मां के पांव छुओ, बृजलाल!

आलोक तोमर: मायावती के चरणों में सैंडिल पहनाने वाले उत्तर प्रदेश पुलिस के सबसे चर्चित आईपीएस यानी अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक बृजलाल के बेचारे बन जाने का राज क्या है : भारतीय दंड विधान का दंड यानी डंडा जिसके हाथ में आ जाता है वह अपने आपको खुदा से कम नहीं समझता। बीट कांस्टेबल अपने हिस्से के इलाके का खुदा होता है, थानेदार एक पूरी बस्ती का खुदा होता है, डीएसपी एक इलाके का खुदा होता है और एसपी पूरे जिले का खुदा होता है।

आम तौर पर ये खुदा गरीबों और हमारे आपके जैसे आम लोगों को अपनी इबादत करने पर मजबूर कर देते हैं। छोटे खुदा बड़े खुदाओं की बंदगी करते हैं और बड़े खुदा जो वर्दी में शेर नजर आते हैं वे मुख्यमंत्री और ताकतवर राजनैतिक हस्तियों के सामने दुम हिलाते, अपने आपको पतित से पतित साबित करते और वफादारी के बदले में मैडल और मनचाहे पद पाते नजर आते हैं। पूरे देश में कई अपवादों को छोड़ कर इन छोटे बड़े खुदाओं की कतार लगी हुई है और खुदा से आम बंदा क्या सवाल करे कि आपने जो किया वो क्यों किया? खुदा की मर्जी के आगे किसकी चलती है?

मायावती के चरणों में सैंडिल पहनाने वाले उत्तर प्रदेश पुलिस के सबसे चर्चित आईपीएस यानी अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक बृजलाल की खामोशी और बेचारगी समझ में आती है। उनकी नामर्दी को राजनैतिक शिलाजीत मायावती से ही मिलता है और वहीं से उनके सारे गुनाहों की कुंडली शुरू होती है। मगर गॉड मदर मायावती के राज में कर्मवीर सिंह को क्या हो गया कि सारे जीवन की एक बेदाग, साफ और साहसी छवि को एक दरोगा के हाथों मिट्टी में मिलवाने पर तुल गए? नहीं मालूम कि उनकी क्या मजबूरी है और यह भी नहीं मालूम कि गाजीपुर के नंदगंज थाने का थानेदार इतना ताकतवर हो गया कि एसपी से लेकर आईजी और बृजलाल जैसे भाड़ -मीरासियो से ले कर कर्मवीर सिंह जैसे अधिकारियों जिनके नाम की कसम खाई जाती है, उसके खिलाफ बोलने तक से डरने लग गए।

लेकिन एक बार सोच कर देखिए तो कि वर्दी वाले ये गुंडे सिर्फ एक इस मामले में दोषी नहीं है। वह तो मामला यशवंत सिंह का हैं जिन्हें देश के सारे पत्रकार जानते हैं और मानते हैं और इसीलिए अलग अलग कोनों से जहां से उम्मीद तक नहीं थी, आवाजें उठना शुरू हुई है। मगर उससे क्या होता है, खुदा तो खुदा रहेंगे। यह यशवंत की मां का मामला है इसलिए पूरे देश को पता भी चल रहा है। हिंदी विश्वविद्यालय चला रहे आईपीएस अधिकारी विभूति नारायण राय भी मां को न्याय दिलाने के लिए खुलकर सपोर्ट कर रहे हैं। जिस मामले की तस्वीरें और वीडियो मौजूद हैं, फोन का रिकॉर्ड मौजूद है, वहां इतने सब हंगामे का असर सिर्फ इतना होता हैं कि बयान लेने के लिए पुलिस वाले गांव पहुंच जाते हैं और साबित करने की कोशिश करते हैं कि न्याय हो रहा है। कम से कम न्याय का अभिनय तो हो रहा है। देश के 99 प्रतिशत से ज्यादा मामलों में तो यह अभिनय ही नहीं होता। बृजलाल अपने बंगले में स्कॉच पीते हैं और दरोगा जी ठेके से सिपाही भेज कर अपने नशे का इंतजाम करते हैं। लोकतंत्र का क्या है, उसमें बहुत सारे यशवंत हैं और बहुत सारी मांए हैं।

