राडिया से रार क्‍यों!

शिशु शर्मा पूरा पत्रकार जगत, कारपारेट जगत, पूरा राजनैतिक क्षितिज राडिया की दलाली में खुलासे से लाल-पीला हो रहा है। ऐसा लग रहा है, जैसे राडिया ने कोई नया कार्य किया हो। कभी भी राडिया के द्धारा किये कार्यों को जायज नहीं माना जा सकता, लेकिन इस इस प्रकार के दलाली के कार्य हमेशा किसी न किसी के द्धारा होते रहें हैं। स्‍वयं इस प्रकार के खुलासे इस समय हुये हैं कि प्रभु चावला ने मुकेश अंबानी के लिये दलाली की। यानी कि क्‍या ये दलाली या ‘लाबींग’ केवल पत्रकारों या नेताओं द्धारा की जाती तो क्‍या इन खुलासों पर इतना हंगामा होता। प्रभु चावला लम्‍बे समय से ऐसा करते रहे होंगें। कारपोरेट जगत को नाजायज फायदा पहुंचाने के लिये जो लाबीइंग की जाती है, आखिर उसकी फिलासफी क्‍या है।

हमारा पूरा सरकारी तंत्र वास्‍तव में एक क्‍लोज सिस्‍टम की तरह है, जहां सात तालों में रहकर डिसीजन लिये जाते हैं। गोपनीयता के नाम पर जी भरकर अपनों के हित साधे व संभाले जाते हैं। सिद्धांतगत डिसीजन मेकिंग निश्चित तथ्‍यों पर आधरित प्रक्रिया होती है। इसमें मॉरल वैल्‍यू का सम्मिश्रण इस लेविल पर किया जाता है कि डिसीजन अधिक से अधिक लोगों को लाभप्रद हो सके। इसमें अपनी मर्जी की गुजांइश नहीं होती है। यदि इस प्रकार डिसीजन लिये जाते-तो कभी भी गोपनीयता की इस हद तक जरूरत न पड़ती कि डिसीजन को प्रभावित करने के लिये ‘लाबीइंग’ जैसी दलाली प्रक्रिया की आवश्‍यकता पड़ती। अब जबकि निर्णय पूरी तरह मनमाने तरीके से लिये जायेंगे तो वे निश्चित रूप से किसी को बेजा फायदा पहुंचायेंगे ही।

हमारा तंत्र तथ्‍यों को छिपाने की वकालत करता है, और मॉरल वैल्‍यू पर बात करना हमने बहुत पीछे छोड़ दिया है। ऐसी दशा में सोच सकते हैं कि राडिया या बरखा दत्‍त की जरूरत तो पड़ेगी ही। तो राडिया से रार क्‍यों। राडिया तो बधाई की पात्र इसलिये हैं कि उन्‍होंने स्‍त्री-जात के दुर्गुणों का प्रयोग नहीं किया। अपनी तीन सौ करोड़ की धन-दौलत इकटठी करने के लिये शायद शरीर की नैतिकता तो बरकरार रखी होगी ही। हालांकि आजकल इसके कोई मायने नहीं है, लेकिन आगे बढ़ने के लिये शरीर का उपयोग तो खतरनाक है ही। दूसरी बात जो राडिया कारनामें के दर्शन में है वो अनसुनी नहीं है।

वामपंथी इसे अपना राग बताते हैं, जबकि वे इससे अपना सरोकार केवल सत्‍ता की भागीदारी के लिये ही करते हैं। पूंजी के उदारीकरण का प्रवाह केवल कुछ हाथों के कब्‍जे में ही क्‍यों रहे, पूंजी लैंगिक विभेद की सीमाओं के पार है। पूरा देश जब सर्विस सेक्‍टर की ग्रोथ पर फूला नहीं समा रहा हो तो दलाली से पर्दा कैसे कर सकते हैं। आखिर सर्विस सेक्‍टर को दलाली से ज्‍यादा क्‍या कहेंगे। किसी उद्योगपति का समय किसी मंत्रालय के वेटिंग रूम में बिताना ज्‍यादा शर्मनाक है, अपेक्षाकृत किसी दलाल को पैसे देकर फाइल पास करा ली जाय। और ये काम हमेशा से होता आया है। मंत्री जी का पीए या अधिकारी का स्‍टेनो इस काम को आसानी से कर सकते हैं, और हमेशा से करते रहे हैं। ये अलग बात है कि अब ये काम इंस्‍टीट्यूट के रूप में संचालित होने लगे हैं। इसे अब हम लाबीइंग के नाम से बुला रहें हैं।

