ये वीडियो देखने के बाद भी आप कहेंगे कि भारत में कानूनराज है?

: मुंबई पुलिस की क्रूरता का वीडियो : मुंबई से एक साथी ने यह वीडियो भड़ास4मीडिया के पास भेजा है. कुछ मिनट के इस वीडियो के जरिए आप देखकर जान सकते हैं कि अपनी भारतीय पुलिस कितनी बर्बर और अराजक है. दुनिया भर में पुलिसिंग को जनपक्षधर बनाने और न्यूनतम हिंसा के जरिए संचालित किए जाने के प्रयास जोरों पर है. लेकिन अपने देश में पुलिस ने जैसे तय कर रखा हो कि उसे तो सिर्फ डंडे के जरिए ही पुलिसिंग करनी है, बाकी कोई फंडा नहीं सीखना.

करियर ग्रोथ मीटर- चेक ह्वेयर यू स्टैंड!

यह भी एक तस्वीर की कहानी है. मेल के जरिए आए दिन दिलचस्प तस्वीरें इधर-उधर बलखाती टहलती रहती हैं. उसी में एक तस्वीर यह भी है. कहानी सिंपल है. गरीब आदमी का पेट नहीं निकलता क्योंकि वह खटने में ज्यादा वक्त गंवाता है, ठीक से खाने-पीने में कम. और बड़े पद पर बैठे साहब सुब्बा लोग खा-पी कर डकार मारते हुए कुर्सी तोड़ते रहते हैं सो उनका लाद (पेट) निकल जाता है.

राजीव वर्मा और शशि शेखर को टका-सा मुंह लेकर लौटना पड़ा खंडूरी के यहां से!

आजकल जिन मीडिया घरानों के पास कथित रूप से पत्रकारिता का ठेका है, वे पत्रकारों को पत्रकार नहीं बल्कि दलाल बनाने में लगे हुए हैं. वे अपने संपादकों को संपादक कम, लायजनिंग अधिकारी ज्यादा बनाकर रखते हैं. ताजा मामला हिंदुस्तान टाइम्स जैसे बड़े मीडिया हाउस का है. बिड़ला जी के इस मीडिया घराने की मालकिन शोभना भरतिया हैं. उनके हिंदी अखबार के प्रधान संपादक शशि शेखर हैं.

दुख को स्थायी भाव बना चुके एक शराबी का प्रवचन

यशवंत: एक शराबी मित्र मिला. वो भी दुख को स्थायी भाव मानता है. जगजीत की मौत के बाद साथ बैठे. नोएडा की एक कपड़ा फैक्ट्री की छत पर. पक रहे मांस की भीनी खुशबू के बीच शराबखोरी हो रही थी. उस विद्वान शराबी दोस्त ने जीवन छोड़ने वाली देह के आकार-प्रकार और पोस्ट डेथ इफेक्ट पर जो तर्क पेश किया उसे नए घूंट संग निगल न सका… :

शातिर-खुर्राट दलालों का हाथ और एक संवेदनशील पत्रकार की किताब

यशवंत: एक होने वाले आयोजन के बहाने आज की मीडिया पर भड़ास : आज जो जितना बड़ा दलाल है, वो उतना ही धन-यश से मालामाल है. आज जो जितना बड़ा दलाल है, सत्ता-बाजार में उसका उतना बड़ा रसूख है. आज जो जितना बड़ा दलाल है, लालची-तिकड़मी मिडिल क्लास की नजरों में उतना ही बड़ा विद्वान है.

इस पागल, नंगे व खतरनाक शख्स को पुलिस ने मारकर क्या गलत किया?

: देखें सीसीटीवी फुटेज और अन्य वीडियो : सतना (मध्य प्रदेश) की घटना याद होगी. न्यूज चैनलों पर बार-बार दिखाया गया. एक मानसिक रूप से बीमार आदमी को पुलिसवालों द्वारा मिलकर सरेराह पीटा जाना. और इसी के चलते उस आदमी की मौत हो जाना. पिटाई की सीन को जिसने भी देखा, उसने पुलिसवालों को जमकर गालियां दी और देश में अंग्रेजी राज जैसे पुलिस दमन की कल्पना की.

जर्नलिस्टों की ब्लैकमेलिंग के विरोध में पूरी तरह बंद रहा एक कस्बा

यशवंत: मीडिया करप्शन के खिलाफ स्थानीय लोगों का ऐतिहासिक विरोध : बाजारू मंडी में रंडी मीडिया के दलालों के कारण ये दिन देखने होंगे : क्या आपने कभी सोचा था कि एक दिन कोई शहर या कस्बा इसलिए बंद रखा जाएगा क्योंकि वहां के लोग पत्रकारों की ब्लैकमेलिंग से पूरी तरह परेशान हो चुके हैं. मीडिया करप्शन इतना बढ़ जाएगा कि इसके खिलाफ बंद तक का आयोजन होने लगेगा, ऐसी कल्पना किसी ने न की होगी.

एक शराबी का अपराधबोध

: मेरी भोपाल यात्रा (1) : भोपाल से आज लौटा. एयरपोर्ट से घर आते आते रात के बारह बज गए. सोने की इच्छा नहीं है. वैसे भी जब पीता नहीं तो नींद भी कम आती है. और आज वही हाल है. सोच रहा हूं छोड़ देने की.

जो बाजार के आलोचक हैं, उन्हें कोई संपादक नहीं बनाना चाहता

विमल कुमार

: इंटरव्यू : कवि और पत्रकार विमल कुमार : एसपी ने कम विवेकवान और भक्त शिष्यों की फौज खड़ी की, जिनमें से कई आज चैनल हेड हैं : मैं तब यह नहीं जानता था कि मीडिया का इतना पतन हो जाएगा और वह भी सत्ता-विमर्श का एक हिस्सा बन जाएगा : उर्मिलेश और नीलाभ मिश्र, दोनों मुझसे आज भी योग्य हैं : अज्ञेय जी ने शब्दों की गरिमा को, रघुवीर सहाय ने जनता की संवेदना को और राजेंद्र माथुर ने संपादक पद की गरिमा को बचाए रखा :


सच में गद्दारी की स्वामी अग्निवेश ने, बातचीत का वीडियो टेप भी जारी

टीम अन्ना के स्तंभ कहे जाने वाले स्वामी अग्निवेश बुरी तरह फंस गए हैं. उन्होंने फोन पर किपल सिब्बल से जो बातचीत की, वह बातचीत पब्लिक में आ चुकी है. इस बातचीत का आडियो टेप जारी किए जाने के बाद अब वीडियो टेप भी उपलब्ध हो गया है. कपिल से बातचीत में अग्निवेश ने अन्ना और उनकी टीम के लोगों को जमकर कोसा है और सरकार को उकसाया है कि वह इन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करे.

जय जनता, जय अन्ना : दस बज गए हैं लेकिन पार्टी अभी बाकी है

ये आधी जीत है. आधी लड़ाई बाकी है. अगर आप लोगों की अनुमति हो तो ये अनशन तोड़ दूं. हाथ उठाएं. अन्ना के इतना कहते ही रामलीला मैदान में खड़े हजारों हाथ उठ खड़े हुए. तिरंगा झंडा लहराते हुए हजारों लोगों का करीब 13 दिन तक रामलीला मैदान में डटे रहना, सैकड़ों-हजारों लोगों का हर बड़े छोटे शहरों कस्बों में निकलना, सांसदों के घरों को घेरना, राजनीतिज्ञों को गरियाना…

करप्ट लोग चढ़ने लगे अन्ना के मंच पर!

: संदेह के घेरे में आने लगी टीम अन्ना : जिस अन्ना हजारे ने कभी एक करोड़ रुपये का एवार्ड इसलिए लेने से मना कर दिया था क्योंकि वह एवार्ड एक शिक्षा माफिया की तरफ से दिया जा रहा था, उसी अन्ना हजारे ने अपनी आंखों के सामने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के अपने मंच से उसी शिक्षा माफिया को अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए देखा. जी हां, ये शिक्षा माफिया और करप्ट परसन कोई और नहीं बल्कि अरिंदम चौधरी है.

35 में मरना था, 38 का आज हो गया, डेडलाइन अब 40 की कर दी

: मेरा समय और मेरे दिल-दिमाग का आफलाइन स्टेटस : ((कुछ मिनट बाद 26 तारीख आ जाएगी और मैं 38 बरस का हो जाऊंगा. 30 की उम्र में था तो अपनी लाइफलाइन 35 की तय कर रखी थी और 35 का हुआ तो डेडलाइन को 40 तक एक्सटेंड कर दिया. दो साल और मस्ती के दिन. 40 के बाद दुनियादारी और दुनिया से मुक्त होकर कहीं गुमनाम जीवन जीना चाहूंगा… अपने तरीके से. फिलहाल मेरी मनोदशा यह है- ”मैं अन्ना हूं”.))

अन्ना हजारे को अरिंदम चौधरी ने ये क्या-क्या कह डाला!

अरिंदम चौधरी को तो जानते ही होंगे आप लोग. आईआईपीएम के फर्जीवाड़े का जनक और इसके जरिए पैदा हुआ शिक्षा माफिया. प्लानमैन कंसल्टेंसी और प्लानमैन मीडिया जैसी कंपनियों का सर्वेसर्वा. ये महोदय कई भाषाओं में मैग्जीन भी निकालते हैं. मीडिया का अच्छा खासा कारोबार शुरू किया हुआ है. और, ये महोदय दूसरे मीडिया हाउसों को जमकर विज्ञापन भी देते हैं ताकि इनके व्यक्तित्व की चकाचौंध बनी रहे और युवा छात्र-छात्राएं लाखों-करोड़ों रुपये लुटाकर उनके आईआईपीएम में पढ़ने जाएं.

इंडिया गेट टू जंतर-मंतर : अगस्त 2011 – ए लव स्टोरी… कुछ दृश्य

1-वो इंडिया गेट से जंतर-मंतर के बीच किसी चौराहे पर मिली. चेहरे पर खुशी-उल्लास. वही नारे लगा रही थी, जो लोग लगा रहे थे. अत्याचारी बंद करो. भ्रष्टाचार बंद करो. वो छुटकी रोजाना मसाले, सुर्ती, तंबाकू, सिगरेट, चने, मूंगफली बेचती है. उसके साथ उस जैसे कई बच्चे भी यही काम करते हैं. रोज कुआं खोद पानी पीने वाले हैं ये. स्कूल नहीं जाते क्योंकि सांसों की डोर के लिए ज्ञान की नहीं बल्कि चंद सिक्कों की जरूरत होती है.

जनांदोलनों के साथ हूं, इसलिए… मैं अन्ना हजारे हूं – बयान दर्ज करें

मेरे एक मित्र पंकज झा, जो छत्तीसगढ़ भाजपा की मैग्जीन के संपादक हैं, ने सबसे एक सवाल पूछा है- ”जिन लोगों को अन्ना के इस आन्दोलन से काफी उम्मीद है उनसे एक असुविधाजनक सवाल पूछना चाहता हूं कि आखिर आज़ादी के बाद से अभी तक कितने आंदोलन को सफल होते उन्होंने देखा या सुना है? मेरे एक मित्र ने सही कहा कि गर्द-ओ-गुबार थम्हने दीजिए फिर सही तस्वीर देखिएगा.”

अन्ना और मीडिया से आतंकित सत्यव्रत चतुर्वेदी व रमाकांत गोस्वामी का भाषण सुनकर उन्हें सुनाए बिना न रह सका

: आपको पता है कि …लम्हों ने खता की, सदियों ने सजा पाई.. लिखने वाले शायर का नाम? : जब आप सम्मान लेने बुलाए गएं हों तो मौका-ए-वारदात पर पूरे सम्मान के साथ मौजूद रहना चाहिए. किसी को टोकना-टाकना नहीं चाहिए. और, सम्मान पकड़कर प्लास्टिक वाली मुस्कान फेंकते हुए मनेमन मुनक्का मनेमन छुहारा होते हुए अपनी सीट पर लौट आना चाहिए.

नभाटा का हाल : रखने हैं पाव भर के दो इंटर्न, लेकिन नक्शेबाजी सवा कुंतल की

नवभारत टाइम्स वालों ने अपनी वेबसाइट के लिए वैकेंसी निकाली है. दो इंटर्न इन्हें चाहिए. पर इन दो इंटर्न की नियुक्ति के लिए जितना भाषण पेल दिया है, उतना सुन-पढ़ कर तो बेचारे इंटर्न बेहोश हो जाएं, अप्लाई करना तो दूर. नभाटा की वेबसाइट पर संपादक की तरफ से दो इंटर्न की जरूरत से संबंधित जो लेख या विज्ञापन, जो कहिए, प्रकाशित हुआ है, उसे आप भी एक बार पढ़ लें.

प्रोफेशनल हैकरों को दी गई भड़ास4मीडिया के मर्डर की सुपारी!

पिछले चालीस घंटे बेहद तनाव भरे रहे. अब भी हैं. आशंकाएं कम नहीं हुई हैं. हैकरों के DOS और DDOS अटैक को झेलना पड़ रहा है भड़ास4मीडिया को. डीओएस यानि डिनायल आफ सर्विस. डीडीओएस माने डिस्ट्रीव्यूटेड डिनायल आफ सर्विस. दुनिया के कई देशों के हैकर एक साथ मिलकर किसी एक साइट के पीछे पड़ जाते हैं और लगातार अलग अलग आईपी से अटैक करते रहते हैं.

विचार.भड़ास4मीडिया.कॉम के एक लेख पर पत्रकार राहुल के खिलाफ आईटी एक्ट में मुकदमा

बात पुरानी हो चली है. पत्रकार राहुल कुमार ने गरीबों-आदिवासियों-निरीहों के सरकारी दमन से आक्रोशित होकर गृहमंत्री पी. चिदंबरम को संबोधित एक पद्य-गद्य युक्त तीखा आलेख भावावेश में लिख दिया. और उसे हम लोगों ने भड़ास4मीडिया के विचार सेक्शन में प्रकाशित भी कर दिया.

संघियों-भाजपाइयों का बड़ा खेल, फर्जी लिस्ट जारी कर कांग्रेसियों को स्विस बैंक में काला धन रखने वाला बताया!

पिछले तीन चार दिनों से नेट की दुनिया में गजब की हलचल है. विकीलीक्स की तरफ से कथित रूप से जारी एक लिस्ट इधर से उधर फारवर्ड, सेंड, पब्लिश हो रही है. इस लिस्ट को विकीलीक्स द्वारा जारी बताया गया है और इसमें दर्जन भर से ज्यादा गैर-भाजपाई नेताओं के नाम और स्विटजरलैंड के बैंक में जमा उनकी धनराशि के बारे में उल्लेख किया गया है. कल इससे संबंधित एक खबर भड़ास4मीडिया पर भी प्रकाशित हुई.

राजेंद्र यादव का हांफना और निशंक की रचना छापना

यशवंत

हिंदी पट्टी के लोगों में उद्यमिता के लक्षण कहीं दूर दूर तक नहीं होते. सिपाही से लेकर कलेक्टर तक बनने की हसरत लिए बच्चे जवान होते हैं और बीच में कहीं घूसघास के जरिए या टैलेंट के बल पर फिटफाट होकर नौकरी व उपरी कमाई का काम शुरू कर देते हैं और इस प्रकार जिंदगी की गाड़ी टाप गीयर में दौड़ाने लगते हैं.

करोड़ों रुपये हर माह सेलरी पाने वाले इन भारतीय मालिकों को क्या कहें?

आप सबने खबर पढ़ी होगी. भारती एयरटेल के मालिक सुनील मित्तल की सेलरी 70 करोड़ रुपये सालाना तय कर दी गई है. माने, महीने में साढ़े पांच करोड़ रुपये के आसपास वे सेलरी उठाएंगे. जरा सोचिए, साढ़ें पांच लाख नहीं, साढ़े पांच करोड़ रुपये प्रति महीने सेलरी वे पाएंगे. और, अपनी मीडिया इंडस्ट्री में पत्रकारिता की शुरुआत करने वाला कोई होनहार अगर महीने में साढ़े पांच हजार रुपये तनख्वाह पर कहीं रख लिया जाता है तो अपने करियर की शुरुआत को सफल मानता है.

दो दिन, दो आयोजन और मेरी भागदौड़… राजेंद्र यादव से बीएचयू वालों तक…

: राजेंद्र यादव की पीसी और बीएचयू के पूर्व छात्रों की बैठक की नागरिक रिपोर्टिंग :

चिल्लर पार्टी : पैसा हजम कहानी खतम बोलो लड़कों सीताराम…

: बहुत दिन बाद बाबा ने सुनाई बच्चों वाली एक प्यारी-सी कहानी : बाबा बहुत पहले गुजर गए मेरे. शायद कक्षा दस में पढ़ता था. व्रत वाले एक दिन वे पड़ोस के गांव में जा रहे थे कि उसी पड़ोस वाले गांव में अपने एक अनन्य मित्र के घर के दरवाजे पर हार्ट अटैक के कारण गिरे और चले गए. देर रात हम लोग गाजीपुर शहर से गांव लौटे थे. उनका शरीर उसी नीम के पेड़ के नीचे जमीन पर ढककर लिटाया गया था जहां मैं बाबा के साथ उनकी चारपाई पर सोता था.

‘सिंघम’ देखकर पुलिस अफसर कुछ सीखें तो बात बने

: दुनिया जिन महान बेईमान कारपोरेट घरानों, उनके महाबलशाली लुच्चे प्रतिनिधि नेताओं के जरिए संचालित होती है उनका असली दर्शन तो हर बेईमानी व भ्रष्टाचार के जरिए मुनाफा और माल कमाना है. ये लोग लोकतंत्र, सिस्टम व व्यवस्था को जनविरोधी बना देते हैं. ऐसे सड़े हालात में कुछ एक जनपक्षधर लोग कितना झेलते हैं, इसका तीखा प्रदर्शन फिल्म सिंघम में है :

मेरा सवाल और अंबिका सोनी का जवाब, टेप सुनें

सोचिए, चैनल के संपादक लोग लाखों रुपये महीने सेलरी लेते हैं और उनके देश भर में फैले सैकड़ों स्ट्रिंगर एक-एक पैसे को तरसते हैं. इस विषमता, इस खाई, इस विरोधाभाष के कई नतीजे निकलते हैं. चैनलों की रीढ़ कहे जाने वाले स्ट्रिंगर मजबूरन ब्लैकमेलिंग के लिए प्रेरित होते हैं. या कह सकते हैं कि चैनल के लखटकिया संपादक लोग अपने स्ट्रिंगर को जान-बूझ कर ब्लैकमेलर बनने के लिए जमीन तैयार करते हैं.

क्या कोई मुझे हारमोनियम सिखा सकता है?

