हिमाचल प्रदेश के चंबा, कांगड़, कुल्लू, शिमला, सोलन, सिरमौर, लाहुल स्पिति, किन्नौर आदि जिलों से ताल्लुक रखने वाले तथा विभिन्न समाचार पत्रों से जुड़े बीसियों पत्रकार भी मीडिया में चल रहे इस गोरखधंधे से आहत हैं लेकिन ये लोग अपना नाम आगे आने से गुरेज करते हैं। इन पत्रकारों का मानना है कि धन उगाही के इस धंधे में उन्हें ढाल की तरह प्रयोग किया जा रहा है।
तीस सालों से शिमला से द ट्रिब्यून से जुड़े राकेश लोहमी पत्रकारिता के गिरते स्तर के लिए मीडिया प्रबंधन को दोषी मानते हैं। मीडिया कर्मियों में नैतिकता के पतन से आहत लोहमी कहते हैं कि आज की पत्रकारिता में मिशन का अभाव दिखाई देता है। निष्पक्ष व निर्भीक पत्रकारिता का क्षेत्र तेजी से सिमटता जा रहा है। विषेश्ा रूप से इलैक्ट्रॉनिक मीडिया और कुछ समाचार पत्र खुलेआम खबरों के बदले में पैसे वसूलते दिखाई देते हैं। इस बात के कई सबूत 2009 के चुनाव के दौरान मिले हैं। लोहमी कहते हैं कि आज कई चैनल ऐसे हैं जिनमें बिचैलियों, राजनीतिज्ञों का धन लगा हुआ है, लिहाजा ये लोग मीडिया का उपयोग अपने स्वार्थ साधने के लिए कर रहे हैं। पेड न्यूज को वे मीडिया के लिए एक खतरनाक जीवाणु मानते हैं।
शिमला से ताल्लुक रखने वाले बरिष्ठ पत्रकार एच. आनंद शर्मा भी मीडिया के गलत राह पर जाने को दुर्भाग्यपूर्ण मानते हैं। वे कहते हैं कि कारपोरेट कहे जाने वाले मीडिया घरानों ने मीडिया को व्यापार का जरिया बना दिया है। उनका मानना है कि आज भी समूची व्यवस्था से निराश व हताश व्यक्ति की आखिरी उम्मीद मीडिया ही है लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि आम आदमी की समस्या के लिए मीडिया के पास कहीं कोई स्थान ही नहीं है। मीडिया द्वारा आज जो भी प्रकाशित एवं प्रसारित किया जा रहा है वह पाठकों की पसंद नहीं है। यही वजह है कि आज कई दैनिक करोड़ों रूपए के पुरस्कारों का प्रलोभन दे कर अपनी प्रसार संख्या बढ़ाने की नीति अपनाए हुए हैं। आनंद कहते हैं कि चुनाव के दौरान खबरें बेचने का जो नंगा नाच हो रहा है, उससे समूचे मीडिया जगत को शर्मसार होना पड़ रहा है। वह मानते हैं कि चौथे स्तंभ की गरिमा को बनाए रखने के लिए एक जन आंदोलन की जरूरत है।
18 वर्षों से पत्रकारिता से जुड़े डे एण्ड नाईट चैनल के मंगलजीत सिंह कहते हैं कि जिस ढर्रे पर आज मीडिया जा रहा है उससे तो यही लगता है कि मीडिया का असली स्वरूप बच पाना मुश्किल है। एएनआई से जुड़े गगनदीप नारंग कहते हैं कि मीडिया समूह प्रंबधन की गुलामी करने वाले पत्रकारों की वजह से ही मीडिया की साख पर बट्टा लग रहा है और पत्रकारिता का पेशा कलंकित हो रहा है। बद्दी-बरोटीवाला नालागढ़ पत्रकार संघ के अध्यक्ष श्याम मोदगिल कहते हैं कि आज अच्छी खबरों का अभाव रहता है। जो पत्रकार बन रहे हैं ब्लैकमेलिंग को बढ़ावा दे रहे हैं। पत्रकारिता के लिए कोई भी मापदंड एवं योग्यता नहीं है और विज्ञापन दो पत्रकार बनो की नीति हावी होती जा रही है। मीडिया काले कारोबारियों के शिकंजे में फंसता जा रहा है। बिना पारिश्रमिक के पत्रकार शोषण का शिकार हैं।
