शातिर-खुर्राट दलालों का हाथ और एक संवेदनशील पत्रकार की किताब

यशवंत: एक होने वाले आयोजन के बहाने आज की मीडिया पर भड़ास : आज जो जितना बड़ा दलाल है, वो उतना ही धन-यश से मालामाल है. आज जो जितना बड़ा दलाल है, सत्ता-बाजार में उसका उतना बड़ा रसूख है. आज जो जितना बड़ा दलाल है, लालची-तिकड़मी मिडिल क्लास की नजरों में उतना ही बड़ा विद्वान है.

और, ऐसे ही कथित यशस्वी, रसूखदार, विद्वान आजकल दिल्ली में भांति-भांति के आयोजनों की शोभा बढ़ाते फिरते हैं. पर दुख तब होता है जब कोई ठीकठाक पत्रकार इन दलालों के बहकावे में आकर इन्हें अपना मुख्य अतिथि या नेता या परम विद्वान मान लेता है. आईबीएन7 में कार्यरत और टेलीविजन के वरिष्ठ पत्रकार हरीश चंद्र बर्णवाल अच्छे पत्रकारों में शुमार किए जाते हैं. विनम्र, पढ़े-लिखे, समझदार, संवेदनशील और सरोकार को जीने वाले हरीश ने हाल-फिलहाल एक किताब का उत्पादन किया है. नाम है- “टेलीविजन की भाषा”.

इस किताब का जोरदार विमोचन कराने के चक्कर में हरीश लोकार्पण समारोह में ऐसे-ऐसों को बुला बैठे हैं कि कोई संवेदनशील आदमी अपने मन से तो उस समारोह में जाने से रहा. हां, नौकरी बजाने की मजबूरी, दलालों के नजदीक जाने की इच्छा, कुछ हासिल कर लेने की लालसा और तमाशा देखने का आनंद उठाने वाले जरूर वहां भारी मात्रा में पहुंचेंगे. यह कार्यक्रम 8 अक्टूबर को दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में आयोजित किया गया है. किताब का विमोचन अमलतास हॉल में सुबह 11 बजे किया जाएगा. अब आप जान लें कि इसका विमोचन कौन करेंगे.

इस किताब का विमोचन टीवी न्यूज इंडस्ट्री के दिग्गज कहे जाने वाले पत्रकार राजदीप सरदेसाई करेंगे. ये वही राजदीप सरदेसाई हैं जिन्होंने नोट-वोट कांड की सीडी को पानी के साथ निगल कर अपने पेट में कहीं पचा लिया था और दुनिया इन पर थू थू करती रही लेकिन इन्हें उबकाई आजतक नहीं आई तो नहीं आई. स्टिंग वाली सीडी घोंटकर बैठे इस पत्रकार को लोग दिग्गज कहें तो कहें पर इस सीडी घोंटू कांड के कारण राजदीप की टीआरपी भयंकर गिरी है और उन पर हर कोई शक करने लगा है. तो ये महाशय हरीश के किताब का विमोचन करेंगे. अब जानिए, इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कौन होंगे. मुख्य अतिथि होंगे संसदीय कार्य राज्य मंत्री राजीव शुक्ला.

दलाल शिरोमणि राजीव शुक्ला आजकल के हर बाजारू पत्रकार के रोल माडल हैं. एक आम पत्रकार से केंद्रीय मंत्री तक का सफर. एक आम पत्रकार से मीडिया मालिक बनने तक का सफर. एक आम पत्रकार से सत्ता के गलियारे का सबसे पसंदीदा चेहरा बनने का सफर. इन राजीव शुक्ला के मुख्य आतिथ्य में हरीश अपनी किताब को पत्रकारिता के बचवा लोगों के लिए पेश कराएंगे. बचवा टाइप पत्रकार इस किताब से भले कुछ सीखें या न सीखें, राजीव शुक्ला से दलाली और राजदीप सरदेसाई से सीडी घोंट लेना जरूर सीख लेंगे.

