ये वीडियो देखने के बाद भी आप कहेंगे कि भारत में कानूनराज है?

: मुंबई पुलिस की क्रूरता का वीडियो : मुंबई से एक साथी ने यह वीडियो भड़ास4मीडिया के पास भेजा है. कुछ मिनट के इस वीडियो के जरिए आप देखकर जान सकते हैं कि अपनी भारतीय पुलिस कितनी बर्बर और अराजक है. दुनिया भर में पुलिसिंग को जनपक्षधर बनाने और न्यूनतम हिंसा के जरिए संचालित किए जाने के प्रयास जोरों पर है. लेकिन अपने देश में पुलिस ने जैसे तय कर रखा हो कि उसे तो सिर्फ डंडे के जरिए ही पुलिसिंग करनी है, बाकी कोई फंडा नहीं सीखना.

वीडियो देखने से पता चल रहा है कि एक कम उम्र के लड़के को मुंबई के पनवेल इलाके के पुलिस वाले बेतरह मार रहे हैं. दो पुलिस वालों ने उसके हाथ-पैर पकड़ कर उल्टा कर रखा है और दो-तीन अन्य पुलिस वाले लड़के की पीठ पैर आदि पर पट्टों, फट्टों, लाठियों के जरिए मारे जा रहे हैं. जब लड़का बुरी तरह चीखने लगता है तो उसे कुछ देर के लिए छोड़ते हैं और वह लड़का जाने क्या क्या बोलता रहता है. संभव है, जो युवक इन पुलिस वालों की क्रूरता का शिकार हो रहा है, उसका किसी मामले में कोई अपराध हो और पुलिस उससे कुछ पता लगाने का काम कर रही हो लेकिन क्या यही एक तरीका है पता लगाने का? और, क्यों यह पिटाई का हथियार ही गरीब लोगों पर अप्लाई किया जाता है जबकि कोई अमीर आदमी या बड़ा माफिया पकड़ा जाता है तो यही पुलिस वाले थाने में बिठाकर उसको चाय-पानी पिलाने लगते हैं. क्या पुलिस वालों का डंडा भी अमीर-गरीब के हिसाब से ही चलते हैं?

इस देश में मानवाधिकार आयोग समेत कई ऐसे संस्थान, प्रतिष्ठान, संगठन आदि हैं जो पुलिस उत्पीड़न के शिकार लोगों के लिए काम करते हैं पर ज्यादातर मामलों में गरीब व अशिक्षित लोग इन संगठनों तक पहुंच ही नहीं पाते. इसी कारण पुलिस वाले गरीबों पर अपने डंडों का बेखौफ प्रयोग करते रहते हैं. इस वीडियो के डिटेल्स नहीं पता हैं. कोई पत्रकार साथी अगर वीडियो में दिख रहे युवक व पुलिस वालों व संबंधित प्रकरण के बारे में बता सके तो इस मामले को विस्तार से जाना जा सकता है और न्याय के लिए पहल की जा सकती है. फिलहाल तो यही कहा जा सकता है कि हम भारत में रहते हुए पाकिस्तान-अफगानिस्तान में अराजक हालात को देखकर जिस तरह चिंतित होते हैं और फिर शुक्र मनाते हैं कि हम भारत में हैं जहां ऐसा कुछ नहीं होता, वह सब सिर्फ दिल को खुश रखने का खयाल भर है. अपने भारत में भी आम जन का बहुत भयंकर शोषण व उत्पीड़न होता है और अपराधी-आरोपी किस्म के पुलिसवालों का कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाता.

वीडियो देखने के लिए क्लिक करें- मुंबई में पनवेल पुलिस का कारनामा

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

संपर्क- yashwant@bhadas4media.com

करियर ग्रोथ मीटर- चेक ह्वेयर यू स्टैंड!

यह भी एक तस्वीर की कहानी है. मेल के जरिए आए दिन दिलचस्प तस्वीरें इधर-उधर बलखाती टहलती रहती हैं. उसी में एक तस्वीर यह भी है. कहानी सिंपल है. गरीब आदमी का पेट नहीं निकलता क्योंकि वह खटने में ज्यादा वक्त गंवाता है, ठीक से खाने-पीने में कम. और बड़े पद पर बैठे साहब सुब्बा लोग खा-पी कर डकार मारते हुए कुर्सी तोड़ते रहते हैं सो उनका लाद (पेट) निकल जाता है.

देखिए, आप इस तस्वीर के पैमाने पर कहां ठहरते हैं. हालांकि मेरे कई लखनवी और अन्य शहरों के मित्रों के लाद इसलिए निकल गए हैं कि वे गरीबी में भी पर्याप्त मदिरा-मांस का सेवन करते रहते हैं, यह सोचकर कि निकले हुए को अंदर करने की मुहिम कभी शुरू कर दी जाएगी लेकिन जो निकल जाता है वो अंदर कहां आता है भला. मैं भी आजकल इसी चिंतन प्रक्रिया से गुजर रहा हूं कि जो निकला है उसे कैसे समाया जाए 🙂 -यशवंत, भड़ास4मीडिया

राजीव वर्मा और शशि शेखर को टका-सा मुंह लेकर लौटना पड़ा खंडूरी के यहां से!

आजकल जिन मीडिया घरानों के पास कथित रूप से पत्रकारिता का ठेका है, वे पत्रकारों को पत्रकार नहीं बल्कि दलाल बनाने में लगे हुए हैं. वे अपने संपादकों को संपादक कम, लायजनिंग अधिकारी ज्यादा बनाकर रखते हैं. ताजा मामला हिंदुस्तान टाइम्स जैसे बड़े मीडिया हाउस का है. बिड़ला जी के इस मीडिया घराने की मालकिन शोभना भरतिया हैं. उनके हिंदी अखबार के प्रधान संपादक शशि शेखर हैं.

पिछले दिनों शशि के कंधे पर शोभना भरतिया ने एक बड़ा टास्क रख दिया. जब मालकिन ने कोई काम कह दिया तो भला संपादक कैसे ना-नुकूर करे. शोभना का आदेश मिलते ही हवा की वेग से शशि शेखर देहरादून पहुंच गए. अब जान लें कि मालकिन ने काम क्या सौंपा. दरअसल निशंक जब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हुआ करते थे तो उन्होंने मौखिक रूप से यह ऐलान कर दिया था कि राज्य में एचटी ग्रुप को डीम्ड यूनिवर्सिटी खोलने का मौका प्रदान किया जाएगा. संभवतः निशंक की कैबिनेट ने इसे पारित भी कर दिया था और अब इसे विधानसभा में पास होना था. निशंक से हिंदुस्तान, देहरादून के स्थानीय संपादक दिनेश पाठक का गहरा याराना था. दिनेश पाठक को उन दिनों सीएम निशंक के दाएं-बाएं मंडराते हुए अक्सर देखा जा सकता था. निशंक से प्रेम का फायदा दिनेश पाठक ने हिंदुस्तान अखबार को नाना रूपों में दिलवाया जिसमें एक रूप विवि खोलने की अनुमति देना भी था. और, निशंकप्रेम से अत्यधिक प्रेम के चक्कर में दिनेश पाठक ने खंडूरी से भी पंगा ले लिया था, उन दिनों खंडूरी के खिलाफ खूब खबरें छापीं.

खंडूरी ने सीएम की कुर्सी संभालते ही निशंक के भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की पहल करते हुए उनके फैसलों की समीक्षा का ऐलान कर दिया. एचटी वालों को डीम्ड यूनिवर्सिटी खोलने की अनुमति देने के कैबिनेट के प्रस्ताव का अध्ययन करने के लिए एक आईएएस अधिकारी के नेतृत्व में कमेटी बना दी. बात दिल्ली तक, शोभना भरतिया तक पहुंच गई कि उत्तराखंड में एचटी के प्रस्तावित विश्वविद्यालय पर खंडूरी सरकार पानी फेर सकती है. इसके बाद शोभना भरतिया ने अपने सीईओ राजीव वर्मा और संपादक शशि शेखर को ”आपरेशन खंडूरी” में लगा दिया. कई दिनों तक राजीव वर्मा और शशि शेखर देहरादून में पड़े रहे. इनकी दो बार मीटिंग भी खंडूरी के साथ हुई पर खंडूरी टस से मस नहीं हुए. उन्होंने कहा कि वे वही करेंगे जो राज्य के हित में होगा और नीतियों के अनुरूप होगा. उन्होंने अलग से कोई छूट या अनुशंसा करने से मना कर दिया. इसके बाद राजीव वर्मा और शशि शेखर टका सा मुंह लेकर लौट गए.

सूत्रों का कहना है कि जिस कमेटी को विवि के प्रस्ताव पर रिपोर्ट सौंपने को कहा गया, उसने इतनी कमियां प्रस्ताव में पाई हैं कि इसका नीति के तहत पास होना संभव ही नहीं है. पर शशि शेखर जुटे रहे कि वह किसी तरह से खंडूरी को मना कर काम करा लेंगे पर ऐसा हो न सका. इस पूरे घटनाक्रम के दौरान दिनेश पाठक बिलकुल हाशिए पर चले गए. सूत्रों का कहना है कि शशि शेखर की मीटिंग तक दिनेश पाठक नहीं रखवा पाए क्योंकि उनका खंडूरी व उनके लोगों से छत्तीस का आंकड़ा रहा है. इस कारण निशंक के कार्यकाल के दौरान हिंदुस्तान, देहरादून में हाशिए पर रखे गए अविकल थपलियाल को सामने लाया गया. अविकल ने अपने स्तर पर पहल कर खंडूरी से शशि शेखर की मीटिंग फिक्स कराई. इससे दिनेश पाठक की लायजनिंग के मामले में नंबर कम हो गए. वैसे दिनेश पाठक सीएम बदलने के बाद से खंडूरी की जय जय करने में भी खूब लगे हैं और सरकार परस्त खबरों को छाप छाप कर ज्यादा से ज्यादा तेल-मक्खन लगाकर खूब नंबर बटोरने की फिराक में लगे हैं पर उनकी दाल गल नहीं पा रही.

अविकल के आगे आने और ”आपरेशन खंडूरी” के कई स्टेप्स संभालने से दिनेश पाठक की कुर्सी पर खतरा मंडरा गया है. एचटी प्रबंधन को समझ में आ गया है कि जब तक दिनेश पाठक देहरादून में हिंदुस्तान की कुर्सी पर आसीन रहेंगे, खंडूरी का गुस्सा शांत नहीं होने वाला. इस तरह नए संपादक की तलाश शुरू हो गई है पर कोई ‘सूटेबल ब्वाय’ अभी नहीं मिला है. शशि शेखर और राजीव वर्मा की खंडूरी से मीटिंग और टका सा मुंह लेकर वापस लौटने की घटना की देहरादून के वरिष्ठ पत्रकारों के बीच खूब चर्चा है. जितने मुंह उतनी बातें सुनाई पड़ रही हैं. बीसी खंडूरी के कुछ करीबी लोगों से जब भड़ास4मीडिया ने बात की तो उन्होंने शशि शेखर और राजीव वर्मा के देहरादून आने व खंडूरी से मिलने की पुष्टि की और साथ ही यह भी जानकारी दी कि ये लोग विश्वविद्यालय के मसले पर ही मिलने आए थे.

उधर, एक चर्चा और भी है. लोग कह रहे हैं कि उमाकांत लखेड़ा ने शशि शेखर से अच्छा बदला लिया. उमाकांत लखेड़ा दिल्ली में हिंदुस्तान के ब्यूरो चीफ थे और शशि शेखर के कारण उन्हें हिंदुस्तान छोड़ना पड़ा था. अब लखेड़ा सीएम खंडूरी के मीडिया एडवाइजर हैं. उन्होंने अपने लेवल पर भी भरसक यह कोशिश की होगी कि शशि शेखर के काम किसी भी हालत में सीएम के लेवल से पास न हो जाएं ताकि शशि शेखर को एहसास हो सके कि मीडिया की दुनिया वाकई छोटी है और कोई छोटे पद वाला जर्नलिस्ट भी उनके सामने शेर जैसी ताकत वाला बन सकता है. शह-मात के इस खेल में फिलहाल बुरी स्थिति शशि शेखर की है. कई लोग यह भी कह रहे हैं कि खंडूरी को न पटा पाना शशि शेखर के करियर के लिए भारी पड़ सकता है. शोभना भरतिया कई मसलों के कारण शशि शेखर से नाराज चल रही हैं और अब वे नए दौर के लिहाज से नए संपादक की तलाश में हैं जिसके तहत उनकी कई लोगों से मुलाकात व बातचीत भी शुरू हो गई है. तो लोग यह मानने लगे हैं कि छह महीने या साल भर में शशि शेखर के राज का खात्मा संभव है. फिलहाल शशि शेखर के लिए देहरादून की हार एक बड़ी हार है जिसका घाव भरते भरते वक्त लगेगा.

पर ऐसे वक्त में शशि शेखर को कौन समझाए कि उन्होंने जिस तरह की अवसरवादी पत्रकारिता अबतक के अपने करियर में की है, उसका अंजाम कुछ इसी तरह का होना था. प्रधान संपादक की कुर्सी पर बैठ जाने और पीएम के साथ कई देश घूम आने से लोग महान बन जाते या बड़े पत्रकार कहलाते तो इस देश में ऐसे कृत्य करने वाले हजारों पत्रकार हो चुके हैं पर उनका कोई नामलेवा नहीं है. हां, ये जरूर है कि उन्होंने इतना पैसा कमा लिया और दिल्ली में घर-दुकान बना लिया कि उनकी कई पीढ़ियां आराम से उनके जाने के बाद भी जी-खा सकती हैं. पर यह काम तो लाला लोग भी करते हैं, किराना वाला भी करता है, फिर उनमें और पत्रकार में फर्क क्या. दरअसल दिक्कत ये है कि आजकल के बाजारू दौर में पत्रकारिता के असली मतलब को पत्रकार लोग भूल गए हैं. कोई संपादक भी नहीं जानना चाहता कि संपादक होने के असली मतलब क्या होता है. वह तो मालिक और मालकिनों का मुंह देखता रहता है कि वे क्या कहें और हम तुरंत उसके अनुपालन में लग जाएं. एक जमाने में जो काम टाइपिस्टों, पीए, चाकरों आदि का होता था, वह अब प्रधान संपादकों का हो गया है.

इसी कारण आजकल के संपादक दोहरे व्यक्तित्व को लेकर जी रहे हैं. आफिस में दलाली और समझौते की बातें करते हैं और मंचों पर, पन्नों पर नैतिकता व सरोकार की. इसी के चलते संपादकों के खाने और दिखाने के दांत अलग-अलग होते हैं. इस बात को जानते तो सब हैं और इसके प्रामाणिक उदाहरण भी आए दिन मिल जाते हैं. इस खाने-दिखाने वाले दांतों के अलग-अलग होने को नए जमाने के संपादक लोग गर्व से मल्टीटास्किंग वाला प्रोफेशनल एट्टीट्यूड कहकर स्वीकारते-बताते हैं और यह सब कहते हुए उन्हें लाज-शरम भी नहीं आती.

पर इन्हें कौन फिर से पढ़ाए कि संपादक और पत्रकार होने का मतलब आधा बागी होना होता है, होलटाइमर सरीखे जीवन को जीना होता है, मिशनरी एप्रोज से जनहित में लिखना-लड़ना होता है. जो सत्ता और सिस्टम के द्वारा हाशिए पर फेंके गए लोग हैं, जिनका कोई सुनने वाला नहीं है, जिनकी आवाज को दमदारी से उठाने वाला कोई नहीं, वैसे वंचितों-दलितों-दरिद्रों का नेता बनने, अगुवा होने, आवाज उठाने, लड़ने का काम होता है पत्रकारों का. शासन और सत्ता के करप्शन, कारोबार, जनहित विरोधी कार्यों का खुलासा करते हुए दो-दो हाथ करना होता है पत्रकारों का काम.

इस प्रक्रिया में जितने संकट आए, मुश्किल आए, उससे निपटना होता है पत्रकार का काम क्योंकि ईमानदारी व सरोकार को जीने वाले संघर्षों और मुश्किलों के संग-संग ही जीवन को जी पाते हैं और इसी में संतुष्टि पाते हैं. तो यह काम वही कर सकता है जो आत्मा और दिल से बागी हो. जिनके अंदर बिकने और झुकने की लेशमात्र भी लालसा, इच्छा न हो. जिन्हें भौतिक सुख-सुविधाएं न लुभाती हों. जो पत्रकारिता को धंधा और बिजनेस न मानते हों. तो ऐसे होते हैं असली पत्रकार लेकिन दुर्भाग्य यह कि जो पत्रकार कहे जाते हैं आजकल, वही सबसे बड़े सुविधाभोगी बनने की ओर उन्मुख हैं. जो संपादक कहे जाते हैं आजकल वही सबसे बड़े पीआर एजेंट बनने की ओर उन्मुख हैं. इसी कारण हमारे दौर में राडियाओं का काम आसान हो जाता है कि क्योंकि उसके एक फोन पर बड़े बड़े संपादक लायजनिंग और पीआर के अनमोल बोल बोलने बकने लगते हैं.

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत की रिपोर्ट. तथ्यों से असहमति और प्रतिवाद की इच्छा की स्थिति में नीचे दिए गए कमेंट बाक्स या bhadas4media@gmail.com का इस्तेमाल कर सकते हैं.

दुख को स्थायी भाव बना चुके एक शराबी का प्रवचन

यशवंत: एक शराबी मित्र मिला. वो भी दुख को स्थायी भाव मानता है. जगजीत की मौत के बाद साथ बैठे. नोएडा की एक कपड़ा फैक्ट्री की छत पर. पक रहे मांस की भीनी खुशबू के बीच शराबखोरी हो रही थी. उस विद्वान शराबी दोस्त ने जीवन छोड़ने वाली देह के आकार-प्रकार और पोस्ट डेथ इफेक्ट पर जो तर्क पेश किया उसे नए घूंट संग निगल न सका… :

दुख मेरा प्रिय विषय है. मेरा स्थायी भाव है. ज्यादातर लोगों का होगा. क्योंकि ब्रह्मांड में फिलहाल हम्हीं लोग सबसे ज्यादा सोचने, समझने, महसूस करने और कहने-बोलने वाले लोग हैं. मनुष्य जो हैं हम लोग. कोई और जीव-जानवर होते तो शायद दुख स्थायी भाव नहीं होता. कुत्ता, बिल्ली, चींटी, चिड़िया, गोजर, सांप…. सैकड़ों तरह के गैर-मनुष्य कोटि के जीवों के नाम ले लीजिए. उनके सुख-दुख के रेशियो-प्रपोर्शन के बारे में हम लोग नहीं जानते, इसलिए कह सकते हैं कि दुख उनका स्थायी भाव नहीं होगा. कई तरह के भावों के साथ वे लगातार जीते रहते हैं. भय, आतंक, दुख वाले भाव भी अन्य भावों की तरह समान या कम ज्यादा मात्रा में उनमें होंगे. पर यह तय है कि दुख स्थायी भाव नहीं होगा.

इन गैर-मानव कोटि के प्राणियों के लिए किसी एक भाव पर हर पल टिके रहना संभव नहीं है. उनकी समझने-बूझने की चेतना उतनी उन्नत नहीं है जितनी हम लोगों की है. जो कहना चाह रहा हूं यह कि मेरे जैसे दुखी आत्मा वाले लोगों के लिए कई मौके आते हैं जब दुख की धधकन कुछ घटनाओं के कारण बढ़ जाती है, भभक जाती है, पूरी तरह प्रचंड हो जाती है. उन मौकों पर सोचता ही रह जाता हूं और सोचने-समझने की प्रक्रिया इतनी गहन हो जाती है कि खुद से बेगाना हो जाने का एहसास होने लगता है. जैसे कुछ इस तरह कि मैं यशवंत देहधारी अलग हूं और जो सोच-समझ पा रहा है वह आंतरिक यशवंत कोई अलग है. देह वाले यशवंत की जरूरतें अलग है. आंतरिक सोच-समझ वाले यशवंत की जरूरतें भिन्न हैं. कई बार देह की जरूरतों से प्रेरित होकर आंतरिक यशवंत संचालित होता है पर यह बड़ा छोटा वक्त होता है. यह वही वक्त होता है जब मैं मनुष्य नहीं होता. देहधारी कोई प्राणी होता हूं.

रुपया, पैसा, मकान, सेक्स, खाना, सुरक्षा, स्वास्थ्य…. ये सब वाह्य यशवंत की जरूरतें हैं. और इन जरूरतों के लिए आंतरिक यशवंत भी परेशान होता रहता है. पर अब वाह्य जरूरतों के लिए आंतरिक को परेशान होने का वक्त कम होता जा रहा है. ऐसा नहीं कि सब ठीकठाक हो गया है. इसलिए क्योंकि वो होता तो क्या होता और वो न होगा तो क्या होगा जैसी फीलिंग बढ़ गई है. तो वाह्य जरूरतों के लिए अब अंदर वाले हिस्से को परेशान करने का मन नहीं करता. दोनों यशवंत के मिजाज-काम अलग-अलग हैं, सो दोनों को अलग-अलग सोचना-जीना करना चाहिए. यह बड़ी अदभुत अवस्था होती है.

हालांकि कई बार एक का काम दूसरे के बिना संचालित नहीं होता, सहयोग लेने की जरूरत पड़ जाती है. जैसे, आंतरिक यशवंत को सक्रिय करने के लिए यदा-कदा मदिरा की जरूरत महसूस होती है तो उस मदिरा को वाह्य यशवंत यानि देहधारी धारण करता है. तो यह अन्योन्याश्रितता है. जैसे वाह्य यशवंत को पैसे की जरूरत महसूस होती है तो उसे आंतरिक उर्जा का भी इस्तेमाल करना पड़ता है. तो यह आपसी सौहार्द है. बावजूद इन एका के, दोनों की मूल प्रकृति और काम अलग-अलग है, वो तो दुनिया इतनी बेईमान है कि दोनों को एक दूसरे के काम के लिए कई बार एक दूसरे का सहारा लेने को मजबूर करती है.

: ज़ुल्मत कदे में मेरे शब-ए-ग़म का जोश है, इक शम्मा है दलील-ए-सहर, सो ख़मोश है :

तो अब, बाहरी जरूरतों को वैसे ही लेने लगा हूं जैसे अन्य देहधारी लेते हैं. पहनने को जो मिल गया, सब ठीक है. ना पहना भी तो क्या ग़म है. खाने को जो मिल गया ठीक है. ना खाया तो क्या ग़म है. पीने को जो मिल गया ठीक है, ना पिया तो क्या ग़म है. रोने को कोई मुद्दा मिल गया तो ठीक है. ना रोया तो क्या ग़म है. हंसने को कुछ मिल गया तो हंसा, ना हंसा तो दुखी होने के लिए कई ग़म ही ग़म हैं.

दुख वो आखिरी पड़ाव है जहां आकर ठहर जाता हूं. और कहीं पर आप बार बार अंटकते हों, रुकते हों तो उस जगह से आपको प्यार हो जाता है. दुख से भी हो गया है. स्टीव जाब्स चले गए. जगजीत सिंह भी चले गए. थोड़ा बहुत विश्लेषण दिमाग ने किया और फिर तुरंत बोल पड़ा- सब चले जाएंगे. एक दिन सब चले जाएंगे. जा ही रहे हैं लगातार. करोड़ों वर्षों से लोग जा रहे हैं. हर कोई जो जिंदा है, अपने अगले चालीस-पचास साठ सत्तर अस्सी नब्बे सौ साल में चला जाएगा. जाना उतना ही बड़ा स्थायी भाव है जितना दुख है. कह सकते हैं कि इस नकारात्मक दृष्टि के कारण मुझे वो नहीं दिख रहा है जो पाजिटिव है, आधी खाली है गिलास या आधी भरी की तरह.

जा रहे हैं लोग तो उससे ज्यादा मात्रा में आ रहे हैं. दुख है तो सुखों के हजार गुना ज्यादा कारण भी हैं, और मौके भी. सच है ये. पर उन रहस्यों के पार न जा पाने का दुख है कि ये लोग जाते कहां हैं, आते कहां से हैं. और क्यों आते हैं, क्यों जाते हैं. आखिरी सच क्या है. असीम प्रेम और असीम आनंद कहां है. दुखों को न समझ पाने की दुर्बुद्धि से कैसे पार पाया जाए… इन रहस्यों के ओरछोर समझने के लिए गौतम बुद्ध से पहले भी लाखों संत-साधक-मनीषी-ऋषि हुए और उनके बाद भी. सबके अपने-अपने तर्क, जीने और सोचने को लेकर. पर आदमी का रोना बंद नहीं हुआ. लोग जाते हैं तो लोग रोते हैं. कुछ लोगों के लिए ज्यादा लोग रोते हैं. कुछ लोग बिना किसी को रुलाए रुखसत हो जाते हैं.

स्टीव जाब्स गए तो उनकी सफलताओं की कहानी के बीच कुछ दाग-धब्बे दिखे तो मन वहीं अटक गया. स्टीव जाब्स जिन हालात में धरती पर आए, बिन ब्याही मां और पिता के संभोग के कारण, वही  कृत्य स्टीव जाब्स ने किया, एक बिन ब्याही लड़की से संभोग कर बच्चा पैदा किया. शादी-ब्याह ब्रह्म की लेखी नहीं है, खुले और बौद्धिक समाज में इसकी जरूरत कम से कमतर होती जाती है. लेकिन पता नहीं क्यों, अपन के संकुचित भारतीय दिमाग में यह बात टंग गई कि जैसा स्टीव जाब्स के मां-पिता ने किया और वैसा ही स्टीव जाब्स ने किया, वह ठीक न था. पर थोड़ा ठहरकर सोचता हूं तो लगता है कि इतने छोटे-छोटे ठीक और सही के पचड़े में अगर मैं फंस रहा हूं तो दिक्कत मेरी है. और ऐसी फच्चड़ों, फंसान से उबरते रहना चाहिए अन्यथा मेंटल ग्रोथ रुक जाएगी और कब हम चेतन की जगह गोबर हो जाएंगे, पता ही नहीं चलेगा. चलिए, ऐसी सोच रखने के लिए स्टीव जाब्स से सारी.

स्टीव जाब्स की महानत की गाथा हर कोई गाता रहा, कारपोरेट से लेकर आम बुद्धिजीवी तक, पर अभी तक केवल मैं नहीं समझ पाया कि स्टीव जाब्स ने जो क्रांति की, उसमें उनका मकसद मुनाफा पाना नहीं, लाभ कमाना नहीं तो और क्या था. क्या उनकी कथित क्रांति दुनिया के आम लोगों तक पहुंची? जिनके हाथ में आईपैड आ गया वो स्टीव जाब्स की महानता को समझ गया. पर जिनके हाथ वे एप्पल नहीं लगे, वो भला स्टीव जाब्स को क्या समझे-माने!

मतलब, आपकी महानता और आपका ओछापन भी क्लास के हिसाब से तय होता है. स्टीव जाब्स ने कोई सोशल काम नहीं किया. उन्होंने पैसे को किसी सामाजिक या पर्यावरणीय या मनुष्यता के भले के काम में नहीं लगाया. हां, वे खुद निजी जीवन में ज्यादा प्रयोगधर्मी, रचनाशील, संघर्षशील और विजनरी थे. पर समाज-देश-मनुष्य से कटकर यह कोई गुण कोई खास गुण तो नहीं! ऐसे न जाने कितने स्टीव जाब्स कारपोरेट कंपनियों में, मल्टीनेशनल कंपनीज के रिसर्च एंड डेवलपमेंट विंग में काम कर रहे हैं, अविष्कार कर रहे हैं और एक दिन सिधार जा रहे हैं. उन सभी का कुछ न कुछ योगदान है पर अंत में देखता हूं तो पाता हूं कि सतत महान खोजों-अविष्कारों के बावजूद ज्यादातर मनुष्यों के दुखों के आवेग में कमी नहीं आई है, हां तरीके में जरूर कमी आई होगी. तो स्टीव जाब्स एक इंडिविजुवल वर्कर, कारपोरेट लीडर के रूप में गजब के लगे पर ज्योंही सोशल कनसर्न पर आते हैं, उनका योगदान शून्य टाइप का ही लगा.

काश, कितना अच्छा होता जो स्टीव जाब्स ने दुनिया भर के आम लोगों को एप्पल फ्री में खिला दिया होता. यह बहस पुरानी है कि फ्री में क्यों, फ्री में किसलिए. समाजवाद या पूंजीवाद. कौन सा वाद अच्छा वाद…. और हर छोटी छोटी बड़ी बड़ी ऐसी बहसें एक समय के बाद कई लोगों के लिए अनसुलझी रह जाती हैं, उसी तरह जैसे आजतक यह हल नहीं हुआ कि सच्चाई की वैश्विक जयघोष के बावजूद दुनिया में मुनाफा आधारित, पूंजी आधारित, मुद्रा आधारित सिस्टम ही अघोषित रूप से वैल्यू सिस्टम क्यों बना हुआ है.

पूंजी आधारित वैल्यू सिस्टम जब अघोषित रूप से दुनिया का वैल्यू सिस्टम बन चुका है तो फिर हमें इसे घोषित, संवैधानिक रूप में मानने-बताने में क्या दिक्कत और क्यों नहीं हम खुला ऐलान कर देते हैं कि पूंजी ही अंतिम सच है, इसलिए हे गरीबों, अब नियम-कानून-संविधान वगैरह भूलो, पूंजी के लिए मरो-जियो. हालांकि बिना कहे हो भी यही रहा है. पर दुनिया के हुक्मरानों ने सच को एकरूप में नहीं पेश किया है. सच को अपने मुट्ठी में भींच रखा है और सच की लोक परिभाषा संविधानों, पोथियों, नैतिकताओं के जरिए लोगों में व्याख्यायित-प्रचारित कर दी है.

ज्यादातर लोगों के लिए जीने लायक स्थितियां नहीं क्रिएट हो पा रही हैं, तनाव, दुखों, अवसादों के ढेर लगे हैं हर एक की खोपड़ी पर लेकिन दुनिया ने मरने को गैरकानूनी कह दिया है. पेट भरने के लिए पैसे देने की, रोजगार देने की व्यवस्था नौजवानों के लिए नहीं की गई, वे जब छीनने लगते हैं, लूटने लगते हैं तो उन्हें लुटेरा कहकर मुठभेड़ में मार देते हैं. थोड़ा हटकर, थोड़ा धैर्य से सोचिए. क्या दुनिया में कुछ भी गलत लगता है आपको? गलत-सही की ठेकेदारी अलग-अलग देशों में अलग-अलग लोगों को दे दी गई है और सबने अपने अपने कबीले के नियम-कानून बना रखे हैं, अपनी अपनी सुविधा के हिसाब से. पर हर जगह एक कामन सच है कि कबीलों में अमीर और गरीब होते हैं और ये अमीर-गरीब अपने कर्म से नहीं, अपने पास पाए जाने वाले मुद्रा की मात्रा से नामांकित होते हैं.

मैं खुद को तकनीक फ्रेंडली आदमी मानता हूं, इसलिए स्टीव जाब्स के जीवन को रोचक, प्रेरणादायी और महान मान लेता हूं. पर अगर मैं तकनीक फ्रेंडली नहीं होता तो स्टीव जाब्स का दुनिया से जाना उसी तरह का होता जैसे मेरे पड़ोसी गांव का कोई अपरिचित घुरहू भाई दमे की किसी घनघोर बीमारी से अचानक एक दिन विदा ले लेता और फोन से कुछ महीनों बाद बातों बातों में कोई गांववाला दोस्त बता देता कि अरे वो घुरहूवा मर गया.

: फ़िक्र-ए-दुनिया में सर खपाता हूं, मैं कहां और ये वबाल कहां :

जगजीत सिंह के चले जाने पर ऐसा लगा कि कोई अपने घर का चला गया है. मिडिल क्लास के डाक्टर कहे जाने वाले जगजीत सिंह की आवाज और उनकी गाई गई लाइनों के जरिए करोड़ों भारतीयों ने अपने अवसादों, अपने दुखों, अपने अकेलेपनों का इलाज किया है, विचित्र स्थितियों को जस्टीफाई किया है, ग़मों को सहज रूप से लेने की आदत डाली है. जैसे गांव के किसी आम आदमी के लिए एक लोकधुन उसे दिन भर के दबावों-तनावों से मुक्त कर देती है, उसी तरह किसी लोअर मिडिल क्लास, मिडिल क्लास और शहरी आदमी के लिए जगजीत की आवाज व लाइनें क्षणिक मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती है. वह अपने दुखों को महिमामंडित होते देख खुश हो जाता है. वह अपने दुख में ग़ालिब जैसा दुख देखने लगता है और दुखों की इस अदभुत एका के आधार पर वह अंदर से समाज-लोगों से दूर होते जाते हुए भी ज्यादा नजदीक पाने लगता है क्योंकि उसे लगने लगता है कि विशाल दुखों को जीने वाले लोग दुखीजन नहीं, बल्कि बड़े आदमी होते हैं. मुझे भी कई बार ऐसी गलतफहमी होती है.

और इस तरह जगजीत जैसे लोगों की आवाज के पास करीब रहते हुए हम एकाकीपन से बच जाते हैं, अवसाद से उबर जाते हैं. लेकिन इस प्रक्रिया में हम दुख को स्थायी भाव बनाने-मानने लगते है. हर शख्स उम्र के एक मोड़ पर अपनी मौत के बारे में खुद के अंदर से बतियाते हुए एक आमराय कायम कर लेता है. उसके बाहर की देह और अंदर का व्यक्ति जिस दिन मौत पर एक हो जाते हैं, वह व्यक्ति दुख को स्थायी भाव बना लेता है और जीने लगता है. जब आप किसी चीज को स्थायी भाव बना लेते हैं तो उससे उबर चुके होते हैं क्योंकि वह हर पल आपके पास रहता है इसलिए उस पर अलग से चिंता करने की कोई जरूरत महसूस नहीं होती. लेकिन जो लोग इसे टालते, भगाते, गरियाते, समझाते रहते हैं, वे बीच-बीच में गहरे डिप्रेसन में उतरने लगते हैं. अचानक से बेचैन हो जाया करते हैं. बहुत कुछ सोचने विचारने लगते हैं. यहां वहां जहां तहां तक पहुंच जाते हैं. और आखिर में पस्त होकर सो जाते हैं. नींद न आने पर न सोना, खूब जगना भी नींद आने की राह को बनाता है. उसी तरह बहुत सोचने, बहुत विचारने और अंतहीन मानसिक कूद-छलांग लगाने के बाद ‘अनिर्णीत पस्त जीत’ हाथ में आ ही जाती है जिसमें ‘अनिर्णय’ और ‘पस्त’ का भाव दबा हुआ, सोया हुआ होता है सो कथित जीत के मारे हम तात्कालिक अवसाद, आवेग से उबरते हुए महसूस होते हैं.

अब जबकि दुख स्थायी भाव बन चुका है तो किसी के मरने जीने पर वैसा आवेग उद्विग्नता निराशा दुख क्षोभ अवसाद नहीं आता जैसा कुछ महीनों के पहले आया करता था. इस नयी डेवलप मानसिकता को मजबूत करने का काम एक छोटी घटना ने भी किया. दरवाजे को पैर से जोर से मार कर खोलने की कोशिश करने जैसी फुलिश हरकत के कारण अपने पैर के अंगूठे में हेयरलाइन फ्रैक्चर करा बैठा. डाक्टर ने प्लास्टर लगाया और तीन हफ्ते तक पैर को धरती से छुवाने से मना किया. सो, जरूर कार्यों के लिए चलने हेतु कांख में दबाकर चलने वाली लाठी का सहारा लेना पड़ा और एक पैर के सहारे कूद कूद कर बाथरूम-टायलेट के लिए चलना पड़ा. शुरुआती दो तीन दिन बेहद कष्ट में गुजरे. इस नई स्थिति के लिए मेरा मन तैयार नहीं था. पर डाक्टर की सलाह पर अमल करना था और अपने बेहद दर्द दे रहे अंगूठे के फ्रैक्चर को सही करना था, सो नसीहत के सौ फीसदी पालन के क्रम में धीरे-धीरे मन को इस हालात के अनुरूप ढलने को मजबूर होना पड़ा.

शुरुआती दो-तीन दिन बीत गए तो मैं शांत सा होता गया. दिन भर सोया बैठा. और रात में दारू. दारू का जिक्र आया तो बता दूं कि दर्जनों बार छोड़ने की बात कही, की, पर हर बार उसे पकड़ने को मजबूर हुआ. बिना इसके सूने व दुखदाई दिखते जीवन में कोई रंग, कोई दर्शन नहीं दिखता. पैर देखने के लिए घर आने वालों में एक नाम अमिताभ जी का भी है. आकर उन्होंने पैर पर चर्चा कम की, मेरे दारू प्रेम पर ज्यादा हड़काया. मैं निरीह और फंसे हुए बच्चे की तरह उनकी हां में हां, ना में ना करता रहा. और अगले दिन दोपहर से ही शुरू हो गया. तब उन्हें फोन करके उसी दिव्यावस्था में बताया कि आपका दारू पर भाषण देना मुझे ठीक नहीं लगा, इसीलिए आज दोपहर से ही शुरू हो गया हूं. वे बेचारे क्या कहते. घोड़ा को नदी तक ले जाने का काम घुड़सवार कर सकता है, उसे पानी पीने के लिए मजबूर नहीं कर सकता. हालांकि अगले दिन सुबह उन्हें मैंने एक एसएमएस भेजकर कहा कि आज से छोड़ रहा हूं और उस आज से छोड़ने के वादे को तीन दिनों तक निभा पाया.

: तूने क़सम मैकशी की खाई है ‘ग़ालिब’, तेरी क़सम का कुछ ऐतबार नहीं है :

अब फिर पीने लगा हूं. चाहता हूं पहले की तरह रोज रोज पीना पर रोज रोज पीने का दिल नहीं करता. और, पीने का सिलसिला, कई लोगों के बीच आनंदित-आप्लावित-आह्लादित होने का सिलसिला भी दुहराव देने लगता है, वैसे में सूनेपन अकेलापन कई बार अच्छा लगता है क्योंकि इसके जरिए कुछ नया माहौल मिलता है. कई बार सोचता हूं कि जो लोग नहीं पीते होंगे, वे कितने दुर्भाग्यशाली लोग होते होंग कि हर शाम उनकी जिंदगी में एक सी होती होगी, बेहद बोर और उबाऊ-थकाऊ. न पीने वाले हर शाम क्या करते होंगे, यह सोचने की कोशिश करता हूं तो लगता है कि वे वही करते होंगे जो मैं न पीने वाली शाम करता हूं. यानि थोड़ा ज्यादा सामाजिक हो जाना. खाना पकाने लगना. बच्चों से उनकी पढ़ाई के बारे में बात करना. किसी से मिलने जुलने परिवार के साथ निकल जाना. कोई फिल्म देख लेना. किसी को घर पर बुलाकर उनसे बतिया लेना. कुछ सरकारी या आफिसियल काम निपटा लेना. कोई उपन्यास या कहानी या लेख वगैरह लिख देना.. और इन सबसे क्या होता है….

खैर, पियक्कड़ों के लिए दुनिया पैदा होने व मरने के बीच के दौरान खेल-तमाशे से भरी होती है और ना पीने वालों के लिए यह दुनिया पैदा और मरने के बीच में बेहद सफल या महान बन जाने के लिए जुट जाने की होती है, सो सबकी अपनी भावना, सबकी अपनी मनोकामना. दारू को लेकर कोई जिद नहीं है. जो ना पीता है, उसके ना पीने के दस अच्छे तर्क होते हैं और उन तर्कों से डेमोक्रेटिक स्प्रिट के साथ सैद्धांतिक रूप से सहमत रहता हूं. और, पीने वालों के अपने जो दस रंजोगम होते हैं, उनसे व्यावहारिक रूप से सहमत रहता हूं. कोई बुरा नहीं है. केवल देखने वालों के नजरिए में फर्क होता है.

एक शराबी मित्र मिला. वो भी दुख को स्थायी भाव मानता है. जगजीत की मौत के बाद एक दिन साथ बैठे थे. नोएडा की एक कपड़ा फैक्ट्री की खुली छत पर. उसी छत पर मांस पक रहा था और उसकी भीनी खुशबू के बीच शराबखोरी हो रही थी. वो दोस्त जीवन त्यागने वाली देह के प्रकार और पोस्ट डेथ इफेक्ट पर बोलने लगा- ”जग को जीत लो या जग में हार जाओ, दोनों को अंजाम एक होता है. फर्क बस ये होता है कि जग के जीतने वालों के जाने पर जग में शोर बहुत होता है जिससे दुखी लोगों की संख्या बढ़ जाया करती है जिससे पूरी धरती पर निगेटिव एनर्जी ज्यादा बढ़ जाया करती है और जो जग में हारा हुआ जग से जाता है तो उसकी चुपचाप रुखसती धरती के पाजिटिव एनर्जी के माहौल को छेड़ती नहीं. तो बोलिए, महान कौन हुआ. जो जग को रुला जाए या जो जग को एहसास ही न होने दे कि ये गया कि वो गया.”

उस विद्वान शराबी के तर्क को दारू के एक नए घूंट के साथ पी जाने को मन था, पर वह गले से नीचे सरका नहीं. सोचने लगा… कि कहीं दुनिया का बड़ा संकट यह बकबक ही तो नहीं है. जिसो देखो वो बकबक का कोई एक कोना थामे पिला पड़ा है. कोई कश्मीर के भारत से अलग होने की संभावना की बात कहे जाने पर पगलाया हुआ हमला कर रहा है तो कोई सारा माल गटककर भी खुद के निर्दोष होने का कानूनी व संवैधानिक तथ्य-तर्क गिनाए जा रहा है, कोई बंदूकधारियों की सुरक्षा से लैस होकर शांति का पाठ पढ़ा रहा है तो कोई शांति के नाम पर संस्थाबद्ध हत्याएं करा रहा है. कोई रुपये के मोहजाल में न फंसने की बात कहकर खुद को मालामाल किए जा रहा है तो कोई नशे से दूर रहने का उपदेश देकर देश में ब्लैक में नशा बिकवा रहा है. कोई पार्टी करप्शन में लीन होने के बावजूद करप्शन के खिलाफ रथ-अभियान चलाने में लगी है तो कोई दंगे कराकर खुद को निर्दोष-अहिंसक बता रहा है.

पर ठीक से देखिए, थोड़ा उबरकर सोचिए, थोड़ा शांत-संयत होकर मन को बांचिए तो पता चलेगा कि इस ब्रह्मांड के अनगिनत वृत्ताकार खेल-तमाशों के एक छोटे से वृत्त में हम भी कैद हैं और उस वृत्त को हम सिर से लेकर पैर तक से नचा नचा कर कुछ कहने समझाने की कोशिश कर रहे हैं पर दूसरा आपका सुनने कहने के दौरान अपना भी सुनता कहता रहता है और इस तरह अरबों-खरबों जीव जंतु प्राणी जड़ चेतन मनुष्य अपनी अपनी दैहिक-मानसिक सीमाओं के भीतर नाच रहे हैं, कह रहे हैं, रो रहे हैं, पुकार रहे हैं, हंस रहे हैं, सो रहे हैं, मर रहे हैं, पनप रहे हैं और कारोबार चल रहा है. जीवन का कारोबार. धरती का कारोबार. ब्रह्मांड का कारोबार. किसी कोने में कोई बाढ़ में फंसा मर रहा है तो कोई भूख से दम तोड़ रहा है तो कोई सुख की बंशी बजा रहा है तो कोई कांख-पाद रहा है…

बिखरे जाल को अब बटोरते हैं. फिर क्या माना जाए. क्या किया जाए. क्या सोचा जाए. कैसे रहा जाए. क्या कहा जाए. क्या सुना जाए. कैसे जिया जाए… बहुत सवाल खड़े होते हैं. माफ कीजिए. मैं अभी इन सवालों के जवाब तक नहीं पहुंचा हूं. पर इतना कह सकता हूं कि पहले फैलिए. खूब फैलिए. सांचों, खांचों, विचारों, वृत्तों, सोचों, वर्जनाओं, कुंठाओं, अवसादों… के माध्यम से इन्हीं से उपर उठ जाइए. जैसे पोल वाल्ट वाला खिलाड़ी लाठी के सहारे लंबी छलांग लगाकर लाठी को पीछे छोड़ देता है. जब तक उदात्तता को नहीं जीने लगेंगे, जानने लगेंगे तब तक जो हम करेंगे कहेंगे जियेंगे वह औसत होगा, किसी और की नजर में हो या न हो, खुद की नजर में औसत होगा. और जिस दिन खुद को आप खुद के औसत से उच्चतर ले जाने की सोच में पड़ जाएंगे, कुछ न कुछ नया करने लगेंगे, और स्टीव जाब्स के शब्दों में ”स्टे हंग्री, स्टे फुलिश” की अवस्था में रहकर बहुत कुछ कर पाएंगे. तड़प होना दूसरों को बेहतर करने की, एक ऐसी खोज, एक ऐसी यात्रा की शुरुआत कराती है जिस पर हम तमाम बाहरी दिक्कतों, दिखावों, दुनियादारियों के बावजूद चलते रहने लगते हैं.

और संक्षेप में बात कहना चाहूंगा ताकि अमूर्तता खत्म हो और बातें साफ साफ समझ में आएं. आप जैसे भी हों, अपनी मानसिक ग्रोथ के लिए प्रयास करें वरना अटक जाएंगे किसी गैर-मनुष्य जीव के बौद्धिक स्तर पर और फंसे हुए टेप की तरह रिपीट मारकर बजने लगेंगे जिससे बहुतों को सिरदर्द होगा और आखिर में आपको भी माइग्रेन या साइनस की दिक्कत हो जाएगी. जब आप खुद की मेंटल ग्रोथ करते, पाते हैं तो अपने अगल बगल वालों को भी खुद ब खुद बहुत कुछ दे देते हैं जिससे उनकी ग्रोथ होती रहती है. अभी बड़ी दिक्कत बहुतों की चेतना के लेवल के जड़ होने की है. जीवन स्थितियां ऐसी क्रिएट की गई हैं, सिस्टम ऐसा बनाया गया है कि बहुत सारे लोग मनुष्य की देह में जानवर जैसी सोच-समझ रखते हैं जिस कारण समाज और देश-दुनिया में बहुत सारे विद्रूप देखने को मिलते हैं जिससे हमारे आपके मन में दुख पैदा होता है.

यह हालत सिर्फ कम बुद्धि वालों को पैसे दे देने से भी खत्म नहीं होगीं. पैसा का इस्तेमाल हर कोई अपनी बुद्धि विवेक के अनुसार करता है. बहुत ज्यादा बुद्धि रखने वाला कमीना आदमी पैसा बटोरकर विदेश के बैंक में रख देगा. बहुत कम बुद्धि वाला पैसा बटोरकर कई बीघे खेत खरीद लेगा और बाकी का दारू-मुर्गा में लगा देगा. तो पैसे से हालात नहीं बदलने वाले. हालात बदलेंगे जब हम शिक्षा को टाप प्रियारिटी पर रखें और एजुकेशन में पढाई गई बताई गई पवित्र चीजों, पवित्र भावना के अनुरूप सिस्टम को चलाएं-बढ़ाएं-बनाएं. पढ़ने और करने में जो हिप्पोक्रेसी है, जो भयंकर उलटबांसी है, वह अंततः पढ़े लिखे को बेकार और चोर-चिरकुट को समझदार साबित करता है. आजकल का माहौल ऐसा ही है. जिसने पढ़ लिखकर सत्ता का हिस्सा बनकर खूब चोरी कर ली, वह बड़ा आदमी और जो ईमानदारी से काम करे वह सड़ा आदमी. कुछ ऐसी हालत है आजकल की.

: बेख़ुदी बेसबब नहीं ‘ग़ालिब’, कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है :

विद्रोह और प्रेम. ये दो शब्द लगते अलग अलग हैं, पर हैं एक ही सिक्के के दो पहलू. सच्चा प्रेम वही कर सकता है जो विद्रोही हो. जो विद्रोही होता है वह सच्चा प्रेमी होता है. विद्रोही केवल अपने लिए नहीं जीता. वह अपने जैसी स्थितियों में रहने वालों का प्रतिनिधि होता है. मतलब वह बहुत सारे लोगों के लिए आगे बढ़कर नेतृत्व करता है, लड़ता है जड़ता से. तो वह उन सबसे प्रेम करता है जो हाशिए पर किए गए हैं,  वंचित किए गए हैं. वह सच्चा प्रेमी है. और जो सच्चा प्रेमी है वह लड़ता है अपने प्रेम के लिए, अपने हक के लिए, अपने सिद्धांत के लिए. बिना प्रेम किए विद्रोह संभव नहीं है. विद्रोही प्रेम ना करे, यह असंभव है. यह चरम अवस्था है. यही उदात्तता है. इसी में आनंद है.

स्टीव जाब्स और जगजीत सिंह के न रहने के बहाने अपने दुख-सुख-सोच-समझ की जो नुमाइश की है, उससे भले ही आपके कुछ काम लायक ना मिले पर मैं यह सब लिखकर कुछ ज्यादा उदात्त और संतोषी महसूस कर रहा हूं खुद को. मुझे खुद के उलझे हुए होने को सुलझाने के लिए कई बार मदिरा, तो कई बार कागज कलम, तो कई बार संगीत तो कई बार जादू की झप्पी लेने-देने की जरूरत महसूस होती है… और इसी तरह का हर किसी का होता है कुछ न कुछ. दुख का स्थायी भाव बनना विद्रोह की निशानी होती है. और, विद्रोही ही दुखों से ताकत खींच-सींच पाते हैं. सो, अपने स्थायी-तात्कालिक दुखों से दुखी होने के दिन नहीं बल्कि उससे ताकत लेकर मजबूत होने के दिन हैं, उदात्त होने के दिन हैं, ताकि शब्द, तर्क, शोर के परे के असीम आनंद को जीते-जी महसूस कर सकें हम-आप सब.

अपने प्रिय ग़ालिब साहिब की उपरोक्त कई जगहों पर कुछ एक लाइनों के बाद अब आखिर में, यहां चार लाइनों को छोड़ जा रहा हूं गुनने-गुनगुनाने के लिए…

तुम न आए तो क्या सहर न हुई
हां मगर चैन से बसर न हुई
मेरा नाला सुना ज़माने ने
एक तुम हो जिसे ख़बर न हुई

(सहर यानि सुबह, बसर यानि गुजर-बसर वाला बसर और नाला यानि रोना-धोना शिकवा-गिला-शिकायत)

((हैदाराबाद में रह रहे बुजुर्ग पत्रकार भरत सागर जी से कहना चाहूंगा कि आपकी उस एक लाइन वाली मेल से इतना भारी भरकम लिख बैठा जिसमें आपने अनुरोध किया था- ”Jagjeet Singh par aapko sun ne ki tamanna thi !” पता नहीं क्या लिखा और कैसा लिखा, लेकिन हां, जो भी लिखा, आपके कहने के कारण लिखा क्योंकि मैं ठहरा भड़ास का क्लर्क जो दूसरों के लिखे को ही छापते देखते जांचटे काटते पीटते थक जाता है, सो, अपना भला कब और क्यों लिख पाएगा. भरत सागर जी मेरा प्रणाम स्वीकारें और मैं उनके लिए लंबी उम्र व अच्छी सेहत की कामना करता हूं. -यशवंत))

लेखक यशवंत भड़ास4मीडिया से जुड़े हुए हैं. उनसे संपर्क yashwant@bhadas4media.com के जरिए किया जा सकता है.

शातिर-खुर्राट दलालों का हाथ और एक संवेदनशील पत्रकार की किताब

यशवंत: एक होने वाले आयोजन के बहाने आज की मीडिया पर भड़ास : आज जो जितना बड़ा दलाल है, वो उतना ही धन-यश से मालामाल है. आज जो जितना बड़ा दलाल है, सत्ता-बाजार में उसका उतना बड़ा रसूख है. आज जो जितना बड़ा दलाल है, लालची-तिकड़मी मिडिल क्लास की नजरों में उतना ही बड़ा विद्वान है.

और, ऐसे ही कथित यशस्वी, रसूखदार, विद्वान आजकल दिल्ली में भांति-भांति के आयोजनों की शोभा बढ़ाते फिरते हैं. पर दुख तब होता है जब कोई ठीकठाक पत्रकार इन दलालों के बहकावे में आकर इन्हें अपना मुख्य अतिथि या नेता या परम विद्वान मान लेता है. आईबीएन7 में कार्यरत और टेलीविजन के वरिष्ठ पत्रकार हरीश चंद्र बर्णवाल अच्छे पत्रकारों में शुमार किए जाते हैं. विनम्र, पढ़े-लिखे, समझदार, संवेदनशील और सरोकार को जीने वाले हरीश ने हाल-फिलहाल एक किताब का उत्पादन किया है. नाम है- “टेलीविजन की भाषा”.

इस किताब का जोरदार विमोचन कराने के चक्कर में हरीश लोकार्पण समारोह में ऐसे-ऐसों को बुला बैठे हैं कि कोई संवेदनशील आदमी अपने मन से तो उस समारोह में जाने से रहा. हां, नौकरी बजाने की मजबूरी, दलालों के नजदीक जाने की इच्छा, कुछ हासिल कर लेने की लालसा और तमाशा देखने का आनंद उठाने वाले जरूर वहां भारी मात्रा में पहुंचेंगे. यह कार्यक्रम 8 अक्टूबर को दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में आयोजित किया गया है. किताब का विमोचन अमलतास हॉल में सुबह 11 बजे किया जाएगा. अब आप जान लें कि इसका विमोचन कौन करेंगे.

इस किताब का विमोचन टीवी न्यूज इंडस्ट्री के दिग्गज कहे जाने वाले पत्रकार राजदीप सरदेसाई करेंगे. ये वही राजदीप सरदेसाई हैं जिन्होंने नोट-वोट कांड की सीडी को पानी के साथ निगल कर अपने पेट में कहीं पचा लिया था और दुनिया इन पर थू थू करती रही लेकिन इन्हें उबकाई आजतक नहीं आई तो नहीं आई. स्टिंग वाली सीडी घोंटकर बैठे इस पत्रकार को लोग दिग्गज कहें तो कहें पर इस सीडी घोंटू कांड के कारण राजदीप की टीआरपी भयंकर गिरी है और उन पर हर कोई शक करने लगा है. तो ये महाशय हरीश के किताब का विमोचन करेंगे. अब जानिए, इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कौन होंगे. मुख्य अतिथि होंगे संसदीय कार्य राज्य मंत्री राजीव शुक्ला.

दलाल शिरोमणि राजीव शुक्ला आजकल के हर बाजारू पत्रकार के रोल माडल हैं. एक आम पत्रकार से केंद्रीय मंत्री तक का सफर. एक आम पत्रकार से मीडिया मालिक बनने तक का सफर. एक आम पत्रकार से सत्ता के गलियारे का सबसे पसंदीदा चेहरा बनने का सफर. इन राजीव शुक्ला के मुख्य आतिथ्य में हरीश अपनी किताब को पत्रकारिता के बचवा लोगों के लिए पेश कराएंगे. बचवा टाइप पत्रकार इस किताब से भले कुछ सीखें या न सीखें, राजीव शुक्ला से दलाली और राजदीप सरदेसाई से सीडी घोंट लेना जरूर सीख लेंगे.

पुस्तक विमोचन के इस कार्यक्रम के बहाने टेलीविजन न्यूज चैनलों के कई संपादक एक साथ एक मंच पर जमा होंगे. मुख्य वक्ताओं में प्रभु चावला का भी नाम शामिल है. प्रभु चावला के बारे में कुछ कहना खुद अपने मुंह पर थूकने के समान है. इनके तमाम तरह के कांड यहां-वहां बिखरे मिलेंगे. आलोक तोमर पर्याप्त मात्रा में इनकी शिनाख्त उजागर करने वाले सुबूत छोड़ गए हैं. इनके बारे में ज्यादा चर्चा करना अपना और आपका वक्त खराब करना है. चूंकि न्यूज चैनल कारपोरेट्स के हाथों के खिलौने हैं, सो इन जैसों की न्यूज चैनलों-बड़े अखबारों में बहुत पूछ रहती है क्योंकि इनकी पूंछ की पहचान नेताओं, नौकरशाहों, उद्यमियों, गैंगस्टर्स से लेकर मिडिलमैनों तक को बखूबी रहती है, सो इस पहचान का फायदा ये न्यूज चैनलों और अखबारों के मालिकों को गाहे-बगाहे दिलाते रहते हैं और इसी कारण मालिकों के प्रियपात्र बने रहते हैं.

जिस आयोजन में उपरोक्त उद्धृत ‘विद्वान’ आने को तैयार हों तो कई छोटे-मोटे विद्वान खुद ब खुद अपने पैरों से चलकर आने को तैयार हो जाते हैं. जिन अन्य लोगों के यहां आने की सूचना प्रेस रिलीज के जरिए दी गई है, उनके नाम हैं- आज तक के न्यूज डायरेक्टर नकवी, स्टार न्यूज के एडिटर इन चीफ शाजी जमा, IBN7 के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष, जी न्यूज के एडिटर सतीश के सिंह, इंडिया टीवी के मैनेजिंग एडिटर विनोद कापड़ी, न्यूज 24 के मैनेजिंग एडिटर अजित अंजुम. इसके अलावा इसमें प्रिंट के भी कई विद्वान संपादक शामिल होंगे. जिन कुछ नामों का पता चला है, वे इस प्रकार हैं- अंग्रेजी अखबार पायनियर के संपादक, मैनेजिंग डायरेक्टर चंदन मित्रा, दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर श्रवण गर्ग और नवभारत टाइम्स के ग्रुप एडिटर रामकृपाल सिंह.

आयोजन के बारे में आई प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है कि– ”हरीश बर्णवाल की किताब ‘टेलीविजन की भाषा’ टेलीविजन न्यूज चैनलों पर पहली ऐसी किताब है, जिससे टीवी न्यूज इंडस्ट्री के व्यवहारिक ज्ञान को पाया जा सकता है. इस किताब में स्क्रिप्टिंग को लेकर बारीक से बारीक चीजों का भी ख्याल रखा गया है. किताब को पढ़ने के बाद टेलीविजन की दुनिया न सिर्फ टेलीविजन के अभ्यर्थियों के लिए बहुत आसान हो जाएगी, बल्कि पेशेवर पत्रकारों को भी मदद मिलेगी. ये किताब राजकमल प्रकाशन दिल्ली में उपलब्ध है.”

प्रेस विज्ञप्ति में किताब खरीदने के लिए राजकमल की मेल आईडी और फोन नंबर भी दिए गए हैं. पर कांट्राडिक्शन ये कि किताब और लेखक, दोनों स्वयं में पवित्र होने के बावजूद पत्रकारों व पाठकों तक पहुंचने की यात्रा गलत लोगों के गिरोह में प्रवेश करके प्रारंभ कर रहे हैं. हो सकता है यह संवेदनशील पत्रकार हरीश की करियर संबंधी कोई मजबूरी हो या बाजार में बड़ी हलचल पैदा करके किताब के जरिए ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की राजकमल की कोशिश. पर इतना तय है कि कारपोरेट के हाथों बिकने के इस दौर में किताब लेखन और उसके विमोचन जैसे पवित्र कार्यों में भी वर्ग भेद पैदा हो गया है और इनमें भी कारपोरेट खेल और नान-कारपोरेट खेल खुले तौर पर दिखाई देने लगा है.

एक तरफ वे लेखक और उनकी किताबों का विमोचन जिनके पास संसाधन नहीं, नामी प्रकाशक नहीं और अच्छे संपर्क नहीं. दूसरी तरफ वे लेखक जो नामी प्रकाशक, अच्छे संपर्क और ठीकठाक संसाधन के साथ लेखकीय पारी शुरू करते हैं और पहली ही गेंद पर छक्का मार देते हैं. हरीश को उनकी किताब मुबारक. पर मैं पत्रकारिता के शिशुओं से यही कहना चाहूंगा कि टीवी और भाषा को किताबों के जरिए नहीं, जीवन के जरिए जाना जा सकता है. आप हरीश की किताब जरूर पढ़ें पर उस किताब से कितने सबक हासिल किए, यह हम सबको जरूर बताइएगा. और उन टीवी पत्रकारों से भी पूछना चाहूंगा जो आज चैनलों में ठीकठाक पोजीशन पर नौकर हैं कि वे किस किताब को पढ़कर टीवी में नौकर-चाकर बनने के लिए घुसे और आज सफलतापूर्वक नौकरी-चाकरी करके अच्छी पगार पा रहे हैं.

दरअसल भाषा एक दिन में हत्थे चढ़ने वाली चीज नहीं और टीवी एक दिन में समझ में आना वाला डब्बा नहीं. दोनों को साधने की जरूरत पड़ती है. और खासकर भाषा की साधना तो पत्रकारिता की डिग्री लेने के बाद कतई नहीं शुरू होती. इसकी शुरुआत कायदे से प्राइमरी से, नर्सरी से हो जाती है जो हाईस्कूल, इंटर, बीए-बीएससी करते हुए परवान चढ़ती है. पत्रकारिता में डिग्री लेने के दौरान तो बच्चे एक ऐसे चंगुल में फंस जाते हैं जहां उनकी पत्रकार बनने की इच्छा का कदम-कदम पर दोहन किया जाता है. सबसे पहले पत्रकारिता शिक्षा देने वाला संस्थान लूटता है, फिर कई तरह के लोग थोड़ी बहुत मात्रा में लूटते रहते हैं जिसमें प्रकाशक, बड़े पत्रकार, मीडिया संस्थान, कुख्या संपादक, टीवी के नाम के ट्रेनर, जाब दिलाने वाले मिडिलमैन, समझाने पढ़ाने वाले शिक्षक, कंसल्टेंसी देने वाले भाई लोग… आदि कई कुत्ते-सूअर बीच में हैं.

हर टीवी वाले ने अपनी दुकान खोल रखी है. टीवी पत्रकार बनाने के नाम पर अकादमी खोलकर लड़कों को लूट रहे हैं. यह फ्री का धंधा है. ना हींग लगे ना फिटकरी रंग चोखा ही चोखा. जब ये लड़के यहां से निकलते हैं तो इनसे लंबे समय तक मुफ्त में काम कराया जाता है और जब ये प्रमोशन करने की बात करते ही उन्हें बाहर किसी दूसरे जगह तलाशने या फिर सदा के लिए जाने को कह दिया जाता है.