ये मदद अपील कालम इसी के लिए बनाया था कि पत्रकार साथी अपनी पर्सनल दिक्कतों, जरूरतों, इच्छाओं को खुलकर अभिव्यक्त करें पर हमारी हिंदी पट्टी में ही प्राब्लम है कि हम वैसे तो बड़ी बड़ी बातें करते हैं पब्लिकली, लेकिन जब खुद की बात करने की बात आती है तो सपाट चुप्पी साध लेते हैं. पर मैं तो चुप नहीं रह सकता क्योंकि बोलना और उगलते रहना ही मेरी ताकत है. बड़े दिनों से इच्छा है कि कोई एक वाद्य यंत्र सीख लूं. पर बात आगे बढ़ नहीं पा रही.

भड़ास4मीडिया के प्रदेश-देश-विदेश की खबरों के नए पोर्टल का ट्रायल शुरू

कठिन मेहनत व पक्के इरादे के साथ दूरदृष्टि जरूरी है. सो, मंजिल पाने के लिए समय संग बदलते रहना और अपग्रेड होते रहना चाहिए. इसी कारण कभी सिर्फ पांच हजार रुपये में साल भर के लिए शुरू हुए bhadas4media.com ने बहुत पाया और बदला है. एक और बदलाव सामने है. यह है भड़ास4मीडिया का देश-प्रदेश-विदेश की खबरों का नया पोर्टल. इसे ट्रायल के लिए आज से आनलाइन कर दिया गया है.

निशंक का न्योता- रामदेव उत्तराखंड में सत्याग्रह करें, दिक्कत न होगी

दिल्ली के रामलीला मैदान से पुलिस कार्रवाई के जरिए सत्याग्रह-अनशन खत्म कराके बाबा व उनके भक्तों को बेदखल किए जाने के बाद जो ताजी स्थिति है, उसके मुताबिक रामदेव को सेना के हेलीकाप्टर से हरिद्वार ले जाया जा रहा है.  केंद्रीय गृह सचिव जीके पिल्लई भी बता चुके हैं कि आपरेशन रामदेव के तहत बाबा को हरिद्वार भेजा जाएगा. उधर, बाबा के हरिद्वार पहुंचने की भनक मिलते ही उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के अंदर की राजनीतिक आत्मा जाग चुकी है.

बाबा व भक्तों पर जुल्म के खिलाफ आज ब्लैक डे मनाएं

यशवंत सिंहकुछ काम अन्ना ने किया और काफी कुछ बाबा ने कर दिखाया. अन्ना ने करप्ट कांग्रेसियों पर भरोसा किया और सरकार के झांसे में आ गए तो नतीजा ये है कि उन्हें अब रोना पड़ रहा है, मुद्दा पीछे छूट गया और तेवर पीछे रह गया. शेष है तो सिर्फ फिजूल की बैठकों का दौर और बेवजह की उठापटकों की चर्चाएं.

अयोध्याकांड : पत्रकारिता दिवस यात्रा वाया मच्छर से लिंग तक

यशवंत सिंहपत्रकारिता दिवस आया और चला गया. 29 और 30 मई को जगह-जगह प्रोग्राम और प्रवचन हुए. मैंने भी दिए. अयोध्या में. अयोध्या प्रेस क्लब की तरफ से आमंत्रित था. अपने खर्चे पर गया और आया. लौटते वक्त 717 रुपये अतिरिक्त ट्रेन में काली कोट वाले को दे आया. वापसी का टिकट कनफर्म नहीं हो पाने के कारण रुपये देकर भी ट्रेन में ठीक से सो न सका.

मुख्यमंत्री को ब्लैकमेल करने का आरोप! लखनवी पत्रकार बना उत्तराखंड पुलिस का शिकार

: उत्तराखंड सरकार की मीडिया को पालतू बनाने या परेशान करने की घटिया मानसिकता का विरोध करें : लखनऊ में लाइवन्यूज नाम से न्यूज एजेंसी चला रहे पत्रकार आसिफ अंसारी को उत्तारखंड की पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है. मिली जानकारी के मुताबिक आसिफ अंसारी पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को ब्लैकमेल करने का आरोप है.

”अमर कथा वार्ता” के सभी टेप सभी खबरें एक जगह सुनें-पढ़ें

नीरा राडिया से जुड़े मसले की सबसे पहले डाक्यूमेंट्स के साथ खबर भड़ास4मीडिया ने ब्रेक की. अमर वार्ता टेप कांड से जुड़े सभी टेप सबसे पहले भड़ास4मीडिया डॉट कॉम पर अपलोड हुए. सैकड़ों ऐसी खबरें हैं जिसे भड़ास4मीडिया ने ब्रेक किया. सिर्फ ब्रेक नहीं किया बल्कि साहस के साथ आतंकित करने वाले सचों का खुलासा कर पारंपरिक मीडिया को आइना दिखाने का काम किया. ये पारंपरिक मीडिया उर्फ न्यूज चैनल और अखबार अपने हितों, कारोबार, क्लाइंट आदि के नाम पर पत्रकारिता की मूल आत्मा को मारने का काम करने लगे हैं.

राहुल की राजनीति से मायावती चित!

राहुल गांधी उस भट्टा परसौल गांव के ठीक बगल में बसी दिल्ली में रहते हैं जहां पुलिस-पीएसी वालों ने एक रात हर घर में घुसकर कोहराम मचाया था, बच्चों, बूढ़ों, बीमारों, महिलाओं, युवतियों, युवाओं को पीटा था, पैसा लूटा था, बेइज्जत किया था. राहुल गांधी तक खबर अगले दिन सुबह पहुंच गई होगी. अखबार और टीवी में खबरें आ चुकी थीं. आ रही थीं. उत्पीड़न की दास्तां को बताया जा रहा था.

इस अदभुत जर्नलिस्ट को सलाम कहिए, दुवा करिए

होनहार और तेजतर्रार पत्रकार साथी जयंत चड्ढा दिल्ली में जीवन और मौत से संघर्ष कर रहे हैं. जयंत चड्ढा के बारे में बताया जा रहा है कि वे होश में नहीं आ पा रहे हैं. पिछले महीने की बारह तारीख से वे अस्पताल के बिस्तर पर पड़े हुए हैं. पहले कैलाश हास्पिटल, नोएडा में थे. हालत न सुधरते देख उन्हें एम्स के ट्रामा सेंटर में रखा गया है जहां डाक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए हैं.

राडिया से रिश्ता रखना महंगा पड़ रहा, उपेंद्र राय के खिलाफ सीबीआई जांच शुरू!

उपेंद्र राय: खुलने लगी पोल : ईडी ने सीबीआई को लिखा था पिछले साल पत्र : राडिया का काम कराने के लिए ईडी अधिकारी से मांगा था फेवर और बदले में दो करोड़ देने का किया था आफर : ईडी ने उपेंद्र राय के खिलाफ शिकायती पत्र फिर भेजा सीबीआई के पास : उपेंद्र राय ने आरोपों से इनकार किया और इसे विरोधियों की साजिश करार दिया :

भंगू भाई, पी7न्यूज में किसने भांग मिलाई!

पी7न्यूज राजनीति का अखाड़ा बन गया है. पर्ल के मालिक भंगू ने अपने इस चैनल को लेकर ऐसी भाव-भंगिमा अपनाई है कि दर्जन भर लोग आपस में लड़े मरे जा रहे हैं और भंगू ताली बजा बजा कर मजे ले रहे हैं. अगर ऐसा न होता तो पी7न्यूज अंदरुनी खबरों की वजह से नहीं बल्कि बड़ी खबरें ब्रेक करने के लिए चर्चा में होता. करीब दर्जन भर से ज्यादा बार कंपनियों के नाम बदल बदल कर जनता को लूट लूटकर अरबों खरबों का साम्राज्य खड़ा करने वाले भंगू ने असल में न्यूज चैनल इस मकसद से नहीं शुरू किया कि उन्हें जनता या पत्रकारिता का भला करना है.

ब्लागरों की जुटान में निशंक के मंचासीन होने को नहीं पचा पाए कई पत्रकार और ब्लागर

: गंगा घोटाले को लेकर कुछ लोगों ने आवाज उठाई : पुण्य प्रसून बाजपेयी और खुशदीप सहगल ने किया बहिष्कार : नुक्कड़ समेत कई ब्लाग व ब्लाग एग्रीगेटर चलाने वाले और हिंदी ब्लागिंग को बढ़ावा देने के लिए हमेशा तन मन धन से तत्पर रहने वाले अपने मित्र अविनाश वाचस्पति का जब फोन आया कि 30 अप्रैल को शाम चार बजे दिल्ली के हिंदी भवन (जो गांधी शांति प्रतिष्ठान के बगल में है) में ब्लागरों की एक जुटान है तो मैं खुद को वहां जाने से रोक नहीं पाया.

यादों में आलोक : आयोजन की कुछ तस्वीरें

होली के दिन आलोकजी के चले जाने की खबर मिली थी. तब गाजीपुर के अपने गांव में था. रंग पुते हाथों को झटका और चुपचाप बगीचे की तरफ चला गया. न कोई झटका लगा, न कोई वज्रपात हुआ, न कोई आंसू निकले, न कोई आह निकला… सिर्फ लगा कि कुछ अंदर से झटके से निकल गया और अचानक इस निकलने से शरीर कमजोर हो गया है.

भ्रष्टों को सेवा विस्तार का सिफारिशी पत्र लिखवाने का रेट चालीस लाख!

भारतीय जनता पार्टी में कौन नेता है जो दागी नहीं है? आप अंदाजा लगाते रहिए. शायद ही कोई माई का लाल दूध का धुला मिले. और, ये हालात किसी एक नहीं बल्कि हर बड़ी राजनीतिक पार्टी का है. लेकिन भाजपा की चर्चा इसलिए जरूरी है क्योंकि वे लोग अपने चरित्र, चाल, चेहरा, चलन को लेकर बहुत दावे करते हैं और परंपरा व संस्कृति पर काफी हायतौबा मचाते हैं.

अन्ना की चिट्ठी में सोनिया से सवाल, दिग्गी को फटकार

सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर जज ने करप्शन पर चुप्पी साधने का आरोप लगाते हुए राहुल गांधी को पत्र लिखा तो राहुल ने ऐसा जवाब दिया कि इस जवाब में खुद राहुल फंस गए और उनकी फजीहत होने लगी. अब अन्ना हजारे ने राहुल की मां को लेटर लिख दिया है. इस चिट्ठी में अन्ना हजारे ने ऐसी बातें कहीं हैं जिसका जवाब सोनिया गांधी को देना होगा और यकीन मानिए, सोनिया बोलेंगी तो फंसेंगी. चोरों की सरकार की माता उर्फ संरक्षणदाता तो वही हैं. आइए, पढ़ते हैं, अन्ना ने आखिर लिखा क्या है…

ये है अमर सिंह – शांति भूषण – मुलायम सिंह यादव की बातचीत का टेप, आडियो प्लेयर पर क्लिक करके सुनें

जिस टेप ने भूषण पिता-पुत्र की नींद हराम कर रखी है, पुलिस में शिकायत दर्ज करने को मजबूर किया, फोरेंसिक एक्सपर्ट्स से जांच करवाना पड़ा, और जिस टेप ने अन्ना हजारे की टीम में विभेद पैदा करने की कोशिश की, उस टेप को पहली बार पब्लिकली प्रसारित किया जा रहा है. और यह प्रसारण भड़ास4मीडिया पर आप यहीं सुनेंगे.

राहुल गांधी से ऐसे घटिया जवाब की उम्मीद नहीं थी

यशवंत सिंहराहुल जब दलित के घर जाकर रात में रुकते हैं, वो हीरो बनना नहीं था. राहुल जब यूपी की सड़कों पर गाड़ियों के काफिले के साथ यात्रा करते हैं तो वो हीरो बनना नहीं था. अन्ना हजारे अगर आमरण अनशन कर बैठे और भ्रष्टाचार के खिलाफ हल्लाबोल कर बैठे तो यह इसलिए कर बैठे क्योंकि वो हीरो बनना चाहते थे. बहत्तर वर्ष का आदमी भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सार्थक बिल लाने की मांग करते हुए आमरण अनशन कर देता है और देश भर के लोगों को अपने साथ कनेक्ट कर लेता है, तो यह परिघटना राहुल को पच नहीं रहा.

मायावती के करोड़ों रुपये हवाला के माध्यम से विदेशी बैंकों में जमा है!

बात निकली है तो दूर तलक जाएगी. कभी महाईमानदार माने जाने वाले विजय शंकर पांडेय आज महाभ्रष्ट से संबंध रखने के कारण नप गए और आगे के उनके दिन दुर्दिन में तब्दील होने वाले हैं. सोचिए, विजय शंकर पांडेय जैसे अफसर मायावती के इतने करीब क्यों होते हैं. नीरा यादव और अखंड प्रताप सिंह जैसे महाभ्रष्ट मुलायक के बेहद करीब क्यों होते थे. इसलिए कि खग जाने खग ही की भाषा. बेइमानी करने की चाह रखने वाले अपने आसपास इस काम में दक्ष खिलाड़ी को ही रखते हैं.

शाबास मदन मौर्या, जुग-जुग जियो

[caption id="attachment_20168" align="alignleft" width="170"]मदन मौर्यामदन मौर्या[/caption]एक फोटोग्राफर हैं. मदन मौर्या. दैनिक जागरण, मेरठ में हैं. वरिष्ठ हैं. कानपुर के रहने वाले हैं लेकिन जमाना हो गया उन्हें मेरठ में रहते और दैनिक जागरण के लिए फोटोग्राफरी करते. इस शख्स के साथ अगर आप दो-चार दिन गुजार लें तो आपको समझ में आ जाएगा कि मिशनर जर्नलिस्ट या मिशनरी फोटोग्राफर किसे कहते हैं. इतना खरा और साफ बोलता है कि सुनने वालों को डर लगने लगता है.

बेसहारा होने की राह पर चल पड़ा है सहारा समूह!

यशवंत सिंहभर पेट विज्ञापन दे देकर मीडिया हाउसों का मुंह बंद करने में अब तक सफल रहे सहारा समूह के खिलाफ न जाने क्यों एचटी ग्रुप के अखबार सच्चाई का प्रकाशन करने में लग गए हैं. यह सुखद आश्चर्य की बात है. हो सकता है हिंदुस्तान को सहारा समूह से नए विज्ञापन दर पर बारगेन करना हो या फिर शोभना भरतिया व सुब्रत राय में किसी बात को लेकर तलवारें खिंच गई हों.

एक डिप्रेशनधारी तन-मन की एक्सरे रिपोर्ट

: जीवन दुख ही दुख है! सुख बिलकुल नहीं है!! : आज सुबह से नहीं बल्कि कल दोपहर बाद से ही डिप्रेशन का दौर शुरू हो गया. पी7न्यूज के तीन साथियों का कैलाश हास्पिटल में भर्ती होना और उसमें से एक पत्रकार साथी जयंत चड्ढा का अभी भी बेहोश हालत में होना, नोएडा में दो बहनों का कंकाल में तब्दील हो जाना और एक का मर जाना…, वरिष्ठ पत्रकार शेष नारायण सिंह का हफ्ते भर से अस्पताल में भर्ती रहना, खबरों-सूचनाओं से हिलती-मचलती इस दुनिया को थर्रा देने का दम रखने वाले आलोक तोमर के गुजर जाने पर अब तक यकीन न हो पाना…

कई पत्रकारों की इच्छा- ये खबर भड़ास पर जरूर छापें

आमतौर पर हम लोग जिलों की इंटरनल मीडिया पालिटिक्स से बचते हैं. वजह यह कि हर जिले में कुछ महा भ्रष्ट पत्रकार होते हैं, कुछ भ्रष्ट पत्रकार होते हैं, कुछ कम भ्रष्ट पत्रकार होते हैं, कुछ अवसरवादी पत्रकार होते हैं, कुछेक संतुलित भ्रष्ट व संतुलित ईमानदार पत्रकार होते हैं, कुछ एक बेहद ईमानदार होते हैं और कई सारे मौका देखकर बेईमान और ईमानदार बनते-बदलते रहते हैं. इसी कारण हर जिले में पत्रकारों में आपस में टांग-खिंचव्वल होती रहती है.

हाईकोर्ट, प्रेस क्लब और जंतर-मंतर : एक रोजनामचा

कल दिल्ली हाईकोर्ट गया था. एचटी मीडिया ने जो मानहानि का मुकदमा कर रखा है उसी की तारीख थी. कोर्ट में क्या क्या हुआ और आगे क्या होने वाला है, उसकी जानकारी आप नीचे के वीडियो लिंक पर क्लिक करके देख-सुन सकते हैं. वहां से जब फ्री हुआ तो प्रेस क्लब आफ इंडिया गया. खाना खाने. प्रेस क्लब में नए लोग जबसे चुनाव जीतकर आए हैं तबसे जाना नहीं हुआ.

दो पुराने (आई-नेक्स्ट के दिनों के) लेखों को पढ़ने का सुख

बहुत कम मौका मिलता है पीछे मुड़कर देखने का. लेकिन जब कभी किसी बहाने देखने का अवसर आता है तो कुछ ऐसी चीजें हाथ लग जाती हैं जिसे देखकर मन ही मन कह उठते हैं कि अरे, क्या इसे मैंने ही किया था! खासकर हम पत्रकारों के मामले में अपना पुराना लिखा-पढ़ा और आर्काइव्ड माल देखकर मन खिलखिल खिल जाता है, और खुद की पीठ ठोंक हम कह उठते हैं- वाह, क्या लिखा था. परसों ऐसे ही मेरे खुद को अपने दो पुराने लेख हाथ लग गए. तब आई-नेक्स्ट, कानपुर का संपादक था.

नाच सोनिया नाच, पर देख ले, लग गया है जाम

: सोनिया गांधी को नाचते देखा है? नहीं न, तो लीजिए, यहां पर देख लीजिए : क्रिकेट के बुखार में पूरा देश तप रहा है. भारत जीत क्या गया, देश में मानो 1947 की आजादी सरीखी जश्न शुरू हो गया. क्या नेता, क्या जनता. सब मगन. सब नाचने-झूमने लगे. हद तो तब हो गई जो गंभीर दिखने वाली सोनिया गांधी भी नाचने लगीं. कल दिल्ली के आईटीओ पर भारत की जीत के बाद तिरंगा लहरा रहे क्रिकेट प्रेमियों के जश्न में सोनिया गांधी भी शामिल हो गईं.

बड़ी मनहूस रात है

बड़ी मनहूस रात है. आज दारू नहीं पी. कोई उन्माद-उम्मीद नहीं बची. आलोक भइया का चेहरा घूम रहा है आंखों के आगे. खुद को कमजोर महसूस कर रहा हूं. हम फक्कड़ों के अघोषित संरक्षक थे. अब कौन देगा साहस और जुनून को जीने की जिद. अपने गांव में घर के छत पर अकेला लेटा मैं चंद्रमा के इर्द-गिर्द सितारों में आलोक सर को तलाश रहा हूं. लग रहा है आज चंद्रमा नहीं, आलोक जी उग आए हैं. धरती से आसमान तक की यात्रा खत्म कर हम लोगों को मंद-मंद मुस्कराते दिखा रहे हों…. कि…

बुरा न मानें, होली है संतोष भारतीय जी!