पुस्तक विमोचन के इस कार्यक्रम के बहाने टेलीविजन न्यूज चैनलों के कई संपादक एक साथ एक मंच पर जमा होंगे. मुख्य वक्ताओं में प्रभु चावला का भी नाम शामिल है. प्रभु चावला के बारे में कुछ कहना खुद अपने मुंह पर थूकने के समान है. इनके तमाम तरह के कांड यहां-वहां बिखरे मिलेंगे. आलोक तोमर पर्याप्त मात्रा में इनकी शिनाख्त उजागर करने वाले सुबूत छोड़ गए हैं. इनके बारे में ज्यादा चर्चा करना अपना और आपका वक्त खराब करना है. चूंकि न्यूज चैनल कारपोरेट्स के हाथों के खिलौने हैं, सो इन जैसों की न्यूज चैनलों-बड़े अखबारों में बहुत पूछ रहती है क्योंकि इनकी पूंछ की पहचान नेताओं, नौकरशाहों, उद्यमियों, गैंगस्टर्स से लेकर मिडिलमैनों तक को बखूबी रहती है, सो इस पहचान का फायदा ये न्यूज चैनलों और अखबारों के मालिकों को गाहे-बगाहे दिलाते रहते हैं और इसी कारण मालिकों के प्रियपात्र बने रहते हैं.

जिस आयोजन में उपरोक्त उद्धृत ‘विद्वान’ आने को तैयार हों तो कई छोटे-मोटे विद्वान खुद ब खुद अपने पैरों से चलकर आने को तैयार हो जाते हैं. जिन अन्य लोगों के यहां आने की सूचना प्रेस रिलीज के जरिए दी गई है, उनके नाम हैं- आज तक के न्यूज डायरेक्टर नकवी, स्टार न्यूज के एडिटर इन चीफ शाजी जमा, IBN7 के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष, जी न्यूज के एडिटर सतीश के सिंह, इंडिया टीवी के मैनेजिंग एडिटर विनोद कापड़ी, न्यूज 24 के मैनेजिंग एडिटर अजित अंजुम. इसके अलावा इसमें प्रिंट के भी कई विद्वान संपादक शामिल होंगे. जिन कुछ नामों का पता चला है, वे इस प्रकार हैं- अंग्रेजी अखबार पायनियर के संपादक, मैनेजिंग डायरेक्टर चंदन मित्रा, दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर श्रवण गर्ग और नवभारत टाइम्स के ग्रुप एडिटर रामकृपाल सिंह.

आयोजन के बारे में आई प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है कि– ”हरीश बर्णवाल की किताब ‘टेलीविजन की भाषा’ टेलीविजन न्यूज चैनलों पर पहली ऐसी किताब है, जिससे टीवी न्यूज इंडस्ट्री के व्यवहारिक ज्ञान को पाया जा सकता है. इस किताब में स्क्रिप्टिंग को लेकर बारीक से बारीक चीजों का भी ख्याल रखा गया है. किताब को पढ़ने के बाद टेलीविजन की दुनिया न सिर्फ टेलीविजन के अभ्यर्थियों के लिए बहुत आसान हो जाएगी, बल्कि पेशेवर पत्रकारों को भी मदद मिलेगी. ये किताब राजकमल प्रकाशन दिल्ली में उपलब्ध है.”

प्रेस विज्ञप्ति में किताब खरीदने के लिए राजकमल की मेल आईडी और फोन नंबर भी दिए गए हैं. पर कांट्राडिक्शन ये कि किताब और लेखक, दोनों स्वयं में पवित्र होने के बावजूद पत्रकारों व पाठकों तक पहुंचने की यात्रा गलत लोगों के गिरोह में प्रवेश करके प्रारंभ कर रहे हैं. हो सकता है यह संवेदनशील पत्रकार हरीश की करियर संबंधी कोई मजबूरी हो या बाजार में बड़ी हलचल पैदा करके किताब के जरिए ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की राजकमल की कोशिश. पर इतना तय है कि कारपोरेट के हाथों बिकने के इस दौर में किताब लेखन और उसके विमोचन जैसे पवित्र कार्यों में भी वर्ग भेद पैदा हो गया है और इनमें भी कारपोरेट खेल और नान-कारपोरेट खेल खुले तौर पर दिखाई देने लगा है.