बढ़िया भाषा ज्ञान और तकनीकी समझ के बावजूद कई नए पत्रकारों को नियुक्ति पत्र नहीं दिया जाता क्योंकि टीवी न्यूज इंडस्ट्री में जितने लोगों की जरूरत है, उससे कई सौ गुना ज्यादा लोग डिग्री लेकर नौकरी पाने को हाजिर रहते हैं. इस डिमांड-सप्लाई में भारी अंतर के कारण हजारों युवाओं के सपने टूट जाते हैं. वे न पत्रकार बन पाते हैं और न पेट पालने भर की आमदनी पाने वाले नौकर. हां, इस बेरोजगारों की फौज से कई अन्य लोग बैठे-बिठाए महान जरूर हो जाते हैं. टीवी के मठाधीशों के पांव छूने वाले और बिना वजह प्रणाम करने वालों की संख्या हजारों में हो जाती है. सोचिए, आपकी हमारी बेरोजगारी कई लोगों के मठाधीश बने रहने का कारण है. संभव है, इन्हीं में से कोई बेरोजगार एक दिन किसी मठाधीश के सिर पर जूता ठोंक दे, उसी तरह जैसे कांग्रेसियों पर जूता फेंकने का दौर चल निकला.

पत्रकारिता में आने वाले देहाती बैकग्राउंड के आदर्शवादी नौजवानों को कहना चाहूंगा कि यह दलालों और मगरमच्छों की दुनिया है, एक बार फंसे तो गए. यहां मजे लेने के लिए आओ, दलालों-मठाधीशों-मगरमच्छों को समझने-बूझने के लिए आओ, पत्रकारिता करने का जज्बा लिए मत आना. और हां, जीवन यापन के लिए रंडियों की दलाली से लेकर रामनामी बेचने तक का काम कर लेना क्योंकि दोनों काम में अंदरुनी अदृश्य पाप कुछ नहीं है, जो कुछ है सामने है, पर कारपोरेट के हाथों बिके न्यूज चैनलों और अखबारों के जरिए पत्रकारिता मत करना. सच लिखना है, सच को समझना है तो अपना ब्लाग बनाओ, वेबसाइट बनाओ और शौकिया पत्रकारिता करो. पेट पूजा के लिए कोई और धंधा कर लो. यह चलेगा. क्योंकि आने वाले वक्त में पत्रकारिता की लाज ऐसे शौकिया पत्रकार ही बचाएंगे, जिनके कंधों पर आज पत्रकारिता का भार हम देख रहे हैं, वे साले जाने कबके दलाल हो चुके हैं और अब पत्रकारिता की मां-बहिन करने के बाद इसके कफन तक को बेचने लगे हैं.

असहमति के बावजूद हरीश बर्णवाल और उनकी किताब, दोनों को बधाई. उगते सूरज को सलाम करने का ट्रेंड हमेशा से पूरी दुनिया में और हर तरह के समाज में रहा है. आजकल जो टीवी संपादक हैं, वे बुढाएंगे, रिटायर होंगे तो उनकी जगह हरीश जैसे साथी ही संपादक बनेंगे और समाज व बाजार में संतुलन साधने की बाजीगरी करेंगे. सफलता हर कीमत पर का मंत्र जिन लोगों ने अपना लिया है, उनके फेल होने की आशंका कम रहती है. दिक्कत उनको होती है जो सफलता और समाज में सामंजस्य बिठाने की कोशिश करते हैं. जो सफलता समाज के लोगों का खून पीने की कीमत पर नहीं चाहते.

पर इतनी बारीकियों में कौन जाता है. लोग ‘सफल’ होकर पकड़े जाने पर जेल जाना ज्यादा पसंद करते हैं, असफल होकर बिना चर्चा वाली मौत मरना नहीं. शार्टकट का दौर है. और शार्टकट की प्रक्रिया में समाज और समाज के गरीब-गुरबे, गंवई-देहाती, गांव-जवार वाले कट जाते हों तो कटते रहें, शायद उनकी नियति या उनके भाग्य में ऐसा हो. सफलता अमीरी गरीबी दरिद्रता को भाग्य और नियति से जोड़ने वाले लुटेरे कारपोरेट्स को बारीकी से समझने का दौर शुरू हो चुका है. और, दुनिया के कई देशों की जनता इस लूट को समझने के बाद सड़कों पर आ चुकी है. अमेरिका में हुआ हालिया प्रदर्शन इसका गवाह है. कई और देशों में यह दौर है. भारत के लोग ज्यादा भावुक और देर तक बर्दाश्त करने की क्षमता रखने वाले होते हैं इसलिए वे बौद्धिक बातों और लूट आदि को आखिर में समझते हैं.

न्योता

आप सभी को आयोजन में जाना चाहिए, भले ही तमाशाई बनकर आनंद लेने को जाएं. लेकिन वहां से लौटकर जरूर लिखना-बताना कि पूरे आयोजन को देखने-सुनने के बाद पत्रकारिता को लेकर किस तरह का फीलगुड या फीलबैड हुआ. मैं भी आउंगा, आनंद लेने और आप लोगों का साथ देने. मेरे यहां मन की भड़ास निकालने से किसी को दुख हुआ हो ता माफी चाहूंगा क्योंकि मेरी मंशा किसी को पीड़ा पहुंचाना नहीं. पर दिल की भड़ास निकालने के दौरान अगर कोई पीड़ित होता है तो इसकी परवाह भी मैं नहीं करता क्योंकि भड़ास का जन्म हर किसी को खुश करने को नहीं बल्कि उनकी बात रखने को हुआ है जो बाजार और पावर से खदेड़े गए लोग हैं, जो सत्ता-सिस्टम के पीड़ित हैं, जो बेरोजगार हैं, जो गरीब-दलित हैं, जो शहरी सभ्यता के मारे हुए हैं…. ऐसे लोगों को करीब पाकर, ऐसे लोगों की बात रखकर मुझे ज्यादा खुशी होती है तुलना में उनके जो भरे पेट वाले, माल-नोट वाले और रावणमयी दर्प से आप्लावित हो मचलने वाले हैं.

आखिर में कहना चाहूंगा कि टीवी की भाषा को जरूर समझिए पर उस भाषा को जो टीवी न्यूज चैनलों को संचालित करती है, इनके मुनाफे की भाषा को, इनकी टीआरपी की भाषा को, इनके कारपोरेट्स के हाथों खिलौने बने रहने की भाषा को, इनके लूटने और फिर साधु बनकर कीर्तन करने की भाषा को… जब इन भाषाओं को समझ जाएंगे तो आपको इन स्वनामधन्यों के खेल तमाशे भी समझ में आने लगेंगे वरना तो सब कुछ हरा भरा है क्योंकि आप और हम सावन के अंधे हैं….

जय हो.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

yashwant@bhadas4media.com

इस पागल, नंगे व खतरनाक शख्स को पुलिस ने मारकर क्या गलत किया?

: देखें सीसीटीवी फुटेज और अन्य वीडियो : सतना (मध्य प्रदेश) की घटना याद होगी. न्यूज चैनलों पर बार-बार दिखाया गया. एक मानसिक रूप से बीमार आदमी को पुलिसवालों द्वारा मिलकर सरेराह पीटा जाना. और इसी के चलते उस आदमी की मौत हो जाना. पिटाई की सीन को जिसने भी देखा, उसने पुलिसवालों को जमकर गालियां दी और देश में अंग्रेजी राज जैसे पुलिस दमन की कल्पना की.

पर इस घटनाक्रम का दूसरा पहलू भी है. जिसे मानसिक रूप से बीमार बताया जा रहा है, वह आदमी एक दुकान में बड़ी-सी हंसिया लेकर घुसता है और दुकानदार के गर्दन के आसपास ले जाकर उसे कत्ल कर देने की धमकी देता है. वह दुकान के टेबल आदि पर चढ़ जाता है. वह हाफ पैंट और बनियान निकालकर पूरी तरह नंगा हो जाता है और नंगा होने के बाद फिर हंसिया लेकर दुकानदार को कत्ल करने की धमकी देता है. दुकान में मौजूद लोग चिल्लाने लगते हैं. यह सब दृश्य एक वीडियो में कैद है. दुकान में लगे सीसीटीवी कैमरे में सब कुछ कैद है. इस फुटेज को कुछ लोगों ने भड़ास4मीडिया के पास भेजा है, एक पत्र लिखकर. पत्र यूं है-

Dear Yashwant ji

Namaskaar

As discussed about the matter over phone please find below two videos. It is clear that the famous “mentally challenged” person was about to KILL a jewellery shop owner and was even moving around in the market of Satna (M.P.) with a sickle & baton in his hand & could have harmed/killed other people if the Police has not reached on time. The public & the business community is in favour of the Police Action but this fact is being hidden by the popular news channels in order to gain fake TRP & mislead the public without probing about the real matter which lead to such a Police action.

As a responsible Police Officer Mr. B.S. Jaggi controlled the situation by first catching the accused person & then to put a psycological pressure on him he used some force to calm-down this guy. But a local News Channel & other popular channels in order to defame the Police Officer only showed HALF TRUTH where only the Police is shown as beating the person but the FULL TRUTH of the nuisance created by that person is deliberately not shown….It was done just to gain TRP but the result is that the diligent & responsible Police Officer – Mr. B.S. Jaggi, Kotwali Incharge, Satna was suspended without even trying to know the real story.

I request your intervention in the matter & request JUSTICE for the Police Officer for his efforts in controlling the person by the medium of your MEDIA which will open the eyes of others & show them what RESPONSIBLE JOURNALISM means….Hope to get your support in the matter on urgent basis.

Thanx & Regards,

Varinder

जिन सज्जन ने ये पत्र भेजा है, उन्हें मैं नहीं जानता. उनका फोन आया तो उन्होंने सारी बात बताई. मीडिया पर आरोप लगाया कि एकतरफा कवरेज करके पुलिस वालों का मनोबल डाउन किया गया और पुलिस वालों को सस्पेंड करा दिया गया. मैंने उनसे वीडियो और डिटेल भेजने को कहा. नीचे तीन वीडियो के लिंक दिए जा रहे हैं. पहला वीडियो सीसीटीवी फुटेज है जिसे देखकर कोई भी कह सकता है कि इस पागल आदमी को दुकान के भीतर ही गोली मार देनी चाहिए, प्राण रक्षा के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए. दूसरे वीडियो में दुकान के बाहर पुलिस, जनता और पागल आदमी के दृश्य हैं. पर इस दूसरे वीडियो में पुलिस द्वारा पीटे जाने के सीन को कम-कट कर दिया गया है.

तीसरा वीडियो स्टार न्यूज पर प्रसारित खबर है, जिसमें पुलिस वाले उस पागल को पीटते दिख रहे हैं. तीनों वीडियो के देखने के बाद मुझे यही लगता है कि उस पागल आदमी ने जो कुछ किया, वह बहुत खतरनाक था, कई लोगों की जान ले सकता था वह. पर पुलिस वाले भी पागल हो जाएंगे, यह कतई उम्मीद न थी. पुलिस वालों को उस व्यक्ति को लोकल नागरिकों की मदद से पकड़कर बांधकर थाने ले जाने चाहिए था और किसी इलनेस सेंटर वगैरह में भर्ती करा देना चाहिए या किसी पागलों के डाक्टरों से उसे दवा-इंजेक्शन वगैरह दिलाकर काबू में कर लेना चाहिए था. इसकी बजाय पुलिस ने सारे नियम कानूनों को ताकपर रखकर अपने आखिरी ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया, दे दनादन मारना शुरू कर दिया. यह बिलकुल गलत, निंदनीय और अलोकतांत्रिक है.

इन पुलिसवालों को निलंबित किया जाना छोटा सा दंड है. कायदे से इन्हें नौकरी से बर्खास्त कर देना चाहिए क्योंकि उन्होंने पागल आदमी को कंट्रोल करने के नाम पर खुद को और पूरे पुलिस विभाग को पागल साबित कर दिया है. एक मानसिक रूप से विक्षिप्त और खतरनाक दिख रहे आदमी को पांच-दस पुलिसवाले मिलकर कंट्रोल नहीं कर सकते तो ये किसी शातिर शूटर से मुठभेड़ में कैसे जीत पायेंगे. आखिर क्यों पुलिस वाले छोटी-मोटी घटनाओं में भी आपा खोकर लाठी-डंडा लेकर टूट पड़ते हैं, इन्हें क्यों नहीं समझ में आता कि बल प्रयोग हर हालत में अंतिम विकल्प होना चाहिए और वह भी सीमित मात्रा में.

किसी को मारने, जेल भेजने या फांसी पर लटकाने का फैसला देने का काम करने के लिए अदालतों की व्यस्था इसीलिए है. अगर अदालतों का काम भी पुलिस वालों ने ले लिया है और तालिबानियों की तरह सड़क पर फैसला करने लगे हैं तो फिर इस देश का भगवान मालिक. प्रोग्रेसिव और माडर्न पुलिसिंग के लिए हमारे देश की सरकारें भी कुछ नहीं करतीं, यह दुर्भाग्यपूर्ण है. कैसे अपराधियों को हैंडल किया जाए, कैसे उन्हें पकड़ा जाए, कैसे उनसे निपटा जाए… इसको लेकर शिक्षण-प्रशिक्षण और जागरूरकता का काम लगातार करते रहना चाहिए. पर सरकारें पुलिस विभाग को पालतू और दिमागविहीन बनाकर रखने में ही खुश रहती हैं क्योंकि ऐसा रखकर सरकारें अपने गलत-सही कानून विरोधी काम इन्हीं पुलिसवालों से बिना ना नुकूर के करा लेती हैं.

सतना की घटना पूरे देश के पुलिसवालों के लिए नसीहत है. सबक है. पुलिस वालों को एक बार फिर अपने मैनुवल, नियम-कानून पढ़ने चाहिए और स्मार्ट पुलिसिंग के लिए खुद के स्तर पर पहल करना चाहिए. वर्दी पहन लेने का मतलब किसी पर भी डंडा चला देना नहीं होता है. वर्दी पहनने का मतलब चीजों को इंटेलीजेंट तरीके से टैकल कर समाज में सुख शांति कायम रखना होता है. सतना में पुलिस वालों ने सड़क पर जिस तरह से पीट पीटकर एक पागल आदमी को मार डाला, उसे देखकर कई संवेदनशील लोगों को डिप्रेशन हो गया होगा. यह सच है. क्योंकि हम पढ़े लिखे लोग यह कतई उम्मीद नहीं करते कि अपने भारत देश में कहीं भी तालिबानियों का राज हो. पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आए दिन खबरें आती हैं कि किस तरह वहां पुलिसवालों ने निर्दोष युवकों को घेरकर गोली मार दी, सड़क पर ही तालिबानियों ने (अ)न्याय कर दिखाया.. आदि आदि. तब वह सब देखकर लगता है कि चलो अच्छा है, हम लोगों का देश, हम लोगों की व्यवस्था उनसे ज्यादा मेच्योर और डेमोक्रेटिक है. पर सतना जैसी स्थितियां देखकर लगता है कि नहीं, हम लोग गलत हैं. हमारे यहां भी सिस्टम में पागलों की भयंकर भरमार है.

हां, इस मामले में मीडिया ने यह गलती जरूर की है कि उसने सिर्फ पुलिसवालों द्वारा पीटे जाने का ही दृश्य दिखाया. मीडिया को पागल आदमी के कारनामों को भी दिखाना चाहिए था. सीसीटीवी फुटेज को भी प्रसारित करना चाहिए था. आम लोगों के रिएक्शन को भी दिखाना चाहिए था, भले ही वे आम लोग पुलिस कार्रवाई का समर्थन कर रहे हों. और, मीडिया को वरिष्ठ विश्लेषकों की राय को भी प्रसारित करना चाहिए था. तब जाकर इस प्रकरण के जरिए मीडिया पूरे देश के दर्शकों और पुलिसवालों को ट्रेंड, जागरूक और सचेत कर पाता. पर टीआरपी के भूखे न्यूज चैनलों को चेतना और जागरूकता से क्या लेना देना. वे तो एक ही सीन को बार बार दिखाते रहेंगे और दर्शकों में जुगुप्सा, उत्तेजना पैदा करते रहेंगे. मीडिया के इस एकतरफा और सनसनीखेज रवैये की भी हम लोग भर्त्सना करते हैं.

तीनों वीडियो देखने के लिए इन शीर्षकों पर क्लिक करें-

सीसीटीवी फुटेज : दुकान में

दुकान के बाहर का हालचाल

स्टार न्यूज पर चली खबर

मैंने अपनी बात रख दी. संभव है, मैं गलत होऊं. यह एक बड़ा मुद्दा है जिस पर बात होनी चाहिए. अगर आप अपने विचार रखेंगे तो अच्छा रहेगा. नीचे दिए गए कमेंट बाक्स का सहारा ले सकते हैं या फिर bhadas4media@gmail.com पर मेल भेज सकते हैं.

यशवंत

एडिटर, भड़ास4मीडिया

bhadas4media@gmail.com

जर्नलिस्टों की ब्लैकमेलिंग के विरोध में पूरी तरह बंद रहा एक कस्बा

यशवंत: मीडिया करप्शन के खिलाफ स्थानीय लोगों का ऐतिहासिक विरोध : बाजारू मंडी में रंडी मीडिया के दलालों के कारण ये दिन देखने होंगे : क्या आपने कभी सोचा था कि एक दिन कोई शहर या कस्बा इसलिए बंद रखा जाएगा क्योंकि वहां के लोग पत्रकारों की ब्लैकमेलिंग से पूरी तरह परेशान हो चुके हैं. मीडिया करप्शन इतना बढ़ जाएगा कि इसके खिलाफ बंद तक का आयोजन होने लगेगा, ऐसी कल्पना किसी ने न की होगी.

पुलिस के खिलाफ बंद का आयोजन होता रहता है. नेताओं के खिलाफ बंद का आयोजन होता रहता है. अफसरों के खिलाफ बंद का आयोजन होता है. उद्योगपतियों के खिलाफ बंद का आयोजन हो जाता है. पर मीडिया के खिलाफ कभी कहीं बंद का आयोजन नहीं हुआ. मीडिया को जनता के साथ, जनता के लिए काम करने वाला स्तंभ माना जाता है. पर परम बाजारू मंडी वाले इस दौर में मीडिया ने खुद को इस कदर रंडी बना लिया है कि वह जनता की गोद से निकलकर भ्रष्ट नेताओं, भ्रष्ट अफसरों और भ्रष्ट उद्योगपतियों की गोद में जाकर बैठ गई है. इस कारण मीडिया का चरित्र बदल गया. उसका काम घपले-घोटाले उजागर करना और जनता की तकलीफों-दुखों के लिए लड़ना नहीं रह गया. मीडिया का काम हो गया घपलों-घोटालों को न छापने के नाम पर पैसे लेना. मीडिया का काम जन मानस को डरा-धमका कर पैसे वसूलना हो गया.

ऐसे हालात में जाहिर है कि मार्केट मंडी में रंडी हुई मीडिया के ढेर सारे दलाल पत्रकार उसी तरह आम जनता को चूसेंगे, शोषण करेंगे जैसे भ्रष्ट नेता, भ्रष्ट अफसर और भ्रष्ट उद्यमी करते हैं. इस हालत में एक न एक दिन जनता के धैर्य का जवाब दे जाना स्वाभाविक है. यही हुआ उत्तरी कर्नाटक के मुढोल कस्बे में. यहां 20 सितंबर को स्थानीय निवासियों ने बाजार, दुकान, दफ्तर, कारोबार, परिवहन सब बंद रखा. इस ऐतिहासिक बंद का आयोजन ”ब्लैकमेल जर्नलिज्म” के खिलाफ किया गया. लोगों का कहना है कि पत्रकारों की संख्या बहुत ज्यादा हो गई है और लुटेरे-लफंगे तक पत्रकार बन गए हैं जिनका एकमात्र काम लोगों को डरा धमका कर उगाही करना है.  जो इन्हें पैसे नहीं देता, उसको ये लोग तरह तरह से परेशान पीड़ित प्रताड़ित करते रहते हैं.

कर्नाटक के एक दैनिक अखबार प्रजा वाणी ने इस बंद के बारे में लिखा कि मीडिया के खिलाफ यह ऐतिहासिक बंद पूरी तरह सफल रहा. करीब एक लाख नागरिकों वाले इस कस्बे में मीडिया विरोधी बंद का असर जबरदस्त था. दुकानों और प्रतिष्ठानों के शटर गिरे रहे. सड़कों पर गाड़ियां नहीं चलीं. विरोध प्रदर्शन करने वालों में स्थानीय नेताओं, किसानों के साथ-साथ कई जर्नलिस्ट भी थे. सैकड़ों की संख्या में लोगों ने मार्च किया और तहसीलदार के आफिस जाकर उन्हें ज्ञापन सौंपा. विरोध प्रदर्शन करने वाले एक शख्स का कहना था कि कई साप्ताहिक अखबार अपनी हरकतों के कारण पूरे मीडिया प्रोफेशन को बदनाम कर रहे हैं. इसी तरह कुछ लोग आरटीआई के जरिए उगाही का काम करके आरटीआई एक्ट की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े कर रहे हैं.

कर्नाटक के मुढोल कस्बे के लोगों ने जो रास्ता दिखाया है, उस रास्ते पर देश के कई अन्य कस्बे और शहर चल पड़ेंगे, इतना तय है. पत्रकारों की दिन प्रतिदिन बढ़ती संख्या, ब्लैकमेलिंग की दिन प्रतिदिन बढ़ती घटनाएं, मीडिया मालिकों द्वारा किसी भी प्रकार से रेवेन्यू जनरेट करने के लिए दिया जाने वाला दबाव, जीवन यापन के लिए पत्रकारिता को उगाही का जरिया बनाना, पेड न्यूज के जरिए नेताओं-व्यापारियों से सौदेबाजी करना… इन सब चीजों से अंततः आम लोगो में मीडिया के प्रति भरोसा खत्म होगा और लोग पत्रकार को देखते ही उसी तरह दायें बायें सरकने लगेंगे जैसे आजकल पुलिस वालों को देखकर करते हैं. मीडियावाले जब उगाही और ब्लैकमेलिंग की हद पार कर देंगे तो लोग सड़कों पर उतरने और बंद आयोजित करने को मजबूर हो जाएंगे. फिलहाल तो मीडिया के लगातार गर्त में गिरने पर लगाम लगने-लगाने के दूर-दूर तक कोई आसार नहीं हैं क्योंकि जब तक भ्रष्ट राजनीति नहीं खत्म होगी, मीडिया में से भ्रष्टाचार को खत्म कर पाना मुश्किल है.

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह की रिपोर्ट. उनसे संपर्क yashwant@bhadas4media.com के जरिए कर सकते हैं.

एक शराबी का अपराधबोध

: मेरी भोपाल यात्रा (1) : भोपाल से आज लौटा. एयरपोर्ट से घर आते आते रात के बारह बज गए. सोने की इच्छा नहीं है. वैसे भी जब पीता नहीं तो नींद भी कम आती है. और आज वही हाल है. सोच रहा हूं छोड़ देने की.

कल रात भोपाल में पीकर जो कुछ हुआ, उसके बाद से तो मैं हिल गया हूं. मैंने होटल में ज्यादा पी ली और अपना मोबाइल तोड़ डाला, शर्ट फाड़ दिए, गिलास वगैरह तोड़ डाले, पुलिस आ गई और बवाल न करने को समझा गई, बहुत ड्रामा हुआ… इतनी पी ली कि बेचैनी के मारे वोमिटिंग होने लगी.. सुबह 11 बजे जगा… आज दिन भर अपराधबोध और ग्लानि से जूझता रहा.. उसी कारण ज्यादा काम कर रहा हूं ताकि वह प्रकरण भूल सकूं, अपराधबोध और ग्लानि से मुक्त हो सकूं… पीने के बाद आत्महंता आस्था जग जाती है और सेल्फ किलिंग एट्टीट्यूड डेवलप हो जाता है.. बिन पिए भी संसार की निस्सारता और जीवन के रुटीनी होने का भाव बना रहता है पर पीने के बाद तो सब साफ साफ समझ में आने लगता है और तब कई बार खुद पर और कुछ एक बार दूसरों पर गाज गिराता हूं… दुआ करें और संबल दें कि इस बार छोड़ दूं…

अपने प्रिय पत्रकार अवधेश बजाज का लंबा इंटरव्यू कर पाया और उनके साथ बैठकर जमकर दारू पी सका… ह्विस्पर्स इन दो कारिडोर डाट काम के संस्थापक सुरेश जी से मिल आया… आलोक तोमर जी के नाम पर 25 हजार रुपये का एवार्ड घोषित हो सका… यह सब उपलब्धि है भोपाल यात्रा की. भोपाल के पत्रकार बहुत प्यारे और मेहनती हैं. कई साथियों से मिला. सबने सम्मान-प्यार दिया. लगा नहीं कि मैं सबसे पहली बार मिला. सभी पत्रकार साथियों का आभारी हूं. एसपी त्रिपाठी, अनुराग अमिताभ, प्रवीण, अनुराग उपाध्याय, लोकेंद्र, सत्यनारायण वर्मा, पुष्पेंद्र सोलंकी, अरशद भाई, विनय डेविड… दर्जनों लोगों से मिला. भोपाल यात्रा पर विस्तार से लिखूंगा..

कल ही क्षमावाणी पर्व बीता है. अपनी गल्तियों को मान लेने और कह देने से मन हलका हो जाता है और आत्मा शुद्ध रहती है. सो, अपने दिल की बात लिख रहा हूं. पत्रकार अवधेश बजाज से मिलकर संसार और समाज से दुखी मेरा मन और ज्यादा दुखी हो गया था क्योंकि अवधेश बजाज उस पत्रकार का नाम है जिसने भ्रष्ट सिस्टम और भ्रष्ट पत्रकारिता से सौदा-समझौता नहीं किया, सो धीरे धीरे सबसे कटता गया और दारू पी पीकर खुद को नष्ट करते गए. दुनिया की नजर में यह नष्ट होना होता है लेकिन अवधेश बजाज जैसों की नजर में यह सहज होना है. इतना सड़ांध है पूरी व्यवस्था में कि अगर आप ज्यादा संवेदनशील हैं और चीजों को बहुत गहरे तक पकड़ देख पा रहे हैं तो आपका जीना मुहाल हो जाएगा. हार्ट फेल हो जाएगा या दिमाग की नस फट जाएगी. अगर आप कीचड़ के पार्ट नहीं हैं तो आपको उसके खतरे उठाने पड़ेंगे. अवधेश बजाज बहुत शराब पीते हैं, यह दुनिया जानता है. कई बार अस्पताल में रह आए. अब वो कहते हैं कि दो साल से ज्यादा उम्र नहीं बची है.

45 साल का यह जवान इतना सैडिस्ट हो गया है कि उनकी बातें सुन सुनकर मुझे अंदर से लगता रहा कि बिलकुल सच कह रहे हैं बजाज साहब. अवधेश बजाज सच्चाई और ईमानदारी को कहते ही नहीं, उसे जीते भी हैं. इसी कारण अवधेश बजाज से लोग डरते हैं क्योंकि जो खरा, खांटी, सच्चा होता है उसका वाइब्रेशन कम लोग झेल पाते हैं. लंबे इंटरव्यू के बाद उसी शाम अवधेश बजाज जी के साथ जमकर मदिरा पान किया. वे पूरी बोतल लेकर मेरे होटल चले आए. मैंने उन्हें खूब प्यार किया. किस किया. पैर पकड़े. जीवन की निस्सारता पर बतियाते रहे. खूब भजन गाए.

किसी बात पर वो भी रोए और मैं भी. जीने की इच्छा खत्म होने का भाव पैदा हुआ. और इसी सब के दौरान जाने कब अचानक चीजों को तोड़ने फोड़ने लगा, समझ में ही नहीं आ रहा. बजाज साहब सब देखते झेलते रहे. मैंने जिद की कि पान खाऊंगा, वे अपनी गाड़ी से ले गए और पान खिलाकर होटल छोड़ा. बड़े भाई सा प्यार दिया और एक दिन की मुलाकात ने हम दोनों के दिलों को इस कदर जोड़ दिया कि लग ही नहीं रहा कि मैं बजाज साहब से पहली बार मिला हूं. पर सोकर सुबह उठा तो टूटा मोबाइल फटे शर्ट देखे तो खुद से पूछता रहा कि ऐसा क्यों किया मैंने, तो जवाब आया… अंदर कोई चीज बहुत गहरे फंसी है.. सामान्य अवस्था का छिपा रहने वाला सतत कायम डिप्रेशन मदिरापान के बाद उग्रता में बदल जाता है. शायद मन में यह भी भाव था कि बजाज साहब, आप अकेले नहीं मर रहे हैं, हम सब धीरे धीरे मर रहे हैं, आप साहसी हो जो खुलकर पीते हो और मजे से जीते हो, साथ ही, मरने की तारीख तय कर रखे हो पर हम लोग डरपोक हैं, न ठीक से पी पाते हैं और न सही से जी पाते हैं और मौत से हर पल घबराते हैं. ज्यादातर लोगों का यही हाल है.

भोपाल के कुछ पत्रकार साथियों के साथ यह ग्रुप फोटो पत्रकार साथी अनुराग अमिताभ ने क्लिक किया. किसी ने इसे फेसबुक पर अपलोड किया. वहीं से साभार.

ब्यूरोक्रेसी और कारपोरेट जगत में बेहद चर्चित वेबसाइट ह्विस्पर्स इन द कारीडोर डाट काम के संस्थापक और प्रधान संपादक सुरेश मेहरोत्रा  जी से मिलने उनके निवास पहुंचा. बेहद सरल-सहज सुरेश जी दिल खोलकर मिले. चलते चलते मैंने उनके पैर छू लिए. इस शख्स ने कई साल पत्रकारिता करने के बाद अपना काम शुरू करने की हिम्मत की और चार साल तक बिना किसी लाभ के डटा रहा. अब दुनिया इन्हें सलाम करती है.

ह्विस्पर्स इन द कारीडोर डाट काम की सफलता का सारा श्रेय सुरेश मेहरोत्रा जी साईं बाबा को देते हैं. अपनी कुर्सी के ठीक उपर टंगे साईं बाबा को मेहरोत्रा जी अपना सीएमडी बताते हैं और कहते हैं कि जो कुछ भी होता है, सब उनके आदेश से होता है.

तेजस्वी पत्रकार अवधेश बजाज से मैंने लंबा इंटरव्यू किया. तरह तरह तरह के सवाल पूछे. यह तस्वीर खींची भोपाल के मेरे पत्रकार मित्र अरशद ने. अरशद ही मुझे अपनी गाड़ी में बिठाकर अवधेश बजाज जी के यहां ले गए.

अवधेश बजाज अपने घर के बाहर. साथ में खड़ा है उनका गनमैन. कलम के जरिए भ्रष्ट नौकरशाहों, नेताओं और उद्यमियों की खाल खींच लेने वाले और इन सबों के लिए दहशत के पर्याय अवधेश बजाज को उनकी जान का खतरा मानते हुए सरकार ने गनमैन मुहैया कराया है.

रात को अवधेश बजाज उस होटल आए जहां मैं रुका था. कमरे में शराबखोरी के दौरान ब्लाग-वेब और वर्तमान पत्रकारिता पर भी चर्चा होती रही. रिफरेंस के लिए कई बार इंटरनेट व लैपटाप का सहारा लिया गया. उसी क्रम में लैपटाप पर कुछ पढ़ते अवधेश बजाज.

तो संभव है, कहीं मेरे अवचेतन में यह भी रहा होगा कि सेल्फ किलिंग एट्टीट्यूड के जरिए अवधेश बजाज को दिखा सकूं कि देखिए, इधर भी वही हाल है. तोड़फोड़ करने में कांच गड़ गया एक उंगली में और खून बहा. शायद मैंने खून से अवधेश बजाज से अपनी दोस्ती का तिलक किया. उनका मुरीद तो पहले से ही था, उनके बारे में सुन सुन कर, लेकिन मिलकर उनका प्रशंसक बन गया, उसी तरह वाला जैसा आलोक तोमर जी का बना. अपने लंबे इंटरव्यू के दौरान अवधेश बजाज ने दो प्यारी सी कविताएं सुनाईं. उन्हें अपलोड कर रहा हूं. उसे सुनने के लिए क्लिक करें….

अवधेश बजाज की दो कविताएं

शराबखोरी की अपनी बढ़ती लत से परेशान मैं जब पीछे मुड़कर पाता हूं तो समझ में आता है कि शराब पीने के बाद मैं पूरी तरह से अराजक और असामाजिक प्राणी हो जाता हूं. पिछले महीने राजेंद्र यादव के बर्थडे की पार्टी थी. वहां इतनी दारू पी की मुझे कुछ होश नहीं कि मैं क्या कह कर रहा हूं. अचानक मुझे देर रात पार्टी वाले लान में लगा कि सारे लोग गायब हो गए हैं और मैं व कुछ वेटर साथी रह गए. तब समझ में आया कि पार्टी तो खत्म हो गई. अपनी कार में ड्राइविंग सीट पर बैठा तो मेरे थके पैर ब्रेक एक्सीलेटर आदि दबाने से इनकार कर रहे थे, मतलब गाड़ी चलाने की स्थिति में नहीं था. तब आयोजक को फोन किया कि मुझे घर भिजवाएं. कुछ वेटरों ने मुझे पकड़कर नींबू पानी कई गिलास पिलाए. कुछ घंटे बाद मैं अपनी ही कार से इधर उधर भटकते भिड़ते अपने घर पहुंचा. अगले दिन सुबह भी भयंकर अपराधबोध. यह क्यों करता हूं. मुझे समझ में आता है कि मदिरा मैं नियंत्रित करके पी ही नहीं सकता. पीने लगता हूं तो पीता ही चला जाता हूं, सब्र नहीं होता. एक्सट्रीमिस्ट लोगों का स्वभाव होता है कि वे हमेशा अतियों में जीते हैं. या तो इधर या उधर. या तो खूब पिएंगे या फिर पूरी तरह छोड़ देने का ऐलान कर देंगे. मध्यम मार्ग इन्हें स्वीकार नहीं होता. ऐसे लोगों को यह भी लगता है कि वे जीयें तो क्या, मरें तो क्या… न पिएं तो क्या, पीते रहें तो क्या… मतलब, हर चीज के प्रति उदासी. उदासी संप्रदाय के कट्टर सदस्य माफिक दिखते हैं. मैंने कह तो दिया है कि शराब छोड़ रहा हूं पर देखता हूं कितने दिन तक छोड़ पाता हूं. मैंने पिछले दिनों सोचा कि दरअसल छोड़ने पकड़ने का काम करना ही गलत है. आप कैसे कह सकते हैं कि दुख छोड़ रहा हूं, सुख पकड़ रहा हूं. आप कैसे कह सकते हैं कि दिन छोड़ रहा हूं, रात पकड़ रहा हूं. ये सब एक सिस्टम है, क्रम है. शराब आप छोड़ते ही इसीलिए हैं कि आपको फिर से पकड़ना है, और पकड़ते इसलिए हैं कि फिर छोड़ना है. यह सतत चलने वाला क्रम है. इस साइंस को जो नहीं समझता वह मूरख छोड़ने और पकड़ने के अपराधबोध में फंसा रहता है. पर, कई बार मूरख बन जाना तसल्ली देता है, कई बार अपराधबोध करना तपाकर कुंदन बना देता है. यही वो बेसिक भाव हैं, जिसके होने के कारण हम मनुष्य हैं और प्रकृति पृथ्वी में सब पर भारी हैं. जिस दिन ये सारे भाव मर गए, हम रुटीनी व रोबोटिक हो गए तो समझिए कि जीवन से सुर, लय, ताल, मौज-आनंद खतम.

भोपाल में हुए आयोजन की खबर लखनऊ के डेली न्यूज एक्टिविस्ट हिंदी दैनिक में.

भोपाल यात्रा पर बातचीत जारी रहेगी. यह पहला पीस भावावेश में लिख रहा हूं. आगे जो कुछ लिखूंगा, उसमें वाकई भोपाल की रिपोर्टिंग होगी. उम्मीद है आप लोगों का प्यार, सहयोग, सुझाव और आशीर्वाद मिलता रहेगा.

यशवंत

भड़ास

yashwant@bhadas4media.com

जो बाजार के आलोचक हैं, उन्हें कोई संपादक नहीं बनाना चाहता

विमल कुमार

: इंटरव्यू : कवि और पत्रकार विमल कुमार : एसपी ने कम विवेकवान और भक्त शिष्यों की फौज खड़ी की, जिनमें से कई आज चैनल हेड हैं : मैं तब यह नहीं जानता था कि मीडिया का इतना पतन हो जाएगा और वह भी सत्ता-विमर्श का एक हिस्सा बन जाएगा : उर्मिलेश और नीलाभ मिश्र, दोनों मुझसे आज भी योग्य हैं : अज्ञेय जी ने शब्दों की गरिमा को, रघुवीर सहाय ने जनता की संवेदना को और राजेंद्र माथुर ने संपादक पद की गरिमा को बचाए रखा :


9 दिसंबर 1960 को बिहार की राजधानी पटना में जन्में और पिछले 25 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय विमल कुमार के चार कविता संग्रह- ”सपने में एक औरत से बातचीत”, ”यह मुखौटा किसका है”, ”पानी का दुखड़ा” और ”बेचैनी का सबब” छप चुके हैं. उनका एक कहानी संग्रह ‘कॉल गर्ल’ भी छपा है. उनकी पुस्तक ‘चोर पुराण’ काफी चर्चित रही. पत्रकारिता लेखन की पुस्तक ‘सत्ता, बाजार और संस्कृति’ ने भी लोगों का ध्यान खींचा. फिलहाल वे यूएनआई, दिल्ली की हिंदी सेवा में विशेष संवाददाता हैं. उन्हें कई पुरस्कार और सम्मान मिल चुके हैं. विमल कुमार से भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह ने विस्तार से बातचीत की. पेश है इंटरव्यू के कुछ अंश. यहां इंटरव्यू को सवाल-जवाब के तौर पर नहीं दिया जा रहा है. विमल कुमार जो कुछ बोलते गए, उसे उसी क्रम में दिया जा रहा है, बिना सवाल के, ताकि पढ़ने में फ्लो बना रहे और कोई अवरोध या औपचारिकता न उपजे…


  • मैं बिहार की राजधानी पटना से 1982 में ही दिल्ली आया था। उस समय पटना का इतना विस्तार नहीं हुआ था और तब लालू यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान का उतना बड़ा व्यक्तित्व नहीं बना था, जितना आज दिखाई देता है। हम लोग मूलतः बक्सर जिले के गंगाढ़ी गांव के रहने वाले थे, पर मेरा परिवार, जो संयुक्त परिवार था, पटना में ही रहता था। मेरे पिता जी गुलजार बाग प्रेस में काम करते थे। बाद में वह बिहार राज्य विद्युत बोर्ड में क्लर्क के रूप में काम करने लगे और वहीं से क्लर्क के रूप में ही रिटायर भी हुए। मां तो मुश्किल से आठवीं पास होगी। घर में बुनियादी चीजों का भी अभाव था, मसलन कुर्सी, पंखा आदि का भी। मेरी एक बहन और एक छोटा भाई है। दोनों चाचा का परिवार साथ था लेकिन धीरे-धीरे वक्त के दबाव में संयुक्त परिवार टूटता चला गया। पत्रकारिता की नौकरी में आने के बाद पटना में ही मेरी शादी हुई। पत्नी बिहार के सम्मानित परिवार की पुत्री हैं। उनके पिता और दादा अत्यंत संस्कारवान और विद्वान थे, जिन्हें आज हिंदी का हर लेखक जानता है, जिसे साहित्य और पत्रकारिता का थोड़ा इतिहास मालूम है। बहरहाल, सातवीं आठवीं कक्षा से ही मेरी साहित्य में रुचि थी। जेपी आंदोलन शुरू हुआ तो मैंने जेपी पर एक कविता लिखी और डाक से उन्हें भेज दी। जेपी का पत्र आया और उन्होंने मेरे जैसे स्कूली छात्र से मिलने की इच्छा व्यक्त की। उस पत्र की प्रेरणा से मेरे भीतर सामाजिक परिवर्तन की बेचैनी ओर कुलबुलाहट पैदा हुई जिसे मैंने अपने लेखन में व्यक्त करने की कोशिश की। मैं नहीं जानता कि मैं कितना व्यक्त कर पाया हूं। हालांकि यह अजीब विडंबना है कि मैं खुद अपने को भी बदल नहीं सका, सामाजिक परिवर्तन की बात तो दूर और मेरे लिखे से मुझे ही आज तक संतोष नहीं हुआ।

  • शुरू से ही पत्र-पत्रिकाएं और पुस्तकें पढ़ने का शौक था, बचपन से ही। धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, दिनमान और रविवार पढ़ता था। सारिका और पराग भी प्रिय पत्रिकाएं थीं, तब लघु पत्रिकाओं के संपर्क में नहीं था। पर अज्ञेय, धर्मवीर भारती, रघुवीर सहाय का मन-मस्तिष्क पर असर था। गणेश शंकर विद्यार्थी, निराला, प्रेमचंद, प्रसाद, जैनेंद्र, माखनलाल चतुर्वेदी, मैथिलीशरण गुप्त, शिवपूजन सहाय, रामवृक्ष बेनीपुरी का प्रभाव कहीं मन पर था। यूं तो माता-पिता ने अच्छी नौकरी करने के लिए, आई.ए.एस आदि की परीक्षा की तैयारियों के लिए ही दिल्ली भेजा। दिल्ली आकर राजनीति विज्ञान का छात्र बन गया। चाहता था कि जे.एन.यू से हिंदी में एम.ए. करूं, पर वहां दाखिला नहीं हो सका। मैनेजर पांडेय जी ने मुझे इंटरव्यू में छांट दिया जबकि बाद में उन्होंने मेरी पुस्तक ‘चोर पुराण’ का लोकार्पण भी किया। लेकिन मेरा मन कविता-कहानी में अधिक रमता था। दो वर्ष के भीतर ही मैं हरियाणा की एक पत्रिका ‘पींग’ में काम करने लगा। 1984 के दिसंबर से मैंने पत्रकारिता को अपना कैरियर बना लिया।  दरअसल मैं तब पांच सौ रुपये  पिता से मंगवाता था और उनकी तब तनख्वाह 1200 सौ के आसपास थी। मुझे लगता था कि पैसे मांगकर मैं उनके साथ ज्यादती कर रहा हूं। अतः मैंने 800 रुपये की नौकरी ‘पींग’ में शुरू कर ली और उन्हें बताया भी नहीं क्योंकि मेरे पिता नाराज हो जाते। वह चाहते थे कि मैं कोई अफसर बनूं, जैसा हर पिता चाहता है। दरअसल राजनीति विभाग के छात्र के रूप में  प्रो. रणधीर सिंह के मार्क्सवादी विचारों ने मुझे प्रभावित किया। मुझे लगा कि नौकरशाही में नहीं जाना चाहिए।

  • टाइम्स ऑफ इंडिया का तब स्तर था। शामलाल जैसे पत्रकार का स्तंभ उसमें छपता था। बाद में जाना कि उनकी पुत्री नीना व्यास हिंदू में संवाददाता हैं। हालांकि मैं तब यह नहीं जानता था कि मीडिया का इतना पतन हो जाएगा और वह भी सत्ता-विमर्श का एक हिस्सा बन जाएगा। तब कारपोरेट मीडिया इतना ताकतवर नहीं था और चैनलों का आगमन  नहीं हुआ था। टाइम्स आफ इंडिया और अन्य अखबारों का चरित्र नहीं बदला था। इंडियन एक्सप्रेस ने जेपी आंदोलन के दौरान साहसिक भूमिका निभाई थी, पर बाद में उसका चरित्र भी बदल गया। उस समय अरुण शौरी नए जर्नलिस्ट हीरो के रूप में उभर रहे थे, पर बाद में उनका पतन भी भाजपा के मंत्री के रूप में देखने को मिला। रघुवीर सहाय के 60 वर्ष पूरे होने पर दिनमान टाइम्स में मैंने एक लेख भी लिखा था। स्टेट्समैन में एम. सहाय आदर्श थे। दिनमान में रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर जी थे और नवभारत टाइम्स में अज्ञेय जी थे। रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर जी और अज्ञेय जी से दो बार मिलना भी हुआ। मेरे कवि-मित्र राजेंद्र उपाध्याय एक बार अज्ञेय जी के घर मुझे ले गए। वे कुछ नए कवियों से मिलना चाहते थे। अजंता देव भी साथ में थीं, जो कृष्ण कल्पित की पत्नी बनीं बाद में। एक बार श्रीराम वर्मा जी के साथ भी अज्ञेय जी के घर गया था। वहां अज्ञेय जी ने दोपहर का भोजन करवाया था। उन्होंने अपने हाथों से व्यंजन परोसे। वह एक सुखद स्मृति मेरे मन में है। तब हमलोग अज्ञेय जी के फैन थे। शेखर एक जीवनी जादू की तरह था। कितनी नावों में कितनी बार, हरी घास पर क्षण भर, इत्यलम्, नदी की बांक पर छाया पुस्तकें पढ़ चुका था। रघुवीर सहाय की सीढ़ियों पर धूप में, आत्महत्या के विरुद्ध और सर्वेश्वर जी की कुआनो नदी ने प्रभावित किया। 1986 से मैं यूएनआई की हिंदी सेवा में आ गया। मैंने नवभारत टाइम्स में भी आवेदन दिया था और जनसत्ता में भी, पर मेरा चयन वहां नहीं हुआ। नवभारत में उर्मिलेश और नीलाभ मिश्र ने भी आवेदन किया था, दोनों का चयन हुआ। आज उर्मिलेश राज्यसभा टीवी में संपादक हैं, नीलाभ मिश्र आउटलुक हिंदी के संपादक हैं- दोनों मुझसे आज भी योग्य हैं।

  • मैं मूलतः कवि था। विष्णु नागर से मेरा परिचय मेरे पत्रकार‘-कवि मित्र अमिताभ ने कराया और तभी इब्बार रब्बी, मंगलेश डबराल, मधुसूदन आनंद, असद जैदी से परिचय हुआ। मेरी आरंभिक कविताओं के छपने में उन्होंने मेरी मदद की। एसपी सिंह उन दिनों नवभारत टाइम्स आ गए थे, पर मैं उनकी प्रतिभा से कभी आकृष्ट नहीं हुआ, सो मैं कभी उनसे मिला ही नहीं। एक-दो बार उनके चैंबर में भी गया पर मिला नहीं। मेरा सहपाठी मुकुल शर्मा उन दिनों नवभारत टाइम्स में काम करता था। यूनीवार्ता में वर्षों तक मेरे भीतर आत्मविश्वास की कमी थी। मैं डेस्क पर ही था, पर कभी कहीं रिपोर्टिंग करने जाता तो घबरा जाता था। समझ में नहीं आता कि कैसे खबर लिखूं, पर धीरे-धीरे यह कला भी आ गई और आत्मविश्वास भी। कस्बे में रहने वाला आदमी कभी यह नहीं सोचता कि वह किसी दिन कैबिनेट मंत्री को फोन कर बात भी कर सकता है। लेकिन किसी भी प्रकार की सत्ता का कोई आकर्षण शुरू से नहीं था, अगर था तो बस साहित्य की सत्ता के प्रति आकर्षण था, पर बाद में वह भी बेमानी और व्यर्थ ही लगा। मुझे फूको का वह कथन अक्सर याद आता है जिसमें वह हर चीज को पावर डिस्कोर्स के दृष्टिकोण से देखने की बात करता है। मुझे लगता है कि आज संसार में हर चीज एक सत्ता विमर्श में शामिल है, चाहे वह यौनिकता की, सौंदर्य की सत्ता क्यों न हो, पर लोकसत्ता का क्षरण पूरी दुनिया में होता गया। अन्ना आंदोलन, जेपी आंदोलन, गांधी जी के आंदोलन ने इसी लोकसत्ता को प्रतिष्ठित किया।

  • मीडिया का भी यही काम है, हाशिए को मुख्यधारा में लाना और उसकी सत्ता को पहचानना, पर बाजार और भूमंडलीकरण के बाद मीडिया सत्ता विमर्श का हिस्सा बन गयी। उसमें शब्दों की गरिमा जाती रही और अर्थ खोता गया। अज्ञेय जी ने शब्दों की गरिमा को बचाए रखा। रघुवीर सहाय ने जनता की संवेदना को बचाए रखा। राजेंद्र माथुर ने संपादक पद की गरिमा को बचाए रखा, पर बाद में यह सब ध्वस्त हो गया। एस.पी. ने तो रविवार की पत्रकारिता के माध्यम से सत्ता गलियारा का रास्ता दिखाया। वह संतोष भारतीय और उदयन शर्मा की तरह चुनाव तो नहीं लड़े, पर अपनी शादी के रिसेप्शन में आठ राज्यों के मुख्यमंत्री को बुलाकर अपना शक्ति प्रदर्शन किया। यहां तक कि धर्मवीर भारती ने भी यह काम नहीं किया। वे संतोष भारतीय की तरह विश्वनाथ प्रताप सिंह के आगे पीछे नहीं करते थे, पर उस वक्त वी.पी. सिंह ने मंडल की राजनीति कर भारतीय राजनीति के सवर्ण चेहरे को बदल दिया। एस.पी. समाजवादी मूल्यों और सामाजिक न्याय के पक्षधर थे, इसलिए मैं उन्हें संघी पत्रकारों से बेहतर मानता हूं, पर उनमें वह प्रतिभा नहीं थी जो राजकिशोर में है। उनका साहित्य और संस्कृति ज्ञान भी सीमित था। इसलिए नवभारत टाइम्स के लेखक-पत्रकारों से उनकी कभी नहीं बनी। उन्होंने कम विवेकवान और भक्त शिष्यों की फौज खड़ी की, जिनमें से कई आज चैनलों के हेड बन गए हैं। एस.पी. एक सफल पत्रकार थे। सफल इस मायने में कि नेताओं के सीधे संपर्क में थे। जबकि कई लेखक-पत्रकार नेताओं से दूरी बनाकर रखते थे। एस.पी. की फौज में विचारवान पत्रकार कम थे। एस.पी. सूट, टाई और पालिश्ड शू पहनने वाले पत्रकार थे जो सिगार भी पीते थे। वह अंग्रेजी के पत्रकारों की तरह नजर आते थे, इसलिए नए पत्रकारों में उनके प्रति विशेष आकर्षण था।

  • राजेंद्र माथुर में यह सब बात नहीं थी। वह एक धीर-गंभीर पत्रकार थे जो इतिहास और राजनीति में गहरी अकादमिक रुचि रखते थे। उनकी भाषा भी बहुत अच्छी थी। वह एक रुपक बनाते थे अपने लेखों में। दरअसल वह नेहरूवादी थे, उनका प्रभाष जोशी की तरह हिंदूवादी रूझान नहीं था। प्रभाष जोशी की भाषा में एक अजीब ऊर्जा, साहस और बेबाकी थी, पर वह माथुर साहब में नहीं थी, लेकिन प्रभाष जी कई बार अनावश्यक आक्रामक भी लिखते थे। उनमें कहीं कहीं फासीवादी आक्रामकता भी थी, पर बाबरी मस्जिद के बाद उनके लेखन में बदलाव आया। वह संघ परिवार के एक आलोचक बन गए। उन्होंने जितना प्रहार संघ पर किया वैसा अंग्रेजी में भी किसी ने नहीं किया और प्रभाष जी की तरह बेबाक, बेधड़क लेखन तो किसी अंग्रेजी पत्रिका ने नहीं किया। उनका कद किसी भी अंग्रेजी पत्रकार-संपादक से कम नहीं था। उन्होंने हिंदी गद्य को एक नया आयाम दिया। अंग्रेजी में भी उनके जैसा कोई पत्रकार नहीं हुआ। राजकिशोर, विष्णु नागर, सुधीश पचौरी, रमेश दवे आदि ने भी हिंदी पत्रकारिता को नया विमर्श दिया। उसके बाद कुछ अन्य पत्रकारों ने मसलन, रामशरण जोशी, भरत डोगरा, अभय कुमार दूबे, आनंद प्रधान, अनिल चमड़िया, रामसुजान अमर, सुभाष गताड़े, राजेंद्र शर्मा, अरविंद मोहन, दिलीप मंडल, प्रियदर्शन, सत्येंद्र रंजन, आलोक पुराणिक, अरुण कुमार त्रिपाठी ने भी धार दी। इसके अलावा कई अन्य लेखकों ने भी हिंदी में अच्छी टिप्पणियां लिखीं, पर वे लिखते कम हैं, उनमें गिरधर राठी, विष्णु खरे, प्रयाग शुक्ल, अपूर्वानंद, प्रेमपाल शर्मा, अजेय कुमार, अजय तिवारी जैसे अनेक लोग हैं जो बीच-बीच में हस्तक्षेप करते रहे।

  • दरअसल, हिंदी के पत्रकारों की ब्रांडिंग नहीं होती। अंग्रेजी के पत्रकारों में चमक-दमक और प्रदर्शन अधिक होते हैं। उसे राजनेता तथा नौकरशाह पढ़ते हैं, कारपोरेटों के लोग पढ़ते हैं। पर उसमें अधिक दम-खम नहीं होता है। प्रभु चावला, शेखर गुप्ता, राजदीप सरदेसाई, अर्णव गोस्वामी, सागरिका घोष, बरखा दत्त धीरे-धीरे ब्रांड बन गए। पर आज उषा राय जैसे पत्रकारों की पूछ नहीं है। टी.वी. पत्रकारों में भी दीपक चौरसिया, आशुतोष जैसे पत्रकार रोल माडॅल बने, पर रवीश और पुण्य प्रसून वाजपेयी जैसी उनकी दृष्टि नहीं है। टी.वी. पत्रकारों में ज्ञान और पढ़ाई कम है। उन्हें अपने इतिहास, संस्कृति, समाजशास्त्र और सभ्यता की कोई जानकारी नहीं है। उनके पास कोई दृष्टि भी नहीं है। वे सफल होना और दिखना चाहते हैं। उनमें कोई इतिहासबोध ही नहीं है। वे मिहनती हैं, उनके पास सूचनाएं भी होती हैं, पर वे ‘आत्ममुग्ध’ अधिक हैं। वे खबरों को बेचते हैं और खुद को भी बेचते हैं। मैंने उन पत्रकारों को संसद के भीतर और बाहर करीब से देखा है। वे नेताओं को ‘सर-सर’ कहते हैं। हमारे यहां भी एक पत्रकार एक अपराधी नेता को कहते थे- सर, मेरे लिए कोई सेवा। बाद में वह एक राज्य में कांग्रेस के प्रवक्ता बन गए । कई पत्रकार तो मुख्यमंत्री के पी.आर.ओ. बन गए। कई पीए और स्टाफ में शामिल हो गए। किसी ने नेताओं के साथ विमान यात्रा की तो लगा कि वे कुछ और ऊपर हो गए। जर्नादन द्विवेदी पर किसी पत्रकार ने जूता फेंका तो कांग्रेस कवर करने वाले पत्रकारों ने उसकी जमकर धुनाई की। पत्रकार का काम कानून हाथ में लेना नहीं है। उसे लिखकर विरोध करना चाहिए, पर यह तो सरासर चाटुकारिता है। मुझे यह सब देखकर बहुत निराशा हुई। विदेश यात्रा की लिए मारामारी। संपादकों की चाटुकारिता या संपादक का ब्रांड मैनेजर हो जाना और मालिकों की चरणवंदना में लगे रहना आज की पत्रकारिता की पहचान बन गई है। क्या अंग्रेजी और क्या हिंदी! अब तो पेड न्यूज और राडिया प्रसंग भी सामने आ चुका है।

  • शायद यही कारण है कि देरिदा, एडवर्ड सईद और अहमद नदीम कासमी, अख्तर उल ईमान के मरने की खबर भी वो नहीं देते, या कोने में एक फिलर भी नहीं देते। वे रामशरण शर्मा और रोमिला थापर के महत्व को ही नहीं जानते। आंद्रे वेते, ए आर. देसाई, श्रीवासन, शाहीद अमीन, पार्थ चटर्जी को नहीं जानते। हिंदी और अंग्रेजी पत्रकारिता मुख्य रूप से राजनीति, फिल्म और खेल में फंसी है। किसान आत्महत्या की खबरें भी प्रमुखता से नहीं देतीं। पी. साईनाथ ने दस महीने बाद हिंदू में डेढ़ लाख किसानों के मरने की खबर दी, एजेंसी ने जब खबर दी तो किसी ने नहीं छापी। जिस दिन राज्य सभा में शरद पवार ने डेढ़ लाख किसानों के मरने की खबर सुनाई तो प्रेस गैलरी में मैं भी था। समय 7 बजे का था पूरा प्रेस गैलरी खाली! आमतौर पर पत्रकार शाम होते ही चले जाते हैं, बशर्तें कोई महत्वपूर्ण सनसनीखेज मुद्दा न हो।

  • संसद की खबरें भी अब कम छपती हैं। प्रश्नोत्तर की खबरें छपनी लगभग कम हो गई हैं। केवल हंगामा, विवाद और बॉयकाट ही खबर है। कई महत्वपूर्ण बिल के पास होने की खबर नहीं छपती। अब पत्रकारिता का नारा है- जो बिके वही खबर। टी.आर.पी यानी मध्यवर्ग का खेल। अन्ना आंदोलन मध्यवर्ग से जुड़ा था, इसलिए टी.वी. ने दिखाया, अन्यथा किसानों की आत्महत्या वे नहीं दिखाते और अगर दिखाते तो पिपली लाइव की तरह। चैनल को नाटकीयता रोमांच और जिज्ञासा अधिक पसंद है। विचार गायब है। वह मुकाबले और प्रतिद्वंद्विता में अधिक यकीन करता है। पत्रकारिता की भाषा और शब्दावली भी बदल गई है, पर कई बार चैनल अच्छा भी करते हैं, लेकिन आज वो अन्ना को दिखाएंगे तो कल राखी सांवत और मल्लिका सेहरावत या मलाइका अरोड़ा को भी। उनके लिए सब बेचने और खरीदने का व्यापार है। अन्ना के आंदोलन में उनकी भूमिका सही थी। दरअसल जनता का इतना दबाव था कि वे उसे नकार नहीं सकते थे। वे नहीं दिखाते तो बुरी तरह पीट जाते। उनकी विश्वसनीयता का काफी संकट था। पर यह भी सच है कि अगर आज मीडिया नहीं होता तो इतने घोटाले सामने नहीं आते, सत्ता की पोल नहीं खुलती, राजनेताओं का पर्दाफाश नहीं होता, पर दूसरी ओर कारपोरेट का पर्दाफाश नहीं होता क्येंकि मीडिया में कारपोरेट की पूंजी लगी है।

  • मुझे मीडिया में खुशी तब हुई जब मैंने किसी कमजोर आदमी की खबर दी और वह छपी तो बहुत अधिक प्रसन्नता हुई। राहुल, सोनिया, पीएम, लालू, सचिन, अमिताभ की खबर के छपने से क्या खुशी! लेकिन हाशिए के लोग मीडिया में पूछे नहीं जाते। एक भेड़चाल भी है मीडिया। उसके पास अपना विवेक नहीं है। वह रुढ़िवादी और परंपरावादी अधिक है। एक ओर सैकड़ों महत्वपूर्ण खबरें नहीं छपीं तो दूसरी ओर सैकड़ों फालतू खबरें मुखपृष्ठ पर जगह पा गईं। एक असंतुलन सभी अखबारों में दिखाई देता है। बाजार का दबाव अधिक काम कर रहा है। हिंदू अपेक्षाकृत श्रेष्ठ अखबार है। इंडियन एक्सप्रेस की स्टोरी आम अंग्रेजी अखबारों से अच्छी होती है। टाइम्स और हिंदुस्तान टाइम्स का पतन अधिक हुआ है। हिंदी में जनसत्ता और भास्कर अपेक्षाकृत ठीक है, पर उनकी कई सीमाएं हैं। पत्रकारिता में जो नए लोग आते हैं, वे दोषी नहीं होते। दोष तो इस व्यवस्था का है। कई पत्रकारों ने कई लोगों का नाम तक नहीं सुन रखा है। पढ़ानेवाले भी अब फील्ड के पत्रकार नहीं हैं। दिल्ली में मधुबाला इंस्ट्टीयूट ऑफ जनर्लिज्म भी है, वहां की कुछ लड़कियां हमारे दफ्तर में आईं तो मैंने उनसे पूछा- तुमलोग बाद में क्या करोगी, तो उसने कहा- मैं भी देवानंद इंस्ट्टीयूट ऑफ जर्नलिज्म खोल दूंगी। मैंने उनसे जाना कि मधुबाला नाम तो उस संस्थान की प्रमुख का नाम है। मधुबाला हिरोइन से कोई लेना देना नहीं। निजी संस्थानों के नाम पर इसी तरह की रद्दी संस्थाएं सामने आई हैं। हर कोई पत्रकार-एंकर बनना चाहता है। दरअसल बेरोजगारी भी अधिक है। युवा क्या करें! सरकारी नौकरियां कम हैं, और वे पत्रकार पीस रहे हैं। लेबर कानून का पालन नहीं। वेज बोर्ड लागू नहीं। सेवा शर्तें मनमानी हैं। भीतरी शोषण काफी है। कोई यूनियन नहीं। अराजक माहौल है। इसके लिए भी सरकार दोषी है। वह मालिकों तथा एडीटरों को पटा कर रखती है। उन्हें पद या पुरस्कार दे देती है, राज्यसभा में भेज देती है। पत्रकारिता के भीतर चराग तले अंधेरा है। छोटे पत्रकार खुद ही शोषित हैं। पर सरकार औ राजनीतिक दल चुप बैठे हैं। उनकी दोस्ती और साठगांठ सीधे मालिक और संपादक से है, फिर भी ये मीडिया की स्वतंत्रता के हिमायती हैं। चौथा स्तंभ भले ही जर्जर हो गया है पर वह चेक एंड बैलेंस का काम कर रहा है। जनता की आवाज का एक मंच तो है।

