यशवंत की मां नहीं, मेरी-तेरी-सबकी मां

नूतन ठाकुर: हम सबकी मां-बेटियों की लड़ाई है यह : साधन संपन्न घरों की महिलाओं को नहीं पकड़ती पुलिस : औरत होना और आर्थिक रूप से कमजोर होना अपराध तो नहीं : संविधान, कोर्ट, कानून सबमें है महिलाओं के सम्मान की रक्षा की व्यवस्था लेकिन पुलिस नहीं मानती और परिजन रह जाते हैं चुप : यशवंत जी ने एक लड़ाई शुरू की है, अपनी माँ को गाजीपुर जिले के नंदगंज थाने में बंधक बनाए जाने, घर से अवैध तरीके से थाने लाए जाने के खिलाफ. यशवंत जी ने घटना के बारे में लगभग सारी बातें बता दी हैं, इसीलिए उस पर कोई टिप्पणी नहीं करुँगी लेकिन जैसा कि मैंने कल भी उनसे कहा था, मैं यह चाहूंगी और मैं यह मानूंगी कि यह लड़ाई अपने अंजाम तक पहुंचे. इसीलिए ही नहीं कि ये हम लोगों के अज़ीज़ यशवंत जी की लड़ाई है बल्कि इसीलिए भी क्योंकि वे एक ऐसे मामले को लेकर आगे बढे हैं जो हमारे पुलिसिया व्यवस्था की एक बहुत बड़ी समस्या है. और इस रूप में यह यशवंत जी की समस्या से आगे बढ़ कर मेरी, आपकी सबकी समस्या बन गयी है. समस्या के मूल में हमारी कानूनी व्यवस्था और उसका व्यवहारिक जीवन में अनुपालन है. नियम कहता है महिला को बिना गिरफ्तार किये थाने नहीं ले जा सकते, महिला से पूछताछ के लिए उसके घर पर ही जाना पड़ेगा, महिला को थाने में भी अलग रखा जाए, सभी अभियुक्तों और गिरफ्तारशुदा लोगों के मानवाधिकारों की पूरी रक्षा हो.

इसके विपरीत हो क्या रहा है? जैसा आपने और मैंने देखा, यशवंत जी की माँ और उनकी भाभी पकड़ कर थाने ले जाई गयीं. दिन भर थाने में रखी जाती हैं. और बाद में छोड़ दी जाती हैं. अगर आप पुलिस वाले से कारण पूछते हैं तो जवाब मिलेगा कि इस महिला या इन महिलाओं के पति या पिता या भाई मुलजिम हैं. वे नहीं मिल रहे हैं इसीलिए हम इनको थाने ले आये हैं. और ऐसा ज्यादातर उन मामलों में होगा जिसमे या तो कोई ज्यादा हल्ला-गुल्ला मच रहा हो या फिर कोई पोलिटिकल प्रेशर होगा. थाने पर पूछने पर यही बताएंगे और अपनी बात को साबित करने की कोशिश करेंगे, किसी अधिकारी से पूछिए तो वह भी यही कहेंगे- “दरअसल इस महिला के फलां रिश्तेदार ने फलां अपराध किया है.” फिर ज्यादा पूछिए तो जोड़ देंगे- “क्या करें बड़ा प्रेशर है”. या फिर ये – “दबाव बनाने के लिए कुछ तो करना पड़ता है”. नजदीकी होगी तो यह भी राज बता देंगे- “पब्लिक में बड़ी नाराजगी है” या “एक पक्ष बहुत अधिक भाग-दौड़ कर रहा है.”

justice for मांऔर इस पूरी समस्या की जड़ यही है. कहीं का भी प्रेशर हुआ, कोई भी हल्ला-गुल्ला मचा, कहीं का दबाव बना और यदि पुरुष मुलजिम पकड़ में नहीं आ रहे हैं तो उसके घर की औरतें और बच्चे तक पर पुलिसिया कहर टूट जाया करता है. भूखे, प्यासे, अपनी प्रतिष्ठा और अपनी मर्यादा संभाले, हांफते-कांपते ये लोग अक्सर थानों के किसी कोने में बैठे अपनी रिहाई की राह देखते बैठी नज़र आ जाती हैं. यदि आप पूछेंगे तो पता लगेगा कि ये नहीं इनके घर के कुछ पुरुष मुलजिम हैं और इनको उनकी जगह थाने पर बैठा कर रखा गया है. तो क्या ये महिलायें यहां जमानत का काम कर रही हैं? या फिर इन्हें उनकी जगह विकल्प के रूप में रखा गया है?

एक और बात यहाँ सोचने और देखने लायक है. ऐसी जो भी महिला थाने पर लायी गयी होगी वो पुलिस वालों की निगाह में कमजोर, गरीब या साधारण होंगी. मैंने कभी भी किसी साधन-संपन्न महिला को इन हालातों में पुलिस द्वारा उठा कर थाने में लाये जाते नहीं देखा है. और यदि किसी को पुलिस ले भी आएगी तो जैसे ही पता चलेगा कि इस औरत का भी कोई नामलेवा है या ये किसी प्रकार से रसूखदार है तो पुलिस तुरंत ही उसे थाने से छोड़ दिया करती है. यानि कि यह पूरा मामला पुलिस और हमारे तंत्र की दो प्रकार से कमाजोरियों के प्रति नजरिये को दिखाता है- एक औरत होने की सामान्य कमजोरी और दूसरे आर्थिक और सामाजिक कमजोरी.

