मीडिया की मर्यादा के लिए संवैधानिक संस्था जरूरी

रामबहादुर जी: इंटरव्यू : रामबहादुर राय (वरिष्‍ठ एवं नामचीन पत्रकार) : रामबहादुर राय का नाम हिन्दी पत्रकारिता में ना केवल एक पत्रकार के रूप में बल्कि अच्छे व्यक्ति के रूप में भी बड़े ही सम्मान एवं आदर के साथ लिया जाता है। लेखन, समाचारों पर पकड़ के साथ उनकी सादगी, आचरण और विद्वता की मिसाल दी जा सकती है। जनसत्ता और नवभारत टाइम्स में उन्होंने राजनीतिक रिपोर्टिंग की जो मिसाल कायम की वह हिन्दी पत्रकारिता के जगत में मील का पत्थर साबित हो चुकी है।

उनके पहले तक हिन्दी पत्रकारों और पत्रकारिता को भारतीय राजनीति में कोई तवज्जो नहीं दी जाती थी। रामबहादुर राय के विचार ईमानदार, समर्पित और निष्ठावान पत्रकारों के लिए उम्मीद की किरण जगाने के साथ-साथ उन्हें संबल भी प्रदान करते हैं। पेड न्यूज के खिलाफ आवाज बुलंद करने वालों के तीसरे पड़ाव में पहुंच चुके वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय पूरे दमखम से सिर्फ अपनी उपस्थिति ही दर्ज नहीं कराते बल्कि एक दिशा देते हुए नजर आते हैं।

वे भारतीय पत्रकारिता को जनसरोकार से भटकने का दोषी ठहराते हुए समानांतर मीडिया से दो-दो हाथ करने की सलाह देते हैं। उनके अनुसार मुख्यधारा की पत्रकारिता यदि अभी भी नहीं चेती तो उसका स्थान समानांतर मीडिया ले लेगा, जहां लोगों का व्यक्तिगत आभा मंडल काम नहीं आता बल्कि न्यूज वैल्यू और कंटेंट मानदंड स्थापित करते है। हालांकि उन्होंने कहा कि अब का युग समानांतर मीडिया के लिए सबसे माकूल है, लेकिन प्रेस की स्वतंत्रता और मर्यादा के लिए एक सशक्त नियामक भी वक्त जी जरूरत बन गई है। पेड न्यूज के मुद्दे पर आशुतोष कुमार सिंह ने की उनसे खास बातचीत, पेश है उसके प्रमुख अंश :

– पेड न्यूज को किस रूप में परिभाषित किया जा सकता है? क्या सिर्फ धन लेकर खबरें प्रकाशित या प्रसारित करना ही पेड न्यूज के दायरे में आता है या किसी अन्य संसाधनों को भी इसके दायरे में रखा जा सकता है?