  • अखबारों में किस तरह के संपादक हैं, हम अच्छी तरह जानते हैं। कोई राजकिशोर, विष्णु खरे, पंकज बिष्ट, उदय प्रकाश, आनंद स्वरूप वर्मा, पंकज सिंह, मंगलेश डबराल, नीलाभ अश्क आदि को संपादक नहीं बनाना चाहता, चैनल का हेड नहीं बनाना चाहता, क्योंकि वे बाजार के आलोचक हैं। इसलिए मालिकों को ऐसे संपादक चाहिए जो बाजार के मनमाफिक काम करे। शायद इसलिए सभी संपादक बौने हैं। कोई कांग्रेसी है तो कोई भाजपाई तो कोई अवसरवादी। संपादक पद की गरिमा अब नहीं। अखबारों को ब्रांड एंबेसडर चला रहे हैं। पर यह भी सच है कि कागज, छपाई, प्रस्तुति और समाचार संकलन में हिंदी के अखबारों में वृद्धि हुई है। यह भी कहा जाता है कि हिंदी में विभिन्न विषयों में लिखनेवाले लोग नहीं हैं। दरअसल हमारे संपादक लेखक पैदा नहीं करते। अब तो वे ब्रांड के पीछे भाग रहे हैं। सेलेब्रेटी को छाप रहे हैं। चेतन भगत भी हिंदी के अखबार में छप रहे हैं, राजदीप सरदेसाई भी- यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। जो अच्छा लिखते हैं, वे रेखांकित नहीं किए जाते। कई पत्रकार तो पर्दे के पीछे रह जाते हैं। एजेंसी में काम करनेवाले पत्रकारों को कोई नहीं जानता, जबकि कई पत्रकार उनकी खबरें रोज उड़ाते हैं और अपने बाईलाइन से खबरें देते हैं, यह तो हम वर्षों से देख रहे हैं। लखटकिया पुरस्कार और फैलोशिप भी उन्हें ही मिलती है। मैं ऐसे कई अच्छे स्वाभिमानी पत्रकारों को जानता हूं जो कभी फैलोशिप के लिए आवेदन नहीं करते, किसी पुरस्कार के लिए जुगाड़ नहीं करते। अंग्रेजी में हिंदू अखबार है, तो आप पी. साईनाथ बन सकते हैं, पर हिंदी के संपादकों को पी. साईनाथ की जरूरत नहीं है। हिंदी में छपो तो 500 रुपये, अंग्रेजी में दो हजार! अंग्रेजी में स्तंभकार का फोटो, हिंदी में नाम भी ठीक से नहीं! भाषाई गुलामी की मानसिकता अभी भी। मराठी, तमिल, तेलगु और उर्दू के पत्रकारों को तो कोई जानता ही नहीं। हिंदी कविता-कहानी और उपन्यास में काफी विकास हुआ है, पर हिंदी और अंग्रेजी मीडिया को अभी जानकारी ही नहीं।

  • आज हिदी में उदय प्रकाश, पंकज बिष्ट, स्वयं प्रकाश, असगर वजाहत, संजीव, अखिलेश, गीत चतुर्वेदी जैसे लेखक हैं, तो कविता में विष्णु खरे, मंगलेश डबराल, आलोकधन्वा, अरुण कमल, ज्ञानेंद्रपति, इब्बार रब्बी, असद जैदी, कुमार अंबुज, देवी प्रसाद मिश्र, एकांत श्रीवास्तव जैसे कवि हैं, तो अनामिका, गगन गिल, सविता सिंह, कात्यायनी जैसी कवयित्रियां हैं। बद्रीनारायण और पंकज राग जैसे युवा इतिहासकार भी हैं। मनीषा कुलश्रेष्ठ, वंदना राग, प्रत्यक्षा, नीलाक्षी सिंह जैसी युवा कहानीकार हैं तो मैत्रेयी पुष्पा, मृदुला गर्ग, राजी सेठ जैसी लेखिकाएं भी हैं, पर मीडिया के लोग इनका महत्व नहीं जानते। वे केवल नामवर सिंह, राजेंद्र यादव और अशोक वाजपेयी को जानते हैं। अंग्रेजी के पत्रकार तो ये भी नहीं जानते। हिंदी का लेखक भी विक्रम सेठ, अनिता देसाई, के. की.दारुवाला, अमिताभ घोष, हरिश त्रिवेदी, माला श्री लाल, सुकृता पॉल आदि को जानता है, पर अंग्रेजी के पत्रकारों को तो रामविलास शर्मा, नागार्जुन, त्रिलोचन आदि की भी जानकारी नहीं। इसलिए यह कहना कि अंग्रेजी के पत्रकार श्रेष्ठ हैं, गलत हैं। वे प्रोफेशनल हैं, क्योंकि उनके संस्थान प्रोफेशनल हैं, पर कई बार उनकी भी कलई खुलती है, उनकी गहराई हमें भी मालूम है। फ्रंटलाइन को छोड़ दें, तो इंडिया टुडे, आउटलुक में कुछ भी खास नहीं होता। ईपीडब्ल्यू और मेनस्ट्रीम, सेमीनार जैसी पत्रिकाओं में काफी महत्वपूर्ण सामग्री रहती है। अंग्रेजी में पैकेजिंग और डिस्प्ले तथा पब्लिसिटी पर जोर अधिक है, फिर भी कुछ एंकर अच्छे हैं। अर्णव गोस्वामी और करन थापर बेहतर हैं। उनका बैकग्राउंड काम करता है। हिंदी का पत्रकार कस्बे से आता है, वह कैंब्रिज और ऑक्सफोर्ड से नहीं आता, पर उसके पास दृष्टि है, उसने यथार्थ को देखा है, पर बरखा दत्त के पास कोई दृष्टि नहीं है। या अगर है तो वही रुलिंग क्लास के पक्ष में है।

  • मुझे फिल्मों का भी शौक रहा। कुछ अंग्रेजी फिल्में देखी। बंदिनी, मदर इंडिया, तीसरी कसम, साहब बीबी और गुलाम, दो बीघा जमीन जैसी फिल्में मन-मस्तिष्क पर अब भी हैं, पर इनके साथ कुछ बाक्स ऑफिस पर हिट फिल्में भी मैं पसंद करता रहा- चाहे दीवार हो या डॉन या संगम हो या रब ने बना दी जोड़ी। सत्यजित रे का जलसाघर और मृणाल सेन का खंडहर मुझे पसंद है। विदेशी फिल्म निर्देशकों की कई फिल्में देखी हैं- कुरोसावा से लेकर वर्गमैन, फेलिनी, डीसीका, पर उनका मैं विशेषज्ञ या अधिकारी नहीं। उसके बारे में विष्णु खरे और विजयमोहन सिंह, विनोद भारद्वाज ज्यादा सही व्यक्ति हैं।

  • संगीत में सहगल, रफी, किशोर, तलत मेहमूद प्रिय हैं। रफी को सबसे बड़ा गायक मानता हूं। किशोर की रूमानियत पसंद है। शास्त्रीय संगीत ज्यादा नहीं, पर मास्टर मदन, अमीर खान, बड़े गुलाम अली खान, मल्लिकार्जुन मंसूर और भीमसेन जोशी प्रिय हैं। पंडित जसराज मुझे नहीं अच्छे लगे। राजन मिश्रा, साजन मिश्रा प्रिय हैं। ध्रुपद सुनना भी अच्छा लगता है, पर संगीत की तकनीकी जानकारी नहीं है। गौहर जान में मेरी दिलचस्पी है। समय मिला तो एक नॉवेल लिखना चाहूंगा। मुकेश गर्ग, मुकुंद लाठ, अशोक वाजपेयी, कुलदीप कुमार, ओम थानवी, गोविंद प्रसाद, मंगलेश डबराल को संगीत की ज्यादा जानकारी हैं, उन्हें लिखना चाहिए हमेशा। वे अंग्रेजी के समीक्षकों से अधिक अच्छा लिखते हैं। जनसत्ता को छोड़कर किसी हिंदी अखबार को संगीत, नृत्य समीक्षा में दिलचस्पी नहीं, अंग्रेजी में एकमात्र अखबार हिंदू है। एनएसडी की पत्रिका ‘रंग प्रसंग’ और ‘संगना’ ने कला की दुनिया में बेहतर अंक निकाले पर चैनलों, अखबारों नेे इस दिशा में कोई पहलकदमी नहीं ली। यह मानसिक दिवालियापन है मीडिया का। लेकिन यह भी सच है कि आम पाठक बहुत कुछ इस मीडिया से ही जान रहा है और उसी के आधार पर सही-गलत का फैसला कर रहा है तथा अपनी राय बना रहा है, पर जो लोग मीडिया की मुख्यधारा में दिखाई देते हैं, उनसे अलग दूसरी परंपरा भी मीडिया की है जो कहीं अधिक पढ़े-लिखे, संवेदनशील तथा ईमानदार एवं योग्य लोगों के बारे में बताता है, पर यह दुर्भाग्य है कि सो काल्ड मीडिया उनके बारे में नहीं जानता।

  • समाज और वक्त काफी बदला है। नरसिंह राव की नई आर्थिक नीति, जिसे आर्थिक सुधार कहते हैं, के बाद काफी बदलाव आया है। सूचना क्रांति ने भी समाज को पूरी तरह ऊपर से बदल दिया है, लेकिन भारत के गांव और दूरदराज आदिवासी इलाकों में बदलाव कम हुए हुए हैं। एक बार मैं छत्तीसगढ़ के एक आदिवासी गांव में गया तो स्कूल के गरीब बच्चों ने सचिन और अमिताभ का नाम तक नहीं सुना था, पर महानगरों, राजधानियों और कस्बों में समृद्धि आई हुई है। भारतीय मध्यवर्ग काफी समृद्ध हुआ है। सबसे ज्यादा क्षरण संवेदना का हुआ है, ईमानदारी और सत्यनिष्ठा का हुआ है। भावुक और संवेदनशील व्यक्ति असफल है। सफल वो है, जो ज्यादा धूर्त, चालाक और व्यावहारिक है। यह जीवन में हर रोज दिखाई देता है। इसलिए ईमानदार आदमी या तो बेवकूफ माना जाता है या पागल- यह हर क्षेत्र की कहानी है। साहित्य और पत्रकारिता में भी ऐसा ही है। जो अपने ज्ञान और उपलब्धियों को प्रदर्शित करता है, जो शामियाना लगाता है, नजर उसकी तरफ जाती है। जरूरत है, हाशिए पर पड़े लोगों को मुख्यधारा में लाया जाए और उन्हें न्याय दिलाया जाए। आदिवासी, दलित और पिछड़े काफी धकेल दिए गए हैं। हालांकि लोगों के जीवन स्तर में कुछ सुधार हुआ है। कागजों पर सरकार की योजनाएं काफी अच्छी हैं। सर्वशिक्षा अभियान, साक्षरता मिशन, मनरेगा, प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना, सेल्फ हेल्प ग्रुप और बैंकों के विस्तार से भी कुछ बदलाव आया है, पर आज भारत का निर्माण कम इंडिया का निर्माण अधिक हुआ है, राष्ट्रनिर्माण तो खैर कम ही हुआ है। भाषा और संस्कृति के संबंधों के सवालों पर कोई राष्ट्रीय बहस नहीं है। संसद में मैंने कभी संस्कृति नीति या भाषा नीति, फिल्म या नृत्य या संगीत पर कोई बहस नहीं देखी। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया भी दारू क्लब ऑफ इंडिया है।

  • मैं 25 साल की कैरियर में कभी प्रेस क्लब का सदस्य नहीं बना, क्योंकि वहां कोई गंभीर, सृजनात्मक विचार-विमर्श नहीं है। वहां कभी इतिहासकार, समाजशास्त्रियों, राजनीति विज्ञानियों, लेखकों, रंगकर्मियों को नहीं बुलाया जाता है। हबीब तनवीर, अल्काजी का क्या योगदान है? रामशरण शर्मा, इरफान हबीब ने क्या काम किया अपने जीवन में, रजनी कोठारी या अचिन विनायक या मनोरंजन मोहंती क्या सोचते हैं? कुरतलैन हैदर क्या सोचती थीं या निर्मल वर्मा- कहीं कोई जिज्ञासा नहीं, प्रेस क्लब के लोगों में- इसमें अंग्रेजी के भी स्वयंभू पत्रकार हैं जो इंडिया टुडे, इंडियन एक्सप्रेस या बिजनेस टुडे में काम करके अपने को महान पत्रकार मानते हैं, पर उनमें इतिहासबोध, मानवीय संवेदना की जगह केवल प्रोफेशनलिज्म है जो अंततः एक तरह का अवसरवाद है, उसमें जनपक्षधरता या प्रतिबद्धता नहीं है।

  • महानगरों में अवसाद के क्षण काफी आए। दो-तीन वर्ष से अधिक। इसलिए ‘प्रेम’ और ‘मित्रता’ की उत्कंठा हुई पर बाजार और भूमंडलीकरण के युग में इन चीजों का महत्व नहीं रह गया है, कोई सच्चा मित्र नहीं मिलता, चाहे पुरुष हो या स्त्री। स्त्री से मित्रता में भी काफी पेंचोखम है। इगो और देह वहां एक दीवार की तरह है। विनम्रता, सरलता और निश्छलता का अभाव है। कभी किसी कविता, उपन्यास या कहानी पढ़ने से या किसी से मिलने से भी अवसाद के क्षण दूर हुए पर शाश्वत ऊर्जा नहीं मिली, फिर भी कुछ मित्रों ने समय-समय पर ऊर्जा दी, उनका शुक्रगुजार हूं, पर उनमें से कइयों से संबंध कटु हो गए। यह सब एक वक्त के दबाव का ही नतीजा है। व्यक्ति रूप में सभी अच्छे हैं, कुछ की सीमाएं हैं, कुछ का स्वभाव और कुछ की पसंद अलग है।

  • एक बात शेयर करना चाहूंगा- प्रेम के अभाव ने ही मुझे लिखने को प्रेरित किया। घर और दफ्तर सभी जगह प्रेम का अभाव। कटुताएं और आलोचना या विरोध इतना अधिक है कि क्या कहा जाए! यह भी संभव है कि मैं भी लोगों से प्यार नहीं कर सका। दो-तीन पुरुष लेखकों से जाने-अनजाने संबंध कटु हो गए, जिन्होंने मेरी कभी मदद की और दो महिला मित्रों से भी संबंध खराब हुए, जिनके कारण मैंने कई कविताएं, उपन्यास और कहानियां लिखीं। ये मेरे पीड़ादायक अनुभव हैं। इसके जख्म काफी गहरे हैं। मैं आज भी उन लोगों का सम्मान करता हूं और उन्हें स्नेह तथा प्यार देता हूं। किसी को आत्मीय बनाना चाहता हूं, पर नहीं बना पाता, तो अब मौन मौन प्रेम में ही यकीन करने लगा हूं। मैं एक सरल, सहज, पारदर्शी, निश्छल और ईमानदार व्यक्ति के रूप में ही याद रखा जाना चाहूंगा, जिसके भीतर गहरा प्रेम छिपा था। वह कई लोगों से मन में प्रेम करता था और उनका शुभचिंतक बना रहा जीवन भर। मेरे ख्याल से किसी का आजीवन शुभचिंतक बने रहना बड़ी बात है। मैं अपनी घृणा, क्रोध, काम, वासना, लालच, नफरत आदि भी लड़ता रहा। मेरा मानना है कि मनुष्य को पहले अपने आप से लड़ना चाहिए, फिर समाज से। जो व्यक्ति आत्मसंघर्ष नहीं कर सकता, वह सामाजिक संघर्ष नहीं कर सकता। इस दृष्टि से मुझे निराला, मुक्तिबोध और शमशेर पसंद हैं, अज्ञेय भी, जिनकी एक तरह की मुठभेड़ अपने आप से भी है।

  • मुझे कई कविताएं प्रिय हैं। निराला की बांधो न नाव इस ठांव बंधु, त्रिलोचन की चंपा काले-काले अच्छर नहीं पहचानती, नगई मेहरा, नागार्जुन की मंत्र, दिनकर की जेपी पर लिखी कविता, अज्ञेय की कई कविताएं, धूमिल की पटकथा, आलोकधन्वा की ब्रूनो की बेटियां, राजेश जोशी की मैं एक सिगरेट जलाता हूं, मंगलेश डबराल की कई कविताएं, वीरेन डंगवाल की राम सिंह, समोसा और जलेबी, विष्णु खरे की लालटेन, जो मार खाके रोई नहीं, विष्णु नागर का बाजा, असद जैदी की बहनें, देवीप्रसाद मिश्र की कई कविताएं, कुमार अंबुज की क्रूरता, रब्बी की अरहर की दाल, उदय प्रकाश की सुनो कारीगर, गिरधर राठी की लौटती किताब का बयान और रामदास का शेष जीवन, प्रयाग जी की कई कविताएं, अनामिका और सविता की कुछ कविताएं- मेरे पास एक लंबी सूची है। हां, गोरख पांडेय इस पूरे दौर के ऐसे कवि हैं, जिनकी कविताएं मुझे बेहद पसंद हैं, लेकिन विडंबना है कि उनके ही समकालीन स्वनामधन्य प्रगतिशील जनवादी कवियों ने उनकी उपेक्षा की। उनकी दसेक कविताएं तो हमेशा मेरे जेहन में रहती हैं। स्वर्ग से विदाई, समझदारों का गीत, अमीरों का कोरस, तुम्हारी आंखें, कैथरकलां की औरतें बेहद महत्वपूर्ण कविताएं हैं।

  • मुझमें कई बुराइयां हैं- गुस्सैल हूं, आलसी हूं, आत्मविश्वास की कमी है, धैर्य का अभाव है, हठी भी हूं, और सबसे बड़ी बुराई है- प्रेम की तीव्र आकांक्षा। पारदर्शी, निष्ठावान, व्यक्तिगत संबंधों में ईमानदारी, किसी भी तरह की सत्ता से दूरी और धन का कोई मोह नहीं होना अगर अच्छाई है, तो वह मुझमें है। एक अत्यंत साधारण मनुष्य हूं और मृत्यु तक साधारण ही बना रहना चाहता हूं। मनुष्य की साधारणता को ही असाधारणता मानता हूं। अहम् और अहंकार को सबसे बुरी चीज मानता हूं।

  • राजनीति में मैं कांग्रेस और भाजपा की नीतियों का विरोधी हूं। मेरा मानना है कि दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और दोनों कारपोरेट तथा मध्यवर्ग के हितों की ही रक्षा करते हैं। दोनों की विदेश नीति तथा आर्थिक नीति एक है। सामाजिक न्याय की राजनीति का पक्षधर हूं, पर उसके नेतृत्व में मेरी आस्था नहीं है। लालू, मायावती, पासवान और नीतीश में भी मेरी आस्था नहीं है। उनकी सीमाएं हैं। वामपंथी पार्टियां आत्ममुग्ध अधिक हैं, वे दिग्भ्रमित भी हैं, फिर भी वे जनता के हितों का ख्याल रखती हैं, लेकिन वे कागजी तथा किताबी अधिक हैं। भाकपा (माले) का उतना जनाधार ही नहीं है।

  • उनकी शक्ति कम है। नेतृत्व का संकट वहां भी है। कोई राष्ट्रीय नेता नहीं है। जेपी, लोहिया और नरेंद्रदेव का समर्थक रहा हूं, पर उनमें भी एक तरह का वामपंथ विरोध रहा है, पर उनका चरित्र बड़ा था। उनके पास ज्ञान था और जनता में उनके लिए सम्मान था। वे जनता के ही नेता थे। नेहरु जी मध्यवर्ग के ही नेता थे। उनका अभिजात्य मुझे पसंद नहीं है। राजेंद्र बाबू और शास्त्री जी की सहजता, सादगी और ईमानदारी पसंद है, पर इनमें कोई बड़ा नेता नहीं, जो संपूर्ण हो। मधु लिमये, मधु दंडवते और सुरेंद्र मोहन जैसे सहज सरल और ईमानदार नेताओं में मेरी आस्था रही, पर जनता के नेता वे भी नहीं थे। यह एक अजीब विडंबना है। भारतीय राजनीति में बहुत बड़ा संकट है। अन्ना में गांधीवादी आदर्श तो है, पर वह दृष्टि नहीं, जो गांधी, जेपी और लोहिया में थी, वो ज्ञान भी नहीं, पर ईमानदारी और सरलता है। उनकी टीम के लोगों का मुद्दा सही है, पर वे मुझे अधिक प्रभावित नहीं करते। मैं अन्ना के आंदोलन का समर्थक हूं। दरअसल मैं उस जनता का समर्थक हूं जो राज्यसत्ता को चुनौती देती है। हमारा स्टेट हिंसक और  क्रूर होता जा रहा है। विनायक सेन और मेधा पाटकर हमारे नायक हैं। पर कोई महानायक नहीं है, पूरी दुनिया में। कभी मंडेला, फिदेल कास्त्रो थे, पर अब उनका भी पराभव हो चुका है। इसलिए अंतरार्ष्ट्रीय स्तर पर अंधेरा है। भारत के बुद्धिजीवियों में भी एक तरह का कैरियरवाद है। वे किताबी अधिक हैं। सरलता, सहजता और जीवन के रंग उनमें नहीं हैं। वे विद्वान तो हैं, पर पाखंड तथा ज्ञान का अहंकार उनमें अधिक है। वे भारतीय जनता से कटे हुए हैं। कुल मिलाकर स्थिति संतोषजनक नहीं है। हताशा और निराशा अधिक है। पर उम्मीद है…

  • मुझे अफसोस है कि मैं चाहकर भी राजनीतिक रूप से सक्रिय नहीं हो पाया, कुछ नौकरी तो कुछ स्वास्थ्य के कारणों से, पर बेचैनी अधिक है। मेरा एक उपन्यास चांद/आसमान. डॉटकाम और एक प्रेम कविताओं का संग्रह ‘बेचैनी का सबब’ हाल में आया है। एक व्यंग्य संग्रह राजनीति का सर्कस भी आने वाला है। ‘आर यू ऑन फेसबुक’ नामक एक उपन्यास लिख रहा हूं। दो वर्षों में एक और कविता संग्र्रह निकालूंगा। कई योजनाएं पाइपलाइन में है। लिखना ही मुक्ति है। लिखने की बेचैनी बनी रहती है क्योंकि प्रेम की भी बेचैनी है- सबसे प्रेम- मनुष्यता को बचाने का प्रेम।

विमल कुमार से संपर्क 09968400416 या vimalchorpuran@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. विमल कुमार की कविताओं को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- विमल की कुछ कविताएं

सच में गद्दारी की स्वामी अग्निवेश ने, बातचीत का वीडियो टेप भी जारी

टीम अन्ना के स्तंभ कहे जाने वाले स्वामी अग्निवेश बुरी तरह फंस गए हैं. उन्होंने फोन पर किपल सिब्बल से जो बातचीत की, वह बातचीत पब्लिक में आ चुकी है. इस बातचीत का आडियो टेप जारी किए जाने के बाद अब वीडियो टेप भी उपलब्ध हो गया है. कपिल से बातचीत में अग्निवेश ने अन्ना और उनकी टीम के लोगों को जमकर कोसा है और सरकार को उकसाया है कि वह इन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करे.

वीडियो टेप में भी वही बातचीत है जो आडियो टेप में है. बस, वीडियो टेप में आप अग्निवेश को बात करते हुए सुनने के साथ देख भी सकते हैं. इस तरह अब यह पूरी तरह साबित हो चुका है कि स्वामी अग्निवेश ने अन्ना के साथ गद्दारी की है. बातचीत का वीडियो देखने-सुनने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें- अग्निवेश और कपिल वार्ता

जय जनता, जय अन्ना : दस बज गए हैं लेकिन पार्टी अभी बाकी है

ये आधी जीत है. आधी लड़ाई बाकी है. अगर आप लोगों की अनुमति हो तो ये अनशन तोड़ दूं. हाथ उठाएं. अन्ना के इतना कहते ही रामलीला मैदान में खड़े हजारों हाथ उठ खड़े हुए. तिरंगा झंडा लहराते हुए हजारों लोगों का करीब 13 दिन तक रामलीला मैदान में डटे रहना, सैकड़ों-हजारों लोगों का हर बड़े छोटे शहरों कस्बों में निकलना, सांसदों के घरों को घेरना, राजनीतिज्ञों को गरियाना…

इन सबने मिलकर भारतीय संसद के बंद पड़े कान को थोड़ा बहुत खोलने में कामयाबी हासिल की. वही कामयाबी जो कभी अंग्रेजों के जमाने में इकलौते भगत सिंह ने संसद में बम गिराकर और फांसी पर चढ़कर हासिल की थी. जनलोकपाल बिल की राह का बहुत बड़ा रोड़ा आज हट गया. जनताकत के बल पर बहुत बड़ी जीत हासिल हुई. कल दस बजे अन्ना हजारे अपना अनशन तोड़ेंगे. उन्होंने अनुरोध भी कर दिया कि जिस तरह भी तक सब शांतिपूर्ण हुआ, उसी तरह जश्न का कार्यक्रम भी शांतिपूर्ण रहे. पूरा देश जश्न में है. मीडिया के लोग जश्न में हैं.

अन्ना ने मीडिया को भी बधाई दी कि इन लोगों के कारण भी जीत हासिल हुई. कहने वाले कहते हैं कि सत्ता और सरकार ने सिस्टम के खिलाफ जनाक्रोश को अन्ना के जरिए कम कर लिया. और, कहीं कुछ बिगड़ा भी नहीं. सरकार भी वही. नेता भी वही. सिस्टम भी वही. और, माहौल बन गया जीत का. कहने वाले यह भी कहते हैं कि दुनिया में करोड़ों कानून है लेकिन मानवता अब भी हर जगह त्रस्त है, सो, कानून से काम नहीं बनने वाला, काम बनेगा हर एक आदमी को अन्ना जैसा बनने पर. इस जीत की जितने मुंह उतनी व्याख्याएं हो रही हैं. फिलहाल यह जश्न का दौर है. सवाल उठाना लोगों को कम पचेगा. सो, हम भी यही कहेंगे कि दस बज गए हैं लेकिन पार्टी अभी बाकी है. लेकिन दोस्त, दस बजे के बाद की जिंदगी उतनी की रुखी और बेजान होगी, जितनी अब तक थी.

भ्रष्टाचार कोई एक शब्द नहीं जिसे डिक्शनरी से मिटा दो. यह जीवन पद्धति है. इस भ्रष्टाचार के खिलाफ हजारों लोग सदियों से लड़ते रहे हैं और आज भी लड़ रहे हैं. इस देश के कोने कोने में लोग लड़ रहे हैं और अपनी जान गंवा रहे हैं. सिस्टम शांत और निष्ठुर बना हुआ है. अन्ना भाग्यशाली हैं जो उनको आधी ही सही, जीत हासिल हुई. पर अन्ना और उनके लोगों की यह आधी जीत क्या देश के कोने कोने में लड़े जा रहे भ्रष्ट जीवन शैली और पद्धति के खिलाफ भी कामयाब होगी, कहना मुश्किल है. पूरी दुनिया जिस बाजार से संचालित हो रही है, उस बाजार के नियामकों के काम करने के तौर तरीके में भ्रष्टाचार रचा-बसा है.

कैसे आप मल्टीनेशनल्स को अपने देश का दाम और सामान बाहर ले जाने से रोक सकोगे. कैसे आदिवासियों की अच्छी भली जिंदगी को उजड़ने से बचा सकोगे. कैसे किसानों की जमीन को भ्रष्ट लोगों द्वारा कब्जाने से बचा सकोगे. कैसे हर शिक्षित व्यक्ति को बेरोजगार बनने से रोक सकोगे. कैसे हर हाथ को काम न मिलने की घुटन से मुक्त करा पाओगे… दर्जनों सवाल हैं. और इनका जवाब सिर्फ जनलोकपाल बिल नहीं है. पर, निराश होने की जरूरत नहीं. बस जरूरत इसी जज्बे को बनाए रखने की है. जो भी सत्ता-सिस्टम के खिलाफ सही सवालों पर लड़ता दिखे, उसे सपोर्ट करने के इसी जज्बे की जरूरत है. जाति, धर्म, क्षेत्र और पैसे की राजनीति के विरोध करने के लिए इसी जज्बे की जरूरत है.

ध्यान रखिए, सत्ता और सिस्टम बहुत मक्कार होता है. यह दुनिया के सबसे चालाक लोगों के हाथों संचालित होने वाली चीज होती है जो आसानी से अपने राज करने की ताकत को छोड़ नहीं सकते. इन्हें हमेशा संघर्षों से हराया जा सकता है. वह संघर्ष चाहे अहिंसक हो या हिंसक. अंग्रेजों के खिलाफ चले लंबे आंदोलन गवाह हैं कि वहां हमेशा दो धाराएं सक्रिय रहीं. गरम दल और नरम दल. दोनों दलों का बहुत बड़ा योगदान रहा है अंग्रेजों को नाको चने चबवाने में. आज इस देश के आम नागरिक को सलाम है जो अन्ना के पक्ष में उठ खड़ा हुआ. और इस दस बारह तेरह दिन के आंदोलन की प्रक्रिया ने पूरे देश के आम जन का राजनीतिकरण कर दिया. मेरी नजर में सबसे बड़ी उपलब्धि यही है.

अगर हम राजनीतिक चेतना से लैस रहेंगे और विरोध करने के अपने लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल करते रहेंगे तो इसी तरह आगे भी हम बड़े बड़े सूरमाओं को परास्त करते रहेंगे. फिलहाल तो मैं अन्ना और उनकी टीम के सभी लोगों के साथ साथ इस देश के आम जन को प्रणाम-सलाम करता हूं और उनका दिल से शुक्रिया अदा करता हूं कि सबने मिलकर एक चमत्कारिक माहौल का सृजन किया जिससे जनजीवन के मुख्य मुद्दे एजेंडे में आए और भ्रष्ट राजनीति व राजनेताओं को घुटनों के बल बैठना पड़ा.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

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करप्ट लोग चढ़ने लगे अन्ना के मंच पर!

: संदेह के घेरे में आने लगी टीम अन्ना : जिस अन्ना हजारे ने कभी एक करोड़ रुपये का एवार्ड इसलिए लेने से मना कर दिया था क्योंकि वह एवार्ड एक शिक्षा माफिया की तरफ से दिया जा रहा था, उसी अन्ना हजारे ने अपनी आंखों के सामने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के अपने मंच से उसी शिक्षा माफिया को अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए देखा. जी हां, ये शिक्षा माफिया और करप्ट परसन कोई और नहीं बल्कि अरिंदम चौधरी है.

अपने एक हालिया लेख में अन्ना हजारे को जमकर गरियाने वाले और सत्ता के पक्ष में खड़े होने वाले अरिंदम चौधरी ने अन्ना समर्थकों की नाराजगी से बचने के लिए किसी शातिर की तरह पैंतरा बदला और भड़ास4मीडिया पर खबर प्रकाशित होते ही अगले दिन रामलीला मैदान पहुंच गया. अरिंदम ने टीम अन्ना को पटाने में कामयाबी हासिल की. मंच पर चढ़ा. अधखुली बुशर्ट और खुला सीना दिखाते किसी लफंगे की माफिक अरिंदम चौधरी ने दूसरा गांधी कहे जाने वाले अन्ना हजारे के मंच से समर्थकों को खूब ज्ञान पिलाया और अन्ना हजारे व उनके आंदोलन की भूरि भूरि प्रशंसा कर डाली. सुनिए, अरिंदम ने अपने भाषण में क्या-क्या कहा और समझिए कि उसकी ये बातें उसके पिछले आलेख (क्लिक करें- अन्ना को अरिंदम ने ये क्या कह डाला) से किस तरह अलग हैं-

”अन्‍ना हजारे का भ्रष्‍टाचार के विरुद्ध आंदोलन और सिविल सोसायटी की बढ़ती ताकत को जनता का व्‍यापक समर्थन मिला है. यह वह आंदोलन बन गया है जो बीते 60 सालों से नहीं देखा गया. अगर सरकार अन्‍ना और उनकी टीम की आधी मांगों को भी मान लेती है तो दो साल में हम एक नया हिंदुस्‍तान देखेंगे. भ्रष्‍टाचार के लिए सरकार और सरकारी नीतियां जिम्मेदार हैं. देश में सबसे ज्‍यादा भ्रष्‍टाचार बड़े ओद्यौगिक घरानों में होता है. सिर्फ इन घरानों को पांच से छह लाख करोड़ रुपए की कर राहत दी जाती है. इस रकम को अगर विकास में खर्च किया जाए तो देश से गरीबी का नामोनिशान मिट सकता है. देश में खाद्य वितरण में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार भी चिंतनीय है. हमारे देश में 200 मिलियन लोग 40 साल की उम्र से पहले मर जाते हैं. इसके पीछे बड़ी वजह यह है कि 60 मिलियन टन अनाज सिस्‍टम में फैले भ्रष्‍टाचार के चलते उन लोगों तक नहीं पहुंच पाता है. सरकार हर बजट में अमीरों के लिए कुछ नए प्रावधान जरूर करती है, लेकिन उसका एक भी फैसला भ्रष्‍टाचार को समाप्‍त करने वाला नहीं होता. सरकार इस ओर बिल्‍कुल ध्‍यान नहीं देती. सरकार की इसी नजरअंदाजी के कारण ही अन्‍ना हजारे को सड़क पर आना पड़ा है. अन्‍ना भ्रष्‍टाचार को मिटाना चाहते हैं. यह लोकपाल बिल बहुत उपयोगी बिल है. इसी बिल ने अमेरिका और इंग्‍लैंड जैसे देशों को बदला है. इसके साथ ही स्‍वीडन और सिंगापुर जैसे देशों से भी भ्रष्‍टाचार पर लगाम लगाने में भी लोकपाल बिल का बहुत बड़ा योगदान है. दक्षिण कोरिया और इंडो‍नेशिया में भी अगर भ्रष्‍टाचार पर नकेल कसी जा सकी है तो लोकपाल की वजह से. कोरिया में इस लोकपाल के लिए प्रतिनिधियों का चयन सिर्फ छह दिन में हो गया था, अमेरिका में इसके लिए छह महीने का वक्‍त लगा वहीं भारत में 20-30 साल का समय लग गया ऐसे लोगों को सामने आने में. अन्‍ना का यह आंदोलन काबिलेतारीफ है. जिस तरह से इस आंदोलन को दिशा दी गई है उसके लिए अन्‍ना और उनकी टीम का काम काबिले तारीफ है. मैं अन्‍ना हजारे से अपना अनशन समाप्‍त करने का अनुरोध करता हूं. यह आंदोलन और विरोध चलता रहना चाहिए. अन्‍ना समर्थकों को चाहिए कि सांसदों के घरों के बाहर धरना प्रदर्शन करने से बेहतर रहेगा कि स्‍थायी समिति के 14 सदस्‍यों के घरों के बाहर धरना दिया जाए. अन्‍ना को अपनी सेहत का खयाल रखना चाहिए और आगे चुनाव और न्‍यायिक सुधार की जंग के लिए भी हमारा मार्गदर्शन करना चाहिए.”

दोहरा चरित्र : अन्ना को पहले लिखकर गाली, फिर मंच पर चढ़कर गुणगान

पढ़ा आपने. कल तक अन्ना को जाने किस किस उपाधियों से नवाजने वाला यह कथित मैनेजमेंट गुरु जब अन्ना के मंच पर पहुंचता है तो उसके सुर बदल जाते हैं और किसी शातिर नेता की तरह भीड़ को अपने पक्ष में लुभाने के लिए वही बोलता है जो अन्ना समर्थकों को पसंद आए. पर बड़ा सवालिया निशान टीम अन्ना पर लग गया है. वे लोग आखिर किस तरह करप्ट लोगों को मंच शेयर करने दे रहे हैं. जो आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रहा है, उसी आंदोलन के पवित्र मंच पर घटिया व अपवित्र लोग चढ़े जा रहे हों और लच्छेदार बातें कहकर खुद को हीरो साबित कर रहे हों, तो यह प्रकरण बताता है कि टीम अन्ना किस कदर दबाव में है.

और, अगर ये लोग आज दबाव में हैं तो कल को जनलोकपाल बिल बन जाने पर क्या गारंटी कि इन्हें कोई भ्रष्टाचारी पटा न ले. अरिंदम चौधरी और उनके आईआईपीएम के खिलाफ दर्जनों प्रकरण, कई जांच आदेश और कई घपले-घोटाले के आरोप हैं. न्यूज चैनल और अखबार इनके खिलाफ कुछ न लिखें, दिखाएं, इस कारण अरिंदम चौधरी हर साल अरबों रुपयों का विज्ञापन इन अखबारों और चैनलों को देता है. साथ ही, खुद के मीडिया हाउस के जरिए वह देश में अपनी छवि एक क्रांतिकारी मैनेजमेंट गुरु की बनाता रहता है. पर इसी अरिंदम चौधरी के मीडिया हाउस की कहानी है कि यहां कई महीनों से लोगों को तनख्वाह नहीं मिली. लड़कियों को दिनदहाड़े आफिस में गरियाया जाता है.

अरिंदम चौधरी का दाहिना हाथ माने जाने वाला शख्स भरी दोपहर दारू पीकर आफिस आता है और लड़कियों को गंदी गंदी गालियां देता है. उसकी दी हुई गालियां की रिकार्डिंग भी भड़ास4मीडिया के पास सुरक्षित है. वह लड़कियों का कई तरह से शोषण करता है और इसे पूरा आफिस जानता देखता है. पर चंद हजार रुपये में इमान बेचने वाले हमारे महान पत्रकार, जो वहां काम करते हैं, विरोध की आवाज तक निकाल नहीं पाते. इसी के मीडिया हाउस में पेड न्यूज का काम धड़ल्ले से किया जाता है. यहां पत्रकारों को विज्ञापन और लायजनिंग का काम करने के लिए मजबूर किया जाता है. इसके भी दस्तावेज भड़ास4मीडिया के पास सुरक्षित है.

इन प्रकरणों पर बात कभी बाद में और विस्तार से किया जाएगा, फिलहाल इतना तो कहा ही जाना चाहिए कि जो खुद नख से शिख तक फर्जीवाड़े में डूबा हो, वो वह शख्स अन्ना के मंच पर चढ़ कर जनता को उपदेश दे तो यह न सिर्फ अन्ना का और इस देश का दुर्भाग्य है बल्कि इस आंदोलन के हश्र को भी बताता है. मीडिया के सभी लोगों और अन्ना के सभी समर्थकों को इस बिंदु पर खुले दिमाग से विचार करना चाहिए.

संभव है, कई लोग मेरी बातों, विचार से सहमत न हों. उनके कमेंट की प्रतीक्षा रहेगी. पर यह खुली बहस का विषय बन गया है कि क्या टीम अन्ना के लोगों ने अरिंदम चौधरी को रामलीला मैदान का मंच उपलब्ध कराकर गलत काम नहीं किया है? और, अरिंदम चौधरी ने अन्ना के साथ मंच पर भाषण देते हुए फोटो खिंचवाकर उसका अपनी ब्रांड इमेज बढ़ाने में, अपने पापों को धोने में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है, क्या इसका एहसास टीम अन्ना को है?

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

bhadas4media@gmail.com

35 में मरना था, 38 का आज हो गया, डेडलाइन अब 40 की कर दी

: मेरा समय और मेरे दिल-दिमाग का आफलाइन स्टेटस : ((कुछ मिनट बाद 26 तारीख आ जाएगी और मैं 38 बरस का हो जाऊंगा. 30 की उम्र में था तो अपनी लाइफलाइन 35 की तय कर रखी थी और 35 का हुआ तो डेडलाइन को 40 तक एक्सटेंड कर दिया. दो साल और मस्ती के दिन. 40 के बाद दुनियादारी और दुनिया से मुक्त होकर कहीं गुमनाम जीवन जीना चाहूंगा… अपने तरीके से. फिलहाल मेरी मनोदशा यह है- ”मैं अन्ना हूं”.))

फेसबुक पर उपरोक्त स्टेटस डाला कल रात करीब साढ़े ग्यारह बजे डाला. उपरोक्त लाइनों को यह सोचते हुए फेसबुक पर डाला कि अपने को अभिव्यक्त करूं, अपने को दोस्तों से शेयर करूं, अपने मन के हाल को थोड़े में बयान करूं, जी रहे इस क्षण के मनोभाव को सार्वजनिक करूं. और, यह फेसबुक पर डालते ही जिस तरह से दोस्तों, शुभचिंतकों, भाइयों का बधाई संदेश, शुभकामनाएं आदि टिप्पणी के रूप में आने लगे तो मैं थोड़ा हतप्रभ हुआ. चाहने वालों की एक भीड़ से खुद को घिरा महसूस करने लगा और ऐसा महसूस करना हमेशा सुखकर हुआ करता है.

पर मन-दिल-दिमाग में चल रहे उथल-पुथल का आवेग इतना गहरा है कि इतने से मन भरा नहीं. लगा कि यह भी तो दुनियादारी है कि जो जानते हैं आपको, जो कनेक्ट हैं आपसे वे सब आपको विश करें और आप फूलकर कुप्पा हो जाएं. उथल-पुथल का अंदाजा इससे लगा सकते हैं कि मैंने खुद के जन्मदिन के मौके को अन्ना से कनेक्ट किया. उस अन्ना से जो अभी कुछ महीनों से पहले बहुतों के लिए अनजान सा शख्स था. बहुतों के लिए समाज सुधारक समझा जाने वाला आदमी था. इस अन्ना ने अपनी सादगी, अपनी सोच की व्यापकता, उदात्तता, सहजता, संतई जीवन, बाल सुलभ आंतरिक मिठास और प्रेम भाव से लबालब होने के कारण सबके दिल में घर कर लिया.

जब मैंने अपने उपरोक्त स्टेटस के आखिर में लिखा कि ”फिलहाल मेरी मनोदशा यह है- मैं अन्ना हूं”, तो एक फेसबुकी दोस्त अमित सोनी ने कमेंट किया- जन्मदिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएं… और हां, मीडिया के लिए तो अन्ना हो.

तब मुझे उन्हें लिखकर जवाब देना पड़ा और अपनी स्थिति, मनोदशा को व्याख्यायित करना पड़ा, इस तरह- ”धन्यवाद आप सभी का. दिल से आभार. लेकिन अमित सोनी जी, मैं बिलकुल भी मीडिया का अन्ना नहीं हूं. जीवन जीने की जिजीविषा में फंसा उसी तरह का आम आदमी हूं जैसा कोई दिल्ली में होता है. अन्ना ने 27 साल की उम्र में अपने जीवन का मकसद तय कर लिया था और इसीलिए शादी नहीं की क्योंकि उनके लिए पूरा देश अपना परिवार था. तभी यह संत आज जब देश का हाल देख अंगद के पांव की तरह रामलीला मैदान में अड़ा है तो सरकारों, सत्ताओं, धनपसुओं की सांस फूल रही है. मेरे आगे के जीवन के लिए अन्ना शायद बहुत बड़ी प्रेरणा होंगे. और सच कहूं तो हर बड़े आदमी के जीवन को बहुत नजदीक से देखिए तो वे सभी बेहद सरल सहज और समझ में आने वाले लोग लगेंगे. गांधी से जितना सहज कौन हो सकता है. तो सहजता में ही जीवन का सच है. यह एक्सपेरीमेंट हर एक को करना चाहिए, ऐसा कहने से पहले सोच रहा हूं कि पहले खुद प्रयोग कर लूं तब कहूं क्योंकि अपन के यहां पर उपदेश कुशल बहुतेरे बहुतेरी मात्रा में होते हैं.”
इसका अमित सोनी ने भी सटीक जवाब दिया- ”सर जी, आम आदमी में एक अन्ना है, तभी तो आज हर जगह, मैं भी अन्ना तू भी अन्ना… और आज हर वो शख्स अन्ना है जो अपनी भड़ास खुलकर सामने निकाल रहा है.. लेकिन अहिंसक तरीके से.”

बात यहीं पर बंद नहीं हुई. ब्रिजेश चौहान गुड्डू ने कमेंट किया- ”यार दादा, मुझे लगता है कि चालीस के बाद जिंदगी शुरू होती है, कहते हैं ना- लाइफ बिगेन ऐट 40.” इस कमेंट पर लगा कि अपनी बात रखना का फिर मौका मिला है, अपने हाल-ए-दिल को बयान करने का फिर अवसर प्राप्त हुआ है, मैंने लिखा- ”सही कहा बृजेश चौहान गुड्डू भाई. जो मैं कह रहा हूं 40 के बाद के लिए और जो आप बता रहे हैं 40 के बाद के लिए, दोनों में बहुत फर्क नहीं है. बस फर्क सच को देखने के नजरिए में है. उदाहरण के तौर पर- किसी संन्यासी के लिए भौतिक सफलताएं जरा भी उत्तेजना पैदा नहीं करतीं, ललचाती नहीं. और किसी भौतिक रूप से सफल आदमी के लिए फकीर बन जाने का कांसेप्ट जरा भी नहीं सुहाता… तो ये सच को अलग अलग जमीन पर खड़े होकर देखने का फर्क है. मूल बात यही है कि आप आनंद कहां पाते हैं. सुखों से वंचित आदमी के लिए भौतिक दुनिया में अंत तक स्कोप दिखाई देता रहता है. और मुझे लगता है कि मैंने सारे भौतिक सुखों का खूब भोग कर लिया है, सो वो जो दूसरी दुनिया है, वो काफी प्रभावशाली और लुभावनी लग रही है.” इस पर ब्रिजेश चौहान गुड्डू ने अपने अंदाज में लिखा- ”तरीका जोरदार होने के लिए पार्टी भी दो यश दादा.”

तब मेरा उनको कहना था- ”‎40वें पे जोरदार पार्टी दूंगा, ये वादा है. दो साल की मोहलत दे दें. फिलहाल तो आलम ये है कि अन्ना के आह्वान के बाद से मैंने मदिरा का भी त्याग कर रखा है, यह सोचकर कि कोई आदमी हमारे लिए 12 दिनों से भूखा है और हम उसके कहने पर सिर्फ शराब पीना तक नहीं छोड़ सकते.. सो छोड़ दिया. इसे मेरे निजी जीवन पर अन्ना इफेक्ट कह सकते हैं. और अन्ना के समर्थन की खातिर पार्टी का परित्याग भी कर रहा हूं.” ब्रिजेश चौहान गुड्डू ने सहमति जताई और लिखा- ”यश दादा, आई एम टोटली एग्री विद यू. पर इन डकैतों को भी कुछ सोचना चाहिए. इक बात और- तुम्हें और क्या दूं मैं इसके सिवा, तुमको हमारी उमर लग जाए. हैप्पी बर्थ डे बडी एन जस्ट टेक केयर आफ योरसेल्फ.”

इतनी दुवाएं, प्यार, शुभकामनाएं पाकर भला कोई क्यों न खुद को खुशकिस्मत माने.

सबसे बढ़िया तरीके से मेरी बात को समझा मेरे मित्र संजय तिवारी ने. उन्होंने लिखा- ”दूसरे सिरे से पकड़े तो यह मरण दिन बन जाता है. मौत के एक साल और करीब. जो जीना जानते हैं वे जिन्दगी को दूसरे सिरे से पकड़ते हैं. लेकिन जीवन जीते ही कितने लोग हैं? दूसरे सिरे से जीवन में दखल हमें जीने का मकसद देती है. शायद अन्ना दूसरे सिरे से जीवन को पकड़े हुए हैं, इसलिए हर कोई अन्ना कह देने से जीवन को पा लेना चाहता है.” मैंने संजय का आभार व्यक्त किया- ”बहुत ठीक से आपने मेरी बात को जुबान दे दी संजय तिवारी जी. पंकज शुक्ला सर को थैंक्यू. राजेश यादव जी को शुक्रिया, शानदार कविता पढ़ाने के लिए.. बाबू अशोक दास को ढेर सारा प्यार… इशान समेत सारे दोस्तों, भाइयों, शुभचिंतकों का आभार, शुक्रिया, थैंक्यू..”

राजेश यादव द्वारा पेश की गई कविता को यहां पढ़ाना चाहूंगा…

गांधीजी के जन्मदिन पर

-दुष्यंत कुमार-

मैं फिर जनम लूंगा
फिर मैं
इसी जगह आउंगा
उचटती निगाहों की भीड़ में
अभावों के बीच
लोगों की क्षत-विक्षत पीठ सहलाऊँगा
लँगड़ाकर चलते हुए पावों को
कंधा दूँगा
गिरी हुई पद-मर्दित पराजित विवशता को
बाँहों में उठाऊँगा।

इस समूह में
इन अनगिनत अचीन्ही आवाज़ों में
कैसा दर्द है
कोई नहीं सुनता !
पर इन आवाजों को
और इन कराहों को
दुनिया सुने मैं ये चाहूँगा ।

मेरी तो आदत है
रोशनी जहाँ भी हो
उसे खोज लाऊँगा
कातरता, चु्प्पी या चीखें,
या हारे हुओं की खीज
जहाँ भी मिलेगी
उन्हें प्यार के सितार पर बजाऊँगा ।

जीवन ने कई बार उकसाकर
मुझे अनुलंघ्य सागरों में फेंका है
अगन-भट्ठियों में झोंका है,
मैंने वहाँ भी
ज्योति की मशाल प्राप्त करने के यत्न किये
बचने के नहीं,
तो क्या इन टटकी बंदूकों से डर जाऊँगा ?
तुम मुझकों दोषी ठहराओ
मैंने तुम्हारे सुनसान का गला घोंटा है
पर मैं गाऊँगा
चाहे इस प्रार्थना सभा में
तुम सब मुझपर गोलियाँ चलाओ
मैं मर जाऊँगा
लेकिन मैं कल फिर जनम लूँगा
कल फिर आऊँगा ।

सच में, अन्ना में गांधी का रूप देख रहे हैं लोग. जैसे महात्मा गांधी आ गए हों. कहते भी हैं, कोई आदमी इस धरती से मरता नहीं है. वह यहां से जाता है तो अपना सब कुछ बहुत लोगों में अलग-अलग रूपों में छोड़ जाता है.

अपने जन्मदिन पर अपने महिमामंडन का इरादा नहीं है. और, जीवन में खुद का महिमामंडन करके बहुत देर तक बहुत कुछ नहीं पाया जा सकता और पा भी लिया गया तो वो स्थायी न होगा. हालांकि कह सकते हैं कि स्थायी तो कुछ भी नहीं है पर समझदार लोग जानते हैं कि स्थायी भाव कुछ होते हैं. जैसे, अलौकिक आनंद की अनुभूति. सवालों, दुविधाओं, हालात के जाल में फंसा औसत दुनियादार आदमी लाख कोशिश कर ले, मुक्ति नहीं पा सकता. वहीं इर्द-गिर्द सांप-सीढ़ी के खेल की तरह गिरता-चढ़ता-फिर गिरता रहता है. प्लैटोनिक प्लीजर की एक अवस्था होती है, जिसे मैं तब तक नहीं मानता था जब तक कि इसे महसूस न कर सका था. अब कई बार करता रहता हूं.

इसी कारण बहुत सारी बुरी अच्छी स्थितियों में समभाव वाला रुख पैदा हो गया है. मन में यही आता है, ये हो गया तो क्या हो गया और ये न हुआ तो क्या हुआ. हालांकि इस मूड, इस मिजाज, इस अवस्था को बेहद डिप्रेसिव होने का लक्षण भी कहा जाता है पर अगर दुनिया के होने, चलने, बढ़ने के फार्मूले को आप समझ लें तो आप खुद के होने, चलने, बढ़ने के फार्मूले को पा लेंगे और फिर बेहद डिप्रेसिव और प्लैटोनिक प्लीजर वाले मोमेंट्स के तह तक जाएंगे तो शायद इन्हें धारण करने वाली एक ही धरा को पाएंगे. जिस औसत दुनियादार आदमी के सांप-सीढ़ी वाले दुनियादारी के गेम में फंसे होने की बात कही है, उसका एक्स्ट्रीम एक बेहद डिप्रेसिव आदमी के रूप में सामने आएगा. क्योंकि वह निराशा का चरम होता है जहां कुछ भी होने पर कोई भाव नहीं पैदा होता. नोएडा की दो बहनों की बात बहुत पुरानी नहीं है. उनकी यही दशा थी. राग द्वेष सुख दुख से परे थीं. पर वे एक आतंक और भय के कारण इस मनःस्थिति में आ गईं थीं. पर जब आप जीवन के फार्मूले को समझ लेते हैं तो प्लैटोनिक प्लीजर वाली अवस्था में आ जाते हैं और अतिशय आनंद के कारण समभाव धारण कर लेते हैं. इस बात को मैं कुछ उदाहरणों से समझाऊंगा.

अपने मित्र संजय तिवारी ने अपने एक हालिया लेख में लिखा- ”एक ब्रिटिश जर्नल प्लोस बायोलॉजी ने ब्रिटिश वैज्ञानिक राबर्ट एम मे के हवाले से एक रिसर्च पेपर प्रस्तुत किया है जिसमें राबर्ट ने दावा किया है कि दुनिया में 87 लाख प्रजातियां हैं. राबर्ट कहते हैं कि इस बात की बहुत चिंता करने की जरूरत नहीं है कि प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं. इसका मतलब है कि मनुष्य की सोच के उलट धरती पर जीव की प्रजातियों के विलुप्त होने के साथ-साथ नई प्रजातियों का खूब उदभव और विकास हो रहा है.” देखा, यही फार्मूला है. जो विलुप्त हो रहा है- जबरन किये जा रहे हैं विलुप्त या प्राकृतिक रूप से, उनकी जो संख्या है, उसी की तरह की संख्या वो भी है जो हमारे चाहने, न चाहने के बावजूद पैदा हो रहा है, पनप रहा है.

थोड़ा और पीछे चलते हैं. ब्रह्मांड के पैदा होने की कहानी पर. अब तक का जो सबसे साइंटिफिक दावा है, प्रस्तुति है, उसके मुताबिक बिग बैंग थ्यूरी से यह दुनिया अस्तित्व में आई. संघनन और एक्सपैंसन, यह फार्मूला काम करता है. पहले पूरा ब्रह्मांड सिकुड़ कर एक धधकता हुआ आग का बड़ा गोला था. वह कंडेंस होता जा रहा था. कंडेंस होता चला गया. और एक ऐसी अवस्था आई जहां कंडेंस होना संभव नहीं रह गया. वह संघनन एक्स्ट्रीम पर पहुंच चुका था. उसे नया रूप लेना था. और जैसे कोई बहुत दबाई हुई चीज विस्फोट होकर छिन्न भिन्न हो जाती है, बहुत खींची गई कोई चीज एक अवस्था पर जाकर टूट जाती है, उसी तरह वह आग का धधकता हुआ गोला फटा और ढेर सारे टुकड़े इधर उधर बिखर गए, छितरा गए. इन्हें तारे सितारे धरती ग्रह उपग्रह गैलेक्सी आदि कहा गया. एक्सपैंसन हो गया. विस्फोट हो गया. चीजें एक समय के बाद फिर संघनित होने लगेंगी. ये जो बिखरे हुए टुकड़े हैं, ये जो ग्रह नक्षत्र तारे सितारे गैलेक्सी सूर्य चांद आदि हैं, ये सब धीरे धीरे नजदीक आने लगेंगे, कंडेंस होने की प्रक्रिया शुरू होने लगेगी और फिर सब एक में सिमट जाएगा. वही आग का गोला बन जाएगा. और संघनन, कंडेंस होने की प्रक्रिया अरबों, खरबों वर्षों में पूरी होगी…

और, जीवन क्या है. तनाव और खुशियों का फार्मूला. दुखों-सुखों का फार्मूला. भौतिक और आध्यात्मिक का फार्मूला. ये सारी बातें एक हैं. वही द्वंद्व यहां भी चल रहा है जो ब्रह्मांड में चल रहा है. पहले के जमाने में जो संत महात्मा सूफी फकीर हुए, उन लोगों ने इस दुनिया के चक्र को समझ लिया, दुनिया के फार्मूले को जान लिया, और फिर उन्होंने खुद के जीवन, खुद के होने को भी समझ लिया और फिर ब्रह्मांड और खुद के जीवन के फार्मूले को आपस में कनेक्ट कर लिया. बस, फिर क्या था, बज गया जीवन संगीत. कोई कबीर तब जो लिखने लगा वह सदियों सदियों के बाद भी अकाट्य माना गया. कोई फकीर तब जो गा गया वह आज भी सम्मान के साथ गाया गुना जाता है.

सुख के सबके अपने अपने फार्मूले होते हैं. अन्ना के लिए हम बहुत चिंतित हैं पर खुद अन्ना आनंद से भरे हैं. उनको हमसे उर्जा मिल रही है. उनको ताकत देश की जनता के खड़े होने से मिल रही है. क्योंकि अन्ना ने पिछले कई दशक तक खुद को आदमी के हित के लिए लगाए रखा. और आदमी अन्ना से उर्जा पाते रहे, बदलते रहे, नया रचते रहे. वे पीड़ितों शोषितों गरीबों के लिए जीते करते रहे. पीड़ित शोषित गरीब उनके संपर्क में आकर सुखों का साक्षात्कार कर सका, खुद को बदल सका. अन्ना के भीतर उनके द्वारा किए गए कामों, बदलावों और आदमियों की समर्थन में खड़ी जमात ने नई ताकत दे दी. अन्ना बुराइयों के खिलाफ समय समय पर खड़े होने लगे. बुराइयों से पंगा लेने लगे. अड़ने लगे.

और आज अन्ना 13 दिन ना खाकर भी भरे पूरे पेट वाले मनुष्य की तरह दिखते हैं. क्योंकि अन्ना की ताकत भोजन नहीं है. भोजन तो माध्यम भर है शरीर का ढांचा खड़ा रखने के लिए. अन्ना की असली ताकत उनकी आंतरिक दुनिया है जो प्लैटोनिक प्लीजर से भरी हुई है. उन्हें यह प्लैटोनिक प्लीजर हमारे आपसे मिलती है, इस देश समाज के सुखमय होने की उम्मीदों से मिलती है, लड़ते हुए अड़ते हुए बुरे को ठीक करा ले जाने में मिलती है. जादू की छड़ियां कहानियों में होती हैं, इसलिए अन्ना को ऐसा नहीं मानना चाहिए कि वे उठ खड़े हुए हैं तो सब ठीक हो जाएगा. उन्होंने एक आतंकित समाज, आतंकित समय में अपने प्लैटोनिक प्लीजर की ताकत के बल पर असंभव को संभव बनाने की मुहिम छेड़ दी है. कई लोगों ने ऐसी मुहिम छेड़ी होगी और कइयों को इसमें आंशिक सफलताएं भी मिली होंगी.

यह एक अनवरत क्रम है. मुगल आए और जम गए. फिर वे अंग्रेजों के आने के बाद सत्ता से बेदखल हुए. अंग्रेज जमे तो अपने देश के जन जगे और दशकों के संघर्ष बाद वे हटे. अपने काले अंग्रेज सत्तानशीन हुए तो आंदोलनों के जरिए ही उनकी सत्ता वाली तंद्रा टूटी. वही क्रम फिर जारी है.  अन्ना के दबाव में चीजें बहुत कुछ दुरुस्त हो जाएंगी, बस यह उम्मीद है. अन्ना के आंदोलन से बहुत सारे लोग लड़ना और जीवन जीना सीख जाएंगे, बस यह उम्मीद है. मर रही लोकतांत्रिक प्रक्रिया और कानून-नियम अन्ना के आंदोलन से फिर स्वस्थ, चैतन्य हो जाएंगे, बस यह उम्मीद है. और, सबसे बड़ी उम्मीद ये कि कई पीढ़ियां जो बड़े और ऐतिहासिक आंदोलनों को इतिहास की किताब में पढ़कर जवान हुई हैं, वे रीयल बड़े आंदोलन कैसे होते हैं, इसका फील ले पाएंगे और यह मान पाएंगे कि दुनिया में असंभव कुछ नहीं होता.

मैं अपने जन्मदिन पर खुद को अन्ना से कनेक्ट कर अपने इंटरनल प्लीजर को बढ़ा पा रहा हूं, प्लैटोनिक प्लीजर के बनने-आकार लेने की प्रक्रिया को आगे बढ़ा पा रहा हूं, इसकी बहुत खुशी है. वरना आनंदित होने के लिए जो बाजार ने, सत्ता ने, सरकारों ने, दुनिया के संचालकों ने जो रास्ता बनाया दिखाया है उसमें तो बस एक क्षणिक मजा मिल पाता है, जो क्षण भर बाद ही रफूचक्कर हो जाता है. और, इसी क्षणिक मजा को पाने के लिए हम रोज रोज मरते और जीते रहते हैं. इस मजा को मैं निगेट नहीं कर रहा. शायद ये क्षणिक आनंद ही बहुत सारे लोगों के लिए बड़े आनंद की तरफ बढ़ने का रास्ता खोजने का दबाव बनाते हैं. विकल्प हमें तय करना होता है. वही रुटीन करते रहना है. उसी क्षणभंगुर दुख-सुख में लिपटे रहना है या इनसे निपटकर इन्हें पूरी तरह खूब खूब समझ बूझकर आगे बढ़ना है, इनसे थोड़ा उपर उठना है, कुछ अलौकिक चीजों की ओर जिन्हें आजकल तलाशने जीने का चलन बेहद कम हो गया है और जो है भी वह बेहद बाजारू व बकवास है.

पता नहीं मैं अपनी बात कितना कह पाया पर आखिर में जो कहना चाहूंगा वह सचमुच उपसंहार सा होगा कि जीवन का आनंद उसकी विविधता को भोगने या समझने या जानने में है, और उससे निकले निष्कर्षों नतीजों को मानकर थोड़ा अन्ना हो जाने में है, थोड़ा कबीर हो जाने में है, थोड़ा सूफी हो जाने में है, थोड़ा राम तो थोड़ा रहीम हो जाने में है, थोड़ा मुक्त हो जाने में है, थोड़ा पगला हो जाने में है, थोड़ा तथास्तु हो जाने में है… खुद से उम्मीद करता हूं कि आंतरिक बदलाव की प्रक्रिया को जी रहा यशवंत आने वाले वक्त में इतना खुद ब खुद बदलेगा कि उसे किसी खास उम्र वय में यहां से मुक्त होकर वहां जाने की घोषणा फेसबुक पर न करनी होगी और इस पर ऐसा विश्लेषण व्याख्यान न लिखना पड़ेगा. फिर कैसा होगा, क्या होगा, यह मुझे भी नहीं पता. हां, कुछ कुछ अनुभूत कर पाता हूं पर अभी उसे शब्दों का रूप दे पाना संभव नहीं.