एक तरफ वे लेखक और उनकी किताबों का विमोचन जिनके पास संसाधन नहीं, नामी प्रकाशक नहीं और अच्छे संपर्क नहीं. दूसरी तरफ वे लेखक जो नामी प्रकाशक, अच्छे संपर्क और ठीकठाक संसाधन के साथ लेखकीय पारी शुरू करते हैं और पहली ही गेंद पर छक्का मार देते हैं. हरीश को उनकी किताब मुबारक. पर मैं पत्रकारिता के शिशुओं से यही कहना चाहूंगा कि टीवी और भाषा को किताबों के जरिए नहीं, जीवन के जरिए जाना जा सकता है. आप हरीश की किताब जरूर पढ़ें पर उस किताब से कितने सबक हासिल किए, यह हम सबको जरूर बताइएगा. और उन टीवी पत्रकारों से भी पूछना चाहूंगा जो आज चैनलों में ठीकठाक पोजीशन पर नौकर हैं कि वे किस किताब को पढ़कर टीवी में नौकर-चाकर बनने के लिए घुसे और आज सफलतापूर्वक नौकरी-चाकरी करके अच्छी पगार पा रहे हैं.

दरअसल भाषा एक दिन में हत्थे चढ़ने वाली चीज नहीं और टीवी एक दिन में समझ में आना वाला डब्बा नहीं. दोनों को साधने की जरूरत पड़ती है. और खासकर भाषा की साधना तो पत्रकारिता की डिग्री लेने के बाद कतई नहीं शुरू होती. इसकी शुरुआत कायदे से प्राइमरी से, नर्सरी से हो जाती है जो हाईस्कूल, इंटर, बीए-बीएससी करते हुए परवान चढ़ती है. पत्रकारिता में डिग्री लेने के दौरान तो बच्चे एक ऐसे चंगुल में फंस जाते हैं जहां उनकी पत्रकार बनने की इच्छा का कदम-कदम पर दोहन किया जाता है. सबसे पहले पत्रकारिता शिक्षा देने वाला संस्थान लूटता है, फिर कई तरह के लोग थोड़ी बहुत मात्रा में लूटते रहते हैं जिसमें प्रकाशक, बड़े पत्रकार, मीडिया संस्थान, कुख्या संपादक, टीवी के नाम के ट्रेनर, जाब दिलाने वाले मिडिलमैन, समझाने पढ़ाने वाले शिक्षक, कंसल्टेंसी देने वाले भाई लोग… आदि कई कुत्ते-सूअर बीच में हैं.

हर टीवी वाले ने अपनी दुकान खोल रखी है. टीवी पत्रकार बनाने के नाम पर अकादमी खोलकर लड़कों को लूट रहे हैं. यह फ्री का धंधा है. ना हींग लगे ना फिटकरी रंग चोखा ही चोखा. जब ये लड़के यहां से निकलते हैं तो इनसे लंबे समय तक मुफ्त में काम कराया जाता है और जब ये प्रमोशन करने की बात करते ही उन्हें बाहर किसी दूसरे जगह तलाशने या फिर सदा के लिए जाने को कह दिया जाता है.

बढ़िया भाषा ज्ञान और तकनीकी समझ के बावजूद कई नए पत्रकारों को नियुक्ति पत्र नहीं दिया जाता क्योंकि टीवी न्यूज इंडस्ट्री में जितने लोगों की जरूरत है, उससे कई सौ गुना ज्यादा लोग डिग्री लेकर नौकरी पाने को हाजिर रहते हैं. इस डिमांड-सप्लाई में भारी अंतर के कारण हजारों युवाओं के सपने टूट जाते हैं. वे न पत्रकार बन पाते हैं और न पेट पालने भर की आमदनी पाने वाले नौकर. हां, इस बेरोजगारों की फौज से कई अन्य लोग बैठे-बिठाए महान जरूर हो जाते हैं. टीवी के मठाधीशों के पांव छूने वाले और बिना वजह प्रणाम करने वालों की संख्या हजारों में हो जाती है. सोचिए, आपकी हमारी बेरोजगारी कई लोगों के मठाधीश बने रहने का कारण है. संभव है, इन्हीं में से कोई बेरोजगार एक दिन किसी मठाधीश के सिर पर जूता ठोंक दे, उसी तरह जैसे कांग्रेसियों पर जूता फेंकने का दौर चल निकला.