संतोष भारतीय का मैं दिल से इज्जत करता हूं. भड़ास4मीडिया जब मैंने शुरू किया, और उस वक्त ज्यादातर वरिष्ठ पदों पर बैठे लोग इस प्रयोग को हेय नजरों से देख रहे थे, तब संतोष भारतीय ने न सिर्फ इसे सपोर्ट किया बल्कि इसे चलाए रखने को आर्थिक रूप से मदद भी की, एकमुश्त एक वर्ष तक विज्ञापन देकर. जाहिर है, जब कोई चीज चल जाती है तो उसके दस यार प्रकट हो जाते हैं.

मैं राम बहादुर राय, छुट्टा पत्रकार हूं

दरियागंज (दिल्ली) में ”प्रज्ञा” आफिस में कल शाम एक बैठक हुई. प्रभाष न्यास की तरफ से. एजेंडा था मीडिया के हालात पर चर्चा करना और प्रभाष जी की स्मृति में होने वाले आयोजन को फाइनलाइज करना. रामबहादुर राय ने संचालन किया और नामवर सिंह ने अध्यक्षता. बैठक की शुरुआत हो जाने के बाद राम बहादुर राय अचानक उठ खड़े हुए और बीच में बोलने के लिए मांफी मांगते हुए बोल पड़े.

जय हो, अमिताभ ठाकुर जीते

: अंततः मिली पोस्टिंग : ईओडब्लू मेरठ के एसपी बने : अमिताभ ठाकुर मेरे लिए भी एक टेस्ट केस की तरह रहे. इस दौर में जब बौनों का बोलबाला है, क्रिमिनल गवरनेंस का दौर है, पैसे की ताकत व माया है तब कोई अधिकारी निहत्था होकर अपने पर हो रहे अन्याय का मुकाबला करे और जीत जाए, यह तथ्य न सिर्फ चौंकाता है बल्कि कइयों को प्रेरणा भी देता है. अमिताभ ठाकुर को अब तक जिसने भी पढ़ा है, वो मेरी तरह यही मानता होगा कि यह शख्स अपनी कुछ कथित बुराइयों के बावजूद जनपक्षधर और लोकतांत्रिक लोगों के लिए उम्मीद की किरण की तरह है.

भड़ास पर पत्रिका समूह में पाबंदी

गुलाब कोठारी ने पत्रिका अखबार के पहले पन्ने पर जो विवादित संपादकीय लिखा, उसे और उस पर पत्रकारों की तरफ से आई प्रतिक्रियाओं को भड़ास4मीडिया में स्थान दिया जाना पत्रिका प्रबंधन को शायद नागवार गुजरा है. इसी कारण पत्रिका के सभी संस्करणों में भड़ास4मीडिया को खोलने और देखने पर पाबंदी लगा दी गई है. भड़ास4मीडिया वेबसाइट के पैदा होने के बाद अब तक दर्जनों बड़े छोटे संस्थानों ने इसे अपने-अपने यहां प्रतिबंधित किया.

इस भ्रष्ट इंजीनियर के पास तीन हजार करोड़ रुपये हैं, सीबीआई ने छापेमारी शुरू की

: यह इंजीनियर खुद को मुख्यमंत्री का दत्तक पुत्र कहता है : मनी लांडरिंग के इस खेल में एक पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश का एक इंडस्ट्री मिनिस्टर भी शामिल : करोड़ों रुपये देकर पहले भी अपने खिलाफ जांचों को बंद करा चुका है यह इंजीनियर : यह खबर आप शायद सिर्फ यहीं पढ़ रहे होंगे क्योंकि इस वक्त मीडिया के गिने-चुने लोगों को ही यह खबर है कि एक भ्रष्ट इंजीनियर के आवासों और कई राज्यों में बिखरे उसके कालेधन की जांच के लिए सीबीआई ने छापा मार रखा है. इस भ्रष्ट चीफ इंजीनियर का नाम है अरुण मिश्रा.

सबसे तीखा सवाल शाजी जमां का, सबसे घटिया सवाल अनुराधा प्रसाद का

: राडिया वाले पत्रकार पीएम की पीसी में नहीं दिखे : लाचार पीएम मनमोहन की आज बेहद मजबूरी में टीवी चैनलों के संपादकों के साथ आमने-सामने सवाल जवाब की कुछ भड़ासी झलकियां… सबसे शानदार, तीखा और टू द प्वाइंट सवाल पूछा स्टार न्यूज के एडिटर शाजी जमां ने. उन्होंने पूछा कि ये जो पूरा करप्शन है, इसके लिए आप खुद को नैतिक जिम्मेदार मानते हैं या नहीं मानते हैं. इस सवाल ने सबसे ज्यादा मनमोहन को असहज किया और चिरकुटईपूर्ण और अतार्किक सफाई देते नजर आए.

मैं फिर न सो सका, वो सरेराह खूब सोता मिला

आंख खुलने – जगने से ठीक पहले चेतना लौटने के क्रम में अवसाद का भाव मन-मस्तिष्क में था. दिल-दिमाग रो-रो कर कह रहा था, सक्रिय हो रही चेतना-चैतन्यता से, कि तुम, प्लीज, यूं ही कुछ मिनटों पहले जैसे निष्क्रिय पड़े रहो, चुपचाप रहो, सक्रिय न हो, पड़े ही रहने दो,  वो जो भी अवस्था थी, ठीक इससे पहले, अर्द्धमूर्छित-मूर्छित, कथित सोया हुआ, मुझको, मेरे नश्वर शरीर को, बेतुके दिमाग-दिल को, उसी मोड में रहने दो.

”यशवंत, ऐसे सेक्स की पैरोकारी पर अपना इरादा स्पष्ट करो”

”जेएनयू में सेक्स….” शीर्षक से लिखे मेरे लेख पर कई लोगों के कमेंट आए हैं. मैं कुछ उन कमेंट्स का जवाब देना चाहूंगा जिन्होंने मेरे लिखे पर गंभीर आपत्ति जताई और इसके एवज में अपने तर्क पेश किए हैं. इनमें से खासकर 4 कमेंट्स को प्रकाशित करूंगा और इन चारों के सामने अपना पक्ष रखूंगा. ये चार कमेंट्स देने वालों के नाम हैं- श्रीवास्तव एस., अखिलेश, कबीर और प्रकाश. अपना पक्ष रखने से पहले इन चारों लोगों को थैंक्यू कहूंगा कि इन लोगों ने अपनी बात रखने का साहस किया.

ब्लैकमेलिंग के आरोपों में आजतक न्यूज चैनल से निकाले गए भुप्पी

भूपेंद्र नारायण सिंह भुप्पी को आजतक न्यूज चैनल ने ब्लैकमेलिंग के गंभीर आरोपों के कारण चैनल से चलता कर दिया है. भुप्पी पर हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री धूमल से पैसे उगाहने के लिए दबाव बनाने का आरोप है. भुप्पी आजतक का पंजाब, हरियाणा और हिमाचल का ब्यूरो चीफ है. सूत्रों का कहना है कि भुप्पी की आडियो सीडी हिमाचल के सीएम ने आजतक के मालिक अरुण पुरी के पास भेज दिया जिसके बाद चैनल ने फौरन भुप्पी को हटा दिया.

”यशवंतजी, आप भी दलाली में जुट जाते होंगे”

अपने हिंदी पट्टी के साथियों में एक बड़ी परेशानी है. वह यह कि आई-क्यू लेवल ज्यादातर का कम है और तार्किक बात नहीं करते हैं बल्कि इमोशनिया जाते हैं. ये इमोशन हम हिंदी वालों की ताकत भी है और कमजोरी भी. ताकत इस लिहाज से हम दिलवाले होते हैं, हम बुद्धि पर कम, दिल के कहे पर ज्यादा भरोसा करते हैं, सो, ज्यादा इन्नोसेंट होते हैं हम लोग.

पद्मश्री तो इस इलाहाबादी को मिले

[caption id="attachment_19374" align="alignleft" width="73"]एसकेएस गौरएसकेएस गौर[/caption]: पर ये मारे-मारे यहां से वहां भटक रहे हैं : ऐसी खोज कर दी है कि देश की तकदीर संवर सकती है : खोज का पेटेंट भी करा चुके हैं : लेकिन बड़ी कंपनियों की आरएंडडी विंग इन्हें मालिकों तक नहीं पहुंचने दे रही : दर्जनों जगह दिखा चुके हैं करामात : इन दिनों दिल्ली में डाले हुए हैं डेरा : आप सबकी मदद की दरकार है इन्हें :

राडिया रानी ले डूबीं मीडिया(द)लालों के पदम!

: दिल्ली के दलाल संपादकों-पत्रकारों का नहीं हुआ सम्मान : इसी कारण कुछ एक गोबरगणेश हैं हैरान-परेशान : होमोई और जार्ज जैसे मीडिया के असली महारथियों को पदम पुरस्कार मिला : अतीत में पदम एवार्ड पा चुके कई जर्नलिस्टों के नाम राडिया टेपों में आने के बाद इस बार पदम पुरस्कार बांटने में सरकार ने मीडिया को लेकर खासी सतर्कता बरती.

मनहूस जनवरी भीमसेन जोशी को भी ले गया

: पंडित जी की अदभुत गायकी को सुनकर उन्हें श्रद्धांजलि दीजिए… सुनने के लिए नीचे दिए गए लिंक्स पर क्लिक करें… : कुछ जाने क्यों नया साल मनहूस सा लगने लगा है. अतुल माहेश्वरी की मौत से जो शुरुआत हुई तो एक के बाद एक बुरी खबरें ही आ रही हैं. बालेश्वर चले गए. कई पत्रकार साथियों की मौत हुई, कइयों का इलाज चल रहा है तो कुछ के साथ पारिवारिक ट्रेजडी हुईं.

भड़ास4मीडिया में कुछ बदलाव

आक्रामक लाल रंग से आंखें चुभ-सी रहीं थीं. और लाल-लाल देखते-देखते मन एकरस-सा भी हो गया था. हलका ग्रीन, जो आंखों के लिए फ्रेंडली कलर है, को लाया गया है. शुरू-शुरू में ये अजीब लगेगा लेकिन मेरे खयाल से बाद में इस रंग के साथ आंखें एकाकार हो जाएंगी. इस रंग में सबसे खास बात है आखों में न चुभना. इससे आंखों को थोड़ी राहत होगी, खासकर उनके लिए जो दिन भर भड़ास के बुखार में तपते रहते हैं.

टोरेंटो से एक खूबसूरत पत्र, ग़ालिब साहब के बहाने

आजकल मैं हवा में उड़ रहा हूं. कभी कनाडा से पचास डालर की मदद भड़ास के लिए, तो अगले ही पल टोरंटो से मिर्जा ग़ालिब साहब के बहाने एक खूबसूरत पत्र, मेरे नाम. कभी बनारस स्थित काशी विद्यापीठ में मुख्य वक्ता की हैसियत से संबोधन तो कभी पटना में भाजपा नेता सुशील मोदी के हाथों मोमेंटो न लेकर वाहवाही पाने की अनियोजित परिघटना. कभी गली में निकलते ही अचानक किसी का हाथ उठाकर प्रणाम करते हुए बोलना कि सर आप भड़ास वाले हैं ना….

श्रवण गर्ग, कल्पेश याज्ञनिक, यतीश राजावत बताएं

: भास्कर डॉट कॉम की ये कैसी पत्रकारिता! : एक बार दैनिक भास्कर के संपादकीय विभाग के एक वरिष्ठ पत्रकार ने मुझे सलाह दी कि भड़ास4मीडिया बहुत अच्छा है लेकिन बस इसमें जो कमेंट आते हैं उस पर नियंत्रण लगाने की जरूरत है.

आप भी कहें- धन्य है देहरादून का हिंदुस्तान

उत्तराखंड में हिंदुस्तान अखबार द्वारा निशंक की स्तुति जारी है. निशंक की स्तुति के लिए हिंदुस्तान अखबार को बस बहाना भर चाहिए. जमीन धसक जाए और लोग मर जाएं तो बचाव कार्य के लिए निशंक की भूरि भूरि तारीफ करते हुए लोटपोट हो जाता है हिंदुस्तान. अफसर अपनी बैठक करें तो वहां भी निशंक की महिमागान का मौका खोज लेता है हिंदुस्तान अखबार. मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान पत्रकार टर्न्ड पालिटिशियन, कई घपले-घाटालों के सूत्रधार और जनता के जल्द ही कोपभाजन बनने वाले मिस्टर रमेश पोखरियाल निशंक के प्रेम में पागल हिंदुस्तान के देहरादून संस्करण में आज एक घटना की जिस तरह रिपोर्टिंग हुई है, उसे देखने-पढ़ने के बाद तो सिर पकड़ लेने का मन करता है.

नीरा राडिया प्रकरण से जुड़े टेप-खबरें एक जगह सुनें-पढ़ें

नीरा राडिया के टेप और इससे जुड़ी खबरें इस देश के लोकतंत्र को समझने, मीडिया को समझने, कारपोरेट के काम के तरीके को समझने, बड़े स्तरों पर होने वाले खेल-तमाशे के मॉडस आपरेंडी को समझने के लिए बेहद जरूरी है. खासकर जो लोग मीडिया में प्रवेश ले रहे हैं, उन्हें ये टेप जरूर सुन लेने चाहिए, इससे संबंधित खबरें जरूर पढ़नी चाहिए. देश की मीडिया को हिलाकर रख देने वाले राडिया टेप, देश में शीर्ष स्तर पर होने वाले स्पेक्ट्रम घोटाले के रहस्यों की सभी परतों को खोल कर रख देने वाले ये टेप भड़ास4मीडिया पर उपलब्ध हैं.

पुलिस वालों पर हिंदी में दो वेबसाइटें

वेब पर हिंदी की दुनिया तेजी से बढ़ती जा रही है. भड़ास निकालने का दौर तेज हो रहा है. वेब के लोगों ने जनरलाइज न्यूज की बजाय अब स्पेशफिक न्यूज सेक्शन्स को पकड़ा है. मीडिया पर केंद्रित खबरों के कई पोर्टल लांच हो जाने के बाद अब पुलिस-प्रशासन पर केंद्रित पोर्टलों का दौर शुरू हुआ है. भड़ास4मीडिया की बेहद सफलता से प्रभावित होकर एनएनआई वाले उमेश कुमार ने भड़ास शब्द का इस्तेमाल करते हुए भड़ास4पुलिस डॉट कॉम नामक पोर्टल की शुरुआत की है.

चिनगारी उर्फ उनका मरना हमारा रोना…

: अतुल माहेश्वरी – अंतिम निवास और अंतिम यात्रा : दिल्ली के दंदफंद से दूर शांति की खातिर पुराने-नए साल के संधिकाल में नैनीताल गया. बर्फ में खेलने-कूदने-सरकने, पहाड़ों पर घूमने से मिली खुशी नए साल के शुरुआती दो-तीन दिनों में काफूर हो गई. पहली दुखद खबर.

पुराने नए साल के संधिकाल में आपसे एक अनुरोध

नए साल के मौके पर मैंने मीडिया के कई वरिष्ठों और कुछ संभावनाशील दोस्तों-कनिष्ठों को एक मेल भेजा. मेल में ये लिखा था… ”विषय: पुराने नए साल के संधिकाल में आपसे एक अनुरोध, आदरणीय, आपसे अनुरोध है कि बीत रहे साल और आने वाले नए साल को लेकर कुछ सोचें और लिखें. विषय मैं सुझा रहा हूं. बीत रहे साल में सबसे ज्यादा खुशी (उम्मीद, आशा, सकारात्मकता) और सबसे ज्यादा निराशा (अवसाद, अकेलापन, तनाव, नाउम्मीदी) किस चीज से मिली आपको. आने वाले साल में आप वो क्या कुछ करना चाहेंगे जो अब तक नहीं कर पाए, या नए साल में आप निजी और सार्वजनिक जीवन में क्या कुछ करना चाहेंगे. और आखिरी चीज, आपको इन दिनों किस चीज से मोहब्बत है और किससे नफरत है. जीवन के अकारथ बीतने का भाव कितना गहरा या हलका है मन में. क्या कुछ करने की खुशी है जो आपको जीवट बनाती है.

क्या ‘बकचोदी’ वाकई बुरा शब्द है?

एचटी के सीईओ राजीव वर्मा के नए साल के संदेश को प्रकाशित करने के साथ मैंने अपनी जो टिप्पणी लिखी, उससे कुछ लोग आहत हैं. वे आहत इस बात से हैं कि मैंने ‘बकचोदी’ और ‘बौद्धिक मैथुन’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल क्यों कर दिया. अंग्रेजी के एक पत्रकार साथी अश्विनी भटनागर ने और एक किन्हीं महेंद्र कुमार ने अपनी तल्ख टिप्पणी इस पोस्ट पर दी. अश्विनी ने ‘बकचोदी’ और ‘बौद्धिक मैथुन’ जैसे शब्द हटाने का अनुरोध किया जबकि कथित महेंद्र कुमार ने तो मुझे इतना भला-बुरा कहा है कि पढ़कर लगा कि अगर मैं उनके सामने होऊं तो वे मुझे गोली मार दें. खैर, जाके रही भावना जैसी. राजू नाम से एक साथी ने टिप्पणी की है कि उन्हें राजीव वर्मा के पत्र में कुछ गलत समझ में नहीं आया. मैं पहले अश्विनी, महेंद्र और राजू के प्रकाशित कमेंट को नीचे फिर प्रकाशित कर रहा हूं, फिर उसके बाद अपनी बात रखूंगा.

शिबली व विजय की तरफ से हजार-हजार रुपये

ऐसे दौर में जब पत्रकारिता राडियाओं के कारण आम जन की नजरों से गिर चुकी है, तब न्यू मीडिया के लोग फटेहाली में जीते हुए भी मिशन को जिंदा रखे हुए हैं, आगे बढ़ा रहे हैं और इस मिशन के संचालन के लिए किसी पूंजीपति या सरकार के दरवाजे पर दस्तक देने की जगह, दांत निपोरने की बजाय जनता के सामने सीना तान कर चंदा मांग रहे हैं, मदद की अपील कर रहे हैं.