कुछ आजकल की बातें-

  • एक दिन एक सज्जन मिले और मुझसे बोले कि मेरे एक मित्र ने तुम्हारे बारे में कहा कि यशवंत की छवि मार्केट में बहुत खराब हो रही है. मैंने उनसे यह बताते हुए पूछा कि मैं तो वैसे खुद को बुरा आदमी ही मानता हूं लेकिन यह जानने में खुशी होगी वह किस वजह से मुझे बुरा आदमी मानते हैं. तब उन्होंने बताया कि यशवंत दिन में पिये रहता है, ऐसी चर्चा सुनने को मिलती है, यह खराब बात है और इससे छवि खराब हो रही है. तब मैंने उन्हें समझाया कि दो तरह के लोगों की दो तरह की छवियां होती हैं. एक मालिक वर्ग होता है और उसके यहां का नौकर वर्ग. नौकर वर्ग अपनी छवि ठीक रखने की फिराक में होता है क्योंकि उसे मालिक वर्ग के यहां काम करना होता और मालिक कभी नहीं चाहता कि उसका नौकर दिन में पिये रहे. सो, अगर मुझे कहीं नौकरी मांगनी होती तो मैं जरूर अपनी छवि को ठीक रखने की कोशिश करता कि हे मालिकों, देखो, मैं तुम्हारे लायक नौकर हूं. छवियां वो लोग ठीक रखें जिन्हें नौकरियां करनी और मांगनी हैं. मैं तो भोग में पड़ा हुआ प्राणी हूं जो दिन रात कुछ नहीं देखता. और सच बताऊं, पिछले महीनों में कुछ मित्रों ने बड़ी अदभुत किस्म की मदिरा भेंट की, भिजवाई. और मैं उस मदिरा का पान अक्सर दिन में ही कर लेता. एक मदिरा अदभुत और दूसरे बेटाइम चढ़ाने के दुस्साहस का आनंद. नतीजा ये हुआ कि मदिरा से मन भर गया. मांसाहार का गजब प्रेमी मैं. झिंगा, प्रान, मछली, बकरा, मुर्गी.. नाना प्रकार के प्राणियों का भोजन करता. दिन में ही इन्हें बनवाना शुरू कर देता. कोई पकाकर रखता और मुझे बुला लेता. कहीं अच्छा मिलने की बात सुनता तो वहां खाने पहुंच जाता. नतीजा ये हुआ कि मांसाहार उतना ही मेरे लिए सामान्य हो चुका है जितना दाल-भात. दोनों सामने रखें हो तो दोनों में से किसी के प्रति कोई उत्तेजना वाला भाव पैदा नहीं होगा. यही हाल सेक्स का है. सेक्स के बारे में विस्तार से एक किताब लिखने की योजना है, सो उससे जुड़ी घटनाओं का खुलासा अभी नहीं करूंगा पर हां इतना बता सकता हूं इसके आनंद-अतिरेक से मन प्लावित हो चुका है. पर, जैसा कि इंद्रियजन्य हम सब प्राणी हैं और खाना पीना हगना मूतना सेक्स करना पढ़ना काम करना धन कमाना विमर्श करना आदि इत्यादि सबके जीवनचर्या का पार्ट होता है, सो मेरे भी है, पर बस इतना अलग है कि इन चीजों से धीरे धीरे उपर उठने लगा हूं और इन्हें, इनके प्रति वैसा ही भाव पैदा होने लगा है कि जैसे ये हों भी और न भी हों. मैं कुबूल करता हूं मेरे भीतर इंद्रियजन्य कुंठाएं भारी मात्रा में मौजूद थीं, और शायद होंगी भी, क्योंकि ठीकठीक दावा करना उचित न होगा. पर इनसे पार पाने के लिए इनसे भागने का रास्ता नहीं अपनाया, इनसे भिड़ने और इन्हें भोगने की राह पर चला. मुझे बताते हुए खुशी है कि एक खास लेवल की उदात्तता के चलते इन भोगों के दौरान भी इनकी सार्थकता और निरर्थकता को वाच करता रहा, महसूस करता रहा और इनकी संपूर्णता को आत्मसात कर विलीन कर लिया, न संपूर्ण स्वीकार और न कंप्लीट रिजेक्शन.
  • एक वाद्ययंत्र बजाने का मन था. जिसके लिए पिछले दिनों एक पोस्ट लिखकर अपील भी की थी कि कोई तो सिखा दो भाई. कई जगहों से प्रस्ताव भी आए. सबका शुक्रगुजार हूं. पर कहीं जा न सका. तब अचानक दिल में खयाल आया कि सीखने के लिए खुद मेहनत करनी पड़ती है, रास्ता बनाना पड़ता है, दो कदम आगे बढ़ना पड़ता है. आखिर में तय किया कि वाद्ययंत्र पहले खरीद लिया जाए. तो केसियो खरीद लाया. करीब 2300 रुपये में. और जिस शाम खरीदकर लाया उसी रात यूट्यूब पर ट्यूटोरियल के सहारे दो धुनों को बजाना भी सीख लिया. अभ्यास जारी है. बहुतों को गुरु नहीं मिले और उन्होंने अपने स्वाध्याय से सीखा. मैं अपने लिए खुद उदाहरण हूं. कंप्यूटर की कखग नहीं जानता था जब अमर उजाला, कानपुर में भर्ती हुआ. लेकिन पेज आपरेटरों की उंगलियों की धड़कन, छिटकन और उठान-गिरावट को देख-बूझकर धीरे धीरे सीख लिया. और, आज उसी कंप्यूटर के भरोसे डाट काम का काम कर रहा हूं. तो मेरे सीखने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. संगीत प्रेमी हों और कुछ बजाना जान जाएं तो क्या कहने. मुझे हमेशा ये लगता है कि जब तक हम लोग नया कुछ भी, थोड़ा बहुत भी शुरू नहीं करेंगे, शुरू करने का साहस नहीं इकट्ठा करेंगे, तब तक हम कल्पना की दुनिया में ही जीते रहेंगे. कल्पनाओं, सपनों का होना बहुत जरूरी है पर उससे आगे बढ़ना उससे ज्यादा जरूरी है. और लगातार जुटे डटे रहने से क्या कुछ नहीं हो सकता.
  • कई लोग पूछते हैं कि यशवंतजी, आप अपनी अच्छी बुरी सारी बातें लिख देते हैं, छोटी छोटी बातें बता देते हैं. यह कितना ठीक है. या ऐसी बातों से औरों का क्या मतलब, क्यों सबको यह सब पढ़वाते हैं. तब मेरा उन्हें सिर्फ एक कहना होता है कि भइये, हम सब जो हैं, उसमें हमारे अब तक के पूर्वजों, आजतक के खोजों, आजतक की बातों का बड़ा योगदान है. और छोटी छोटी चीजों को जब आप बड़े फलक पर डाक्यूमेंटाइज करते हैं तो वह बहुत सारे लोगों के लिए इन्सपिरेशन का काम करता है. खासकर हम हिंदी पट्टी के लोग जो महानता का बखान तो खूब करते हैं पर जब अपनी लाइफस्टाइल को बयान करते हैं तो वह सब छुपा देते हैं जिससे यह खतरा होता है कि महानता वाली छवि का विखंडन हो जाएगा. अज्ञेय का एक उपन्यास है- शेखर एक जीवनी. वह एक शख्स के जीवन के बनने, सुख-दुख की कहानी है. बहुत छोटी छोटी चीजें उसमें दर्ज है. वह बड़ा उपन्यास माना गया. उस उपन्यास के बारे में अज्ञेय कह गए कि हर व्यक्ति का जीवन एक महाकाव्य है, बशर्ते उसमें अपने जीवन को वाच करने और उसके सूक्ष्तम चीजों, बदलावों, आड़ोलनों को दर्ज करने की क्षमता हो. हिंदी पट्टी में नायकत्व हमेशा एक्सट्रीम का रहा है. या तो हम भगवान मान लेते हैं या कंप्लीट विलेन. बीच में स्पेस नहीं देते. मेरी कोशिश है कि मनुष्य को मनुष्य की तरह देखा जाए. उसके समस्त गुणों-अवगुणों के साथ स्वीकारा और सम्मान दिया जाए. यह डेमोक्रेटिक होने, रेशनल होने की तरफ बढ़ना होगा. और बगैर डेमोक्रेटिक हुए, बगैर रेशनल हुए हम बेहतर मनुष्य, बेहतर समाज नहीं बना सकते. एक सनकी और अतिवादी समाज और मनुष्य को जिंदा रखे रहेंगे जो कभी बर्बर हो जाएगा या कभी फूटफूट कर रोएगा. शायद मैं भी कुछ ऐसा ही रहा हूं और हूं, पर यह सब जो लिखता हूं, बताता हूं, जीता हूं तो इससे उबरने की प्रक्रिया भी खुद ब खुद अंदर शुरू हो जाती है और इससे उबरने में काफी सफलता मिलती है. चिकित्साशास्त्र में एक शाखा है जिसमें बताया जाता है कि अगर आप अपनी सारी बातें किसी से कह देते हैं, लिख देते हैं, बता देते हैं, सुना देते हैं तो अपने तनावों, दुखों, मनोभावों को काफी कुछ रिलैक्स कर लेते हैं, मुक्त होते जाते हैं. शायद भड़ास की बात यही है. जो कुछ है अंदर उसे बाहर निकालिए, बुरा अच्छा बेकार सुंदर… सब कुछ. ताकि आप इन सबसे उबर कर कुछ और नया तलाश जान सीख पा सकें.

काफी कुछ हो गया. बात खत्म करता हूं. पर एक संगीत भेंट करके. आजकल जिन गीत-संगीत को आंखें बंद कर सुनता रहता हूं, उनमें एक प्रिय नीचे दिया है. एक माल से सीडी खरीदकर लाया था. ”रेयर इनस्ट्रुमेंट्स आफ इंडिया” के नाम वाली सीडी. जिस ”धुन इन कहरवा” को सुनाने जा रहा हूं, उसके कांट्रीब्यूटींग आर्टिस्ट हैं आशीष बंदोपाध्याय. किसी मनुष्य की आवाज नहीं है. सिर्फ एक इनस्ट्रुमेंट है. वो अपन लोगों के देश का है. इसे आप सुख और दुख, दोनों के मनोभाव में सुनिए और लगेगा कि आपके दोनों मनोभावों में ये शरीक है. और, उन मनोभावों से उपर जाने की बात कह-समझा रहा हो जिसे कुछ कुछ हम आप समझ रहे हों और कुछ कुछ सुबह सुनने समझने की बात कह रहे हों. सुनिए और आनंदित होइए. नीचे दिए गए आडियो प्लेयर को क्लिक करिए…

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लेखक यशवंत भड़ास4मीडिया से जुड़े हुए हैं.

अन्ना हजारे को अरिंदम चौधरी ने ये क्या-क्या कह डाला!

अरिंदम चौधरी को तो जानते ही होंगे आप लोग. आईआईपीएम के फर्जीवाड़े का जनक और इसके जरिए पैदा हुआ शिक्षा माफिया. प्लानमैन कंसल्टेंसी और प्लानमैन मीडिया जैसी कंपनियों का सर्वेसर्वा. ये महोदय कई भाषाओं में मैग्जीन भी निकालते हैं. मीडिया का अच्छा खासा कारोबार शुरू किया हुआ है. और, ये महोदय दूसरे मीडिया हाउसों को जमकर विज्ञापन भी देते हैं ताकि इनके व्यक्तित्व की चकाचौंध बनी रहे और युवा छात्र-छात्राएं लाखों-करोड़ों रुपये लुटाकर उनके आईआईपीएम में पढ़ने जाएं.

आईआईपीएम के फर्जीवाड़े और इनके मीडिया कारोबार के असली हकीकत को हम बाद में बताएंगे. पहले बता रहे हैं कि यह शिक्षा माफिया किस तरह अन्ना हजारो को बदनाम करने पर तुला हुआ है. अपने एक लेख में अरिंदम चौधरी ने अन्ना हजारे को जिद्दी, गैरजिम्मेदार, घमंडी, असंवेदनशील और अदूरदर्शी जैसी उपाधियों से नवाजा है. अरिंदम चौधरी अपने लेख में किंतु परंतु लेकिन करते-करते आखिर में अन्ना को बुरा आदमी साबित करते हुए दिख जाते हैं. आखिर यह शिक्षा माफिया क्यों ऐसा कर रहा है? जानकारों का कहना है कि अरिंदम का अन्ना विरोध सोची समझी रणनीति का हिस्सा है.

बहुत पहले की बात है जब एक बार अरिंदम ने अन्ना के गुणगान करते हुए उन्हें लाखों रुपये के एक पुरस्कार से नवाजने की घोषणा की थी लेकिन जब अन्ना को अरिंदम की सच्चाई समझ में आई तो उन्होंने पुरस्कार लेने से मना कर दिया. अन्ना को उनके साथियों ने बताया कि अरिंदम का कामधंधा ट्रांसपैरेंट नहीं है और इन पर कई तरह की गड़बड़ियों के जरिए छात्र-छात्राओं और सरकार को छलने का आरोप है. अन्ना को यह भी बताया गया है कि अरिंदम चौधरी शिक्षा माफिया है. तब अन्ना ने पुरस्कार लेना स्वीकार नहीं किया. इससे अरिंदम चौधरी के मन में अन्ना के प्रति नकारात्मक भाव पैदा हो गया.

दूसरे, केंद्र की सरकार के पास अरिंदम और आईआईपीएम की गड़बड़ियों की लंबी चौड़ी फाइल पड़ी है. इनके खिलाफ कई आदेश भी जारी हुए हैं. पर जिस तरह इस दौर में सारे सत्ता संरक्षित भ्रष्टाचारी मजे ले रहे हैं, उसी तरह अरिंदम भी सरकार के लोगों को पटाकर अपना धंधापानी करने में सफल हो पा रहा है और अपनी मीडिया कंपनी के जरिए अपने को बौद्धिक दिखाने का स्वांग रच पा रहा है. इसी कारण कांग्रेस नीत केंद्र सरकार के पक्ष में खड़ा होना और अन्ना को बुरा कहकर सरकार का बचाव करना उसकी फितरत में शामिल हो गया है. अरिंदम के लेख के कुछ पैरे को नीचे दिया जा रहा है, जिसे आप पढ़ें…

”सारे देश में युवा और बुजुर्ग सरकार के अभिमानी और अडिय़ल रुख की निंदा कर रहे हैं. वे अकसर सरकार पर यह इल्जाम सही ही लगाते रहे हैं कि वह उनकी बात सुनने तक को तैयार नहीं. इसमें कोई शक नहीं कि सत्तारूढ़ गठबंधन के कुछ वरिष्ठ नेताओं के कुछ बेहद गैर-जिम्मेदाराना और बेवजह के बयानों ने लोगों की इस सोच को बल दिया है और भ्रष्टाचार के कारण सरकार से पहले से ही बहुत खिन्न जनता के आक्रोश को और बढ़ा दिया है. फिर भी अगर सरकार जिद्दी और अभिमानी होने की दोषी है तो क्या अन्ना हजारे भी वैसा ही रवैया नहीं दिखा रहे? अन्ना हजारे और उनके समर्थक सरकार पर असहिष्णु और असंवेदनशील होने का आरोप लगा रहे हैं क्योंकि वह अन्ना के बनाए लोकपाल बिल के प्रारूप को स्वीकार करने को तैयार नहीं है. लेकिन अन्ना के लोकपाल बिल पर आशंका जताने वाले हर व्यक्ति को सरकार का पिट्ठू और देशद्रोही बताकर क्या वे अपनी असहिष्णुता और असंवेदनशीलता नहीं दिखा रहे? आखिर अन्ना और उनकी टीम पूरे विश्वास के साथ यह दावा कैसे कर सकती है कि लोकपाल बिल का केवल उनका ही प्रारूप सही है और कोई उसकी आलोचना नहीं कर सकता? अगर सरकार खुद को सही साबित करने के लिए लोकप्रिय जनादेश और संसद के सर्वोच्च आधिकारों की आड़ ले रही है तो क्या अन्ना की टीम दिखावटी नैतिकता की आड़ में छुपने की कोशिश की दोषी नहीं है?”

”अगर साफ-साफ कहूं तो, पिछले कुछ महीनों से, सरकार और अन्ना की टीम दोनों ही असहिष्णु, अडिय़ल और असंवेदनशील होने की दोषी हैं.  देश के लाखों भारतीय कुछ कांग्रेसी नेताओं द्वारा सार्वजनिक तौर पर अन्ना को कोसने और उनकी टीम को भ्रष्टाचार में शामिल बताने की वजह से खासे नाराज हैं, और यह जायज भी है. लेकिन अन्ना की टीम भी अप्रैल से ही प्रधानमंत्री, भारत की संसद, भारतीय चुनाव और यहां तक कि भारतीय लोकतंत्र को सार्वजनिक तौर पर कोसने के अलावा और क्या कर रही थी?  और हां, मैं इस बात से सहमत हूं कि सरकार में कई ऐसे लोग भी हैं, जो इसी चीज के हकदार हैं, लेकिन आखिरकार हर चीज का एक लोकतांत्रिक तरीका तो होना ही चाहिए. एक समूह की तानाशाही को सिर्फ इसलिए नहीं स्वीकार किया जा सकता, क्योंकि वह लोगों के उन्माद को हवा देने में कामयाब हो रहा है. आखिर एक संविधान है, अदालत है और एक निर्वाचित संसद है, जिसके नियमानुसार ही सबकुछ होना होता है.”

”जब अन्ना तिहाड़ में थे और वहीं रहने की जिद पर अड़े थे तो बहुत सारे भारतीय इसे उनके संघर्ष के अदम्य साहस के तौर पर देख रहे थे. लेकिन छोडिए भी. सरकार ने उनके अनशन को रोकने के लिए मूर्खतापूर्ण शर्तें लगाकर और उन्हें गिरफ्तार कर एक बड़ी भूल की. लेकिन भारी जनविरोध ने सरकार को झुकने और समर्पण के लिए विवश किया. बाद में खुद सरकार ने कहा कि अन्ना की टीम और उनके समर्थक अनशन कर सकते हैं. उसने अनशन पर थोपी सभी मूर्खतापूर्ण शर्तों को वापस लेने की सार्वजनिक घोषणा भी की. तो क्या अन्ना हजारे इस शानदार जीत के बाद कुछ उदार हुए? नहीं, अब वह इस बात पर अड़े हैं कि उन्हें वह सब कुछ हासिल करने दिया जाए, जो वह चाहते हैं. सरकार पूरी तरह से नतमस्तक होकर उनकी सभी मांगें मानती रहे. इस बीच भावनाओं से भरे उनके लाखों समर्थक खुद को जोखिम में डालकर देशभर में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. क्या इसे जिद्दी, घमंडी और असंवेदनशील होना नहीं माना जाएगा?”

”अन्ना जरूर विरोध करें, लेकिन वह इसको थोपने की जिद पर अड़े नहीं रह सकते. विरोध प्रदर्शनों का अपना प्रभाव होता है और इससे बदलाव भी होते हैं. लेकिन यह हमारे संविधान और लोकतांत्रिक मशीनरी के समर्थन के बिना संभव नहीं हो सकता. भावनात्मक उन्माद से भरी भीड़ अगर उत्पात मचाने पर आमादा हो तो हिंसा और त्रासदी की स्थिति के बीच एक बारीक फर्क ही रह जाता है. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब क्रोध से भरी लोगों की उग्र भीड़ आवेश और उत्तेजना में थी तो 1984 में दिल्ली में और 2002 में गुजरात में क्या हुआ था. जैसा कि मैने शुरू में ही कहा था कि मैं तब बहुत छोटा था, इसलिए 1970 के दशक की शुरुआत के उन घटनाक्रमों को ठीक से याद नहीं कर सकता जिनकी वजह से आपातकाल लगा था. लेकिन मैं यह अवश्य जानता हूं कि लोकनायक जय प्रकाश नारायण आज भी एक पूजनीय गांधीवादी नेता हैं, जो एक स्वच्छ और बेहतर भारत के लिए जीवनपर्यंत लड़ते रहे. अन्ना हजारे को भी दूसरा जेपी बताया जा रहा है. लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि बहुत से निष्पक्ष इतिहासकार, जो व्यक्तिगत तौर पर तो जेपी के घोर प्रशंसक हैं, अब खुलेआम कहते और लिखते हैं कि जेपी का अडिय़ल रवैया और प्रदर्शनों के जरिए भारत को पंगु बना देने का उनका आह्वान गैर-जिम्मेदराना और अदूरदर्शी था. क्या इतिहास अन्ना हजारे को भी ऐसे ही देखेगा?”

तो ये थे अरिंदम चौधरी के आलेख के कुछ अंश. इसे पढ़ने के बाद आपको साफ समझ में आ गया होगा कि यह शख्स किस तरह शब्दों की जलेबी छानकर सरकार के पक्ष में और अन्ना व उनकी टीम के विरोध में खड़ा हो गया है. जरूरत है अब अरिंदम चौधरी के आईआईपीएम, प्लानमैन कंसल्टेंसी और प्लानमैन मीडिया की सच्चाई का खुलासा करने की. भड़ास4मीडिया पर जल्द ही अरिंदम चौधरी की असलियत को सीरिज में प्रकाशित किया जाएगा ताकि लोग जान सकें कि अन्ना का विरोध करने वाला यह शख्स और इसकी कंपनियां खुद कितनी इमानदार हैं. अगर आपके पास भी अरिंदम चौधरी और इसकी कंपनियों के बारे में जानकारियां हों तो भड़ास4मीडिया को bhadas4media@gmail.com के जरिए मुहैया कराएं ताकि उसे प्रकाशित कराया जा सके.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

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इंडिया गेट टू जंतर-मंतर : अगस्त 2011 – ए लव स्टोरी… कुछ दृश्य

1-वो इंडिया गेट से जंतर-मंतर के बीच किसी चौराहे पर मिली. चेहरे पर खुशी-उल्लास. वही नारे लगा रही थी, जो लोग लगा रहे थे. अत्याचारी बंद करो. भ्रष्टाचार बंद करो. वो छुटकी रोजाना मसाले, सुर्ती, तंबाकू, सिगरेट, चने, मूंगफली बेचती है. उसके साथ उस जैसे कई बच्चे भी यही काम करते हैं. रोज कुआं खोद पानी पीने वाले हैं ये. स्कूल नहीं जाते क्योंकि सांसों की डोर के लिए ज्ञान की नहीं बल्कि चंद सिक्कों की जरूरत होती है.

छुटकी की नारेबाजी, उठने ही वाला है हाथ…

ये लो, वो झंडा अभी संभाल रहे हैं, इधर लग गया नारा और उठ गई बंद मुट्ठी

अभी वे लोग झंडा-मोबाइल में फंसे हैं, इधर छुटकी ने गला फाड़कर अत्याचारी मुर्दाबाद कह दिया.

बाबू, इधर ले आओ तिरंगा झंडा, जरा हम भी तो देखो… अरे अरे नहीं दोगे… साले चश्मा वाले, ये तिरंगा तुम्हारी बपौती नहीं है, और तुम लोगों ने अभी कहां तिरंगा हमें थामने दिया, पर चल निकल, फिलहाल तो हम भी तेरे साथ हैं …

2-इंडिया गेट से जंतर मंतर जाने वाले इतनी बड़ी संख्या में थे कि लग रहा था कि इंडिया गेट से जंतर मंतर के बीच कई किलोमीटर की सड़क सिर्फ और सिर्फ भारत के लाडलों से भरी पड़ी है. मैं भी इसी भीड़ का हिस्सा था. कभी कक्षा आठ दस बारह के बच्चों का हुजूम दिख रहा था जो स्कूली ड्रेस और बस्ते के साथ आंदोलन में शरीक हुए थे, स्कूल से बंक मारकर. ये किशोर उम्र विद्यार्थी सबसे ज्यादा जोरशोर से नारे लगा रहे थे. कभी बुजुर्ग दिख रहे थे जो खाए पिए घरों से थे लेकिन उन्हें करप्शन और महंगाई के मुद्दे परेशान करते हैं. महिलाओं का रेला भी नारा लगाता चल रहा था. सुंदर सजीली जींसधारी लड़कियों का समूह भी इसमें था. नए फिल्मों के हीरो माफिक युवाओं की भरपूर मात्रा इस पैदलमार्च में शामिल थी.

3-तरह तरह के नारे लग रहे थे- सोनिया जिसकी मम्मी है, वो सरकार निकम्मी है. मनमोहन जिसका ताऊ है, वो सरकार बिकाऊ है. जिसने देश को बेचा है, राहुल उसका बेटा है. इंडिया अगेंस्ट करप्शन के वालंटियर ऐसे नारे लगाने से मना कर रहे थे पर भीड़ कहां मानने वाली. भीड़ का सरकार के प्रति गुस्सा तीखे रूप में नारों के जरिए प्रकट हो रहा था. खासकर स्कूल से भागकर आंदोलन में शामिल होने आए किशोरों को तो ऐसे ही नारे भा रहे थे और यही नारे वे शुरू से आखिर तक लगाते रहे.

4-एक लड़की जंतर मंतर से फोन पर अपने किसी दोस्त को अपनी लोकेशन बता रही थी. यह प्रेमी जोड़ा भटक गया था. लड़का इंडिया गेट के इर्दगिर्द भीड़ में नारे लगाते हुए घूम रहा था और साथ ही अपनी गर्लफ्रेंड को भी तलाश रहा था. लड़की रेले के साथ बहते हुए, नारे लगाते हुए जंतर मंतर आ पहुंची थी. दोनों कुछ देर में शायद मिल जाएंगे यहीं कहीं जंतर मंतर के आसपास, रिजर्व बैंक आफ इंडिया के करीब. ऐसी संभावना थी. लव स्टोरी में विचारधारा थी. लव स्टोरी में देश की चिंता भी थी. यह मेच्योर लव स्टोरी थी. ऐसों की संख्या काफी दिखी. और जब ”अगस्त 2011 – ए लव स्टोरी” में आंदोलन पार्ट हो तो आंदोलन की गहनता को समझा जा सकता है. और, यह आंदोलन सचमुच लवस्टोरी है, देश के प्रति प्यार की स्टोरी.

5-दिल्ली पुलिस के लोग चौराहों पर ट्रैफिक रोककर पैदलमार्च में शामिल लोगों को जाने का रास्ता बना रहे थे. ट्रैफिक रुकने के कारण चौराहों के इधर उधर रुके कारधारी बाइकधारी बससवार लोग रैली को संभावनापूर्ण नजरों से निहार रहे थे. रैली के लोग उन्हें देखकर नारे लगाते- वंदेमातरम, तो रुकी ट्रैफिक में फंसे लोगों के कंठ भी खुल जाते- वंदेमातरम. कांस्टेबल से लेकर इंस्पेक्टर तक खड़े थे चौराहों पर, आधुनिक हथियारों से लैस जवान भी थे. इन्हें देख नारे लगते- अंदर की है ये बात, दिल्ली पुलिस हमारे साथ. इतना भरोसा अपने पर और आंदोलन पर कि पैदलमार्च वालों को लगता कि पुलिस भी उनके साथ है क्योंकि देश की हालत से पुलिसवालों के घर-परिवार भी परेशान हैं.

6-मीडिया के लोगों का हुजूम था. हर चौराहे पर मीडिया वाले खड़े मिलते. थ्री इडियट्स का बैनर लगाए खड़े थे कुछ लोग जिसमें मनमोहन, चिदंबरम और कपिल सिब्बल की तस्वीर थी. एक लड़का इस बैनर पर जूता सटाए खड़ा था. फोटोग्राफरों की भीड़ सीन को कैमरे में कैद करने को बार बार क्लिक क्लिक कर रही थी. कई विदेशी फोटोग्राफर थे. अच्छी तस्वीर बन रही थी उनकी. कैमरे देखकर नारे लगाने वाले बड़ी संख्या में थे. मीडिया आंदोलन के साथ है, यह भाव सबके मन में दिखा. और मीडिया वाले भी कुछ अलग करने की जुगत में अलग-अलग मूड मिजाज के सीन फुटेज जुटा रहे थे, लाइव दे रहे थे. नागरिक पत्रकारिता के इस दौर में ढेर सारे युवा, बुजुर्ग अपने मोबाइलों से तरह तरह के फोटो और वीडियो खींच बना रहे थे.

7-कलाकार भी पैदलमार्च में काफी संख्या में थे. कोई ड्रम बजाता चल रहा था तो कोई गाने गाता. तिरंगा ज्यादातर के हाथों में था. डाक्टरी की पढ़ाई कर रहे छात्र-छात्राएं भी आंदोलन के सपोर्ट में ग्रुप बनाकर आए थे और नारे लगा रहे थे. कई संकोची युवा नारे नहीं लगाते दिखे लेकिन उनसे बात करने पर पता चला कि चाहते हैं कि सड़ा हुआ पानी बदले, नई तस्वीर बने, सुख-चैन का माहौल कायम हो. युवाओं का एक ग्रुप पानी के खाली बोतलों को सड़क पर पीट पीट कर बजा गा रहा था. मैं अन्ना हजारे हूं लिखी टीशर्ट पहने युवा सबसे अलग नजर आ रहे थे. किसी लड़की ने एक टीशर्टधारी से पूछा- ये टीशर्ट मिलते कहां हैं. युवक ने जवाब दिया- मुझे नहीं मालूम, मुझे तो कल शाम तिहाड़ के सामने दिया गया, वहां बांटा जा रहा था, तभी से पहना हूं.

8-जंतर-मंतर पर युवा कांग्रेस वालों ने काफी बड़ा इलाक अपने बैनर और तंबू से घेर रखा था. क्या कि राजीव गांधी के हत्यारों को फांसी मिलनी चाहिए. इस मांग से जुड़े पोस्टर टेंट में लगे हुए थे पर टेंट पूरा खाली था. कोई भी सज्जन नहीं दिख रहे थे. और जंतर मंतर पूरा अन्ना समर्थकों से भरा था. क्या पता उन्हें डर हो कि सरकार के प्रति नाराजगी के चलते भीड़ कहीं उन पर न टूट पड़े, इसलिए एक बड़ी जगह घेरकर, टेंट तंबू लगाकर वे खुद उखड़ गए थे वहां से.

9-अपने जीवन में मैं तरह तरह के प्रदर्शनों और आंदोलनों में शामिल हुआ था पर इस पैदलमार्च के साथ चलते हुए लग रहा था कि ये वही लोग हैं जिनके हम आंदोलन में शामिल होने की कामना किया करते थे पर लोग थे कि सुनते-समझते ही नहीं थे. आज ये सब लोग सड़क पर खुद ब खुद निकल पड़े हैं, अन्ना के नाम पर. उन्हें अन्ना में देवता दिखता है, सादगी दिखती है, ईमानदारी दिखती है, देश का असली नेता होने का स्वरूप दिखता है, गांधी दिखते हैं… तो इस देश की आम जनता को विचारधारा के जरिए नहीं, प्यार और सादगी से जीता जा सकता है, ऐसा महसूस हुआ. और जब आप उन्हें जीत ले, जोड़ लें तब चाहें जैसे शिक्षित करें, वे शिक्षित हो जाएंगे. नेता इससे सबक ले सकते हैं. विचारधारा वाली पार्टियां इससे सीख ले सकती हैं.

10-एक युवा अपनी शर्ट खोलकर उस पर भारत का नक्शा बनवाए था और अन्ना के समर्थन में व करप्शन के खिलाफ नारे लिखवाए थे. उसकी तस्वीर खींचने वालों की भीड़ थी. एक साथी शराब के नशे में इतने नारे लगाते रहे और पैदल चलते रहे कि जंतर-मंतर पहुंचकर उन्हें बेहोशी आ गई. अन्य अपरिचित लोगों ने उनकी इस तरह सेवा टहल की जैसे वे उनके ही घर के हों. अपनापन का एक भाव अजनबियों के मन में था और सब एक दूसरे से जन्मों-जन्मों से परिचित लग रहे थे. ऐसे आंदोलन जनता के दिलों को आपस में जोड़ते भी हैं. और ऐसे आंदोलन देशभक्ति की प्रचंड भावना पैदा करते हैं.

11- इंडिया गेट से जंतर मंतर पहुंचे एक अधेड़ हो रहे सज्जन ने अपनी निकली तोंद और पसीने से डूबी शर्ट को देखते हुए अपने एक दूसरे मित्र से कहा- चलो, अन्ना बाबा की कृपा रहेगी तो अपनी तोंद कम हो जाएगी. बहुत दिन बाद इतना पैदल चला हूं और खूब पसीना निकला है. शरीर से टाक्सिक चीजें बह गई हैं. राजनीति से भी विषैलापन खत्म होना चाहिए. उन्होंने अपने दोस्त को, जो जंतर-मंतर पर पराठे वाली दुकान से एक प्लेट लेकर भकोसने में लगे हुए थे, सलाह दी कि हम लोग मार्निंग वाक छोड़कर रोज अन्ना के आंदोलन में शामिल होंगे और देश की सेहत ठीक करने की प्रक्रिया के साथ अपनी तंदरुस्ती को भी रास्ते पर ले आएंगे.

उपर उल्लखित बातों और पैदल मार्च की झलकियां वीडियो में देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें–

IndiaGate to JantarMantar Part1

IndiaGate to JantarMantar Part2

IndiaGate to JantarMantar Part3

IndiaGate to JantarMantar Part4

IndiaGate to JantarMantar Part5

&

IndiaGate to JantarMantar Part6

… और, पैदल मार्च से जुड़ी कुछ चुनिंदा तस्वीरें यूं हैं…

…अन्ना एंड आंदोलन… अगस्त 2011 – ए लव स्टोरी… जारी है… कुछ सीन अगर आपके भी जेहन में हों तो इसमें जोड़ें और फिल्म को क्लाइमेक्स तक ले जाएं….

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

bhadas4media@gmail.com

इसे भी पढ़ें, क्लिक करें- जनांदोलनों के साथ हूं, इसलिए… मैं अन्ना हजारे हूं – बयान दर्ज करें

जनांदोलनों के साथ हूं, इसलिए… मैं अन्ना हजारे हूं – बयान दर्ज करें

मेरे एक मित्र पंकज झा, जो छत्तीसगढ़ भाजपा की मैग्जीन के संपादक हैं, ने सबसे एक सवाल पूछा है- ”जिन लोगों को अन्ना के इस आन्दोलन से काफी उम्मीद है उनसे एक असुविधाजनक सवाल पूछना चाहता हूं कि आखिर आज़ादी के बाद से अभी तक कितने आंदोलन को सफल होते उन्होंने देखा या सुना है? मेरे एक मित्र ने सही कहा कि गर्द-ओ-गुबार थम्हने दीजिए फिर सही तस्वीर देखिएगा.”

यह सवाल सिर्फ पंकज झा का नहीं है. ऐसे सवाल बहुत सारे लोग देश के अलग-अलग कोनों से उठा रहे हैं. और सवाल उठाने वाले अलग अलग बैकग्राउंड और विचारधारा के हैं. इसके जवाब में आप लोगों को मैं दो चीज कहूंगा. एक दिन आप बिना मकसद, बिना मतलब अन्ना के आंदोलन में शामिल हो जाइए. और वहां मौजूद लोगों को देखिए. हमारे आप जैसे घरों के बच्चे, युवा, बुजुर्ग, अभिभावक, लड़कियां, बच्चे, महिलाएं… आपको वहां मिलेंगे.

ये लोग सत्ता, सरकार और सिस्टम से उकताये-उबे हुए लोग हैं. आम जीवन में हम सभी रोज सिस्टम की क्रूरता, भ्रष्टाचार, असंवेदनशीलता से दो-चार होते हैं पर जब सिस्टम के खिलाफ आंदोलन की बात आती है तो उसके नाम पर वो पार्टियां सामने आती हैं जो खुद भ्रष्ट हो चुकी हैं और जनता का भरोसा खो चुकी हैं. चुनाव जीत जाना एक अलग बात है क्योंकि आजकल चुनाव लड़ने के लिए करोड़पति-अरबपति होना जरूरी होता है और चुनाव जीतने के बाद ये करोड़पति-अरबपति विभिन्न किस्म के भ्रष्टाचार से अपनी जेब भरते रहते हैं.

आजादी के बाद जितने आंदोलन हुए, वे भले सफल नहीं हुए पर उन आंदोलनों ने इस देश के लोकतंत्र को बचाए रखा, सत्ता के मद में चूर नेताओं को औकात न भूलने का दबाव बनाए रखा, तंत्र में लोक को हमेशा बड़ा मानने का ज्ञान पढ़ाए रखा… जेपी आंदोलन ने तानाशाह इंदिरा और कांग्रेस को उनकी औकात दिखाई. उस झटके के कारण कांग्रेस के नेताओं में जनता के प्रति भय पैदा हुआ जो हाल के वर्षों में गायब होता दिखा. लोकतंत्र की खासियत यही है कि अगर जनता संगठित और जागरूक होकर अपने हित में इकट्ठी न हुई तो सत्ता के भ्रष्ट से भ्रष्टतम होते जाने का रास्ता मिल जाता है.

इस देश में पक्ष और विपक्ष, दोनों दलों ने जनता के साथ धोखा किया है. दोनों ने भ्रष्टाचार के जरिए अथाह पैसा कमाया है. रोज ब रोज बढ़ती महंगाई को खत्म करने का बूता सरकारों में नहीं दिख रहा है. कारपोरेट इस देश की नीतियां बनाते और चलाते हैं, नेता उनके अप्रत्यक्ष प्रतिनिधि की तरह बिहैव करते हैं. भ्रष्टाचार और महंगाई का जो चोली-दामन का साथ है, उससे निपटना बेहद जरूरी हो गया है अन्यथा पैसा कुछ अमीर लोगों की जेब में जाता रहेगा और आम जनता दिन प्रतिदिन गरीबी रेखा के नीचे जाती जीती रहेगी. अन्ना के आंदोलन ने इस देश के लोकतंत्र को मजबूत करने का काम शुरू किया है. जनता की असली ताकत को दिखाने का काम किया है.

यह आंदोलन अपने मकसद में कामयाब हो या विफल, लेकिन इस आंदोलन ने भ्रष्ट नेताओं को संदेश दे दिया है कि उनकी तभी तक चल सकती है जब तक जनता चुप है. गर्द-ओ-गुबार थमने के बाद भी सही तस्वीर यही रहेगी कि अन्ना के आंदोलन से देश के नेता और पार्टियां अपनी औकात समझते हुए नई चीजें शुरू करेंगी जो उन्हें ज्यादा जनपक्षधर बनाएंगी. कम्युनिस्ट हों या संघ, मध्यमार्गी पार्टियां हों या जाति-भाषा वाली पार्टियां, सबकी सीमाएं जहां खत्म होती हैं, वहां से अन्ना का आंदोलन शुरू होता है. दुनिया का इतिहास गवाह है कि अक्सर बड़ी क्रांतियां छोटे मुद्दे पर शुरू हुआ करती हैं और बाद में निर्णायक रुख अख्तियार कर लेती हैं.

केंद्र में काबिज नेताओं ने अन्ना को रोकने के लिए क्या नहीं किया, लेकिन उनका हर उपाय उन्हीं के खिलाफ चला गया. सारे सलाहकारों के मुंह पर ताले पड़ चुके हैं. कांग्रेस सकते में है. भाजपा सत्ता विरोधी हवा को अपने पक्ष में करने की फिराक में है पर सफल नहीं हो पा रही क्योंकि जनता किसी भी पार्टी पर भरोसा करने के मूड में नहीं है. संभव है आगे अन्ना के साथ के लोग कोई राजनीतिक विकल्प खड़ा करने की सोचें पर फिलहाल तो यही सच है कि भ्रष्टाचार का इलाज करने के लिए एक कड़वी दवा इस लोकतंत्र को देने की जरूरत है और वह कड़वी दवा जनलोकपाल बिल ही है.

इस बिल के बारे में भी लोगों को आशंकाएं हैं कि कहीं इस बिल के बाद देश में लोकतंत्र का स्वरूप ही नष्ट न हो जाए और जनलोकपाल सबसे बड़ा सत्ता तंत्र बन जाए. इसका जवाब यही दिया जा सकता है कि वही जनता जो आज करप्ट सरकारों और नेताओं के खिलाफ सड़क पर है, कल जनलोकपाल के पथभ्रष्ट हो जाने और तानाशाह हो जाने की स्थिति में उसके खिलाफ भी सड़कों पर उतरेगी. पर मौत तय है इस डर से तो जीना नहीं छोड़ा जा सकता. इस देश में हजारों कानून हैं पर उनका इंप्लीमेंटेशन नहीं होता. इंप्लीमेंटेशन क्यों नहीं होता और इंप्लीमेंटेशन कैसे कराया जाए, यह बड़ा सवाल रहा है पर नेता और सत्ता के लोग इस पर चुप रहते हैं.

इन कानूनों का सत्ताधारी नेता अपने हित के लिहाज से उपयोग करते हैं. जो सत्ता का विरोध करना शुरू करे, उसे नष्ट करने और फंसाने के लिए उन कानूनों का तुरंत इस्तेमाल शुरू हो जाता है पर सत्ताधारी भ्रष्टाचारियों के खिलाफ वही कानून मौन रहते हैं. क्योंकि कानूनों को लागू करने वाली एजेंसियां सरकारों के दबाव में होती हैं. ऐसे में जनलोकपाल बिल जरूरी है ताकि सत्ता के मदांध सांड़ों को नाथा जा सका, काबू में किया जा सके, उन्हें उनके भ्रष्टाचार को लेकर कठघरे में खड़ा किया जा सके.

देश आजाद कितने बरसों में हुआ और कितने आंदोलन हुए, यह सबको पता है. सन 1857 से लेकर 1947 तक हजारों लाखों आंदोलन चले होंगे. कई दशक लग गए. पर अंततः आंदोलनों की सीरिज ने, जन जागरूकता ने, जन गोलबंदी ने अंग्रेजों पर इतना दबाव बनाया कि वे देश छोड़कर भागने को मजबूर हुए. इसी तरह अब अन्ना के नेतृत्व में जो जनगोलबंदी शुरू हुई है, और आगे भी यह विभिन्न लोगों, संगठनों, कार्यकर्ताओं के नेतृत्व में जारी रहेगी, वह सत्ताधारियों को घुटने के बल बैठने को मजबूर करेगी ताकि वे जनहित में काम करें, करप्शन पर लगाम लगाएं, महंगाई को पूरी तरह नियंत्रित करें, प्राकृतिक संसाधनों की लूट खसोट रोक सकें.

दिल्ली में जो जनसैलाब उमड़ा है, वह थमने का नाम नहीं लेगा, यह तय है. पूरा देश जब दिल्ली कूच करेगा तो दिल्ली वाले नेताओं की सांसें थम जाएंगी और वो मजबूर हो जाएंगे अन्ना की मांग मानने के लिए. अन्ना व्यवस्था में बदलाव कितना ला पाएंगे या नहीं ला पाएंगे, यह सवाल फिलहाल बेमानी है. हमें एक कदम आगे बढ़ना चाहिए ताकि निष्प्राण हो चुके कानूनों में जान फूंका जा सके. इस देश और लोकतंत्र को बचाने के लिए, बदलाव का सहभागी बनने के लिए हमको आपको सभी को अन्ना का साथ देना चाहिए ताकि हम अपनी विचारधाराओं से उपर उठकर सरकारों पर यह दबाव बना सकें कि वो काला धन देश में लाए, करप्शन करने वालों को सजा दे, उनकी संपत्ति जब्त करे और आम लोगों को राहत प्रदान करे.

अन्ना का आंदोलन अराजनीतिक हो चुकी कई पीढियों को राजनीतिक रूप से ट्रेंड करने का काम कर रहा है. जिन दिनों में बड़े नेताओं के बेटे ही राजनीति के योग्य माने जा रहे हों और उन्हें ही देश चलाने का अधिकार मिलता दिख रहा हो, उस दौर में हमारे आपके घरों के लोग राजनीति के प्रति प्रेरित हो रहे हैं, विरोध प्रदर्शन, राजनीतिक बहस-बतकही, लोकतंत्र से संबंधित विमर्श में शामिल हो रहे हों, तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए. राजनीति सिर्फ करप्ट लोगों की बपौती नहीं, राजनीति सिर्फ नेताओं के बेटे का पेशा नहीं बल्कि यह आम जनता को बेहतर जिंदगी दिलाने का माध्यम है, यह स्थापित होना चाहिए. संभव है अगले आम चुनाव में बड़ी संख्या में ऐसे नए चेहरे चुनकर संसद में पहुंचें जो हमारे आपके घरों के हों. इस बदलाव का असर भारतीय राजनीति पर जरूर पड़ेगा, कोई इससे इनकार नहीं कर सकता.

आखिर में कहना चाहूंगा कि यह पक्षधरता का वक्त है. बहस का नहीं. बहुत बहसें हो चुकी हैं. अब थोड़ा सी उर्जा लगाकर सड़क पर उतरें. और सरकारों, भ्रष्टाचारियों, नेताओं, अफसरों को अपनी ताकत दिखाएं. उन्हें औकात में रहने का संदेश दें. ध्यान रखिए, अगर हम चुप बैठे रहे तो देश बेचने वाले देश बेच डालेंगे और हम बहसों में ही उलझे रहेंगे. तय करो किस ओर हो, आदमी के साथ हो या कि आदमखोर हो… इन पंक्तियों में छिपे-छपे संदेश को महसूस करिए और अपना अपना पक्ष तय करिए. आपके दो पैर दो कदम भी अन्ना के आंदोलन में चल सकें तो यह बड़ी परिघटना होगी. इसलिए आप चाहें जिस शहर में हों, आप दिल्ली कूच करें, रामलीला मैदान पहुंचें. निर्णायक वक्त को आपके समर्थन की दरकार है.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

bhadas4media@gmail.com

अन्ना और मीडिया से आतंकित सत्यव्रत चतुर्वेदी व रमाकांत गोस्वामी का भाषण सुनकर उन्हें सुनाए बिना न रह सका

: आपको पता है कि …लम्हों ने खता की, सदियों ने सजा पाई.. लिखने वाले शायर का नाम? : जब आप सम्मान लेने बुलाए गएं हों तो मौका-ए-वारदात पर पूरे सम्मान के साथ मौजूद रहना चाहिए. किसी को टोकना-टाकना नहीं चाहिए. और, सम्मान पकड़कर प्लास्टिक वाली मुस्कान फेंकते हुए मनेमन मुनक्का मनेमन छुहारा होते हुए अपनी सीट पर लौट आना चाहिए.

और सम्मानित किए जाने वाले घटनास्थल से विदा लेते हुए सबके प्रति आभार से भर जाना चाहिए, सिर झुका-झुका कर व्यक्त कर आना चाहिए. यही रिवाज है. यही चलन है. पर लगता है अब अपनी किस्म में सभा-सभागारों में जाना नहीं लिखा है क्योंकि जहां जाता हूं वहां अपनी असहमति व्यक्त किए बिना नहीं रह पाता हूं, और, जाहिर है, इससे आयोजकों को थोड़ी दिक्कत परेशानी होती होगी. अपने बड़े भाई समान मित्र पंडित सुरेश नीरव ने बड़े प्रेम से आदरणीय दामोदर दास चतुर्वेदी स्मृति सम्मान समारोह में सम्मान लेने के लिए बुलाया था. आज अन्ना डे होने के बावजूद प्रोग्राम हुआ और मैं उसमें शरीक हुआ. मंच पर कांग्रेस के दो नेता मौजूद थे. सत्यव्रत चतुर्वेदी और रमाकांत गोस्वामी.

सत्यव्रत चतुर्वेदी कांग्रेस के राष्ट्रीय स्तर के नेता माने जाते हैं और रमाकांत गोस्वामी हिंदुस्तान अखबार में 33 साल नौकरी करने के बाद इन दिनों कांग्रेस की दिल्ली राज्य सरकार में उद्योग मंत्री हैं. इन दोनों नेताओं ने मंच से अपने भाषण में बिना नाम लिए अन्ना और उनके आंदोलन को कोसा. और दोनों ने ही मीडिया को जमकर कोसा. तरह तरह के उदाहरण देकर कोसा. कई बार मैं उन दोनों को सुनते हुए उबला लेकिन चुप रहा. पर जब सम्मान लेने के लिए मंच पर बुलाया गया तो दो मिनट बोलना है, कहकर मंच की तरफ बढ़ चला.

संचालक महोदय को मजबूरन माइक थमाना पड़ा और मैं कह बैठा- चूंकि मैं भड़ास4मीडिया से हूं और भड़ास निकालना मेरा काम है, इसलिए यहां जो मन में भड़ास है, उसे निकाल ही देना चाहता हूं. मैं कांग्रेस के इन दोनों नेताओं, जिनके हाथों सम्मान दिलाया जा रहा है, के संबोधन से अपनी असहमति जाहिर करता हूं. मीडिया में मार्केटिंग बहुत ज्यादा हो गई है संबंधी रमाकांत गोस्वामी के आरोप के बारे में उनसे पूछना चाहूंगा कि इस देश में मार्केटिंग, बाजारीकरण की शुरुआत क्या कांग्रेस पार्टी ने नहीं कराई, और जब कराई तो फिर अब मीडिया को क्यों कोस रहे हैं, खुद को कोसें. दूसरी बात, मैं अन्ना का जोरदार समर्थक हूं, और चाहता हूं कि इस देश में जनांदोलन होते रहें ताकि बेलगाम सत्ताधारियों के मन में डर रहे और इसी डर के कारण वे गलत काम न करें, जनता के प्रति उनकी जवाबदेही बनी रहे.

कुछ इसी तरह की बातें कहकर मैं मंच से नीचे उतर आया. सभागार में बैठे लोगों ने मेरे कहे को समर्थन अपनी तालियों से दिया. बाद में ईटीवी के साथियों ने बाइट ली, और मुझे सराहा कि मैंने उनके दिल का बात कह दी. कई लोगों ने मुझसे मिलकर मुझे सराहा. पर मैं यह सोचता रहा कि अगर सभी के मन में सत्यव्रत चतुर्वेदी और रमाकांत गोस्वामी के कहे के प्रति गुस्सा था तो बाकियों ने अपना विरोध क्यों नहीं प्रकट किया. हां, संतोष मानव नामक सज्जन ने अपनी तल्खी का इजहार रमाकांत गोस्वामी के बोलते वक्त यह कहकर किया कि- ”फिर आप ही गांधी बनने की कोशिश क्यों नहीं करते”.

मानव ने रमाकांत गोस्वामी से यह तब कहा जब गोस्वामी अन्ना का नाम लिए बिना कह रहे थे कि जो लोग आजकल गांधी के नाम पर सब कुछ कर रहे हैं वे दूर दूर तक गांधी जैसा कुछ नहीं कर रहे हैं. पूरे आयोजन में कांग्रेसी नेताओं का संबोधन यह बताने के लिए काफी रहा कि कांग्रेसियों के दिलोदिमाग पर इन दिनों अन्ना और मीडिया का खौफ बुरी तरह तारी है. रमाकांत गोस्वामी कह बैठे कि उनके यहां इलेक्ट्रानिक मीडिया के एक ब्यूरोचीफ आए और कह बैठे कि उन्हें कोई ऐसी खबर बताइए जिसे बेचा जा सके. यह सुनाते हुए रमाकांत गोस्वामी का कहना था कि मीडिया में आजकल खबर नहीं, मार्केटिंग का दौर है.

जाहिर है, कभी पत्रकार रहे रमाकांत गोस्वामी कांग्रेसी होने के अपने धर्म का निर्वाह कर रहे थे क्योंकि अगर वे मीडिया का विरोध करने के बहाने अन्ना का विरोध नहीं करते तो कांग्रेस के प्रति अपनी निष्ठा का कैसे प्रदर्शन करते. सत्यव्रत चतुर्वेदी ने अपने संबोधन में अपनी एक कविता सुनाकर यह साबित करने की कोशिश की कि राजनीति में न सबकुछ अच्छा होता है और न सबकुछ बुरा. दोनों के बीच संतुलन ही राजनीति है. और जो कविता सुनाई उसमें उन्होंने रामायाण के कई प्रसंगों के जरिए राम को सत्तालोलुप बताते हुए उनके कई कृत्यों को जनविरोधी और समाजविरोधी साबित किया.

रमाकांत गोस्वामी भी उन्हीं के नक्शेकदम पर रामायण का जिक्र करते हुए दशरथ को कह बैठे कि उन्हें मोक्ष नहीं मिला क्योंकि उन्होंने मरते हुए हे राम की जगह बेटा राम कहा था जबकि गांधी ने मरते हुए हे राम कहा था, इसलिए उन्हें जरूर मोक्ष मिला होगा. इन कांग्रेसी नेताओं को सुनते हुए लग रहा था कि वाकई कांग्रेसी कितने ढीठ, थेथर, कुतर्की, जनविरोधी और अतिशय आत्ममुग्ध होते हैं. अन्ना के आंदोलन के इस दौर में मुझे इन अन्ना विरोधी कांग्रेसियों के हाथों सम्मान लेते हुए मलाल हुआ लेकिन मंच पर अपनी बात रखकर मैंने अपने मन को हलका कर लिया और बाद में ”…लम्हों ने खता की, सदियों ने सजा पाई” लाइनें लिखने वाले मुजफ्फरनगर के बुजुर्ग शायर को सम्मान में मिली शाल को अपनी तरफ से ओढाकर उन्हें सम्मान के काबिल करार दिया और इस तरह से सम्मान के बोझ से मुक्त हुआ.

रमाकांत गोस्वामी, शशि शेखर, सत्यव्रत चतुर्वेदी और पंडित सुरेश नीरव.

”लम्हों ने खता की, सदियों ने सजा पाई” लिखने वाले शायर के साथ बाएं डा. सुभाष राय और दाएं कुमार सौवीर.

विडंबना देखिए कि मुजफ्फरनगर के बुजुर्ग शायर का नाम मुझे भी इस वक्त याद नहीं आ रहा. हां, अच्छा काम ये किया मैंने कि उन्होंने मंच से जितनी देर अपनी बात रखी, शेर पढ़े, उस सबको मोबाइल में रिकार्ड कर लिया. प्रोग्राम खत्म होने के बाद भी काफी देर तक उनके साथ रहा और उनके शेर सुने व रिकार्ड किए. लखनऊ से आए जनसंदेश टाइम्स के संपादक सुभाष राय और पत्रकार कुमार सौवीर ने भी उस बुजुर्ग शायर से बात की. जल्द ही उन शायर महोदय के बारे में विस्तार से रिपोर्ट, वीडियो प्रकाशित-अपलोड करूंगा. इन शायर महोदय के बारे में पता चला कि उनके लिखे ”….लम्हों ने खता की, सदियों ने सजा पाई” को पाकिस्तान में दो शायर अपना लिखा बताते हैं और भारत में भी कई दावेदार पैदा हो गए थे.

इन लाइनों को भारत के तीन प्रधानमंत्री अपने वक्तव्यों-भाषणों में बोल चुके हैं, पर किसी ने शायर का नाम नहीं लिया या उन्हें शायर का नाम नहीं पता. कहानीकार कमलेश्वर ने इन लाइनों को सुनाते हुए कहा था कि इसके रचनाकार मर चुके हैं, पर जब उनके सामने पंडित सुरेश नीरव ने रचनाकार को पेश किया तो वे हक्के बक्के रह गए. ये बातें आज प्रोग्राम खत्म होने के बाद बुजुर्ग शायर महोदय से जुड़ी बातचीत के क्रम में पंडित सुरेश नीरव ने बताई.  फिलहाल इतना ही.

यशवंत

भड़ास4मीडिया

bhadas4media@gmail.com

नभाटा का हाल : रखने हैं पाव भर के दो इंटर्न, लेकिन नक्शेबाजी सवा कुंतल की

नवभारत टाइम्स वालों ने अपनी वेबसाइट के लिए वैकेंसी निकाली है. दो इंटर्न इन्हें चाहिए. पर इन दो इंटर्न की नियुक्ति के लिए जितना भाषण पेल दिया है, उतना सुन-पढ़ कर तो बेचारे इंटर्न बेहोश हो जाएं, अप्लाई करना तो दूर. नभाटा की वेबसाइट पर संपादक की तरफ से दो इंटर्न की जरूरत से संबंधित जो लेख या विज्ञापन, जो कहिए, प्रकाशित हुआ है, उसे आप भी एक बार पढ़ लें.

और जरा सोचें, कि दो इंटर्न की नियुक्ति के लिए इतने सारे कड़े प्रावधान, नियम-कानून, इफ बट किंतु परंतु है तो संपादक की नियुक्ति के लिए क्या होता होगा. लेकिन माफ करिएगा, संपादक की नियुक्ति के लिए कोई वैकेंसी नहीं निकलती क्योंकि संपादक तो वही होगा जो मालिक के किचन में पक रहे खाने की खुशबू को छौंक लगने से पहले ही ताड़ जाए. यही ट्रेजडी है भारतीय पत्रकारिता की. ट्रेनी के लिए इतने नियम कानून और संपादक के लिए कुछ नहीं.

ट्रेनी से नैतिकता-ज्ञान की अपेक्षा, संपादक माने खुल्ला सांड़, जिसकी कोई योग्यता नहीं, सिवाय मालिक के लटक होने के. लीजिए, नभाटा के महान इंटर्न एप्वायंटमेंट वैकेंसी को बांचिए. यह आलेख आठ दिन पहले का है. एक मीडियाकर्मी साथी ने इस तरफ ध्यान आकृष्ट कराया तो यहां प्रकाशित किया जा रहा है. -यशवंत, भड़ास4मीडिया

NBT को जरूरत है नए युवा साथियों की

10 Aug 2011, 1143 hrs IST, नवभारतटाइम्स.कॉम

नवभारत टाइम्स ऑनलाइन पाठकों की सबसे पसंदीदा हिंदी वेबसाइट बन गई है। हमने इधर पाठकों के लिए अलग ब्लॉग सेक्शन शुरू किया है और अपनी मोबाइल साइट भी लॉन्च की है जिसका भरपूर स्वागत हुआ है। हम आगे और भी नई-नई चीजें लेकर आ रहे हैं। जाहिर है, जब हम पाठकों को पहले से ज्यादा सामग्री देंगे तो हमारा काम भी बढ़ेगा। फिलहाल हमारी 13 सदस्यों की टीम रात-दिन मेहनत करके आपके लिए एक ऐसी साइट परोसती है जिसमें खबरों से लेकर मनोरंजन और विचार तक सबकुछ है। लेकिन अब काम का भार बढ़ने से हमें कुछ युवा साथियों की ज़रूरत है जो हमारे बढ़े हुए काम में मदद कर सकें।

हमें फिलहाल दो ताज़ा चेहरे चाहिए । अनुभव न हो, कोई बात नहीं लेकिन पत्रकारिता, खासकर डेस्क के काम में रुचि हो और टेक्नॉलजी से घबराता न हो। इन्हें हम इंटर्न के तौर पर रखेंगे। शुरुआती इंटर्नशिप 6 महीनों की है और काम देखने के बाद और आगे की ज़रूरत देखने के बाद उनका भविष्य तय होगा। अगर आप हमारे साथ काम करना चाहते हैं तो हमें अपना रेज़्युमे इस पते पर भेजें – nbtonline@indiatimes.co.in सब्जेक्ट लाइन में NBT Interns लिखें। साथ में 500-700 शब्दों में अपने किसी भी पसंदीदा विषय पर एक लेख लिखकर भेजें। (लेख के बगैर भेजे गए किसी आवेदन पर विचार नहीं किया जाएगा।) यह टिप्पणी मंगल फॉन्ट में हो और इन्स्क्रिप्ट (फनेटिक) कीबोर्ड का इस्तेमाल करके लिखी गई हो। अगर आप इन्स्क्रिप्ट कीबोर्ड से टाइप नहीं कर सकते तो आप हमारे यहां काम नहीं कर पाएंगे।

हां, इंटर्नशिप के दौरान उन्हें एक निश्चित राशि स्टाइपेंड के तौर पर दी जाएगी। और आखिर में, किसी भी तरह की सिफारिश या फोन कॉल को एंटरटेन नहीं किया जाएगा। जिस किसी की भी पैरवी हम तक पहुंची, समझिए, उसके सारे नंबर कट गए। हम यही समझेंगे कि उस व्यक्ति को या तो अपनी क्षमता पर भरोसा नहीं है या फिर हमारी निष्पक्षता पर। दोनों ही स्थितियां सही नहीं है। अगर आपको इस मामले में कोई भी जानकारी चाहिए, तो बेहिचक ऊपर दिए गए पते पर लिखें। आपको ज़रूर जवाब मिलेगा।

याद रखें, हमें काम करने वाले साथी चाहिए। न तो हमें उनके नाम से मतलब है, न धर्म से, न जाति से, न सेक्स से। हां, उम्र से ज़रूर मतलब है। हमारी चॉइस है 25 से कम उम्र के युवक-युवतियां। लेकिन अगर हमें इस उम्र में ठीकठाक कैंडिडेट्स नहीं मिले तो दो साल का ग्रेस दिया जा सकता है। तो अगर आप 27 साल तक के हैं, और हमारे साथ इंटर्नशिप करना चाहते हैं तो आप आवेदन कर सकते हैं। तरीका और पता ऊपर दिया गया है। 17 अगस्त तक आए आवेदनों के आधार पर हम छंटाई करेंगे और चुने हुए उम्मीदवारों को लिखित टेस्ट के लिए बुलाएंगे।

संपादक
नवभारत टाइम्स ऑनलाइन

प्रोफेशनल हैकरों को दी गई भड़ास4मीडिया के मर्डर की सुपारी!

पिछले चालीस घंटे बेहद तनाव भरे रहे. अब भी हैं. आशंकाएं कम नहीं हुई हैं. हैकरों के DOS और DDOS अटैक को झेलना पड़ रहा है भड़ास4मीडिया को. डीओएस यानि डिनायल आफ सर्विस. डीडीओएस माने डिस्ट्रीव्यूटेड डिनायल आफ सर्विस. दुनिया के कई देशों के हैकर एक साथ मिलकर किसी एक साइट के पीछे पड़ जाते हैं और लगातार अलग अलग आईपी से अटैक करते रहते हैं.

इससे साइट के अपने रिसोर्सेज खत्म हो जाते हैं. साइट के रीयल यूजर्स का रिक्वेस्ट सर्वर तक नहीं पहुंच पाता. साइट और सर्वर पर लोड बढ़ता जाता है. आईपीज ब्लाक करने से भी काम नहीं चलता क्योंकि हैकर्स नए नए आईपीज से लगातार अटैक करते रहते हैं. अगर जरूरी साफ्टवेयर, डेडीकेटेड फायरवाल आदि नहीं है तो इस स्थिति में सर्वर को शट डाउन करना विकल्प होता है. भड़ास4मीडिया के साथ यही हुआ. इराक से लेकर ब्रिटेन, अमेरिका कई देशों के अलग-अलग हैकरों ने एक साथ अटैक शुरू किया. अटैक अब भी जारी है. इनकी कोशिश है कि भड़ास4मीडिया डॉट काम न चले. सर्वर डाउन होने की स्थिति में इस साइट को होस्ट करने वाली चंडीगढ़ की कंपनी पगमार्क ने दूसरे सर्वरों पर, दूसरे आईपीज पर जब भड़ास4मीडिया को शिफ्ट किया तो वहां भी उतना ही तेज अटैक शुरू हो गया. डास और डीडास अटैक की शिकार फेसबुक और ट्विटर जैसी साइटें हो चुकी हैं. ट्विटर को भी करीब दस घंटे इस अटैक के चलते बंद रहना पड़ा.