‘पेड न्यूज’ अंग्रेजी का शब्द है, यदि हम इसे हिंदी में कहें तो इसका अर्थ ‘भुगतानशुदा खबर’ होगा। बात पूर्वी उत्तर प्रदेश की है। जब 15वीं लोकसभा के लिए वर्ष 2009 के प्रथम चरण का चुनाव हो रहा था, तभी पेड न्यूज का मामला सामने आया। दरअसल हुआ यह कि चंदौली लोकसभा सीट से तुलसी सिंह उम्मीदवार थे। ये वही तुलसी सिंह थे जो कभी तेलगी के सहयोगी थे। जिस तरह इन्होंने चुनाव में पैसा बहाया उसे देखकर सब को यह लगा कि इनके पास बहुत पैसा है। इन्होंने दैनिक हिन्दुस्तान के पहले पेज को खरीद लिया और अपने मन मुताबिक अपनी खबर उसमें छपवाई। यह एक विज्ञापन था लेकिन हिन्दुस्तान के पाठकों को यह बताना जरूरी नहीं समझा कि यह विज्ञापन है। यह पहली घटना थी जिस पर सबकी नजर गई। जब इसकी तह में लोग गए तो मालूम चला कि यह कोई पहला मौका नहीं है, इस तरह के काम पहले भी होते आ रहे हैं। कोई अखबार अपवाद नहीं है। सबने तय कर रखा था और अपने ब्यूरो के लिए एक लक्ष्य निर्धारित कर दिया था उसे उम्मीदवारों और पार्टी से पैसे लेने हैं। अगर इस आधार पर हम ‘भुगतानशुदा खबर’ को परिभाषित करें तो हम कह सकते है, ‘वह खबर जिसे अखबार या मीडिया समूह अपनी नीति के तहत पैसे लेकर खबर प्रकाशित या प्रसारित कर रहा है।’ जहां तक किसी पत्रकार द्वारा व्यक्तिगत रूप से अगर कोई गिफ्ट लिया जा रहा है अथवा पैसे लेकर खबर छापने का आश्वासन दिया जा रहा है, तो इसे पेड न्यूज के दायरे में नहीं डाला जा सकता। यह उस पत्रकार के व्यक्तिगत रूप से भ्रष्ट होने का मामला हो सकता है। कोई पत्रकार केवल गिफ्ट के लिए ही किसी प्रेस कांफ्रेंस में जाते रहे है। इसे हम संबंधित पत्रकार का निजी मामला मान सकते हैं, साथ ही उसके पत्रकारिता के चरित्र में यह गिरावट का संकेत भी है। अगर कोई पत्रकार अथवा मीडियाकर्मी अखबार को बदनाम करता है तो उसके खिलाफ संस्थान कार्रवाई तो करता ही है। इस तरह की कार्रवाई नवभारत टाइम्स में राजेन्द्र माथुर ने एक मीडियाकर्मी पर की थी। रायसाहबकोई संवाददाता जब अपनी रिपोर्ट फाइल करता है तो उस रिपोर्ट को कई टेबल से होकर गुजरना पड़ता है। खबर की मांग के आधार पर उसमें कांट-छांट की जाती है। उसके बाद कोई खबर छप के आती है। लेकिन पेड न्यूज के मामले में संस्थान की सहमति से विज्ञापन को खबर के रूप में मनचाहे स्थान पर छापा जाता है। अतः कोई पत्रकार किसी उम्मीदवार, पार्टी, संस्थान अथवा व्यक्ति विशेष को यह आश्वासन नहीं दे सकता कि वह उसके पक्ष में खबर उसके मन मुताबिक स्थान पर छपवा देगा।

1998 और 2003 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में मॉडल टाउन से हमारे एक मित्र चुनाव लडे़। उन्होंने जब मुझे बताया कि पत्रकारों ने खबर छापने के लिए उनसे पैसे मांगे थे, तो मैं सन्न रह गया। यहां गौर करने वाली बात है कि पत्रकारों ने पैसा मांगा था, किसी अखबार ने नहीं। लेकिन 2009 में इसके उलट थी, कई अखबार की ओर से तयशुदा जगह पर पैसा लेकर खबर छापने का मामला सामने आया। 22 मई 2009 को प्रभाष जी के अनुरोध पर माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय ने इस विषय पर एक सेमिनार का आयोजन कराया था। जिसमें अजीत सिंह के संसदीय क्षेत्र बागपत से चुनाव लड़ने वाले सोमपाल शास्त्री ने कहा कि मुझसे भी पैसा मांगा था और अखबार वालों ने उनके ना कहने पर उनको ब्लैक आउट कर दिया था। मुझे भी उस सेमिनार को संबोधित करना था। मेरे पहले जितने भी वक्ता बोले उन लोगों की बातों से ऐसा लगा कि पेड न्यूज की यह घटना दुनिया की पहली कोई घटना है। मैंने दो बातें कही। पहली यह कि 1995 के चुनाव के समय मैं जनसत्ता का ब्यूरो चीफ था। मेरे एक साथी ओमप्रकाश जी को महाराष्ट्र का चुनाव कवर करने जाना था। उन्होंने वहां का अनुभव बताया कि वहां पर तो पार्टी के कार्यालय से जो न्यूज भेजा जाता था, अखबार वाले हू-ब-हू उस खबर को बिना एक भी शब्द कांटे-छांटे छाप रहे थे। पत्रकारों को इधर-उधर घूमने के लिए कह दिया गया था। इस रोग से महाराष्ट्र और गुजरात पिछले 20 साल से ग्रसित हैं। यह रोग बिहार और उत्तर प्रदेश में अब सामने आया है। देश के बाकी के हिस्से के बारे में कुछ नहीं बता सकता। दूसरी बात यह कि लखनऊ राजाजीपुरम में लाल जी टंडन ने एक चुनावी सभा में यह कहा कि मैं रीता बहुगुणा अथवा अखिलेश दास से चुनाव नहीं लड़ रहा हूं बल्कि दैनिक जागरण से चुनाव लड़ रहा हूं, जिसने हमसे चुनाव कवरेज के नाम पर 80 लाख रूपये मांगे हैं। उस समारोह में सरकार के चार अधिकारी भी मौजूद थे, जिनमें से दो ने मुझे बताया कि हम लालजी टंडन को ही वोट करेंगे और हमसे जितना वोट मैनुपुलेट हो सकता है वह भी करेंगे। और लालजी टंडन उस चुनाव को जागरण के विरोध के नाम पर जीत गये।

