विकीलीक्‍स की पत्रकारिता को सलाम

नूतनविकीलीक्स को सलाम. वास्तव में 2006 में स्थापित विकीलीक्स ने पत्रकारिता और शासकीय अभिलेखीकरण को एक नयी दिशा प्रदान की है और आज विकीलीक्स का लोहा सारा विश्व मान रहा है. इस मीडिया समूह की स्थापना का उद्देश्य गोपनीय तथा अज्ञात सूत्रों के माध्यम से तमाम गोपनीय शासकीय तथा अशासकीय दस्तावेजों को लीक करके इनकी सूचना आम जन तक लाना था. अपने शुरुआत के एक साल के अंदर ही विकीलीक्स के पास बारह लाख से अधिक अभिलेख आ चुके थे, जिनमे कई तो ऐसे गहन, गंभीर दस्तावेज़ थे जिन्होंने अमेरिका तक को हिला कर रख दिया. ऑस्ट्रेलिया के इन्टरनेट उपयोगकर्ता जूलियन असांज इसके मूल प्रवर्तक माने जाने हैं.

ना जाने कितने ही महत्वपूर्ण मामलों में विकीलीक्स ने अंदरखाने छिपे अभिलेखों को सामने ला कर रख दिया, जिससे कितने सारे लोग, कितनी सारी व्यवस्थाएं बेनकाब हुईं और कितनी मान्यताएं तक टूटने को मजबूर हो गयीं. खास कर इस साल के अप्रैल महीने में इराकी नागरिकों को अमेरिकी सेना द्वारा मारे जाने की घटनाओं से जुड़े वीडियो जारी करने के बाद तो विकीलीक्स पूरी अमेरिकी शासकीय तंत्र का दुश्मन नंबर एक हो गया है, जिसे अमेरिका के राष्ट्रपति से लेकर समस्त अमेरिकी तंत्र बहुत ही गहराई तक अपना दुश्मन मानने लगा है. इसके अलावा भी कई देशों की सरकारें विकीलीक्स के प्रति अत्यंत घृणा का भाव रखती हैं. लेकिन इसके साथ ही काफी घबराती भी हैं.

विकीलीक्स ने अन्य बातों के अलावा गोपनीयता और जानने के हक के बहस को भी एक वृहद आयाम दिया है. यदि एक तरफ बातों को गुप्त रखने का सरकारों का हक है और उसकी जरूरत है तो दूसरी ओर इन सारी बातों के आम जन के सामने आने की बात भी अपने आप में उतनी ही जरूरी है. यदि हम अपने देश का ही सन्दर्भ लें तो यहाँ यदि शासकीय गोपनीय दस्तावेजों से सम्बंधित ऑफिशिएल सीक्रेट्स एक्ट है तो आम जन को शासकीय नीतियों, रीतिओं और कृत्यों के बारे में बताये जाने के लिए सूचना का अधिकार अधिनियम बनाया गया है. लेकिन सूचना का अधिकार अधिनियम कई मायनों में सीमित विस्तार का है और बहुत सारी बातें इस अधिनियम की परिधि के बाहर रखी गयी हैं. ये सारी सूचनाएं इस अधिनियम की धारा आठ के अंतर्गत देश की सुरक्षा और संरक्षा, वैदेशिक नीति, वैदेशिक व्यापार, अपराध अन्वेषण आदि के नाम पर प्रतिबंधित सूचनाओं के अंतर्गत शामिल कर दी गयी हैं. फिर ऑफिशिएल सीक्रेट्स एक्ट तो है ही, जिसमें गोपनीय सूचनाओं को लीक करने पर गंभीर दंड तक का प्रावधान है. इस एक्ट का कैसे दुरूपयोग होता है, इसका एक अच्छा उदाहरण भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी आरएडब्लू के पूर्व अधिकारी मेजर जनरल वीके सिंह की पुस्तक द रा एक्सपीरिएंस के बाद भारत सरकार द्वारा उठाया गया कदम है. इस पुस्तक में इस गुप्तचर संगठन की कई सारी बुराईयों और कमियों को सामने लाया गया था और वहाँ फैले भ्रष्टाचार को प्रकट किया गया था. नतीजा यह रहा कि इन कमियों को सही ढंग से लेने की जगह सरकार ने उलटे वीके सिंह के ऊपर ही मुकदमा दर्ज कर दिया और उन्हें जेल तक जाना पड़ा.