हैकिंग के पिछले 36 घंटों के दौरान मैंने डास और डीडास अटैक के बारे में काफी पढ़ा. फेसबुक और गूगल प्लस के जरिए अपने जानने-चाहने वालों को सूचना देता रहा कि साइट क्यों बंद है. देश भर से करीब आधा दर्जन वेब डेवलपर्स, सर्वर होस्ट करने वाले साथियों के फोन आए. इन सभी ने भड़ास4मीडिया को मदद देने की अपील की. इस सपोर्ट से सचमुच मैं अभिभूत हूं क्योंकि भड़ास4मीडिया की ताकत यही लोग हैं. अब सच में लगने लगा है कि भड़ास4मीडिया के सपोर्टर तकनीकी विशेषज्ञ लोगों की एक टीम होनी चाहिए जो ऐसी नाजुक स्थितियों में भड़ास4मीडिया को संकट से उबारने के लिए स्ट्रेटजी प्लान कर सके. कई लोगों ने कहा कि साइट को नए डोमन नेम पर ले जाते हैं और भड़ास4मीडिया डाट काम को नए डोमेन नेम पर रिडायरेक्ट कर देंगे.

पर फिर सवाल आया कि हैकर्स को जब पता चल जाएगा कि साइट फलां नए डोमेन नेम पर रिडायरेक्ट हो गई है तो वे वहां भी थोक के भाव में पहुंचकर सर्वर जाम कर देंगे. कुछ एक ने जानकारी दी कि दुनिया भर के हैकर्स का एक बड़ा ग्रुप है जो सुपारी लेकर किसी साइट के पीछे पड़ जाता है और फिर पीछे पड़ा ही रहता है. इनसे निपटना बड़ा मुश्किल है. जितने मुंह उतनी बातें. पर हां, मुझे सच में इस बार बेचारगी का एहसास हुआ. बागी पोर्टल चलाने के गहन दुखों को महसूस किया. जब आप एक साथ नेताओं, पत्रकारों, अफसरों… सभी से पंगा ले लेते हैं तो ये समर्थवान लोग आपको निपटाने के लिए किसी लेवल पर चले जाते हैं. और हम, जिसके पास सिवाय अपने जिस्म और दुस्साहस के कुछ नहीं है, क्या कर सकते हैं इनका.

पिछले चालीस घंटों के दौरान मुझे लगता रहा कि मैं शायद मिसफिट आदमी हूं. कुछ नहीं कर सकता. न नौकरी कर सका और न अपना काम कर पा रहा. जब साइट ही भाई लोग हैक कर लेंगे, लगातार पीछे पड़ते रहेंगे, सर्वर पर अप्रत्याशित प्रेसर डालते रहेंगे तो कैसे चला सकेंगे भड़ास. ऐसे में नए विकल्प की तरफ सोचने लगा हूं. नया क्या किया जाए. नया यानि वेब की दुनिया से अलग क्या किया जाए. हालांकि ये पता है कि आप नया जहां जो कुछ भी करेंगे, वहां भी उतनी ही अलग तरह की मुश्किलें मिलेंगी और मुश्किलों से भागने वाला आदमी कभी मुश्किलों से पीछा नहीं छुड़ा पाता.

मैं अपनी बात करूं तो फिलहाल बुरी तरह फ्रस्टेट और डिप्रेस्ड हूं. इस अटैक ने और साइट आफ रहने के दौरान की मनःस्थितियों-घटनाक्रमों ने काफी तोड़ डाला है. किलिंग स्पिरिट रखने वाला मैं बेचारगी और लाचारगी से भरा हुआ हूं. समझ रहा हूं, एक फेज है, जो खत्म हो जाएगा. पर फिलहाल तो जो है सो है ही. नीचे कुछ लिंक दे रहा हूं, डास और डीडास अटैक के बारे में जानने समझने के लिए…

http://en.wikipedia.org/wi​ki/Denial-of-service_attac​k

http://www.techpluto.com/d​dos-attack-tutorial/

http://www.webopedia.com/TERM/D/DoS_attack.html

http://dos-attacks.com/

http://www.us-cert.gov/cas/tips/ST04-015.html

http://searchsoftwarequality.techtarget.com/definition/denial-of-service

http://www.topwebhosts.org/tools/denial-of-service.php

यशवंत

भड़ास4मीडिया

09999330099

विचार.भड़ास4मीडिया.कॉम के एक लेख पर पत्रकार राहुल के खिलाफ आईटी एक्ट में मुकदमा

बात पुरानी हो चली है. पत्रकार राहुल कुमार ने गरीबों-आदिवासियों-निरीहों के सरकारी दमन से आक्रोशित होकर गृहमंत्री पी. चिदंबरम को संबोधित एक पद्य-गद्य युक्त तीखा आलेख भावावेश में लिख दिया. और उसे हम लोगों ने भड़ास4मीडिया के विचार सेक्शन में प्रकाशित भी कर दिया.

बाद में जब दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने पूछताछ के लिए नोटिस भेजा तो मैंने राहुल के उस लिखे को ध्यान से दुबारा पढ़ा. तब समझ में आया कि कुछ चीजें आपत्तिजनक हैं, उस आलेख व कविता में भावुकता की भारी मात्रा है, तार्किक तरीके से अपनी बात कहने की कोशिश बेहद कम है. हालांकि कविताई भावुकता से युक्त ही होती है लेकिन जब आप सीधे-सीधे किसी से निपटने लेने, किसी को उड़ा देने की बात करते हैं तो उसके मायने बदल जाते हैं. ऐसे में मैंने बिना इफ बट किए आर्टिकल को हटा दिया.

राहुल के साथ मैं दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के आफिस पहुंचा था. शायद ये पिछली सर्दियों की बात है. संबंधित इंस्पेक्टर से विस्तार से बातचीत हुई. उन्होंने भी समझ लिया कि नौजवान खून है, जोश में ज्यादा तीखा लिख दिया. इंस्पेक्टर समझाने की मुद्रा में रहे और मैं सुनने की. बात आई गई हो गई. पर आज अचानक पता चला कि राहुल के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने आईटी एक्ट की धारा 66 के तहत एफआईआर लिख दिया है.

इस बाबत खबर दैनिक भास्कर के दिल्ली एडिशन में पेज नंबर चार पर छपी है. भास्कर में अभिषेक रावत की बाइलाइन खबर पुलिसिया ब्रीफिंग पर आधारित है, और, इस खबर को पढ़कर ऐसा लगता है जैसे राहुल कुमार कोई सिरफिरा आतंकवादी है. खबर लेखक से संवेदनशीलता की उम्मीद थी. दूसरे पक्ष से भी बातचीत किए जाने की अपेक्षा थी. पर ब्रेकिंग के चक्कर में अब ऐसा कुछ कहां हो पाता है. भास्कर में प्रकाशित पूरी खबर हम नीचे दे रहे हैं.

मेरा इस पूरे प्रकरण पर साफ-साफ कहना है कि राहुल कुमार ने नक्सलियों को कुचलने और आपरेशन ग्रीन हंट के नाम पर आम आदिवासियों, आम जनता को शासन-सत्ता, पुलिस-फौज द्वारा प्रताड़ित किए जाने की परिघटना से आक्रोशित होकर भावावेश में जो लिखा, उसे गैर जमानती अपराध (बताया जा रहा है कि आईटी एक्ट की धारा 66 नान बैलेबल है) मानना कतई सही नहीं है. वह भी तब जब दिल्ली पुलिस द्वारा बुलाए जाने पर राहुल खुद मेरे साथ पुलिस आफिस गए हों. और, अभी तक जो पुलिस ने राहुल के बैकग्राउंड के बारे में जो जांच-पड़ताल की, दिल्ली से लेकर बेगूसराय तक, उसमें कहीं भी राहुल के प्रतिबंधित नक्सली संगठनों से जुड़े होने का कोई प्रमाण नहीं मिला हो.

साथ ही, संबंधित आर्टिकल वेबसाइट से, लेखक की सहमति से, हटाया जा चुका हो. ऐसे में दिल्ली पुलिस का राहुल को दोषी मानते हुए उनके खिलाफ एफआईआर लिखना और उन्हें फरार घोषित करना चिंताजनक है. अगर वाकई लेखक के रूप में राहुल कुमार दोषी हैं तो प्रकाशक के रूप में मैं खुद भी दोषी हूं, तो दिल्ली पुलिस को मेरे खिलाफ भी उसी एक्ट के तहत एफआईआर लिख लेना चाहिए.

मेरा दिल्ली पुलिस के आला अधिकारियों और इस देश के सत्ता संचालकों से अनुरोध है कि कृपया इस प्रकरण में राहुल कुमार को अपराधी नहीं बनाया जाना चाहिए क्योंकि हमने-उनने प्राथमिक तौर पर अपनी गलती स्वीकार कर ली थी, उन्हीं दिनों, उसी कारण उस आर्टिकल को अनपब्लिश भी कर दिया. इसके बावजूद अगर राहुल कुमार को जेल के सलाखों के पीछे डालने की तैयारी है तो इसे साफ-साफ उत्पीड़नात्मक और बदले की कार्रवाई कहा जाएगा. और, इसे इस संदेश के रूप में भी लिया जाएगा कि केंद्र सरकार न्यू मीडिया, खासकर वेब और ब्लाग पर नकेल कसने की तैयारी कर रही है.

महात्मा गांधी कह गए हैं कि सौ अपराधी भले छूट जाएं पर हम किसी निर्दोष को अपराधी न बनाएं. इसी भावना के तहत मैं दिल्ली पुलिस से अनुरोध करूंगा कि वे लोग राहुल कुमार के प्रकरण पर अतियों में, एक्सट्रीम पर न जाएं. लोकतांत्रिक तरीके से विचार करें. अगर वे भी दूसरी अति पर पहुंच जाएंगे तो वही काम करेंगे जो राहुल कुमार ने एक अति पर पहुंचकर लिखकर और मैंने प्रकाशित करके किया. इस मसले पर मैं देश के (खासकर दिल्ली-एनसीआर के) सभी पत्रकार साथियों से अपील करूंगा कि वे राहुल कुमार को पुलिस द्वारा फंसाए जाने का विरोध करें और अपनी नाराजगी, अपना विरोध, अपना अनुरोध प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृहमंत्री पी. चिदंबरम तक पहुंचाएं.

अभी मेरे पास कोई मेल आईडी नहीं है गृहमंत्री और प्रधानमंत्री का, तो संभव हो तो आप पी. चिदंबरम व मनमोहन सिंह की मेल आईडी पता करके नीचे कमेंट बाक्स के जरिए सभी तक पहुंचाने का कष्ट करें. साथ ही यह भी बताएं कि राहुल कुमार को कैसे बचाया जा सकता है, क्या क्या किया जा सकता है. नीचे इस प्रकरण से संबंधित वो खबर दो रहे हैं, जो आज के दैनिक भास्कर अखबार में प्रकाशित हुई है.

यशवंत

एडिटर, भड़ास4मीडिया

bhadas4media@gmail.com

वेबसाइट पर गृहमंत्री को भेजा धमकी भरा मेल, केस दर्ज

अभिषेक रावत, दैनिक भास्कर

नई दिल्ली :  नक्सली संगठनों के खिलाफ ऑपरेशन ग्रीन हंट चलाने पर गृहमंत्री पी. चिदंबरम को एक वेबसाइट के माध्यम से धमकी देने वाले शख्स को दिल्ली पुलिस सरगर्मी से तलाश रही है। हालांकि जांच में यह साफ हो गया है कि आरोपी युवक का किसी नक्सली या आतंकी संगठन से कोई लेना-देना नहीं है, फिर भी उसने अपने लेख में नक्सली संगठनों से सहानुभूति दिखाते हुए न सिर्फ गृहमंत्री को अपशब्द कहे बल्कि उनको जान से मारने की धमकी भी दी।

इतना ही नहीं उसने संसद में आग लगाने जैसी गंभीर बात भी कही है। इस बाबत दिल्ली पुलिस के साइबर सेल ने आरोपी के खिलाफ आईटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कर लिया है। दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि आठ मई 2010 को एक वेबसाइट पर राहुल कुमार नामक व्यक्ति ने एक लेख लिखा, जिसमें नक्सलियों के खिलाफ छेड़े गए ऑपरेशन ग्रीन हंट की निंदा की गई। इसमें धमकी भरे अंदाज में लिखा गया कि चिदंबरम तुम्हारी गोली से तुम्हें ही उड़ाउंगा।

यदि एक और जंगल जला तो संसद में अबकी आग लगाऊंगा। इसके अलावा कई अन्य तरह की अपमान जनक बातें भी इस लेख में लिखी गईं। आरोपी ने यह भी लिखा था कि वह ओडीशा, बिहार, झारखंड़, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों के माओवादियों का समर्थन करता है। इस लेख पर जैसे ही गृहमंत्रालय के अधिकारियों की नजर पड़ी तो उन्होंने दिल्ली पुलिस आयुक्त को इसकी जानकारी दी। इसके बाद पुलिस आयुक्त ने स्पेशल सेल के डीसीपी को इस मामले की जांच कराने के लिए कहा। पुलिस ने जांच करते हुए वेबसाइट के मालिक से पूछताछ की तो उसने बताया कि उसे लेख ईमेल के माध्यम से मिला था।

पुलिस ने गुगल को उस ईमेल आईडी की जानकारी भेज कर आईपी एड्रेस के बारे में पता लगाने के लिए कहा। गहन जांच के बाद पता चला कि राहुल कुमार मूल रूप से बेगूसराय (बिहार) का रहने वाला है और दिल्ली में मुनिरका गांव में किराए पर रह रहा था। उसने मुनिरका के ही एक साइबर कैफे से यह धमकी भरा लेख वेबसाइट को ईमेल किया था। पुलिस अब राहुल कुमार की तलाश कर रही है। उसके खिलाफ पिछले दिनों तीन अगस्त को साइबर सेल ने आईटी एक्ट की धारा 66 के तहत मामला दर्ज कर लिया है।

संघियों-भाजपाइयों का बड़ा खेल, फर्जी लिस्ट जारी कर कांग्रेसियों को स्विस बैंक में काला धन रखने वाला बताया!

पिछले तीन चार दिनों से नेट की दुनिया में गजब की हलचल है. विकीलीक्स की तरफ से कथित रूप से जारी एक लिस्ट इधर से उधर फारवर्ड, सेंड, पब्लिश हो रही है. इस लिस्ट को विकीलीक्स द्वारा जारी बताया गया है और इसमें दर्जन भर से ज्यादा गैर-भाजपाई नेताओं के नाम और स्विटजरलैंड के बैंक में जमा उनकी धनराशि के बारे में उल्लेख किया गया है. कल इससे संबंधित एक खबर भड़ास4मीडिया पर भी प्रकाशित हुई.

क्या स्विस बैंक में सबसे ज्यादा धन नीरा राडिया ने जमा कर रखा है?” शीर्षक से. फेसबुक पर एक पत्रकार अमित मोदी द्वारा जारी की गई सूचना के हवाले से. इस खबर में भी हमने संदेह व्यक्त किया था कि फेसबुक पर जो सूचना अमित मोदी ने दी है, उसका कोई स्रोत नहीं लिखा है, किस हवाले से वे ये सूचना दे रहे हैं, इसका कोई जिक्र नहीं किया. बाद में इस पूरे मामले की पड़ताल की गई तो पता चला कि कुछ भाई लोगों ने विकीलीक्स की साइट के उपरी हिस्से के साथ एक फर्जी लिस्ट जोड़कर उसे प्रामाणिक बनाकर इधर-उधर भेजने में लगे हैं. इसे विकीलीक्स द्वारा जारी बताया गया है. पर पता चला है कि विकीलीक्स ने ऐसी कोई लिस्ट जारी नहीं की है.

जिस रैपिडशेयर पर जारी किए जाने की बात की जा रही है, वहां कोई भी किसी तरह का नकली-असली डाक्यूमेंट होस्ट कर सकता है, अपलोड कर सकता है. कुछ एक ब्लागों में इसी फर्जी लिस्ट को सही मानकर लंबी चौड़ी कथा प्रकाशित कर दी गई है. जबकि सच्चाई इससे अलग है. सूत्रों के मुताबिक संघ और भाजपा के लोग देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ बने जनमानस का अपने तरीके से और अपने पक्ष में इस्तेमाल करने के लिए जल्दबाजी में कई कई साजिशें रच रहे हैं. इसीलिए ये लोग न्यू मीडिया का सहारा ले रहे हैं जहां सूचनाएं ज्यादा जल्दी और बिना किसी छानबीन के प्रकाशित-प्रकट हो जाया करती हैं.

न्यू मीडिया के भेड़चाल का इस्तेमाल अफवाहबाज अपने हिसाब से करने की रणनीतियां बना रहे हैं और अमल भी कर रहे हैं. फर्जी विकीलीक्स लिस्ट इसी का नमूना है. भारत में विकीलीक्स का द हिंदू ग्रुप से टाइअप है. अगर कोई सूचना विकीलीक्स की तरफ से प्रामाणिक तौर पर जारी किया जाता है तो अगले दिन भारत में उसे द हिंदू तुरंत प्रकाशित कर देगा और दूसरे मीडिया हाउस भी उसे उठाने, दिखाने, प्रकाशित करने में देर न लगाएंगे क्योंकि विकीलीक्स द्वारा जारी कंटेंट को उनके हवाले से अपने देश में दिखाए जाने की परंपरा रही है. पिछले दिनों राहुल, सोनिया आदि से संबंधित जो खुलासे विकीलीक्स द्वारा किए गए, उसे भारतीय मीडिया ने प्रमुखता से दिखाया. पर इस बार विकीलीक्स के नाम का इस्तेमाल कुछ फर्जी लोग कांग्रेस के खिलाफ कर रहे हैं.

…एक फर्जी डाक्यूमेंट, जो इंटरनेट की दुनिया में यहां वहां प्रसारित प्रकाशित हो रहा है…

माना कि कांग्रेस करप्ट है, करप्शन को बढ़ावा दे रही है, इसके कई नेता करप्शन शिरोमणि हैं, पर कट पेस्ट के जरिए फर्जी व सनसनीखेज खबरें तैयार कर किसी का मानहानि करना अपराध है. नीचे हम वो फर्जी दस्तावेज दे रहे हैं जिसे लोग एक दूसरे को मेल कर रहे हैं और इस अंदाज में मेल कर रहे हैं कि देखिए, कितना बड़ा धमाका उनके हाथ लगा है. पर भाइयों, इस फर्जीवाड़े को समझ जाइए. अगर स्विस बैंक में धन जमा करने वाले भारतीयों का नाम खुलेगा तो उसमें कई भाजपाई भी मिलेंगे क्योंकि करप्शन के मामले में कांग्रेस से कम नहीं है भाजपा.

ये जरूर है कि कांग्रेस ने सत्ता की मलाई बहुत दिनों तक खाई है और खा रही है, इस कारण वहां करप्शन संस्थाबद्ध हो गया है जबकि भाजपा को सत्ता की मलाई खाने का मौका कम मिला है इसलिए वहां भूख-प्यास ज्यादा है. और, जिन राज्यों में भाजपा सत्ता में है, वहां का हाल कांग्रेसी राज्यों से अलग नहीं है. येदुरप्पा, निशंक आदि का उदाहरण लिया जा सकता है. इसलिए, न्यू मीडिया के साथियों से अपील है कि किसी दस्तावेज को सच मानने की जगह उसकी पड़ताल जरूर करें क्योंकि हो सकता है कि हमारी आपकी ताकत का कोई बेजा इस्तेमाल करने की फिराक में हो.

संभव है, मेरी बात आंशिक सच हो, या पूरी तरह गलत हो. लेकिन अब तक जो मुझे समझ में आया उसे आपके सामने पेश किया. अगर आपके पास कोई और तथ्य हों तो कृपया नीचे के कमेंट बाक्स का इस्तेमाल करते हुए बताएं, सूचित करें.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

राजेंद्र यादव का हांफना और निशंक की रचना छापना

यशवंत

हिंदी पट्टी के लोगों में उद्यमिता के लक्षण कहीं दूर दूर तक नहीं होते. सिपाही से लेकर कलेक्टर तक बनने की हसरत लिए बच्चे जवान होते हैं और बीच में कहीं घूसघास के जरिए या टैलेंट के बल पर फिटफाट होकर नौकरी व उपरी कमाई का काम शुरू कर देते हैं और इस प्रकार जिंदगी की गाड़ी टाप गीयर में दौड़ाने लगते हैं.

वह आदमी जो किसी के लिए पैसा लेकर काम करता है, नौकर कहलाता है. और इस करने की प्रक्रिया को नौकरी कहते हैं. गुलामी और नौकरी में थोड़ा-सा ही फर्क है. गुलामी में आपकी जिंदगी के लिए कोई विकल्प नहीं होता, सेवा-शर्तें नहीं होती. नौकरी में आप नौकर बनने के अलावा के वक्त में अपनी निजी जिंदगी जी पाते हैं. नौकरी की सेवा-शर्तें होती हैं. आजकल के मार-काट-इंग (मार्केटिंग) माहौल में कई जगहों पर नौकरी व गुलामी के बीच का फासला खत्म हो जाता है. कई मीडिया कंपनियों में भी कई पत्रकार अपने बारे में तय नहीं कर पाते कि वे यहां के नौकर हैं या गुलाम. इसी कारण कई बार गुलामों को लगता है कि वे नौकर हैं और नौकरों को लगता है कि वे गुलाम है. फासला जो बड़ा महीन सा है.

चंद रुपये के लिए करेजा काट कर रख देने वाली धुंधली दृष्टि युक्त हिंदी पट्टी के अपने रणबांकुरें भला सोच भी कैसे सकते हैं कि वे खुद उद्यमी बनें, वे खुद मालिक बनें, वे खुद कंपनी चलाएं. क्योंकि यह सोचने और करने का अधिकार तो सिर्फ गुप्ताज, अग्रवाल्स, माहेश्वरीज, जैन्स, मारवाड़ीज, लालाज आदि को होता है. हम आप तो पैदा ही हुए हैं इनकी गुलामी करने के लिए, महीने में मिलने वाले चंद सैकड़ा नोटों की खातिर मरने-खपने के लिए. तो, इस बंधी-बंधाई नौकरी-गुलामी वाली परंपरा से अलग कोई कुछ कर पाए, खासकर हिंदी पट्टी वाला तो उसे साहसी आदमी मानना चाहिए और अगर वह यह काम न्यूनतम बेइमामी के साथ अधिकतम ईमानदारी के उद्देश्य के लिए करे तो साहसी के साथ उसे महान आदमी भी मानना चाहिए.

और, अगर बिना किसी आर्थिक बैकग्राउंड वाला कोई व्यक्ति साहित्यिक मैग्जीन अपने दम पर निकालने की ठाने तो उसे कुछ कुछ पागल और उसके काम को दुनिया का सबसे रिस्की काम माना जाना चाहिए. पर राजेंद्र यादव ने साबित किया कि दुनिया पागल है, वह नहीं. असंभव ही संभव हो जाता है, गर ठान लो. और महान रिस्की काम को करते हुए उन्होंने 25 बरस गुजार दिए. कह सकते हैं कि दुनिया के लिए जो काम पहाड़ था, उनके सामने आकर वह धूल-धूसरित-सा है. समाज में अधिकतम ईमानदारी हो, न्यूनतम लूटपाट हो, ज्यादातर लोग प्रसन्न व खुशहाल रहें, कोई जात-पात-धर्म-भाषा का भेदभाव न हो… ऐसे मकसद के लिए साहित्यकार, कलाकार जीता है, करता है. इस महान मकसद के लिए जीना और करना आजकल के मार-काट-इंग माहौल में बेहद रिस्की काम है. पर यह सब कुछ राजेंद्र यादव ने किया.

एक बड़ा साहित्यकार लगातार 25 बरस तक हिंदी साहित्य को दिशा देने वाली मैग्जीन को चलाता रहता है और यह सब करते हुए वह खुद 85 बरस का हो जाता है और जब वह अपनी मैग्जीन के 25 बरस होने पर आयोजित समारोह में बोलता है तो उसकी आवाज से जो हांफने का कंपन निकलता है उससे कइयों को लगा कि राजेंद्र यादव बुढ़ा गये हैं क्योंकि हंस का भी बुढ़ापा आ चुका है. नामवर सिंह ने अपने संबोधन में लोगों (अखिलेश) के कहने का जिक्र करते हुए इशारा किया कि, हंस का अब बुढ़ापा है. नामवर या अखिलेश, जिसे मानना हो माने, पर हम लोग नहीं मानते कि राजेंद्र यादव का बुढ़ापा है. खुद राजेंद्र यादव नहीं मानते होंगे कि उनका बुढ़ापा है. वह आज भी एक नौजवान की तरह चौकस, चैतन्य और चंगे हैं. वैसे भी, अपन के यहां कहा जाता है, अपन के यहां की परंपरा है, शरीर बूढ़ा हो सकता है. आत्मा और विचार को कैसा बुढ़ापा.

नामवर सिंह को माइक से आवाज देते राजेंद्र यादव और मंच की ओर बढ़ते नामवर सिंह. सबसे दाहिने तरफ अजय नावरिया.

नामवर को सम्मान से मंच पर बिठाते अजय नावरिया. नामवर के विराजने को दूर से देखते राजेंद्र यादव और पूरे दृश्य को कैमरे में कब्जातीं एक मोहतरमा.

अर्चना वर्मा को हंस से उनके जुड़ाव के लिए सम्मानित किया गया. सबसे दाएं मंच पर बैठे हैं गौतम नवलखा. अर्चना वर्मा ने कहा कि उनका नाम इसलिए लोगों को याद रहा कि उन्होंने हंस के स्त्री विशेषांक के संपादन के दौरान राजेंद्र यादव की रचना को लौटा दिया था. अर्चना के मुताबिक, इसमें उनका साहस कम, राजेंद्र यादव की लोकतांत्रिकता ज्यादा सराहनीय है. गौतम नवलखा ने कहा कि उन्हें अंग्रेजी से हिंदी लिखने को प्रेरित राजेंद्र यादव ने किया और उन्हीं के चलते वे हिंदी में लिख पाने का साहस जुटा पाए, जिसके लिए वे आभारी हैं.

नामवर सिंह ने भले कहा कि राजेंद्र यादव ऐसे भीष्म पितामह हैं, जो शरशैय्या पर सोए हैं, उनसे सीखना हो तो सीख लो. लेकिन यह एकांगी सच है. राजेंद्र यादव से करीब तीन पीढ़ियों के लाखों-करोड़ों लोगों सीखा है. उनके हंस से गांव-कस्बे तक में एक चेतना, एक जागरूकता पहुंची-पैली है. आरक्षण आंदोलन रहा हो चाहे नक्सली या वामपंथी आंदोलन. दलितों-पिछड़ों का मुद्दा रहा हो या मुस्लिमों-स्त्रियों का. धर्म का मुद्दा रहा हो या सवर्ण का, जातपात का मु्ददा रहा हो या भेदभाव का, दुनिया के साहित्य का मसला हो या भारत के लोगों की जीवन शैली व सोच-समझ का, इतना बेबाक, इतना लाजिकल, इतना तेवरदार लेखन अपने जीवन में मैंने किसी और का नहीं देखा.

कुछ एक लोगों का कुछ एक लिखा स्पार्क देता है, प्रेरित करता है लेकिन कोई बंदा पच्चीस साल तक अलख जगाए रखे, अपने दम पर, अकेले दम पर ताल ठोंककर अपनी बात, अपनी प्रगतिशील सोच, अपनी सामूहिक चेतना के विस्तार को समझाता-बताता-पहुंचाता रहे, यह अदभुत है, यह जीवट है, यह असंभव के संभव होने जैसा है. मेरे जैसे कइयों को रोलमाडल हैं राजेंद्र यादव. मेरे जैसे कइयों की दिमागी बुनावट पर असर डाला है राजेंद्र यादव ने. उनको दिल से सलाम. उनकी लंबी उम्र के लिए दुआ. हंस यूं ही निकले, इसके लिए ढेरों शुभकामनाएं. हंस के निर्बाध निकलते पच्चीस बरस हो गए, इसके लिए बधाई.

राजेंद्र यादव ने हंस की यात्रा से जुड़े कुछ ऐसे लोगों को सम्मानित किया जिन्होंने दिन को दिन नहीं माना और रात को रात नहीं. ऐसे लोगों ने अपने खून पसीने के बल पर हंस का निकलना सुनिश्चित किया. दुर्गा प्रसायद जासवाल, वीना उनियाल, संजीव, गौतम नवलखा, अर्चना वर्मा… ढेरों नाम हैं. राजेंद्र यादव ने यह करके एक नई समझ दी. एक नया ज्ञान दिया. कि, हे कंपनी के मालिकों, हे उद्यमियों, हे अन्टरप्रिन्योरों… सफल हो जाओ, स्थापित हो जाओ… तो उन्हें न भुलाओ, जिनके एक एक कतरे से तुम्हारी सफलता लिखी गई है, जिनकी एक-एक सांस इकट्ठी होकर तुम्हारे लिए नींव के पत्थर बन गए. राजेंद्र यादव ने हंस के पच्चीस बरस होने पर हंस की याद में और हंस के साथियों को सम्मानित करने के लिए कार्यक्रम रखकर अपनी महानता का ही विस्तार किया है.

छोटी सोच वाले लोग अपने फायदे के इतर सोच ही नहीं पाते, इसी कारण उन्हें छोटा आदमी कहा जाता है. आदमी अपनी लंबाई से छोटा या बड़ा नहीं होता. अपने दिल और दिमाग से छोटा-बड़ा होता है. जिसमें दूसरों का भला करने, दूसरों के योगदान के प्रति कृतज्ञ होने, दूसरों के काम को बड़ा मानने का भाव नहीं, वह आदमी बड़ा नहीं हो सकता. राजेंद्र यादव ने हंस के 25 बरस पूरे होने पर आयोजित जलसे में हंस से जुड़े नामधारी-एनानिमस लोगों को सम्मानित कर, उन्हें सामने लाकर बड़ा काम किया है. सच में यह एक बड़ी सीख है. कोई चीज बनाने के दौर में हम मनुष्यों का इस्तेमाल टूल की तरह करते हैं, इस्तेमाल करो और फेंक दो वाले सिद्धांत से अनुप्रेरित होकर करते हैं, यहीं से कंपनियों, संस्थाओं का अमानवीयकरण शुरू होता है. जो कंपनी, संस्था, चीज अपने एप्रोज में अमानवीय हो तो उसका लार्जर मकसद चाहे जो हो, अंततः वह एक दिन आम आदमी के खिलाफ दैत्याकार रूप में खड़ी मिलेगी.

आजकल के मीडिया हाउसों को ही देख लीजिए. इन मालिकों के बाप-दादाओं ने पत्रकारों के खून से अपने अखबारों को सींचा. बाद में उन पत्रकारों को उनकी दुर्दशा में याद तक नहीं किया, मदद देने की बात दूर. और यही अखबार अब पेड न्यूज करते हैं, मीडिया के मौलिक सिद्धांतों को बेवकूफी की बात कहते हैं, बिजनेस को सबसे बड़ा लक्ष्य मानते हैं, जन सरोकार को किताबी बात बताते हैं… तो हालत क्या हो गई है. अखबार आज करप्ट लोगों के करप्शन को ढंकने का सबसे बड़ा माध्यम बन गया है. भ्रष्ट नेताओं, भ्रष्ट नौकरशाहों, भ्रष्ट संस्थाओं के कारनामों को न प्रकाशित किया जाए, इसका खेल चलता रहता है और इसके बदले दाम मिलता रहता है. यानि मीडिया अब सच दिखाने के लिए नहीं बल्कि सच छुपाने का माध्यम बन गया है.

तो ये चौथा खंभा भी विकलांग हो चुका है. आम जन के खिलाफ हो चुका है. इसलिए क्योंकि इसके मालिक का जो दिमाग है, वह मानवीय नहीं है. वह कारपोरेट है. वह ज्यादा से ज्यादा मुनाफा अपने निजी नाम से करने को इच्छुक रहता है. वह लाभ में अपने कर्मियों को हिस्सेदारी देने के नाम से ही भड़कता है. ऐसे दौर में अगर राजेंद्र यादव हंस मैग्जीन से जुड़े रहे लोगों को याद करते हैं, सम्मानित करते हैं, उनकी भूमिका को रेखांकित करते हैं और हंस के लगातार निकलते रहने को एक टीम वर्क बताते हैं तो यह उनका बड़प्पन है, यह हमारे समय के बनियों के लिए सीख है.

हंस चलाते रहने के लिए राजेंद्र यादव ने न्यूनतम बेइमानी का सहारा लिया होगा, इससे इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि जब आपको कोई चीज चलानी होती है तो थोड़ा बहुत दाएं बाएं करना पड़ता है, आंख बचाके या सबके सामने रखके. इसे मैं निजी तौर पर दस फीसदी तक मानता हूं. क्योंकि समय और सिस्टम ऐसा है कि अगर आप अच्छा काम कर रहे हैं तो कोई आपको पैसा नहीं देने वाला. जब तक आप किसी ओबलाइज या उपकृत नहीं करते, तब तक वह आपको कोई मदद देने के बारे में सोच ही नहीं सकता. कई मैग्जीनों में अफसरों की बीवियों की कहानी-कविताएं इसलिए छपती हैं क्योंकि उनके साजन सरकारी या प्राइवेट विज्ञापन दिलाने की भूमिका में होते हैं.

…मैं और मेरा मेरा तेरा सबका प्यार-दुलारा ”हंस” : यूं गुजर गए पच्चीस साल जैसे कल की बात हो… मंच पर अकेले विराजे राजेंद्र यादव चिंतन में लीन… जब पूरा हाल श्रोताओं-दर्शकों से भर गया तो एक कोने से चुपचाप राजेंद्र यादव मंच की तरफ पहुंचे. उन्हें उनका एक साथी किशन सहारा दिए हुए था. उस साथी को इस जलसे में सम्मानित किया गया. किशन साये की तरह राजेंद्र यादव के साथ रहते हैं. उनकी सेहत की पूरी देखभाल करते हैं. क्या खाना है, कितना खाना है, इसका मुकम्मल हिसाब किशन के पास होता है.

इतनी बड़ी संख्या में लोग राजेंद्र यादव और हंस के प्रोग्राम में पहुंचे कि बड़ा सा हाल छोटा पड़ गया. ऐसे में बहुत सारे लोगों को पीछे जमीन पर बैठना पड़ा. कई लोग खड़े होकर सुनते रहे.

ग़ालिब सभागार के दाएं और बाएं, दोनों ओर सभी सीटें फुल थीं. बाद में पीछे इंग्री गेट के आसपास लोग बैठकर, खड़े होकर कार्यक्रम में देर तक शरीक रहे.

हंस और कथादेश ने भी ये काम किए हैं. घटिया रचनाओं को इसलिए प्रकाशित किया क्योंकि उसके बदले उन्हें विज्ञापन मिलते या इसी पीआर के जरिए उन्हें कुछ लाभ मिल जाता. और, यह क्रम राजेंद्र यादव जारी रखे हुए हैं. अगले वाले अंक में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक की कोई रचना छप रही है हंस में. उस हंस मैग्जीन में जिसे प्रेमचंद ने शुरू किया और राजेंद्र यादव ने अपनी पूरी जवानी, अपनी पूरी मेधा, अपनी पूरी प्लानिंग के जरिए पिछले पच्चीस साल से जिंदा रखा हुआ है. तो क्या, छब्बीसवें साल से हंस का स्तर निशंक की रचनाओं को प्रकाशन करने वाला रहेगा?

ऐसा ही एक सवाल किसी युवा ने हंस के पच्चीस बरस पूरे होने के जलसे में मंच से राजेंद्र यादव से पूछा. जाहिर है, राजेंद्र यादव को यही कहना था कि रचना मुख्य होती है, लेखक कौन है यह नहीं. और, कई बार बुरे लोग अच्छी रचनाएं कर जाते हैं. और, यह कि वे रचना के स्तर से तय करते हैं कि छपनी है या नहीं. राजेंद्र यादव की बातों से बहुतेरे लोग कनवींस हो गए होंगे. मैं भी थोड़ा थोड़ा हूं. पर मुझे लगता है कि राजेंद्र यादव और हंस अब बड़े ब्रांड हैं. उन्हें हंस चलाने के लिए अब वो मगजमारी करने की जरूरत नहीं जो पहले रही होगी. ऐसे में उन्हें निशंक जैसे रचनाकारों से बचना चाहिए था. मुझे नहीं पता निशंक की जो रचना छपने जा रही है, उसका स्तर क्या है, कंटेंट क्या है. पर भ्रष्टाचार के आधा दर्जन से ज्यादा आरोपों में घिरे भाजपा के इस मुख्यमंत्री के खिलाफ जगह-जगह विरोध के स्वर उठते रहे हैं और कई बार तो अच्छे लोग इस सीएम के साथ बैठने से परहेज करते हैं. ऐसे में राजेंद्र यादव का निशंक की कथित रचना छापने के पक्ष में दलील देना थोड़ा चौंकाता भी है, और उनके बुढ़ापे की मजबूरी को समझने का मौका भी देता है.

मुझे लगता है कि कोई संस्था या मैग्जीन चलाते वक्त उसके मालिक को न्यूनतम बेइमानी का सहारा लेना पड़ता है, खासकर आजकल वाले मार-काट-इंग दौर में, तो उसी अघोषित अनकहे अधिकार का इस्तेमाल किया होगा राजेंद्र यादव ने. क्योंकि ज्योंही आप नौकर की अवस्था से हटकर किसी संस्था, कंपनी, मैग्जीन, धंधा को शुरू करके एक उद्यमी या संचालक या मालिक या प्रधान या मुखिया की भूमिका में आते हैं तब आपको अपनी सारी इंद्रियों को सक्रिय करके संबंधित चीज को जिंदा रखना पड़ता है और इसके लिए कुछ बार ऐसे समझौते भी करने पड़ते हैं जिन्हें लोग पचा नहीं पाते, ऐसा काम भी करना पड़ता है जो आपके काम के स्तर को घटिया बना देता है. पर यह सब तो शुरुआती अवस्था में होता है, प्रारंभ की अवस्था में होता है. किसी चीज के पच्चीस साल हो जाने पर भी अगर यही सब करना पड़े तो मेरे खयाल से यह ठीक नहीं. और अगर ऐसा कोई संकट है तो जनता के बीच जाने में कौन सी हिचक. जिस जनता के दुलार प्यार से हंस ने पच्चीस साल का सफर तय किया, वही जनता छोटे छोटे सहयोग से हंस की क्वालिटी को जिंदा रखने में मददगार साबित हो सकती है.

इतना तो तय है कि जब इस परम भ्रष्टाचार वाले देश में ट्रांसपैरेंसी एक बड़ा मुद्दा है, भ्रष्टाचार को रोकना बड़ा मुद्दा है, वहां निशंक जैसे घपलेबाज-घोटालेबाज सीएम की रचना को छापना दरअसल सारे आंदोलन की हवा निकालने का प्रयास करना है. और, मेरे खयाल से निशंक इसीलिए आजकल अपनी रचनाओं को यहां वहां छपवा रहा है, कवियों-लेखकों के साथ बैठ रहा है, ब्लागर सम्मेलनों में जा रहा है, नेक-पुनीत काम करते-कराते दिख रहा है, अपने नाम से किताबें छपवा रहा है ताकि वह अपने चरित्र के धवल होने का सर्टिफिकेट ले सके, दिखा सके.

याद रखें राजेंद्र यादव जी, अभी कर्नाटक का येदुरप्पा भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण भाजपा नेतृत्व के द्वारा पदमुक्त किया गया है, बेहद दबाव में. उस भाजपा नेतृत्व के द्वारा जिस पर आरोप है कि वह पैसे लेकर, अटैची लेकर अपने भ्रष्टाचारी मुख्यमंत्रियों को बचाने का काम करता है. उस तक को मजबूर होकर अपने एक दागदार सीएम से कुर्सी छीननी पड़ी है. निशंक की कुर्सी भले ही ओबलाइज्ड भाजपा नेतृत्व न छीने लेकिन बहुत जल्द होने जा रहे चुनाव में निशंक की लाइजनिंग और रचनाधर्मिता का उत्तराखंड की जनता ही बैंड बजाने वाली है.

याद रखिए यादव जी, देश-समाज के बड़े मुद्दों से कटकर रचनाधर्मिता का ककहरा सुनाना आपको ही हास्यास्पद बना देगा. मैं उस युवा के तेवर को सलाम करता हूं जिसने हंस के मंच पर चढ़कर निशंक और हंस के नापाक रिश्ते के बारे में खुलासा किया, वहां मौजूद सभी लोगों को जानकारी दी.

उस जलसे से लौटकर, दो दिन बाद जब मैं उस आयोजन के बारे में सोचता हूं तो खुद को राजेंद्र यादव के जीवन, दृढ़ता, उद्यमिता से बहुत कुछ सबक लेता हुआ पाता हूं. साथ ही यह निराशा भी कि यादव जी ने हंस जैसी मैग्जीन में निशंक को छापने का एक घटिया फैसला लिया, और, यह फैसला कंस सरीखा है, जैसाकि यादवजी ने मंच से कहा था कि उनकी इच्छा कंस निकालने की थी, पर निकाल दिया हंस, लेकिन आज भी इच्छुक हूं कंस निकालने के लिए. हंस-कंस के बीच हम सब जीवन जीते हैं. कभी किसी का पलड़ा भारी होता है कभी किसी का. लेकिन पब्लिक लाइफ में जिन मूल्यों को लेकर हम प्रतिबद्ध होते हैं, उससे समझौते करते वक्त यह जरूर देख लेना चाहिए कि इसका वृहत्तर समय, समाज, जनता, आंदोलन पर क्या असर पड़ेगा.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

bhadas4media@gmail.com

करोड़ों रुपये हर माह सेलरी पाने वाले इन भारतीय मालिकों को क्या कहें?

आप सबने खबर पढ़ी होगी. भारती एयरटेल के मालिक सुनील मित्तल की सेलरी 70 करोड़ रुपये सालाना तय कर दी गई है. माने, महीने में साढ़े पांच करोड़ रुपये के आसपास वे सेलरी उठाएंगे. जरा सोचिए, साढ़ें पांच लाख नहीं, साढ़े पांच करोड़ रुपये प्रति महीने सेलरी वे पाएंगे. और, अपनी मीडिया इंडस्ट्री में पत्रकारिता की शुरुआत करने वाला कोई होनहार अगर महीने में साढ़े पांच हजार रुपये तनख्वाह पर कहीं रख लिया जाता है तो अपने करियर की शुरुआत को सफल मानता है.

माना कि सुनील मित्तल मालिक हैं, इसलिए किसी एक ट्रेनी, या प्रशिक्षु या छात्र से उनकी तुलना नहीं की जा सकती. पर उन्हें यह भी तो हक नहीं है कि वे हर महीने साढ़े पांच करोड़ रुपये सेलरी लें. भले अपना भारतीय कानून उन्हें यह सेलरी पैकेज लेने को एलाऊ करता हो, पर किसी आम भारतीय का दिल कभी नहीं कहेगा कि इस देश का कोई एक बंदा हर महीने साढ़े पांच करोड़ रुपये सेलरी पाए. बात सिर्फ मित्तल की नहीं है. आप गुप्ताज, अग्रवाल्स, जैन्स आदि को ले लें. ये लोग जो अखबार मालिक हैं और इन दिनों मीडिया इंडस्ट्री पर राज करते हैं.

टाइम्स आफ इंडिया समूह के जो मालिकान जैन बंधु हैं, उनकी तनख्वाह पता करिए कितनी है. दैनिक भास्कर के मालिकन जो अग्रवाल्स हैं, उनकी पता करिए सेलरी कितनी है. दैनिक जागरण के मालिकान जो गुप्ताज हैं, पता करिए उनकी सेलरी कितनी है. लाखों-करोड़ों रुपये सेलरी उठाने वाले ये मालिकान किसी के प्रति जवाबदेह नहीं होते. वे जाते हैं दूर प्रदेश किसी मंदिर में दर्शन करने, सपरिवार, और बना लेते हैं आफिसियल टूर. पर कोई बेचारा उनका कर्मी अगर छुट्टी मांग ले तो देखा जाता है कि वह कहीं झूठ बोलकर तो छुट्टी नहीं ले रहा. और ज्यादा दिन छुट्टी पर रह गया तो उसकी फाइनल छुट्टी करने की तैयारी कर ली जाती है. इन्हीं मीडिया मालिकों की नानी मर रही है अपने कर्मियों को वेजबोर्ड के हिसाब से सेलरी देने में. पर खुद वे इतनी ज्यादा तनख्वाह लेते हैं कि हम आप इसकी कल्पना तक नहीं कर सकते.

इस देश में जो दो देश तेजी से बनते जा रहे हैं और दोनों देशों के बीच खाई बढ़ती जा रही है, वह दिन दूर नहीं जब गांव-देहात के लोग पगलाकर शहरों पर धावा बोलेंगे और इन धन्ना सेठों की तिजोरियों से धन निकालकर बांटना शुरू कर देंगे. यह जो सिस्टम है, फौज फाटा है, पुलिस है, व्यवस्था है, इस तरह निर्मित है कि यह सब अंततः आम आदमी के खिलाफ और धन्ना सेठों के पक्ष में खड़ा होता है. पर व्यवस्था बहुत दिनों तक आम जन की बोलती नहीं बद कर सकता. दुनिया का इतिहास गवाह है कि लुटेरों को एक दिन भगोड़ा बनना पड़ता है और इन करोड़ों रुपये पाने वाले मालिकों को अगर हम लोग लुटेरा कहें तो कतई गलत नहीं होगा.

लूट-खसोट और भ्रष्टाचार के कारण देश में आम जन का जीना मुहाल है. महंगाई चरम पर है. नेता, नौकरशाह, कारपोरेट घरानों के स्वामी मजे ले रहे हैं. सब पैसे बटोरने में लगे हुए हैं. जनता मरे तो मरे. पता नहीं आप लोगों का खून खौलता है या नहीं पर मुझे तो लगता है कि एक बार फिर से आंदोलनों का दौर शुरू करने की जरूरत है जो व्यवस्था को पंगु कर दे, सब कुछ ठप कर दे, धन्ना सेठों को सबक सिखाए और भ्रष्टाचारियों को चौराहों पर फांसी पर लटका दे. अन्ना के आंदोलन से बहुत उम्मीद तो नहीं की जा सकती है लेकिन इस आंदोलन के जरिए देश के सिस्टम को दिखाया जा सकता है कि उबे, सताए और बेचारे लोग अपने हक के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं.

आप लोगों से अपील है कि मीडिया के मालिकों की असली तनख्वाह पता करके उसे नीचे कमेंट के रूप में प्रकाशित करें या फिर bhadas4media@gmail.com पर भेजें ताकि इन बेशर्म मीडिया मालिकों को बताया जा सके कि तुम जो अपने कर्मियों का खून पी रहे हो, वह ठीक नहीं है. अगर पैसे हैं तो सबको दो, खुद काहें को छुपकर घी पी रहे हो और दूसरों को भुखमरी का शिकार बनाकर रखना चाहते हो. जो मी़डिया कंपनियां लिस्टेड हैं, सेबी में, उनके निदेशकों की तनख्वाह संभवतः सेबी की साइट पर मिल जाए. थोड़ी छानबीन की जरूरत है. उम्मीद है कोई न कोई बहादुर इस काम को जरूर करेगा कि वह मीडिया के मालिकों की तनख्वाह के डिटेल निकालकर पब्लिक डोमेन में डालेगा.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

bhadas4media@gmail.com

दो दिन, दो आयोजन और मेरी भागदौड़… राजेंद्र यादव से बीएचयू वालों तक…

: राजेंद्र यादव की पीसी और बीएचयू के पूर्व छात्रों की बैठक की नागरिक रिपोर्टिंग :

पिछले कई दिनों से दौड़ रहा हूं. दिल्ली में इधर-उधर जाना दौड़ने की ही तरह होता है. पूर्वी दिल्ली इलाके यानि नोएडा या मयूर विहार फेज थ्री में रहते हों तो किसी कार्यक्रम में शरीक होने मेन दिल्ली पहुंचने यानि प्रेस क्लब आफ इंडिया, रायसीना रोड या गांधी शांति प्रतिष्ठान, आईटीओ के पास जाने के लिए कम से कम आपको पंद्रह बीस किलोमीटर की यात्रा करनी होगी. दर्जन भर लाल-हरी बत्तियों के ब्रेक से दो-चार होना पड़ेगा.

घंटा-दो घंटा खर्चने के बाद आप मंजिल पर पहुंचेंगे और यही प्रक्रिया अपनाते हुए जब घर लौटेंगे तो अंततः लगेगा कि काफी दौड़-भाग हो गई. मतलब, साठ सत्तर किमी की यात्रा दिल्ली में आम बात है, रुटीन है, नियम की तरह है. नौकरी की जब तक मजबूरी रही, ऐसी चुनौतियों को जबरन जीता रहा. लेकिन जबसे अपन का खुद का काम है तो चलना-फिरना-भागना कम पड़ गया. हफ्तों अजगर की तरह मांद में पड़ा रहता हूं.

अपन का मांद भड़ास आफिस है. जिसे प्यार से भड़ास आश्रम भी कहता हूं. एक ऐसा आश्रम, जहां सारे कर्म-कुकर्म होते हैं. खबरें अपलोड करने से लेकर दारू पीने तक. मछली पकाने से लेकर बाहर से आए गेस्ट के लिए फ्री में रात बिताने की जगह देने तक. कभी कभार जुआ खेलने से लेकर अक्सर तेज-तेज आवाज में पंडित जसराज को सुनने तक.

मतलब, छोटी सी जगह का मल्टीपल इस्तेमाल है. यह दिल्ली का तरीका है. यही मुंबई समेत अन्य मेट्रो शहरों का तरीका होगा जहां स्पेस कम होता जा रहा है और लोग व गाड़ियां दिन प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं.

अगर किसी दिन भड़ास आफिस उर्फ भड़ास आश्रम में न गया तो स्पष्ट है कि फिर घर में ही एक अलग कमरे में, जिसे खुद के लिए रिजर्व कर रखा है, लप्पूटप्पू आन करा और शुरू हो गया भड़ास भड़ास.

पर अब दौड़ने-भागने लगा हूं क्योंकि लगने लगा है कि अकेले गुफा में बैठकर आप सच्चे, अच्छे, पवित्र, महान… खुद की निगाह में बने रह सकते हैं पर इससे अंततः समाज-देश से कटने का खतरा पैदा हो जाता है. नए लोगों को जानने-समझने-मिलने का मौका खत्म हो जाता है.

और, सौ बात की एक बात की, महीने के तीस हजार रुपये खाने वाले भड़ास के सर्वर को चालू रखने के लिए पैसा कहां से आएगा… भिखमंगई करनी ही पड़ेगी. साफिस्टीकेटेड लैंग्वेज में कहें तो, पीआर, लाइजनिंग, बिजनेस, मार्केटिंग, एसोसिएशन… आदि करने के लिए यहां वहां जाना पड़ेगा, गांव की भाषा में कहें तो हांथ-पांव हिलाना पड़ेगा तब दो जून की रोटी मिलेगी. पर आदत तो आदत होती है. जब मोबाइल की घंटी बजने पर फोन उठाएं और उधर से आवाज आए कि मैं राजेंद्र यादव बोल रहा हूं तो आपको एलर्ट हो ही जाना पड़ेगा कि कहीं ये हंस वाले प्रख्यात साहित्यकार राजेंद्र यादव तो नहीं. और अगर वे कहें कि हां, वही राजेंद्र यादव बोल रहा हूं और आपको फलां बजे फलां जगह आना है तो कोई माई का लाल नहीं रोक सकता वहां पहुंचने से, चाहें जितनी भी कोई और अर्जेंट मीटिंग बैठक कहीं रखी हो.

असल में मुझे लगता है कि दिल्ली की दुनियादारी काफी सीखने के बावजूद अब भी मैं भारी मात्रा में इमोशनल नागरिक बना हुआ हूं. तभी तो कोई प्यार से पुकार ले तो भागा चले जाने को दिल करता है. और कोई जबरन पंगा लेकर सिर भिड़ाने-लड़ाने की कोशिश करे तो सारा काम रोककर पहले उस बंदे को निपटाने में जुट जाने का मन करता है. दिल्ली की दुनियादारी यह करने को कतई नहीं सिखाती. यह तो गांव वालों का नियम है. जैसा अंदर वैसे बाहर. पत्थर की तरह साफ-सपाट और सौ प्रतिशत शुद्ध. कोई आंय बांय सांय दाएं बाएं नहीं. जो हैं सो हैं. पर दिल्ली की दुनियादारी की बात करें तो यहां बताया सिखाया जाता है कि अगर कोई सिर लड़ा भिड़ा रहा है तो उससे उसी तरह बचकर दाएं बाएं निकल लो जैसे कोई मरकहा सांड़ बीच सड़क पर खड़ा होने पर हम आप करते हैं. अगर कोई प्यार से पुकार रहा है तो उसमें लाभ हानि तलाश लो, बेकार में प्यार के पचड़े में पड़ने से टाइम और पैसे का नुकसान करने का क्या मतलब.

यानि मछली की आंख पर निगाह रखते हैं दिल्ली वाले. पैसा और सिर्फ पैसा. कोई चाहे किसी प्रोफेशन में हो. उसका आखिरी लक्ष्य पैसा होता है. और, आखिरी लक्ष्य के पहले ढेर सारे नैतिक-अनैतिक प्रवचन टाइप लक्षण-विलक्षण बातें बकचोदियां होती हैं, जो कम दिमाग वाले या फिर आदर्शवादियों या युवाओं या गरीबों को चूतिया बनाने के काम में आती हैं ताकि उन्हें फांसकर उनसे काम निकलवाया जा सके या उनसे लाभ लिया जा सके.

जड़ें जमीन से गहरी जुड़ी हैं सो कटने उजड़ने में वक्त लगेगा… दिल कहीं वहीं उनके पास है सो संभलने-बदलने में वक्त लगेगा…

राजेंद्र यादव का बुलावा आया कि प्रेस क्लब में एक छोटी सी मीटिंग रखी गई है, कुछ चुनिंदा पत्रकार साथियों के साथ… आपको आना है, यह संगम पांडेय जी का मुझे आदेश है कि मैं आपको सूचित कर दूं…

मैंने खुद को धन्य मानते हुए राजेंद्र जी को आश्वस्त किया कि जरूर पहुंचूंगा. और पहुंचा प्रेस क्लब आफ इंडिया.

प्रेस क्लब आफ इंडिया में मेरा जाना बहुत कम होता है क्योंकि मुझे आज तक वह जगह छककर दारू पीने और मुर्गा खाने से ज्यादा काम की नहीं लगती और यह काम मैं अक्सर अपने सचल मदिरा वाहन उर्फ अल्टो कार में किया करता हूं सो प्रेस क्लब से कोई अपनापा नहीं कि वहां अक्सर जाया करूं. परसों गया.

एक छोटे से कमरे में राजेंद्र यादव के अलावा हंस के एडिटर और कथाकार संजीव, पत्रकार संगम पांडेय, पत्रकार सुधीर श्रीवास्तव, अजय समेत करीब आठ दस लोग थे. हंस के बारे में, राजेंद्र यादव के बारे में काफी बातें हुईं. लोगों ने कई कई सवाल पूछे. मैंने कई वीडियो बनाए, फोटो खींचे. सबने जमकर खाया पिया. मैंने भी मौका-माहौल और आजादी देखकर छककर दारू पी. पिलाने वालों ने जब कोई कमी नहीं की तो पीने वाले को क्या दिक्कत.

जब ”’तन डोले मन डोले” वाली अवस्था में आ गया तो प्रेस क्लब के मेन दारूखाने में पहुंचा. कई एक परिचित लोग दिखे. सबको प्रणाम सलाम के साथ दारू पिलाने का अनुरोध. दारू बंद होने वाली पगली घंटी बज गई तो मैंने कई पैग मंगा लेने का अनुरोध एक साथी से किया. उन्होंने मेरी सेवा में तत्परता दिखाते हुए ऐसा ही किया और इसका नतीजा हुआ करीब दर्जन भर लार्ज पैग पीने के बाद मैं आउट आफ कंट्रोल हो गया.

फिर तो, किससे क्या कहा, किससे क्यों लड़ा, किसी ने क्यों डांटा, किससे क्या कहा, किसको क्यों फोन किया, कैसे घर पहुंचा और घर पहुंचते हुए रास्ते में गाड़ी चलाते हुए और किसी मित्र को सुनाते हुए फूट फूट कर क्यों रोया.. मुझे खुद पता नहीं. वो मैं अक्सर कहता हूं, लिखता हूं न कि चरम दारूबाज की गाड़ी ईश्वर चलाता है, मोक्ष की अवस्था में गाड़ी में ड्राइविंग सीट पर बैठा शराबी तो निमित्त मात्र होता है जो ईश्वरीय निर्देश पर स्टीयरिंग को दाएं बाएं करता रहता है.

और आज जब कल व्यतीत हुई भयंकर शराबखोरी वाली रात के अपराधबोध तले दबा-बुझा मैं जब सुधरने की कसमें खाकर गुमसुम बैठा अपना काम कर रहा था और बीच-बीच में याद आ रही चीजों के आधार पर कई कल रात के कई पात्रों से फोन कर जो भी कुछ अनजाने में हुआ उसके लिए माफी मांग रहा था तो अचानक एक मित्र का फोन आया कि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन विभाग के पूर्व छात्र एक बैठक कर रहे हैं, आईटीओ के पास मालवीय स्मृति भवन में, आपको हर हाल में पहुंचना है तो मुझे लगा कि चलना चाहिए. ढेर सारे बनारसी और बीएचयू वाले और उस पर से, जर्नलिज्म डिपार्टमेंट वाले लोग मिलेंगे. सबसे रूबरू हो जाना ठीक रहेगा. जमाना हुआ अपने बनारसी भाइयों से मिले, बतियाये.

फटाफट तैयार होकर गाड़ी रूपी घोड़ा दौड़ाया और पहुंच गया मालवीय स्मृति भवन. देर में पहुंचा था. परिचय सत्र खत्म हो रहा था. वहां सबने मिलने और एक दूसरे की मदद करने की बातें की. एक कमेटी बनाई. डिनर हुआ. ग्रुप फोटो खींचे गए. ढेर सारे नए लोग मिले. भड़ास के कई प्रशंसक भी मिले. अपने बीएचयू वाले छात्र नेता आनंद प्रधान भी मिले. यूनीवार्ता वाले सुफल जी मिले. वरिष्ठ पत्रकार नरेश कुमार मिले, जो हाल में ही रिटायर हो गए यूनीवार्ता से. पत्रकारिता शिक्षक और परम बनारसी उमेश पाठक मिले. इन दो आयोजनों, राजेंद्र यादव की प्रेस से छोटी सी मुलाकात और बीएचयू पत्रकारिता विभाग के पूर्व छात्रों की बैठक, की कुछ तस्वीरें यहां डाल रहा हूं.

बीएचयू के पत्रकारिता विभाग के पूर्व छात्रों की बैठक, मुखातिब हैं पत्रकारिता शिक्षक उमेश पाठक

परिचय के बाद और डिनर के पहले बात-बतकही का दौर, आपको घूर रहे हैं पत्रकारिता शिक्षक आनंद प्रधान

इतने लोग मिले हैं तो फिर ग्रुप फोटो क्यों न हो जाए, और पैदा हो गए कई फोटोग्राफर

राजेंद्र यादव, एक संस्था, एक महान शख्सियत के साथ चुनिंदा पत्रकारों का सवाल-जवाब

बीच वाली मोहतरमा के बारे में बताया गया कि वे मुंबई से आई हैं, अभिनेत्री हैं, राजेंद्र जी की भक्त हैं.

पत्रकार संगम पांडेय, कथाकार संजीव और पत्रकार सुधीर श्रीवास्तव : राजेंद्र यादव के संघर्ष और हंस के उतार-चढ़ावों को बयान करते संजीव

इंडिया टुडे की टीम सबसे लास्ट में आई. आते ही भाई श्यामलाल गरमागरम चिकन पकौड़े पर टूट पड़े. शिवकेश मुखातिब हैं राजेंद्र यादव की तरफ.

बहुमुखी प्रतिभा के धनी चर्चित पत्रकार व साहित्यकार प्रदीप सौरभ प्रेस क्लब में एक साथी के साथ बतियाते दिखे.

और, दिल्ली के गरीबों की (मेरी भी) पसंदीदा जगह इंडिया गेट. पिछले तीन-दिनों की भागादौड़ी के दौरान एक दफे यहां भी पहुंचा. एक लड़की से मनुहार कर अपनी फोटो खिंचवाई, कोई नहीं मिला तो इंडिया गेट पर सैलानियों की तस्वीरें खींचकर जीवनचर्या चलाने वाले एक अनजान फोटोग्राफर भाई के गले में हाथ डाल खुद के अकेले न होने का एहसास कराया… जिंदगी जिंदाबाद का नारा लगाया…

बता दूं, नरसों (परसों के एक दिन पहले का दिन) भी मिशन भागदौड़ का हिस्सा बना था. न्यूज एक्सप्रेस चैनल की लांचिंग पर गया था. और, कल के दिन भी मिशन भागदौड़ का हिस्सा बना रहूंगा. हंस मैग्जीन के पच्चीस साल होने पर जो आयोजन हो रहा है, उसमें शरीक होना है. आखिर इस दौर के महानतम साहित्यकारों में से एक राजेंद्र यादव का न्योता जो हमको आपको सबको आया है.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

संपर्क yashwant@bhadas4media.com

चिल्लर पार्टी : पैसा हजम कहानी खतम बोलो लड़कों सीताराम…

: बहुत दिन बाद बाबा ने सुनाई बच्चों वाली एक प्यारी-सी कहानी : बाबा बहुत पहले गुजर गए मेरे. शायद कक्षा दस में पढ़ता था. व्रत वाले एक दिन वे पड़ोस के गांव में जा रहे थे कि उसी पड़ोस वाले गांव में अपने एक अनन्य मित्र के घर के दरवाजे पर हार्ट अटैक के कारण गिरे और चले गए. देर रात हम लोग गाजीपुर शहर से गांव लौटे थे. उनका शरीर उसी नीम के पेड़ के नीचे जमीन पर ढककर लिटाया गया था जहां मैं बाबा के साथ उनकी चारपाई पर सोता था.

