रतन टाटा और नीरा राडिया के बीच का घनचक्कर

: अंतरंग बातचीत के अन्य टेप सार्वजनिक न हो जाएं, इससे घबराए हुए हैं टाटा : प्रशांत भूषण का कहना है कि कोई निजी बातचीत नहीं है, सब धंधेपानी का मामला है : रतन टाटा 74 साल के हैं। रिश्ते में टाटा उद्योग समूह के संस्थापक जमशेद जी टाटा के पोते लगते हैं। इनकी कभी शादी नहीं हुई। नीरा राडिया के साथ फोन पर सात समुंदर पार से भी हुई उनकी फोन बातचीत के जो अंश सामने आए हैं उनमें ब्लैक क्राउन, स्विमिंग पुल और चांदनी रात में डिनर आदि का काफी वर्णन है। इससे समझा जा सकता है कि रतन टाटा सर्वोच्च न्यायालय क्यों गए हैं और क्यों उन्हें डर लग रहा है कि उनकी निजी बातें सामने नहीं आ जाए?

आखिर नीरा राडिया रतन टाटा की जिंदगी में मामूली भूमिका में नहीं है। जिस महिला के लिए रतन अपने उद्योग साम्राज्य की 90 कंपनियों के जनसंपर्क और विज्ञापन विभाग भंग कर के यह सारा काम साठ करोड़ रुपए महीने में मुंबई के एक कमरे में चलने वाली वैष्णवी कम्युनिकेशन को दे सकते हैं, जिनके साथ डिनर करने के लिए अपना जहाज कोलकाता भेज कर उन्हें बुला सकते हैं, जिनके एक अपने से कम उम्र मुख्यमंत्री के साथ देर रात तक बैठने पर सार्वजनिक रूप से नाराज हो सकते हैं, तो समझा जा सकता है कि नीरा राडिया और रतन टाटा के बीच रहस्यों का एक पूरा साम्राज्य है जिसे रतन टाटा कानूनी रूप से खंडित होने से रोकना चाहते हैं।

वे किसी जिला या सत्र अदालत में नहीं गए। सीधे सर्वोच्च न्यायालय आए। इस पर उनके पैसे जो भी खर्च हुए हों, उसकी परवाह नहीं की क्योंकि आखिर वे टाटा हैं। उन्होने सर्वोच्च न्यायालय में वहीं तर्क दिया जो एक जमाने में अमर सिंह ने दिया था। रतन टाटा ने कहा कि उनका अगर कोई गुनाह है या उनके खिलाफ कोई कानूनी जांच होनी है तो उसमें इन टेप संदेशों का इस्तेमाल किया जा सकता है लेकिन इनकों सार्वजनिक और अनाधिकृत तौर पर प्रकाशित करने से उनकी निजी जिंदगी पर असर पड़ सकता है और दूसरे लोग भी प्रभावित हो सकते हैं। दूसरे लोगों से मतलब नीरा राडिया के अलावा और कौन हो सकता है?

रतन टाटा एक प्रायोजित इंटरव्यू में सवाल कर चुके हैं कि सरकार को भी राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून के नाम पर लोगों के निजी जीवन मे झांकने का क्या अधिकार है? यह एक बहुत बड़ी ताकत है जिसका इस्तेमाल जिम्मेदारी की भावना से किया जाना चाहिए। अगर मुकदमा चलाना है तो इनका इस्तेमाल किया जाए लेकिन अखबारों और पत्रिकाओं और वेबसाइटों पर छाप कर मेरी निजी जिंदगी तबाह करने की कोशिश क्यों की जा रही है?

