लाखों रुपये वाली एक राष्ट्रीय संगोष्ठी की कहानी

: मानवीय मूल्यों के अमानवीय कार्य पर मीडिया की मुहर : इस खबर को लिखने की कोई इच्छा नहीं थी. कारण भी साफ था. उदघाटन और समापन की औपचारिकताओं के अलावा इसमें कुछ दिखा नहीं. बफर का सुस्वादू भोजन करने के बाद संभागी और आयोजकों ने विश्राम किया. कुछ समूह चर्चा भी हुई जिसे समापन की जल्दबाजी में शीघ्रता से समाप्त कर दिया गया. दूसरे दिन के अखबारों में खबर भी छपी. लेकिन तीसरे दिन जब बाकायदा समापन का सचित्र समाचार पढा तो मन हुआ कि अब तो खबर लिखनी ही पडे़गी. दो दिन की ‘राष्ट्रीय गोष्ठी’ जो एक दिन में ही समाप्त हो गई को अखबारों ने दो दिन की बताकर मानवीय मूल्यों की चर्चा में मीडिया ने वास्तव में अमानवीय कार्य किया है, ऐसा मुझे तो लगता है.

ये एक राष्ट्रीय संगोष्ठी थी. सच में देखा जाये तो इसमें राष्ट्रीय तो दूर राज्य स्तरीय प्रतिभागी और वक्ता तक नहीं थे. राजस्थान के भरतपुर जिला मुख्यालय पर 29 सितंबर बुधवार को इसका आयोजन किया गया. निमंत्रण पत्र में कहीं इस बात का हवाला नहीं था कि गोष्ठी दो दिन की रहेगी. 29 के उदघाटन समारोह में शामिल होने जैसी सूचना थी. एक संभागी के रूप में जब समारोह स्थल के बैनर को देखा तो पता चला कि आयोजन दो दिन का है. विषय भी बड़ा व्यापक और जरूरी सा लगा. ‘शिक्षा में मानवीय मूल्यों के सुदृढ करने की योजना के अन्तर्गत आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी’. ‘‘शिक्षा में सांस्कृतिक संचेतना’’. विषय गंभीर हो सकता है मगर इस विषय पर गंभीरता पर कहीं चर्चा होती नजर नहीं आई. यह भी कहा जा सकता है कि विषय की गंभीरता के अनुरूप न तो वक्ता थे और न ही श्रोता.

भरतपुर जिला मुख्यालय पर एक स्वंयसेवी संगठन है- मित्र मंडली तरूण समाज. इसके संचालक महोदय एक पत्रकार हैं. अब वो लिखते हैं या नहीं. मगर पत्रकार की चर्चा हो और उनका नाम न आये, ये एक पहचान जरूर अपने साथ लिये हुये हैं. यह एनजीओ टाईप संगठन कुछ कार्यक्रम करता है. जिनमें होली का महामूर्ख सम्मेलन जरूर अपनी पहचान रखता है. इसी संगठन के बैनर पर हुई थी ये राष्ट्रीय संगोष्ठी. जिसको भारत सरकार के मानव संसाधन विकास उच्चतर शिक्षा विभाग नई दिल्ली ने प्रायोजित किया था. बजट जानने की कोशिश तो हमने की मगर पूछने पर शंकालू नजरों के अलावा जानकारी नहीं मिली. ऐसे में इसे लाखों का आयोजन माना जा सकता है.

समापन के बाद परिसर से बाहर आते समय एक शिक्षक संभागी की इस टिपण्णी ‘दो जोड़ी कपड़े रखने लायक बैग तो मिल ही गया’’ ने जरूर सोचने को मजबूर किया कि आज सेमीनारों के बारे में कैसी सोच हो गई है. पूरे आयोजन में लगा नहीं कि कुछ हुआ हो. हां समापन में ये जरूर सुनने को मिला कि संगोष्ठी के निष्कर्ष बिन्दु सरकार को प्रेषित कर दिये जायेंगे. अनुमान लगाया जा सकता है कि ऐसे चिंतन से निकले बिन्दुओं पर सरकार कितनी गंभीरता से मंथन करेगी.

दैनिक नवज्योति ने 30 सितंबर के समाचार में लंबी चौड़ी खबर फोटो सहित लिखते हुये राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारम्भ बताया तो दूसरे अखबारों में भी इस खबर को प्रमुखता से स्थान दिया गया है. संगोष्ठी में भरतपुर संभाग के कमिश्नर राजेश्वर सिंह, राज्य विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष गिर्राज प्रसाद तिवाडी, शिक्षाविद्व वासुदेव गुप्ता, डा रामकृष्ण शर्मा, उषा अग्रवाल सहित अनेकों विद्वानों ने शिरकत की. संभागियों में भरतपुर और उसके आसपास के महाविद्यालय, विद्यालयों के शिक्षकों ने श्रोताओं की भूमिका बखूबी अदा की.