हिंदी साहित्य के शोधार्थी एवं दैनिक भास्कर कुल्लू से जुड़े रमेश ठाकुर कहते हैं कि मीडिया में हर किसी का बिना शिक्षण-प्रशिक्षण के प्रवेश नैतिकता के पतन का सबसे बड़ा कारण है। लोग आज मीडिया से समाज सेवा की भावना से नहीं अपितु मीडिया के बहाने अपना उल्लू सीधा करने के उदेश्य से जुड़ रहे हैं। उनकी राय में छोटे-छोटे कई समाचार पत्र और पत्रिकाएं भी हैं जिनका उदेश्य भी अपना हित साधना और काले कारोबार पर पर्दा डालना है। रमेश ठाकुर मानते हैं कि यदि मीडिया कर्मियों एवं पत्रकारों को अच्छा पैकेज मिले और आजीविका के लिए कहीं भी समझौता न करना पड़े तो निश्चित रूप से मीडिया का रोल आज भी सर्वोपरि हो सकता है। उनकी राय में लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी आधुनिकता की चकाचौंध में खो रहा है। उनकी राय है कि अब नई पौध तलाशनी और तराशनी होगी और नई दिशा देनी होगी। यही पौध लोकतंत्र के प्रति अपनी भूमिका को बखूवी समझ सकती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले समय में मीडिया अपनी विश्वसनीयता बनाए रखेगा।
सरकार भी दोषी
दैनिक ट्रिब्यून में बतौर डिप्टी एडिटर न्यूज कार्यरत विनोद कोहली पिछले 37 सालों से मीडिया से जुड़े हैं। चंडीगढ पंजाब यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट के राज्य अध्यक्ष, राष्ट्र स्तर के विभिन्न पत्रकार संगठनों के पदाधिकारी व केंद्रीय प्रेस मान्यता समिति के सदस्य विनोद कोहली कहते हैं कि वर्तमान दौर में मीडिया भटकाव और गिरावट की राह पर है। आजादी से पहले पत्रकारिता एक मिशन हुआ करती थी लेकिन अब वह बात कहां। आज पत्रकारिता व्यापार बन कर रह गई है। बड़े-बड़े मीडिया घरानों ने आज पत्रकारिता का मुखौटा ओढ़ा कर पत्रकारों को विज्ञापन एजेंट बना कर व्यापार बढ़ाने का जरिया बना दिया है। ऐसे में खबर की तह तक जाने की बात भी हवा हो गई है। वे कहते हैं कि पत्रकारिता का गिरता स्तर, मीडिया कर्मियों में नैतिकता का पतन इस सब के लिए मीडिया प्रबंधन और सरकार दोनों ही पूरी तरह से दोषी हैं। कोहली का मानना है कि व्यापारीकरण के इस दौर में जीवन यापन और बुनियादी सुविधाओं की प्रतिपूर्ति के लिए पत्रकारों ने आत्मसमपर्ण कर दिया है। मीडिया कमाई का साधन बन गया है। वे कहते हैं कि यदि पत्रकार विज्ञापन के एवज में खबर निकालता है तो स्वाभाविक तौर पर उसमें सत्यता तो कम होगी ही और खबर की तह तक जाने का भी पत्रकार प्रयास नहीं करेगा, क्योंकि उसे वही प्रकाशित करवाना है जो विज्ञापनदाता चाहता है।
वे कहते हैं कि ऐसे भी लोग हैं जो मीडिया का उपयोग अपने काले कारोबार पर पर्दा डालने के लिए कर रहे हैं। पेड न्यूज को वे न केवल शर्मसार करने वाला बल्कि आम जनमानस के साथ भी छलावा मानते हैं । उनका कहना है कि पेड न्यूज ने मीडिया को शर्मसार किया है और कई कारपोरेट घरानों ने अपनी तिजोरियां भरी हैं। उनके अनुसार एक आकलन के मुताबिक केवल उतरी भारत में ही करीब डेढ़ से दो हजार करोड़ रूपए मीडिया घरानों की तिजोरी में गए हैं। इसकी शिकायत कुछ पत्रकार संगठनों ने प्रेस कांउसिल ऑफ इंडिया से भी की है। उनका कहना है कि पेड न्यूज के इस गोरखधंधे की सरकार द्वारा जांच की जानी चाहिए। कोहली की राय में यदि समय रहते सुधार न किया गया और पेड न्यूज पर