बरखा, वीर और प्रभु के घर छापे क्यों नहीं पड़े

यशवंत सिंह: बूढ़ा और रोबोटिक प्रधानमंत्री जनता की भाषा नहीं, लुटेरे उद्योगपतियों की भाषा बोल रहा है : इस बदले समय में असली पारदर्शिता तभी लाई जा सकती है जब जिम्मेदार पदों पर बैठे सभी लोगों के फोन चौबीसों घंटे टेप किए जाएं और उन्हें सार्वजनिक करते रहने का कानून बनाया जाए : अगर टेप लीक न हुए होते तो क्या राडिया के यहां छापे पड़ सकते थे : नक्कीरन के पत्रकार के घर छापा पड़ सकता है तो दिल्ली के स्वनामधन्य पत्रकारों के यहां छापा क्यों नहीं पड़ा जिनकी एक बड़े खेल में संलिप्तता टेपों के जरिए जगजाहिर हो चुकी है :

विकीलिक्स और विकीपीडिया का मॉडल बनाम भड़ास4मीडिया की चिंता

लखनऊ में एक पत्रकार हैं संजय शर्मा. पहले कुछ मीडिया हाउसों के साथ जुड़कर पत्रकारिता करते थे. बाद में लखनऊ में अपना अखबार शुरू किया, वीकेंड टाइम्स नाम से, समान विचार वाले कुछ लोगों के साथ मिलकर पार्टनरशिप में. पिछले कुछ महीनों के दौरान दो बार लखनऊ जाना हुआ दोनों ही बार उनसे मिला. पहली बार बड़े आग्रह और स्नेह के साथ अपने घर ले गए, खाना खिलाया. अपना आफिस दिखाया. खूब सारी बातें कीं. दूसरी बार वे छोड़ने स्टेशन आए, स्टेशन पर ही हम दोनों ने खाना खाया. आज उनका मोबाइल पर एक संदेश आया. आपके एकाउंट में दस हजार रुपये जमा करा दिए हैं.

कायर, बूढ़े, अटके हुए लोग और ओशो का यह भाषण

यशवंत सिंहमन कुछ खिन्न सा है. सा क्यों, खिन्न है. बल्कि कहूं कि बेहद क्षुब्ध है, तो ज्यादा सही होगा. अंबानी, टाटा, राडिया, बरखा, वीर, प्रभु, मीडिया, टेप लीक, पदमश्री, नैतिकता, पत्रकारिता, दिग्गज, राजनीति, कारपोरेट, भ्रष्टाचार, 2जी स्पेक्ट्रम, कामनवेल्थ, सीबीआई, केंद्र सरकार, दबाव, जांच, नाटक, सुप्रीम कोर्ट, जनता, सत्ता, कारपोरेट, चुप्पी, भ्रष्टाचार, भविष्य, देश, विश्व, मानव…

भड़ास4मीडिया के वीडियो पोर्टल का ट्रायल शुरू

पहले भड़ास ब्लाग Bhadas.BlogSpot.com फिर भड़ास4मीडिया Bhadas4Media.com फिर विचार पोर्टल Vichar.Bhadas4Media.com अब वीडियो पोर्टल. नाम  मीडियाम्यूजिक.भड़ास4मीडिया.काम है. इस पर जाने के लिए आपको पता www.MediaMusic.Bhadas4Media.com टाइप करके इंटर मार देना होगा.

ब्यूरो चीफ के गाने से दुखी हैं उनके अधीनस्थ!

[caption id="attachment_18488" align="alignleft" width="91"]जुहैर जैदीजुहैर जैदी[/caption]जो दुखी आत्मा हैं, वे दुखी ही रहेंगे, चाहे उन्हें बॉस जैसा भी मिल जाए. बॉस अगर कम बोले और कड़क हो तो तुरंत उसे जेलर टाइप कहते हुए अमानवीय करार दिया जाएगा. बॉस अगर नरम हो और सबकी सुनता हो व सबकी राय लेकर काम करता हो तो उसे प्रबंधन में अकुशल मान लिया जाता है, बॉस अगर संगीत का प्रेमी हो और गाहे-बगाहे गाने लगता हो अपने अधीनस्थों के सामने तो दुखी आत्माएं उससे भी दुखी हो जाती हैं. दरअसल दुखी आत्माओं का कोई इलाज नहीं होता. उनका दुख ही यह होता है कि वह उस कुर्सी पर क्यों नहीं हैं जहां आज उनके बॉस बैठे हैं.

हमारे आप जैसे ही थे विद्यार्थीजी

: बस, थोड़े ज्यादा ईमानदार थे, थोड़े ज्यादा साहसी थे : ”विद्यार्थी जी ने अपनी कलम से अंग्रेजी हुकूमत को हिला दिया था. विद्यार्थी जी का जन्म 23 अक्टूबर 1890 में अपने इलाहाबाद स्थित ननिहाल अतरसुइया मोहल्ले में हुआ था. उनके पिता का नाम मुंशी जयनारायण लाल था जो मूल रूप से फतेहपुर के निवासी कायस्थ ब्राह्मण थे. जीविकोपार्जन के लिए वे ग्वालियर रियासत में मुंगावली नामक स्थान पर एक प्राइमरी स्कूल में प्रधानाध्यापक के पद पर कार्यरत थे.

सीधी बात; अरुण पुरी चोर है!

[caption id="attachment_18467" align="alignleft" width="122"]अरुण पुरीअरुण पुरी[/caption]एक वेबसाइट है, स्लेट नाम से. उस पर ग्रेडी हेंड्रिक्स का सुपरस्टार रजनीकांत के उपर लिखा एक आर्टिकल 27 सितंबर 2010 को प्रकाशित हुआ. उस आर्टिकल के पहले दो पैरा को इंडिया टुडे के मालिक अरुण पुरी ने हूबहू उड़ा लिया और उसे 18 अक्टूबर वाले इंडिया टुडे के अंक में अपने संपादकीय के प्रथम दो पैरा के रूप में प्रकाशित कर दिया. कुछ लोगों की नजर इस चोरी पर गई तो उन्होंने कई वेबसाइटों को सूचित कर दिया.

सेक्स, बाबा, पीएम, वेश्या, अफसर, मौत, मानव

यशवंत सिंहनींद की दुनिया में, सपनों की आवाजाही में क्रम नहीं होता. कभी कुछ, कभी कुछ दिखता चलता रहता है. सपने वाले जगे-अधजगे माहौल में बहुत कुछ चलता रहता है पर नींद खुलने के कुछ घंटों बाद बहुत गहरे तक याद नहीं रहता कि सपने में हुआ क्या क्या था, चला क्या क्या था. बिना सपने की अवस्था में हम फिर मशगूल हो जाते हैं अपनी-अपनी खुली आंखों वाली दुनिया में. पर कई बार खुली आंखों वाले सीन को ठेल कर सपनों में ले जाने का मन करता है.

गूंगी-बहरी-अंधी मायावती सरकार के लिए

मेरी मां यूपी के गाजीपुर जिले के नंदगंज थाने में पूरी रात बंधक बनाकर रखी गईं. साथ में विकलांग चाची को भी रखा गया. चाची की बहू को भी. इसके प्रमाण के तौर पर तीन वीडियो दे रहा हूं. वीडियो में एक चौथी बुजुर्ग महिला भी हैं, जो बैठी हैं, वे एक अन्य आरोपी के परिवार की हैं, शायद उसकी मां हैं. इन लोगों ने थाने के अंदर मीडियाकर्मियों को अपना बयान दिया. इसमें सब कुछ बताया.

क्योंकि वो मायावती की नहीं, मेरी मां हैं

[caption id="attachment_18303" align="alignleft" width="309"]: गाजीपुर के नंदगंज थाने के भीतर बिना अपराध जबरन बंधक बनाकर रखी गईं महिलाएं : लाल साड़ी में खड़ी मेरी मां, पैर व कूल्हे में दिक्कत के कारण लेटी हुईं चाची, बैठी हुईं दो स्त्रियों में चचेरे भाई की पत्नी हैं. एक अन्य दूसरे आरोपी की मां हैं.: गाजीपुर के नंदगंज थाने के भीतर बिना अपराध जबरन बंधक बनाकर रखी गईं महिलाएं : लाल साड़ी में खड़ी मेरी मां, पैर व कूल्हे में दिक्कत के कारण लेटी हुईं चाची, बैठी हुईं दो स्त्रियों में चचेरे भाई की पत्नी हैं. एक अन्य दूसरे आरोपी की मां हैं.[/caption]वो मायावती की नहीं, मेरी मां हैं. इसीलिए पुलिस वाले बिना अपराध घर से थाने ले गए. बिठाए रखा. बंधक बनाए रखा. पूरे 18 घंटे. शाम 8 से लेकर अगले दिन दोपहर 1 तक. तब तक बंधक बनाए रखा जब तक आरोपी ने सरेंडर नहीं कर दिया. आरोपी से मेरा रिश्ता ये है कि वो मेरा कजन उर्फ चचेरा भाई है. चाचा व पिताजी के चूल्हे व दीवार का अलगाव जाने कबका हो चुका है. खेत बारी सब बंट चुका है. उनका घर अलग, हम लोगों का अलग. उस शाम मां गईं थीं अपनी देवरानी उर्फ मेरी चाची से मिलने-बतियाने. उसी वक्त पुलिस आई. ये कहे जाने के बावजूद कि वो इस घर की नहीं हैं, बगल के घर की हैं, पुलिस उन्हें जीप में बिठाकर साथ ले गई. चाची व चाची की बहू को भी साथ ले गई. चाची के कूल्हे का आपरेशन हो चुका है. पैर व कूल्हे की हड्डियां जवाब दे चुकी हैं. सो, चलने-फिरने में बड़ी मुश्किल होती है. लेकिन हत्यारोपी मेरा चचेरा भाई है, चाची का बेटा है, सो उन्हें तो पुलिस थाने में जाना ही था.

वीएन राय, ब्लागिंग और मेरी वर्धा यात्रा

[caption id="attachment_18266" align="alignnone" width="505"]विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार के ठीक बगल में लिखे नाम के साथ तस्वीर खिंचवाता मैं.विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार के ठीक बगल में लिखे नाम के साथ तस्वीर खिंचवाता मैं.[/caption]

वर्धा में भले सिर्फ दो, सवा दो दिन रहा, लेकिन लौटा हूं तो लग रहा है जैसे कई महीने रहकर आया हूं. जैसे, फेफड़े में हिक भर आक्सीजन खींचकर और सारे तनाव उडा़कर आया हूं. आलोक धन्वा के शब्दों में- ”यहां (वर्धा में) आक्सीजन बहुत है”. कई लोगों के हृदय में उतर कर कुछ थाह आया हूं. कुछ समझ-बूझ आया हूं. कइयों के दिमाग में चल रहीं तरंगों को माप आया हूं. दो दिनी ब्लागर सम्मेलन के दौरान विभूति नारायण राय उर्फ वीएन राय उर्फ पूर्व आईपीएस अधिकारी उर्फ शहर में कर्फ्यू समेत कई उपन्यास लिखने वाले साहित्यकार उर्फ महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति, ये सब एक ही हैं, से कई राउंड में, मिल-जान-बतिया आया हूं.

चार्जशीट वाली खबर किसी हिंदी अखबार में नहीं

कितना बुरा हाल है हिंदी मीडिया का. अमर उजाला के मालिक के खिलाफ सीबीआई ने चार्जशीट दायर कर दी, और इसकी खबर सभी हिंदी अखबार और न्यूज चैनल पी गए. किसी अखबार में एक लाइन नहीं. अगर कहीं भूले भटके होगी भी तो उसमें अमर उजाला और अतुल माहेश्वरी का नाम न होगा. इंटरनेट पर गूगल व याहू के न्यूज सेक्शन में जब सीबीआई, अंकुर चावला, अतुल माहेश्वरी, चार्जशीट आदि हिंदी शब्दों के जरिए खबरों को तलाशा गया तो कोई रिजल्ट न आया.

नए सर्वर पर शिफ्ट हुआ भड़ास4मीडिया

नये सर्वर पर भड़ास4मीडिया की शिफ्टिंग की प्रक्रिया लगभग पूरी हो गई है. लगभग शब्द का इस्तेमाल इसलिए कर रहा हूं क्योंकि जितनी दिक्कत-अफरातफरी इस बार हम लोगों के हिस्से में आई, उतनी परेशानी कभी नहीं हुई. नए डेडीकेटेड सर्वर को जिस कंपनी ने प्रोवाइड किया है, उस कंपनी के छह शिफ्टों के इंचार्जों ने अपने-अपने तरीके से भड़ास4मीडिया के डाटाबेस को पुराने से नए सर्वर पर लाने की कोशिश की और साइट को रन करने का प्रयास किया. लगभग 40 घंटे साइट शिफ्टिंग में लगे.

24 घंटे तक क्षमा करें, कमेंट करने से बचें

सूचना : भड़ास4मीडिया को डेडीकेटेड सर्वर पर ले जाने की प्रक्रिया आज शाम से शुरू हो जाने के कारण अगले चौबीस घंटों के दौरान यह वेबसाइट कई बार अनुपलब्ध, ब्लैंक या अन-अपडेटेड दिख सकती है. इसके लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं. कई सारी खबरें प्रकाशन के लिए आई हैं, कई बड़ी खबरें प्रकाशन के लिए तैयार हैं. लेकिन सर्वर शिफ्टिंग की प्रक्रिया शुरू हो जाने के कारण इन खबरों को अपलोड कर पाने में असमर्थ हैं क्योंकि अगर अपलोड कर भी दी गईं तो ये खबरें नए सर्वर पर साइट के शिफ्ट हो जाने के बाद नहीं दिखेंगी.

यह खबर पढ़कर आप पर क्या बीतेगी? क्या सोचेंगे?

इस खबर को पढ़ आप स्तब्ध हो सकते हैं. शर्म से सिर झुका सकते हैं. सोच में पड़ सकते हैं. अफसोस करने लग सकते हैं. मुस्करा कर हंस भी सकते हैं. चाहें जो करें, लेकिन खबर को इगनोर नहीं कर सकते.  यह खबर देर तक आपके दिमाग में बैठी रहेगी. भड़ास4मीडिया के पास इस खबर व तस्वीर को एक पाठक ने भेजा है.

डेडीकेटेड सर्वर फाइनल, संकट खत्म

भड़ास4मीडिया फिर फंसा संकट में” शीर्षक से अपनी बात कहने-प्रकाशित करने के बाद करीब 15 घंटे तक मोबाइल व मेल से खुद को दूर रखा. अब जब सारा कुछ देख चुका हूं, तो कह सकता हूं कि रिस्पांस गजब का मिला है. लगने लगा है कि एक बड़ी संख्या शुभचिंतकों, समर्थकों, चाहने वालों की भड़ास4मीडिया के आसपास है जो इसे इसके तेवर के साथ जिंदा रखने के लिए कुछ भी करने को तैयार है.

भड़ास4मीडिया फिर फंसा संकट में

जनसत्ता अखबार जब अपने चरम पर था, सरकुलेशन इतना ज्यादा दिल्ली में हुआ करता था कि मशीनें छापते-छापते हांफ जाया करती थीं तब प्रभाष जोशी जी ने अपने पाठकों से अखबार में संपादकीय लिखकर अपील की थी कि ”जनसत्ता को मिल-बांट कर पढ़ें, अपन की क्षमता अब और ज्यादा छापने की नहीं है”. तब दौर कुछ और था. अब दौर बदल गया है. अखबारों के सरोकार, संपादक व मालिक सब के सब बदल गए हैं. और तो और, पाठक तक बदल गए हैं. या यूं कहें कि भरी जेब वालों को ही सिर्फ पाठक – दर्शक माने जाना लगा है.

दुनिया का नंबर वन मीडिया हाउस बनेगा भास्कर!

: बहुत तेज स्पीड में दौड़ रहा भास्कर समूह : कई एडिशन लांच करने की घोषणा : भटिंडा संस्करण लांच : नागौर व इटारसी एडिशन लांच होंगे : कई लोगों ने ज्वाइन किया : पुरस्कारों,  सेमिनारों व बड़े आयोजनों के जरिए भास्कर ब्रांड को अति-लोकप्रिय बनाने की मुहिम : गैर-मीडिया उद्यमों में भी फहरा रहा है कमाई का झंडा : जागरण समेत सभी मीडिया हाउसों को मात देने का इरादा : दुनिया का नंबर वन मीडिया हाउस बनने का सपना :

इंडिया टीवी को रोल माडल न बनाए आजतक

आजतक में कोहराम मचा हुआ है. बाजारू दर्शकों को मापने के बाजारू यंत्र से लैस बाजारू टामियों ने इस न्यूज चैनल को नंबर दो पर क्या पटका, आजतक में बड़े-बड़ों की थूक सरकी हुई है. जिसे देखो वही नंबर दो से एक पर पुनः आसीन होने के नुस्खे आजमा रहा है, सुझा रहा है, समझा रहा है. टैम वालों की टीआरपी की जो 37वें सप्ताह की सूची जारी हुई है, रेटिंग आई है, उसमें फिर उसी इंडिया टीवी को नंबर एक की कुर्सी पर विराजमान दिखाया गया है जिसे देश के संवेदनशील व पढ़े-लिखे लोग सबसे वाहियात चैनल बताते हैं.

मैं अमर सिंह बनना चाहता हूं!

: इतनी उम्र जी लेने के बाद फिर से ज़िंदगी जीना सीख रहे हैं अमर सिंह : परिवार की खातिर बीते हुए दिन लौटाने की अपील कर रहे हैं : होटल ली मेरीडियन में आयोजित रोजा इफ्तार पार्टी में नहीं दिखे अमर सिंह के बड़े-बड़े दोस्त : अकेलेपन और मुश्किल के इस दौर में मन की हलचल को बयान करने का जरिया अपने ब्लाग को बना रहे हैं :

राजेश ने जान ली नहीं, खुद दे दी

आज दैनिक जागरण, कानपुर के परिसर में जहर खाने वाले राजेश वाजपेयी की मौत हो गई. वे प्रसार विभाग में कार्यरत थे. कोई उन्हें असिस्टेंट मैनेजर पद पर आसीन बता रहा तो कोई सीनियर एक्जीक्यूटिव. कोई कह रहा है कि वे सरकुलेशन मैनेजर की प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या को मजबूर हुए तो कोई उन्हें किसी घोटाले में फर्जी फसाए जाने व हर महीने सेलरी इसी कथित घोटाले के बदले में काटे जाने के चलते दुखी होकर मौत को गले लगाने को कारण बता रहा है.

धरे रह जाते हैं ब्लाग, फेसबुक, ट्विटर, फ्लिकर…

[caption id="attachment_17998" align="alignleft" width="99"]एस. शिवकुमारएस. शिवकुमार[/caption]: ओह, 40 की उम्र में चले गए शिवा! : प्रतिभाशाली फोटोजर्नलिस्ट और ‘बेंगलोर मिरर’ के फोटो एडिटर थे एस. शिवकुमार : 40 की उम्र कोई उम्र नहीं होती. लेकिन कई बार इसी उम्र में अच्छे, प्रतिभाशाली, विचारवान, क्रिएटिव, समझ-सरोकार रखने वाले लोगों को इस दुनिया से चले जाना पड़ता है. जाने कितना कुछ करने की हसरत रखे फोटोजर्नलिस्ट एस. शिवकुमार अचानक चले गए. वे कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे. परिवार में बिटिया और पत्नी हैं. इन दिनों वे बेंगलोर मिरर में फोटो एडिटर के पद पर कार्यरत थे.