मुझे पक्का भरोसा है कि यशवंत और उनके परिवार की स्त्रियों को गिरफ्तार दिखाया ही नहीं गया होगा। अभियुक्त को शरण देने का मामला अगर बनाया गया होता तो जमानत तक नहीं होती। हिरासत में रखने का कानून में बगैर गिरफ्तारी के कोई प्रावधान नहीं है मगर भारत की और खासतौर पर गाजीपुर की पुलिस कब से प्रावधानों की परवाह करने लगी? वहां तो इल्जाम भी खुदाओं का, गवाह भी खुदाओं के और फैसले भी खुदाओं के। असली खुदा बेचारा शर्मिंदा हो रहा होगा उस अपनी कायनात को देख कर जहां थानेदार और उनके माई बाप खुदा बन बैठे हैं।

बृजलाल जी भी नावाकिफ नहीं होंगे क्योंकि हमारी चंबल घाटी के पड़ोस में इटावा में वे तैनात रह चुके हैं। चंबल घाटी में वर्दी वाले गुंडों से निपटने के दो ही तरीके हैं। एक तो यह कि उन्हें पामेरियन कुत्ते की तरह खरीद लिया जाए और बिस्किट खिला कर दुलारा जाए। दूसरा तरीका यह है कि बंदूक, बंदूक से बात करे। इटावा जिले के ही एक गांव में जब पुलिस ने तलाशी के नाम पर घर की महिलाओं को सताना शुरू कर दिया था तो डरे हुए परिवार वालों ने भी पुलिस वालों की बंदूकें छीन कर उनके जनाजे निकाल दिए थे। यह धमकी नहीं है बृजलाल। हकीकत है। तुम भी जानते हो। कल तुम्हारी गॉड मदर सड़क पर आ गई या सीबीआई की हवालात में पहुंच गई तो तुम नया बाप तलाशोगे। 1977 में आईपीएस बने थे इसलिए रिटायरमेंट को बहुत वक्त नहीं बचा है और रिटायर हो चुके पुलिस वाले किस कदर आम हो जाते हैं और दूसरे लोगों से ज्यादा सताएं जाते हैं यह तुम्हे बताने की जरूरत नहीं है।

सबसे आसान और न्यायपूर्ण उपाय यही होता कि उत्तर प्रदेश की पुलिस शर्मिंदगी जाहिर करती, जिन महिलाओं को निपट अन्याय के दायरे में ला कर हवालात में दो किस्तों में रखा गया, उनसे दरोगा जी पांव छू कर माफी मांगते और इसके बाद हो सकता है कि यशवंत ही नहीं, हमारा दयालु समाज माफ कर देता। आखिर वर्दी में हो तो क्या हुआ, हैं तो बेचारे चपरासी ही और गरीबों के प्रति मन में गांठ बांध कर रखना किसी भी क्षत्रियता के खिलाफ है।

वरना अब सब तैयार हो जाएं। लड़ाई शुरू हो चुकी है। यह लड़ाई सिर्फ यशवंत सिंह और उनके भाई के, मां के अपमान की लड़ाई नहीं है। यह पूरे देश की पुलिस को यह बताने की जंग हैं कि जब आम आदमी प्रतिशोध लेने पर उतारू होता है तो उसका प्रतिकार झेलने की ताकत बड़े बड़े तीसमारखाओं में भी नहीं होती। मायावती को हाथी और मूर्तियों के अलावा कुछ दिखता नहीं मगर उनके चौकीदार की हैसियत से कम से कम बृजलाल उन्हें आइना दिखाने की कोशिश कर सकते हैं। माना कि कायरों में इतनी हिम्मत नहीं होती मगर उम्मीद करने में बुराई ही क्या है?