नकेल न कसी गई तो एक दिन मीडिया से लोगों का विश्वास ही उठ जाएगा। वे कहते हैं कि पत्रकारिता और व्यापारीकरण को अलग अलग रखा जाना चाहिए। पत्रकारिता की बिगड़ी व्यवस्था के लिए पूर्ण रूप से वे सरकार को दोषी मानते हैं। उनका तर्क है कि यदि सरकार पत्रकारों के लिए न्यूनतम वेतन कानून सुचारू रूप से लागू करती तो इससे पत्रकारों को सरंक्षण मिलता और मीडिया के बिकाउ होने की नौबत भी न आती। यही वजह है कि सरकार की उदासीनता के चलते ही आज मीडिया कर्मी सबसे ज्यादा उपेक्षित और शोषण का शिकार हैं। कोहली कहते हैं कि पत्रकारों की बदौलत ही मीडिया घराने करोड़ों कमा रहे हैं ये घराने सरकार द्वारा पत्रकारों के लिए बनाए गए कायदे कानूनों को लागू करना भी जरूरी नहीं मानते।
हर स्तर पर हो रहा मीडिया मैनेज
पंजाब, हरियाणा और हिमाचल के इंडिया टीवी के ब्यूरो प्रमुख जगदीप संधू कहते हैं कि अब आम आदमी की खबर गुम हो गई है और चैनल रियलिटी शो का हिस्सा बन कर रह गए हैं। संधू मानते हैं कि मीडिया कर्मियों में नैतिकता का पतन हुआ है। वे इसके लिए मीडिया प्रबंधन को दोषी मानते हैं। वे कहते हैं कि पत्रकार बनने के लिए कोई भी मापदंड नहीं हैं, न तो कोई योग्यता परीक्षा है और न ही मीडिया में प्रवेश के लिए कोई कायदे कानून हैं लिहाजा कोई भी कहीं से उठ कर पत्रकार बन रहा है। ऐसे हालात में स्तर गिरने से लोकतंत्र का चैथा स्तंभ जर्जर हो रहा है। वे कहते हैं कि मीडिया क्षेत्र में उंची पंहुच रखने वाले लोग अपने हितों के लिए हर स्तर पर मीडिया का उपयोग कर रहें हैं, बात चाहे जमीनी एवं ग्रामीण स्तर की हो, जिला, राज्य स्तर की हो या फिर राष्ट्रीय स्तर की हर स्तर पर मीडिया को मैनेज किया जा रहा है। खबरें प्लांट की जा रही हैं।
संधू राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया कर्मियों के लिए प्रवेश परीक्षा के पक्षधर हैं। उनका कहना है कि ऐसी परीक्षा को उतीर्ण करने के बाद ही मीडिया में प्रवेश मिलना चाहिए। वे भी मानते हैं कि मीडिया में काले कारोबारियों और राजनीतिज्ञों का प्रवेश अपने स्वार्थ के लिए हो रहा है। ये लोग जनता की आवाज को ठेंगा दिखा कर मीडिया का उपयोग अपने लाभ के लिए कर रहे हैं। संधू मानते हैं कि एनआरआई के लिए मीडिया क्षेत्र में नियमों में छूट दी जानी चाहिए। उनका तर्क है कि ऐसे लोगों का न तो कोई राजनीतिक स्वार्थ होता है और न ही कोई अन्य स्वार्थ। वे कहते हैं कि ऐसा मीडिया कम से कम स्वार्थों से दूर होगा। शोषण के लिए संधू मीडिया कर्मियों को स्वयं जिम्मेवार ठहराते हैं। संधू कहते हैं कि आज भी लोग मीडिया से आशान्वित हैं। मीडिया क्षेत्र में युवाओं का आगमन हो रहा है जो कड़ी मेहनत के बूते बेहतरीन काम कर रहे हैं। संधू कहते हैं कि टीआरपी के लिए निजी एंजेंसी कतई हितकर नहीं हो सकती ।
सत्ता की रेस का घोड़ा मीडिया
कंवलजीत सिंह एएनआई, स्टार न्यूज के लिए काम कर चुके हैं। एमईटी जैसे बड़े प्रशिक्षण एव शिक्षण संस्थान और पटियाला यूनिवर्सिटी में बतौर प्राध्यापक सेवाएं प्रदान कर पत्रकारों की नई पौध तैयार करने में अपनी भूमिका अदा कर चुके सिंह आजकल पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ में बतौर रेडियो स्टेशन हेड कार्यरत हैं। वर्तमान में मीडिया की भूमिका को लेकर कंवलजीत खासे चिंतित हैं। वे मीडिया को राजनीतिज्ञों के लिए सत्ता का घोड़ा मानते हैं। जिसकी नकेल राजनीतिज्ञों के हाथों में हैं। मीडिया की भूमिका के बारे उन्होंने अपने विचार कुछ यूं व्यक्त किए।