– पेड न्यूज पर प्रेस परिषद द्वारा बनाई गई खुद की उक्त समिति की रिपोर्ट को दबा दिया गया। आखिर इसकी वजह क्या हो सकती है?

प्रेस परिषद की जांच रिपोर्ट को दबाया जा रहा है। इसके पीछे लोकमन अखबार के मालिक विजय दरड़ा का हाथ है। उन्होंने शीतला सिंह और सुमन गुप्ता को जांच रिपोर्ट के विपक्ष में वोट करने को कहा था। जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक करने न करने की बात पर हुए मतदान में 9 सदस्य पक्ष में 12 विपक्ष में बाकी या तो मत में शामिल नहीं हुए अथवा तटस्थ रहे।

– अब जब जन सरोकार वाली पत्रकारिता के लिये पेड न्यूज एक चुनौती बन गया है। ऐसे में इस रोग से निपटने के उपाय क्या हो सकते हैं?

1955 में प्रेस आयोग की रिपोर्ट के आधार पर प्रेस परिषद की स्थापना की गई थी। 1955 और अभी की मीडिया में बहुत अन्तर है। उस समय पूरे देश में कुल 417 अखबार थे और आज इनकी संख्या बढ़कर 70 हजार हो गई है और 450 न्यूज चैनल हैं। यह नया आंकड़ा है। इनके नियमन के लिये सरकारी स्तर पर पहल होनी चाहिये। उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने प्रेस आयोग को बैठाकर मीडिया पर सकारात्मक अंकुश लगाया था। लेकिन आज की सरकार तो विदेशी पूंजी के दबाव में है। मीडिया में विदेशी पूंजी का हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है। पहली प्रेस कमीशन की रिपोर्ट में यह कहा गया था कि दूसरे देशों की तरह भारत में भी प्रिंट मीडिया में विदेशी पूंजी का निवेश करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। सिनेमा की एक मैगजीन और रीडर्स डाइजेस्ट को अपवाद स्वरूप विदेशी पूंजी से दूर नहीं रखा गया। इसके बाद जो भी सरकार बनी वह मीडिया में विदेशी पूंजी के प्रवेश पर लगी रोक को हटाने से हिचकती रही। 1987 में भी यह मामला प्रधानमंत्री राजीव गांधी के सामने आया। वे इसके पक्ष में थे। वे चाहते थे कि विदेशी पूंजी को हरी झण्डी दी जावे। अमेरिका का दबाव उन पर था। लेकिन उनकी भी हिम्मत नहीं पड़ी। यह मामला टलता रहा। 1999-2000 में इस मसले ने एक बार फिर जोर पकड़ा और इस मसले पर जमकर वाद-विवाद हुआ। मीडिया समूह दो फाड़ में बंट गए। पांच प्रमुख मीडिया घराना टाइम्स ऑफ इण्डिया ग्रुप, इण्डियन एक्सप्रेस, इण्डिया टुडे, आनन्द बाजार पत्रिका ग्रुप और जागरण जिनका अटल बिहारी वाजपेयी पर प्रभाव भी था, इसके पक्ष में थे। अन्ततः विदेशी पूंजी को हरी झण्डी मिल गयी। उस समय सूचना एवं प्रसारण मंत्री सुषमा स्वराज थीं।

– अगर मीडिया परिषद बना भी लिया जाये तो वह इस समस्या से निपटने के लिए पर्याप्त होगा?

