यूं ही खिलाएं हैं हमने आग में फूल

शेष नारायण सिंह : न उनकी हार नई है, न अपनी जीत नई : भड़ास के संकट के बारे में जानकारी मिलने के बाद थोड़ा दुखी था. भड़ास और उसके जैसे कई अन्य पोर्टल मीडिया के जनवादीकरण के नायक हैं. इनमें कई नौजवानों को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ. इनके पास अपने कंधे पर लटके हुए झोले में रखे कम्प्यूटर के अलावा कुछ नहीं है. ज़्यादातर अपने उसी कमरे से काम चला रहे हैं जिसमें वे रहते हैं. ऐसे ही एक नायक ने पिछले दिनों  अपना ज़्यादातर वक़्त दोस्तों के घर में या सड़कों पर बिताया. दिल्ली की मई-जून की गर्मी उन्होंने अपने स्कूटर पर सवार होकर बिताई.

ज़िंदगी की चुनौती को झेल रहे इस पत्रकार ने लगभग रोज़ ही कुछ न कुछ ऐसा पोस्ट किया जो पत्राकारिता की दिशा तय करने में कामयाब होने की क्षमता  रखता था. बहुत बाद में मुझे पता चला कि वे दर-ब-दर हो गए हैं लेकिन काम चलता रहा. भड़ास का संकट जब पब्लिक डोमेन में आया तो मैं सन्न रह गया. मुझे लगा कि अब मदर इण्डिया वाले साहूकार की तरह कोई सेठ आयेगा और भड़ास के संचालक से उस पोर्टल को खरीद लेगा. मैं जानता हूँ कि पूंजी इसी तरह से आम आदमी के आन्दोलनों को को-आप्ट करती है. इसलिए भड़ास के किसी भी पैसे वाले नेता, सेठ या कंपनी के भोंपू बनने के खतरे साफ़ नज़र आने लगे लेकिन अब खबर आई है कि संकट ख़त्म हो गया.

राहत की सांस आ रही है लेकिन कितने दिन? बकरे की माँ को खैर मनाने का विकल्प बहुत कम वक़्त के लिए मिलता है. आज नहीं तो कल यह संकट फिर आयेगा और कहीं ऐसा न हो कि भड़ास का संचालक हिम्मत हार जाए. वह मीडिया के जनवादीकरण का बहुत बुरा दिन होगा. भड़ास जैसे और भी कुछ पोर्टल हैं .. विस्फोट है, जो किसी भी फीचर सम्पादक के लिए संकट मोचक है और किसी भी  राजनीतिक पार्टी की एकाधिकारवादी सोच पर अक्सर लगाम लगाता रहता है. उसका सचालक भी आर्थिक संकट में रहता है.

जनतंत्र और मोहल्ला वाले भी अपना सब कुछ दांव पर लगाकर मीडिया के जनवादीकरण के यज्ञ में अपनी आहुति दे रहे हैं. अभी हस्तक्षेप और नेटवर्क ६ भी आ गए हैं. यह सारे प्रयास अपने संचालकों की प्रतिबद्धता की वजह से चल रहे हैं और पूंजीवादी मीडिया की मनमानी को चुनौती दे रहे हैं. दकियानूसी विचारों को बहस की सरज़मीन पर बार-बार लथेर रहे हैं. सबको बहस में शामिल होने का मौक़ा दे रहे हैं.

सवाल यह उठता है कि क्या इस वैकल्पिक और ताक़तवर मीडिया को मर जाने देना जनहित में है. मुझे लगता है कि सूचना के इस माध्यम को जिंदा रखना जनहित में है. यह माध्यम हुक्मरान और पूंजी के सेठों पर लगाम  लगाता है. लेकिन बिना पैसे के कैसे चलेगा यह और कब तक चलेगा. जो लोग इसे चला रहे हैं, उनमें से सब की योग्यता इतनी है कि आज चाहें तो एकाध लाख रूपये महीने की नौकरी पकड़ लें लेकिन सूचनाक्रान्ति के उस रथ का क्या होगा, जिसके सारथी बनकर यह लोग भावी मीडिया की कुण्डली बना रहे हैं.