विगत दिनों रिलीज हुई हिंदी फिल्म रण में सत्ता के सौदागरों और टीवी चैनल मालिकों के बीच सांठगांठ होती है। जिसमें प्रधानमंत्री बनने के लिए खलनायक टीवी मालिकों के साथ बेबुनियाद खबरें दिखा कर सत्ता हड़प ली जाती है। लेकिन एक टीवी चैनल के मालिक का किरदार निभा रहे अमिताभ बच्चन इस सारे झूठ का फर्दाफाश कर देते हैं। बुरे, लालची और भ्रष्ट मीडिया वालों की शामत आ जाती है। लेकिन यह सब ख्बावों और फिल्मों में ही होता है। मीडिया आज सिर्फ एक व्यापार बन कर रह गया है।
सबसे खतरनाक बात यह है कि यह सत्ता, पैसा और भ्रष्टाचार आदि का तिलिस्म बन गया है। मीडिया बिकाउ है। यह बात अब पर्दे के पीछे नहीं कही जाती बल्कि विगत लोकसभा चुनाव और महाराष्ट्र के चुनाव में साफ देखने को मिली। खबरों की खरीद फरोख्त को एक नया नाम मिला पेड न्यूज। जी हां जो भी खबर लगवानी हो, सच्ची हो या झूठी सब लगेगी लेकिन दाम लगेंगे। इसकी एक मूल्य सूची भी थी। कितनी खबर कितने दाम की। इसमें हर जेब के लिए पैकेज और स्लॉटस थे। राजनीतिज्ञों की तो पौ बारह। अब यह साफ हो गया है कि सत्ता की दौड़ में मीडिया का उपयोग रेस के घोड़े की तरह हो रहा है। इस बात में कोई शंका नहीं कि अस्तित्व की लड़ाई के लिए किसी भी अखबार और टीवी चैनल को पैसों की दरकार रहती है। लेकिन ऐसा भी क्या कि मीडिया सिर्फ पैसे के पीछे-पीछे दौड़े और खबर की वास्तविकता से भी अनजान बना रहे। राजनेता अब जान गए हैं कि मीडिया को कब्जे में रखने के लिए स्वामित्व जरूरी है। इसीलिए अब हर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टी के पास अपने अखबार और चैनल हैं। नेताओं ने समझ लिया है कि लोगों तक क्या और कैसी सूचना पहुंचेगी। यदि इस पर उनका अंकुश लग जाए तो जो वे चाहेंगे वही होगा। तृणमूल कांग्रेस समर्थकों ने कोलकाता टीवी खरीद लिया है और तमिलनाडू में द्रमुक और अनाद्रमुक का टीवी के बाजार पर कब्जा है। आज के दौर में मीडिया क्रांति का माध्यम नहीं कुकृत्यों का माध्यम है।
मीडिया चलाना हर किसी के बस की बात नहीं हैं। इसमें लाखों करोड़ों लगते हैं। ये अब एक व्यवसाय है जो ईमानदारी से नहीं चला सकते। क्योंकि आपके दुश्मन आपसे ज्यादा ताकतवर और खतरनाक हैं। आपका दुश्मन आपकी सरकार है। सरकार से उलझने का मतलब विद्रोह। मीडिया पर कब्जे की बात इसलिए भी चिंता जनक है कि क्योंकि पार्टी विशेष का मीडिया न सिर्फ खुद का वर्चस्व चाहता है बल्कि साम, दाम, दंड, भेद से अपने प्रतिस्पर्धी का सफाया चाहता है। उदाहरण के रूप में पंजाब में पहले कांग्रेस राज में और अब अकालियों के राज में यह बात स्पष्ट हो गई है। जब मीडिया को चलाने वाले ही भ्रष्ट होंगे, उसमें काम करने वालों का सच्चाई और ईमानदारी से दूर-दूर तक का कोई लेना देना नहीं होगा। इसीलिए अब पत्रकार कम और खपतकार ज्यादा मिलते हैं। शराब, तोहफे और