इन गड़बड़ियों को दूर करने के लिए मुझे नहीं लगता कि अब मीडिया परिषद का कान्सेप्ट पर्याप्त है। मीडिया को उसकी मर्यादा में रखने के लिये संवैधानिक संस्था की जरूरत है। जिसके पास निगरानी रखने और दण्ड देने दोनों का अधिकार होना चाहिए। आज ऐसी मीडिया की जरूरत है जो सत्ता के बराबर खड़ी होकर जनता से अपनी बात कह सके। अगर मीडिया भ्रष्ट होता है तो लोकतंत्र कमजोर होगा। यहां पर मीडिया को बचाने का मतलब लोकतंत्र को बचाने से है। लेकिन लोकपाल जैसी कोई संस्था बनाने में फिलहाल तो सरकार की कोई रूचि नजर नहीं आ रही। इस बीच यह एक अच्छी बात हुई है कि राजनीतिक दल भी यह मानने लगे है कि मीडिया पर निगरानी रखने के लिये इस तरह की एक शक्तिशाली नियामक की जरूरत है।

– पेड न्यूज को लेकर आपका कहना है कि भारत में 1995 के पहले इस तरह के मामले नहीं देखने को मिले हैं, लेकिन एक सेमिनार में राजकिशोर कह रहे थे कि इसे आजादी के बाद से ही देखा जा सकता है। उनका तर्क था कि उस समय के अखबारों को कांग्रेस के खिलाफ कोई समाचार छापने की हिम्मत नहीं थी?

अगर पेड न्यूज को फैलाया जायेगा और इसको बहुत पीछे ले जायेंगे तो इससे उनका मकसद पूरा होगा जिनका इसमें स्वार्थ छुपा हुआ है। 1995 के पहले की जानकारी मुझे नहीं है। इस तरह की किसी भी प्रवृति को गलत तो तब ही कहेंगे जब हमारे पास उसका कोई सबूत हो। 2009 के पहले से सबूत हमारे पास नहीं है। परांजॉय गुहा ठाकुरता की रिपोर्ट में सबूत हैं। उस समय के अखबार कांग्रेस से पैसा तो नहीं लेते थे। वे नेहरू के व्यक्तित्व से प्रभावित थे। इनको लगता था कि नेहरू जो कर रहे हैं वह देशहित में है। इसीलिये नेहरू की बातें प्रमुखता से छापी जाती थीं। 1989 में नवभारत टाइम्स, पटना के सम्पादक आलोक मेहता थे। उनका रूझान कांग्रेस की ओर था। उन्होंने मर्यादा तोड़ते हुए एक फर्जी सर्वे करवाया। वह सर्वे पटना में छपा भी। यहां पर वह छप भी नहीं सकता था क्योंकि यहां पर सुरेन्द्र प्रताप सिंह और माथुर साहब थे। उस सर्वे के सम्बन्ध में बातचीत के लिए माथुर साहब ने मुझे बुलाया था। उस सर्वे में 54 में से 54 सीटों पर कांग्रेस को जीतते हुए बताया गया था। लेकिन जहां तक मुझे याद है कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली थी। आलोक मेहता ने कांग्रेस की तरफदारी की लेकिन कोई यह तो नहीं कह सकता कि नवभारत टाइम्स ने पैसा लिया होगा। जहां तक 60 के दशक में कांग्रेस का विरोध नहीं करने का सवाल है तो यह सही है कि 55 से 62 तक हिन्दुस्तान का कोई भी अखबार जवाहर लाल नेहरू के विरोध में जाने की हिम्मत नहीं जुटा सकता था। सभी अखबार यह समझ रहे थे कि जवाहरलाल नेहरू देश को जिस दिशा में लेकर जा रहे हैं वह सही रास्ता है। लेकिन 1962 में लोगों का और खुद नेहरू का भी खुद से मोहभंग हो गया। अखबार सोच-समझकर उनका समर्थन कर रहे थे। लोहिया ने जब कांग्रेस की आलोचना करनी शुरू कर दी तब अखबारों ने उनकी आवाज को भी उठाना शुरू कर दिया। क्योंकि उनको लगा कि लोहिया ठीक कह रहे हैं।