और, बाबा जब जल्द सो जाया करते तो उनके अधखुले पेट पर तीली विहीन माचिसों के ढेर को एक दूजे से जोड़कर ट्रैक्टर बनाकर चलाया करता था.. भड़भड़ भड़भड़ ठकठक ठकठक की आवाज मुंह से निकालते हुए. और, वे जब काफी देर बाद अनमनाते तो मेरे सारे ट्रैक्टर गिर पड़ते, तब दूसरा खेल खेलता. बाबा की बड़ी बड़ी सफेद मूछों को ऐंठकर उपर की तरफ कर देता. बाबा की मूंछें बड़ी बड़ी हुआ करती थी लेकिन लटकी हुई होतीं. उन्हें टे-टा कर चंद्रशेखर आजाद की तरह करता तो भी वे चुप शांत सोये रहते. और, इसी बीच निबौनी (हमारे यहां नींबकौड़ी बोलते हैं) नींब के पड़ से खटिया पर टपकते रहते तो उन्हें उठा उठा कर कुछ को चखकर और कुछ को यूं ही नीचे फेंकता रहता.

इस रुटीन दृश्य से अलग कुछ और दृश्य होते जो स्थायी भाव होते. वो था बाबा द्वारा रोज एक कहानी सुनाना. बाबा की कहानियों और उनको सुनते वक्त अपने अंदर की भाव भंगिमाओं के बारे में सोचता हूं तो लगता है कि बाबा की कहानियों के इमोशन, उतार-चढ़ाव, विस्तार… सब हम लोगों को इस तरह आगोश में ले लेता कि हर कहानी के बाद अपन बच्चा लोगों का शरीर शांत हो जाता, सिर्फ दिमाग दौड़ता रहता, सोचता रहता. और, आज वही दृश्य सब याद आ गया. चिल्लर पार्टी देखते हुए. फिल्म देखकर लौटते वक्त नास्टेल्जिक होता गया. बाबा के पास पहुंचता रहा. बचपन की कहानियों में गोता लगाने लगा.

एक था कुत्ता. आवारा था. और उसका दोस्त था एक लड़का. वो भी गली छाप था, इसलिए आवारा था. वो एक बार शहर में आ गया, मजूरी करने वाले अपने बाबा के पास. उसके बाबा शहर की उस कालोनी में कपड़े प्रेस करते थे जहां राजे-राजकुमार सरीखे लोग रहते, सारी सुविधाओं से लैस. उस कालोनी के सभी राजकुमार बच्चे उस आवारा लड़के और उसके आवारा कुत्ते के आने से खुश नहीं थे. क्योंकि राजकुमारों की क्रिकेट पिच पर उस कालोनी की एक राजकुमारी सरीखी पालतू बिच उर्फ कुतिया रोज टट्टी कर देती थी. राजकुमार लोग टट्टी जैसी बुरी चीजों को भला कैसे झेल पाते, सो वे प्लान बनाते रहते कि कैसे इस कालोनी के एक घर की एलीट कुतिया को कालोनी से बाहर भगा दिया जाए ताकि उनकी पिच चाक-चौबंद रहे. और, लो, यह क्या. एक पालतू व सभ्य-सुशील कुतिया अभी गई भी नहीं कि एक आवारा कुत्ता कालोनी के भीतर आ गया.

आवारा लड़का और उसका आवारा कुत्ता उस कालोनी के मैदान के एक किनारे पड़ी बेहद पुरानी, जर्जर, कबाड़ी कार में रात बिताते थे और दोनों आपस में बतियाते थे. कुत्ता बेचारा क्या बोलता, पर आवारा लड़का उसके मूड मिजाज को खूब समझता और उसी अनुरूप बातें भी करता. यह भी कह सकते हैं कि आवारा लड़के का कालोनी में कोई दोस्त नहीं था क्योंकि वहां सब राजे-राजकुमार थे, सो उसने बातचीत करने का काम अपने दोस्त कुत्ते से जारी रखा. बाबा ने अपने गरीब बालक को कालोनी की कार साफ करने का काम दिलवा दिया था. सो, वह अपना काम निपटाकर कुत्ते के साथ बोलता-बतियाता और खटारा-कबाड़ा-जर्जर कार में सो जाता. अब जब ये आवारा टाइप लोग आ गए तो इन्हें भगाना बेहद जरूरी हो गया था राजे-राजकुमारों के लिए. इसके लिए एक से बढ़कर एक प्लानिंग की गई और उसे आजमाया गया.

एक बार तो एक तेजतर्रार बुद्धि वाले चश्माधारी छटांक भर के राजकुमार ने अपने पापा की रिमोट कंट्रोल वाली घर के बाहर खड़ी बड़ी-सी कार में आवारा कुत्ते को घुसा दिया और कार को दूर से ही रिमोट से लाक कर दिया. बेचारा आवारा कुत्ता. बंद शीशों वाली कार में क्यूं क्यूं कांहें कांहें करता हुआ दम घुटने की प्रताड़ना झेलता रहा और उधर यह सब देख राजे-राजकुमार प्रसन्न होते रहे. अपने दोस्त को न पाकर मैला-कुचैला कपड़ा पहनने वाला गरीब लड़का दुखी हो गया और बेचैन होकर खोजने लगा. खोजते-खोजते खोजते वह हर जगह पहुंचा. दाएं बाएं यहां वहां. कालोनी के चप्पे चप्पे को आवाज देकर पुकार लिया, पूछ लिया, रो लिया, पर कुत्ता दोस्त नहीं मिला. उसका रोना जारी रहा. धीरे धीरे वह जोर जोर से रोने लगा. इतना जोर जोर से रोने लगा कि कालोनी के राजे-राजकुमार के दिलों में खुशी की लहर दौड़ गई. आखिरकार रोते हुए आवारा लड़के ने कार में मरते हुए अपने आवारा दोस्त को खोजने में कामयाब हो गया पर उससे तो कार का दरवाजा खुल ही नहीं रहा था.

सिर पटक पटक कर हाथ पटक पटक कर वह थक गया, बैठ गया, रोता रहा पुक्का फाड़ के, पर कार का दरवाजा नहीं खुला और अंदर उसका दोस्त दम घुटने से छटपटाता जा रहा था…. राजे-राजकुमारों को इस हृदयविदारक दृश्य से दया आई. रिमोट दबाया तो कार से टक टक की आवाज आई. दोस्त ने दोस्त को निकाल लिया, बचा लिया, पानी पिलाकर उसके दम घुटते जाने के दर्द के एहसास को कम किया… और फिर एक दिन आवारा लड़के और अच्छे लड़कों में दोस्ती हो गई. दोस्ती क्रिकेट के नाम पर हुई क्योंकि राजे-राजकुमारों की क्रिकेट टीम के फास्ट बालर को हैंड इंजरी थी और आवारा लड़का फास्ट बालिंग में एक बार यूं ही अपना गुर टीम को दिखा चुका था….

उफ्फ… बड़ी लंबी कहानी है भाई… बच्चा लोग अब सो जाओ. अभी तो आधी भी नहीं हुई है… बाकी कल सुनाएंगे… इसके आगे की कहानी और मजेदार है….

और, तब बच्चा लोगों की तरफ से समवेत स्वर में अनुनय-विनय… नहीं बाबा, आज ही सुना दो, आज ही पूरी कर दो.. अच्छा चलो बता दो कि लास्ट में क्या हुआ… बाबा बच्चों की जिद के आगे हार गए और अपनी ऊंघ, नींद, जम्हाई को किनारे कर धीमी आवाज में कहानी को आगे बढ़ाने लगे और बच्चे लोग कहानी के चरित्रों के साथ एकाकार होकर शांत होने लगे. कई तो इसी दौर में सोचते सोचते सो जाते.

और, जब बाबा को लगता कि सभी सो गए, कहीं से किसी की हुंकारी (कहानी के बीच में श्रोताओं द्वारा हां हूं करते रहने की आवाज) की आवाज नहीं आ रही तो वो भी अचानक चुप होकर सो जाते. पर मुझे नींद कहां, मुझे तो पूरी कहानी सुननी थी. बोल बैठा- बाबा, सोना नहीं, मैं सुन रहा हूं, फिर क्या हुआ. तब बाबा समझाते कि कल बाकी बच्चे कहेंगे कि कहानी पूरी कर दो तो फिर दुहराना पड़ेगा इसलिए रात ज्यादा हो गई है और सुनो, सियारों की भी आवाज आ रही है, इसलिए सो जाओ. तब कहीं जाकर मैं सोने के प्रयास में जुट जाता, बाबा से चिपककर, बाबा के पेट पर लात फेंककर, ताकि सियार-हुंड़ार का भय मेरे करीब न आ सके.

और, आज जब पहली बार नेट बैंकिंग से स्पाइस माल में लगी चिल्लर पार्टी फिल्म का टिकट बुक किया तो मुझे कतई एहसास नहीं था कि फिल्म देखकर लौटते वक्त कार में मैं सिर्फ शरीर से रहूंगा, आत्मा तो कहीं बाबा के शरीर पर लात फेंककर सो रही होगी, कही गई कहानी के सीन को रिपीट कर कर के सोचते गुनते समझते हंसते दुखी होते हुए. फिल्म इसलिए सभी को देखनी चाहिए क्योंकि हर आदमी में एक बच्चा होता है जो शरीर के बूढ़ा होने पर भी बच्चा ही रहता है, बेहद निर्दोष रहता है, वह अपनी गल्तियों को एहसास करता है, वह रोता है, वह दुखी होता है, वह हंसता है, वह इमोशनल होता है, वह महसूस करता है, वह गलत सही में तुरंत फर्क कर लेता है…

पर काया की उम्र बढ़ने के साथ-साथ उस बच्चे का काया पर से अधिकार-प्रभाव कम होने लगता है, सो वह कहीं कोने में छोटा-मोटा होकर पड़ा रहता है और चिल्लर पार्टी जैसी फिल्म देखकर कुलांचे मारने लगता है. इस फिल्म को काया के हिसाब से हो चुके दिमाग से नहीं बल्कि अंदर बसे बच्चे की निगाह से देखेंगे और किस्सागोई का लुत्फ लेने के लिए सुनेंगे तो ज्यादा आनंद आएगा. फिल्म बनाने वालों को बधाई. इसके कलाकारों को बधाई. और मुझको बधाई, कि मैं यह फिल्म देखने गया, जाने किस भाव से प्रेरित होकर. बहुत दिनों बाद हफ्ते में दो फिल्में देख डाली. सिंघम देखकर आया था तो मन की बात लिख दी थी. अब चिल्लर पार्टी की चिल्ल-पों आपको सुना दिया.

सोचा है कि हर हफ्ते कम से कम एक फिल्म देखा करूंगा. दिल को दिल्ली में लगाने का ये खयाल अच्छा है. ज्यादा कहा सुना हो तो माफ करें. अब पैसा हजम. कहानी खतम. बोलो लड़कों सीताराम. बस. सो जाओ सब लोग. वरना किसी पार्टी का कोई नेता आ जाएगा, देखो आवाज सुनाई पड़ रही है न…

लेखक यशवंत भड़ास4मीडिया से जुड़े हैं. उनसे संपर्क yashwant@bhadas4media.com के जरिए किया जा सकता है.

‘सिंघम’ देखकर पुलिस अफसर कुछ सीखें तो बात बने

: दुनिया जिन महान बेईमान कारपोरेट घरानों, उनके महाबलशाली लुच्चे प्रतिनिधि नेताओं के जरिए संचालित होती है उनका असली दर्शन तो हर बेईमानी व भ्रष्टाचार के जरिए मुनाफा और माल कमाना है. ये लोग लोकतंत्र, सिस्टम व व्यवस्था को जनविरोधी बना देते हैं. ऐसे सड़े हालात में कुछ एक जनपक्षधर लोग कितना झेलते हैं, इसका तीखा प्रदर्शन फिल्म सिंघम में है :

मेरी जरूरतें कम है, तभी मेरे सीन में दम है

बहुत दिनों से फिल्म नहीं देखी. और हर हफ्ते कोई न कोई चर्चित फिल्म आती रही, जाती रही पर संयोग नहीं बन पाया कि कोई भी फिल्म देख सकूं. गाली वाली फिल्म आई आमिर खान की तो सेक्स वाली मर्डर2 आई इमरान की. बच्चा लोगों की चिल्लर पार्टी भी आई और ऋतिक रोशन की लव स्टोरी भी आई. इनके पहले भी बहुत फिल्में आईं. लेकिन बहुत दिनों बाद किसी फिल्म को देखने का संयोग आज बन बैठा.

फिल्म मैं अक्सर घर से भागकर देखता हूं. आज भी घर से भाग निकला. कहां जाऊं कहां जाऊं सोचते हुए नोएडा के स्पाइस माल पहुंच गया. टिकट खिड़की पर पहुंचा और सिंघम का टिकट कटा लिया. अकेले था. सो, तुरंत शुरू हुए शो का टिकट लेकर भागते हुए उसमें जाकर बैठ गया. फिल्म शुरू हो चुकी थी. एक इंस्पेक्टर अपने थाने में बैठकर खुद के सिर पर रिवाल्वर लगाकर गोली मार रहा है और खत्म हो गया. यह देखकर मलाल हुआ कि अरे यार, लगता है फिल्म के इंपार्टेंट सीन मुझसे छूट गए. अब जब लौटकर फिल्म के बारे में लिख रहा हूं तो लग रहा है कि एक ठीकठाक फिल्म देखी.

अपन लोग पार्टी आंदोलन भगत सिंह समाज सरोकार बदलाव जनता जैसे शब्दों को सोते पहनते गाते बोलते पत्रकारिता में आए इसलिए फिल्में वही अच्छी लगती हैं जिसमें कोई सोच, सरोकार और समझ हो. सिंघम में ढेर सारे फिल्मी अतिरंजना के बावजूद फिल्म अंत तक बांधे रखती है. कहानी वही पुरानी है. सिस्टम भ्रष्ट है, सिस्टम चलाने वाले लोग भ्रष्ट हैं, इसलिए कुछ जो ईमानदार आदर्शवादी टाइप देहाती लोग इस सिस्टम में पहुंचते हैं तो उन्हें किन किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, इसका बयान है फिल्म में.

अजय देवगन (फिल्म में नाम है बाजीराव सिंघम) एक ईमानदार इंस्पेक्टर हैं. दूर देहात के थाने में हैं और ईमानदारी से मामलों को निपटाते हैं, समाज के हिस्से हैं और एक प्रगतिशील सोच रखते हैं. इसी कारण गांव देहात के लोग उनके मुरीद हैं और उनकी मुश्किल में जान देने के लिए भी तैयार रहते हैं. बाद में अजय देवगन का साबका एक महान गुंडे से पड़ता है. वह गुंडा अजय को सबक सिखाने के लिए उनका तबादला शहर में करा देता है, शहर में यानि अपने गुंडई वाले इलाके में. वो महान गुंडा नेताओं, अफसरों, मंत्रियों तक को पालता है और खुद अपहरण, उगाही, बेईमानी आदि का धंधा करता है. जो उसका इगो हर्ट करता है वह उसे निपटा देता है.

अजय देवगन से उसका साबका पड़ता है तो वह अजय देवगन को ऐसी स्थिति में लाकर खड़ा कर देता है कि जैसे उसके पहले एक इंस्पेक्टर ने उससे पंगा लिया तो उसको भ्रष्टाचार में जबरन फंसा दिया गया और उसे थाने में अपनी सर्विस रिवाल्वर से गोली मारकर मरना पड़ा. एक तरह से उसकी हत्या कर दी गई.  उसी तरह की स्थितियां अजय देवगन के सामने भी आ चुकी हैं. पर अजय देवगन अपनी तरकीबों, समझ बूझ और टीम को साथ लेकर चलने वाली भावना के कारण गुंडे को निपटा देता है. हां, इसके लिए फिल्म में बहुत ज्यादा अतिरंजना दिखाई गई है. कि अजय देवगन के भाषण देने पर पुलिस विभाग के बड़े बड़े अफसरों का, खुद डीजीपी का दिल डोल जाता है और वह भी इंस्पेक्टर अजय देवगन की ईमानदारी की मुहिम में शामिल हो जाते हैं.

अजय देवगन का हर बार की तरह इसमें भी कमाल का अभिनय है. जो शख्स खलनायक बना है, प्रकाश राज, उसने तो अदभुत अभिनय किया है. रीयल गुंडे माफिया की तरह अभिनय किया है. उसके बड़े गुंडे वाला अभिनय देखकर सिहरन दौड़ जाती है. कितनी शांति से वह सबको मारता काटता पकड़ता और निपटाता है, और कितने मजे से सिस्टम को अपना गुलाम बनाए हुए हैं, कितने आराम से वह टिकट लेकर चुनाव जीत जाता है… यह सब देखते हुए लगता है कि अपन लोग के लोकतंत्र की यही सच्ची हकीकत है. फिल्म खत्म होने पर निर्देशक रोहित शेट्टी ने फिल्म के शूट किए जाने के रा सीन भी दिखाए हैं.

इस एक्शन फिल्म सिंघम में अजय देवगन पर मारधाड़ के जोरदार सीन फिल्माए गए हैं. यंग एंग्री मैन वाला दौर याद आता है इसे देखकर. माल में अब वो लोग नहीं होते जो हीरो के एक्शन में आने पर सीटियां बजाएं पर इस फिल्म को देखते हुए सीटियों की आवाज से कई बार दो-चार हुआ. तालियां भी दर्शकों ने बजाईं. कमेंट भी लोगों ने खूब किए. भ्रष्ट सिस्टम, भ्रष्ट राजनीति ने किस तरह से पुलिस विभाग को बिना पेंदी का लोटा बना दिया है, बिना औकात का कर दिया है, इसका सटीक चित्रण है. अभिनेत्री काजल अग्रवाल टाइमपास के लिए हैं. बीच में कुछ एक रोमांटिक गाने फिलर की तरह हैं. पर अभिनेत्री काजल अग्रवाल सीमित भूमिका के बावजूद अपनी स्टाइल और अभिनय से दर्शकों के दिल को छूती हैं.

फिल्म देखकर निकलते वक्त वही पुराना सवाल दिमाग में तैरता है कि आखिर ईमानदारी दाल में नमक की तरह क्यों है. जब पूरी दाल बेईमानी की है तो उसमें ईमानदारी के नमक से क्या होने वाला. दुनिया जिन महान बेईमान कारपोरेट घरानों, उनके महाबलशाली लुच्चे प्रतिनिधि नेताओं के जरिए संचालित होती है उनका असली दर्शन तो हर बेईमानी व भ्रष्टाचार के जरिए मुनाफा और माल कमाना है. किसी भी तरह माल बटोरते रहने, पावर में बने रहने और सिस्टम को अपना घरेलू नौकर बना लेने की जिद हर देश के लोकतंत्र, सिस्टम और व्यवस्था को जनविरोधी बना दे रहा है. ऐसे जनविरोधी सिस्टम में कुछ एक जनता की बात करने वाले लोग, ड्यूटी व फर्ज की बात करने वाले लोग पहुंचते हैं तो उन्हें कितना कुछ झेलना पड़ जाता है, उसका तीखा वर्णन इस फिल्म में है.

तीन घंटे तक सिंघम देखने वाला दर्शक जब सिनेमाहाल से बाहर निकलता है तो यही मानकर निकलता है कि इस फिल्म का हीरो फिल्मी स्टोरी होने के कारण जीत जाता है, जिंदा बच जाता है वरना असल जिंदगी में तो ऐसे हीरो या तो निपटा दिए जाते हैं, या साइडलाइन कर दिए जाते हैं या फिर उन्हें भ्रष्टाचार का ककहरा सीखकर भ्रष्टाचार के मेनस्ट्रीम में शामिल हो जाना पड़ता है. फिल्म के कुछ एक डायलाग जोरदार हैं. इंस्पेक्टर गुडे से कहता है- मेरी जरूरतें कम है, तभी मेरे सीने में दम है. डीजीपी साहब जब पूरी पुलिस  फोर्स के साथ गुंडे को निपटाने उसके घर पहुंचते हैं तो गुंडा उनसे कहता है कि डीजीपी साहब आपके सामने ये सब क्या हो रहा है. तब डीजीपी जवाब देते हैं कि यहां डीजीपी साहब कहां हैं, डीजीपी साहब तो दिन भर वीआईपी ड्यूटी के कारण हाईबीपी की दवा लिखवाकर और खाकर सो रहे हैं, वो अब सुबह ही जगेंगे.

मतलब यह कि पुलिस अगर चाह ले तो वह कुछ भी कर सकती है. वह सही को गलत व गलत को सही बना सकती है. इस फिल्म के जरिए पुलिस की लाचारी और पुलिस की अकूत ताकत, दोनों का एहसास कराया गया है. अगर कोई पुलिस वाला इस फिल्म को देखेगा तो फिल्म खत्म होने के बाद काफी देर तक खुद के बारे में और अपने विभाग की व्यवस्था के बारे में सोचता रहेगा. उसे अपनी खाकी के बारे में सोचने पर मजबूर होना पड़ेगा, उसे इस खाकी के पहनने का मकसद समझ में आएगा. हो सकता है कि मैं गलत होऊं क्योंकि अक्सर लोगों की उनके हालात के अनुसार कंडीशनिंग हो जाती है जिसके बाद उन पर तर्कों, संवेदनाओं और समझाइश का कोई असर नहीं पड़ता.

यह फिल्म मुझे इसलिए भी अच्छी लगी क्योंकि पिछले कुछ महीनों में पुलिस केंद्रित जो फिल्में आईं, जिसके लीड रोल में सलमान खान थे, दबंग, चुलबुल पांडेय टाइप, उसमें इंस्पेक्टर को मसखरा बना दिया गया, उसमें इंस्पेक्टर को जन्मना हरामी, बदमाश, छिछोरा, लफंगा दिखाया गया. शायद इसी कारण आजकल के इंस्पेक्टरों को चुलबुल पांडेय का अभिनय ज्यादा रीयलिस्टिक लगा और पसंद आया है. सो, इसी वजह से कई नए नवेले दरोगा थानेदार खुद को चुलबुल पांडेय कहलाने और वैसा दिखने-करने में गर्व महसूस करने लगे. पर सिंघम में पुलिस इंस्पेक्टर को एक आदर्शवान, संवेदनशील और ईमानदार के रूप में चित्रित किया गया है जिसके उपर समाज और जनता की रक्षा का गंभीर दायित्व है. यही सच भी है.

सिंघम देखते हुए मनोज वाजपेयी का अभिनय याद आ जाता है. प्रकाश झा की फिल्में नजर आने लगती हैं. यंग्र एंग्री मैन वाले जमाने के अमिताभ बच्चन याद आते हैं. मतलब, सिंघम देखने के बाद आप बाहर निकलेंगे तो बहुत देर तक इसका नायक बाजीराव सिंघम आपके दल-दिमाग पर छाया रहेगा. हालांकि नायकत्व की यह छवि वर्तमान सड़ी व्यवस्था का खयाल आते ही खत्म होने लगती है कि और अंततः लगता है कि यह सब फिल्मी है पार्टनर…. अपन का देश समाज ऐसे ही चूतियापे वाली व्यवस्था में चलता रहेगा… कभी कभार कुछ एक नायक टाइप बहके हुए लोग आएंगे और व्यवस्था के मकड़जाल में फंसाकर शहीद किए जाते रहेंगे, उनकी शहादत पर थोड़ा बहुत हो हल्ला मचेगा, पर इस आकस्मिक ब्रेक के बाद, छोटी सी श्रद्धांजलि व शांति के बाद फिर सड़ी-गली व्यवस्था यूं ही धड़ल्ले से चलती रहेगी.

फिल्म के कुछ अन्य तथ्य

  • रोहित शेट्टी और अजय देवगन की जोड़ी पिछली पांच फिल्मों की कामयाबी का स्वाद चख चुकी है. इनका आत्मविश्वास फिल्म सिंघम में भी नजर आता है. अब तक यह जोड़ी दर्शकों के सामने कॉमेडी फिल्में लेकर आयी है, लेकिन इस बार उन्होंने शेर की तरह दहाड़ते हुए दिखाने की कोशिश की है कि वे गंभीर फिल्में भी अच्छे से बना लेते हैं.

  • पिछली कई फिल्में गोवा को केंद्रित करके बनाई गईं और वहां होनेवाले काले धंधों का पर्दाफाश कर रही हैं. सिंघम भी इसका विस्तार करती है. एक्शन सीन के दर्शकों को बेहद पसंद आयेगी यह फिल्म. एक बार फिर से फिल्मों में एक्शन को पसंद किया जायेगा और इसके दृश्यों को यादगार दृश्य माना जायेगा.

  • फिल्म को यू/ए सर्टिफिकेट दिया गया है. बच्चों और परिवार के साथ फिल्म देख सकते हैं. फिल्म में कोई वलगर सीन नहीं है. सिर्फ मारधाड़ ज्यादा है. फिल्म कुल 2 घंटे 25 मिनट की है.

  • जिन लोगों को ऐसे हीरो पसंद हैं जो चुटकियों में बीस गुंडों को धूल चटा दे, लड़कियों को छेड़ने वाले को सबक सिखाए, बड़ों की इज्जत करे, रोमांस करने में शरमाए… वह जरूर इस फिल्म को देखें.

  • ‘सिंघम’ तमिल में इसी नाम से बनी सुपरहिट फिल्म का हिंदी रिमेक है. शुरुआत के चंद मिनटों बाद ही पता चल जाता है कि इस फिल्म का अंत कैसा होगा, लेकिन बीच का जो सफर है वो फिल्म को मनोरंजन के ऊंचे स्तर पर ले जाता है. तालियों और सीटियों के बीच गुंडों की पिटाई देखना अच्छा लगता है.

  • युनूस सजवाल की लिखी स्क्रिप्ट में वे सारे मसाले मौजूद हैं जो आम दर्शकों को लुभाते हैं. हर मसाला सही मात्रा में है, जिससे फिल्म देखने में आनंद आता है. बाजीराव सिंघम में बुराई ढूंढे नहीं मिलती तो जयकांत में अच्छाई. इन दोनों की टकराहट को स्क्रीन पर शानदार तरीके से पेश किया गया है. फिल्म इतनी तेज गति से चलती है कि दर्शकों को सोचने का अवसर नहीं मिलता है.

  • ‘जिसमें है दम वो है फक्त बाजीराव सिंघम’ तथा ‘कुत्तों का कितना ही बड़ा झुंड हो, उनके लिए एक शेर काफी है’, जैसे संवाद बीच-बीच में आकर फिल्म का टेम्पो बनाए रखते हैं. कई संवाद मराठी में भी हैं ताकि लोकल फ्लेवर बना रहे, लेकिन ये संवाद किसी भी तरह से फिल्म समझने में बाधा उत्पन्न नहीं करते हैं.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

bhadas4media@gmail.com

मेरा सवाल और अंबिका सोनी का जवाब, टेप सुनें

सोचिए, चैनल के संपादक लोग लाखों रुपये महीने सेलरी लेते हैं और उनके देश भर में फैले सैकड़ों स्ट्रिंगर एक-एक पैसे को तरसते हैं. इस विषमता, इस खाई, इस विरोधाभाष के कई नतीजे निकलते हैं. चैनलों की रीढ़ कहे जाने वाले स्ट्रिंगर मजबूरन ब्लैकमेलिंग के लिए प्रेरित होते हैं. या कह सकते हैं कि चैनल के लखटकिया संपादक लोग अपने स्ट्रिंगर को जान-बूझ कर ब्लैकमेलर बनने के लिए जमीन तैयार करते हैं.

समाज और देश में समता-समानता की बात करने वाले मीडिया के भीतर कितना भयंकर असंतोष है, कितना भयंकर शोषण है, यह जानने के लिए सिर्फ संपादक-स्ट्रिंगर की सेलरी की विवेचना कर लेना जरूरी है. महंगाई के इस दौर में ईमानदार स्ट्रिंगरों यानि ईमानदार हजारों टीवी जर्नलिस्टों को कितना मुश्किल जीवन जीना पड़ता है, इसका केवल अंदाजा लगाया जा सकता है. संपादक लोग मंचों से बड़ी बड़ी बात करते हैं, इसलिए भी कर पाते हैं क्योंकि उनका पेट भरा होता है, जेब फूला होता है, सो, सुंदर वचन बोलने में कोई दिक्कत नहीं होती, लेकिन जब उनसे उनके स्ट्रिंगरों के बारे सवाल किया जाता है तो वे इसका जवाब देने की जगह सवाल को ही टालने-इगनोर करने की कोशिश करते हैं.

पर कल बड़ा बढ़िया मौका रहा. दिल्ली के रफी मार्ग पर स्थित कांस्टीट्यूशन क्लब के स्पीकर हाल में मंच पर केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी के साथ-साथ हिंदुस्तान के प्रधान संपादक शशिशेखर, चौथी दुनिया के प्रधान संपादक संतोष भारतीय, आज समाज अखबार के प्रधान संपादक राहुल देव, जी न्यूज के प्रधान संपादक सतीश के सिंह, वरिष्ठ और ओजस्वी पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी, एनडीटीवी के प्रबंध संपादक पंकज पचौरी आदि मौजूद थे. चार संपादकों के भाषण दे लेने के बाद अंबिका सोनी को बोलने का न्योता दिया गया. अंबिका सोनी को जो कहना था, उन्होंने कहा. उन्होंने भाषण खत्म किया, तालियां बजने लगीं तो मैं अचानक खड़ा हुआ और अपने मन में उमड़-घुमड़ रहे स्ट्रिंगरों के सेलरी स्ट्रक्चर वाले सवाल को उठा देने का निर्णय लिया.

मैंने कहा- ”मंत्री महोदया, मैडम, एक सवाल है मेरा, छोटा सा सवाल है….”. मेरे खड़ा होकर इतना कहते ही कई संपादकों के चेहरे भक हो गए. एक दो लोगों ने मुझे इशारा कर बैठने को कह दिया. मतलब, सवाल न पूछने का इशारा कर दिया. पर मैं बैठा नहीं और न ही संपादकों के तेवर से प्रभावित हुआ. मैंने अपना पूरा सवाल सामने रख दिया. मैंने पूछा- ”यहां बैठे प्रबंध संपादक लोग ग्यारह ग्यारह लाख रुपये महीने सेलरी लेते हैं पर इनके देश भर में फैले हजारों स्ट्रिंगर्स को धेला भर भी नहीं मिलता. ये संपादक अपने स्ट्रिंगरों को ब्लैकमेलर बनने के लिए मजबूर कर देते हैं, तो क्या यह करप्शन नहीं है.” यहां बताना जरूरी है कि उदयन शर्मा के जन्मदिन पर आयोजित सेमिनार का इस बार का विषय ”भ्रष्टाचार और मीडिया” था. सो, मेरा सवाल भ्रष्टाचार और मीडिया को लेकर तो था ही, मीडिया के अंदर के एक भयानक काले सच को उदघाटित करने वाला भी था और चैनलों की रीढ़ स्ट्रिंगर्स की व्यथा को सर्वोच्च सत्ता व सर्वोच्च संपादकों के कानों तक पहुंचाने वाला भी था.

अंबिका सोनी ने जवाब दिया. अपनी सीट पर बैठे-बैठे जवाब दिया. उन्होंने खुद को ”प्रो-स्ट्रिंगर” बताया. साथ ही टालने वाले अंदाज में मुझे जवाब दिया- ”तीस साल बाद जब आप संपादक हो जाएंगे तब इस सवाल को उठाइएगा तो मैं जवाब दूंगी.” अब अंबिका जी को कौन समझाए कि मैं तीस साल बाद नहीं, बल्कि तीन साल पहले से ही संपादक हूं, भले भड़ास4मीडिया का संपादक हूं. और, मैं चाहूंगा कि किसी हरामखोर के यहां नौकरी करने की जगह तीस साल बाद भी, जिंदा रहा तो, मैं भड़ास4मीडिया का ही संपादक बना रहूं. खैर, मेरा जो मकसद था सवाल उठाने का वो पूरा हो चुका था. स्ट्रिंगर्स की समस्या केंद्रीय मंत्री से लेकर संपादकों के कानों तक एक बार फिर पहुंचा दी गई. इन्हें थोड़ी भी शरम होगी तो ये संपादक अपने अपने स्ट्रिंगर्स के बेहतर जीवन के लिए सेलरी की निश्चित रकम निर्धारित करेंगे ताकि ईमानदार स्ट्रिंगर्स को अपने परिवार का पेट पालने के लिए दलाली या ब्लैकमेलिंग का सहारा न लेना पड़े.

मुझे संतोष हुआ कि मैं जो काम कर रहा हूं, मैं जिस मिशन पर चल रहा हूं, उसी के तहत मीडिया के एक बड़े तबके के हित से जुड़ा सवाल उठाया. वहां से लौटते हुए मुझे संतोष था कि आज का दिन मेरे लिए सार्थक रहा. आप अगर सुनना चाहते हैं कि मैंने किस तरह सवाल उठाया और अंबिका सोनी ने क्या जवाब दिया तो नीचे दिए गए आडियो प्लेयर पर क्लिक कर सुनें.

यशवंत सिंह

एडिटर, भड़ास4मीडिया

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क्या कोई मुझे हारमोनियम सिखा सकता है?

ये मदद अपील कालम इसी के लिए बनाया था कि पत्रकार साथी अपनी पर्सनल दिक्कतों, जरूरतों, इच्छाओं को खुलकर अभिव्यक्त करें पर हमारी हिंदी पट्टी में ही प्राब्लम है कि हम वैसे तो बड़ी बड़ी बातें करते हैं पब्लिकली, लेकिन जब खुद की बात करने की बात आती है तो सपाट चुप्पी साध लेते हैं. पर मैं तो चुप नहीं रह सकता क्योंकि बोलना और उगलते रहना ही मेरी ताकत है. बड़े दिनों से इच्छा है कि कोई एक वाद्य यंत्र सीख लूं. पर बात आगे बढ़ नहीं पा रही.

अब लग रहा है कि वो बेला करीब है जब संगीत से नाता जोड़कर जीवन जीने के प्रति लालसा को बढ़ाया जा सकता है, वरना कोई वजह अब शेष नहीं रह गई है जिंदगी को जीवंत बनाने के लिए. आज दिन भर नेट पर दिल्ली में म्यूजिक टीचर्स आदि के बारे में सर्च करता रहा. कइयों से बात भी की है. हारमोनियम सीखने की इच्छा है. अपनी इस इच्छा को आपके सामने भी रख रहा हूं. अगर कोई साथी हारमोनियम बजाना जानता है और सिखाने की क्षमता रखता है तो मैं उनसे बात करना चाहता हूं.

मैं फ्री में नहीं सीखना चाहता. लेकिन मैं पैसे की बात करके गुरु का अपमान भी नहीं कर सकता. सो, चाहता हूं कि पहले गुरु मिलें, गुर मिले.. और इस क्रम में धीरे धीरे अपनापा हो और गुरु के आदेश पर, वो जो कहें, वो उन्हें दे दिया जाए. मैं पूर्वी दिल्ली में रहता हूं. गुरु महोदय दिल्ली के हों तो बेहतर. वैसे, मैं देश के किसी भी कोने में गुरु मिलें तो महीने पंद्रह दिन के लिए आ सकता हूं और अपने खर्चे पर रह कर सीख सकता हूं. उम्मीद करता हूं कि संगीत के प्रति, हारमोनियम के प्रति मेरी अगाध उत्सुकता को देखते हुए कोई न कोई गुरु मुझसे जरूर टकराएगा. मेरा मोबाइल नंबर 09999330099 है.

यशवंत

पूर्व पत्रकार और वर्तमान में छोटा-मोटा वणिक (भड़ास4मीडिया से संबद्ध)

yashwant@bhadas4media.com

भड़ास4मीडिया के प्रदेश-देश-विदेश की खबरों के नए पोर्टल का ट्रायल शुरू

कठिन मेहनत व पक्के इरादे के साथ दूरदृष्टि जरूरी है. सो, मंजिल पाने के लिए समय संग बदलते रहना और अपग्रेड होते रहना चाहिए. इसी कारण कभी सिर्फ पांच हजार रुपये में साल भर के लिए शुरू हुए bhadas4media.com ने बहुत पाया और बदला है. एक और बदलाव सामने है. यह है भड़ास4मीडिया का देश-प्रदेश-विदेश की खबरों का नया पोर्टल. इसे ट्रायल के लिए आज से आनलाइन कर दिया गया है.

नाम www.news.bhadas4media.com है. भड़ास की यात्रा बहुत पुरानी नहीं है. करीब चार वर्षों में ही भड़ास काफी बड़ा हो गया. पहले यह सिर्फ भड़ास ब्लाग www.bhadas.blogspot.com के रूप में शुरू हुआ. आज यह ब्लाग दुनिया का सबसे बड़ा हिंदी कम्युनिटी ब्लाग है. इस भड़ास ब्लाग में करीब 900 लोगों को बिना किसी के संपादन के डायरेक्ट अपनी रचना-सूचना को पोस्ट करने का अधिकार है. भड़ास ब्लाग जब शुरू हुआ तो बहुत सारे उतार-चढ़ाव आए. आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला. मनमुटाव और खेमेबंदी हुई. ये खट्टे-मीठे अनुभव बड़े काम के साबित हुए. इन अनुभवों के सकारात्मक पक्ष को ग्रहण कर व्यवस्थित रूप से मीडिया केंद्रित खबरों का पोर्टल bhadas4media.com शुरू किया गया. लेखों-विश्लेषणों की अत्यधिक आवक को देखते हुए अलग पोर्टल www.vichar.bhadas4media.com नाम से लांच किया गया. आडियो-वीडियो फाइलों के आने और उन्हें अपलोड करने की जरूरत व मजबूरी ने आडियो-वीडियो के लिए अलग पोर्टल www.mediamusic.bhadas4media.com नाम से शुरू करने को प्रेरित किया. इस सबके बाद अब लगने लगा कि मेनस्ट्रीम न्यूज का एक पोर्टल होना चाहिए. तब जनरल न्यूज के लिए एक पोर्टल शुरू करने का इरादा किया गया और अब इसे मूर्त रूप दिया जा रहा है. इस नए पोर्टल तक पहुंचने के लिए www.news.bhadas4media.com पर क्लिक कर सकते हैं.

इस नए पोर्टल में देश-प्रदेश और विदेश की खबरें होंगी. वे खबरें जो अखबारों में अगले दिन प्रकाशित होती हैं. कोशिश होगी कि इस पोर्टल में ऐसी खबरें दी जाएं जो बेहद महत्वपूर्ण हों. मीडिया से संबंधित खबरों के पोर्टल www.bhadas4media.com पर मीडिया से संबंधित खबरें ही रहें, इसलिए भी जनरल न्यूज के लिए अलग पोर्टल की जरूरत महसूस हुई. भड़ास से लोगों की बढ़ती उम्मीदों ने भी जनरल न्यूज के पोर्टल को लांच करने की सीख दी. इसी कारण अबसे ऐसी खबरें जो जिला-प्रदेश-देश-विदेश के महत्व की हैं, भड़ास4मीडिया के न्यूज पोर्टल www.news.bhadas4media.com पर प्रकाशित की जाएंगी.

इस न्यूज पोर्टल पर प्रकाशित खबरों के शीर्षक www.bhadas4media.com के होम पेज पर उसी तरह दिखाई देने लगे हैं जैसे www.vichar.bhadas4media.com पर प्रकाशित आलेखों-विश्लेषणों-रचनाओं के शीर्षक और www.mediamusic.bhadas4media.com पर अपलोड वीडियो के शीर्षक मुख्य पोर्टल भड़ास4मीडिया के होम पेज पर दिखाई देते हैं. जनरल न्यूज पोर्टल के शुरू हो जाने से भड़ास के पाठकों को अपनी पसंद की खबरों, आलेखों, म्यूजिक, वीडियो को देखने पढ़ने में आसानी होगी. जो पाठक जिस तरह की खबर पढ़ना चाहेगा, उसे अपनी प्रियारिटी की खबरें ढूंढने में मदद मिलेगी. साथ ही इस नए पोर्टल के जरिए हम देश-विदेश की मेनस्ट्रीम न्यूज को भी नेट के पाठकों तक पहुंचा सकेंगे.

इस पोर्टल को बनाने-सजाने और संवारने में भड़ास4मीडिया के तकनीकी हेड राकेश डुमरा का अमूल्य योगदान है. उनकी कोशिशों के चलते ही यह पोर्टल जूमला के लैटेस्ट अविष्कार से लैस है और ढेर सारे नए फीचर्स से युक्त है जिसका समय आने पर इस्तेमाल किया जाएगा. यह नेशनल-इंटरनेशनल न्यूज पोर्टल अभी ट्रायल के दौर में है. इसमें टेस्ट के बतौर डाली गईं और प्रकाशित की गईं खबरें अभी दूसरे न्यूज पोर्टलों व न्यूज एजेंसियों से चुराई हुई हैं. जल्द ही भड़ास के तेवर के अनुरूप इसमें ओरीजनल कंटेंट और खबरें दिखाई देंगी. इस पोर्टल को समृद्ध बनाने के लिए आपके सुझावों का जरूरत है.

जल्द ही भड़ास टीवी भी लांच करेंगे हम लोग. तब भड़ास के गुलदस्ते में मीडिया न्यूज पोर्टल, नेशनल-इंटरनेशनल न्यूज पोर्टल, विश्लेषण व विचार पोर्टल और आडियो-वीडियो पोर्टल के अलावा आनलाइन टीवी का चैनल भी होगा. इसके बाद देश भर में जिले स्तर पर भड़ास संवाददाताओं की नियुक्ति की प्रक्रिया प्रारंभ की जाएगी जो भड़ास के मीडिया न्यूज, लोकल न्यूज, स्टेट न्यूज, नेशनल न्यूज, आडियो, वीडियो और टीवी न्यूज के लिए एक साथ काम करेंगे. और यह नियुक्ति भी नये प्रकार की होगी जिसमें कोई किसी का नौकर नहीं होगा बल्कि सहकारिता (कोआपरेटिव) दर्शन के आधार पर हर जिले का भड़ास से जुड़ा पत्रकार या ब्यूरो चीफ अपने जिले के लिए भड़ास का डायरेक्टर / मालिक होगा और उस जिले की खबरों के लिए अलग से बनाए गए भड़ास लोकल न्यूज पोर्टल का संचालक होगा. ऐसे होनहार, प्रतिभावान और उद्यमी प्रकृति के पत्रकारों की बहुत जल्द भड़ास को जरूरत होगी. तब देश भर में भड़ास ब्रांड का डंका बजेगा और वेब मीडिया में भड़ास सबसे बड़ा ब्रांड बनेगा.

भड़ास की इस यात्रा में मुश्किलें बहुत आई हैं और अभी भी आ रही है. पर इससे हम लोगों के इरादे पर कोई असर नहीं है. किसी भी नए काम की शुरुआत में खून-पसीना बहुत जलता है, कई बार मन निराश होता है, कई बार अभाव आत्मा को तोड़ते हुए से लगते हैं, लेकिन अंततः नैराश्व पर जीतने व जीने की जिजीविषा भारी पड़ती है.

नेताओं-नौकरशाहों और कारपोरेट घरानों के हाथों बिक चुके बड़े मीडिया हाउसों के समानांतर जनता का मीडिया हाउस खड़ा करने की हम लोगों की जिद आज भी उतनी ही जवान है जितनी भड़ास ब्लाग के शुरुवात के वक्त थी. आर्थिक थपेड़ों से जूझते हुए, संसाधनों की कमी से जूझते हुए, चरम-परम बाजारू माहौल में लोभों-प्रलोभनों से बचते हुए हम लोगों का निरंतर बढ़ते जाना इस देश के करोड़ों जनों और हजारों ईमानदार पत्रकारों के लिए एक आंख खोलने वाली परिघटना है. उम्मीद है इस नए प्रयोग और बुलंद इरादों का आप लोग हमेशा की तरह स्वागत करेंगे और अपने सुझावों-संदेशों से हम लोगों को समृद्ध करेंगे.

यशवंत

संपादक
भड़ास4मीडिया
yashwant@bhadas4media.com

निशंक का न्योता- रामदेव उत्तराखंड में सत्याग्रह करें, दिक्कत न होगी

दिल्ली के रामलीला मैदान से पुलिस कार्रवाई के जरिए सत्याग्रह-अनशन खत्म कराके बाबा व उनके भक्तों को बेदखल किए जाने के बाद जो ताजी स्थिति है, उसके मुताबिक रामदेव को सेना के हेलीकाप्टर से हरिद्वार ले जाया जा रहा है.  केंद्रीय गृह सचिव जीके पिल्लई भी बता चुके हैं कि आपरेशन रामदेव के तहत बाबा को हरिद्वार भेजा जाएगा. उधर, बाबा के हरिद्वार पहुंचने की भनक मिलते ही उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के अंदर की राजनीतिक आत्मा जाग चुकी है.

उन्होंने तुरंत बयान दे दिया कि काले धन के खिलाफ बाबा रामदेव चाहें तो उत्तराखंड की धरती से अपना सत्याग्रह जारी रख सकते हैं. निशंक ने बाबा को न्योता भेजते हुए कहा कि उन्हें यहां आंदोलन चलाने पर कोई दिक्कत न आएगी. अब जरा कोई निशंक से पूछे कि अगर बाबा रामदेव ने अगर उत्तराखंड में सरकार द्वारा किए गए घपले-घोटालों की जांच तय समय में कराने और दोषियों को फांसी देने की मांग के साथ भूख हड़ताल शुरू कर दी तो क्या होगा. करीब दर्जन भर छोटे-बड़े घोटाले के आरोपी उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक मीडियाकर्मियों के उत्पीड़न और दमन के भी अपराधी हैं.

स्टर्डिया घोटाला से लेकर जाने कौन-कौन से घोटाले हुए और निशंक के दामन बार बार दागदार हुए पर भाजपा के इस नेता व मुख्यमंत्री को भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने अभयदान दे रखा है, सो निशंक अभी तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन है. पर राजनीति के खेल में निशंक को लगता है कि बाबा रामदेव का आंदोलन कांग्रेस की केंद्र सरकार के खिलाफ है, इसलिए उन्होंने फटाफट बयान दे डाला कि रामदेव चाहें तो अपना सत्याग्रह उत्तराखंड की धरती से जारी रख सकते हैं.

कोई इन राजनेताओं से पूछे कि करप्शन चाहे कांग्रेस का हो या भाजपा का, वह तो करप्शन ही है. कांग्रेस से कम करप्ट नहीं है भाजपा. और भाजपा के जिन कुछ राज्यों में सर्वाधिक करप्शन की चर्चा होती है, उनमें एक उत्तराखंड भी है. पर नेताओं को शरम और लाज कहां आती है. अपने को उजला बताकर दूसरी पार्टियों को कालिख पुता बताएंगे. कांग्रेस और भाजपा, दोनों की सरकारों के भ्रष्टाचार और दोनों के नेताओं की अकूत संपत्ति का पता लगाकर सारे धन का राष्ट्रीयकरण कर लिया जाना चाहिए.

बाबा व भक्तों पर जुल्म के खिलाफ आज ब्लैक डे मनाएं

यशवंत सिंहकुछ काम अन्ना ने किया और काफी कुछ बाबा ने कर दिखाया. अन्ना ने करप्ट कांग्रेसियों पर भरोसा किया और सरकार के झांसे में आ गए तो नतीजा ये है कि उन्हें अब रोना पड़ रहा है, मुद्दा पीछे छूट गया और तेवर पीछे रह गया. शेष है तो सिर्फ फिजूल की बैठकों का दौर और बेवजह की उठापटकों की चर्चाएं.

बाबा ने हुंकार भरकर सत्याग्रह शुरू किया तो सरकार एक दफे चरणों में लोट गई. बाबा जब न माने तो बाबा को धक्का मारकर दिल्ली से बाहर भगा दिया. बाबा के अनुयायियों पर लाठियां बरसी. एक संत का अपमान. हजारों साधकों का अपमान. इस भारत देश में संत का ऐसा खुलेआम अपमान नहीं किया गया, उस संत का जो देश हित की बातें कर रहा है. बाबा रामदेव को जिस तरह से पुलिस वालों ने, गुप्तचर एजेंसियों के लोगों ने नजरबंद किया वह शर्मनाक है. जैसी पिटाई श्रद्धालुओं और सत्याग्रहियों की की गई, वह लोकतंत्र का काला अध्याय है. पर यह सब अब हो ही गया है तो तय मानिए की कांग्रेस ने अपने ताबूत में कील ठोंक ली है. देश का आम जन सांस बांधे टीवी देख रहा है. अखबार पढ़ रहा है. बाबा के अपमान को महसूस कर रहा है. सत्याग्रहियों के साथ हो रहे जुल्म को खुद पर जुल्म गिन रहा है.

वंदेमातरम और बाबा जिंदाबाद जैसे नारों के बीच पिटते लोगों को देखना अंग्रेजों के दौर की याद दिला देता है. यह जो घाव, यह जो जख्म सरकार ने ईमानदारी के साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने वालों को दिया है, वह जल्द भरेगा नहीं, वक्त का मरहम भी काम नहीं आए. अगले लोकसभा चुनाव में अगर कांग्रेस का सूपड़ा पूरे देश से साफ नहीं हुआ तो तय मानिए कि बाबा और उनके सत्याग्रहियों पर हुए जुल्म का बदला नहीं लिया गया. ऐसी कांग्रेसी सरकार के खिलाफ उठ खड़े होने और इसे उखाड़ फेंकने का दौर आ चुका है. आप जहां भी हों, जिस भी स्थिति में हो, बाबा और उनके लोगों पर हुए जुल्म के खिलाफ अपना विरोध प्रकट करें. अपने-अपने ब्लागों पर  पोस्ट लिखें. ट्विटर और फेसबुक पर ब्लैक डे मनाएं. आम जन के बीच कांग्रेस और उनके नेताओं के करप्शन की पोल खोलें और इनकी निंदा करें. और कुछ न करें तो कम से कम काली टीशर्ट या शर्ट पहनें.

मैं निजी तौर पर आज के दिन को काला दिवस के रूप में मना रहा हूं. इसी कारण भड़ास4मीडिया पर एक ब्लैक पट्टी लगा दी है. विरोध जताने के लिए ही यह पोस्ट लिख रहा हूं और फेसबुक व ट्विटर आदि पर भी बाबा व भक्तों पर हुए जुल्म के खिलाफ आवाज उठाऊंगा. अन्ना हजारे जिंदाबाद. रामदेव जिंदाबाद. भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग जारी रहे. भ्रष्ट और निकम्मी कांग्रेस पार्टी और इसके कर्ताधर्ता मुर्दाबाद…. दांव-पेंच में फंसाकर करप्शन के मुद्दे को डायलूट करने वाली केंद्र सरकार मुर्दाबाद…

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

bhadas4media@gmail.com

अयोध्याकांड : पत्रकारिता दिवस यात्रा वाया मच्छर से लिंग तक

यशवंत सिंहपत्रकारिता दिवस आया और चला गया. 29 और 30 मई को जगह-जगह प्रोग्राम और प्रवचन हुए. मैंने भी दिए. अयोध्या में. अयोध्या प्रेस क्लब की तरफ से आमंत्रित था. अपने खर्चे पर गया और आया. लौटते वक्त 717 रुपये अतिरिक्त ट्रेन में काली कोट वाले को दे आया. वापसी का टिकट कनफर्म नहीं हो पाने के कारण रुपये देकर भी ट्रेन में ठीक से सो न सका.

कभी बरेली में कोई आकर उठा जाता तो कभी रामपुर में. असल में सेकेंड एसी का टिकट कनफर्म न होने से जो सीट खाली दिखती वहीं सो जाता. और जो कोई आकर उठाता तो चुपके से उठकर फिर कोई खाली सीट तलाशने लगता. जो शख्स पत्रकारिता रत्न सम्मान लेकर लौटानी ट्रेन से लौट रहा था वह ट्रेन में बेचारा बन बन इधर उधर भटक रहा था, सोने की जगह तलाश रहा था… फैजाबाद से लखनऊ इस उम्मीद में बैठकर आया कि काली कोट वाले ने व्यवस्था करने का आश्वासन दे रखा था. पर सीट देने की जगह उसने, लखनऊ में एक खाली सीट तलाश कर जिस पर मैं सोया था, उस सीट के बारे में यह बताकर कि यह बरेली तक खाली है, मुझसे 717 रुपये ले लिए, टिकट बनाने के नाम पर. पर उसने टिकट दिए नहीं. मैंने भी मांगा नहीं. इस ट्रेन में तीन टिकट कलेक्टर थे, राजकुमार, पुनीत और एक अन्य. तीनों ने जमकर पैसे दूहे, उनसे जिनके टिकट कनफर्म नहीं थे.

तीसरा टीसी जिसका मुझे नाम नहीं मालूम, उसने मुझसे लखनऊ से बरेली या फैजाबाद से बरेली तक का 717 रुपये लिए. ऐसे ही ये लोग अन्य सभी से ले रहे थे पर टिकट किसी को नहीं दे रहे थे. मैं सोचता रहा कि करप्शन के खिलाफ बोलकर आया हूं और खुद जब करप्शन अपनी आंखों के सामने होता देख रहा हूं तो कुछ बोल नहीं पा रहा हूं. पर मन ही मन तय कर रखा था कि इन काली कोट वालों के नाम तो प्रकाशित करके रहूंगा और इनकी करतूत के बारे में रेल मंत्रालय में भी शिकायत करूंगा. और इसकी शुरुआत यहां इनके नाम को लिखकर कर दिया है.

हां, तो मैं बता रहा था कि जब बरेली में सोते हुए मुझे उठाया गया तो वहां से हटकर एक अन्य खाली सीट देखकर उस पर सो गया. रामपुर में उठाया गया तो एक अन्य जगह बैठने की जगह मिली. मुरादाबाद में उठाया गया तो फिर हापुड़ तक कहीं जगह न मिलने से ट्रेन के दरवाजे को खोलकर बाहर के प्राकृतिक दृश्य को देखते हुए मन को तसल्ली देने लगा. और गाजियाबाद में उतर गया. दो रात ठीक से न सो पाने के कारण थकान बहुत थी, सो दिल्ली आते ही सो गया. पर अपन की जिंदगी में सोना और चांदी कहां है. थोड़ी देर आराम के बाद उठा और नहा धो निकल पड़ा कोर्ट. मेरे पर कई मुकदमें चल रहे हैं. मानहानि से लेकर छेड़छाड़ तक के. इन्हीं में से एक में कोर्ट जाना था. कई घंटे बाद शाम को कोर्ट से लौटा तो भड़ास आफिस पहुंचा. देर रात तक भड़ास4मीडिया के मेलों-खबरों से जूझता रहा. इस चक्कर में अयोध्या में क्या क्या हुआ, कैसा मैंने देखा जिया, यह सब रिपोर्ट नहीं कर पाया.

सच कहूं तो अब वक्त नहीं मिलता कि मैं अपना हाल ए दिल लिखूं. लोगों के इतने गम हैं, इतने खत आते हैं, इतने मेल संदेश व सूचनाएं आती हैं कि उन्हीं को निपटाते निपटाते रात हो जाती है और बाकी बचे वक्त में शराबखोरी और मांस भक्षण करता रहता हूं. यही दो मेरी बुराइयां हैं, इसका आप बुरा मानें या भला, मुझे परवाह नहीं. और, इस बात को मैं अयोध्या प्रेस क्लब में बतौर मुख्य अतिथि भी कह आया कि मैं अपनी सभी बुराइयों और अच्छाइयों के साथ आपके सामने हूं. मैं शराब पीता हूं तो मुझे स्वीकारने में कोई हिचक नहीं कि मैं पीता हूं. मैं मांस पसंद करता हूं तो मुझे कहने में कोई हिचक नहीं कि मुझे तरह तरह के मांस का भक्षण करना पसंद है. मेरे खयाल से ट्रांसपैरेंट रहना ज्यादा सुखद है, बजाय के ढेर सारे अंधेरे के खाने-कोने बनाकर उसे बचाते-संतुलन साधते हार्ट अटैक से अचानक मर जाना या बीमार दिल दिमाग से जीते रहना. नए दौर में, तकनीक के इस दौर में हर कोई ट्रांसपैरेंट होने के दबाव में है. लोग छिपाते बचाते फिर रहे हैं पर टेक्नालजी उनकी चोरी उजागर कर दे रही है. किसी के फोन टेप पब्लिक हो जा रहे हैं तो किसी के खाते-घपले-घोटाले.

बात के सिरे को फिर पकड़ें. कह रहा था कि अयोध्या फैजाबाद की यात्रा कष्टकारी रही. अयोध्या और फैजाबाद कभी गया नहीं था, इसलिए जाने का जब प्रस्ताव आया तो ना ना हां हां करते हुए आखिर में हां कर बैठा. आमतौर पर किसी कार्यक्रम में बाहर से कोई गेस्ट बुलाता जाता है तो आने जाने का किराया आयोजक लोग दे देते हैं. रहने की भी ठीकठाक व्यवस्था कर देते हैं. पर अयोध्या कांड मेरे लिए दुखदाई रहा. जानकी महल ट्रस्ट के एक कमरे में रुकवाया गया. रात भर मच्छरों ने चबाया या खटमल ने काटा, ठीकठीक याद नहीं. पर इतना याद है कि दो-तीन घंटे ही सो पाया और आठ बजे सुबह उठा दिया गया.

अयोध्या प्रेस क्लब के अध्यक्ष हैं महेंद्र त्रिपाठी. उनकी फैजाबाद प्रेस क्लब के नेता शीतला सिंह से जबरदस्त रार-टकरार रहती है. महेंद्र का कहना है कि शीतला ने दस लाख रुपये अकेले मार लिए थे जो अयोध्या प्रेस क्लब के लिए आए थे. ये झगड़ा ये बात काफी पुरानी है. इस झगड़े को फैजाबाद और अयोध्या का हर मीडियाकर्मी जानता है. सो, लोग यह मानते हैं फैजाबाद प्रेस क्लब मालदार है और अयोध्या प्रेस क्लब संघर्षशील. जो संघर्षशील होता है, वो संसाधनविहीन भी होता है, यह अपने यहां की परंपरा रही है. और महेंद्र त्रिपाठी की व्यवस्थाओं को देखकर लगा कि संसाधनों का टोटा है. उन्होंने बातचीत में स्वीकारा भी कि जैसे तैसे चल रहा है काम. मैंने फिर उनसे किराया मांगने की हिम्मत नहीं की. चुपचाप आने-जाने के टिकट की फोटोकापी का लिफाफा उन्हें थमा दिया था. एक बार सोचा कि टिकट का लिफाफा न दूं और बात को यहीं खत्म कर दूं पर बाद में लगा कि अपन भी कौन धन्नासेठ हैं, जैसे तैसे गाड़ी चल रही है तो क्यों अकेले कष्ट उठाएं, कुछ ये लोग भी तो वहन करें.

बाहर से लोगों को लगता है कि भड़ास और यशवंत मालदार पार्टी है, काम चल निकला है… पैसा खूब आता है… पर ये तो भड़ास और यशवंत ही जानते हैं कि कैसे कैसे दिन कट रहे हैं भड़ास के. सर्वर का खर्चा भूत की तरह विशाल होता जा रहा है. अमर सिंह के टेप अपलोड किए जाने की नतीजा ये निकला कि सर्वर अपग्रेड कराना पड़ा और अब करीब 30 से 40 हजार रुपये महीने देने पड़ रहे हैं. सर्वर मैनेजमेंट का खर्चा अलग से. आफिस-स्टाफ-अपना-सबका खर्च अलग. मिलाकर महीने के दो-ढाई लाख रुपये. जाहिर है, हर माह इतने पैसे नहीं आ पाते क्योंकि पैसे वसूलने-धंधा करने के लिए कोई मार्केटिंग टीम नहीं रखी और मार्केटिंग टीम रखकर उगाही करने का मन नहीं क्योंकि ऐसा करके ईमानदार और निष्पक्ष देर तक नहीं रहा जा सकता है. अभी तक दस परसेंट भ्रष्ट हूं. यह तब है जब हम लोग मीडिया हाउस नहीं है. कोई प्रेस व्रेस नहीं लिखवाते. मीडिया होने का कोई लाभ नहीं लेते. सरकारी एड नहीं मिलता. बेहद मुश्किल के दिन हैं तब सिर्फ 10 फीसदी भ्रष्ट हैं. पर जो वाकई मीडिया हाउस हैं, सारे लाभ लेते हैं मीडिया होने के, केंद्र से लेकर राज्य सरकारों तक के खूब विज्ञापन मिलते हैं, वे साले दिल से केवल दस फीसदी ईमानदार हो जाएं तो देश का काया-कल्प हो जाए, मीडिया का कायाकल्प हो जाए. इसलिए, मेरा मानना है कि दस फीसदी करप्शन, सरवाइवल के लिए, बाजार में टिके रहने के लिए, पवित्र लक्ष्य के लिए संस्थान चलाते रहने के लिए, जरूरी है और मजबूरी है, अन्यथा किसी गुफा में जाकर रामनाम जपना पड़ेगा क्योंकि वहां पैसे की कोई खास जरूरत नहीं पड़ेगी, हवा पानी फ्री है और कंदमूल फल मिल जाएंगे दाएं बाएं. बस.

हम लोगों की जो दस फीसदी बेइमानी है, उसका भी ब्रेकअप निकालते हैं. इस दस फीसदी करप्शन का नब्बे फीसदी पार्ट कंटेंट सपोर्ट और विज्ञापन है, जोकि लिखित टाइअप के तहत आता है, और इसे करप्शन में नहीं माना जाना चाहिए, फिर भी मैं मान लेता हूं, दुनिया को संतुष्ट करने के लिए कि- हां मैं बेईमान हूं. पर मैं निजी तौर पर खुद को सौ फीसदी ईमानदार मानता हूं. लेकिन दुनिया को जब बताने की बारी आती है तो खुद को दस फीसदी भ्रष्ट घोषित करता हूं क्योंकि जो सिस्टम देश-दुनिया-समाज में है, उसमें आप थोड़ा-सा भ्रष्ट, अनैतिक, समझौतावादी बने बिना, बताए बिना नहीं रह सकते क्योंकि कई लोग सिर्फ इसलिए आपके पीछे लग जाएंगे कि आपने कैसे कहा कि आप सौ फीसदी ईमानदार हैं. वैसे सही बात भी है. मुझे आजतक कोई सौ फीसदी ईमानदार आदमी नहीं मिला. और कोई माई का लाल कहे कि वह सौ फीसदी नैतिक, ईमानदार और स्वाभिमानी है तो मैं जरूर उसको चरणों में लोट जाना चाहूंगा क्योंकि मुझे ऐसे गुरु की तलाश है. पर एक शर्त है कि ऐसा बताने वाला कहने वाला मनुष्य हो, पत्थर की मूर्ति या पत्थर का भगवान न हो. ये लंबी बहस है. कोई कूदना चाहे तो स्वागत है, उकसा रहा हूं.  खैर, कोई उकसावे में आ जाए तो बात बढाऊं. इसी कारण इस गणित पर कभी अलग से बात. फिलहाल मूल बात पर लौटते हैं.

कह रहा था कि अयोध्या फैजाबाद यात्रा पर अपनी जेब से तीन हजार रुपये लुटा आया और दो रातों की नींद बर्बाद कर आया. तो ऐसी यात्रा के बाद उस यात्रा को रिपोर्ट करने को लेकर कोई उल्लास या उत्साह तो नहीं दिखना चाहिए, सहज मानव मन तो यही कहता है पर अपन को मैं सहज से एक कदम आगे सुपर मानता हूं (अपनी पीठ बीच-बीच में थपथपाते रहना चाहिए ताकि आत्मविश्वास कायम रहे) सो अपनी दर्दनाक यात्रा के बारे में भी लिख रहा हूं. मेरी बात पढ़ने से पहले पढ़ लीजिए अयोध्या प्रेस क्लब की तरफ से आई प्रेस विज्ञप्ति…

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”प्रेस क्लब अयोध्या-फैजाबाद ने मनाया पत्रकारिता दिवस : घोटालों की कवरेज और उनके खुलासों में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया की भूमिका संतोषजनक है. लेकिन कुछ गंभीर बातों पर हमें ध्यान देना ही होगा. ये बातें भड़ास4मीडिया डाट कॉम के संपादक यशवंत सिंह ने कहीं. वह पत्रकारिता दिवस की पूर्व संध्या पर प्रेस क्लब अयोध्या द्वारा तुलसी प्रेक्षागृह में ‘भ्रष्टाचार व घोटालों की कवरेज में मीडिया का दायित्व’ विषय पर आयोजित गोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि पत्रकारों की भूमिका का दायरा निरंतर बढ़ रहा है। प्रेस क्लब अयोध्या-फैजाबाद हर वर्ष पत्रकारिता दिवस पर गोष्ठी का आयोजन करता है. जिसमें पत्रकारिता से जुड़े हुए दिग्गज पत्रकारों को बतौर मुख्य अतिथि के बतौर आमंत्रित किया जाता है. इस बार प्रेस क्लब के कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि भड़ास4मीडिया डाट कॉम के संपादक यशवंत सिंह ने शिरकत की. अध्यक्षता कर रहे साहित्यकार हरिशंकर सिंह सफरीवाला ने नैतिकता को प्रभावी बनाने वाली संस्थाओं के अभाव पर चिंता जताई। शनिधाम के आचार्य तांत्रिक हरिदयाल मिश्र ने पत्रकारिता के बढ़ते जोखिम का जिक्र किया। जामवंत किला के महंत अवधराम दास ने भ्रष्टाचार का उजागर करने में मीडिया की भूमिका को सर्वाधिक प्रभावी बताया। पूर्व पालिकाध्यक्ष सरदार महेंद्र सिंह ने मीडिया को भ्रष्टाचार मिटाने का सबसे सशक्त माध्यम बताया। मुख्य अतिथि भड़ास4मीडिया डाट कॉम के संपादक यशवंत सिंह ने घोटालों के कवरेज और उनके खुलासे के लिए प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया की भूमिका पर संतोष जताया. साथ ही उन्होंने अमर सिंह और नीरा राडिया के बातचीत के खुलासों में देश के दिग्गज पत्रकारों का नाम आने पर तथा उनके कृत्यों में पत्रकारों का रोल होने पर खासा चिंता जताई. उन्होंने कहा कि जिनसे मिसाल पेश करने की उम्मीद की जाती है वो घोटालों में अपनी भूमिका की मिसाल पेश करेंगे तो पत्रकारिता का भविष्य शोचनीय हो सकता है. प्रेस क्लब अयोध्या के अध्यक्ष महेंद्र त्रिपाठी ने इस अवसर पर यशवंत सिंह, गिरजा प्रसाद मिश्र, हीरालाल दुबे और रमाशरण अवस्थी को उल्लेखनीय कार्य के लिए पत्रकारिता रत्न सम्मान से सम्मानित भी किया। इस अवसर पर पुनीत मिश्र, चन्दन श्रीवास्तव, अतुल चौरसिया, अरविन्द गुप्ता, पंकज टंडन, अबुल बशर, महेश आहूजा, गोविन्द चावला, के.बी शुक्ल, मुकुल श्रीवास्तव, डीके त्रिपाठी आदि पत्रकार उपस्थित रहे.”

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मेरे श्रीमुख से जो बचन प्रेस रिलीज में बुलवाए गए हैं, मुझे याद नहीं कि मैंने यह सब बोला था. संभवतः नहीं. पर आजकल प्रेस रिलीज ऐसे ही बना करती हैं और अखबार भी ऐसे ही सब छाप दिया करते हैं. मैंने क्या कहा, उसे आडियो प्लेयर पर क्लिक करके सुन सकते हैं. बाद में पता चला अमर उजाला वालों ने तो खबर ही नहीं छापी, संभवतः लखनऊ के संपादक पंचोली ने कह दिया था कि यशवंत खूब मेरे खिलाफ छापता है, इस बार इसे सबक सिखाता हूं, इसकी खबर रोक देता हूं. जब मैंने यह किसी के मुंह से सुना तो हंसी आयी. अमर उजाला में अगर इतनी छोटी सोच के लोग संपादक बनने लगे हैं तो सच मानिए, अमर उजाला का दुश्मन कोई और हो नहीं सकता, ये लोग काफी हैं मटियामेट करने के लिए. और, जागरण वालों ने खबर छापी तो उसमें से मेरा नाम व मेरा संबोधन उड़ा दिया. जागरण वाले ऐसा करें तो समझ में आता है. वहां पत्रकारिता कम, दोस्ती, दुश्मनी, धंधा-पानी… ये सब ज्यादा होता है. दंभ और अहंकार देर तक टिका नहीं करते. दैनिक जागरण, लखनऊ में जिस कुर्सी पर आजकल शेखर त्रिपाठी हैं, वहां उनसे ज्याद पावर में विनोद भइया बैठा करते थे. लेकिन आखिरी दिनों में प्रायश्चित किया करते थे. उन्हें अपने किए कई कामों पर अफसोस हुआ करता था. स्वर्ग नरक सब यहीं है. बदले की भावना से काम करने वालों की उम्र भले लंबी होती हो लेकिन उनका अंत भयानक होता है. भड़ास तो भड़ास है. इसका काम ही मीडिया के प्रति क्रिटिकल होना है. सो, हम जो कर रहे हैं वह सहज है, सकारात्मक है. पर ये अखबारों के संपादक लोग जो कर रहे हैं, खुन्नस निकाल रहे हैं, वह निगेटिव है. खतरनाक है. पर कोई बात नहीं. मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना.

खैर, ये तो रही मेरी भड़ास. अपन की पंचलाइन भी तो यही है- जो कुछ दिल-दिमाग में अटका हो, निकाल दो, मन हलका हो जाएगा….

आते हैं मूल मुद्दे पर. बात प्रेस रिलीज की कर रहा था. जो छपा है उसमें लिखा है कि मैं वहां, मुख्य अतिथि रहा. जी, और, पत्रकारिता रत्न सम्मान मिला मुझे. पढ़ा होगा प्रेस रिलीज में उपर. पत्रकारिता रत्न सम्मान. गज़ब. पर खुश होने की जरूत नहीं. बंटते रहते हैं सम्मान. मिलते रहते हैं पत्रकारों को. पर बड़ा अजीब लगता है मुझे जब इस टाइप के सम्मान मुझे मिलते हैं. मैंने मंच से जाकर कहा कि भई, मुझे सम्मान-वम्मान लेना अच्छा नहीं लगता क्योंकि सम्मानित तो बड़े बुजुर्ग जीवन की आखिरी बेला में किए जाते हैं जब उन्हें तीर्थ वगैरह पर जाना होता है, पता नहीं लौट पाएं या नहीं, सो सम्मान करके इनका मोरल हाई कर दो जिससे मर भी जाएं तो उन्हें जीवन से कोई मलाल न हो क्योंकि पहले की जिंदगी में ऐसा-ऐसा, चाहे जैसा काम कर दिया कि सम्मानित भी हो गए.

तो मुझे अभी भरी जवानी में विधवा बनने का कोई शौक नहीं है, इसलिए मैं सम्मानित नहीं होना चाहता. दूसरे सम्मान लायक काम किया ही नहीं. सम्मान लायक काम शायद चालीस पार की उम्र में करूंगा. और हो सकता है वो जो मैं करूं वो किसी को सम्मान लायक न लगे. फिर भी, चाहूंगा कि अगले दो-तीन साल तक जवान ही रहने दो भाइयों और जो कर रहा हूं उसे खेल खेल में शौकिया कर रहा हूं, और पैशन को प्रोफेशन बनाकर कर रहा हूं. हालांकि इस पैशन से मन उचट रहा है और कोई नया पैशन बहुत दिनों से अंखुवाया हुआ है, उसी को जी रहा हूं इन दिनों, उसी को ग्रो कर रहा हूं इन दिनों और इसी के बरक्स चूतियापों की चिपकान को खुद ब खुद कम होते हुए देख रहा हूं. यह क्रम सहज रूप से जारी रहे, यही कोशिश करता हूं और इसी सहजता को कायम करने के लिए यह सब लिख रहा हूं.

आपको भरोसा नहीं होगा, पर मुझे खूब है कि जब जब मैं खुद के भाव को व्यक्त कर लेता हूं, अपने अच्छे बुरे को कइयों से बांट लेता हूं तब तब मुझे लगता है कि मुझसे बड़ा दुनिया में कोई संत नहीं होगा क्योंकि मेरे अंदर तो बिलकुल हड़हड़ा कर प्रवाहित होता समुद्र ही शेष है. सारे बांध तटबंध टूट चुके हैं. कोई कुंठा कोई विरोध कोई हिंसा कोई प्रतिशोध कोई निगेटिविटी है ही नहीं. सबसे मुक्त हूं. और तब अचानक गाने लगता हूं… मोको कहां ढूंढो रे बंदे मैं तो तेरे पास…. शुजात हुसैन ने बहुत खूब गाया है इसे. भिलाई के दिनेश जी को धन्यवाद, लिंक भेजा था तो उसी के सहारे खोजकर डाउनलोड भी कर लिया हूं. इसको भी सुन सकते हैं नीचे के आडियो प्लेयर के जरिए. फैजाबाद अयोध्या की यात्रा के दौरान फिलिप्स का प्यारा सा छोटा सा रिकार्डर ले गया था जिसमें अपनी पसंद के कई भजनों गानों को ले गया था और रास्ते भर सुनता रहा.

तो मन को भाता नहीं कि कोई मेरा सम्मान करे. पहले भी कई बार लोगों द्वारा खुद को सम्मानित किए जाने का दुस्साहस झेल चुका हूं. इस बार भी झेल गया. थमा दिया तो पकड़ लिया. और प्रतीक चिन्ह लेकर लौट आया. भाषण दिया. जो मन में आया बोलता रहा. गरियाता रहा. सिखाता रहा. पूरा भाषण नीचे के आडियो प्लेयर में है, क्लिक करके सुन सकते हैं. आयोजन की कुछ तस्वीरें डाल रहा हूं. चीफ गेस्टी करना किसके अच्छा नहीं लगता. मुझे भी लगा. पर यह भी अब सब रुटीन लगने लगा है. सब प्रायोजित. सब दुनियादारी का हिस्सा. शायद अब कहीं जाने से पहले दस बार सोचूं. वैसे भी जाता हूं नई जगह देखने के वास्ते, घूमने के वास्ते, कार्यक्रम तो बहाना होता है. दिल्ली से उबियाया-उजियाया मन कहीं भागने को कहता है और किसी प्रकार का मौका मिलते ही भाग लेता हूं.

अयोध्या-फैजाबाद में कई अनुभव शानदार रहे. महेंद्र त्रिपाठी जी ने कई जगहों पर घुमाया. अपनी बाइक पर बिठाकर. उनकी सादगी मुझे अच्छी लगी. कोई दिखावा नहीं. जैसे हैं, वैसे हैं. दिगंबर जैन मंदिर ले गए तो बहुत देर वहां स्थापित ऋषभदेव की दीर्घाकार आकृति देखता रहा. बिलकुल दिगंबर मुद्रा में. कई जैन अन्य गुरुओं की मूर्तियां लगी थीं. उनकी कुछ तस्वीरें लीं. कारसेवकपुरम गया जहां राम मंदिर के लिए सब कुछ तैयार करके रखा हुआ है. वहां एक साधु वेशधारी असहाय वृद्ध हम लोगों को देखते हुए पैसे मांगने लगा, रिरियाते हुए. मन बेचैन हो गया. काहें का राम मंदिर. इस आदमी के भीतर के मंदिर को बनाओ-चमकाओ.

पर यहां तो खंडहर है. अंदर उदासी है, वीरानापन है. कैसे राम आ सकेंगे नए बनने वाले भव्य मंदिर में. वे जहां हैं जैसे हैं वैसे ही बहुत अच्छे हैं क्योंकि अयोध्या के ज्यादातर लोग बेहद सहज, सरल और गरीब दिखे. बाहर से अयोध्या को लेकर कई तरह की तस्वीर बनती है पर वहां जाइए तो अयोध्या अपने गांव सरीखा लगता है, अगर पुलिस पीएसी वालों को माइनस कर दें तो. अयोध्या की गलियां कई बार वृंदावन की याद दिलाती हैं. बंदर यहां भी पर्याप्त मात्रा में है. महेंद्र ने बताया कि करीब दस हजार मंदिर हैं अयोध्या में और रोजाना एवरेज करीब तीस हजार जन बाहर से आते हैं रामलला के दर्शन हेतु.

अयोध्या में धर्म कारोबार की तरह है. बड़े से बड़ा संत यहां ज्यादा से ज्यादा श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींचने में लगा रहता है. कहने को ट्रस्ट हैं यहां पर उनमें रहने के ठिकाने होटलों को मात दें. पैसे भी ठीकठाक वसूले जाते हैं. हर जगह गुप्त दान पेटिकाएं लगाई गई हैं. गुप्त दान पेटिकाओं को देखकर मुझे भड़ास की याद आई. क्यों न हम लोग भी अब भड़ास के लिए गुप्त दान की अपील करें. बात आई गई. दिमाग है. चलता रहता है. कभी अच्छा, कभी सच्चा, कभी गंदा, कभी बुरा. कुछ न कुछ बज-बजाता बजता-बजाता रहता है. ढनन ढन ढन.. टनन टन टन. ठिम्मक टिम्मक.. टमक टमक चमक चमक… चम चम.. झम झम.. झमक चमक..

फैजाबाद के प्रेस के साथियों से मुलाकात हुई. दैनिक जागरण और अमर उजाला के आफिसों में गया. वहां के साथियों से मिला. कई अन्य लोगों से मुलाकात हुई. भड़ास बड़ा ब्रांड बन चुका है, इसका एहसास हुआ. और इस बड़े ब्रांड ने मुझ जैसे परम देहाती को भी कथित बड़ा बना दिया है, यह महसूस हुआ. पर जब जब मुझे कथित बड़प्पन का एहसास कराया जाता है, सम्मान दिया जाता है.. तब तब लगता है कि कहीं न कहीं कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है. मेरे जैसे करोड़ों युवा हैं जो दिन रात खटते तपते रहते हैं पर उनका कोई नामलेवा क्यों नहीं. हजारों लाखों लोग हैं जो बहुत सारे काम कर रहे हैं उनको रिकीगनीशन क्यों नहीं. और, मेरे में तो बुराई ज्यादा है, अच्छाई कम. अराजक, शराबी, लोफर, मवाली, कबाबी, दलाल, ब्लैकमेलर, कुंठित, फ्रस्टेट, व्यभिचारी, कामी, क्रोधी, लोभी, मोही… जितनी उपमाएं हो सकती हैं सब आप मुझ पर मढ़ सकते हैं और मैं आपको उन उपमाओं के जायज होने के कई तर्क-प्रमाण गिना-बता सकता हूं.

आखिर में, फैजाबाद और अयोध्या के पत्रकार साथियों को प्रणाम कहना चाहूंगा. थोड़ा कष्ट मुझको तो हुआ लेकिन ऐसी दिक्कतों का आदी रहा हूं. और मुझे सच में लग रहा है कि पत्रकारिता दिवस पर वाकई मैं एक पत्रकार की तरह मुश्किल हालात में फैजाबाद अयोध्या की यात्रा कर और वैसा ही बोलकर और वैसी ही दिक्कतों को झेलते हुए वापस आया हूं. हर कष्ट, बुराई, गल्ती में एक अच्छी बात छिपी होती है. गल्तियां आपको सीखने और समझने में मदद करती हैं और आगे से वैसे हालात को टैकल करने की दृष्टि देती हैं. कष्ट आपको समान स्थितियों में जीने वाले अन्य लोगों की हालत को महसूस करने का मौका देते हैं. बुराइयां आपको यह बताने के लिए पर्याप्त होती हैं कि इस बुरे के विलोम अच्छा की क्या स्थिति है और कैसे उत्तरोत्तर अच्छे की तरह शिफ्ट किया जा सकता है.

आखिर में कुछ झलकियां-

  1. -अयोध्या प्रेस क्लब के कार्यक्रम शुरू होने का समय सुबह 11 बजे था लेकिन तब तक एक भी आदमी आयोजन स्थल पर नहीं पहुंचा था. खासकर प्रेस क्लब के पदाधिकारी और पत्रकार गण काफी बाद में आए. शाम को जब एक होटल में दारू कार्यक्रम शुरू हुआ तो सबके चेहरे चमक रहे थे और सभी फटाफट मदिरास्थल पहुंचे. पहले और दूसरे, दोनों आयोजनों का मैं मुख्य अतिथि था. और, ज्यादा मजा दूसरे आयोजन, शराबखोरी वाले में आया क्योंकि इसमें खामखा का आदर्श नहीं था, हम सब विकट नंगे होकर धंधे और मीडिया की बातें कर रहे थे, बिलकुल सच सच…

  2. -ऋषभदेव मंदिर में नग्न जैन गुरुओं की मूर्तियां देखकर एकपल को ठिठका. मंदिर में जब तक रहा, ज्यादा वक्त तक दिमाग में इनके लिंग पर चिंतन चलता रहा. और लगा, हम सब अगर आम जीवन में भी ऐसे ही हों तो शायद नंगई खत्म हो जाए. मतलब, नंगा नहीं हैं तो नंगई है, और जब नंगे हो गए तो नंगई खत्म. क्योकि नंगई है ही तब तक जब तक सब ढंका है. जो ढंका है, वह कौतुक पैदा करता है, फिर उसका एक बाजार बनता है, फिर कारोबार होता है और फिर नैतिक-अनैतिक संबंधित नियम कानून बनाए जाते हैं और पैदा होते हैं दरोगा- कानून वाले व समाज वाले.  दिल से प्रणाम किया जैन गुरुओं को, और सोचता रहा कि ये काम मैं क्यों नहीं कर सकता. अजीब बीमारी है मुझमें. हर शख्स को जी लेना चाहता हूं… उसकी तरह सोचने लग जाता हूं… वैसा होने के बारे में तय करने लगता हूं क्योंकि वैसा सोचते सोचते मैं जाने क्यूंकर उसमें आनंद तलाशने लगता हूं सो उसी ओर उन्मुख होने लगता हूं.

  3. -अयोध्या जाने से पहले लखनऊ में ट्रेन से उतरा था और रात वहीं गुजारी थी. पहले से तय था कि मैं लखनऊ उसी शर्त स्टे करूंगा जब कमरे पर पहुंचूं तो बकरा पक रहा हो, और पकने की कल कल की आवाज और पके रहे मसाले की खुशबू कान-नाक तक पहुंचे. ऐसा ही हुआ. आदिवासी गीत गाते हुए … हुडुंबा गुडुंबा.. गुड़ुड़ बुड़ुड डब टटा डब टटा… और गाते गाते गोल गोल घूमते हुए … बीच बीच में रुक रुक कर मदिरा पान करते हुए और फिर एकाध पीस व ग्रेवी का टेस्ट लेते हुए फिर गोल गोल घूम घूम कर गाने लगते… … हुडुंबा गुडुंबा.. गुड़ुड़ बुड़ुड डब टटा डब टटा… यह अवस्था शराबियों के लिए आदर्श है… किसी ध्यानमग्न संत के ब्रह्म से नाता जोड़े लेने वाली अवस्था की तरह…

  4. -लखनऊ से अयोध्या बस से गया. बस पर चढ़ने से पहले आधी बोतल बीयर गटकी थी और आधी उछाल दी थी. बहुत दिन बाद गर्मी के दिनों में बस से यात्रा की… बस पर बैठा तो पसीना सर सर बहने लगा. बस वाला सवारी भरने के चक्कर में आधा घंटा धूप में दाएं बाएं करता रहा. फैजाबाद उतरा तो वहां से तिपहिया विक्रम में सवार होकर अयोध्या पहुंचा. बस और विक्रम की यात्रा के दौरान गाने सुनता रहा. रास्ते में एक कव्वाल मिले जो अपने घर के छोटे छोटे बच्चों को भजन कव्वाली आदि सिखाकर गायक बनाने का काम करते हैं. वे अगले दिन सुबह पत्रकारिता दिवस के कार्यक्रम में भी पहुंचे. यात्राओं के दौरान अनजान लोगों से दोस्ती का आनंद ही कुछ और होता है. और, आयोजनों में जहाज से पहुंचने के कई क्रमों के बाद इस बार विक्रम से पहुंचने के ताजे अनुभव ने बहुत कुछ दिया. जन, मन और तन तो अपन का विक्रम वालों, बस वालों के साथ ही रहता है क्योंकि असल जीवन, चमक-चर्चा-हनक-खनक-उल्लास-उत्सव यहीं है. जहाजों पर तो मुर्दनी सी शांति छाई रहती है, जैसे सभी यमराज के यहां रवाना हो रहे हों…

कुछ बुरा लगा हो तो गरिया लीजिएगा, भा गया हो तो आपकी जय जय भाया…

उपर उल्लखित आडियो इधर हैं, सुनें….

  • ….पत्रकारिता दिवस पर अयोध्या प्रेस क्लब की तरफ से आयोजित कार्यक्रम में मेरा भाषण… नए जमाने का नायकत्व और हिप्पोक्रेसी का बाजार…

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  • शुजात हुसैन साहब… चुनरी में पड़ गयो दाग….

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  • मोको कहां ढूंढो रे बंदे…. कबीर और शुजात हुसैन का सितार व संगीत…

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आम. प्रणाम. व्यायायाम.

यशवंत

yashwant@bhadas4media.com


….यात्रा और आयोजन की कुछ तस्वीरें, नजारे, अखबारों में प्रकाशित खबरों की कटिंग…….

सब पापी पेट के लिए ही हो रहा है और सब इसी के लिए मरे-जिए जा रहे हैं, फिर इस नेक काम में देरी क्यों… अयोध्या प्रेस क्लब की तरफ से हिंदी पत्रकारिता दिवस पर आयोजित सेमिनार के खत्म होने के बाद हम सभी भोजन पर टूट पड़े. चोखा, बाटी ने आनंद ला दिया.

लीजिए, चीफ गेस्ट साहब जला रहे हैं बत्ती, कर रहे हैं उदघाटन. रस्म-रिवाज है जो. साथ में महेंद्र त्रिपाठी (मेरे दाएं) और सबसे दाएं आखिर में चंदन श्रीवास्तव.

लीजिए साहब, आप भी ले लीजिए पत्रकारिता रत्न एवार्ड…

आपका (रमाशरण अवस्थी) भी योगदान अमूल्य है.. आप भी पकड़ें पत्रकारिता रत्न सम्मान…

जनमोर्चा के पुराने साथी, जिन्हें शीतला सिंह ने निकाल दिया था, को पत्रकारिता रत्न एवार्ड. बीच में महेंद्र त्रिपाठी.

लीजिए यशवंत जी, बहुत काम कर लिया, ये पकड़िए पत्रकारिता रत्न सम्मान और निकल जाइए जंगल की ओर भजन गाने.

एक एक कर लोग पहुंचे तो कार्यक्रम शुरू होने के घंटे भर बाद सिर्फ एक साइड की ही कुर्सियां भर सकीं.

बाबा की जय हो. पहनाओ इन्हें माला… माला का रंग और इनके कपड़े का रंग, सब एक है. जय जय हो. माला फेरत जग मुआ….

अगले दिन अयोध्या फैजाबाद के कई छोटे बड़े अखबारों ने सम्मान के साथ समारोह का विवरण छापा. आखिर मीडिया के साथियों का प्रोग्राम जो था.

सिंह साहब ने ये क्या बयान दे डाला. लगता है बड़े आदमी बन गए हैं सिंह साब. पर ये खबर के बीच में मच्छरों का प्रकोप कहां से हो गया बाबा..

ये हेडिंग तो मेरे पिताजी ने भी पत्रकारिता दिवस के अपने समय के एक समारोह के बाद लगाई थी. वाह, हम न सुधरेंगे.

मीडिया माता जिंदाबाद. इतना त्याग व समर्पण है कि मत पूछो. सब हरा भरा है भाई. आंखें किधर गई हैं…

मुख्य अतिथि को बर्गर खिलाने अयोध्या के एक रेस्टोरेंट में ले गए अयोध्या प्रेस क्लब के अध्यक्ष महेंद्र त्रिपाठी. उसी दौरान मैंने ये तस्वीर ली. राम और बर्गर.. क्या कांट्रास्ट है. एक गाना सूझ रहा है… रामनाम संग बर्गर खाया… गर्मी में दुख दूर भगाया… बंदर धावत भुट्टा खावत… सैलानी सब थर थर कांपत…

विहिप वालों की दुकान. कारसेवक पुरम में रामलला के निर्माण के लिए तराशे गए पत्थरों की लाट. दिन बीत रहे इंतजार में और पत्थर की चमक खोती जा रही है इस संसार में.

पत्थरों का स्थापत्य ऐसा रखा गया है ताकि वह रामलला कालीन लगे. इन पत्थरों की साफ-सफाई और रख-रखाव ठीक न होने से इनकी हालत खराब होने लगी है. कहीं ऐसा न हो कि जब कभी इस्तेमाल की नौबत आए तो ये टांय टांय फिस्स हो जाएं.

पत्थरों की आस्था. वो तो बंदर महाराज हैं जो इन पत्थरों पर उछलकूद कर इनमें प्राण प्रतिष्ठा करते रहते हैं वरना मनुष्यों ने इन पत्थरों को पाषाण बना डाला है…

राम नाम के पक्ष में कारसेवकपुरम में काफी कुछ इकट्ठा किया गया है… मुस्लिमों द्वारा ढाए गए कथित अत्याचार के दृश्यों से लेकर भगवान के होने संबंधी बयानों का जखीरा यहां मौजूद है. अगर एक बार कोई औसत दिमाग का आदमी आ गया तो कई सवाल व कई कहानियां लिए बिना लौट न पाएगा.

दूर दूर के लोग, दूसरे प्रदेशों के काफी लोग कारसेवकपुरम आते हैं, रामलाल के मंदिर के माडल को देख जाते हैं.. और इस दौरान…

…वहां रखी गुप्त दान पेटिका में रकम डाल जाते हैं…. जय हो… गुप्त पेटिका भरती रही…. गुप्त पेटिका के बगल में बैठा बुजुर्ग साधु (इस तस्वीर में नहीं है) भूखा होने का हवाला देकर भीख मांगता रहे…

जैन भगवान ऋषभदेव के मंदिर के बाहर का दृश्य

जैन भगवान ऋषभदेव की दीर्घाकार मूर्ति

भगवान ऋषभदेव की मूर्ति के बाएं अन्य गुरुओं-भगवानों की भी मूर्तियां हैं

भगवान ऋषभदेव की मूर्ति के बाएं अन्य गुरुओं-भगवानों की भी मूर्तियां हैं

दिल्ली वापसी के दौरान ट्रेन जहां कहीं बीच में रुक जाए तो जनरल डिब्बा वाले साथी हाथ-पांव सीधा करने के लिए फटाफट ट्रेन से कूद जाएं और पत्थर-गिट्टी से लेकर रेल पटरी तक पर पसर कर बैठ जाएं. मैं सेकेंड एसी के गेट पर खड़ा बहुत देर तक और बहुत दूर तक रेल पटरियों के आसपास के जीवन व दर्शन को देखता निहारता रहा…

मुख्यमंत्री को ब्लैकमेल करने का आरोप! लखनवी पत्रकार बना उत्तराखंड पुलिस का शिकार

: उत्तराखंड सरकार की मीडिया को पालतू बनाने या परेशान करने की घटिया मानसिकता का विरोध करें : लखनऊ में लाइवन्यूज नाम से न्यूज एजेंसी चला रहे पत्रकार आसिफ अंसारी को उत्तारखंड की पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है. मिली जानकारी के मुताबिक आसिफ अंसारी पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को ब्लैकमेल करने का आरोप है.

देहरादून में आसिफ के खिलाफ 19 फरवरी को जिला सूचना अधिकारी मैलखुरी ने सरकार को ब्लैकमेल करने का मुकदमा लिखाया था. जानकारी होने के बावजूद आसिफ न तो कोर्ट से स्टे ले आए और न ही अग्रिम जमानत कराई. आसिफ ने इस प्रकरण को सामान्य घटनाक्रम माना. पर कल रात उत्तराखंड की पुलिस ने चुपके से लखनऊ पहुंच गई और अचानक धावा बोलकर आसिफ को उनके घर से पकड़ लिया. उन्हें पकड़कर देहरादून ले जाया गया. बताया जा रहा है कि आसिफ अंसारी को आज कोर्ट में पेश किया गया जहां कोर्ट ने सोमवार को सुनवाई की तारीख दी है.

उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड सरकार मीडिया को लेकर बहुत पजेसिव और कंजर्वेटिव है. उत्तराखंड के अखबारों और पत्रिकाओं को या तो विज्ञापन के बल पर खरीद लिया गया है या फिर जो नहीं बिके उन्हें उत्पीड़ित कर अलग-थलग भागने-भटकने को मजबूर कर दिया है. आसिफ पहले उसी न्यूज एजेंसी एनएनआई में काम करते थे जिसके मालिक उमेश कुमार के खिलाफ उत्तराखंड सरकार ने कई मुकदमें लिखा दिए हैं. उमेश की भी गिरफ्तारी की कोशिशें लंबे समय से जारी है लेकिन उमेश उत्तराखंड की पुलिस और सरकार को चकमा देने में कामयाब हैं. दरअसल उमेश पर सबसे बड़ा लेकिन अघोषित आरोप यही है कि उन्होंने क्यों मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के घपले-घोटालों की पोल खोली, स्टिंग करवाया और इससे संबंधित खबरें न्यूज चैनलों को मुहैया कराई. इसी बात से खफा उत्तराखंड सरकार ने उमेश के व्यवसाय को तबाह करने से लेकर उनके परिजनों और उनकी निजी जिंदगी को तबाह करने का सिलसिला तेज कर दिया है.

इसी कड़ी में उत्तराखंड पुलिस ने दूसरे राज्य उत्तर प्रदेश में घुसकर वहां के पत्रकार को पकड़कर ले आई है. सवाल यह भी उठता है कि पहले पत्रकार रह चुके और अब मुख्यमंत्री की गद्दी पर विराजमान रमेश पोखरियाल निशंक को ही सब लोग हर बार क्यों ‘ब्लैकमेल’ करते हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि निशंक के घर की दाल कुछ ज्यादा ही काली है जिसे देख पत्रकार अगर पोलखोल अभियान शुरू करते हैं तो सरकार या तो उनसे समझौता कर लेती है या फिर उन्हें सरकारी मशीनरी के जरिए प्रताड़ित करती है. यहां यह भी बताना जरूरी है कि सीएम निशंक ने उत्तराखंड में दलाल पत्रकारों की एक लंबी फौज तैयार कर दी है जो खुद को बताते तो पत्रकार हैं पर वे सरकारी टुकड़ों पर पलकर मीडिया के विभिन्न माध्यमों के में निशंक का जयकारा करते रहते हैं.

दलाल पत्रकारों की फौज में भारी संख्या में युवा पत्रकारों से लेकर बुजुर्ग पत्रकार तक हैं. ये लोग अपने अपने छोटे मोटे अखबारों, ब्लागों, वेबसाइटों आदि के जरिए निशंकनामा लिखते बांचते बताते बेचते रहते हैं. बड़े अखबारों-मैग्जीनों-चैनलों में तो सीधे उपर से ही डील होने की चर्चाएं हैं, सो, इनके पत्रकार उपरी अघोषित निर्देश के तहत वही लिखते हैं जो सरकार और निशंक को सूट करता है. देश में दो दर्जन से ज्यादा राज्य हैं लेकिन किसी राज्य का मुख्यमंत्री कभी किसी पत्रकार की ब्लैकमेलिंग का शिकार नहीं हुआ. सिवाय एक अपवाद को छोड़ कर जिसमें आजतक के चंडीगढ़ संवाददाता रहे भूपेंद्र नारायण सिंह भुप्पी ने हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री को ब्लैकमेल किया और इस क्रम में भुप्पी की सीडी तैयार हो गई जिसके कारण उन्हें आजतक जैसे बड़े न्यूज चैनल से हाथ धोना पड़ा. तब भी हिमाचल प्रदेश की धूमल सरकार ने न तो भूपेंद्र नारायण सिंह भुप्पी के खिलाफ कोई रिपोर्ट दर्ज कराई और न ही उन्हें गिरफ्तार करने के लिए पुलिस भेजा. धूमल ने आजतक प्रबंधन से शिकायत की और आजतक की कार्रवाई पर भरोसा किया.

आप सवाल कर सकते हैं कि आसिफ अंसारी तो अपनी बनाई कंपनी में ही काम करते थे, इसलिए उनकी शिकायत किससे की जा सकती थी? इसका जवाब यह होगा कि निशंक को गिरफ्तारी जैसा आखिरी कदम उठाने से पहले आसिफ अंसारी को लीगल नोटिस भिजवाना चाहिए था, कोर्ट में मुकदमा करना चाहिए था और अदालत के फैसले का इंतजार करना चाहिए था. और भी कई तरीके हो सकते थे. निशंक का सूचना अधिकारी सरकार को ब्लैकमेल किए जाने का प्रेस रिलीज जारी कर सकता था, बयान जारी कर सकता था, प्रेस कांफ्रेंस कर सकता था, ब्लैकमेल किए जाने का स्टिंग कर उसे सार्वजनिक कर सकता था. कई लोकतांत्रिक रास्ते हो सकते थे. लेकिन मीडिया को डराने-धमकाने-आतंकित करने या फिर नोटों के बल पर अपने चरणों में लोटने के लिए मजबूर करने में विश्वास रखने वाले भूतपूर्व पत्रकार और वर्तमान मुख्यमंत्री निशंक को कोई और रास्ता नहीं सूझता. उन्होंने गिरफ्तारी का फरमान जारी कर दिया. बिना मुख्यमंत्री के आदेश के दूसरे प्रदेश में पुलिस गिरफ्तार करने जा नहीं सकती.

नहीं पता कि आसिफ अंसारी पर लगे आरोप कितने सच या झूठ हैं, लेकिन उत्तराखंड सरकार ने मीडिया के लोगों को आतंकित करने का जो तौर-तरीका अपनाया है, वह प्रशंसनीय नहीं है. कई तरह के घपलों-घोटालों-विवादों से घिरे निशंक खुद अपने बुने जाल में फंसते जा रहे हैं. पत्रकारों को परेशान करना उन्हें भारी पड़ेगा. यह धमकी नहीं हकीकत है. मीडिया के वे लोग जो निशंक के सत्ता में होने के कारण उनका गुणगान उनके मुंह पर करते हैं, वही लोग पीठ पीछे निशंक सरकार की बुराइयों का बखान करते हैं और इस बीजेपी सरकार के फिर जीत कर न आने की भविष्यवाणी करते हैं.

उत्तराखंड में भाजपा नेताओं के बीच विवाद की वजह से ”बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा” वाली जो परिघटना हुई, उसी के कारण निशंक सत्ता में आए. पर सत्ता में आते ही यह शख्स जिस जिस तरह की कारस्तानियां करता जा रहा है, उससे वह खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहा है. और, ऐसा करके वह अपने पार्टी के ही विरोधियों को मजबूत कर रहा है जो चाहते हैं कि किसी भी प्रकार निशंक विवादों-विरोधों में घिरे फंसे रहें. निशंक ने किसी एक आसिफ या उमेश को ही परेशान नहीं कर रखा है, उत्तराखंड के करीब दर्जन भर पत्रकार होंगे जो निशंक का कोप झेल रहे हैं.

मीडिया समुदाय के लोगों से अपील है कि वे छोटे-मोटे स्वार्थों से उपर उठकर आसिफ अंसारी की गिरफ्तारी का विरोध करें वरना कल को किसी भी प्रदेश की पुलिस किसी भी पत्रकार के घर में घुसकर उस पर सरकार को ब्लैकमेल करने का आरोप लगाकर गिरफ्तार कर सकती है. हम आप सभी जानते हैं कि देश-प्रदेशों के बड़े नेता बड़े मीडिया हाउसों के मालिकों से तो ब्लैकमेल हो जाते हैं, इसी कारण उन्हें भरपेट विज्ञापन, सस्ती जमीन आदि देते रहते हैं. लेकिन कोई आम पत्रकार सरकार, शासन-सत्ता के विरोध में खबर लिखे तो उस पर ब्लैकमेलर का आरोप लगाकर उसका उत्पीड़न शुरू कर दिया जाता है.

अगर कोई पत्रकार किसी दूसरे के यहां सेलरी लेकर सरकार के विरोध में कलम चला रहा होता है तो सरकारें या तो उसका तबादला करा देती हैं या फिर उसे नौकरी से निकालने के जिद पर अड़ जाती हैं. सरकार से पंगा नहीं, पैसा लेने की नीति पर चलने वाले अपने मीडिया मालिक फौरन उस पत्रकार का ट्रांसफर कर देते हैं या नौकरी से निकाल देते हैं. ऐसा होता रहता है. पटना में हुआ है. लखनऊ में हुआ है. कई बार तो सरकार लोगों की नाराजगी के कारण संपादक लोगों को चलता कर दिया जाता है. ऐसा दिल्ली में हुआ है, लखनऊ में हुआ. होता रहता है. इसी कारण बड़े मीडिया हाउसों में काम करने वाले पत्रकारों के दिमाग का एक तरह का अनुकूलन हो जाता है जिसमें उन्हें पता होता है कि क्या कहना है, क्या लिखना है, कैसे जीना है, कैसे बचना है.

अगर पत्रकार खुद का अखबार, एजेंसी या पोर्टल चला रहा है और सत्ता की पोलखोल में लगा है तो उसे सबक सिखाने के लिए उसे ब्लैकमेलर बताकर पुलिस-प्रशासन के जरिए उठवा लिया जाता है. आने वाले दिनों में जब ज्यादा से ज्यादा बहादुर पत्रकार खुद का ब्लाग, अखबार, एजेंसी, पोर्टल, वेब टीवी, एसएमएस एलर्ट सर्विस आदि चला रहे होंगे तो जो भी सत्ता या नेता या अफसर के आगे नहीं झुकेगा, उसे ये नेता, नौकरशाह ब्लैकमेलर बताकर उठवा लेंगे और सींखचों के पीछे डलवा देंगे. पर ये जान लें. रेलें, जेलें, अदालतें बहादुर पत्रकारों के लिए हमेशा से ट्रेनिंग सेंटर हुआ करती हैं. इससे निकलकर आदमी और मजबूत इरादों वाला बनता है. आसिफ अंसारी आज जिस मुश्किल में हैं, उस हालात में अगर वे टूटे नहीं तो वहां से लौटकर वे ज्यादा जिगर और ऊर्जा वाले पत्रकार बनेंगे. हम सब उनके साथ हैं और उत्तराखंड सरकार की घटिया मानसिकता की निंदा करते हैं.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

yashwant@bhadas4media.com

”अमर कथा वार्ता” के सभी टेप सभी खबरें एक जगह सुनें-पढ़ें

नीरा राडिया से जुड़े मसले की सबसे पहले डाक्यूमेंट्स के साथ खबर भड़ास4मीडिया ने ब्रेक की. अमर वार्ता टेप कांड से जुड़े सभी टेप सबसे पहले भड़ास4मीडिया डॉट कॉम पर अपलोड हुए. सैकड़ों ऐसी खबरें हैं जिसे भड़ास4मीडिया ने ब्रेक किया. सिर्फ ब्रेक नहीं किया बल्कि साहस के साथ आतंकित करने वाले सचों का खुलासा कर पारंपरिक मीडिया को आइना दिखाने का काम किया. ये पारंपरिक मीडिया उर्फ न्यूज चैनल और अखबार अपने हितों, कारोबार, क्लाइंट आदि के नाम पर पत्रकारिता की मूल आत्मा को मारने का काम करने लगे हैं.

इसी कारण दुनिया भर में न्यू मीडिया ने विज्ञापनबाजों और धंधेबाजों के चंगुल में फंस चुकी पत्रकारिता को आजाद कर फिर से कंटेंट इज किंग का नारा बुलंद किया है. भारत में भड़ास4मीडिया ने इस दिशा में एक छोटा सा प्रयास किया है. उम्मीद करते हैं कि आने वाले समय में पत्रकारिता की नई पौध इस काम को साहस के साथ आगे बढ़ाएगी. साथ ही मीडिया के इस नए माध्यम का इस्तेमाल अत्यधिक मुनाफा कमाने और कारपोरेट हितों को साधने की बजाय आम जनता के दुख-दर्द को उजागर करने और सत्ता प्रतिष्ठानों, कारपोरेट घरानों, भ्रष्ट नेताओं-अफसरशाहों के पोलखोल के लिए करेगी. कई पाठकों ने फोन कर कहा है कि उन्हें अमर कथा वार्ता के टेप और संबंधित खबरें एक जगह नहीं मिल पा रही हैं, खोजने में दिक्कत हो रही है, तो उनकी परेशानी को ध्यान में रखते हुए सब कुछ एक जगह परोसा जा रहा है. आपके सुझावों और सहयोग का इंतजार रहेगा.

यशवंत

एडिटर, भड़ास4मीडिया

yashwant@bhadas4media.com


1– इस पहले टेप में यूपी के वरिष्ठ आईएएस अफसर अतुल गुप्ता को अमर सिंह एक उद्यमी को लाभ पहुंचाने के लिए कह रहे हैं और गुप्ता जी सर सर करते हुए अंततः अमर सिंह के कहे अनुसार सब कुछ करने कराने को तैयार हो जाते हैं… सुनिए.. कैसे नेता और अफसर मिलकर बड़े लोगों के लिए नियम कानून बदल डालने को तैयार हो जाते हैं….

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2– इस दूसरे टेप में जेपी इंडस्ट्री वाले जेपी गौड़ को अमर सिंह पटा रहे हैं और जेपी गौड़ लाभ पाने के लिए लार टपकाते हुए अमर सिंह को तेल लगा रहे हैं… अमर सिंह कैसे शिकार पटाते थे, उसका ये नमूना है… (विस्तार से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- अमर सिंह-जेपी गौड़ संवाद)

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3– इस तीसरे टेप में अमर सिंह किसी दीपक से कह रहे हैं कि वे देवेंदर तक 96.5 लाख रुपये पहुंचा दें… क्या है माजरा, जानने के लिए नीचे दिए गए इस आडियो प्लेयर को क्लिक करके सुनें…

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4– अमर सिंह के आगे प्रभु चावला किस तरह गिड़गिड़ा रहे हैं, हाथ जोड़कर माफी मांग रहे हैं… आजतक के सर्वेसर्वा न होने की मजबूरी गिना रहे हैं… उफ्फ… ये टेप सुनेंगे तो आपको न सिर्फ प्रभु चावला बल्कि मीडिया में बैठे ज्यादातर संपादकों के खोखलेपन का एहसास हो जाएगा…इस टेप को जरूर सुनें और पूरा सुनें…

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5– अमर सिंह की जया से बातचीत. अमर सिंह और जया के बीच कितने करीबी रिश्ते रहे हैं और कैसे अमर अपनी सभी भावनाओं का इजहार जया के सामने कर दिया करते थे, जया को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें सब कुछ सुनाते सिखाते और समझाते रहते थे, ये इस टेप से जाहिर है….

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6– अमर सिंह दीवाली के आसपास घर आए गिफ्ट को छोड़ते नहीं है. वे खुद कह रहे हैं इस टेप में. उनके यहां कोई आया और स्विफ्ट कार देने की जिद करने लगा लेकिन अमर सिंह को डर इस बात का है कि कहीं उनके नाम स्विफ्ट गिफ्ट हो जाए तो कल को इसका खुलासा होने पर बवाल न मच जाए, सो, वे अपने एक करीबी से इस तोहफे को कुबूल करने के तौर-तरीके के बारे में चर्चा कर रहे हैं…

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7– इस टेप में अमर सिंह और मुलायम सिंह यादव की बातचीत है. नेताजी और अमर सिंह, कई सारे मुद्दों पर खुलकर बतियाते हैं… (विस्तार से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- अमर-मुलायम संवाद)

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8– यूपी के एक सीनियर अफसर हैं दीपक सिंघल. उनसे अमर सिंह क्या गुफ्तगू कर रहे हैं, यह सुनिए इस टेप में…

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9– इस टेप में भी अमर सिंह और दीपक सिंघल के बीच बातचीत है. अमर सिंह जिन कुछ अफसरों के सहारे यूपी की तत्कालीन सरकार में बड़े बड़े काम कराते थे, उनमें दीपक सिंघल भी हैं. इन महोदय से बातचीत क्या हो रही है, इस टेप के जरिए सुन सकते हैं…

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10– अमर सिंह और अनिल अंबानी के बेहद नजदीकी रिश्ते रहे हैं. सारी बातें दोनों खुलकर किया करते थे, दलाली से लेकर कारपोरेट दुश्मनों को निपटाने के बारे में तक… सुनिए, इस टेप में अनिल अंबानी और अमर सिंह क्या बतिया रहे हैं… (विस्तार से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- अमर सिंह-अनिल अंबानी संवाद)

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11– जया से बातचीत का क्रम जारी है… बहुत सारी बातचीत करते हैं अमर सिंह.. सपा के अंदर की कहानी सुनाते हैं जया को.. ऐसा लगता है जैसे जया से सब कुछ कहकर अमर खुद को शांत और सामान्य बनाते थे या कह सकते हैं जया से बातचीत करते हुए अमर खुद को रिफ्रेश रखते थे… और, जया से वे सारी बातें करते हैं.. सुनिए… इस अमर जया वार्ता को… इस टेप के जरिए…

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12— बिपाशा से क्या कह डाला अमर ने. बुढ़ापे का असर टांगों के बीच तो होता ही है… और बिपाशा ओह गाड कहकर ठहाका मारकर हंस पड़ती हैं.. दोनों जल्द मिलने की बात कह बाय कहते हैं.. इस टेप की सर्वाधिक चर्चा अमर सिंह के एक डायलाग के कारण है और बिपाशा के बिंदास बोल के कारण है… सुनिए, नीचे दिए गए आडियो प्लेयर पर क्लिक करके… (विस्तार से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- अमर सिंह-बिपाशा बसु टेप की हिंदी-इंग्लिश ट्रांसक्रिप्ट)

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13 और 14– नीचे के दो टेपों को सुनकर अमर सिंह के दर्शन, दिल, सोच के अन्य पहलुओं की जानकारी मिलती है. सामने जो महिला हैं (संभवतः जया) उनसे कितनी बातें करते हैं अमर सिंह, किस किस तरह की बातें करते हैं अमर सिंह, कितना कुछ बताते समझाते हैं अमर सिंह, उसे ध्यानपूर्वक सुनकर ही आप समझ सकते हैं नीचे के दोनों टेपों को जरूर सुनिए…

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15– इसमें एक बार फिर अनिल अंबानी हैं. अमर सिंह से मुखातिब हैं. खूब बातें करते हैं. धंधे की. समझाते हैं और समझते हैं. अनिल अंबानी को जो लोग करीब से नहीं जानते, उनके इस टेप से उनके काम व बात करने के तरीके को समझ सकते हैं और ये भी जान सकते हैं कि अमर सिंह किस कदर खास रहे हैं अनिल अंबानी के लिए …(विस्तार से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- अमर सिंह-अनिल अंबानी संवाद)

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16– इस टेप में (संभवतः कांग्रेस के सांसद) सुब्बाराम रेड्डी हैं… वे अमर सिंह के फोन आपरेटर को बार-बार अपना परिचय देते हैं, नाम बताते हैं. अंततः जब दोनों की बातचीत शुरू होती है तब सुब्बाराव अमर की जमकर तारीफ करते हैं पर अमर हैं कि कांग्रेस से अपने बैर को छिपा नहीं पाते और बताते हैं कि हम तो आप लोगों के लिए करते हैं लेकिन आप लोग तो मेरा अपमान कर देते हो, खासकर सोनिया ने जो किया था अमर सिंह के साथ उसकी पूरी पीड़ा इस बातचीत में है.. और भी कई बातें हैं. पूरा टेप सुनिए…

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17–इस टेप में ये तो पता नहीं चल रहा है कि कौन बात कर रहा है अमर सिंह से, लेकिन जो भी है, मजेदार बातचीत हुई है. इस टेप से सहारा के बारे में अमर सिंह की असली राय सामने आती है. अमर सिंह को फोन करने वाला इस टेप में बताता है कि अकबर की कोई प्राब्लम है. कोई गासिप छप गया है तो सुब्रतो राय जी परेशान हो गए हैं, कूद रहे हैं. अकबर ने रिक्वेस्ट किया है कि अमर सिंह जी से रिक्वेस्ट करें कि जरा संभाल लें… अभिजीत ने बैंड बजा दिया है गाली गलौज कर लिख दिया है चिट्ठी… अकबर परेशान हैं… इसके जवाब में अमर सिंह कहते हैं- वे लोग (सहारे वाले) करते ही यही हैं…. उनका धंधा ही यही है… उनके यहां कोई काम धंधा तो है नहीं, सो सब यही करते हैं… उनका काम ही यही है कि लीगल नोटिस दे देंगे… जज बैठे होते हैं उनके यहां वकील होते हैं लीगल होता है… हमारे अगेंस्ट में किसी ने लिखा था, उसको किसी पुराने केस में पकड़कर अंदर खूब मरवाया था उन लोगों ने… मैं अभी बात करता हूं…. …

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18–अमर सिंह और अतुल गुप्ता के बीच बातचीत. अतुल गुप्ता यूपी के वरिष्ठ आईएएस हैं. अमर सिंह के बेहद करीबी. सपा की सरकार में जिन कुछ अफसरों से अमर सिंह बात करते थे और काम करते कराते थे, उनमें एक अतुल गुप्ता भी थे… सुनिए क्या बातचीत हो रही है अमर और अतुल में…

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19–इसमें किसी अभिजीत से अमर सिंह बात कर रहे हैं.. बातचीत के क्रम में वे ये सब कहते हैं… शैलेंद्र वगैरह से ज्यादा प्राब्लम मीरा सहाय और सुधीर श्रीवास्तव के साथ है.. प्राब्लम ही प्राब्लम है.. दादा की तबियत खराब है… बात ये है कि कोई कम्युनिकेशन नहीं है… कोई कुछ भी करना चाहे करे, हमें आपत्ति नहीं है… लेकिन अगर दादा ने कुछ कहा है तो वो हमें बताया जाना चाहिए… मुझे कुछ जरूरत ही नहीं है… मेरा काम चल जाएगा… अंबिका सहाय वगैरह नहीं करेंगे… पूरा माजरा टेप सुनकर समझिए…

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20–नेताजी उर्फ मुलायम सिंह यादव जब अमर सिंह से बतियाते हैं तो खुलकर बतियाते हैं.. जैसे सबसे खास आदमी से सब कुछ बतियाया बताया जाता है, वैसे… मुलायम-अमर वार्ता के इस टेप को सुनिए…… (विस्तार से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- अमर-मुलायम संवाद)

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21–मुलायम सिंह यादव तब यूपी में मुख्यमंत्री के रूप में सरकार चला रहे होते हैं और उनके सबसे करीबी अमर सिंह हुआ करते थे. नेताजी से बातचीत के एक और टेप को सुनिए… (विस्तार से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- अमर-मुलायम संवाद)

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22–कोई बजाज साहब अमर सिंह से बात करने के लिए फोन लगाते हैं लेकिन वे नहीं होते हैं तो तरुण से बात कराने को कहते हैं और जब तरुण से बात शुरू होती है जबरदस्त बातें होने लगती हैं… धंधा, देश दुनिया, कमाई, भावना… सुनिए पूरी बातचीत

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23–लखनऊ-बाराबंकी के एक नेता हैं अरविंद सिंह गोप. सपा में रहे हैं. वे अमर सिंह को फोन करते हैं. दीवाली विश करते हैं. उनसे अमर सिंह बाराबंकी के चुनाव का हालचाल लेते हैं… सुनिए पूरी बातचीत, इस आखिरी टेप में

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ये तो रहे अमर वार्ता के सभी टेप. अब उन खबरों के लिंक जो इस प्रकरण पर भड़ास4मीडिया पर अब तक प्रकाशित हुई हैं…

  1. सार्वजनिक हो सकते हैं अमर सिंह के बातचीत के टेप

  2. अब बजेगा अमर सिंह का टेप, सुप्रीम कोर्ट ने रोक हटाई

  3. ये हैं अमर सिंह के छह टेप… प्रभु चावला, जेपी गौड़, जया प्रदा आदि से बातचीत के टेप

  4. ये हैं अमर सिंह के पांच और टेप… क्लिक करिए और सुनिए

  5. अमर सिंह की बिपाशा बसु समेत अन्य से बातचीत के बारह टेप

  6. ”अमर वार्ता” में अनिल अंबानी ने सुभाष चंद्रा को चूतिया, पागल, इडियट कहा

  7. मुलायम-अमर के अच्छे दिनों की जुगलबंदी देखने को ये तीन टेप सुनें

  8. बिपाशा बसु के सवाल पर अमर सिंह का जवाब- उम्र का असर टांगों के बीच तो पड़ता ही है…

  9. जेपी इंडस्ट्रीज के जेपी गौड़ को चारा डालते अमर सिंह और अमर सिंह को तेल लगाते जेपी गौड़

  10. बिपाशा बसु बोलीं- टेप में मेरी आवाज है, यह कोई साबित करके दिखाए

  11. सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत लेकिन सीडी गलत तरह से तैयार की गई : अमर सिंह

  12. रहस्यमय चुप्पी के बाद अब अमर टेप बजाने लगे कुछ न्यूज चैनल

  13. ‘अमर टेप’ में ये कौन वाले अकबर हैं, एमजे अकबर वाले अकबर या कोई और अकबर?

  14. नोटिस की बात आप आज प्‍लीज मत बोलना, मैं हाथ जोड़ रहा हूं आपके आगे : प्रभु चावला

  15. अमर-जया वार्ता : कान के कच्चे, चिड़ी का चिक्का, चिकनी टांगें

  16. जया का बंगला बने न्यारा… अमर ने दो करोड़ वारा…

इस अदभुत जर्नलिस्ट को सलाम कहिए, दुवा करिए

होनहार और तेजतर्रार पत्रकार साथी जयंत चड्ढा दिल्ली में जीवन और मौत से संघर्ष कर रहे हैं. जयंत चड्ढा के बारे में बताया जा रहा है कि वे होश में नहीं आ पा रहे हैं. पिछले महीने की बारह तारीख से वे अस्पताल के बिस्तर पर पड़े हुए हैं. पहले कैलाश हास्पिटल, नोएडा में थे. हालत न सुधरते देख उन्हें एम्स के ट्रामा सेंटर में रखा गया है जहां डाक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए हैं.

कुछ लोगों का कहना है कि उनके दिमाग में काफी गहरी चोट है जिसके कारण तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें होश में ला पाने की स्थिति नहीं बन पा रही है. कुछ का यह भी कहना है कि उनकी हालत ब्रेन डेड जैसी है, पर शरीर में धड़कन है, हलचल है. एक सड़क हादसे में जयंत चड्ढा समेत चार लोग घायल हुए थे जिसमें से बाकी तीन की अस्पताल से छुट्टी हो चुकी है. घायल होने वालों में पी7न्यूज की क्राइम टीम के हेड मुकुंद शाही भी थे जो अब आफिस आने-जाने लगे हैं, हालांकि उनके घाव अभी भरे नहीं हैं. एक कैमरापर्सन और ड्राइवर भी घायल हुआ. सभी लोग एक शूट से लौट रहे थे. जयंत व पूरी टीम जिस गाड़ी पर सवार थी, वह पी7न्यूज चैनल की ही गाड़ी थी.

पी7न्यूज प्रबंधन ने घायल मीडियाकर्मियों के बेहतर इलाज के लिए प्रयास किया. पर अब खबर है कि जयंत चड्ढा को चैनल ने उनके हाल पर छोड़ दिया है. बताते हैं कि एक्सीडेंट में सबसे ज्यादा चोट जयंत चड्ढा और गाड़ी के ड्राइवर को पहुंची थी. बताया जा रहा है कि एम्स के ट्रामा सेंटर के डाक्टरों ने कह दिया है कि यह व्यक्ति अब पूरी तरह कभी ठीक नहीं हो सकेगा. भड़ास4मीडिया के पास जयंत की हालत के बारे में मेल के जरिए आई एक सूचना में कहा गया है-

”मीडियाकर्मी अक्सर दूसरों की लड़ाई लड़ते हैं, अपने फर्ज़ को सबसे ऊपर रखते हैं, लेकिन अपनी निजी जीवन की लड़ाई हार जाते है. क्राइम रिपोर्टर जयन्त चड्ढा ने कई मौकों पर चैनल के लिए वो सब किया है जो एक रिपोर्टर को करना चाहिए. लेकिन एक्सीडेंट के काफी दिनों बाद कंपनी ने उन्हें एम्स के ट्रॉमा सेंटर में एडमिट कराया. अब जबकि डॉक्टरों ने ये कह दिया है कि ये व्यक्ति कभी पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाएगा तो इसके लिए आईसीयू का एक बेड रिजर्व रखने का कोई कारण नहीं बनता. इस तरह जयंत को ट्रॉमा सेंटर के बाहर रख दिया गया. बेचारे बूढे मां-बाप अपने बच्चे को लिए चैनल से फरियाद की गुहार लगा रहे हैं. लेकिन चैनल के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही.”

पढ़ लिया न आपने. क्या हालत है अपने पत्रकारों की और मीडिया हाउसों की. जयंत चड्ढा बेहद टैलेंटेड जर्नलिस्ट हैं. वे करीब दस वर्षों से मुख्‍य धारा की पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उन्होंने करियर की शुरुआत अमृत प्रभात, इलाहाबाद से की. जयंत ने कुछ समय तक स्‍वतंत्र चेतना, इलाहाबाद में भी अपनी सेवाएं दी. इसके बाद चैनल7, दिल्‍ली जो अब आईबीएन7 हो चुका है, के साथ दो साल तक जुड़े रहे. जयंत एमएच1 न्यूज चैनल की लांचिंग टीम के सदस्‍य रहे. एमएच1 न्यूज के साथ वह पिछले तीन वर्षों से थे. मूल रूप से इलाहाबाद निवासी जयंत की शिक्षा दीक्षा इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से हुई है. अपनी एक ब्लाग रचना में जयंत ने लिखा है कि वे पहले आईसक्रीम बेचने वाला बनना चाहते थे, बाद में फौजी बनने की इच्छा हुई, लेकिन इलाहाबाद के एक गुरु ने ऐसी ट्रेनिंग दी कि उनके हाथ में जब कलम आई तो वे इसे ही बंदूक मानकर इस्तेमाल करने लगे. अपने ब्लाग पोस्ट में जयंत आगे लिखते हैं कि उनकी इच्छा है कि जब वे मरें तो करोड़ों लोग जानें, भले ही लोग यह कहते हुए रिएक्ट करें कि चलो अच्छा हुआ साला मर तो गया.

जयंत जीवन-मौत से जूझ रहे हैं. उनकी हालत बेहद नाजुक है. डाक्टरों ने भले ही हाथ खड़े कर दिए हों (जैसी की सूचना है) पर कहा जाता है कि दवा से ज्यादा असर दुआ में होता है. आप भी दुवा करिए कि अपना जयंत ठीक हो जाए. अगर आपको जयंत के बेहतर इलाज या उन्हें होश में लाने की कोई तरकीब पता हो, तो जरूर जयंत के शुभचिंतकों और परिजनों को सूचित करिए. जयंत की प्रतिभा को जानने के लिए उनकी लिखी रचनाएं पढ़ सकते हैं. ये रचनाएं जयंत के ब्लाग से साभार ली गई हैं और भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित हो चुकी हैं. जयंत खुद के बारे में अपने ब्लाग पर अपनी प्रोफाइल में यूं लिखते हैं-

जयंत चड्ढा
जयंत चड्ढा

”मैं कम बोलता हूं, पर कुछ लोग कहते हैं कि जब मैं बोलता हूं तो बहुत बोलता हूं. मुझे लगता है कि मैं ज्यादा सोचता हूं मगर उनसे पूछ कर देखिये जिन्हे मैंने बिन सोचे समझे जाने क्या क्या कहा है! मैं जैसा खुद को देखता हूं, शायद मैं वैसा नहीं हूं……. कभी कभी बहुत चालाक और कभी बहुत भोला भी… कभी बहुत क्रूर और कभी बहुत भावुक भी…. मैं एक बहुत आम इन्सान हूं जिसके कुछ सपने हैं… बहुत टूटे भी हैं और बहुत से पूरे भी हुए हैं… पर मैं भी एक आम आदमी की तरह् अपनी ज़िन्दगी से सन्तुष्ट नही हूं… मुझे लगता है कि मैं नास्तिक भी हूं थोड़ा सा… थोड़ा सा विद्रोही…परम्परायें तोड़ना चाहता हूं… और कभी कभी थोड़ा डरता भी हूं… मुझे खुद से बातें करना पसंद है और दीवारों से भी…लेकिन बोल कर नहीं…बहुत से और लोगों की तरह मुझे भी लगता है कि मैं बहुत अकेला हूं… मैं बहुत मजबूत हूं और बहुत कमजोर भी…लोग कहते हैं लड़कों को नहीं रोना चाहिये…पर मैं रोता भी हूं…और मुझे इस पर गर्व है क्योंकि मैं कुछ ज्यादा महसूस करता हूं…”

जयंत चड्ढा ने अपने ब्लाग पर कम ही पोस्टें लिखी हैं, लेकिन उतनी पोस्टों के जरिए पता चल जाता है कि जयंत के अंदर जबरदस्त आग है. शब्द, भाषा, शैली… सबको जयंत साधने में सक्षम. जयंत के अंदर की छटपटाहट उनके किस्सा-ऐ-न्यूजरूम सिरीज को पढ़कर जाना जा सकता है. इस सिरीज की सभी पोस्टें आंख खोलने वाली तो हैं ही, जयंत के अंदर के औघड़ और अदभुत पत्रकार को भी सामने लाने वाली हैं. कोई भी अगर जयंत के इन पोस्टों को पढ़ लेगा तो वह जयंत का फैन हुए बिना नहीं रह सकता. ऐसा प्रतिभाशाली पत्रकार आज जीवन-मौत से जूझ रहा है. और, दूसरों की खबर लेने-देने वाले पत्रकारों को खुद ही अपने एक होनहार पत्रकार साथी की सुध नहीं.

जयंत चड्ढा के ब्लाग की रचनाओं को भड़ास4मीडिया पर समय-समय पर प्रकाशित किया जाता रहा है, उन सभी के लिंक यहां दिए जा रहे हैं. आप नायाब जर्नलिस्ट जयंत के ठीक हो जाने और उनके फिर से लिखने-पढ़ने लायक बन जाने के लिए उपर वाले से दुवा तो करिए ही, इन पोस्टों को भी पढ़ लीजिए ताकि जयंत को आप अच्छे से महसूस कर उनके लिए सच्चे मन से दुवा मांग सकें. जयंत के ब्लाग पर उनकी आखिरी पोस्ट ”सुख कहां है…?” शीर्षक से प्रकाशित है. इसे पढ़ते हुए आपको लगेगा कि जयंत कितने आध्यात्मिक और चिंतनशील व्यक्ति हैं. डूबकर, और पूरी ईमानदारी से लिखते हैं. जयंत के लिखे कुछ लेखों का लिंक यहां दिया जा रहा है….

राडिया से रिश्ता रखना महंगा पड़ रहा, उपेंद्र राय के खिलाफ सीबीआई जांच शुरू!

उपेंद्र राय: खुलने लगी पोल : ईडी ने सीबीआई को लिखा था पिछले साल पत्र : राडिया का काम कराने के लिए ईडी अधिकारी से मांगा था फेवर और बदले में दो करोड़ देने का किया था आफर : ईडी ने उपेंद्र राय के खिलाफ शिकायती पत्र फिर भेजा सीबीआई के पास : उपेंद्र राय ने आरोपों से इनकार किया और इसे विरोधियों की साजिश करार दिया :

स्टार न्यूज छोड़कर सहारा मीडिया में सबसे बड़े पत्रकार के पद पर नियुक्त होने वाले उपेंद्र राय कुछ ही महीनों बाद नीरा राडिया से बातचीत का टेप लीक होने के कारण चर्चा में आए. राडिया कई जगहों पर बातचीत में उपेंद्र राय एंड कंपनी का जिक्र करती है. राडिया से बातचीत में उपेंद्र राय भी दंडवत की मुद्रा में दिखते हैं. अब नए खुलासे से उपेंद्र राय के साथ-साथ सहारा की भी नींद उड़ी है और माना जा रहा है कि इस खुलासे के बाद उपेंद्र राय को सहारा से जाना पड़ सकता है क्योंकि सहारा इतने विवादित व्यक्ति को देर तक कांटीन्यू नहीं कर सकता. और इस नए खुलासे से यह भी स्पष्ट हो गया है कि उपेंद्र राय दरअसल नीरा राडिया के एजेंट के रूप में काम कर रहे थे.

वैसे, उपेंद्र राय हर बार यही कहते हैं कि वे किसी स्टोरी के चक्कर में इनसे या उनसे बात कर रहे थे.  चलिए आपको मूल कहानी बताते हैं. प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को एक पत्र लिखकर उस घटना की जांच का अनुरोध किया है जिसमें एक पत्रकार ने ईडी के एक अधिकारी को एक मामले को सलटाने के लिए फेवर मांगा था और बदले में ठीकठाक पैसे देने का वादा किया था. उस पत्रकार ने जिस काम के लिए अनुरोध किया था, वह काम नीरा राडिया की तरफ से था.

पत्रकार का नाम है उपेंद्र राय. पैसे दो करोड़ रुपये तक देने के आफर किए थे. पिछले साल नवंबर में ईडी की तरफ से सीबीआई को यह पत्र लिखा गया और इस पत्र को अति गोपनीय श्रेणी दिया गया. हम आपको यहां यह भी बता देते हैं कि यह पत्र किस अधिकारी ने किस अधिकारी को लिखा था. ईडी के अतिरिक्त निदेशक आरपी उपाध्याय ने अपने निदेशक अरुण माथुर की सहमति से यह पत्र तत्कालीन सीबीआई डायरेक्टर अश्विनी कुमार को भेजा था. पत्र पिछले साल 25 नवंबर को भेजा गया. बताया जाता है कि उपेंद्र राय ने काम होने पर दो करोड़ रुपये देने की बात कही थी. सूत्रों के मुताबिक उपेंद्र राय ने ईडी अधिकारियों को बताया था कि वे नीरा राडिया को करीब 12 वर्षों से जानते हैं.

सीबीआई को भेजे पत्र में कहा गया है कि उपेंद्र राय के प्रस्ताव को ईडी अफसरों ने ठुकरा दिया और इस मामले को अपने निदेशक अरुण माथुर के पास भेज दिया. तब माथुर की सहमति से उपाध्याय ने सीबीआई को जरूरी कार्रवाई व जांच के लिए इस बारे में पत्र लिखकर भेज दिया. ताजी सूचना है कि कुछ दिनों पहले ईडी अफसरों ने उस शिकायती पत्र को दुबारा वर्तमान सीबीआई निदेशक एपी सिंह के पास भेज दिया. सूत्रों के मुताबिक सीबीआई ने उपेंद्र राय के खिलाफ गुपचुप तरीके से जांच शुरू कर दी है.

उधर, उपेंद्र राय ने राडिया की तरफ से किसी काम की सिफारिश ईडी अधिकारी से किए जाने से इनकार किया. उपेंद्र राय का कहना है कि ऐसा कोई मामला उन्हें याद नहीं आता. संभव है वे 2जी स्कैम से संबंधित खबर के लिए कुछ सूचनाओं की बाबत मीटिंग के इच्छुक रहे हों. पर उपेंद्र राय का कहना है कि उन्होंने राडिया की तरफ से किसी से भी आजतक कोई मीटिंग नहीं की. उपेंद्र राय के मुताबिक उनके विरोधी उन्हें नुकसान पहुंचाने के लिए भ्रामक सूचनाएं फैला रहे हैं. इस प्रकरण के बाबत जो भी पत्र या दस्तावेज हैं, वे सब झूठे और आधारहीन हैं.

नीरा राडिया – उपेंद्र राय के बीच रिश्ते के जो कुछ टेप व खबरें हैं, उन्हें नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करके सुन पढ सकते हैं-

उपेंद्र राय ने भी की थी नीरा राडिया से बातचीत

उपेंद्र राय और नीरा राडिया के बीच बातचीत का टेप

ये जो उपेंद्र राय का ब्रदर इन ला या कजिन ब्रदर है, प्रदीप राय, वो यही तो काम करता है

दिल्ली हाईकोर्ट के जज विजेंद्र जैन ने 9 करोड़ रुपये रिश्वत लिए थे

भंगू भाई, पी7न्यूज में किसने भांग मिलाई!

पी7न्यूज राजनीति का अखाड़ा बन गया है. पर्ल के मालिक भंगू ने अपने इस चैनल को लेकर ऐसी भाव-भंगिमा अपनाई है कि दर्जन भर लोग आपस में लड़े मरे जा रहे हैं और भंगू ताली बजा बजा कर मजे ले रहे हैं. अगर ऐसा न होता तो पी7न्यूज अंदरुनी खबरों की वजह से नहीं बल्कि बड़ी खबरें ब्रेक करने के लिए चर्चा में होता. करीब दर्जन भर से ज्यादा बार कंपनियों के नाम बदल बदल कर जनता को लूट लूटकर अरबों खरबों का साम्राज्य खड़ा करने वाले भंगू ने असल में न्यूज चैनल इस मकसद से नहीं शुरू किया कि उन्हें जनता या पत्रकारिता का भला करना है.

रिजर्व बैंक आफ इंडिया की तरफ से दर्जन से ज्यादा बार प्रतिबंधित की गई चिट-फंड कंपनियों के मालिक और जनता की गाढ़ी खून पसीने की कमाई का लुटेरा सरदार भंगू दरअसल न्यूज चैनल को ले ही आया है इस मकसद से कि वह सत्ता प्रतिष्ठानों को प्रभावित कर, दबाव में लेकर, सम्मोहित कर अपने काम निकलवा सके, करा सके. पी7न्यूज में अगर आप वरिष्ठ पद पर ज्वाइन करने के लिए इंटरव्यू देने जाएंगे तो वहां मैनेजमेंट के लोग आपसे आपके पत्रकारीय ज्ञान के बारे में नहीं पूछेंगे, वे पूछेंगे कि आप किन किन नेताओं को निजी तौर पर जानते हैं और उनसे कंपनी का काम करा सकते हैं.

जी हां, ये जानकारी सोलह आने सच है. पी7न्यूज में शीर्ष पदों पर नौकरी करने के लिए आपको भंगू के काले कारोबार को बचाने-बढ़ाने का ज्ञान-गुर आना चाहिए अन्यथा एक दिन आप किनारे करके फेंक दिए जाएंगे या फिर आंतरिक गृह युद्ध में ऐसे उलझा दिए जाएंगे कि आप के दिन-रात का चैन खत्म हो जाएगा. और, पी7न्यूज में आंतरिक गृह युद्ध चरम पर है. लोग एक दूसरे के खिलाफ गंभीर आरोप लगा रहे हैं. लोग एक दूसरे के खेमों की जासूसी करा रहे हैं. तीन चार गुट आपस में भिड़े हैं और हर गुट का नेता अपनी कुर्सी बचाने के साथ-साथ अधिकार बढ़ाने की लड़ाई लड़ते हुए दूसरे गुट के नेता को निपटाने पर तुला है. केसर सिंह. सतीश जैकब. रमन पांडेय. ज्योति नारायण.

फिलहाल इन चार गुटों के बीच खींचतान मची हुई है. ज्योति नारायण का पी7न्यूज से सीधे तौर पर कोई लेना देना नहीं है लेकिन चैनल को उनके ही नेतृत्व में लांच किया गया था इसलिए उनके रखे कई लोग ज्योति नारायण के संरक्षण-इशारे पर दूसरे खेमों के खिलाफ सक्रिय हैं. केसर सिंह, जो कभी दूरदर्शन के लिए कार्यक्रम बनाया करते था और आज भी उनका यही प्राइम कारोबार है, भंगू की विचित्र भाव भंगिमा के कारण अचानक पी7न्यूज के सर्वेसर्वा बन गए. ज्योति नारायण के जाने के बाद केसर सिंह को सत्ता में लाया गया. रमन पांडेय पुराने लोगों में से हैं. कम चर्चित यह शख्स पी7न्यूज में लांचिंग के वक्त से है और मालिक भंगू का करीबी होने का दावा करता है. इसी कारण एक बार वह पी7न्यूज से बाहर होने के बाद फिर अंदर प्रवेश पा गया और पहले से ज्यादा मजबूत हो गया. राजनीति का माहिर खिलाड़ी रमन पांडे एक तीर से कई लोगों को निपटाने पर तुला हुआ है, खासकर सतीश जैकब से इसकी पटरी नहीं बैठती है.

सतीश जैकब. इन दिनों पी7न्यूज में हैं और बेहद लाचार हैं. रहे होंगे ये कभी महान पत्रकार लेकिन आजकल ये तनख्वाह पाने के लिए इन-उन संस्थानों के चक्कर लगाते रहते हैं और पी7न्यूज में इनकी गोटी बैठी तो यहीं जम गए हैं. पत्रकारिता के जानकार आदमी हैं. भंगू की विचित्र भाव भंगिमा के कारण ये आ तो गए पी7न्यूज में लेकिन ठनठन गोपाल बने हुए हैं. केसर सिंह, रमन पांडेय आदि इत्यादि गुटों ने इनके हाथ-पांव बांध रखे हैं. केसर गुट को डर है कि कहीं ये आदमी भंगू की विचित्र भाव भंगिमाओं को प्रभावित कर उनका बोरिया बिस्तर न बंधवा दे. रमन पांडेय गुट को डर है कि कहीं ये आदमी काम लेने लगा तो उन लोगों की पोल ही खुल जाएगी, सो इसे काम करने लायक रहने ही न दो.

ज्योति नारायण गुट रक्षात्मक मुद्रा में है. इस गुट के ज्यादातर लोगों को पहले ही निकाला जा चुका है. जो बचे खुचे लोग हैं, वे हर गुट को प्रणाम कर अपनी नौकरी बचाने में जुटे हैं और जो गुट मजबूत इन्हें दिखता है, उसकी खासकर चरण वंदना करते हैं. अभी तक तो आप कहानी की भूमिका सुनर रहे थे, स्टार कास्ट समझ रहे थे. अब बाते हैं मूल स्टोरी पर. पी7न्यूज में इन दिनों लेटर भेजो अभियान चल रहा है. अनाम मेल आईडीज से ग्रुप के सभी लोगों को मेल किया जा रहा है. कभी कोई मेल सतीश जैकब के चरित्र की ऐसी-तैसी करते हुए इन्हें पी7न्यूज से निकाल भगाने की मांग करते हुए होती है तो कभी कोई मेल रमन पांडेय को खलनायक बताती हुई इस आदमी से मुक्ति के लिए गुहार लगाती हुई इन उन सभी के मेलबाक्सों में प्रकट होती है.

और, हर गुट मेल की एक कापी भड़ास4मीडिया के पास भेज देता है ताकि उनके खेल में भड़ास भी शामिल हो जाए. पर ऐसा न करते हुए हम सभी गुटों के खेल में शामिल होना चाहेंगे और उन सभी मेलों को यहां प्रकाशित कर रहे हैं, जो पी7न्यूज की आंतरिक राजनीति से जुड़ी हुई है. इन पत्रों को पढ़कर आप एक बात तो तय कर ही लेंगे कि पी7न्यूज चैनल काफी खतरनाक हो चुका है, यहां काम करने के बारे में सोचना खतरे से खाली नहीं है. इस ग्रुप का मालिक सरदार भंगू पत्रकारों को आपस में भिड़ाकर खुद मजे ले रहा है ताकि उसके चैनल के पत्रकार और संपादक, लाचार बनकर न्याय के लिए उसके यहां गुहार लगाते रहें और वह न्याय करने की मुद्रा में आकर अपने धंधे के लिए सबसे मुफीद पत्रकारों-संपादकों को संरक्षित कर बाकी को निपटा सके.

भंगू की विचित्र भाव भंगिमाओं की कथाएं और एक आदमी द्वारा जनता को लूट-चूस कर और सत्ता-सिस्टम को भ्रष्ट-नष्ट कर खरबपति हो जाने की कथाएं आपको तफसील से पर बाद में बताएंगे. पहले आपको पी7न्यूज में चल रहे लेटर भेजो अभियान के लेटरों को पढ़ाते हैं.

 


ये हैं तीन पत्र जो आजकल पी7न्यूज से जुड़े लोगों के पास मेल के जरिए घूम-फिर रहे हैं…

((पत्र नंबर एक))

सतीश जैकब को रमन-केसर निपटाने पर तुले हैं

पी7 में भूकंप आया हुआ है…. करीब दो-ढाई वर्ष पहले अस्तित्व में आए इस नेशनल न्यूज चैनल में नए एडिटर इन चीफ सतीश जैकब (बीबीसी फेम) के ज्वाइन करने के बाद घबराए हुए कुछ लोगों ने कई उल्टे सीधे कदम उठाने शुरू कर दिए हैं…. सतीश जैकब को पर्ल ग्रुप के चेयरमैन ने चैनल की कमान दी है…. उसके बाद जैकब ने आउटपुट हेड रमन पांडे के कामकाज पर उंगली उठानी शुरू कर दी…. रमन पांडे ने कभी भी आउटपुट के कामकाज सुधारने पर जोर नहीं दिया…. उसकी जगह वो डायरेक्टर केसर सिंह को साधने और चंडीगढ़ में बैठने वाले कुछ डायरेक्टरों को खुश करने में ही लगे रहते हैं…. चंडीगढ़ के ब्यूरो चीफ मुकेश राजपूत उनके लिए चंडीगढ़ में लाबिंग करते हैं और इसके बदले में मुकेश की हर उल्टी सीधी खबर चैनल में प्रमुखता से चलती है… मुकेश को पी7 में रमन पांडे ने एक तरह का डायरेक्टर का दर्जा दिला रखा है…. बताते हैं कि रमन पांडे ने कभी भी चैनल को सुधारने या प्रजेंटेशन पर जोर नहीं दिया,  उनको कभी भी किसी ने कंप्यूटर पर कुछ भी लिखते या पढ़ते नहीं देखा….  अपनी कुर्सी बचाने के लिए चैनल में हर नए आने वाले के खिलाफ वो  डायरेक्टर केसर सिंह को भरना शुरू कर देते हैं….. अपनी कुर्सी जाते देख रमन ने केसर सिंह को डर बैठाकर सतीश जैकब का विरोधी बनाना भी शुरू कर दिया है…..यही कारण है सतीश जैकब को न्यूजरूम के कामकाज में जरा भी छूट नहीं दी जा रही  है…. हाल ही में सतीश जैकब के खिलाफ चैनल के सभी स्टाफ के पास फर्जी नाम से मेल भेजा गया, जिसमें बुजुर्ग सतीश जैकब के चरित्र हनन और उनके कामकाज पर सवाल उठाए गए….. मेल में उनको ठरकी, बूढ़ा, चुका हुआ और नास्टिल्जिया में रहने वाला पत्रकार करार देकर खिल्ली उड़ाई गई…. इस साजिश के पीछे सतीश जैकब को नीचा दिखाने की कोशिश थी…. इसके बाद चंडीगढ़ ब्यूरो की मदद से इस मेल को डायरेक्टरों के पास भेजकर सतीश जैकब की इमेज खराब करवाई गई…. इस सारी कोशिशों से अंततः सतीश जैकब को नुकसान उठाना पड़ा….  उनकी बिना जानकारी में रमन गुट अपने विरोधियों को चैनल से बाहर का रास्ता दिखाने में जुटा है… जिस जिस से रमन की नहीं पट रही, केसर सिंह के जरिए उसको सीधा चैनल छोड़ने का फरमान सुना दिया जा रहा है…. चैनल से जुड़े पुराने लोगों को निकालने का क्रम जारी है और अभी 50 लोगों की लिस्ट एचआर को सौंपी जा चुकी है… चैनल में कामकाज का माहौल खत्म हो चुका है…. रमन के खास लोगों को छोड़कर सभी पर नौकरी जाने की दहशत कायम है…. अब तक करीब एक दर्जन लोगों को रमन पांडे नोटिस  दिला चुके हैं…. इनमें से कई लोग अदालत जाने की तैयारी कर रहे हैं…. इसकी जानकारी पर्ल ग्रुप के चेयमैन आफिस तक पहुंची तो डायरेक्टर केसर सिंह को चंडीगढ़ बुलाकर नाराजगी जताई गई…

एक और बात बता दूं. पी7 के नए संपादक सतीश जैकब कुछ समय के लिए इंडिया न्यूज में सलाहकार के तौर पर काम कर चुके हैं… जैकब ने इंडिया न्यूज के कुछ लोगों को जूनियर पोस्ट पर पी7 में ज्वाइन करवाया.. वो अपनी पसंद के कुछ सीनियरों को भी इंडिया न्यूज से लाने की कोशिशों में जुटे हैं… लेकिन इसकी भनक लगते ही इंडिया न्यूज से लोगों को पी7 में लाने पर रमन-केसर लाबी ने रोक लगवा दी है. कुल मिलाकर पी7 में इन दिनों कामकाज का माहौल खत्म हो चुका है. इसका सीधा असर चैनल पर दिखने भी लगा है….

((पत्र नंबर 2))

पी7 से लोगों को निकालने वाले असली हाथ

पी7 न्यूज़ चैनल से एकसाथ इतने सारे लोगों को निकालने को लेकर मीडिया जगत में तरह तरह की अटकलें हैं अच्छा काम करने वालो को भी बाहर निकाल दिया गया है…इसके लिए पी7 के मैनेजमेंट ने उस वक्त के इनपुट हैड राकेश शुकला और आऊटपुट हैड रमण पांडे से छटनी के लिए  नाम की लिस्ट मांगी … लिस्ट मागने के बाद मैनेजमेंट ने बहुत चालाकी के साथ उसे अपने पास रखा और कोई एक्शन नहीं लिया  और सतीश जैकब के आते ही…राकेश शुकला को ही सबसे पहले  हटा दिया…..

लोग ये समझे कि  सतीश  जैकब ने आते ही अपना काम शुरू कर दिया… उसके कुछ दिनो के बाद मैनेजमेंट ने उस लिस्ट पर कारवाई करनी शुरू कर दी …उसके बाद लोगो को यकिन हो गया कि ये सतीश जेकब का ही काम है …..मगर सच्चाई कुछ और ही है… मैनेजमेंट ने सतीश जेकब को एडिटर इन चीफ की कुर्सी तो ज़रूर दे दी मगर उस कुर्सी की पावर नहीं दी….. वो न किसी को निकाल ही सकते हैं और न रख ही सकते हैं …इस के पीछे भी बहुत बड़ा खेल है…सोचने वाली बात ये है…जिस शख्स ने 27 साल बीबीसी अंग्रेजी में काम करने के बाद  दो किताबे लिखी “द अमृतसर – द लास्ट बैटल ऑफ इंदिरा गांधी”..और “द वार इन इराक़”…….

यही नहीं ये शख्स तीन साल तक प्रेस क्लब का अध्य़क्ष रहा और एडिटर गिल्ड का  मेम्बर भी ….सरकार ने भी उसकी काबलियत को देखते हुए लांग एंड  डिस्टिन्ग्विश सर्विसेस का कार्ड दिया …जो भारत में सिर्फ नौ लोगों के पास है …… जो बीबीसी में पहला भारतीय इंटरनेशनल कॉरेस्पोंडेट था बीबीसी से रिटायरर्मेट के बाद इतने काबिल और तजुर्बेकार व्यक्ति के साथ काम करना सब के लिए सम्मान की  बात है……उन लोगो को सच्चाई जानने की ज़रूरत है…जो अफवाह फैला रहे है ….क्योंकि शायद वो भी पत्रकार है……और एक पत्रकार को अक्सर परदे के पीछे का खेल देखना चाहिए ……न कि वो जो दिखाया जा रहा है…….

((पत्र नंबर तीन))

इस सतीश जैकब से बच के रहियो

कामरेड लाल सलाम, लाल सलाम इसलिए की ये नारा क्रांतिकारियों का है… और हम आपके साथ हैं, आपकी तरह, लेकिन अफसोस, की हम क्रांति नहीं कर सकते है… तभी तो लेख के माध्यम से एक ऐसे छद्मवेशी व्यक्ति की जानकारी आपको दे रहे हैं जो पिछले कई सालों से मीडिया इंडस्ट्री को शर्मसार कर रहा है… हम बात कर रहे हैं कथित माननीय सतीश उर्फ सतीश जेकब की जिसको इंडिया न्यूज़ से निकाल दिया गया. जिसे इंडिया टीवी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.

फिर ये आख़िर पी7 के भाग्य में क्यों अटक गया. दरअसल साथियों इन जनाब को बहुत कम लोग जानते है. तभी तो ये अपने बाप दादा का नाम गांव और बल्दियत बताते फिरते हैं.. इंडिया न्यूज़ की कहानी जान लिजिए. मालिकों को सब्जबाग दिखाया. बताया कॉंग्रेस का महारथी हूं. मनु शर्मा को जेल से बाहर निकलवा दूंगा. मालिकों ने धोखा खाया और इसकी बुढ़ापे में नौकरी लग गयी. बाद में वहां के लोगों को पता चला कि इस व्यक्ति को टेलिविजन आता ही नहीं है. दरअसल ये जेकब जी उस जमाने का हीरो अपने आप को बताते हैं जब दुनिया  में सूचना क्रांति आयी नहीं थी. और बीबीसी में काम करने वालों को गोरों का दलाल समझा जाता था. वे गोरे जो हमारे देश पर हाथ साफ किये और हमारे भाईयों  पर जुल्म बरसाये.

खैर इंडियां न्यूज़ पर लौटते है वहां ममता (बदला हुआ नाम) नाम की लड़की से इन्हें प्यार हो गया. चौकिंये मत इस बुढ़े (74 साल) की फितरत ही ऐसी है. दिमाग पर गौर डालिए ….पी7 में ऐसा ही कुछ कर रहा होगा….खैर हरिश गुप्ता समय रहते भाप गये.और इस ………को समय रहते बाहर का रास्ता दिखा दिया.

अब जरा इंडिया टीवी के बारे में जान लिजिए. महामहिम रजत शर्मा को इस माननीय ने अपने जाल में कैसे फांसा. रजत जी को बता आया कि हमारा संबध विदेशियों से ज्यादा है क्योकि मै कनवर्टेड हूं. फाईनेंस दिलवाउंगा …रजत जी का भी बुरा दौर था.इसके बहकावे में आ गए. लेकिन जैसे ही कम्पनी में इन हुआ दूसरे वफादार साथियों के खिलाफ जाल बुनना शुरू कर दिया. यहां भी लड़कियों पर डोरे डालने लगा. हम ये नहीं कह रहे है कि ये सबकुछ वासना के लिए कर रहा था. बल्कि जो लड़कियां इसके करीब थीं वो बताती हैं कि कॉफी पीने के लिए बार-बार परेशान करता था. और नहीं जाने पर कहता था की हमारी तो कोई गर्ल फ्रेन्ड ही नहीं है. रजत जी समझदार थे. बीमारी ज्यादा फैलने के पहले दुकान पर दो लात लगा दी.

बुढ़ापे में दारू पीने का पैसा नहीं था. बेटा बेरोजगार है. बहू को प्रमोट करना था. इस उमर में इतने तनाव…. रास्ता ढूढते पहुंच गया पी7. और आते ही राकेश शुक्ला सर का विकेट गिरा दिया. क्या भगवान इसको माफ करेंगे… खैर आने के पहले.. किसी से फोन कराया. सीधे-साधे मालिकों को, पोलिटिकल पैरवी से नौकरी पा लिया. कोई हमारी आपकी तरह साक्षात्कार देकर नहीं आया. टेस्ट नहीं दिया अपना नहीं तो पोल खुल जाती, स्क्रीप्ट लिखने नहीं आती (हिन्दी टाईप करना नहीं आता, टेस्ट लेकर देख लीजिए फेल हो जायेगा… कंसेप्ट कुछ नहीं है ….रेडियो का गाना गाता है….लोग मज़ाक उड़ाते हैं. और तो और कमाल देखिये जिस छत्रछाया में पेट पालने आया है उसके ही डायरेक्टर का जड़ खोद रहा है.. कहता है कि केसर सिंह को जरूर हटाउंगा मैं निर्मल सिंह को रिपोर्ट करता हूं. पहले तीनमूर्ती जिन्होने इस चैनल के लिए अपनी जवानी दे दी यानि रमन सर, अनुराग सर और खंडुरी सर उनके खिलाफ जहर उगलता है. लड़कियों के प्रति नरम है लेकिन ये खबर जब हरिश गुप्ता और रजत शर्मा के पास पहुंचेगी तो उसके नर्मी का राज बता सकते है.

चैनल में अपने बेटे को बुलाने के पहले गेस्ट के आने का कीमत यानि पैसे तय करवा लिये ..और रोज अपने बेटे को बुलाता रहा गेस्ट स्पीकर के रुप में.यानि लाखों रूपये के आस पास अपने बेटे को दिलवा दी भला हो उस मालिक का जो अब भी इसके कर्मों को माफ कर रहा है. इनको करीब से जानने वाले कहते हैं कि सतीश उर्फ जेकब को पत्रकार कौन मानता है .ये तो विमेनाइजर है जो दिल्ली में अपने घर पर अपनी दारु पार्टी, कबाब ..शबाब के लिए जाना जाता है. खाता है पीता है और वही सो जाता है. हम ये कहानी आपको इसलिए बंया कर रहे है कि आप भी हो जाईये इससे सावधान. जो जात का न रहा है वो किसका होगा.कामरेड बहुत दुख के साथ अपको लाल सलाम

ब्लागरों की जुटान में निशंक के मंचासीन होने को नहीं पचा पाए कई पत्रकार और ब्लागर

: गंगा घोटाले को लेकर कुछ लोगों ने आवाज उठाई : पुण्य प्रसून बाजपेयी और खुशदीप सहगल ने किया बहिष्कार : नुक्कड़ समेत कई ब्लाग व ब्लाग एग्रीगेटर चलाने वाले और हिंदी ब्लागिंग को बढ़ावा देने के लिए हमेशा तन मन धन से तत्पर रहने वाले अपने मित्र अविनाश वाचस्पति का जब फोन आया कि 30 अप्रैल को शाम चार बजे दिल्ली के हिंदी भवन (जो गांधी शांति प्रतिष्ठान के बगल में है) में ब्लागरों की एक जुटान है तो मैं खुद को वहां जाने से रोक नहीं पाया.

आमतौर पर भड़ास के कामों से फुर्सत निकाल पाना मेरे लिए कठिन होता है लेकिन हिंदी ब्लागरों से जब मिलने मिलाने की बात होती है तो मैं उत्साहित होकर वहां पहुंचने की कोशिश करता हूं क्योंकि आज भड़ास4मीडिया जिस मुकाम पर है उसके पीछे हिंदी ब्लागिंग की ही देन है. भड़ास ब्लाग से जो शुरुआत की तो उसके पीछे कई हिंदी ब्लागरों का हाथ रहा है जिनसे हिंदी में टाइप करने से लेकर ब्लाग बनाने फिर साइट बनाने तक के नुस्खे सीखे. चार की बजाय तीन बजे ही हिंदी भवन मैं पहुंच गया. पहुंचते ही हिंदी भवन के सभागार स्थल के ठीक बाहर दो किताबों के प्रचार का बैनर टंगते हुए देखा.

इन किताबों पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक का नाम लेखक के रूप में अंकित था. किताबें सफलता सिखाने वाली किताबों जैसी थीं (किताबों के नाम- 1- सफलता के अचूक मंत्र 2- भाग्य पर नहीं, परिश्रम पर विश्वास करें). थोड़ा अचरज हुआ कि एक मुख्यमंत्री सफलता सिखाने वाली किताबें लिख रहा है जिसमें ढेर सारी सच्चरित्र होने की बात कही गई थी और उसी मुख्यमंत्री का नाम कई तरह के घोटालों में आ रहा है. अभी कुछ रोज पहले ही सीएजी की रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि उत्तराखंड सरकार ने हरिद्वार महाकुंभ में गंगा घोटाल किया है. इस गंगा घोटाले के चलते गंगा और ज्यादा मैली हुई हैं. गंगा में भारी मात्रा में मल व मैल बहाकर उत्तराखंड सरकार ने न सिर्फ गंगाजी बल्कि भक्तों की पवित्र भावनाओं को भी चोट पहुंचाया है. इस घोटाले पर हो-हंगामा शुरू होने के आसार बन गए हैं. इस घोटाले से पहले भी कई घोटाले उत्तराखंड सरकार और इसके सीएम रमेश पोखरियाल निशंक के नाम दर्ज हैं. पर लगा कि डायमंड प्रकाशन वालों ने, जो कार्यक्रम के स्पान्सरों में से एक हैं, ये प्रचार बैनर इसलिए लगाए होंगे ताकि उनकी नई किताबों की बिक्री बढ़े. यह तनिक भी आभास नहीं था कि रमेश पोखरियाल निशंक भी इस कार्यक्रम में आने वाले हैं.

हिंदयुग्म डाट काम वाले शैलेष भारतवासी मिल गए. हिंदी ब्लागिंग के लिए इस शख्स ने काफी खून और पसीना जलाया-बहाया है. हिंदी ब्लागिंग के एक्टिविस्ट रहे हैं शैलेष. इनकी तारीफ में ज्यादा कुछ कहने की बजाय इतना बता दूं कि आउटलुक हिंदी वाले इस अंक में शैलेष भारतवासी की तस्वीर छपी है और उन पर रिपोर्ट भी है. शैलेष संग बतियाता और घूमता रहा. ब्लागर साथियों से परिचय होता रहा. उधर, रविंद्र प्रभात, अविनाश वाचस्पति समेत कई आयोजक लोग मंच को सजाने-संवारने में जुटे रहे. गिरोश बिल्लोरे मुकुल कार्यक्रम को ब्लागों पर लाइव प्रसारित कराने की एक अदभुत व्यवस्था को संयोजित करने व सफल बनाने में जुटे थे. मंच के बैनर से स्पष्ट हुआ कि बिजनौर की हिंदी की एक संस्था के पचास बरस पूरे होने पर यह कार्यक्रम आयोजित किया गया है और इसमें कई किताबों का विमोचन होना है.

शैलेष और मैं कार्यक्रम शुरू होने में देरी देखकर सभागार से बाहर निकल कर चाय पीने चले गए. वहां जिस चाय वाले से शैलेष ने परिचय कराया, उन्हें देखकर दंग रह गया. वे चायवाले नहीं बल्कि साहित्यकार हैं. उनकी लिखी किताबें फुटपाथ पर चाय की दुकान के बगल में सजी थीं, बिक्री के लिए. ठीक पीछे उनके साहित्यकार होने से संबंधित तस्वीरें व बैनर थे. तस्वीरों में चाय वाले साहित्यकार साथी पीएम, राष्ट्रपति समेत कई बड़े लोगों के साथ दिख रहे थे. बैनर पर इनका नाम लिखा देखा- लक्ष्मण राव. इतने बड़े लोगों से मिल चुका और इतनी अच्छी किताबें लिख चुका कोई शख्स चाय बनाकर जीवन चलाता होगा, ये सोचकर देखकर मैं हैरान था. ईमानदारी का नशा होता ही ऐसा है. मन ही मन मैं सोचने लगा कि मुझे ईमानदार नहीं रहना है क्योंकि ईमानदार व्यक्ति तो बहुत ठोकर खाता है, बेचारा चाय बेचने लगता है.

अपनी भावना, मन की भड़ास मैंने अपने एक साथी से शेयर की तो उनका कहना था कि दरअसल ईमानदार व्यक्ति जो जीवन जीता है, उससे कम से कम उसको मलाल नहीं होता, हम आप जरूर चकित होते हैं क्योंकि हम लोगों को लगता है कि सारी सुविधाएं मिलने के बाद ही ईमानदारी के लिए लड़ाई लड़ी जानी चाहिए या ईमानदार बनने का दिखावा करना चाहिए. आम आदमी तो अपनी ईमानदारी को अपनी शख्सियत मान उसे ही जीता रहता है और उसी में वो सारी खुशियां, सारे दुख-सुख पा लेता है जो हम लोग बहुत कुछ भौतिक सुख सुविधाएं पाकर भी नहीं जी पाते, नहीं महसूस कर पाते.

खैर, ये लंबी बहस है. मैं मन ही मन उस बुजुर्ग साहित्यकार साथी लक्ष्मण राव को प्रणाम कर और चाय खत्म कर लौट गया सभागार की तरफ. तब पता चला कि निशंक आने वाले हैं. उनका हवाई जहाज लेट है. फिर पता चला कि लैंड कर गया है. रायपुर वाले पंकज झा, दिल्ली वाले चंडीदत्त शुक्ला, मयंक सक्सेना समेत कई लोग मिलते रहे. जाकिर अली रजनीश, राजीव तनेजा, खुशदीप सहगल समेत कई ब्लागर साथियों से मुलाकात हुई. कई महिला ब्लागर भी वहां पहुंची थीं. कार्यक्रम शुरू होने में देरी होते देख सभागार से फिर बाहर निकला तो निशंक के स्वागत के लिए कई लोग लाइन में लगे दिखे. और अंततः कई गाड़ियों के साथ निशंक आ गए.

उतरते ही कुछ न्यूज चैनल वालों ने उन्हें घेर लिया. जिस प्रोग्राम में शिरकत करने आए थे, उसके बारे में बताने के बाद आगे बढ़े और सभागार में पहुंचे. उनके आते ही कार्यक्रम में तेजी आ गई. स्वागत आदि की औपचारिकता के बाद बिजनौर की साहित्यिक संस्था के पचास वर्ष पूरे होने पर बातचीत शुरू हुई. हम लोग फिर बाहर निकल आए. यह भी बताया गया कि करीब पचास साठ ब्लागरों का सम्मान होना है, उन्हें पुरस्कृत किया जाना है. थोक के भाव ब्लागरों का सम्मान. अच्छा लगा कि चलो ब्लागरों को रिकागनाइज किया जा रहा है. सभागार से बाहर आने के बाद कई ब्लागरों से बातचीत चाय की दुकान पर शुरू हुई. बातचीत में निशंक का भी जिक्र चला. उनके गंगा घोटाले की बात उठी. फिर यह भी कि निशंक से मीडिया वालों को सवाल करना चाहिए की उत्तराखंड के इस नए घोटाले के बारे में उनको क्या कहना है.

यहां मैं एक बात बताना भूल गया. हिंदी भवन के बगल में एक राजेंद्र प्रसाद भवन भी है. उसमें सुलभ इंटरनेशनल वाले बिंदेश्वरी समेत कई लोग एक किताब के विमोचन समारोह में आए थे. मुझे सुरेश नीरव ने सूचित किया था, सो बीच में मैं शैलेष के साथ हिंदी भवन से उठकर राजेंद्र प्रसाद भवन चला गया. वहां चाय-नाश्ता तुरंत मिलने वाला था, इसलिए चाय-नाश्ता मिलने तक रुके और खा-पीकर फिर इधर निकल आए. मैंने शैलेष से बोला कि हम लोग प्रेमचंद की कफन कहानी के नायकों सरीखे हो गए हैं, प्रोग्राम में शिरकत करने के नाम पर पहुंचे और खा-पीकर निकल लिए, बिना किसी को दुआ सलाम किए. शैलेष हंसे.

मैं ऐसे क्षण इंज्वाय करता हूं. ऐसी ही जिंदगी जीता रहता हूं जिसके हर पल में छोटी मोटी शैतानियां, खुशियां, एक्सप्रेसन आदि हों. लगातार गांभीर्य धारण करे रहना, लगातार खुद को क्रांतिकारी इंपोज करते रहना अपन से नहीं होता और ऐसी हिप्पोक्रेसी के मैं खिलाफ भी रहता हूं. मनुष्य बेहद सरल चीज होता है, वह उलझी हुई दुनिया को देखकर खुद बहुत कांप्लेक्स बनता जाता है और अंततः अंदर कुछ और, बाहर कुछ और वाला दो शख्सियत रखने वाला इंसान बन जाता है. पर, हर गंभीर आदमी हिप्पोक्रेट होता है, ऐसा भी नहीं है. कई लोगों की गंभीरता उनके स्वभाव का हिस्सा होता है. वे बचपन से ही वैसा जीवन जीते हैं और वैसे ही व्यवहार करते हैं.

आखिरी बार लौटकर जब हिंदी भवन सभागार जाने लगा तो हिंदी भवन के गेट पर पुण्य प्रसून बाजपेयी दिखे. कुछ छात्रनुमा युवका, पत्रकार नुमा युवक उनसे बतिया रहे थे और पुण्य जी लेक्चर दिए जा रहे थे, बड़ी खबर वाले अंदाज में. उन्होंने कार्यक्रम के आयोजकों को समय का ध्यान न रखने के लिए कोसा. उन्हें कार्यक्रम के दूसरे सत्र, जो ब्लागिंग पर था, के लिए बुलाया गया था. पर आयोजकों को होश ही नहीं था कि पुण्यजी आ गए हैं. और, जब निशंक की बात चली तो पुण्य प्रसून ने कहा कि करप्शन के चार्जेज इन महोदय पर लगे हैं. निशंक के मंच पर बैठे होने की बात को पुण्य प्रसून पचा नहीं पाए. और यह भी किसी ने कहा कि भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे निशंक के हाथों ही ब्लागरों को पुरस्कृत-सम्मानित कराया जाना है. थोड़ी देर बाद पुण्य प्रसून बाजपेयी गेट से अपनी कार की तरफ बढ़े.

तभी खुशदीप सहगल, जो संभवतः जी न्यूज में हैं, गुस्साए हुए आए और बोले कि पुरस्कार वगैरह सब वहीं छोड़ दिया है, इन आयोजकों को इतनी भी समझ नहीं है कि किसके हाथ पुरस्कार दिला रहे हैं. सहगल का गुस्सा इस बात पर ज्यादा दिख रहा था कि पुण्य प्रसून बाजपेयी को ब्लागिंग के कार्यक्रम के लिए बुलाया गया लेकिन किसी ने उन्हें मंच पर बुलाने की जरूरत नहीं समझी. एक तरह से पुण्य प्रसून बाजपेयी और खुशदीप सहगल ने अपना विरोध प्रकट करते हुए वहां से निकल लेने की तैयीर शुरू की और आयोजन को बीच में छोड़कर चले गए.

मैं अंदर का नजारा देखने सभागार में पहुंचा. मंचासीन एक सज्जन, जो कभी अधिकारी हुआ करते थे, माइक पकड़कर ब्लागरों को नसीहत दे रहे थे. तारीफ कर रहे थे. निशंक को बार बार संबोधित कर उन्हें देवेगौड़ा से अपनी नजदीकी का किस्सा सुनाते हुए उनके पीएम बनने पर अलग राज्य बनाए जाने के दौरान की घटना का जिक्र कर रहे थे. उनके कहने का आशय ये भी था कि अलग राज्य उनकी सलाह पर देवेगौड़ा ने बनाया, सो, उसी कारण उत्तराखंड बना, और इस कारण उनका निशंक पर हक बनता है, इसके लिए वे बाद में निशंक से मिल लेंगे. वे यह सब बात थोड़ा हंसते हुए भी कह रहे थे, सो कुछ लोगों ने इसे मजाक माना और कुछ ने इसे पूरी गंभीरता से लिया. और हां, इस अधिकारी महोदय ने भ्रष्टाचार पर इतना भाषण झाड़ा कि लोग बोर हो गए. वे स्विस बैंक में जमा धन को भारत लाने के बारे में तरकीब बता रहे थे, वे यूरोपीय यूनियन के बारे में बता रहे थे. पर उन्हें साहस नहीं हुआ कि वे मंच पर बैठे निशंक से उनके राज्य के घोटालों के बारे में पूछ सकें.

प्रभाकर श्रोत्रिय, रामदरश मिश्र आदि आए और बोले. रामदरश मिश्र ने अपनी उम्र का हवाला देते हुए साफ-साफ बता दिया कि उन्हें ब्लाग के बारे में कुछ नहीं पता, लेकिन इतना पता है कि ये बहुत अच्छा है और हर कोई अपने ब्लाग पर लिखकर अपनी बात सब तक पहुंचा सकता है. प्रभाकर श्रोत्रिय ने ब्लाग में सिर्फ सरोकार, विचार, समाज आदि के बारे में लिखे जाने की बात कही. उनके कहने का आशय ये था कि ब्लाग पर कूड़ा करकट नहीं परोसा जाना चाहिए. कई ब्लागरों ने मन ही मन इस पर आपत्ति दर्ज की. सभी हिंदी साहित्य निकेतन संस्था के पचास वर्ष होने और इसके संस्थापक गिरिराज शरण अग्रवाल को जमकर दुवाएं दीं. गिरिराज शरण अग्रवाल की बड़ी बेटी मंच का संचालन कर रहीं थीं. उनकी छोटी बेटी भी पूरे आयोजन को सफल बनाने में पूरे सक्रियता से जुटी हुई थीं. गिरिराज जी की पत्नी मीना भी अच्छी साहित्यकार हैं, ये बात पता चली. हम जैसे साहित्य के अज्ञानियों के लिए पूरे आयोजन ने ये संदेश जरूर दिया कि ये अग्रवाल कुनबा साहित्य की जमकर सेवा कर रहा है. और, इस परिवार के हर एक सदस्य, यहां तक कि छोटे बच्चों को भी बेहद सक्रिय व सहज देखकर अच्छा लगा.

पूरे आयोजन के दौरान मैं उस वक्त वहां नहीं था जब ब्लागरों को पुरस्कार आदि दिए जा रहे थे, सम्मानित किया जा रहा था. लेकिन बाद में जब कार्यक्रम खत्म हुआ तो देखा कि ब्लागर भाई बहन लोग गदगद हैं, सम्मान पाकर, पुरस्कृत होकर. दो बार दर्शकों के बीच से निशंक को लेकर आवाज उठाई गई, भ्रष्टाचार के बारे में. पर ये आवाज बेहद धीमी थीं, सो मंच तक नहीं पहुंच पाई, हां, अगल बगल वाले लोग जरूर आवाज उठाने वालों को देखने लगे.

दोपहर तीन बजे हिंदी भवन पहुंचा तो रात करीब आठ बजे वहां से घर के लिए निकला जब चाय के लिए ब्रेक हो गया. लौटते वक्त ड्राइव करते हुए सोचता रहा, लंबे जाम में फंसने के बाद गाड़ी बंदकर सोचता रहा, इस धरती पर अरबों खरबों लोग हैं, कोई चोर है, कोई उचक्का है, कोई आम आदमी है, कोई बेईमान है, कोई राजा है, कोई रंक है, कोई त्रस्त है, कोई मस्त है. सबके अपने अपने तर्क और सबके अपने अपने कर्म. कोई किसी को चोर चोर कह रहा है तो कोई चोर चुपचाप अपना काम किए जा रहे हैं और चोरी को चोरी न मान, इसे जीवन का हिस्सा मानकर जिए जा रहा है. कोई चोर दूसरे कथित ईमानदारों को लालीपाप पकड़ा कर अपने गोल में कर ले रहा है और उसे अपना प्रवक्ता बना दे रहा है और वह लालीपाप वाला आदमी अब चोर के चोर न होने के पक्ष में तर्क दिए जा रहा है.

ढेरों बिंब प्रतिबिंब आते रहे जाते रहे. यह भी लगा कि इस सिस्टम में बेहद मजबूरी में ही बड़े चोर पकड़े जाते हैं. कलमाड़ी अभी पकड़ा गया. उसके पहले तक वह सीना ताने खुद को ईमानदार बताता घूम रहा था. और फिर कलमाड़ी ही चोर कैसे. कलमाड़ी ने जो कुछ किया उसे क्या उसके उपर वाले आकाओं ने संरक्षण देकर नहीं कराया. तो फिर चोर सिर्फ कलमाड़ी ही क्यों. वो जो चोरी के स्रोत हैं, वे तो सबसे बड़े ईमानदार बने फिरते हैं और चोरी के खात्मे की मुहिम को सपोर्ट करने की बात कहते हैं.

विचारों, खयालों की दुनिया से निकलकर जब घर पहुंचा तो लगा कि दरअसल इस देश में यथास्थितिवाद ने इस कदर घर कर लिया है कि हर कोई सब कुछ जान बूझकर चुपचाप अपने अपने हिस्से की जिंदगी अच्छे से जिए जाने के लिए कसरत कर रहा है. और पसीना सुखाते वक्त दूसरों की चिंता करने का नाटक करते हुए फिर अपने हिस्से की मलाई की तलाश के लिए दाएं-बाएं सक्रिय हो जाता है. पर यह सच संपूर्ण नहीं है.

राजधानियों के बाहर जंगलों गावों कस्बों छोटे शहरों में जो खदबदाहट है, उसे शायद महानगर वाले महसूस नहीं कर पाते लेकिन एक दिन कोई उन्हीं जंगलों और गांवों और कस्बों और छोटे शहरों से निकल कर जब दैत्याकार महानगरों में आता है तो उसे लगता है कि उसने जो कुछ सीखा जिया वो सच नहीं, सच तो ये है झूठ की दुनिया है जहां आगे बढ़ने के लिए हर पल झूठ के शरणागत होने की मजबूरी है और इसे नकार देने पर तनहाई, परेशानियों, मुश्किलों का अंतहीन दौर है.  और ऐसे ही किसी युवक के हाथों में कभी कोई हथियार आ जाता है, कोई विचार आ जाता है और वो सबको थर्रा देता है.

जंगलों से आती कराह की आवाज, गोलियों की आवाज, सिस्टम के सताये लोगों की आहों की आवाज…. ये बेकार न जाएंगी. कई बार हालात बदलने में देरी होती है, वक्त लगता है, पर इसका मतलब यह नहीं कि सच हार गया. देश से गोरों को भगाने में कई दशक लगे. कई तरह के नेता उगे. कई तरह के विचार आए. तब जाकर जनता गोलबंद हुई. आजादी की लड़ाई शुरू और खत्म होने में सौ साल लगने में केवल दस साल ही शेष रह गए थे.

इस मुल्क में जो नई व्यवस्था की गुलामी पिछले साठ साल से चल रही है, उसे खत्म होने और कोई नई व इससे ज्यादा ईमानदार व पारदर्शी व्यवस्था आने में अभी कुछ वर्ष या कई दशक लग सकते हैं. जरूरत सिर्फ इस बात की है कि हम अपने अपने हिस्से के विरोध को प्रकट करते रहें, नए माध्यमों के जरिए अपनी आवाज उठाते रहें, कभी संगठित होकर सड़क पर आते रहें तो कभी समानता के गीत गाते हुए दूसरों को यह गाना सिखाते रहें.

आज का दिन निशंक के नाम रहा. निशंक को अच्छा कहने वाले भी भारी संख्या में हैं, और उसमें से कई वित्तपोषित हैं. निशंक को बुरा कहने वाले भी बहुत लोग हैं, जिनमें से कई निजी स्वार्थ के कारण उनका विरोध करते हैं. लेकिन निशंक के राज में जिस जिस तरह के घोटाले खुलते रहे हैं और खुल रहे हैं, वे कई सवाल उठाते हैं. निशंक का चरित्र एक तरफ सदाचारी, साहित्यकार और तेजस्वी का चित्रित किया जाता है तो दूसरी तरफ वे बेहद भ्रष्ट, अवसरवादी, सांठगांठ में माहिर बताए जाते हैं.

सच क्या है, ये हम आप पर छोड़ते हैं लेकिन यह याद रखिएगा कि निशंक कोई अंतिम व्यक्ति हमारे आपके बीच में नहीं हैं. यहां दिल्ली से लेकर लखनऊ, पटना, रायपुर तक ढेर सारे निशंक अलग अलग नामों से बैठे हुए हैं. इन राज्यों में अफसर बेहद संजीदगी से भ्रष्टाचार की रणनीतियां बनाकर अपने आकाओं को ओबलाइज कर रहे हैं. आज ही कहीं अखबार में पढ़ा था कि कोर्ट ने नौकरशाहों को फटकारा कि ये लोग सब जानबूझकर गलत काम करते और कराते हैं.

कांग्रेस हो यो भाजपा. निशंक हों या मनमोहन. सबके खाने और दिखाने के दांत अलग अलग हैं. लोग कानूनी तरीके से भ्रष्टाचार करने लगे हैं और पकड़े भी नहीं जाते, सवाल उठाने वालों को ही दौड़ा लेते हैं. बेईमानी में पकड़े जाते हैं छोटे मोटे अफसर. ट्रैफिक सिपाही, स्ट्रिंगर. राडिया के दलाल पत्रकार आज भी महान हैं. कई अपने अपने संस्थानों में विराजमान हैं. और उनके संस्थान इन दिनों भ्रष्टाचार के खिलाफ जमकर लिख बोल रहे हैं. यह हिप्पोक्रेसी ही तो है. यह दिखाने और खाने के अलग अलग दांत ही तो हैं.

ऐसे माहौल में, जब झूठ का दर्शन सच के रूप में कराया जा रहा हो और सच बताने वालों को उनकी कीमत लगाकर भ्रष्टाचारियों के पक्ष में खरीद लिया जा रहा हो, वहां तो लगता है कि अब बस राम राम ही कहा जाए और मान लिया जाए कि होइहें वही जो राम रचि राखा.

जय हो.

अगर आप कार्यक्रम में मौजूद रहे हैं, तो जरूर अपनी प्रतिक्रिया दीजिएगा कि मेरी रिपोर्टिंग में कहां कहां गड़बड़ी हुई है और आप क्या सोचते रहे या सोचते हैं पूरे आयोजन व घटनाक्रम पर.

यशवंत

bhadas4media@gmail.com

… आयोजन से जुड़ी कुछ तस्वीरें …

हिंदी भवन सभागार के ठीक बाहर लगा निशंक की नवप्रकाशित पुस्तकों का बैनर

हिंदी भवन में आयोजन शुरू होने से पहले मंच की तैयारियों का दृश्य

अपनी नई किताब का विमोचन करते उत्तराखंड के मुख्यमंत्री डा. निशंक व अन्य.

संबोधित करते डा. प्रभाकर श्रोत्रिय.

साहित्यकार लक्ष्मण राव और उनकी चाय की दुकान. पीछे उनका बैनर.

साहित्यकार लक्ष्मण राव के बारे में बताते हिंदयुग्म के संपादक शैलेष भारतवासी. लक्ष्मण राव के बगल में उनकी किताबें बिक्री के लिए रखी रहती हैं और पेड़ के सहारे उनकी तस्वीरों का कलेक्शन टिका हुआ.

बड़े बड़े लोगों के साथ खड़े लक्ष्मण राव चाय बेचते हैं, ये भला कोई यकीन कर सकता है.

चाय विक्रेता और साहित्यकार लक्ष्मण राव की किताबें.

हिंदी भवन से निकलकर राजेंद्र प्रसाद भवन पहुंचे तो वहां भी कई लोग मिले. चाय नाश्ता कर वहां से हम लोग निकल आए.

हिंदी भवन के बाहर लक्ष्मण राव की दुकान की चाय पीते शैलेष भारतवासी, पंकज झा, मयंक सक्सेना, चंडीदत्त शुक्ला आदि ब्लागर साथी.

यादों में आलोक : आयोजन की कुछ तस्वीरें

होली के दिन आलोकजी के चले जाने की खबर मिली थी. तब गाजीपुर के अपने गांव में था. रंग पुते हाथों को झटका और चुपचाप बगीचे की तरफ चला गया. न कोई झटका लगा, न कोई वज्रपात हुआ, न कोई आंसू निकले, न कोई आह निकला… सिर्फ लगा कि कुछ अंदर से झटके से निकल गया और अचानक इस निकलने से शरीर कमजोर हो गया है.

भावहीन-सा बैठा रहा, बैठ भी न सका, टहलने लगा, टहल भी न पाया, लेट गया, लेट भी न सका, घर लौट चला, घर में भी न रहा, लैपटाप आन किया, यह भी न कर सका, छत पर गया, वहां भी देर तक न रहा… एक बेचैनी जो लगातार चला रही थी पर जाना कहां है, करना क्या है, यह समझ नहीं पा रहा था. दिल्ली में न होना इतना पहले कभी नहीं अखरा, जितना इस बार दिल्ली से दूर होने की लाचारी महसूस हुई. दिन गुजरते गये. दिल्ली भी फिर पहुंचा. सुप्रिया भाभी से मिला. तेरहवीं हो गई. शोकसभा का भी आयोजन हो गया. और, बिना आलोक की ये दुनिया चलती रही.

मैं भी चलता जीता रहा. पर अब भी मुझे अंदर से कुछ कमी महसूस होती है. जो दिल्ली हम जैसे गांव से आए हुओं को आतंकित करती रहती है, जिस दिल्ली के लोग हम जैसे देहातियों को डराते-धमकाते-फंसाते-समझाते रहते हैं, उस दिल्ली से भयमुक्त होना, उस दिल्ली वालों से निपटने और इस आंतिकत करने वाले शहर के सीने पर पैर गड़ाकर सबको ललकार देने के टिप्स अनजाने में देते रहे आलोक भइया. जिसने अनजाने में इतना कुछ मुझे दिया, उसे मैं क्या दे सका. कुछ नहीं. सिर्फ लेता रहा. उनकी पत्रकारिता के प्रति असीम आस्था, जनता के प्रति अदभुत लगाव, दलालों और लाइजनरों के प्रति अपार गुस्सा… उनके भावों को जहां तक संभव हो सका, उनके लिखे को जहां तक संभव हो सका, कैरी करता रहा. लेकिन मुझे कई बार लगता रहा कि आलोक भइया की स्पीड इतनी तेज है कि भड़ास और मैं, उसे फालो नहीं कर पाते.

लोग जहां सोचना बंद करते हैं, आलोक भइया वहां से लिखना शुरू करते थे. तभी तो वे आलोक तोमर हो गए और जीते जी इतिहास बन गए. उस आलोकभइया के लिए एक आयोजन करना का विचार दिमाग में आया लेकिन अपने स्वाभाविक आलस और दिल्ली में ज्यादा दंदफंद करने से बचकर रहने वाली मानसिकता के चलते आजतक सिवाय भड़ास चलाने के और कुछ कर न पाया. आलोक भइया से बात तय हुई थी, कई बार तय हुई कि भड़ास की तरफ से एक पुरस्कार समारोह किया जाएगा और उसमें ऐसे लोगों को पुरस्कार दिया जाएगा जिन्हें मेनस्ट्रीम मीडिया व मेनस्ट्रीम पुरस्कारदाता रिकागनाइज नहीं करते बल्कि उनके खिलाफ सोचते बोलते हैं पर सच में कहा जाए तो ऐसे लोग साहस और सरोकार के अप्रितम उदाहरण होते हैं. दैनिक जागरण के पत्रकार जरनैल सिंह को एवार्ड देने का तय हुआ था. पर हम लोग कर न पाए. हम लोग नहीं बल्कि मैं कर नहीं पाया क्योंकि करना मुझे था. और यह भी तय हुआ था कि सभी पुरस्कार सिर्फ आलोक तोमर भइया के हाथों दिलाए जाएंगे क्योंकि हम लोगों के वही रोल माडल हैं.

और, पुरस्कार देने के बहाने आयोजनों का जो सिलसिला शुरू होता तो कई तरह के आयोजन करते हम लोग. पर दुर्भाग्य यह कि आयोजन किया तो आलोक तोमर जी के न रहने पर उनकी यादों को सजोने के नाम पर आयोजन किया. जिस पहले आयोजन के हीरो आलोक तोमर को होना था, उस पहले आयोजन के हीरो आलोक तोमर ही थे, पर माहौल जुदा था. उन्हें सशरीर होना था, लेकिन वे सिर्फ तस्वीरों में और लोगों के दिलों में थे. ईटीवी के हिंदी चैनल्स के हेड जगदीश चंद्र को साधुवाद देना चाहूंगा जिनके बार बार कहने और आयोजन की जिम्मेदारियां खुद उठाने का वादा करने के बाद मैं आयोजन की दिशा में बढ़ा. और, ईशमधु तलवार व डा. दुष्यंत ने जिस तरह दिल्ली में आकर कई दिनों तक कैंप करके आयोजन के लिए दिन-रात एक किया, उसी कारण आयोजन सफल हो सका.

किसने क्या बोला, इसे रिकार्ड किया है और जल्द ही वो आडियो इस साइट पर अपलोड किया जाएगा जो करीब तीन घंटे का है. आयोजन की कुछ तस्वीरें यहां दे रहा हूं, जो मैंने खुद अपने मोबाइल से लिए थे. आयोजन में जितने लोग आए, सभी का आभार दिल से कहना चाहूंगा.

और, बताना चाहूंगा कि कल मैंने मदिरा का भरपूर सेवन किया. गया, पटना, जालंधर से आए मित्रों व कुछ दिल्ली के दोस्तों के साथ, जिनकी मिलीजुली संख्या करीब एक दर्जन के आसपास थी, पहाड़गंज के एक होटल में दिल्ली में ड्राइ डे होने के बावजूद डबल रेट में खरीदकर मदिरा सेवन किया गया. और, आयोजन के बाद के जीवन को जीते हुए आलोकजी से जुड़ी दर्जनों ऐसी बातों का वहां जिक्र लोगों ने किया, जिसे कोई मंच से बोल बता नहीं पाया था. और सारी बातों से संदेश सिर्फ एक निकलता था कि एक जमाने में एक आलोक तोमर हुआ करते थे जो थे तो मनुष्य ही लेकिन वे पूरे मनुष्य थे क्योंकि बाकी मनुष्य जिस दंदफंद-गुणा-गणित में पत्रकारीय जीवन के बेसिक मर्म व मूल्यों को धीरे-धीरे तिरोहित करते जाते हैं, उसे आलोक तोमर पूरे जी-जान से जीते थे और इस प्रक्रिया में वे नाकारा मनुष्यों, संस्थाओं और समाज को भी चैलेंज कर डालते थे, सीना तानकर, ताल ठोंककर.

और, कल इसी क्रम में जब देर रात घर लौट रहा था, एक साथी की कृपा से, उनकी कार में सवार होकर तो अचानक जाने कब और कहां रुलाई छूटी तो फिर बंद न हुई. रास्ते भर हुचक हुचक कर रोता रहा. और, बहुत देर बाद जब शांत हुआ तो लगा कि बहुत हलका हो गया हूं, कुछ भरा था अंदर आलोक जी के चले जाने के चलते जो अब निकला है. साथी लोग मनाते रहे, पूछते रहे लेकिन बोलना चाहकर भी बोल नहीं पाता था क्योंकि बोल तो तब निकल पाएंगे जब रुलाई की हूक का लगातार बाहर निकलना रुक पाता. एक तस्वीर मद