बीत जाये बीत जाये जनम अकारथ

[caption id="attachment_17975" align="alignleft" width="184"]गांव में पेड़ पर सोने का सुखगांव में पेड़ पर सोने का सुख[/caption]जीवन के 37 साल पूरे हो जाएंगे आज. 40 तक जीने का प्लान था. बहुत पहले से योजना थी. लेकिन लग रहा है जैसे अबकी 40 ही पूरा कर लिया. 40 यूं कि 40 के बाद का जीवन 30 से 40 के बीच की जीवन की मनःस्थिति से अलग होता है. चिंताएं अलग होती हैं. जीवन शैली अलग होती है. लक्ष्य अलग होते हैं. सोच-समझ अलग होती है.

कोमल यादव पुत्र रघुनंदन यादव पकड़ाए

….ब्रेकिंग न्यूज… ….एक्सक्लूसिव…. …..बड़ी खबर…. ….बिग न्यूज…. ….बड़ा खुलासा…. …विशेष रिपोर्ट…. : कोमल यादव पुत्र रघुनंदन यादव गिरफ्तार कर लिए गए हैं. पकड़ लिए गए हैं. पुलिस ने पकड़ा है. गोरखपुर की पुलिस ने पकड़ा है. जो दर्शक, श्रोता, पाठक अभी अभी इस खबर के साथ जुड़ रहे हैं, इस खबर को पढ़ देख सुन निगल रहे हैं, उन्हें एक बार फिर से बता देते हैं…. कि…

ड्रिंक-डिनर का दौर और एक पत्रकार का दुख

ग्वालियर के एक पत्रकार, जो एक अखबार में सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं, ने आईबीएन7 के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष के कथित फेसबुक एकाउंट पर लोड कई तस्वीरों को ‘सेव एज’ करके अपने एक राइटअप के साथ अटैच कर भड़ास4मीडिया के पास मेल के जरिए रवाना कर दिया. उन्होंने जो कुछ लिखा है, वह यूं है…

महिला पत्रकार ने क्यों की खुदकुशी?

[caption id="attachment_17779" align="alignleft" width="99"]सुप्रियासुप्रिया[/caption]: डिप्रेसन की शिकार थीं सुप्रिया : पहले भी कर चुकी थीं आत्महत्या की कोशिश : इस बाजारवादी व्यवस्था में सब कुछ होने के बावजूद आदमी अकेले है. तनहा है. डिप्रेसन में है. परेशान है. आशंकाओं से भरा है. असुरक्षाबोध से ग्रस्त है. लखनऊ की महिला पत्रकार सुप्रिया योगी की मौत ने शहरी जिंदगी और बाजारीकरण पर सवाल खड़ा किया है. आखिर वो कौन सी व्यवस्था बनाई जा रही है, जिसमें किसी की मनःस्थिति ऐसी हो रही है जिसमें जीने से ज्यादा सुकून मरने में दिखने लगे. ये कैसा सिस्टम है जो आदमी को सब कुछ दे रहा है पर संतुष्टि व खुशी नहीं प्रदान कर रहा.

तीन खबरों का खंडन

: ‘सॉरी’ : भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित तीन खबरों में करेक्शन है. इन करेक्शन को प्रकाशित कराया जा रहा है. इसे खंडन भी समझ सकते हैं. इसे माफीनामा भी मान सकते हैं. जिन तीन खबरों पर कुछ आपत्तियां आईं, पड़ताल करने पर ये आपत्तियां सही पाई गईं. इसलिए यहां करेक्शन दिया जा रहा है. ये तीन करेक्शन इस प्रकार हैं-

लखनऊ में तेरा-मेरा उनका सम्मान

बहुत दिनों बाद लखनऊ आना हुआ. उसी लखनऊ, जहां बरास्ते बनारस पहुंचा था 13 साल पहले, पत्रकार बनने. तब ट्रेनी था, पत्रकारिता का और शहर की जिंदगी जीने का. 13 साल बाद फिर लखनऊ पहुंचा, बरास्ते दिल्ली, एवार्ड लेने. पत्रकारिता का और गंवई स्टाइल में खरी-खरी कहने का.

कैंसर को हराने में जुटे हैं आलोक तोमर

आलोक तोमरप्रख्यात पत्रकार आलोक तोमर इन दिनों कैंसर से लड़ रहे हैं. भ्रष्ट व्यवस्था, भ्रष्ट नेताओं, भ्रष्ट मीडिया दिग्गजों की पोल खोलने वाला यह शख्स, अपनी लेखनी से मानवीय त्रासदियों का खुलासा कर सत्ता-संस्थानों को हिलाने वाला यह आदमी, आजकल अपने मुश्किल दिनों में गुजर रहा है. मानसिक और शारीरिक कष्टों को झेल रहा है. पर हौसला देखिए. कैंसर को मात देने में जुटे आलोक तोमर आज अपने सीएनईबी आफिस पहुंच गए, जहां वे काम करते हैं. यह तब जबकि उनकी कीमियो थिरेपी शुरू हो गई है. कई घंटे उन्हें बत्रा अस्पताल में रहना पड़ता है. कीमियो के दौर से गुजरने के बाद आलोक का आफिस जाने के लिए तैयार होना और आफिस पहुंच जाना बताता है कि अगर अंदर जिजीविषा हो तो बड़े से बड़े दुख भगाए जा सकते हैं. कष्टों को मात दिया जा सकता है.

अंतिम संस्कार गीता कालोनी श्मशान घाट पर

[caption id="attachment_17724" align="alignleft" width="156"]कमलकमल[/caption]नौ महीने से बीमार चल रहे 43 वर्षीय वरिष्ठ पत्रकार कमल शर्मा का शनिवार को निधन हो गया. उनका अंतिम संस्कार रविवार सुबह 11 बजे गीता कालोनी स्थित श्मशान घाट पर किया जाएगा. मोटरसाइकिल से दुर्घटनाग्रस्त होने से उनके पैर में मल्टीपल फ्रैक्चर हुआ था. इससे उबरते ही दो माह बाद उन्हें ब्रेन ट्यूमर हो गया. इसका इलाज चल रहा था. शनिवार दोपहर तबियत खराब होने पर उन्हें लाइफ लाइन, फिर मैक्स बालाजी और अंत में लोक नायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल में ले जाया गया, जहां उनकी मौत हो गई.

बौनों के दौर में बहुत बड़े आदमी थे प्रभाषजी

: जन्मदिन पर आयोजन ने साबित किया : खचाखच भरा था संत्याग्रह मंडप : पंडित कुमार गंधर्व को बहुत सुनते थे प्रभाषजी. मालवा की दाल बाटी को बहुत पसंद करते थे प्रभाषजी. गांधीजी और हिंद स्वराज पर खूब बतियाते और सक्रिय रहते थे अपने प्रभाष जोशी जी. कल तीनों का ही संगम था.

वर्ना कोई नौकरी भी नहीं देगा…

रवीश इस दौर के टीवी जर्नलिस्टों के सुपर स्टार हैं. रिपोर्टिंग तो बहुत सारे टीवी जर्नलिस्ट करते हैं, एंकरिंग तो बहुत सारे टीवी जर्नलिस्ट करते हैं, पर रिपोर्टिंग-एंकरिंग करते वक्त खुद को जनता के साथ कनेक्ट कर-रख पाने का माद्दा बहुत कम लोगों में होता है. ये ‘माद्दा’ नामक बल कोई एक दिन में पैदा होने वाली चीज भी नहीं कि किसी मीडिया ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट के मास्टरजी की घुट्टी से मिल जाए या किसी सीनियर जर्नलिस्ट की संगत से पैदा हो जाए. ये माद्दा नामक चिड़िया आपके ज्ञान, आपके जनजुड़ाव, आपके जन प्रेम, आपके आवारापन-बंजारापन टाइप जीवनानुभव, आपकी सचेत सोच और आपकी चीजों के प्रति जनपक्षधर नजरिए से पैदा होती है और यही ‘माद्दा’ आपको जर्नलिस्ट बनाता है. पर अब न तो मीडिया मालिक को ऐसा माद्दा वाला जर्नलिस्ट चाहिए क्योंकि उनके लिए माद्दा का मतलब धंधा है.

न्यूज चैनल हो तो ‘एनडीटीवी इंडिया’ जैसा

: दो-ढाई घंटे के टीवी दर्शन से उपजी भड़ास कुछ यूं है : बहुत दिनों बाद कल टीवी देखा. बहुत दिनों का मतलब वाकई बहुत दिनों बाद. करीब महीने भर बाद. बच्चा पार्टी गर्मियों की छुट्टी में दिल्ली से बाहर थी तो इस छुट्टियों का मैंने भी सदुपयोग किया और कई ऐसी जगहों पर घूमा, रुका और रहा जहां जाने की तमन्ना पिछले कुछ महीनों से पनप रही थी. क्या घूमा, क्या सोचा, क्या किया, इस पर मौका मिला तो बाद में लिखूंगा लेकिन जो कहना चाह रहा हूं वो ये कि कल जब टीवी देखा, रात करीब साढ़े दस से बारह बजे तक, तो कई न्यूज चैनलों पर घूमता रहा. भारत बंद और धोनी की शादी, इन दो घटनाओं का बोलबाला रहा. ये दोनों घटनाएं जहां नहीं आ रही थीं वहां क्राइम शो चल रहा था, या फिर कामेडी वगैरह. कुल दो-ढाई घंटे की टीवी सर्फिंग के बाद मेरी ये धारणा मजबूत हुई कि देश का सर्वश्रेष्ठ न्यूज चैनल एनडीटीवी इंडिया है. ये मेरी अपनी निजी राय है.

फिर लौटेंगे छोटे से ब्रेक के बाद

कई बार लगने लगता है कि चीजें यूं ही चलती चली जा रही हैं, बिना सोचे-विचारे. तब रुकना पड़ता है. ठहरना पड़ता है. सोचना पड़ता है. भड़ास4मीडिया को लेकर भी ऐसा ही है. करीब डेढ़-दो महीने पहले भड़ास4मीडिया के दो साल पूरे हुए, चुपचाप. कोई मकसद, मतलब नहीं समझ आ रहा था दो साल पूरे होने पर कुछ खास लिखने-बताने-करने के लिए. पर कुछ सवाल जरूर थे, जिसे दिमाग में स्टोर किए हुए आगे बढ़ते रहे, चलते रहे. पर कुछ महीनों से लगने लगा है कि जैसे चीजें चल रही हैं भड़ास4मीडिया पर, वैसे न चल पाएंगी. सिर्फ ‘मीडिया मीडिया’ करके, कहके, गरियाके कुछ खास नहीं हो सकता. बहुत सारे अन्य सवाल भी हैं.

हरीश पाठक, अब सुधर जाइए

राष्ट्रीय सहारा, पटना में स्थानीय संपादक द्वारा डांटे जाने के बाद अत्यधिक तनाव के चलते अचानक एक जर्नलिस्ट के बेहोश होने की घटना के बारे में कई नए तथ्य पता चले हैं. भड़ास4मीडिया की जांच से खुलासा हुआ है कि इस घटनाक्रम के लिए पूरी तरह जिम्मेदार स्थानीय संपादक हरीश पाठक हैं. संतोष चंदन, जो कुछ महीने पहले तक दिल्ली में सहारा समय न्यूज चैनल के हिस्से हुआ करते थे, अपनी मर्जी से पटना गए और अपनी मर्जी से टीवी की बजाय प्रिंट को चुनकर उसके हिस्से बने. ऐसा पत्रकारीय समझ और बेहतर काम करने की इच्छा-तमन्ना-भावना के कारण.

कुत्ते भी डांस देखने आए थे

गांव से लौटा (4) : गांव के लोग नाचते कैसे होंगे? मैं भी तो गांव का ही हूं. शहर में अब ज्यादा वक्त गुजरता है, टीवी देख लेता हूं, फिल्में देखता हूं, सो मटकने के कुछ दांव-पेंच दिमाग में घुस जाते हैं और मौका मिलने पर उन दांव-पेचों का मुजाहरा कर देता हूं. लेकिन प्रोफेशनल डांसर तो हम लोग हैं नहीं. सो, सिवाय कमर मटका कर हाथ पांव लहराने के, और कुछ नहीं आ पाता. परिवार में एक बच्चे के मुंडन का समारोह था. खाने-पिलाने के बाद लोगों ने नाच की व्यवस्था कर रखी थी.

यहां बकरियां भी ताड़ी पीती हैं

गांव से लौटा (3) : गांव गया तो गांव से भागा नहीं. दुखी मन से दिल्ली लौटा. दिल में दबी आवारगी की हसरत जो पूरी हुई. लोग कहते हैं कि शहर में आवारगी भरपूर होती है लेकिन मुझे तो लगता है कि आवारगी के लिए गांव ज्यादा अच्छे अड्डे हैं. आवारगी बोले तो? अरे वही, पीना, खाना, नाचना, गाना, मन मुताबिक जीना. शहर में बार, माल, कार में बैठकर दारू पीने से ज्यादा अच्छा है गांव में पेड़ के नीचे बैठकर ताड़ी पीना. जितनी भयंकर गर्मी पड़ती है उतनी ही ज्यादा मात्रा में ताड़ी का धंधा चलता है.

गौतम बुद्ध वाली बुढ़िया

[caption id="attachment_17557" align="alignleft" width="241"]दिल्ली में जख्मी शराबी युवकदिल्ली में जख्मी शराबी युवक[/caption]गांव से लौटा (2) : गरीबी और गर्मी दिमाग में अभी तक हलचल मचाए हैं. गांव जाने और गांव से लौटने के बीच कई दृश्य ऐसे दिखे जिससे मन बेचैन होता गया. हालांकि बेचैनी कुछ लोगों के जीवन का सहज स्वभाव है पर मन को दुखी करने वाली घटनाओं-दृश्य से अवसाद की ओर यात्रा शुरू हो जाती है. गांव में एक बूढ़ी महिला दिखी. कमर झुकी हुई. लाठी ले ठक ठक कर चलती हुई.

स्प्रिट पीती लड़कियां

गांव से लौटा (1) : पिछले दिनों गांव गया था. ढेर सारी चीजें-अनुभव-खट्टे-मीठे संस्मरण साथ लेकर दिल्ली वापस आया हूं. पर सबसे ज्यादा हतप्रभ मैं लौटते वक्त वाराणसी रेलवे स्टेशन पर हुआ. ‘गरीब रथ’ ट्रेन पकड़ने के लिए प्लेटफार्म पर पहुंचा तो गाड़ी स्टेशन पर लगने में देरी को देखते हुए प्लेटफार्म पर टहलने लगा. दो गरीब बच्चियां, जो स्टेशन पर कूड़ा-बोतल आदि बीनने का काम करती हैं, प्लेटफार्म पर एक जगह बैठे हुए आपस में बतियाने में जुटी हुईं थीं. उत्सुकता वश मैं उनके पास पहुंचा. जामुन खरीदकर खा रहा था मैं.

स्टेटमेंट की जगह लीगल नोटिस

कहते हैं कि अगर कहीं अंदर ही अंदर कुछ हो रहा होता है तभी उसका बाहर जोरदार खंडन किया जाता है. पर्ल ग्रुप के न्यूज चैनल पी7न्यूज में सब कुछ सामान्य नहीं चल रहा है. पर प्रबंधन बाहर यह जताने-दिखाने की कोशिश कर रहा है कि सब ठीक है. इसी क्रम में पर्ल ग्रुप व पी7न्यूज के लिए काम करने वाली एक लीगल फर्म ने अपने ‘क्लाइंट्स’ की तरफ से एक नोटिस जारी किया है.

राजेंद्र कभी नहीं रहे शशि के आदमी!

राजेंद्र तिवारीकहानी दिलचस्प होती जा रही है. जिस राजेंद्र तिवारी को शशि शेखर ने संस्थान के साथ दगाबाजी व विश्वासघात का आरोप लगाकर अचानक झारखंड के स्टेट हेड पद से हटाकर चंडीगढ़ पटक दिया, उस राजेंद्र तिवारी के बारे में सबको यही मालूम है कि उन्हें हिंदुस्तान में लेकर शशि शेखर आए थे. शशि शेखर के ज्वाइन करने के बाद राजेंद्र तिवारी ने हिंदुस्तान ज्वाइन किया, यह तो सही है लेकिन यह सही नहीं है कि राजेंद्र तिवारी को शशि शेखर हिंदुस्तान लेकर आए. हिंदुस्तान, दिल्ली में उच्च पदस्थ और शशि शेखर के बेहद करीब एक सीनियर जर्नलिस्ट ने भड़ास4मीडिया को नाम न छापने की शर्त पर कई जानकारियां दीं. इस सूत्र ने भड़ास4मीडिया को फोन अपने मोबाइल से नहीं बल्कि पीसीओ से किया क्योंकि उसे भी डर है कि कहीं फोन काल डिटेल निकलवा कर और विश्वासघात का आरोप लगाकर उसे भी न चलता कर दिया जाए.

तो इसलिए गाज गिरी राजेंद्र तिवारी पर!

कभी गंभीर-गरिष्ठ साहित्यकारों के हवाले थी पत्रकारिता तो अब सड़क छाप सनसनियों ने थाम ली है बागडोर : झारखंड के स्टेट हेड और वरिष्ठ स्थानीय संपादक पद से राजेंद्र तिवारी को अचानक हटाकर चंडीगढ़ भेजे जाने के कई दिनों बाद अब अंदर की कहानी सामने आने लगी है. हिंदी प्रिंट मीडिया के लोग राजेंद्र पर गाज गिराए जाने के घटनाक्रम से चकित हुए. अचानक हुए इस फैसले के बाद कई कयास लगाए गए. पर कोई साफतौर पर नहीं बता पा रहा था कि आखिर मामला क्या है. लेकिन कुछ समय बीतने के बाद अब बातें छन-छन कर बाहर आ रही हैं.

पीएम की पीसी में भी फिक्सिंग?

मानवाधिकारवादियों से दुखी आलोक मेहता ने निकाली भड़ास : जापानी जर्नलिस्ट ने पीएम को दिया उलाहना : उन वरिष्ठ पत्रकारों के दिल से पूछिए जिन्होंने बड़े-बड़े अखबारों-पत्रिकाओं में कई दशक गुजार दिए पर उन्हें आज पीएम की विज्ञान भवन में हुई पीसी में इसलिए सवाल नहीं पूछने दिया गया क्योंकि वे फ्रीलांसर के रूप में काम करते हैं. इन वरिष्ठ पत्रकारों ने ऐतराज भी जताया. चिल्लाए भी. प्रधानमंत्री जी का ध्यान भी आकृष्ट कराया.