पत्रकारिता में आने वाले देहाती बैकग्राउंड के आदर्शवादी नौजवानों को कहना चाहूंगा कि यह दलालों और मगरमच्छों की दुनिया है, एक बार फंसे तो गए. यहां मजे लेने के लिए आओ, दलालों-मठाधीशों-मगरमच्छों को समझने-बूझने के लिए आओ, पत्रकारिता करने का जज्बा लिए मत आना. और हां, जीवन यापन के लिए रंडियों की दलाली से लेकर रामनामी बेचने तक का काम कर लेना क्योंकि दोनों काम में अंदरुनी अदृश्य पाप कुछ नहीं है, जो कुछ है सामने है, पर कारपोरेट के हाथों बिके न्यूज चैनलों और अखबारों के जरिए पत्रकारिता मत करना. सच लिखना है, सच को समझना है तो अपना ब्लाग बनाओ, वेबसाइट बनाओ और शौकिया पत्रकारिता करो. पेट पूजा के लिए कोई और धंधा कर लो. यह चलेगा. क्योंकि आने वाले वक्त में पत्रकारिता की लाज ऐसे शौकिया पत्रकार ही बचाएंगे, जिनके कंधों पर आज पत्रकारिता का भार हम देख रहे हैं, वे साले जाने कबके दलाल हो चुके हैं और अब पत्रकारिता की मां-बहिन करने के बाद इसके कफन तक को बेचने लगे हैं.

असहमति के बावजूद हरीश बर्णवाल और उनकी किताब, दोनों को बधाई. उगते सूरज को सलाम करने का ट्रेंड हमेशा से पूरी दुनिया में और हर तरह के समाज में रहा है. आजकल जो टीवी संपादक हैं, वे बुढाएंगे, रिटायर होंगे तो उनकी जगह हरीश जैसे साथी ही संपादक बनेंगे और समाज व बाजार में संतुलन साधने की बाजीगरी करेंगे. सफलता हर कीमत पर का मंत्र जिन लोगों ने अपना लिया है, उनके फेल होने की आशंका कम रहती है. दिक्कत उनको होती है जो सफलता और समाज में सामंजस्य बिठाने की कोशिश करते हैं. जो सफलता समाज के लोगों का खून पीने की कीमत पर नहीं चाहते.

पर इतनी बारीकियों में कौन जाता है. लोग ‘सफल’ होकर पकड़े जाने पर जेल जाना ज्यादा पसंद करते हैं, असफल होकर बिना चर्चा वाली मौत मरना नहीं. शार्टकट का दौर है. और शार्टकट की प्रक्रिया में समाज और समाज के गरीब-गुरबे, गंवई-देहाती, गांव-जवार वाले कट जाते हों तो कटते रहें, शायद उनकी नियति या उनके भाग्य में ऐसा हो. सफलता अमीरी गरीबी दरिद्रता को भाग्य और नियति से जोड़ने वाले लुटेरे कारपोरेट्स को बारीकी से समझने का दौर शुरू हो चुका है. और, दुनिया के कई देशों की जनता इस लूट को समझने के बाद सड़कों पर आ चुकी है. अमेरिका में हुआ हालिया प्रदर्शन इसका गवाह है. कई और देशों में यह दौर है. भारत के लोग ज्यादा भावुक और देर तक बर्दाश्त करने की क्षमता रखने वाले होते हैं इसलिए वे बौद्धिक बातों और लूट आदि को आखिर में समझते हैं.

न्योता

आप सभी को आयोजन में जाना चाहिए, भले ही तमाशाई बनकर आनंद लेने को जाएं. लेकिन वहां से लौटकर जरूर लिखना-बताना कि पूरे आयोजन को देखने-सुनने के बाद पत्रकारिता को लेकर किस तरह का फीलगुड या फीलबैड हुआ. मैं भी आउंगा, आनंद लेने और आप लोगों का साथ देने. मेरे यहां मन की भड़ास निकालने से किसी को दुख हुआ हो ता माफी चाहूंगा क्योंकि मेरी मंशा किसी को पीड़ा पहुंचाना नहीं. पर दिल की भड़ास निकालने के दौरान अगर कोई पीड़ित होता है तो इसकी परवाह भी मैं नहीं करता क्योंकि भड़ास का जन्म हर किसी को खुश करने को नहीं बल्कि उनकी बात रखने को हुआ है जो बाजार और पावर से खदेड़े गए लोग हैं, जो सत्ता-सिस्टम के पीड़ित हैं, जो बेरोजगार हैं, जो गरीब-दलित हैं, जो शहरी सभ्यता के मारे हुए हैं…. ऐसे लोगों को करीब पाकर, ऐसे लोगों की बात रखकर मुझे ज्यादा खुशी होती है तुलना में उनके जो भरे पेट वाले, माल-नोट वाले और रावणमयी दर्प से आप्लावित हो मचलने वाले हैं.