लेखक आलोक तोमर देश के जाने-माने पत्रकार हैं. डेटलाइन इंडिया के संपादक हैं और सीएनईबी न्यूज चैनल में भी वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं.

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Comments on “मां के पांव छुओ, बृजलाल!

  • जय पुष्‍प says:

    प्रिय यशवंत जी, कुछ व्‍यस्तताओं के कारण इंटरनेट से दूर रहा जिसकी वजह से आपके परिवार के पुलिसिया उत्‍पीड़न की खबर देर से प्राप्‍त हुई। हमारे मित्र कामता जी से पता चला कि आपकी वृद्ध माताजी के साथ यूपी पुलिस ने दुर्व्‍यवहार और गैरकानूनी आचरण किया।
    पुलिस का यह बर्ताव घोर निंदनीय है और इसके खिलाफ कार्रवाई अवश्‍य की जानी चाहिए। मामला सिर्फ किसी पत्रकार के घरवालों के उत्‍पीड़न का नहीं बल्कि एक नागरिक के अधिकारों का है इसलिए सिविल राइट्स और डेमोक्रेटिक राइट्स मंचों को भी इस मुद्दे को उठाना चाहिए।
    हम इसमें पूरी तरह आपके साथ हैं।
    — जय पुष्‍प

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  • Ajay Uprety says:

    Dear Yashwantji, I really felt bad whatever has happend with your mother. I express my complete solidarity with you.In UP, you must be aware,
    a couple of days ago how the Kanpur police tried to muzzle H.T/ Hindustan for exposing the police. People have not forgotten what Shahi Imam did during a press conf. in Lucknow. Before this a circle officer misbehaved with scribes who were covering some assignment. But he was merely transferred. In the case of H.T/Hindustan, it is an open secret that such thing could not had taken place without the consent of senior police officials. So situation is pretty bad as far freedom of press is concerned in UP.
    In the light of above mentioned incidents, I would request you to take the case of your mother to an logical end. By logical end what I mean is entire journalistic community should make concerted efforts to ensure some action against the erring cops of Gazipur. Once again I express my total solidarity and full support to you.

    Ajay Uprety
    Senior Journalist
    Lucknow

    Reply
  • प्रदीप श्रीवास्तव says:

    भाई यशवंत जी, माता जी के बारे में पढ़ कर मन को ठेस पहुंचा. मुझे तो लगता है कि यह सब निर्भीक व निष्पक्ष पत्रकारिता के पीछे किसी की सोची समझी साजिश है. रही पुलिस की बात तो वह जग जाहिर है. आप की मनोभाव को हम समझ रहे हैं. अपने अभियान को जारी रखे, हम आप के साथ हैं.
    प्रदीप श्रीवास्तव

    Reply
  • भाष्कर गुहा नियोगी says:

    [b]आपको हमारे उत्पीड़न का अधिकार दिया किसने है?[/b] उत्तर प्रदेश में पुलिस किस भूमिका में है बताने की जरूरत नहीं है। शिकार ढूढ़ना और थाना यानि टार्चर रूम में ले जाकर बेवजह किसी का भी उत्पीड़न करना यहां की पुलिस की दिनचर्या का एक हिस्सा है। विश्वास नहीं होता तो इस सूबे के थानों के बाहर से एक बार टहल आइए कोई न कोई गिड़गिड़ाता, रोता-बिलखता हुआ जरूर मिल जाएगा जिसके किसी अपने को पुलिस बेवजह थाने में बंद कर उसके घर वालों से उसको छोड़े जाने की कीमत तय करती है। सौदा पट गया तो ठीक नहीं तो फिर हेरोइन की पुड़िया या कट्टा तैयार है केस बनाने के लिए और पकड़े गए को हवालत में भेजने के लिए। ये अलग बात है कि पुलिस शायद ही पुलिस का हाथ किसी बाहुबली, नामी अपराधी के गिरेबान तक पहुंच पाता है। अलबत्ता बहुत से पुलिसकर्मी ऐसे हैं जो इन अपराधियों, बाहुबलियों के चौखट पर झुकते हैं इसलिए कि इन्हें वहां से कुछ न कुछ खर्चा-पानी मिलता रहता है। कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं होती कि उत्तर प्रदेश की उत्तम पुलिस का कानून आम आदमी के लिए कहर है। अगर आप साधरण आदमी है और आपके पास कोई पहुचं नही है तो प्रदेश के थानों में आपकी कोई सुनवाई नहीं है। सड़क पर किसी को भी अकारण लठिया देना, मारते हुए लाकर थाने में अकाराण ही घंटो नहीं दिनों तक जबरन बिठाए रखना यहां के पुलिस वालो की रवायत है। यहां पुलिस सबसे अकारण उल्टे-सीधे सवाल पूछ सकती है लेकिन पुलिस से पूछने का अधिकार कि भाई साहब आप ऐसा क्यों कर रहे है? या फिर आपको ये करने का अधिकार किसने दिया है? किसी को नहीं है। गाजीपुर के नंदगंज थाने में यशवंत जी के मां के साथ जो कुछ हुआ क्या उसे सही ठहराने के लिए पुलिस के पास कोई तर्क है? कानून की किताब की कौन सी धारा इन खाकी वालो को ये इजाजत देती है कि एक महिला को अकारण ही बिना किसी जुर्म के 12 घंटे थाने पर लाकर बैठा दिया जाए? इसका जवाब न तो सूबे का कोई मंत्री दे सकता है न कोई पुलिस का बड़ा अफसर। क्यों इस तरह के पुलिसिया उत्पीड़न का कोई जवाब नहीं होता। सूबे की मुखिया देख ले और देख ले पुलिस के आला अफसरान कि साधारण जन के साथ पुलिस का सुलूक क्या है। पता नहीं क्यो मुझे ये लगता है कि वर्दी का सहारा लेकर जन साधारण को डराने के इस खेल की सूत्रधार सत्ता में बैठे लोग है। वो जनसाधरण को इतना डरा-धमका कर रखना चाहते है ताकि उनके जनविरोधी नीतियों के खिलाफ लड़ने की हिम्मत कही से भी आवाम न जुटा सके। आए दिन निरीह, सिधे-साधे लोगो का पुलिसिया उत्पीड़न इसी की एक कड़ी है। नंदगंज में यशवंत जी के मां के साथ जो कुछ हुआ वो ये बताने के लिए काफी है कि उत्तम प्रदेश के थानों में क्या चल रहा है? पुलिस आम आदमी के कितने करीब और कितने हमर्दद है। सोचने की जरूरत है कि आजाद मुल्क में हम ओर हमारे अधिकार कितने सुरक्षित है? आज यशवंत जी के मां के साथ हुआ हीै पता नहीं आने वाले कल हम में सेे किस की मां के साथ यही वाकया दोहराया जाएगा क्यों ये यहां पुलिस निरकुंश है उसे सत्ता का खुला समर्थन है कि जो चाहे वो कर ले पर जनसाधरण को इतना डरा कर रखे कि कही से भी किसी भी तरह की खिलाफत की आवाज न उठ पाए। लेकिन इस तरह ही घटनाए हमारे सामने एक चुनौती बन कर सवाल के शक्ल में खड़ी होकर पूछती है सब सहते ही रहेंगे कि या फिर एक साथ एक आवाज में हुक्मरानों और उनकी पुलिस से ये पूछंगे भी कि आपकों यू ही हमे उत्पीड़न करने का अधिकार किसने दिया है? सवाल पूछिए तभी हम आने वाले दिनों में मांओं को बचा सकेंगे।
    भाष्कर गुहा नियोगी
    यूनाइटेड भारत
    वाराणसी

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  • हरेश कुमार says:

    यशवंत जी, यूपी पुलिस की कारस्तानी की जितनी भी निंदा की जाए कम है। आज कल यूपी पुलिस, पुलिस कम अपराधी ज्यादा नजर आती है। हर कोई तंग है। सवाल आपकी या मेरी मां का नहीं है। सवाल उस भ्रष्ट हो चुके व्यवस्था का है जो सड़ांध मार रहा है। जहां हर चीज को राजनीतिक लाभ-हानि कि दृष्टि से देखा जाता हो वहां न्याय की उम्मीद करना व्यवस्था पर एक प्रश्नचिन्ह लगाता है। इस संघर्ष की स्थिति में हम सभी पत्रकार भाई आपके साथ हैं। आशा करते हैं कि समाज के प्रबुद्ध जनों का साथ आपको मिलेगा। जबतक जातिवादी चश्मे से सरकार चलेगी तब तक अपराधी खुले आम खुमते रहेंगे और व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने वालों को तंग किया जाता रहेगा। भ्रष्ट, अपराधी, जातिवादी व्यवस्था के उन्मूलन होने तक हमारा संघर्ष जारी रहेगा और उन पुलिस वालों को जरूर न्याय के कटघरे में खड़ा होना पड़ेगा जिन्होंने आपके साथ इतना बड़ा अत्याचार किया है। हम सभी इस संघर्ष में आपके साथ हैं।

    जो घटना आपके परिवार के साथ हुई है, वह उत्तर प्रदेश की पलिस के असली चेहरे को दिखाता है। किस तरह से सत्ताधारी लोगों के दवाब में, अपराधी चरित्र के लोगों की रहनुमाई में शासन का संचालन किया जा रहा है। जिस शासन व्यवस्था के पास समाज के लोगों की भलाई की जिम्मेदारी होती है, संरक्षण की जिम्मेदारी होती है। वह ही अगर अपराध ग्रस्त हो जाए तो क्या कहा जाए। उत्तर प्रदेश में यही सब कुछ हो रहा है। मायावती शक्ति के मद में चूर हो चुकी हैं और उन्हें यह तो मालूम ही होगा कि इंदिरा गांधी से ज्यादा इस देश में कोई निरंकुश नहीं था उसे भी देश की जनता ने गद्दी से उतार दिया तो इनकी औकात क्या है। इस अवसर पर एक पुरानी पंक्ति याद आ रही है। शक्ति के मद में हो कर चूर विजय को निकला था यूनान। एक ही टकराहट में गया मगध को वह पहचान।

    यहां कविता में प्रजा की शक्ति का वर्णन है। सही गलत की पहचान सत्ता से बाहर होने पर होती है जिस तरह आज कल लालू यादव रो-रोकर कह रहे हैं कि उन्होंने कभी ‘भूरा बाल साफ करो’ का नारा नहीं दिया था। क्या वो जनता भूल गई है। नहीं ना। इन्हें भी एक दिन एहसास होगा। तब तक शायद बहुत देर हो चुकी होगी। सिर्फ दलित वोट-बैंक के नाम पर देश के प्रधानमंत्री का सपना शायद ही पूरा हो। अगर जोड़-तोड़ कर किसी भी दिन ये सत्ता में आ भी जाए। क्योंकि इस देश में अगर 16 सांसदों के बूते देवगौड़ा प्रधानमंत्री बन सकते हैं तो कुछ भी हो सकता है। इंद्र कुमार गुजराल प्रधानमंत्री बन सकते हैं और मनमोहन सिंह बगैर लोकसभा का चुनाव जीते प्रधानमंत्री का पद लगातार ग्रहण कर सकते हैं तो कुछ भी हो सकता है। लेकिन यहीं से अराजकता को बढ़ावा मिलता है। अगर ऐसा कुछ हुआ तो देश में भयंकर तूफान खड़ा हो सकता है और ऐसी गदर मचेगी जिसकी नेताओं ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी। क्या सिर्फ सत्ताधारी और बाहुबलियों की मां – बाप को ही इस देश में संरक्षण मिलेगा। औरों की मां -बाप की कोई इज्जत ही नहीं। होशियार! सत्ताधारियों सत्ता के मद में इतना मत चूर हो जाओ कि एक दिन तुम्हें भी जनता नंगा करके सरेआम पीटे और कोई सहानुभूति देने वाला भी ना हो। यह किसी एक की मां की इज्जत का सवाल नहीं है। यह अवाम की गिरती कानून-व्यवस्था पर एक प्रश्नचिन्ह भी है?
    हरेश कुमार
    पत्रकार
    दिल्ली

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  • Bahut hi badhiya likha Tomar ji Aap ne ! Saadhuwaad ! lekin UP ka haal to jaan hi rahe hain– ANDHER NAGARI CHAUPAT RAJA (Rani)……….