भुगतानशुदा खबर का सीधा सम्बन्ध विदेशी पूंजी से जुड़ा है। आज 16-18 संस्करण निकालने वाले अखबार भी विदेश निवेश पर खड़े हैं। उनको यह पैसा काले धन के रूप में लौटाना है। पिछले लोकसभा चुनाव में दैनिक जागरण नामक अखबार ने 400 करोड़ रूपया कमाया था। आजकल नये पत्रकारों का पत्रकारिता से इतर मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव के रूप में काम करने का ट्रेंड बढ़ता जा रहा है। पेड न्यूज को लाने का दबाव भी उन पर होता है। इसका सम्बन्ध संस्थान की आंतरिक व्यवस्था से है। सम्पादकीय टीम को मार्केटिंग के प्रपंच से दूर रहना चाहिये। अगर रिपोर्टर विज्ञापन लाने का काम करेगा तो वह उद्देश्यपरक पत्रकारिता नहीं कर पायेगा। संवाददाता को हमेशा सत्ता के खिलाफ आवाज उठाते रहना चाहिए। दबाव में झुकना नहीं चाहिए। सत्ता का मतलब केवल सरकार से नहीं है। अब तो पार्टियों में भी सत्ता का केन्द्र है। अच्छा पत्रकार वही हो सकता है जो अगर कांग्रेस कवर कर रहा हो और अगर सोनिया गांधी के खिलाफ कोई बात सामने आती है तो उसको भी रिपोर्ट करे। केवल मनमोहन सिंह के खिलाफ लिखने से काम नहीं चलेगा। बीजेपी के सत्ता के केन्द्र में तीन लोग नितिन गड़करी, सुषमा स्वराज और अरूण जेटली है, बीजेपी कवर करने वाले रिपोर्टर को इन लोगों के खिलाफ कोई खबर मिलती है और वह उसको रिपोर्ट करता है तो वह एक अच्छा रिपोर्टर माना जाएगा।

– बिहार में नीतीश कुमार पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि वे पेड न्यूज को बढ़ावा दे रहे हैं, क्या कहेंगे?

नीतीश कुमार पेड न्यूज के सबसे बड़े उदाहरण हैं, उनकी विकास यात्रा के दौरान बिहार के चार चैनलों (महुआ न्यूज, सहारा, ईटीवी और साधना) को एक पत्र भेजकर यह कहा गया कि वे इस यात्रा को लाइव दिखाएं, जिसके बदले में उन्हें निर्धारित पेमेन्ट किया जाएगा। यही हाल वहां के अखबारों के साथ भी हुआ। नीतीश कुमार सरकार ने अच्छा काम किया है। बिहार को राह दिखाई है, बिहार को बदलकर दिखलाया है। लेकिन नीतीश कुमार मीडिया को पालतू बनाकर अपनी साख कमजोर कर रहे हैं। इसका एविडेन्स भी है। कोई संज्ञान तो ले।

– नए पत्रकारों को क्या कहेंगे जिनके सामने रास्ता तय करने की चुनौती है?