आखिर में कहना चाहूंगा कि टीवी की भाषा को जरूर समझिए पर उस भाषा को जो टीवी न्यूज चैनलों को संचालित करती है, इनके मुनाफे की भाषा को, इनकी टीआरपी की भाषा को, इनके कारपोरेट्स के हाथों खिलौने बने रहने की भाषा को, इनके लूटने और फिर साधु बनकर कीर्तन करने की भाषा को… जब इन भाषाओं को समझ जाएंगे तो आपको इन स्वनामधन्यों के खेल तमाशे भी समझ में आने लगेंगे वरना तो सब कुछ हरा भरा है क्योंकि आप और हम सावन के अंधे हैं….

जय हो.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

yashwant@bhadas4media.com

Comments on “शातिर-खुर्राट दलालों का हाथ और एक संवेदनशील पत्रकार की किताब

  • सुधीर अवस्थी 'परदेशी' says:

    धन्यवाद,
    यशवंत जी,
    आपने तो सच्चाई की सीमा को छुवा है बहुत ही प्रभावशाली लेख है, वास्तव में पढने में बिल्कुल सच्चाई लग रही है, इस तरह की सच्चाई को पढकर जोश आ जाता है सुधीर अवस्थी ‘परदेशी’ जन्संदेश टाइमस संवाददाता ग्रामीण पत्रकार बघौली हरदोई उत्तर प्रदेश

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  • fazal imam mallick says:

    yashwant bhai
    Zindabaad…aapne kayee mahatavpurn sawal uthaye hain…parkashakon ko le kar bhi aur lekhakon ko le kar bhi. Bhasha ka sawal bhi matahvpurn hai bhai Bhasha ki to aisi taisi ho rahi hai..her koyee apne tariqe se bhasaha ka suvidhajanak istemal ker raha hai…bhasha sadhne ki cheez hai…do minute ka noodle ya instan cofee nahi..achche lekh ke liye bahut badhayee

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  • भाई यशवंत जी।आपने नए पत्रकारों को नसीहत दी है उसे उन्हें समझना चाहिए।इस गंदगी से दूर रहना ही ठीक है

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  • श्रीकांत सौरभ says:

    वाह, यशवंत भईया फाड़ के रख दिहनी. पहिले के क्षत्रिय देश के खातिर बाहरी सब से लड़ाई में आपन जान दे दिहले . फिलहाल गोला-बारूद के जमाना नइखे . रउआ भी आपन क्षत्रिय धरम के पालन करते हुए कलम से अइसन तोप चलवले बानी कि ई कुल्ही पढ़ के टीवी के आलाकमान लोगन के मय तरे फाट जाई .

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  • bhumika rai says:

    आदरणीय यशवंत जी, मीडिया की सच्चाई ही यही है कि यहां जो जितना ज्यादा अभद्र है, गिरा हुआ है और जितनी घटिया बातें कह-कर सकता है…वही सफल है. सफलता हर किसी को खींचती है..और एक संवेदनशील पत्रकार भी इसे समझता होगा…तभी उसने खुर्राट हाथों को चुना है…

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  • rakesh gaajipuree says:

    बहुत बढ़िया भाई…….आपका वार पहले की तरह ही सटीक है और यथार्थ को उजागर करने वाला है नए पत्रकार बंधुओं को सीख को ध्यान से सीखना चाहिए …….धन्यवाद…..