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  • हरेश कुमार says:

    एक बात और मैं कहना चाहूंगा कि समय लिखेगा उनका भी अपराध। जो इस समय चुप होकर तमाशा देख रहे हैं। मानव की इसी प्रवृति से अपराधियों और असामाजिक तत्वों (मौजूदा प्रशासन भी इन्हीं में से एक है।) को मौका मिलता है। लेकिन एक बात नहीं भूलनी चाहिए कि अगर आपके पड़ोसी पर कोई अत्याचार हो रहा हो और आपने अपनी नजरें बंद कर ली तो समझ लीजिए कि अगला निशाना आप ही हैं। समाज में एक बुरी बात यह है कि लोग तमाशा देखते हैं देखो फलाने की बहू/बेटी या परिवार को पुलिस वाले ने/या अपराधियों ने किस तरह से इज्जत उतार दी। साला बहुत बनता था/काबिल बन रहा था। अब देखों कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं रहा। ठीके हुआ। ऐसे लोगों के साथ यही होना चाहिए। इस सोच को बदलने की जरूरत है। अगर हम दूसरे पर हंसते हैं या उसकी परेशानी मे मजे लेते हैं तो जल्द ही हम भी ऐसी ही स्थिति में होते हैं। लोग सोचते हैं कि जब हम पर इस तरह की परेशानी आयेगी तो देखेंगे। लेकिन ऐसा कुछ होता नहीं है और अपराधी एवं असामाजिक तत्व एक-एक करके समाज के हर व्यक्ति को निशाना बनाते चलते हैं और आपसी फूट के कारण हम सब उनका शिकार बनते हैं। यहां पर पुलिस-प्रशासन भी असामाजिक तत्वों से मिली होती है। सब मौका- ए- ताक में होते हैं। हम सभी को ऐसे मौके पर एकजुटता का प्रदर्शन करना चाहिए जिससे इस तरह के तत्वों का जोरदार मुकाबला करने में हम सक्षम हो सकें। हमें जातिगत चश्मे से उपर उठना होगा। व्यक्तिगत हित से उठकर समाज के हित के बारे में सोचना होगा। अपने आत्म-सम्मान की खातिर एक बार फिर से उठ खड़ा होना होगा। तब देखियेगा इन कुकुरों को कहीं मुंह छिपाने की जगह भी नहीं मिलेगी। फिर किसी की बहू, मां, बेटी पर किसी असामाजिक तत्व की निगाह नहीं पड़ेगी। अपराधियों की सिर्फ एक जाति होती है और वह है समाज को आतंकित करके अपना धंधा कायम करना। चाहे किसी भी पद पर कोई क्यूं ना हो अगर वह किसी की मां, बहन और बेटी की इज्जत से खिलवाड़ करता है तो उसका मुंह-तोड़ जवाब देना सभी भारतीयों का काम है। हम सभी इस अवसर पर आपके साथ हैं। और मीडिया का विशाल नेटवर्क हमारे प्रयासों में अपनी अग्रणी भूमिका निभायेगा और समाज के मीरचंदों को उचित जवाब देगा। जय हिन्द।।
    आपका
    हरेश कुमार
    पत्रकार
    दिल्ली

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  • Dharmendra Pratap Singh says:

    Alok Bhaiya, Brijlal wohi … hai na,jo 15 february ko Mayawati ko HAAR pahnane ke liye mara ja raha thha? Is sarkari wachman ko usi chaurahe par jutiyana hai,jahan mare haathhi khade kiye ja rahe hain ! Bas,Yashwant ji khud ko akela na samjhen.