इसके अलावा ये मामला सीधे-सीधे मानवाधिकारों से भी जुड़ा हुआ है. और ऐसे हर मामले में जो भी व्यक्ति पीड़ित हो रहा है उसे जमकर इसके विरुद्ध आवाज उठानी ही चाहिए. यहां कम से कम एक ऐसी जगह है जहां क़ानून की कोई गलती नहीं है- संविधान से क्रिमिनल प्रोसीजर कोड तक और तमाम सुप्रीम कोर्ट निर्णयों तक यह बात अच्छी तरह बता दिया गया है कि पुलिस थानों को लेकर महिलाओं के अधिकार क्या है पर यदि भुक्तभोगी महिलायें इसके बाद भी चुप रह जाती हैं- पुलिस के भय से, शासन-प्रशासन के भय से या कुछ और हानि होने के भय से तो इसमें मेरी निगाह में वे औरतें और उनके घर वाले ही सीधे-सीधे जिम्मेदार हैं, क़ानून नहीं.

मैंने कल इसीलिए यशवंत जी से कहा था कि उन्हें यह लड़ाई लड़नी चाहिए, अपनी मां के लिए ही नहीं, औरों के लिए भी एक नजीर बन कर मार्ग प्रशस्त करने के लिए. और मैं आज भी अपनी बात दुहरा रही हूँ. अंत में एक बात देश-समाज के सम्बन्ध में भी कहूंगी. इन सारे मामलों में हम भी कहीं ना कहीं जिम्मेदार हैं. यदि हमारे साथ कोई अपराध हुआ तो हम विरोधी दल के सारे लोगों को ही अंधाधुंध फंसाने और उनके घर-परिवार के सब लोगों और महिलाओं तक को थानों के ठूंस देने को उद्धत हो जाते हैं. लेकिन यदि हम एक बार अपने विषय में भी सोचेंगे तो शायद इस विषय में हमारी दृष्टि में कुछ फर्क जरूर आएगा और इस तरह के जो गुनाह जनता के प्रेशर में हो रहे हैं, उनमे कमी तो आएगी ही.

डॉ नूतन ठाकुर

सम्पादक

पीपल’स फोरम

लखनऊ

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Comments on “यशवंत की मां नहीं, मेरी-तेरी-सबकी मां

  • Arvind Chauhan says:

    यशवंत जी हम सब आपकी इस लड़ाई में आपके साथ है , जब तक उत्तरप्रदेश का मायावती का तख्ता पलट नहीं होगा, आम आदमी को न्याय मिलना मुश्किल है , मायावती दलितों की मसीहा बनती तो है परन्तु है नहीं है ! उनकी सरकार के कामो में कथनी और करनी में काफी फर्क है ! हमारी सभी उत्तरप्रदेश के लोगो से गुजारिश है कि आने वाले समय में उत्तरप्रदेश के चुनाव में ये मुहीम और जोर शोर जारी राखी जाएगी !

    अरविन्द चौहान
    संपादक
    दैनिक अदित्याज़

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  • shailendra parashar says:

    My self shailu from makhanlal chaturvedi univercity bhopal This artical is vry nic. i hope to be continew ur jung,

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  • sanjay bhati editor Danik Supreme news says:

    hum Gotam Budh Nagar ki janta se pale he agrha kar chuke hai ki ” DM or SSP nahi CM badalne ki jarurat hai” .hamari tem is par jor sor se kam kar rahi hai .Arvind Chohan ji or Dr.Nutan Thakur Ji se hum shamat hai. ye puri UP ka hal hai isliye ye sab ki samasaya hai.

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  • utkarsh sinha says:

    ये पूरी घटना त्रासद है और उसपर से बड़ी तसदी ये की कुछ भाई लोग इसी में मस्त हैं की यशवंत परेशां तो हुआ …पर उनको नाजियों के दौर की कविता फिर पढ़ लेनी चाहिए …. एक दिन वे आये मेरे लिए…..”

    सभी पत्रकार संघ चुप हैं और सभी बड़े पत्रकार नेता ख़ामोशी ओढ़े है .. मगर यशवंत के साथ जो है उनकी ताकत भी कम नहीं … हम लड़ेंगे साथी …… पूरी ताकत के साथ …

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  • aapkiawaz.com says:

    यशवंत जी, आपकी मायूसी से दोषियों को बल मिलेगा। आगे की सोचियें, पीछे हटना वीर का काम नहीं है। ये कायरता है। मेरी राय है किसी दिन केन्द्रीय महिला आयोग, व अन्य संबंधित विभागों के मंत्रियों व राजपाल आदि से मिलकर ज्ञापन आदि देते है। सभी विभागों का अनुभव है कि कुछ भी कर लो, कुछ दिन लोग कोशिश करके चुप बैठ जाते है, जिसका उनको फायदा उन्हे मिलता है। मां ने आपके लिए कितनी राते-वर्ष आपको पालने में बिताये है और आप उनके लिए थोड़ी सी कोशिश करके ही थक गये, अपने लिए न सही देशहित में इस जंग को जारी रखियें। हम लोग आपके साथ है। संपादक- आपकी आवाज़.कांम।

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