इस तर्क का सीधा मतलब यह है कि रतन टाटा जानते है कि नीरा राडिया के साथ जो बातचीत टेप की गई है उसमें कुल 1800 टेप में से सिर्फ 104 सामने आए हैं। उसमें भी प्रेम भाव का पता चल गया है। अगर सारे टेप सामने आ गए तो रतन टाटा और नीरा को ही पता होगा कि दोनों के बीच फोन पर कितनी विकट अंतरंग बाते हुई है। इसीलिए रतन टाटा घबराए हुए है।

सर्वोच्च न्यायालय के वकील प्रशांत भूषण का कहना यह है कि जो भी वार्तालाप सार्वजनिक हुआ है वह निजी नहीं है। सारी धंधे पानी की बातचीत है जिनमें सौदे करने, मंत्री को पटाने और सरकारी नीति बदलवाने आदि का हवाला दिया गया है। कोई भी नागरिक सूचना के अधिकार की धारा 81 जे का इस्तेमाल कर के इसे प्राप्त कर सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय के दूसरे बड़े वकील दुष्यंत दवे के अनुसार रतन टाटा की नजर में लोकहित क्या है यह आसानी से समझा जा सकता है। श्री टाटा ने शेखर गुप्ता को पकड़ कर एनडीटीवी पर जो अपना इंटरव्यू करवाया है उसमें मंजूर किया है कि नीरा राडिया और उनकी एजेंसी से उनके रिश्ते थे। अगर जेआरडी टाटा होते तो रतन और राडिया को साथ देख कर डूब मरते। टाटा इतना बड़ा समूह है और उसकी जो ईमानदार छवि है वह सब जानते हैं।

इसके मालिक जेआरडी ने इमरजेंसी के कारण इंदिरा गांधी से बोलना बंद कर दिया था और रतन टाटा सरकार के फैसले बदलवाने के लिए दलालों का सहारा लेते हैं। प्रशांत भूषण ने तो कहा है कि पहले तो सर्वोच्च न्यायालय को विचार कर लेने दिया जाए उसके बाद अगर जरूरी हुआ तो जैसा मैने अमर सिंह के मामले में किया था, मैं खुद सर्वोच्च न्यायालय में टेप रिकॉर्ड उसमें हुई बातचीत के अंश ले कर अदालत में जाऊंगा और याचिका दायर कर के सारे दो हजार टेपों को सार्वजनिक करने की मांग करूंगा। यह सरकारी आदेश पर की गई रिकॉर्डिंग है और इसमें कुछ भी निजी नहीं होना चाहिए। रतन टाटा अगर निजी संदर्भ लाए हैं तो इसके लिए वे खुद जिम्मेदार हैं।

लेखक आलोक तोमर जाने-माने पत्रकार हैं.

रतन टाटा और नीरा राडिया के बीच बातचीत के टेप सुनने के लिए क्लिक करें- टेप एक और टेप दो

Comments on “रतन टाटा और नीरा राडिया के बीच का घनचक्कर

  • बिल्‍लू says:

    टाटा समूह पर समूचे भारत को ही नहीं दुनिया को नाज है लेकिन टेपों में जिस तरह की बातें सामने आ रही है उससे टाटा पर किया गया गर्व खंडित हुआ है। अब लगता है सारे एक सरीखे ही हैं। जेआरडी की आत्‍मा को बेहद दुख हुआ होगा और यदि वे जिंदा होते तो संभवत: रतन टाटा को टाटा साम्राज्‍य से ही बाहर कर देते। यह काम टाटा संस कंपनी को करना चाहिए। राडिया के पिता हथियारों के सौदागर थे और राडिया खुद भारत 1996 या 1997 में आई और कैसे इसने उद्योगपतियों से लेकर दिल्‍ली में सत्ता के सौदागरों के बीच पैठ बना ली, इसकी जांच होनी चाहिए। कहीं राडिया ने अपने देश की अहम सूचनाएं हमारे दुशमन देशों या अमरीका जैसे कुटिल मित्रों को तो नहीं दी। दलाल हमेशा दलाल ही होता है और राडिया जैसे दलाल किसी देश के वफादार नहीं हो सकते। सारी जांचें होनी चाहिए हर कोण से।

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