मां, पत्रकार और अखबार

: जैसे मां के लिए यशवंत लड़ रहे, उसी तरह पत्रकार को पीटने वाले बुखारी को सजा दिलाने और हिंदुस्तान अखबार पर अत्याचार करने वालों के खिलाफ उठ खड़े होने की जरूरत :  खिलाफ खड़े होने इन दिनों भड़ास एक बहुत ही महत्वपूर्ण आन्दोलन को लेकर आगे बढ़ा हुआ है- ”जस्टिस फॉर मां”. मैं और आईआरडीएस तथा नेशनल आरटीआई फोरम संस्थाएं, जिनसे मैं जुडी हुई हूँ, की पूरी टीम इस मामले के यशवंत जी के साथ अपने पूरे दमख़म से है. जिस तरह से यशवंत जी इस मामले को आगे बढ़ाएंगे, हम लोग उसके अनुसार साथ रहेंगे.

साथ ही मैं आजाद खालिद जी की इस बात से भी कुछ हद तक सहमत हूँ कि “जैसे जैसे वक्त गुजर रहा है, अपमान की पीड़ा बढती ही जा रही है”. इसके पीछे तो एक कारण स्वयं यशवंत जी का कार्य और व्यक्तित्व है जिसने उन्हें न जाने कितने ही लोगों का प्रिय और अज़ीज़ बना दिया है. लेकिन इसके साथ कम महत्वपूर्ण यह बात भी नहीं है कि मामला एक माँ से जुड़ा हुआ है- जो माँ हम सबको बराबर प्यारी होती है. और बात यहीं ख़त्म नहीं होती. पुलिस जिन तीन महिलाओं को ले गयी थी, वे तीनों ही कहीं ना कहीं मातृत्व का प्रतीक हैं.

साथ ही यह मामला हमारे देश और समाज के एक अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण मसले से भी जुड़ा हुआ है और वह मसला है मानवाधिकारों का. क़ानून हमारे देश के हर नागरिक को कई अधिकार दिए हुए है. उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा और संरक्षा के अधिकार भी इसी में शामिल हैं. ऐसे में कोई संस्था, कोई तंत्र इन अधिकारों को बस यूं ही छीन ले, यह तो बिलकुल ही अनुचित है. और पूर्णतया गलत, अवैधानिक और असंवैधानिक. एक मानवाधिकार कार्यकत्री होने के नाते मैं इस बात और और अधिक गहराई से महसूस करती हूँ.

मुझे इस बात का जहां तक कष्ट है कि यशवंत जी की माँ के साथ ऐसा हुआ वहीं मुझे इस बात की भी बेहद ख़ुशी है कि और लोगों की तरह वे चुपचाप बैठ नहीं गए बल्कि उन्होंने आगे बढ़ कर इस पूरी व्यवस्था से अकेले दम लोहा लेने का साहस किया. यह अलग बात है कि जल्दी ही उन्हें इस यात्रा में कई मजबूत और विश्वसनीय साथी भी मिलते चले गए.

मैं इस रूप में यह चाहूंगी कि यशवंत जी इस मामले को इसकी स्वाभाविक परिणति तक पहुंचाएं. साथ ही इन्हीं दौरान मेरे आसपास घटित हुए दो अन्य घटनाओं को भी इस घटना से जोड़ना चाहूंगी. पहली घटना लखनऊ की है- एक पत्रकार की सरेआम प्रेस वार्ता में पिटाई की. और उसके बाद कार्यवाही कोई नहीं क्योंकि मारने वाला ताकतवर था. यानि कि मानव के मूलभूत अधिकारों का सीधा उल्लंघन.

फिर मैं कानपुर की हिन्दुस्तान अखबार से जुड़ी घटना का जिक्र करुँगी जिसमे कुछ पुलिस अधिकारोयों ने सीधे-सीधे कानून को ताक पर रख कर इस प्रकार का आचरण किया मानो हम आपातकाल में रह रहे हैं. हमारे देश में क़ानून नाम की कोई चीज़ ना हो. हमारी व्यक्तिगत चाहत और इच्छा ही हमारा सब कुछ हो. यानि एक बार पुनः सबकी आँखों के सामने मानवाधिकारों का सीधा उल्लंघन.