जरूरत है कुछ ऐसे नौजवानों की जो….

[caption id="attachment_14676" align="alignleft" width="85"]यशवंत सिंहयशवंत सिंह[/caption]झूठ से पटे बाजार, भ्रष्टाचारियों से भरी व्यवस्था और मुर्दा शांति से युक्त मीडिया से दो-दो हाथ करने वाले लड़ाकों की तलाश : 60 हजार करोड़ रुपये के घोटाले की जब वरिष्ठ पत्रकार एमजे अकबर चर्चा करते हैं तो कई लोग आंखें फाड़ कर इसे सुनते-पढ़ते हैं. कुछ लोग सवाल पूछते हैं कि आखिर इस घोटाले की चर्चा नेशनल मीडिया, कारपोरेट मीडिया, दिग्गज मीडिया हाउस क्यों नहीं कर रहे?

एनडीटीवी और एचटी का क्या स्टैंड होगा?

बरखा दत्त और वीर संघवीराडिया राज 4 : करोड़ों रुपये के टेलीकाम घोटाले से संबंधित सरकारी दस्तावेज में बरखा दत्त और वीर सांघवी का नाम नीरा राडिया के लिए लाबिंग करने वालों के रूप में आने के बाद इन दिग्गज पत्रकारों के मीडिया हाउस क्या रवैया अपनाते हैं, यह भी देखा जाना बाकी है. बरखा दत्त एनडीटीवी की ग्रुप एडिटर हैं तो वीर सांघवी हिंदुस्तान टाइम्स के संपादकीय सलाहकार. इन दोनों बड़े मीडिया हाउसों के लिए बरखा और वीर का नाम टेलीकाम घोटाले से जुड़ना परेशानी पैदा करने वाला है. पर क्या अभी तक इन संस्थानों को अपने इन पत्रकारों की भूमिका के बारे में पता नहीं है? जो दस्तावेज मीडिया सर्किल में घूम रहे हैं, वे इन संस्थानों के संचालकों तक अभी नहीं पहुंचे हैं? या फिर इन मीडिया हाउसों को ये उम्मीद है कि उनके इन दिग्गज चेहरों के बारे में खुलासा कहीं नहीं होगा और ये मामला दब कर रह जाएगा? जो भी हो, लेकिन अब बरखा और वीर के नाम सार्वजनिक होने के बाद एनडीटीवी और एचटी प्रबंधन पर दबाव बढ़ेगा.

पुण्य प्रसून को पता था बरखा-सांघवी का नाम?

बरखा दत्त और वीर संघवीराडिया राज 3 : पर अपने ब्लाग में नीरा राडिया और घपले-घोटाले से संबंधित पोस्ट में इन दिग्गज पत्रकारों के नामों का उल्लेख नहीं किया : पुण्य प्रसून बाजपेयी देश के बड़े पत्रकारों में शुमार किए जाते हैं. बेबाकी से बोलने-लिखने के लिए जाने जाते हैं. मीडिया के अंदर रहते हुए भी मीडिया की गलत दशा-दिशा पर आवाज उठाने के लिए जाने जाते हैं. जनपक्षधर पत्रकारिता करते हुए सत्ता और सिस्टम की नालायकी पर प्रहार करते रहते हैं. पर इस बार वे जाने क्यों चुप रह गए. टेलीकाम घोटाला प्रकरण की बात दस्तावेजों के सहारे करते हुए बरखा दत्त और वीर सांघवी के नाम छुपा गए. उन्होंने अपने ब्लाग पर 3 मई को एक पोस्ट प्रकाशित की. शीर्षक है ‘कारपोरेट के आगे प्रधानमंत्री बेबस’. इस पोस्ट में पुण्य प्रसून ने आयकर महानिदेशालय के गुप्त दस्तावेज की कुछ तस्वीरें भी लगाई हैं. उन्होंने नीरा राडिया के पूरे खेल के बारे में विस्तार से लिखा है. टाटा से नीरा राडिया के बात करने के बारे में लिखा है.

बरखा और वीर सांघवी को जवाब देना होगा

बरखा दत्त और वीर संघवीराडिया राज 2 : देश के हजारों पत्रकारों के रोल माडल बरखा दत्त और वीर सांघवी के उपर जो आरोप हैं, वे बेहद संगीन किस्म के हैं. नीरा राडिया के खेल में इन लोगों के शामिल होने के संकेत सरकारी दस्तावेजों से पता चलते हैं. अभी तक इन दोनों के नामों की सिर्फ चर्चा भर थी कि ये लोग भी टेलीकाम घोटाले में किसी न किसी प्रकार से शामिल बताए जाते हैं. दिल्ली की मीडिया सर्किल में इन दोनों नामों को पिछले कई हफ्तों से उछाला जा रहा था. पर भरोसा नहीं होता था कि ये नाम भी किसी न किसी रूप में इसमें शामिल होंगे. अब जबकि दस्तावेज हाथ लग चुके हैं और मीडिया के कई लोगों के पास ये दस्तावेज पहुंच चुके हैं, बरखा दत्त और वीर सांघवी के नाम इस प्रकरण के दागदार चेहरे के रूप में ब्लागों-पोर्टलों पर दर्ज होने लगे हैं. कल को यह प्रकरण अन्य मंचों-माध्यमों पर भी उठेगा. सबकी निगाह बरखा दत्त और वीर सांघवी पर होगी. उन्हें इस बारे में क्या कहना है?

बरखा दत्त और वीर सांघवी के दामन दागदार

[caption id="attachment_17400" align="alignleft" width="156"]बरखा दत्त और वीर संघवीबरखा दत्त और वीर संघवी[/caption]राडिया राज 1 : मशहूर पत्रकार बरखा दत्त और वीर सांघवी के दामन दागदार हो गए दिखते हैं. केंद्रीय संचार मंत्री पद पर ए. राजा को काबिज कराने व संचार मंत्रालय से कारपोरेट घरानों को लाभ दिलाने के मामले में जिस माडर्न दलाल नीरा राडिया का नाम उछला है, उसकी फोन टेपिंग से पता चला है कि उसकी तरफ से बरखा दत्त और वीर सांघवी ने भी राजा को मंत्री बनाने के लिए शीर्ष कांग्रेसियों के बीच लाबिंग की. आयकर महानिदेशालय के जो गुप्त दस्तावेज इन दिनों मीडिया सर्किल में घूम रहे हैं, उसके पेज 9 पर एक जगह लिखा है- On Mrs. RAdia’s & Kanirozhi’s behalf Barkha Dutt & Vir Sanghvi were negotiating for ministerial birth DMK member especially Raja with Congress members. आगे यह भी लिखा है- Some close associates of Mrs. Radia in relation to this work are, Tarun Das, Vir Sanghavi and Sunil Arora IAS officer Rajasthan Cadre.

दारू की दरिद्रता

गांधीजी के दर्शन को विजय माल्या ने किस तरह धंधे में तब्दील किया है और हम सब इसे कैसे ”ग्रेट सोल्यूशन” मानते हुए सेल्यूट कर रहे हैं, गांधी दर्शन का बैंड बजा रहे हैं, इसके बारे में बताने के लिए सिर्फ यह तस्वीर ही काफी है. यह तस्वीर मेल के जरिए आजकल दोस्तों से आंखें दो-चार कर रही है. कई बार कई लोगों को लगता है कि यह दारू सही है पर क्यों सही है? अगर दारू लड़ने का जज्बा पैदा करे, हार न मानने का रास्ता बताए तब तो कह सकते हैं कि ये कुछ-कुछ ठीक है पर अगर दारू दिमाग में चल रही समस्याओं को ही खत्म कर दे तो फिर दारू से बुरी कोई चीज नहीं है.

जहां नारी मारी जाए, नीरू मारी जाए

नीरू की मौत (16) : निरुपमा की कुछ और तस्वीरें मिली हैं, खिलखिलाती, घूमती, फोटो खिंचाती, चहंकती नीरू दिख रही है इन तस्वीरों में. पर जाने किसकी नजर लग गई उसे. जरा देखिए.

नीरू, हम सब तुम्हें प्यार करते हैं

नीरू की मौत (14) : इन तस्वीरों से जाहिर है कि जाने कितने सपने देखे थे उसने : मौत का बदला इस समाज से लिया जाना चाहिए : प्रेम करने वालों को खूंखार परिवार, परिजन, समाज, पिता, भाई, रिश्तेदार से बचाना होगा :

मुर्दा समाज देखे शव में तब्दील नीरू की तस्वीर

[caption id="attachment_17343" align="alignleft" width="71"]शव में तब्दील नीरूशव में तब्दील नीरू[/caption]नीरू की मौत (4) : इस मरी हुई निरुपमा को देखिए. कोडरमा के अस्पताल में चिरनिद्रा में बेसुध सोई हुई निरुपमा को देखिए. पत्थदिल इंसान भी इसकी कहानी सुन-पढ़कर पिघल जाएगा. पर हमारा मुर्दा समाज और मुर्दा परंपराएं जिंदा रहेंगी. इन्हें मौत न आएगी. देखिए-देखिए. किस तरह बेजान, अकेले, निष्प्राण, शांत पड़ी हुई है यह लड़की.

36 की उम्र में शाद चले गए

मैं शाद का कोई परिचित नहीं हूं. उनके जिला-जंवार, प्रांत का रहने वाला नहीं हूं. उनके मजहब का भी नहीं हूं. पर शाद अपने जैसे लगते हैं. जिला मुंगेर प्रांत बिहार के शाद दिल्ली में सरकुलेशन देखते थे. दी संडे इंडियन से चौथी दुनिया में आए थे. बड़े पद व पैसे में. नेशनल सरकुलेशन इंचार्ज बनकर. नौजवान शख्स. सिर्फ 36 वर्ष उम्र. सुबह जल्दी आफिस जाने की हड़बड़ी सबमें होती है. उनमें भी थी. नहाने के लिए वे बाथरूम गए. पानी नहीं आया तो तौलिया लपेटे छत पर चले गए टंकी देखने.

दिल्ली में वो चार ‘लड़कीबाज पत्रकार’ कौन हैं?

फेसबुक पर अजीत अंजुम

अजीत अंजुम ने अभी-अभी स्पष्ट किया है कि ये चार ‘लड़कीबाज’ लोग संपादक स्तर के नहीं हैं, पत्रकार हैं और न्यूज चैनलों में मध्यम स्तर पर कार्यरत हैं. अजीत अंजुम का कहना है कि ‘लड़कीबाज संपादक’ शब्द लिखे जाने से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि कास्टिंग काउच के आरोपी एडिटर रैंक के हैं जबकि ऐसा है नहीं. अजीत अंजुम के मुताबिक वे फेसबुक पर भी अपने स्टेटस में यह अपडेट डालने जा रहे हैं कि लड़की ने जो नाम बताए हैं, वे नाम संपादक स्तर के लोगों के नहीं है. वे मध्यम स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों के नाम हैं. अजीत अंजुम द्वारा नई जानकारी देने के बाद अब इस खबर के शीर्षक में ‘लड़कीबाज संपादक’ हटाकर उसकी जगह ‘लड़कीबाज पत्रकार’ लिखा जा रहा है. -एडिटर

आईबीएन7 में ‘लौंडा’ कहने पर लड़ाई

अखबारों और चैनलों के दफ्तरों में काम करने वालों के बीच कहासुनी आम बात है लेकिन इन ‘कहासुनियों’ से कई बार हम अपने समय और समाज के चरित्र को भी विश्लेषित कर पाते हैं. सामंती समाज से निकले हुए तलछट किस्म के अवशेष जब मीडिया के हिस्से बनते हैं तो अपने हिप्पोक्रेटिक चेहरे के बावजूद वे कई बार ओरीजनल रूप-स्वरूप में सामने आ जाते हैं और फिर उसी समय वे वहीं पर पकड़ लिए जाते हैं. एक न्यूज चैनल है आईबीएन7. इसके फिल्म सिटी स्थित मुख्यालय की कहानी है.

ऐ सर्किट, पिस्टल-पैसा छोड़, पौव्वा ला

[caption id="attachment_17296" align="alignleft"]यशवंतयशवंत[/caption]पत्नी आजकल कभी-कभार टोक देती हैं- थोड़ा पैसा बचाने की सोचिए. जमीन या मकान लेने की सोचिए. चुपचाप सुन लेता हूं. दिल्ली में 20-25 हजार रुपये महीने की आमदनी वाला आदमी क्या बचाएगा, क्या खाएगा, क्या लेकर परदेस जाएगा. मतलब, कितना बचा पाएगा. एनसीआर में जमीन-मकान खरीदना कोई पांच रुपये वाली आइसक्रीम खरीद कर खा लेना थोड़े ही है.

धन्ना सेठों के बिगाड़े न बिगड़ेगी किस्मत

नई पहल के लिए आप भी सेठी और जैन को शुभकामनाएं दें : ज़िंदगी तो गुरु चलती रहती है. धन्ना सेठों के बिगाड़े नहीं बिगड़ता किसी का नसीब. कुछ दिनों का संकट आ सकता है, थोड़ी परेशानियां आ सकती हैं पर इन मुश्किलों में जो हिम्मत नहीं हारते और कुछ नया रचने-करने की कोशिश करते हैं जमाना उन्हीं के कदमों में होता है. पिछले दिनों छंटनी व बंदी के कारण बेरोजगार हुए दो पत्रकारों ने अपनी नई जिंदगी की शुरुआत की है. उनकी नई ज़िंदगी का हर क्षण उनका अपना होगा.

Is access to Bhadas4Media denied at some places?

Yashwant Ji namaskaar, I hope you are doing fine. I want to share a doubt with you. It is possible that you may already know about it or it is just a figment of my imagination, well in that case please excuse me for bothering you. Some of my friends have been  bugging me on my cell, for quite some time now, asking me to keep informing them about what’s new at Bhadas. I am just fed up.

औकात नहीं भूलना चाहिए : उदयन मुखर्जी

[caption id="attachment_17077" align="alignleft" width="187"]अपने चैनल पर अपने ही चैनल का गुणगान और विरोधी चैनल के सत्यानाश का पाठ करते उदयन मुखर्जीअपने चैनल पर अपने ही चैनल का गुणगान और विरोधी चैनल के सत्यानाश का पाठ करते उदयन मुखर्जी[/caption]ब्लूमबर्ग-यूटीवी का बिना नाम लिए सीएनबीसी टीवी18 के मैनेजिंग एडिटर उदयन मुखर्जी ने अपने चैनल पर एक कार्यक्रम में जो-जो घटिया बातें अपने इस प्रतिद्वंद्वी चैनल के लिए कही हैं, वह वाकई शर्मनाक है. शायद यही वजह है कि ब्लूमबर्ग-यूटीवी वालों ने उदयन पर 500 करोड़ का मानहानि का दावा ठोंका है. यूट्यूब पर मौजूद वीडियो क्लिप को देखने से पता चलता है कि उदयन मुखर्जी धाराप्रवाह गति से अपने चैनल की जय-जयकार किए जा रहे थे और प्रतिद्वंद्वी को झूठा, मक्कार, धोखेबाज… जाने क्या क्या बता रहे थे.

भड़ास4मीडिया और मीडिया के छुपेरुस्तम

हम सभी चाहते हैं कि हमारी समस्याएं कोई आकर हल कर दे और हम खुशहाल हो जाएं. हम सभी चाहते हैं कि पड़ोसी के घर में भगत सिंह पैदा हो जाएं और समाज, देश व मोहल्ले के हित के लिए फांसी पर लटक कर शहीद का दर्जा पा जाएं पर अपने घर के किसी आदमी पर कोई आंच न आए, अपने घर का कोई बंदा क्रांतिकारी बनकर दुख न उठाए. मीडिया में भी यही हाल है. हजारों लोग परेशान हैं. उत्पीड़न झेल रहे हैं. मानसिक यंत्रणा उठा रहे हैं. कोई बास से परेशान है. कोई माहौल से नाखुश है. कोई सेलरी कम होने से दुखी है. कोई सहकर्मियों के उत्पीड़न से त्रस्त है. कोई काम न मिलने का रोना रो रहा है. कोई काम कर-कर के मरा जा रहा है. वे अपनी समस्याओं का हल चाहते हैं. वे जिनसे परेशान हैं, उनकी करतूत का पर्दाफाश करना चाहते हैं. पर वे नहीं चाहते कि उनका नाम व पहचान उजागर हो.

मैनेजिंग एडिटर से 500 करोड़ का हर्जाना मांगा

दो न्यूज चैनल टीआरपी होड़ में एक दूसरे से इस कदर लड़ पड़ेंगे, अंदाजा न था. खुद को नंबर वन  बताने की होड़ में एक दूसरे की चड्ढी उतारने का दौर चला फिर कोर्ट-कचहरी की नौबत आ गई है. सीएनबीसी टीवी18 के मैनेजिंग एडिटर उदयन मुखर्जी को ब्लूमबर्ग-यूटीवी की तरफ से 500 करोड़ रुपये की मानहानि का नोटिस भेजा गया है. दोनों चैनलों में लड़ाई इस बात की है कि बजट वाले दिन नंबर वन बिजनेस चैनल कौन था. टैम वाले टामियों ने सीएनबीसी टीवी18 को नंबर वन बताया है जबकि ए-मैप ने ब्लूमबर्ग-यूटीवी को. ब्लूमबर्ग-यूटीवी के लोगों ने ए-मैप की रेटिंग को आधार बना नंबर वन का गान शुरू किया.

‘मिशन’ पर हैं भास्कर की ये 18 महिला पत्रकार

दैनिक भास्कर में प्रकाशित विज्ञापन का एक अंशभोपाल में डेरा : कल्पेश  ‘बेरोजगार’ : भास्कर समूह कंटेंट प्लानिंग में लगातार बाजी मार रहा है. महिला दिवस के मौके पर यह समूह जो कुछ कर-करा रहा है, वह बेमिसाल है. आज दैनिक भास्कर में लगभग आधे पेज का विज्ञापन निकला है. इसे देखकर पता चलता है कि महिला दिवस के दिन जो अखबार मार्केट में आने वाला है, वह ‘महिलाओं के लिए, महिलाओं के द्वारा और महिलाओं का’ अखबार होगा. इसके लिए दैनिक भास्कर से जुड़ी कई महिला पत्रकार पिछले कई हफ्तों से जी-जान से जुटी हुई हैं. ये महिला पत्रकार भास्कर समूह के अलग-अलग एडिशनों में कार्यरत हैं और कई हफ्तों से भोपाल आकर सिर्फ एक ही मिशन में लगी हुई हैं. वह मिशन है महिला दिवस के दिन दैनिक भास्कर को सिर्फ अपना अखबार बनाना. यानि आधी दुनिया के हाथों तैयार, आधी दुनिया के लिए और आधी दुनिया का अखबार बनाना.