इस प्रकार कभी पूंजी लाबीइंग के सहारे मंत्री पद का निर्धारण करेगी तो कभी कारपोरेट जगत को सब्‍सिडी दिलवायेगी। और इसकी एक हकीकत यह भी है कि उच्‍च शिखर पर ट्राजेक्‍शन किसी तथाकथित उंचे आदमी से ही सम्‍पन्‍न किये जायेंगे। कोई आम आदमी न तो ऐसे ट्राजेक्‍शन का माध्‍यम बनेगा और न ही उससे लाभान्वित होगा। हम और आप कभी इलाज नहीं ढूंढते, बल्कि बंदर की तरह उछलकूद मचाकर शांत हो जाते हैं, ताकि भविष्‍य के लिये हम अपनी पैरोकारी दिखा सकें। नहीं तो इतिहास हमें भी दोषी करार देगा। इसलिये हम शराफत का ढोंग करते हैं। संसद में सवाल पूछने के लिये रिश्‍वत का मामला हो या सांसदों की खरीद के लिये नोट उछालने का मामला, इस सबसे भी शर्मनाक कुछ और हो सकता है। सही बात यह है कि हमारी व्‍यवस्‍था में जो नासूर बन गया है, उससे समय-समय पर ये मवाद रूपी घोटाले रिस-रिस कर दिखाई देते हैं। हम इस नासूर की संडाध को अपनी नाक पर रूमाल रखकर साफ बने रहने की कोशिश करते हैं।

जिस देश का शासक शासितों से दूरी मेंटेन करना अपना बड़प्‍पन समझता हो, अपना धर्म समझता हो, वहां बहुत आसानी से समझा जा सकता है कि इस देश का लोकतंत्र सिर्फ ढोंग है। क्‍या कभी कोई आम आदमी आसानी से देश के मंत्री या शासन में बैठे अधिकारी से मिलकर अपना दुख-दर्द बता सकता है। शायद नहीं, इसके लिये उसे छुटभैया नेता या दलाल का सहयोग लेना ही पड़ेगा। इसके एवज में खर्चा-पानी रिश्‍वत नहीं है, यह आधुनिक शब्‍दों में सर्विस है। तो भैया मेरे राडिया बहना से रार क्‍यों ठान रखी है, क्‍यों हर एक उसके पीछे पड़ गया है। यहां राडिया नहीं तो कोई बरखा होगी या प्रभु चावला के रूप में देशी, लेकिन अंग्रेजियत धंधें को अपनाने वाला पत्रकार। जरूरत इस बात की है कि हम दिलो दिमाग से खुले होने की समतावादी सोच में जीने की आदत डालें, तभी हम सबके लिये अच्‍छा होगा।

शिशु शर्मा के ब्लाग से साभार

Comments on “राडिया से रार क्‍यों!

  • कुमार गौरव says:

    राडिया ने कोई गुनाह नहीं किया , उसने तो बस अपना धर्म निभाया .. उसने अपने क्लाईंट के फायदे के लिए जो बन पाया किया और करने की कोशिश की .
    गुनाह तो हमारे नेताओं ने किया , हमारे अफसरों ने किया जो राडिया के प्रलोभन में आकर अपना धर्म और कर्त्तव्य भूल गये , इन नेताओं , अफसरों एवं पत्रकारों ने समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभायी. राडिया का कोई दोष नहीं है , न ही रतन टाटा , और न ही उन जैसे उद्योगपतियों का है , उनका तो काम ही है फायदा कमाना जो उन्होंने कमाया .
    ये लोग राडिया के जाल में आये क्यों , क्यों इन नेताओं , अफसरों एवं पत्रकारों की तिकड़ी ने देश के साथ धोखा किया ?
    इसलिए भाई , गद्दार ये तिकड़ी है , न की राडिया .

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  • भारतीय़ नागरिक says:

    पहली बार बड़ी समझदारी की बात पढ़ रहा हूं. एक उद्योग को ईमानदारी से चलाया ही नहीं जा सकता, ये कहना खुद उद्योगपतियों का है. वे कहते हैं यदि हम ईमानदारी से करना भी चाहें तो ये करने नहीं देते. अगर टाटा जैसा उद्यमी राडिया का सहारा लेने को मजबूर हो जाता है तो धिक्कार है पूरे सिस्टम पर. जैसे टाटा को एअर लाइन नहीं शुरू करने दी वही हालत टेलीकाम में होती… नीरा ने क्या बुरा किया? कुछ नहीं. बुरे तो सिस्टम में बैठे तत्व हैं और उन्हें बढ़ावा देने वाले पालिटिशियन हैं…

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  • Ajit Kumar Pandey says:

    Neera Radia bilkul Nirdosh hai jo media karmi Neera par galat bayanbaji kar rahe hai wah bahut bade DALAL hai….. ya unhe Neera ne ghash nahi dala……….. yah kadava sach hai …………………………………………………..
    Ajit Kumar Pandey
    ajit.editor@gmail.com

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  • All are culprits,they should be punished.About scribe ..shame …such a shame..
    Rajdeep sardesai ,Barkha datta& singhavi..should be banned from media field & be punished.Awards should be taken from these scribe which is given by Govt.
    Thank you very much Bhadas4media Team because you took up this story in May 2010.
    Jai Hind

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