ऐसा ही संकट एक बार तहलका पर आया था. उस वक़्त की सरकार ने लाठी भांजना शुरू कर दिया था. उन लोगों को भी जेल की हवा खिला दी थी जो तहलका के संस्थापक, तरुण तेजपाल के मित्र थे. तरुण के पास हार मानने का विकल्प मौजूद था लेकिन उन्होंने जीतने का फैसला किया. लेकिन यह भी तय किया कि बड़ी पूंजी को अपने आन्दोलन का कंट्रोल कभी नहीं देगें. तरुण तेजपाल ने अपने चाहने वालों से कहा अगर वे एक लाख रूपया जमा कर के तहलका के आजीवन सदस्य बनना चाहें तो तहलका फिर से शुरू हो सकता है.

याद रखें, तहलका ने उस वक़्त की सरकार से पंगा लिया था और सरकार ने ही तरुण तेजपाल और उनके दोस्तों पर अजीबोगरीब आरोप लगाए थे. हज़ारों की संख्या में लोगों ने एक-एक लाख रूपये जमा कर के तहलका को चला  दिया. तरुण तेजपाल के सामने एक और विकल्प था कि वे चाहते तो किसी भी पूंजीपति को कह सकते थे और कोई भी उनके उद्यम में पैसा लगाकर धन्य हो जाता लेकिन तब ब्रांड मेनेजर आ जाता, मार्केटिंग वाला ज्ञान देने लगता और फिर वह नहीं हो पाता जिसके लिए तहलका जाना जाता है.

मेरे मन में बार-बार सवाल आता है कि नवजागरण के इन नायकों और उनके पोर्टलों को संभालने के लिए क्या समाज आगे नहीं आ सकता. वैकल्पिक मीडिया के यह स्तम्भ अगर गिर गए तो शायद आवाज़ तो न हो लेकिन राजनीतिक दलों और पूंजी नियंत्रित मीडिया के अन्य माध्यमों  की चांदी हो जायगी और आम आदमी की पहुंच से सही खबर एक बार फिर बाहर हो जायेगी.  मीडिया के इन मंदिरों के पुजारियों को भी चाहिये की सही सूचना की जिस देवी की यह लोग आराधना कर रहे हैं उस देवी के चरणों में आम आदमी के पत्र-पुष्प का भी स्वागत करें, जिससे मीडिया के जनवादीकरण की यह चिंगारी एक ऐसा शोला बन जाए कि आम आदमी की पक्षधरता के सिवा पूंजीवादी मीडिया के सामने कोई रास्ता ही न बचे.

ऐसा नहीं है कि यह प्रयोग पहली बार हो रहा है. बार-बार हुआ है और स्थापित मान्यताओं को मुंह की कहानी पड़ी है. आर्थिक सहयोग करना सबको अच्छा लगता है. हमारे मित्र और 1977 के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के यूनियन के चुनावों के एक महत्वपूर्ण नेता, राजेन्द्र शर्मा की एक सूक्ति मुझे याद आती है. नए लोगों को बता देना ज़रूरी है कि 1977 का चुनाव इंदिरा-संजय की इमरजेंसी की तानाशाही की हार के बाद लड़ा  गया था.  राजेन्द्र शर्मा, सीताराम येचुरी और उनकी टीम के लिए वोट मांग रहे थे. वोट के साथ चुनाव के लिए वे एक रूपये की आर्थिक सहायता भी लेते थे. जब उनके इस काम पर चर्चा हुई तो आपने फरमाया कि जो भी एक रूपया दे देगा, वह इस चुनाव में जनवादी ताक़तों का पक्षधर हो जाएगा. राजेन्‍द्र की उस बात को मैंने बार-बार टेस्ट किया है और आज लगता है कि पूंजीवादी मीडिया की मनमानी रोकने के लिए आम आदमी को अपनी पक्षधरता का ऐलान करना चाहिए .

लेखक शेष नारायण सिंह वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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Comments on “यूं ही खिलाएं हैं हमने आग में फूल

  • एस.पी.भाटिया says:

    [b]बहुत खूब लिखा है और शिक्षा प्रद भी है , जमीन से जुड़े हुए पत्रकारों की बानगी ही पेश की है आपने [/b]