अब यदि कोई अधिकारी अपनी ओर से आगे बढ़ कर देश और समाज के हित में वैसे तथ्य प्रस्तुत करता है, जिससे उसकी समझ में सीधा नुकसान हो रहा है, तो देश के सत्तारुढ लोग उसे तंत्र के प्रति विद्रोह के रूप में लेते हैं और तुरंत ऐसे लोगों को दबाने के काम में लग जाते हैं. कमोबेश यही बात दूसरे मामलों में भी देखा गया है. यह भी देखा जा सकता है कि ज्यादातर ऐसे मामलों में बाहर लायी जा रही सूचनाएं देश के सामान्य हित में होती हैं, जिन्हें सत्ताधारी लोग अपने निजी स्वार्थों के लिए छुपाये रखने की बात करते हैं.

इसी निगाह से विकीलीक्स जैसे मीडिया समूहों की सख्त आवश्यकता है, जो आगे बढ़ कर अपने रिस्क पर तमाम उन ख़बरों को जनता के सामने रख रही हैं जिनके कारण सरकारों के काले कारनामे और उनके नुमाइंदों के दुराचरण और कुकृत्य परदे के पीछे से निकल कर सबके सामने आ रहे हैं.

एक तरह से हम कह सकते हैं कि जिस तरह का काम भड़ास जैसे पोर्टल मीडिया से जुड़े मामलों में काम कर रहे हैं, उसी तरह से देश और शासन के स्तर पर गोपनीयता के कृत्रिम बांधों को तोड़ कर विकीलीक्स अंदर का सारा कचरा सामने रख दे रहा है जिससे हम इन अंदरूनी बातों को समझ सकें और इनके अनुसार अपने निर्णय अपने विवेकानुसार ले सकें.

मैं विकीलीक्स जैसे मीडिया चैनल को सलाम करती हूँ और आशा करती हूँ कि जल्दी ही भारत के परिप्रेक्ष्य में भी ऐसी पहल की जायेगी जिससे अंदरखाने बजबजा रही गंदगियां खुल कर सामने आ सकेंगी और इस तरह उनका सफाया करने में मदद मिलेगी.

डॉ नूतन ठाकुर

संपादक,

पीपल’स फोरम, लखनऊ

Comments on “विकीलीक्‍स की पत्रकारिता को सलाम

  • बड़े दुःख के साथ कहना पड़ेगा नूतन जी की अभी थोड़ी देर पहले ही इस वेबसाइट को ब्लाक कर दिया गया है इसका डोमेन नाम ही ख़त्म कर दिया गया है उम्मीद करते हैं की सच की जीत जल्दी ही होगी और विकिलीक्स दोबारा ऑनलाइन होगी

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  • manveer singh chundawat says:

    sach ki disha me uthne waale har kadam ko kuchalne ke prayas sadiyo se hote rahe hai. dukh tab hota hai jab jimmedar log bhi apna daman chhudate najar aate hai. aisa nahi hota to wikiliks par bharat sambandi khulase ko samachar patro me pramukhta se isthan milta .afsos aisa nahi hua .gandhi jaynti par milne waale vigyapano ke lalch ne samachar ptro ke muh par bhi taale laga diye hai
    rajnetao ka charitra bhi sab ke samne hai .amerika ke samne bandar ki manid nachane waale bharat ke raj neta amerika ki jasusi or vishavash ghat par chup qu hai koi nahi pucchta

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