तीनों मामलों में बहुत अधिक एकरूपता है. तीनों में ताकतवर समझते हुए एक पक्ष द्वारा सीधा अत्याचार किया गया, कानून को ठेंगा दिखाया गया और अपनी मर्ज़ी के अनुसार गलत किया गया. तीनों मामलों में अब तक न्याय नहीं हुआ है और कोई भी दोषी क़ानून के अनुसार दण्डित नहीं हुए है. पता नहीं होंगे भी या नहीं. एक दुखद साम्य यह भी रहा कि तीनों मामलों पत्रकारों से जुड़े हुए रहे.

लेकिन कुछ अंतर भी दिख रहा है. जहां यशवंत जी ने मां से जुड़े मामले को पूरी ताकत से लिया है, बाकी दोनों में अभी उसका कुछ अभाव दिख रहा है. शाह इमाम ने जिस पत्रकार साथी पर हाथ उठाया उनकी आवाज़ दुबारा नहीं सुन पायी हूँ. यदि वे अपने मामले को लेकर आज भी खड़े हैं तो हम लोग भी अपनी पूरी ताकत भर इनके साथ रहेंगे और यशवंत जी की ही तरह ना जाने कितने हाथ उठने लगेंगे.

हिंदुस्तान बहुत बड़ा अखबार है. उसे किसी बाहरी सहयोग की जरूरत नहीं है फिर भी हममें से हर आदमी उस अपमान और अन्याय में इनके बगल में खड़ा है, पर हिन्दुस्तान से यह अनुरोध रहेगा कि बात को मात्र तात्कालिक लाभ तक नहीं देखा जाए बल्कि इनसे वाजिब अंत तक पहुंचाएं. ये तीनों लड़ाइयां मानव के अधिकारों की हैं और जो इन्हें ईमानदारी से लड़ेगा वह दूसरों के लिए नजीर बनेगा.

डॉ नूतन ठाकुर

सचिव

आईआरडीएस

लखनऊ

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Comments on “मां, पत्रकार और अखबार

  • shiv prasad narayan singh says:

    डा.नूतन आप की निष्पक्षता या यूं कहिए सही बता के प्रति पक्षधरता का समथॆक रहा हूं। भड़ास से हमेशा एक शिकायत रही है कि गिरोह की तरह काम करता है। इस समय निसंदेह देश की सबसे बड़ी मीडिया साइट है, लेकिन लिखकर रख लीजिए इसके इतिहास बनने के दिन आ रहे हैं, मौजूदा टिप्पणी से इसका संदभॆ जोड़ता हूं। एक माफिया का तरह बरताव करने वाले इमाम बुखारी या एक जज की तरह न्याय करने वाले प्रेमप्रकाश दोनों मामले में उदासीनता और अपनी पीड़ा हो तो न्याय की गुहार। सामूहिक मेल भेजना। हिन्दुस्तान के संदभॆ में तो एकल सच है कि भड़ास को एंटी-शशिशेखर कैंपेन चलाना है, दिक्कत तब होती है जब निजी खंदक मुद्दे खाने लगती है। प्रेमप्रकाश अच्छे हो सकते हैं, लेकिन सही नहीं। पहले दिन वे बयान देते हैं कि हिंदुस्तान में चोरी की गाड़ियां चल रही थीं। अब या तो वे माफी मांगे कि उन्होंने झूठ कहा या हिंन्दुस्तान के लोगों को गिरफ्तार करें। जागरण के मालिक एक क्लब में देर रात मस्ती करते पाए गए थे। उसको खबर से जोड़कर किसी ने नहीं देखा न ही पत्रकारों ने कहा कि उनके पक्ष में कोई मुहिम चलाई जाए।

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  • Rajul Raj Mishra says:

    Yeh Andhe Bahreon ki nagri hai Yashwant ji. Antim sandesh ko chodiye , Aapki Gandhigiri ki yeh “BHADASI” patrkarita MAA ko kahan tak nyay aur samman dilane me sahayak sidh hogi ,pata naheen. Behtar hoga mere Dost, ki turant apne Gaon jayiye aur Aaropiyon ke khilaf morcha khol dijiye taki unko saja mil sake. Yeh tabhi hoga jab apne jile me jakar BAHRE ADHIKARION se milenge dawab dalenge yaa phir court ka sahara lenge. Yaad rakhen MAa ke samman se bad ker kuch bhi naheen .

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  • भारतीय़ नागरिक says:

    पुलिस की बर्बरता के विरुद्ध आवाज उठाई जाना चाहिये..

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