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  • Tomer ji namaskar
    ye mamala mere hi janpad ka hai aur mai janta hu ki nandganj ka daroga radjit rai bsp sarkar k mantri k kafi najdiki ristedar hone ki wajah se ye sab karne ki kosis ki.kyuki ye jante hai ki inka koi bigad nahi sakta.sath hi inka sath janpad k kuch media karmi vigyapan k lalch me unka sath de rahe hai.is liye ye apne ko chulbul pandey samjhte hai.aur sabhi aurat ko munni bai.

    Reply
  • भारतीय़ नागरिक says:

    शर्मनाक चुप्पी है कानून-व्यवस्था लागू कराने वालों की>.

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  • नरेन्द्र प्रताप, बुलंदशहर says:

    ठीक कहा आलोक जी,
    पुलिसवालों के जिस्म से वरदी उतरने के बाद उनकी हालत एक आम शहरी से भी ज्यादा बुरी हो जाती है। फिर चाहे वो कोई दबंग दारोगा हो या आईपीएस। अपने शहर में रोज ही ऐसे रिटायर्ड पुलिसवालों को अफसरों के सामने गिड़गिड़ाते देखता हूँ, लेकिन काम नही होता। और देश-प्रदेश में जब तक राजनीति की माया और भ्रष्टाचार है, ऐसे हालात से ना तो कोई बच सकता है औऱ ना ही इन्हें खत्म कर सकता है। हो सकता है एडीजी ब्रजलाल जैसे अफसरों ने रिटायरमेंट के बाद विदेश में बसने का मन बना लिया हो। शायद इसीलिए जनता-जनार्दन से पंगा लेकर न्याय की राह में रोड़ा बन गये है। लेकिन कलेजे पर हाथ रखकर उन्हें भी सोचना चाहिए। ये वरदी न्याय को जिंदा रखने के लिए पहनी है, कानून की नीलामी के लिए नही। मना नही करता कि सरकार के पिठ्ठू मत बनो। मजबूरी जानता है इन अफसरों की..सरकारी की गुलामी नही की तो ना तो कुर्सी रहेगी और ना ही नौकरी। जीवन भर इतने पंगे किये है कि रोज एक जॉच शुरू होगी, उसे पूरा कराने के मैनेजमैंट में ही वक्त बीत जायेगा। लेकिन मांओ को मत भूलो…मत करो जुल्म इन पर।

    नरेन्द्र

    Reply
  • mahandra singh rathore says:

    yashwant ji ke pariwar ki logo ke sath up police ki yah karywahi sharmnak hai. alok tomar ji ne brij lal aur up police ke bare mai khulker likha hai. yah un jeese log hi likh sekte hain. alok tomaj ji ko mere badhai ho.

    MAHANDRA SINGH RATHORE

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  • RAJESH VAJPAYEE JANSANDESH UNNAO says:

    sha……..bas alok tomerji apki kalam gunaah aur gunaahgaro par esi dhaar say sada chalti rahey aur hum sabhi k liye prayna baney.
    bhai jalimo par kya likha hai seena chauda ho gaya.
    ap k charan choounga gar kabhi amna-samna hua.
    yashwant bhai dukhi mat hona yeh apki MAA par nahi hum sabhi ki MAA par up police k gundo nay hamla kiya hai aur ab yeh aag tabhi shant hogi jab sabhi doshiyo ko kathore saja ki ghoshana soobey ki mukhiya yani CM dwara ki jayegi.
    yashwant bhai ab jansandesh rahey ya jaye koi fikar nahi ab tou MAA kay samman ki ladai akhiri dum tak ladi jayegi.
    rajesh vajpayee unnao

    Reply
  • shailendra kumar shukla says:

    बहुत अच्छा आलॊक सर शायद बृजलाल की तांद्रा टूटे और उसके अंदर का इंसान जागे यह सब पढकर

    Reply

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