इस राष्ट्रीय संगोष्ठी को राजस्थान पत्रिका और दैनिक भास्कर ने तो बाकायदा एक जैसे सार समाचारों को छापते हुये गुरुवार 30 सितंबर को समाप्त हुआ बताया है. जबकि ये संगोष्ठी 29 नवंबर को सांय 5.15 पर समाप्त हो गई थी. यहां एक सवाल जो भले ही आपको बेतुका लगे मगर पैदा होता है कि अखवारों की रिपोर्टिंग में इतनी समानता क्यों है. उदघाटन सत्र में दो चार कैमरामैन फोटो खींचते जरूर नजर आये थे मगर जहां प्रेस लिखा हुआ था उस जगह पर बैठकर रिपोर्टिंग करता हुआ कोई नहीं दिखा था. हो सकता है कैमरामैनों ने ही कुछ लिख लिया हो. लेकिन समापन समारोह के लिए तो ये भी कहना ठीक नहीं है. आनन फानन में हुये इस समारोह में मीडिया की ओर से कोई नहीं था. हां आयोजकों की ओर से जरूर फोटोग्राफी की जा रही थी.

लाखों रुपयों की राष्ट्रीयय संगोष्ठी के समाचार प्रेस नोट से लिखे जाने जैसे दिखाई पड़ रहे है. ऐसे में उसके उदघाटन, समापन को दो अलग अलग दिनों में ऐसी जगह से दिखा देना जहाँ अखबारों के ब्यूरो कार्यालय है, कुछ अटपटा सा महसूस होता है. ये केवल दाल में काला होना जैसा नहीं, सम्पूर्ण दाल ही काली है जैसी बात लगती है. बीते दिनों पेड न्यूज जैसे शब्द और बहस हम सबके बीच खूब चली थी. कहीं ये उसका एक उदाहरण तो नहीं.

इस तथाकथित राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन के आरम्भ में संचालक महोदय ने एक बात की ओर इशारा जरूर किया था. ‘जिला प्रशासन का ऐसा कहना है कि कल विवादित अयोध्या मालिकाना हक का फैसला आने वाला है, ऐसे में गोष्ठी को हो सके तो आज ही समाप्त कर लो’  इस मशवरे पर हमने ये फैसला लिया है कि इसका आज ही समापन कर लिया जाये. हो सकता है ये फैसला सही हो. प्रशासन की राय भी अपनी जगह सही रही हो. मगर यहां भी एक बड़ा सवाल ये पैदा होता है कि अगर ऐसा किया भी गया तो संभागियों को दो दिन की गोष्ठी के प्रमाणपत्र क्यों वितरित किये गये. छपे हुये प्रमाणपत्रों से एक दिन को काटा जाना चाहिये था. अखवारों में इसी कारण का हवाला देकर खबर प्रकाशित होनी चाहिये थी. ये सब क्यों नहीं हुआ. ये समझ से परे की बात है. हो सकता है आयोजकों के अपने हित रहे हों. तो अखबारों ने उन हितों को साधने में मदद क्यों की. यों ही जब एक सज्जन से इस विषय में पूछा तो उनके जवाब ‘गोष्ठी के बिलों का भुगतान अखबारों की खबरों के प्रमाणीकरण के बाद ही होगा’ और अखबार कौन से मुफ्त में ऐसी खबरें छाप देते है.

सच और सच्चाई क्या है? ये तो पता नहीं. मगर इतना जरूर कहा जा सकता है कि ऐसे तो ‘शिक्षा में राष्ट्रीय संचेतना’ आने से रही. ऐसे ही राष्ट्रीय संगोष्ठियां होती रहेंगी, मीडिया भी उन पर अपनी मुहर लगाता रहेगा. और वो बच्चे जिनके शिक्षक ऐसी गोष्ठियों में आते हैं किसी झोपड़ी में बैठे इंतजार करते रहेंगे कि कल उनके गुरुजी कोई नई बात बताएंगे. गोष्ठी से लौटकर. गुरुजी दो जोड़ी कपड़ों के लिए बैग लेकर अपने घर आते रहेंगे. ऐसा हो भी क्यों नहीं. समाज की सच्चाई को उजागर करने वाला चौथा स्तम्भ अब मुहर लगाने का काम जो करने लग गया है.

राजीव शर्मा की रिपोर्ट

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Comments on “लाखों रुपये वाली एक राष्ट्रीय संगोष्ठी की कहानी

  • Dr. Ami Adhar Nidar says:

    Rajeevji, nischit roop se aap ne tarun samaj mitra mandli ke aayojan per aache sabal uthayen hain, lakin aap ko malum haona chahiye ki jis patrakar ka naam aapne nahi khola hai vo aadrniya mahendra cheema hain. aap ko bata doon ki shri Cheema ne beete daskon me Bharatpur me saminaron ke aayojan ma rastriya estar ke logon ko hi nahi bulaya balki samaj ko, shiksha ko apna mahti yaogdaan diya hai. shyad aap esse aanbhigy hain.

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