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  • यह कलम आपकी युही चलती रहे यह दुआ हे मेरी रब से की जब तक मेरी जिंदगी का आखिरी पल नहीं आजाए तब तक आपकी कलम युही चलती रहे। इन भ्रस्ट मीडिया वालो की पोल खोलकर रखती रहे । वास्तव में बिंदास लिखा है । लगता नहीं आजकल रंडी धारी पत्रकारिता में भी ऐसा लेख लिखने वाले है। उस ढाई फुट के आदमी को देखो जो की मीडिया का मालिक बन बता है लेकिन मीडिया के लोगो के लिए कुछ नहीं कर रहा है और अपनी लुगाई के साथ मिलकर एक चैनल और खोल डाला है जिससे पत्रकारों का सोसण कर रहा है। पता नहीं क्या होगा इस रंडी धारी पत्रकारिता का ।

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  • शेष नारायण सिंह says:

    मैं तो इस कार्यक्रम में जाने वाला था . लेखक के बारे में पता चला है कि वह बहुत अच्छा इंसान है. फिर क्यों इन सनीचरों के चक्कर में पड़ गया . शायद यह सारा सरंजाम प्रकाशक ने किया होगा. खैर अब नहीं जायेगें. लेकिन यशवंत के अंदर प्रवेश कर गयी संत कबीरदास की आत्मा को सादर प्रणाम करता हूँ . और यह भी बताता चलूँ कि यशवंत की तरह ही संत कबीरदास भी भोजपुरी में ही सोचते रहे होंगें. बाद में उसका अनुवाद सधुक्कड़ी भाषा में करते थे. यशवंत के भी मूल विचार तो भोजपुरी में ही आते हैं . बाद में उसका हिन्दी, अंग्रेज़ी या गाली में अनुवाद किया जाता है . बेहतरीन लेखन के लिए यशवंत को जयहिंद .

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  • pardeep mahajan says:

    यशवंत बहुत उम्दा 1 तीर से दसियो शिकार
    सही और बेबाक लिखने के कारन तुम्हारे कई दोस्त व् दुश्मन बन गए है परन्तु अपने आर्टिकल से तुम आने वाली जनरेशन को सन्देश भी दे देते हो और इस समुन्द्र के मगरो को चाबुक भी मार देते हो -गुड लगे रहो — प्रदीप महाजन ( http://www.insmedia.org )

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  • sushil Gangwar says:

    Hello
    Yaswant ji

    Hum bhi chor tu chor , fir to bhaiya naache more ? aapka lekh achha hai . Desh ke bade logo ke baare me likha gaya hai . Jo patrakarita ke icon samjhe jaate hai .

    Aaaj ke dour jisne dalali kar liye vah paise vala bana jaata hai. yah baat sach hai. En logo se kaam karne ke liye kabhi kabhi apne tan man or dhan ki tilajanli deni padti hai.

    Mujhe kabhi kabhi dukh hota ki mai TV Journalism me naukri kyo nahi kar paya yaa kyo nahi mil payee . Yaswant ji hame paisa or ladki dene ka majda nahi tha .

    Mujhe yaad aata hai vah din jab mai ek neta ki chhitti lekar aaj ke mantri cum dalal shromani Rajeev shukla ke pass gaya tha. Badi mushkil se unke office pahucha . Un dino Rajeev shukla apna production house chalate the .

    Us samya mai Rajeev shukla ji se pahlei or aakhir mulakat thi . Mujhe samjhte der nahi lagi ye hamare desh ka sabse bada dalal ho sakta hai.

    Kair kuchh patrakaro ko navabi shouk hote hai Jo ab fal fool rahe hai .Naukri ke chakkar me mai ek ese Patrakar se ja takrya jo Ladkiyo ka nahi balki Ladko ki chahta rakhta hai. Uska maksad saaf tha .

    Ye baate purani ho chuki hai jisme kuchh log Bade log ban gaye . Bade -Bade patrkar kahlane lage ..

    Hum to chup hi rahege .. ?

    Editor
    Sushil Gangwar
    http://www.writerindia.com
    http://www.sakshatkar.com
    http://www.politicianindia.com

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  • adarsh prakash singh says:

    itni bebaki se yashwant hi likh sakte hain, patrakarita ki gandgi koun saf karega yaha bada sawal hai. dalali karke log padma shree jase puraskar bhi pa le rahe hain. yashwant ko bahut badhai. adarsh prakash singh

    Reply
  • PRAYAG PANDE says:

    yashwant ji!media gharanon ki bhitar ke sach ko beparda karane ka JIGAR hai to sirf aap main.easa nahi hai ki oaron ko es sach ka elam na ho . per hakikat ko jagajahir karane ki himmat kisi main nahi hai . yahi khubi aapko dusare patrakaron se alag ek nirbhik or samajik sarokaron se ladane wala emandar patrkar banati hai.lage raho ham jaise anginat patrkar aapke sath hain.

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