    Reply
  • शेष नारायण जी, इस लेख से पुनर्जारण-प्रबोधन की जो समझदारी झलकती है उस पर हमें एतराज है। पर पहले सहमति के बिंदुओं को रेखांकित कर लें। धनिकों का यह जनतंत्र कम से कम घोषित तौर पर समाज के सभी लोगों को जो भी नागरिक अधिकार देता है, उनकी हिफाजत के लिए आवाज उठाने का स्पेोस बना रहना चाहिए और इस तरह की पहलकदमी करने वाले और पूंजी की सर्वग्रासी सत्ता से इस पहलकदमी को बचाये-बनाये रखने हेतु संघर्षरत युवाओं को सलाम।
    लेकिन, इसके आगे का काम व्ययक्तिगत उद्यमों के जरिये संपन्न नहीं किया जा सकता, उसके लिए सामूहिक विवेक की समझदारी की दरकार है। पढ़-लिखे मध्यिवर्ग को चूं-चूं करने के लिए स्पे‍स मिल जाये तो वह संतुष्टम हो जाता है पर नागरिक मांगों-अधिकारों के मसले पर वह कोई निर्णायक एवं कारगर कदम नहीं उठा सकता है। यह काम आम जनता खासकर मजदूरों के अगुआ तत्वध ही करेंगे। इसीलिए जरूरत नये मजदूर-पुनर्जागरण की है जो अब तक के समाज-परिवर्तन की समस्तइ आत्मिक-सांस्कृजतिक संपदा से लैस हो।
    बाकी का तो मुझे पता नहीं लेकिन भड़ास के संचालक को अपनी सीमित भूमिका को लेकर कोई भ्रम नहीं है। आदमी अपना है और इस तरह के सामूहिक उद्यम की महत्तास और अनिवार्यता को बखूबी समझता है इसीलिए हम सभी उसके साथ खड़े हो जाते हैं।

    Reply
  • शेष नारायण जी, इस लेख से पुनर्जारण-प्रबोधन की जो समझदारी झलकती है उस पर हमें एतराज है। पर पहले सहमति के बिंदुओं को रेखांकित कर लें। धनिकों का यह जनतंत्र कम से कम घोषित तौर पर समाज के सभी लोगों को जो भी नागरिक अधिकार देता है, उनकी हिफाजत के लिए आवाज उठाने का स्पेोस बना रहना चाहिए और इस तरह की पहलकदमी करने वाले और पूंजी की सर्वग्रासी सत्ता से इस पहलकदमी को बचाये-बनाये रखने हेतु संघर्षरत युवाओं को सलाम।
    लेकिन, इसके आगे का काम व्ययक्तिगत उद्यमों के जरिये संपन्न नहीं किया जा सकता, उसके लिए सामूहिक विवेक की समझदारी की दरकार है। पढ़-लिखे मध्यिवर्ग को चूं-चूं करने के लिए स्पेसस मिल जाये तो वह संतुष्टम हो जाता है पर नागरिक मांगों-अधिकारों के मसले पर वह कोई निर्णायक एवं कारगर कदम नहीं उठा सकता है। यह काम आम जनता खासकर मजदूरों के अगुआ तत्वध ही करेंगे। इसीलिए जरूरत नये मजदूर-पुनर्जागरण की है जो अब तक के समाज-परिवर्तन की समस्तइ आत्मिक-सांस्कृजतिक संपदा से लैस हो।
    बाकी का तो मुझे पता नहीं लेकिन भड़ास के संचालक को अपनी सीमित भूमिका को लेकर कोई भ्रम नहीं है। आदमी अपना है और इस तरह के सामूहिक उद्यम की महत्तास और अनिवार्यता को बखूबी समझता है इसीलिए हम सभी उसके साथ खड़े हो जाते हैं।

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  • shesh narayan ji aapne boht accha likha ummid krta hun ki age bhi media portal se judi samasyao par aap likhte rahenge
    NASIR RANA
    BUREAU CHIEF
    DELHI SHAH TIMES
    9210707194

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  • vedna ko behtarene ke sath disha me parivartit karne ke kala koie sesh sir se sikhe delhi me aise yuvko ke snkhya me kami nahi jo patrkarita ko disha dene ka mada rakhte hai par bade bade pradhan sampadako ko nikat aur door dristi dosh ho gaya hai sampadak ji log kehte hai hindi patrkarita me tailented loge hi nahi arahe hai wahiyat hai bhadas ke yashwnt hi nahi tamam portals chala rahe yuvko me dum hai ki patrkarita ko disha aur dasha badal sakte hai par kuda khair kare unka jo door aur nikat dristi dosh ke mar se do char hai.

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