‘हू न्यूज़’ की टीआरपी कथा

अगड़म-बगड़म : ‘हू न्यूज़’ की टीआरपी इन दिनों उछाल ले रही है। वजह, यहां के संपादक को ये बात समझ में आ गयी है कि यहां उनके सहयोगी इनपुट एडीटर अपने काम के अलावा सारे काम करते हैं। सो, रिपोर्टरों की सीधे मीटिंग लेना, उन पर स्टोरी के लिए दबाव बनाना, नए आइडिया देना और उनके आउटपुट पर नज़र रखना… ये यहां के संपादक खुद करते हैं। सुबह 10 बजे दफ्तर आना और रात के 12 बजे घर जाना, शायद यही हू न्यूज़ की टीआरपी बढ़ने की सही वजह है। एक बार कुछ दिन पहले संपादक जी के दांत में दर्द काफी बढ़ गया था, सो वो कुछ दिनों के लिए दफ्तर नहीं आ पाए। उस हफ्ते टीआरपी पहुंची सीधे धड़ाम। यानी यहां के संपादक के पास अपने काम के अलावा इनपुट एडीटर का काम भी है। तो फिर इन्पुट एडीटर क्या करते हैं? ये महाशय अपने काम के अलावा सारे काम करते हैं। मसलन, शाम को प्रिंटर के पास फैले कागजों को डस्टबिन में डालना, आउटपुट एडीटर के काम करना और स्टोरी का रन आर्डर तय करना, एसाइनमेंट के बचे काम निबटाना, बुलेटिन के लिए शाट-बाइट कटवाना।

पता नहीं इन्हें शर्म आई या नहीं

दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर और दैनिक हिंदुस्तान। संजय गुप्ता, सुधीर अग्रवाल और शोभना भरतिया। तीन बड़े अखबार, तीन बड़े मीडिया ब्रांड और इनके तीन मालिक। तीनों ऐसे मालिक जिन्हें अपने-अपने ब्रांडों के प्रतीक के रूप में जाना जाता है। तीनों में काबिलियत है। तीनों सिंसीयर हैं। तीनों डायनमिक हैं। तीनों देश व समाज के हित की चिंता करते हुए दिखते हैं। तीनों कभी न कभी किसी न किसी रूप में ताकतवर व्यक्ति, प्रतिष्ठित आदमी, सूझबूझ वाले उद्यमी, सोच-समझ वाले युवा आदि के रूप में अखबारों-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। तीनों का व्यक्तित्व इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि तीनों के जीवन का एक नैतिक पक्ष है, जिसे उनके अधीन काम करने वाले लोग उद्धृत करते हैं, फालो करते हैं, बताते रहते हैं। पर इन तीनों ब्रांडों के तीनों मालिकों के दामन पर धब्बा है। बहुत गहरा धब्बा है। पेड न्यूज का धब्बा। पेड न्यूज को भ्रष्टाचार का दूसरा नाम बताया गया है। इन तीनों मालिकों ने कभी न कभी भ्रष्टाचार को देश के विकास में बाधक जरूर बताया है। पर इन्हीं मालिकों ने बदले हुए समय में भ्रष्टाचार को अंगीकार किया।

‘जनसत्ता’ से सहयोग क्यों बनाए रखें?

अठन्नी दाम बढ़ाकर संपादक ने पाठकों से सहयोग बनाए रखने की अपील की : जनसत्ता कभी नाम वाला अखबार हुआ करता था. क्या बनारस, क्या बेंगलूर. हर जगह इसके चाहने वाले हुआ करते थे. लेकिन आजकल का जनसत्ता उदास करने वाला होता है. कुछ अलग पढ़ने की चाहत रखने वालों को मायूसी हाथ लगती है. समाचार एजेंसियों की खबरों से भरे पड़े इस अखबार में इनके रिपोर्टरों की भी जो खबरें होती हैं, वे ऐसी नहीं होतीं कि जिससे पाठक कुछ नया पा सके या जिससे हड़कंप, कंपन या मंथन हो सके. उपर से अब इस 12 पेजी अखबार का दाम भी बढ़ा दिया गया है. तीन की बजाय अब साढ़े तीन रुपये में मिला करेगा यह. अठन्नी ज्यादा देने में किसी को दिक्कत नहीं लेकिन अठन्नी बढ़ाने के साथ क्वालिटी बढ़ाने का कोई भरोसा नहीं मिला है अखबार की ओर से.

‘हाट सीट’ का नाम ‘गरम पिछवाड़ा’ हुआ!

आज तक न्यूज चैनल से खबर आ रही है कि होली की पूर्व संध्या पर दारू पीकर आजतक आफिस में पहुंचने पर प्रभु चावला बुरी तरह फंस गए. ब्रेथ एनालाइजर यंत्र लेकर टहल रहे नकवी जी के आदमियों ने प्रभु चावला को घेर लिया और उनके मुंह में शराब सूंघक यंत्र जबरन घुसेड़कर कई पैग दारू की खोज कर डाली. सूत्रों के मुताबिक मदिरा प्रभु चावला के शरीर के ज्यादातर हिस्सों में असर दिखा चुकी थी. शरीर के रोएं-रोएं, कोने-कोने तक में इसका फैलाव हो चुका था. प्रभु के शरीर में मदिरा की पर्याप्त मात्रा की जानकारी मिलते ही नकवी जी ने एक लिखित रिपोर्ट अरुण पुरी के पास भेज दी.  रिपोर्ट की एक प्रति भड़ास4मीडिया के पास है. इसमें कहा गया है कि इंडिया टुडे मैग्जीन में कम, आजतक में ज्यादा रुचि लेने से प्रभु चावला जैसे वरिष्ठ पत्रकार मतिभ्रम के शिकार हुए लगते हैं. इस मतिभ्रम को दूर करने के लिए ही वे पर्याप्त मदिरा सेवन करने लगे हैं.

तेज-तेज न बोल आशुतोष भइया….

बुरा न मानो होली है… : सवर्णों की दुनिया-मीडिया में….. दिलीप मंडल हैं बड़े परेशान….. होली के मौके पर दिक्खे चिंतित….. रंग डालन को न मिले दलित महान…. ले पिचकारी रामकृपाल पे तानी….. डाल दूंगा रंग सवर्ण महाराज….. रामू भइया बोलें धीरे से….. टाइम्स ग्रुप में न करो ऐसी बात….. वैसे भी अब दलित हैं ब्राह्मण….. सवर्ण भाई तो बन गए बेचारे….. न आरक्षण न है प्रोटेक्शन….. देखो लड़के घूमे हैं मारे-मारे…. वो देखो आ रही एक टोली…. भाग ले भइया एकजुट ये हमजोली…. अनिल चमड़िया एंड कंपनी आई…. साथ प्रगतिशील पिचकारी लाई…. तलाश रहे हैं शहर में कर्फ्यू…. घेर कर डाला गोबर पानी…. याद दिला दी सबकी नानी…. वर्धा से आया अनाम दलित मेल…. लिखा, यशवंत करते भड़ास पर खेल…. मुद्दा खोज आग लगावें….. आग लगे तो आगे बढ़ जावें… पैसे लेकर आग बुझावें…. न बुझे तो आंख बंद कर जावें…..

मतंग-मनोरंजना झगड़े में डूबेंगे चैनल!

मियां-बीबी के झगड़े से दूसरों का कितना नुकसान हो सकता है, इसके उदाहरण मतंग सिंह और मनोरंजना गुप्ता हैं. कभी प्रेम विवाह करने वाले इन पति-पत्नी के बीच इन दिनों जंग चल रही है. इस जंग में पिस रहे हैं एनई टीवी ग्रुप के कर्मचारी. इस ग्रुप के छह टीवी चैनलों व चार रेडियो स्टेशनों में कार्यरत हजारों लोग सेलरी के संकट से जूझ रहे हैं. कुछ महीनों पहले शुरू हुए सेलरी संकट को लोगों ने तात्कालिक व आकस्मिक मान इगनोर किया.

शशि की भड़ास और भड़ास4मीडिया

हिंदुस्तान के प्रधान संपादक शशि शेखर ने भी अपने गले में अटक गई बात को पिछले दिनों उगल दिया. मतलब, अपनी भड़ास निकाल दी. वैसे, शशि शेखर की यह खासियत है कि वे कोई बात गले या पेट में अटका कर नहीं रखते, उसे वे मौका मिलते ही यत्र-तत्र-सर्वत्र उलटते रहते हैं, सामने वाले परेशान या खुश हों तो हुआ करें, दूसरों की परवाह उन्होंने कभी की ही नहीं सो आज क्यों करते.

इसे कहते हैं भरोसा

एसपी ने प्रभात खबर की टीम के साथ बैठे बीडीओ को जबरन कस्टडी में लिया तो डरकर रोने लगे थे बीडीओ : झारखंड में माओवादियों ने बीडीओ को रिहा करने के लिए मध्यस्थ के रूप में प्रभात खबर अखबार पर भरोसा जताया. माओवादियों ने प्रभात खबर के झारखंड हेड अनुज कुमार सिन्हा के पास संदेश भिजवाया कि वे सिर्फ प्रभात खबर की टीम के सामने ही बीडीओ को रिहा कर सकते हैं क्योंकि उन्हें प्रभात खबर और उसके लोगों पर भरोसा है. माओवादियों का संदेश स्पष्ट था- बीडीओ प्रशांत को वे रिहा कर सकते हैं, लेकिन सिर्फ प्रभात खबर की टीम के समक्ष.  अनुज कुमार सिन्हा ने यह संदेश सबसे पहले अपने प्रधान संपादक हरिवंश तक पहुंचाया.

बौनों के दौर में निर्मल का जाना

[caption id="attachment_16969" align="alignleft"]निर्मल पांडेयनिर्मल पांडेय[/caption]यूं चला जाएगा यह बेहतरीन कलाकार और इंसान, किसी को अंदाजा न था : फिल्म और टीवी एक्टर निर्मल पांडेय के निधन की दुखद खबर आ रही है। 46 साल की ही उम्र में वे चले गए। आज दिन में करीब ढाई बजे उनकी मौत हुई। उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उन्हें तुरंत अंधेरी स्थित होली स्पिरिट अस्पताल ले जाया गया। ‘बैंडिट क्वीन’ फिल्म में डकैत विक्रम मल्लाह की भूमिका निभाने के बाद चर्चा में आए निर्मल पांडेय ने ‘इस रात की सुबह नहीं’, ‘दायरा’, ‘प्यार किया तो डरना क्या’, ‘शिकारी’, ‘गाड मदर’ और ‘वन टू का फोर’ जैसी कई फिल्मों में काम किया।

क्या शशि शेखर का इतिहास ज्ञान कमजोर है?

हिंदुस्तान में शशि शेखर के संपादकीय का एक अंशशशि शेखर को ऐतिहासिक तथ्यों का उल्लेख करते वक्त गूगल या विकीपीडिया को सर्च करने की जरूरत है. अगर तकनीक फ्रेंडली न हों तो उन्हें इतिहास और सामान्य ज्ञान की किताबें अपने पास रखने की आवश्यकता है. खासकर उन मौकों पर जब वे रविवार के दिन के लिए ‘हिंदुस्तान’ में कोई संपादकीय नुमा लेख अपने नाम से लिखते हैं. पिछले दिनों उन्होंने एक गलती की थी. उस गलती के लिए अगले हफ्ते के रविवार के अंक में क्षमा याचना भी की गई. वैसी ही गलती आज के दिन उन्होंने फिर कर दी है. गलती देखने में तो बहुत छोटी है पर इस छोटी-सी गलती के कारण समय का पहिया सौ साल पीछे चला जाता है. पहले बताते हैं कि पहली गलती क्या थी.

पटना यात्रा (5) : क्या है ‘मौर्य टीवी’ का भविष्य?

पटना में आयोजित एक भव्य समारोह के दौरान मौर्य टीवी को लांच करते बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार.

पटना में मीडिया के एक परिचित साथी ने मुझसे पूछा कि ‘मौर्य टीवी’ का भविष्य क्या है? उनका सवाल दरअसल पिछले दो वर्षों के दौरान ‘मौर्य टीवी’ में हुई उठापटक के कारण था. मैंने जवाब दिया- ‘पहले तो यह जान लीजिए, मैं मौर्य टीवी का हिस्सा नहीं हूं.

पटना यात्रा (3) : कैलाश का गाना, मेरा चिल्लाना

कैलाश खेर जब गाते हैं तो लगता है कि कोई संत गा रहा है. कोई सूफी गा रहा है. कोई फक्कड़ गा रहा है. कोई पागल गा रहा है. कोई औघड़ गा रहा है. कोई दीवाना गा रहा है. वे दिल से गाते हैं. आत्मा से गाते हैं. कैलाश खेर के गाने मैं अपने मोबाइल में एमपी3 के रूप में सहेजकर रखता हूं. जब मौका मिलता है तो सुनता हूं और गाता हूं. दो गानों को इन दिनों खासकर दीवाना हो गया हूं. बमम बम बमम, बमम बम बमम, बमम बम बमम, बम लहरी… और छाप तिलक सब छीनी….. इन दो गानों को कैलाश खेर ने मौर्य टीवी की लांचिंग के समारोह में नहीं गाया. कोई नहीं, नहीं गाया तो मैं सुनवा रहा हूं और खुद भी सुन रहा हूं, यूट्यूब के सौजन्य से. कैलाश खेर कार्यक्रम शुरू होते समय पटना वालों के ठंडे रिस्पांस से थोड़े निराश थे. सो, पूछ-पुचकार रहे थे कि भइयों, गानों पर मन करे हिलने का तो हिलो, नाचने का मन करे तो नाचो. हां, झूमना-नाचना जरूर लेकिन पड़ोसी का ध्यान रखकर 🙂 इसी बीच मैंने चिल्लाकर कहा- छाप तिलक सब छीनी वाला सुनाइए कैलाश जी! मैंने अपनी चिल्लाहट को दो-तीन बार रिपीट किया पर शायद कैलाश तक मेरी आवाज पहुंची नहीं, ये सोचकर खुद को तसल्ली दे रहा हूं.

पटना यात्रा (2) : प्रकाश झा में दम तो है गुरु

गोरिया करि के सिंगार… गोरिया करि के सिंगार…. अंगना में पीसे लीं हरदिया… होली है!!! जोगीरा सारा रा रा रा : मुफ्त टिकट मिल गया था जाने के लिए और उनका नमक खाकर लौटा हूं, साथ में इस साइट पर मौर्य  टीवी का विज्ञापन भी चल रहा है, इसका हक अदा करने के लिए नहीं लिख रहा हूं कि प्रकाश झा में तो बड़ा दम है. परसों शाम जिन लोगों ने पटना में मौर्य टीवी के लांचिंग समारोह को देखा होगा, उन्हें महसूस हुआ होगा कि जमीन से उठा यह आदमी सिर्फ अपनी प्रतिभा, सोच, मेहनत, क्षमता, साहस और सही समय पर सही फैसले लेने के गुण के कारण आज देश के जाने-माने लोगों में शुमार है. कुछ हद तक हम हिंदी वालों के लिए रोल माडल भी है. मुझ जैसे धंधेबाज (अंग्रेजी के अंटरप्रिन्योर या इंटरप्रेन्योर या हिंदी के उद्यमी जैसे शब्दों का ठेठ देहाती वर्ड तो धंधेबाज ही होता है, ऐसा मैं मानता हूं.) के लिए तो वो बिलकुल रोल माडल सरीखे हैं. कैसे आप किसी की नौकरी-चाकरी-गुलामी में दुखी दिल से जिंदगी खपा देने की जगह अपने पर भरोसा करते हुए कोई काम शुरू करते हैं और उसमें कामयाबी के झंडे गाड़ने के बाद नए-नए क्षेत्रों में भी वैसा ही धमाल कर गुजरने की तमन्ना से बढ़ चलते हैं, यह प्रकाश झा से सीखता हूं.

पटना यात्रा (1) : हवाई अड्डा, मीडिया, नेता

मौर्य टीवी की लांचिंग पर मुझे भी पटना बुलाया गया. न्योता कुबूल किया. जहाज से मुफ्त में उड़ने का प्रस्ताव हो और प्रस्तावित प्रोग्राम में कैलाश खेर जैसे मस्त व महान गायक को सुनने का मौका मिल रहा हो तो मेरे जैसा देहाती क्या, अच्छे से अच्छा शहरी भी इस लोभ को त्याग नहीं सकता. सो, मैं परसों दोपहर जहाज से फुर्र से उड़कर सवा घंटे में पटना पहुंच गया. पटना मैं कभी नहीं गया था. बिहार के बार्डर पर अपना गृह जिला गाजीपुर होने के बावजूद बिहार दर्शन का कभी सौभाग्य नहीं मिला था. पटना हवाई अड्डे पर उतरकर गेट से बाहर निकल रहा था तो जिंदाबादा के ढेर सारे नारे को मुंह में लिए ढेर सारे कंधे और हाथ लहराते दिख रहे थे. कुछ नेताजी लोग गर्वित भाव से खिसक-खिसक कर बाहर की ओर सरक रहे थे. उनके पीछे मैं भी मजबूरन रेंग रहा था क्योंकि गेट नेतागिरी वाली भीड़ से लबालब था. बाहर निकल कर देखा कि माल्यार्पण और भाषणबाजी के हल्के दौर के बाद नेताजी को मीडिया ने घेर लिया. मुझसे रहा न गया. मैंने भी मोबाइल को वीडियो आन किया और लगा रिकार्डिंग करने. लाख धंधेबाज होने के बावजूद अंदर का पत्रकार मरा नहीं है, ऐसा मुझे प्रतीत-आभास-महसूस होता है 🙂

….शराबी जितना बूढ़ा होता है उतना बच्चा हो जाता है…

बहुत दिनों बाद आज सुबह-सुबह जगा. उठ तो रोज ही जाता हूं पर महटिया के सो जाने में भलाई समझता था, सो, सोया ही रहता था. पर आज लगा कि नहीं, फाइनली उठ जाओ. खुद उठा तो सिर पर रखे लैपटाप को भी उठाया. कामधाम-मेल-सेल निपटाया. कई दिनों से कई तरह की नसीहतें कई लोगों से सुन रहा था. नसीहतों के निहितार्थ बताने वाले प्रमुख शब्द इस प्रकार हैं- जागिंग, जिंदगी, सुबह, मदिरा, लीवर, मौत, खुशी, उम्र…..। तो इन शब्दों को मिलाकर एक रचनावली तैयार की है, जो हाजिर है, इसे बस यूं ही पढ़ जाइएगा, सीरियसली लेने की कौनो जरूरत नहीं है। हालांकि कई लोग कह सकते हैं कि भड़ास को सीरियसली लेता कौन है यार :), क्यों सरकार :):) -यशवंत  


रिपोर्टरों को निर्देश- वसूली करो या नौकरी छोड़ो!