रिश्वत की खपत आजकल धड़ल्ले से हो रही है। मीडिया में अब आम लोगों के लिए कोई जगह नहीं है। अखबारों में रोज फिल्मों के कलाकार कौन से कपड़े पहनते हैं यह खबर तो होती है, लेकिन जिन भारतीयों के पास तन ढांपने के लिए कपड़े नहीं हैं उनकी बात कोई नहीं लिखता। आईपीएल, क्रिकेट की खबरें रोज मिलेंगी परंतु पूरे देश के चरमाराते खेल ढांचे पर कोई नहीं बोलेगा। न्यूज चैनल पर लाफ्टर चैलेंज के ठहाकों के बीच आम आदमी का रूदन दब सा गया है। क्रांतिकारी पत्रिका खतरे से खाली नहीं है, जिसका जीता जागता प्रमाण तहलका भी है। आज का दौर शहीद होने का नहीं संगठित होने का है। पत्रकारिता को अपनी गौरवान्वित जगह वापिस दिलवाने के लिए सत्ता पक्ष से जूझना होगा। यह काम किसी एक शूरवीर का नहीं बल्कि सेना का है। लेकिन हां इसके लिए कुछ अच्छे सेनापतियों की दरकार है।
मीडिया के दफ्तर नहीं उगाही केंद्र खुल रहे हैं
जनसत्ता से जुड़े और हिमाचल प्रदेश के मंडी से ताल्लुक रखने वाले बरिष्ठ पत्रकार एवं छायाकार बीरवल शर्मा कहते हैं कि एक समय था जब खबर छपती थी तो उसका असर होता था। समस्या को उजागर करने पर उसका हल निकलता था और आम आदमी को इसका लाभ होता था। लेकिन अब इसके उलट हो रहा है। वह कहते हैं कि पहले पत्रकार जनता के मुद्दों को गंभीरता से लेते थे लेकिन अब ऐसा नहीं होता। उनका कहना है कि अब मीडिया का पूर्णतया व्यापारीकरण, व्यवसायीकरण हो गया है। दिन प्रतिदिन संपादक का कमरा छोटा हो रहा है और विज्ञापन प्रभाग का आलीशान। शर्मा कहते हैं कि बेशक विभन्न समाचार पत्र जहां-तहां कार्यालय खोल रहे हैं लेकिन इनका उदेश्य जन सेवा नहीं अपितु कारोबार बढ़ाना है। उनका कहना है कि इन कार्यालयों को यदि कुलैक्षन सेंटर कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। मीडिया घरानों की वर्तमान व्यवस्था के चलते ईमानदार पत्रकार आज लाचार और बेसहारा महसूस कर रहे हैं।
उनका कहना है कि विज्ञापन ऐजेंट के रूप में भर्ती कई पत्रकारों द्वारा खबर रोकने के लिए सौदेबाजी के मामले भी अब सुनाई देने लगे हैं। उनका कहना है कि आम आदमी अखबारों पर अंधा विश्वास करता है और मीडिया इस विश्वास को तोड़ने पर आमदा है। शर्मा कहते हैं कि गलत सूचना परोसना किसी अपराध से कम नहीं हैं। उनका कहना है कि किसी व्यवस्था पर यदि किसी का नियंत्रण न हो तो यही हश्र होता है। ऐसे हालात में न तो जनता का हित हो सकता है और न ही लेखनी जनता के हितों को तवज्जो देगी। शर्मा कहते हैं कि अखबार पहले भी विज्ञापन से ही चलते थे लेकिन तब तरीका कुछ और था और अब कुछ और है। उनकी राय में राष्ट्रीय स्तर पर एक समिति गठित की जानी चाहिए जो मीडिया के क्रियाकलापों की निगरानी करें। सरकार की मीडिया प्रबंधन पर कोई भी निगरानी न होने के कारण सरकार घुटने टेकती है और प्रबंधन मर्जी करता है और नतीजा पेड न्यूज के नंगे नाच के रूप में सामने आ रहा है। समाप्त
लेखक गोपाल शर्मा पेन पत्रिका के संपादक हैं. कई चैनलों में मुख्य संपादक व निदेशक रह चुके हैं.












daulat bharti
October 31, 2010 at 8:08 pm
GOPAL JI, MEDIA AAJ DALALON KE HATHON ME HAI. SARKAR IS PAR KUCH KARNA NAHI CHAHATI.