नए लोगों के लिए बेहतर संस्था मिलना चुनौती बनता जा रहा है। क्योंकि बेहतर संस्थानों का अभाव होता जा रहा है। लीडरशिप खत्म हो गई है। पहले लोग सम्पादकों को पहचानते थे। अब स्क्रीन पर दिखने वाले रोल मॉडल बन गए हैं। वे पत्रकारिता के रावण हैं। अगर रावण को लोग रोल मॉडल माने तो गड़बड़ी तो होगी ही। आज समानान्तर पत्रकारिता की एक जबरदस्त धारा बह रही है। यूरोप में शुरू भी हो गया है। मेरा मतलब वेब दुनिया से है, जहां पर कोई व्यक्ति विशेष रोल मॉडल नहीं है बल्कि उसकी न्यूज वैल्यू पर बात की जा रही है। नए लोग इस मीडिया में तेजी से आगे आ रहे हैं। हम समानान्तर मीडिया के साथ चल रहे हैं। विकीलिक्स समानान्तर मीडिया ही है जिसने अमेरिका को नाको चने चबवा दिये और अमेरिका में त्राहि-त्राहि मच गई। पत्रकारिता को सुधारना है तो सभी अखबारों और चैनालों में सूचना के अधिकार पर एक अलग बीट होनी चाहिए। इस विषय पर जल्द ही हम एक सम्मेलन करने जा रहे हैं।

सहयोग : राजेंद्र हाड़ा

Comments on “मीडिया की मर्यादा के लिए संवैधानिक संस्था जरूरी

  • santosh jain.raipur says:

    patrakarita ka nanga chehra dekhna hai to emargency ke akhbaro ko dekho,jinhe ghootne ke bal baithne kaha gaya wey pat let gaye,AAJ akhbar Khabro se nahi vajan (weight) se chalta hain,screen ka jalwa to hamesha barkrar rahega,Log khajuraho ki murtiyo ko pahchante hai unhe banane wale hatho ko nahi,web news sabka jawab dega-ummid hai

    Reply
  • Bade dino baad India ke kisi naamcheen patrakaar ka interview publish karne ke liye Bhada4Media ko dhanyawaad ! Aaj [b]Ram Bahadur Rai jee[/b] ka naam media jagat mein [b]behad [/b][b]samman[/b] ke saath liya jaata hai , shaayad isliye ki wo is samman ke wakayee haqdaar hain .
    Par [b]Barkha[/b] aur [b]Vir[/b] jaise [b]kalankit[/b] aur [b]Badnaam[/b] logon ka kya kiya jaana chaaiye , jinhone is peshe ko badnaam karne ka beeda utha rakha hai, wo bhi be-khaufh andaaz mein, bina sharmsaar hue !

    Reply
  • rajkumar sahu, janjgir chhattisgarh says:

    rai sir ka interview se kai gabhir baaton ka pata chala. pade news, media jagat ka ek gambhir bimari hai, iske liye vacsin khojne ki jarurat hai.

    Reply
  • bansi lal ambala haryana says:

    hi sir m bansilal hu aur m kurukshetra university me journallism m m.phil kr rha hu m aapko bdhai dena chahta hu k aapne media ki itni bdi hasti ka interview leke hm sb pr bhut bda ehsan kiya h. agar aaj sare reporter Sri Ram Bhadur rai jaise ho jaye to des ke vikas ko ek nyi disa milegi.

    Reply
  • Ramvilas Saxena says:

    Thanks bhadas4media. Aapne media ki itni bdi hasti ka interview leke hm sb pr bhut bda ehsan kiya h. agar aaj sare reporter Sri Ram Bhadur rai jaise ho jaye to des ke vikas ko ek nyi disa milegi.Is se hm naujavan patrkaro ki dasa aur disa dono ka sudhar hoga.

    Reply
  • Mahesh deshkar says:

    patrakarita bik chuki hai. newspaper ke malik ki hi dukan chal rahi hai. employee ka khun chusa ja raha hai. koibhi parti ya sarkar ka dabav newspepar par nahi hai. empoyee ke bhavisha ki chinta kisi ko nahi hai. ess vishaypar koi aavaj nahi utha raha hai. Uniyan kamjar ho gai hai. Nagpur ke patrakar gairptrakar sanghatna chup Q hai. Nagpur ke sabhi newspepar me contect ke nampar emplyee ka khun malik chus rahe hai. sarkar ke officer kival vasuli kar malik se khus rahate hai. Newspepar Office me chapa Q nahi marte. employee mastar Q cheq nahi karte. ess parbhi avaj ubhana jaruri hai.

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *