकों के लब से बोल क्यों नहीं फूट रहे? किसी भी देश में जब लेखक रीढ़विहीन हो जाए तो समझना चाहिए कि समस्या गंभीर है।
    महाश्वेता जी पर आरोप लग रहा है कि वे अपने प्रिय पत्रकारों को संस्थान छोड़ने को मजबूर किए जाने पर ही पत्रकारों के अपमानजनक विदाई का सवाल उठा रही हैं। आरोप लगाने वालों को इस बात से अंदाजा हो जाना चाहिए कि जिन लोगों की विदाई ने महाश्वेता जी जैसी महान लेखिका को कॉलम नहीं लिखने का फैसला लेने को मजबूर दिया, उन लोगों की अहमियत क्या होगी।
    ताजा मामला अरुण कुमार त्रिपाठी का है। ईमानदारी से बताऊं तो हिंदी के जिन पत्रकारों के लेखों का मुझे इंतजार रहता है उनमें से एक अहम नाम है अरुण त्रिपाठी। इन नामों में कुछ जनसत्ता के हैं और कुछ स्वतंत्र तौर पर लिखने वाले। अरुण त्रिपाठी पर टीका-टिप्पणी करने वाले लोगों को पहले उनके लेखन को जान लेना चाहिए। मैं इस बात का दावा कर सकता हूं कि हिंदी अखबारों के ज्यादातर संपादक अरुण त्रिपाठी के सामने नहीं टिकते। न तो बौद्धिक स्तर पर और न ही लेखन के मामले में। जब सत्ता समर्थक पत्रकारिता की आंधी चल रही हो और हर कोई चम्मच से ज्यादा बेलचा बनने को आतुर हो तो ऐसे में सीमित गुंजाइश के बावजूद व्यवस्था विरोधी पत्रकारिता करने की साहस कितने पत्रकारों में है। यह हिंदी पत्रकारिता का दुर्भाग्य है कि ऐसे लोगों के साथ इस तरह का अपमानजनक व्यवहार किया जा रहा है।
    अब अरुण त्रिपाठी के मन के किसी कोने में यह लगता होगा कि अंग्रेजी पत्रकारिता में ही बने रहते तो अच्छा होता। क्योंकि अंग्रेजी में अब भी हिंदी से कई गुना अच्छी हालत है। हिंदुस्तान टाइम्स बिल्डिंग के जिस गलियारे में अरुण त्रिपाठी बैठते थे उसी गलियारे में हिंदुस्तान टाइम्स के कई वरिष्ठ पत्रकार भी बैठते हैं। वह चाहे पंकज वोरा हों या फिर विनोद शर्मा। ये पत्रकार सालों से हिंदुस्तान टाइम्स में हैं। इनका कद काफी बड़ा है। इस बीच हिंदुस्तान टाइम्स में संपादक भी बदले लेकिन किसी भी संपादक ने अपनी हिटलरशाही के लिए इन पत्रकारों की छुट्टी नहीं की। यही फर्क है अंग्रेजी और हिंदी वालों में। हिंदी के संपादक अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए राजनीति करने में पूरा ध्यान लगाते हैं और इसका नतीजा होता है दोयम दर्जे का अखबार निकालना। राजनीति अंग्रेजी में भी होती है लेकिन सबका जोर बेहतर अखबार निकालने पर होता है।
    आज जिन लोगों ने अरुण त्रिपाठी को धकिया कर बाहर निकलने को मजबूर कर दिया है, कल उनकी भी बारी आएगी। क्योंकि हिंदुस्तान के संपादकों ने ही इस कुप्रथा का बीज बोया है। मृणाल पांडेय की विदाई भी अजय उपध्याय स्टाईल में हुई थी और शशि शेखर के साथ भी आज नहीं तो कल ऐसा होगा ही। क्योंकि मालकिन को यह मालिक है कि हिंदी के तथाकथित मैनेजरनुमा संपादक कितने खोखले हैं। पर अहम सवाल यह है कि हिंदी पत्रकारिता की टहनी पर बैठकर उसे काटने का काम कर रहे पत्रकारों को यह बात कब समझ में आएगी। शायद तब, जब चाहकर भी हम कुछ बचा नहीं पाएंगे और हमेशा अंग्रेजी के सामने हर मामले में दोयम दर्जे के बने रहने के अलावा और कोई चारा नहीं रहेगा। अरुण त्रिपाठी का जाना इस बात को भी साबित करता है कि हिंदी में ज्ञान, समझ और काम के प्रति पैशन का कोई महत्व हिंदी पत्रकारिता में नहीं रहा। इससे युवा पत्रकारों को अब इस दिशा में सोचना चाहिए कि या तो समय रहते पत्रकारिता छोड़ किसी और क्षेत्र में हाथ आजमाएं या फिर अंग्रेजी पत्रकारिता का रुख करें।

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  • पत्रकारों के अपमाजनक विदाई पर महाश्वेता जी के विरोध को प्रणाम। उन्होंने इस मामले पर एक स्टैंड लेकर यह एक बार फिर साबित कर दिया है कि लोग उन्हें महान लेखिका क्यों कहते हैं। दरअसल, ज्यादातर लेखकों के साथ समस्या यही है कि वे अपने लेखन में तो बहुत बड़ी-बड़ी बातें करते हैं लेकिन उनका जीवन लेखन से बेहद जुदा होता है। महाश्वेता देवी ने हिंदुस्तान के कॉलम को लात मारकर यह साबित किया है कि उनके लेखन और जीवन में कोई खास फर्क नहीं है। कुछ लोग कह रहे हैं कि पहले भी पत्रकारों की छंटनी हो रही थी तो महाश्वेता देवी ने उस वक्त क्यों नहीं कुछ बोला? इसे दूसरे तरह से देखना चाहिए। समस्या के पैदा होते ही उसके समाधान के रास्ते निकलने नहीं शुरू हो जाते बल्कि जब ऐसा लगने लगता है कि समस्या बहुत बड़ी हो गई है तब ही विरोध के स्वर फूटते हैं। पर दुख इस बात का है कि ऐसे वक्त में हिंदी के तथाकथित महान साहित्यकारों और लेखकों के लब से बोल क्यों नहीं फूट रहे? किसी भी देश में जब लेखक रीढ़विहीन हो जाए तो समझना चाहिए कि समस्या गंभीर है।
    महाश्वेता जी पर आरोप लग रहा है कि वे अपने प्रिय पत्रकारों को संस्थान छोड़ने को मजबूर किए जाने पर ही पत्रकारों के अपमानजनक विदाई का सवाल उठा रही हैं। आरोप लगाने वालों को इस बात से अंदाजा हो जाना चाहिए कि जिन लोगों की विदाई ने महाश्वेता जी जैसी महान लेखिका को कॉलम नहीं लिखने का फैसला लेने को मजबूर दिया, उन लोगों की अहमियत क्या होगी।
    ताजा मामला अरुण कुमार त्रिपाठी का है। ईमानदारी से बताऊं तो हिंदी के जिन पत्रकारों के लेखों का मुझे इंतजार रहता है उनमें से एक अहम नाम है अरुण त्रिपाठी। इन नामों में कुछ जनसत्ता के हैं और कुछ स्वतंत्र तौर पर लिखने वाले। अरुण त्रिपाठी पर टीका-टिप्पणी करने वाले लोगों को पहले उनके लेखन को जान लेना चाहिए। मैं इस बात का दावा कर सकता हूं कि हिंदी अखबारों के ज्यादातर संपादक अरुण त्रिपाठी के सामने नहीं टिकते। न तो बौद्धिक स्तर पर और न ही लेखन के मामले में। जब सत्ता समर्थक पत्रकारिता की आंधी चल रही हो और हर कोई चम्मच से ज्यादा बेलचा बनने को आतुर हो तो ऐसे में सीमित गुंजाइश के बावजूद व्यवस्था विरोधी पत्रकारिता करने की साहस कितने पत्रकारों में है। यह हिंदी पत्रकारिता का दुर्भाग्य है कि ऐसे लोगों के साथ इस तरह का अपमानजनक व्यवहार किया जा रहा है।
    अब अरुण त्रिपाठी के मन के किसी कोने में यह लगता होगा कि अंग्रेजी पत्रकारिता में ही बने रहते तो अच्छा होता। क्योंकि अंग्रेजी में अब भी हिंदी से कई गुना अच्छी हालत है। हिंदुस्तान टाइम्स बिल्डिंग के जिस गलियारे में अरुण त्रिपाठी बैठते थे उसी गलियारे में हिंदुस्तान टाइम्स के कई वरिष्ठ पत्रकार भी बैठते हैं। वह चाहे पंकज वोरा हों या फिर विनोद शर्मा। ये पत्रकार सालों से हिंदुस्तान टाइम्स में हैं। इनका कद काफी बड़ा है। इस बीच हिंदुस्तान टाइम्स में संपादक भी बदले लेकिन किसी भी संपादक ने अपनी हिटलरशाही के लिए इन पत्रकारों की छुट्टी नहीं की। यही फर्क है अंग्रेजी और हिंदी वालों में। हिंदी के संपादक अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए राजनीति करने में पूरा ध्यान लगाते हैं और इसका नतीजा होता है दोयम दर्जे का अखबार निकालना। राजनीति अंग्रेजी में भी होती है लेकिन सबका जोर बेहतर अखबार निकालने पर होता है।
    आज जिन लोगों ने अरुण त्रिपाठी को धकिया कर बाहर निकलने को मजबूर कर दिया है, कल उनकी भी बारी आएगी। क्योंकि हिंदुस्तान के संपादकों ने ही इस कुप्रथा का बीज बोया है। मृणाल पांडेय की विदाई भी अजय उपध्याय स्टाईल में हुई थी और शशि शेखर के साथ भी आज नहीं तो कल ऐसा होगा ही। क्योंकि मालकिन को यह मालिक है कि हिंदी के तथाकथित मैनेजरनुमा संपादक कितने खोखले हैं। पर अहम सवाल यह है कि हिंदी पत्रकारिता की टहनी पर बैठकर उसे काटने का काम कर रहे पत्रकारों को यह बात कब समझ में आएगी। शायद तब, जब चाहकर भी हम कुछ बचा नहीं पाएंगे और हमेशा अंग्रेजी के सामने हर मामले में दोयम दर्जे के बने रहने के अलावा और कोई चारा नहीं रहेगा। अरुण त्रिपाठी का जाना इस बात को भी साबित करता है कि हिंदी में ज्ञान, समझ और काम के प्रति पैशन का कोई महत्व हिंदी पत्रकारिता में नहीं रहा। इससे युवा पत्रकारों को अब इस दिशा में सोचना चाहिए कि या तो समय रहते पत्रकारिता छोड़ किसी और क्षेत्र में हाथ आजमाएं या फिर अंग्रेजी पत्रकारिता का रुख करें।

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