जागरण प्रबंधन नाम-नंबर छापने के लिए ग्राम प्रधान उर्फ मुखिया से पांच हजार रुपए मांग रहा : बिहार में दैनिक जागरण के स्ट्रिंगर और रिपोर्टर इन दिनों हलाकान हैं. उन्हें प्रत्येक ग्राम पंचायत से पांच हजार रुपये वसूलने के निर्देश दिए गए हैं. जो इस निर्देश का पालन नहीं कर रहा है, उसकी नौकरी चली जा रही है. जो लोग आनाकानी कर रहे हैं, उन पर जबर्दस्त दबाव बनाया जा रहा है. नौकरी से हटाने की खुली धमकियां दी जा रही हैं. यह सब काम हो रहा है पांच हजार रुपये वसूलने के लिए. जागरण की तरफ से ‘दैनिक जागरण पंचायत दर्शिका 2010’ नाम से एक बुकलेट छपवाया जा रहा है जिसमें ग्राम पंचायत सदस्य से लेकर सांसद तक का नाम और फोन नंबर होगा. इस काम के लिए पंचायतों, विशेषकर मुखिया से पांच हजार रुपये वसूले जा रहे हैं. वसूली लीगल दिखे, इसके लिए बाकायदा फार्म भी छपवाया गया है. इस फार्म पर काफी नैतिक बातें की गई हैं. एक फार्म भड़ास4मीडिया के पास भी है, जिसे नीचे प्रकाशित किया गया है.

आपका जर्नलिज्म टैम की गिरफ्त में कैसे?

टैम तो बाजार के लिए है पर आप तो जर्नलिस्ट थे : जो लोग हिंदी टीवी पत्रकारिता के पतन के अपराधी हैं, वो अपनी गल्ती छुपाने के लिए ‘टैम-टैम टीआरपी-टीआरपी’ चिल्ला रहे हैं. ये लोग पूरी तरह से मानसिक रूप से दिवालिया हो चुके हैं. अच्छी पत्रकारिता से भी टीआरपी कैसे पाई जाती है, इन्हें पता ही नहीं है. अखबारों पर लाख आरोप लगे हों लेकिन अखबारों का सबसे कम पढ़ा जाने वाला संपादकीय पेज आज भी जस का तस है. वहां पर विज्ञापन नहीं छपने लगे. वहां पर सेक्सी फोटो नहीं दिखाई जा रही हैं. वो एडिट पेज आज भी अपने स्थान पर कायम है. सचेत पाठक एडिट पेज पढ़ते हैं. तो इन टीवी संपादकों से पूछिए कि पूरे 24 घंटे के दौरान वे एक ऐसा कौन-सा प्रोग्राम दिखाते हैं जिसके बारे में वे कह सकें कि इस प्रोग्राम को टीआरपी को ध्यान में रखकर नहीं, पत्रकारिता और सरोकार को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है. उस प्रोग्राम को वे उस समय दिखाएं जब पूरा देश सो रहा हो, अरली मारनिंग दिखाएं, उस वक्त दिखाएं जिस समय पर टीआरपी का कोई खास दबाव न हो.

धंधेबाज अखबार का एक और एडिशन

खबर आई है कि जागरण वालों ने ‘दैनिक जागरण सिटी प्लस’ नामक कथित वीकली अखबार हैदराबाद से भी लांच कर दिया है. इस अखबार की करीब 40 हजार कापियां कल हैदराबाद में मुफ्त में बांटी गईं. हैदराबाद में लांच हुए ‘सिटी प्लस’ को इसका 21वां एडिशन बताया जा रहा है. इससे पहले एनसीआर, मुंबई, पुणे, बेंगलोर आदि शहरों में इसके कई एडिशन लांच किए जा चुके है. इस अखबार के एनसीआर में पांच एडिशन हैं- नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद, न्यू गाजियाबाद, फरीदाबाद और गुड़गांव। दिल्ली में चार एडिशन हैं- ईस्ट दिल्ली, वेस्ट दिल्ली, सेंट्रल दिल्ली और द्वारका. पुणे में चार, बेंगलोर में पांच, मुंबई में एक और अब हैदराबाद में एक एडिशन के साथ इस अखबार के कुल 21 एडिशन हो गए हैं. दैनिक जागरण सिटी प्लस का टैगलाइन है- Your guide to neighbourhood news, information and entertainment.

मसूरी में भीख मांगते देखे गए यशवंत

यशवंत सिंह

भीख मांगना. उर्फ भिक्षाटन करना. यह कोई नया काम नहीं है. बहुत लोग करते रहते हैं. जीने के लिए पैसे चाहिए. पैसे पाने के लिए धंधा करना पड़ता है. या फिर नौकर बनना पड़ता है. जो लोग नौकर नहीं बन पाते, वे धंधा करते हैं. जो धंधा नहीं कर पाते भीख मांगते हैं. कई धंधेबाज भीख मंगवाने का धंधा करते हैं. भीख मंगवाने वाले धंधेबाज इसी बाजार की उपज हैं. ये बाजार जो बताता है कि अगर आपके पास पैसा है तो आप किंग हैं. आपके पास पैसा है तो आपके पास सभी सुख-सुविधाएं हैं. आपके पास पैसा नहीं है तो आप के व्यक्तित्व और आपके जिस्म के साथ कुछ भी हो सकता है. हो रहा है बहुत लोगों के साथ.

शशि शेखर, जवानी आपकी भी जाएगी

हिंदुस्तान से प्रमोद जोशी, सुषमा वर्मा, शास्त्रीजी, प्रकाश मनु, विजय किशोर मानव हो रहे हैं विदा : ‘इस्तीफा नहीं दिया है’ जैसी बात कहते हुए भी हिंदुस्तान, दिल्ली के सीनियर रेजीडेंट एडिटर प्रमोद जोशी चले जाने की मुद्रा में आ गए हैं। एकाध-दो दिन आफिस वे आएंगे और जाएंगे लेकिन इस आने-जाने का सच यही है कि वे फाइनली जाने के लिए आएंगे-जाएंगे। दरअसल, एचटी मीडिया से हिंदुस्तान अखबार को अलग कर जो नई कंपनी हिंदुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड (एचएमवीएल) की स्थापना की गई है, उसमें रिटायरमेंट की उम्र 60 की बजाय 58 साल रखी गई है। रिटायर होने की उम्र पहले 58 ही हुआ करती थी लेकिन केंद्र सरकार ने इसमें दो साल की वृद्धि की तो नियमतः सभी निजी-सरकारी संस्थानों ने भी अपने यहां 60 साल कर लिया। पर इस लोकतंत्र में नियम केवल नियम हुआ करते हैं, पालन करने योग्य नहीं हुआ करते। कई निजी कंपनियों में तो लोग 44 या 55 की उम्र में ही रिटायर कर दिए जाते हैं। ऐसा ही एक मुकदमा बनारस में चल रहा है।

फाइनली, गुडबाय दिल्ली (7)

[caption id="attachment_16609" align="alignnone"]हम रोते भी हैं तो बताते हैं, वो हंसते भी हैं तो छिपाते हैं....हम रोते भी हैं तो बताते हैं, वो हंसते भी हैं तो छिपाते हैं….[/caption]

हम रोते भी हैं तो बताते हैं, वो हंसते भी हैं तो छिपाते हैं…. : कल अशोक चले गए दिल्ली से। दिल्ली से बहुत दूर। उस शहर का नाम हम किसी को पता नहीं है। उन तक पहुंचना संभव नहीं है। क्यों गए, किसलिए गए, कुछ पता नहीं। बस, चुपचाप चले गए। कल ही रात अलीगढ़ के एक पत्रकार को दिल्ली के एक चैनल के बाहर जमकर मारा गया। रात में गए थे हम लोग उससे थाने में मिलने। उसे सुना और महसूस किया। उसकी खबर आज दी जाएगी। आज धर्मेंद्र भी चला गया। दिल्ली छोड़ गया। सामान तो पहले ही जा चुका था। आज वो भी चला गया। धर्मेंद्र मरा तो नहीं, लेकिन एक मौत जीकर जा रहा है, जिंदगी जीने। ट्रेन में बैठा होगा। सुबह 11 बजे थी। जाने से पहले अंतिम लिखा दे गया। साथ में एक मोबाइल नंबर भी जो आज रात में चालू हो सकेगा। दिल्ली वाला नंबर, और जो चालू होने वाला है, दोनों नीचे डाल दिया है, पर प्लीज, उसे कोई नौकरी के लिए न बुलाए, उसे कोई सांत्वना न दे, उसे कोई सहानुभूति न दिखाए। उसे जाने दीजिए, चुपचाप, बिलकुल अकेले। उसी तरह जैसे कोई मरकर जाता है, बच जाने की खुशी और उम्मीद के साथ। उसे डिस्टर्ब न करें। उसे जीने दें, अपनी नई जिंदगी, शुक्र है इसी दुनिया में जिएगा, वरना लटक कर मरने के उसके पास हजारों बहाने थे, पर वो बहादुर है, एक मीडिया घराने द्वारा दिए गए स्लो प्वायजन मौत को उसने जीने और स्वीकारने से इनकार कर दिया। मैं निजी तौर पर इस जिंदा आदमी को दिल से प्रणाम करता हूं, चरण छूना चाहता हूं, चूम लेना चाहता हूं क्योंकि मुर्दों के इस दिल्ली देस में इतना हिम्मतवाला बहुत दिन बाद देखा है, शायद जरनैल सिंह के बाद कोई एक बंदा और मिला है जिसके लिए कह सकता हूं कि वो धर्मेंद्र हम लोगों के समय का हीरो है, एक बड़ा फैसला लेकर और उसके बारे में दुनिया को बताने का साहस करने के कारण। आज रोक नहीं सका खुद को रोने से, बहुत दिन बाद दिन में रोया हूं.

गुडबाय दिल्ली (6)

ट्रक पर सामान लदवाते धर्मंद्र.

गोमती एक्सप्रेस और मैं : इस ट्रेन का ठहराव पहले उन्नाव में नहीं था। अभी दो साल पहले शुरू हुआ तो माता-पिता ने खुशी जताई कि अब एक और दिन तुम हमारे पास रुक सका करोगे क्योंकि यह ट्रेन सुबह वहां से चलकर ड्यूटी के समय तक दिल्ली पहुंचा देती थी, लेकिन यदि लेट हो गई किन्हीं कारणों से तो बास के चमचे ही ड्यूटी से लौटा देते थे। जाहिर सी बात है कि आपने जाते समय हाजिरी लगाई होगी तो पर्सनल कनपुरिया संबंधों के आधार पर उस दिन एब्सेंट दिखा देते थे। यह नर्क भी मैंने झेला है जागरण में और यदि खुद दारू पीनी हो और मैच खेलना हो तो हाजिरी लगाकर चाहे पूरे दिन गायब रहें, कोई पूछने वाला नहीं। शायद मैं 15 अगस्त 2006 की बात कर रहा हूं।

गुडबाय दिल्ली (5)

धर्मेंद्र प्रताप सिंह ने दिल्ली से उजड़ते वक्त अपनी राम कहानी तफसील से सुनाई। कैसे वे दैनिक जागरण आए और किस तरह उनकी तारीफ के पुल बांधे गए। पर समय बीतने के साथ ही सब उन्हें भूल गए। एक कर्मठ कार्यकर्ता की तरफ धर्मेंद्र दिन-रात लगे रहे। किसी गोल-गैंग के हिस्से नहीं बने। किसी का गलत माना नहीं, किसी से गलत करने के लिए कहा नहीं। जो भी था, उसी में खुशहाल रहना चाहते थे। साथ के लोग आगे बढ़ते गए पर धर्मेंद्र वहीं के वहीं बने रहे। न पद बढ़ा न पैसा। काम जरूर घटता-बढ़ता रहा। इंचार्ज जरूर बदलते रहे। खुद ही पढ़ लीजिए आप धर्मेंद्र की राम कहानी का अगला हिस्सा….

-एडिटर, भड़ास4मीडिया


गुडबाय दिल्ली (4)

धर्मेंद्र से मैंने भी वही अटपटा और फालतू का सवाल किया जो टीवी वाले अक्सर हर किसी से पूछते दिख जाते हैं- यहां से आप जा रहे हैं, उजड़ रहे हैं, तो कैसा महसूस कर रहे हैं? धर्मेंद्र थोड़े असहज थे, घर की पैकिंग के दृश्य को शूट किए जाते देखकर, सवाल सुनकर वे पहले मुस्कराए, फिर बोले…. दिल्ली खानाबदोशों का शहर है… लाखों लोग आते जाते रहते हैं… कमाने-खाने आते रहते हैं…. हम भी पड़े हुए थे…. अब जा रहे हैं…. किसी के आने जाने से दिल्ली पर बहुत फरक नहीं पड़ता…. धर्मेंद्र को शिकायत है कि शीर्ष पदों पर बैठे लोगों को पता ही नहीं है कि नीचे क्या खेल चल रहा है… किसका करियर तबाह किया जा रहा है, वे यह जानना ही नहीं चाहते … मुझे लगता है कि इन सब चीजों से अब कंपनियां मतलब भी नहीं रखतीं….. (देखें नीचे, पहला वीडियो)


गुडबाय दिल्ली (3)

धर्मेंद्र कहते हैं- गांव जाकर घास और गोबर का भी कारोबार करूंगा तो यहां से ज्यादा सुखी रहूंगा…… छोटे-छोटे शहरों से हम जैसे लोग सपने लेकर इन महानगरों में आते हैं…. उम्र बीतने के साथ जब सपने पूरे होते न दिखाई दें तो इस तरह के फैसले लेने पड़ते हैं…. दरअसल मैं बाबूगिरी से तंग आ गया था… (देखें नीचे का पहला वीडियो)


धर्मेंद्र के मुताबिक- परिवार साथ रहता था पर दो साल पहले उन्हें गांव भेजने का फैसला लेना पड़ा…. यहां दिल्ली में नर्सरी और कक्षा एक में बच्चों के एडमिशन के लिए 18 हजार रुपये, 20 हजार रुपये डोनेशन मांगा जा रहा था जो मैं देने की स्थिति में नहीं था…. तभी परिवार को गांव भेजने का निर्णय लिया… परिवार उन्नाव में रहता है अब…. मैं दिल्ली रहकर दैनिक जागरण की सेवा कर रहा था जिससे मैं कतई संतुष्ट नहीं था…. (देखें नीचे का दूसरा वीडिया)

गुडबाय दिल्ली (2)

[caption id="attachment_16573" align="alignleft"]अपने देवताओं को आखिरी प्रणामअपने देवताओं को आखिरी प्रणाम[/caption]धर्मेंद्र जब दिल्ली स्थित डेढ़ कमरे का अपना मकान खाली कर रहे थे तो उस दौरान कई वीडियो शूट किए गए। कुछ वीडियो हम दिखा रहे हैं। यह पहला है। इसमें आपको दिखेगा- धर्मेंद्र के सेकेंड फ्लोर के कमरे से सामान नीचे उतरता हुआ, धर्मेंद्र द्वारा अपने डेढ़ कमरे के मकान में स्थित छोटे से देवघर को आखिरी प्रणाम, पीने का पानी एकत्रित करने के लिए इस्तेमाल में लाई जाने वाली मिट्टी की गगरी, सामान ले जाने के लिए नीचे खड़ा ट्रक……। यूट्यूब पर अपलोड किए गए इस वीडियो को देखने के लिए नीचे दिए गए वीडियो सक्रीन पर क्लिक करें।

गुडबाय दिल्ली (1)

[caption id="attachment_16568" align="alignnone"]धर्मेंद्र प्रताप सिंह दिल्ली स्थित डेढ़ कमरे वाले किराए के मकान में खाना खाते हुए.धर्मेंद्र प्रताप सिंह दिल्ली स्थित डेढ़ कमरे वाले किराए के मकान में खाना खाते हुए.[/caption]

बीत रहे इस साल और आने वाले वर्ष के संधिकाल में खुशियां मनाने में जुटे देश और दिल्ली वालों में एक शख्स ऐसा भी है जो टूटे दिल से दिल्ली को विदा बोल रहा है। ‘गुडबॉय दिल्ली‘ शीर्षक से पिछले दिनों भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित खबर में बताया जा चुका है कि एक पत्रकार दिल्ली और पत्रकारिता, दोनों को अलविदा कहने जा रहा है। वह गांव जा रहा है। सामान पैक कर चुका है। मकान छोड़ चुका है। किसी दोस्त के कमरे पर गेस्ट बन गया है। दिल्ली अभी इसलिए रुका है क्योंकि उसे दैनिक जागरण से अपना बकाया पैसा चाहिए। रुकी हुई सेलरी चाहिए। छुट्टियों का पेमेंट चाहिए। दिल्ली के मकान का किराया कुछ दोस्तों से उधार लेकर चुकाया क्योंकि वे दो महीने गांव में रह गए, कुछ पारिवारिक वजहों से और कुछ खराब स्वास्थ्य के चलते, इस कारण उनके एकाउंट में कोई सेलरी नहीं गई, मेडिकल लीव की अप्लीकेशन भेजने के बावजूद। आज हम उस पत्रकार का नाम, उनके संस्थान का नाम और उनके दिल की बात को यहां प्रकाशित करने जा रहे हैं। पत्रकार का नाम है धर्मेंद्र प्रताप सिंह। उनके संस्थान का नाम है- दैनिक जागरण। वे नोएडा स्थित मुख्यालय में सीनियर सब एडिटर पद पर कई वर्षों से कार्यरत हैं। धर्मेंद्र ने अपने दिल की बात तफसील से कही है, जिसे कई किश्तों में प्रकाशित किया जाएगा, आज पहली किश्त और कुछ तस्वीरें आपके सामने है। -एडिटर, भड़ास4मीडिया


और अपने चोर एंकर को चलता कर दिया चैनल ने!

अगड़म-बगड़म : बहुत दिन से गायब था। ऐसी ही प्रकृति है अपनी। कभी यहां तो कभी वहां। आजकल लिखने का मन भी नहीं करता। खराबी एकाध दो हो तो लिखा जाए भइये, पर अब तो जहां नजर फेरो, गड़बड़ी की गाड़ी हड़बड़ी में नहीं, आराम से चलते दिखती है। एक के बारे में लिखने की सोचो तो चार और लिखवाने के लिए तैयार। इतनी गड़बड़ियों को देख कर बजाय लिखने के, अपना पौव्वा खोल लेता हूं और अलौकिक चिंतन में डूब जाता हूं। पर परलोक जाने से पहले जिंदगी तो लोक में ही कटनी है, इसलिए आज लोक चिंतन करने आ पहुंचा हूं। खबर दे रहा हूं, गासिप भी समझियो तो कोई बात नहीं क्योंकि आजकल खबरें गासिप होती हैं और गासिप खबरें होने लगी हैं। खबर एक बड़े मीडिया हाउस से है जिसने टीवी इंडस्ट्री में ढेर सारे गठजोड़ कर ढेर सारे चैनल लांच कर दिए हैं। इसी ग्रुप का एक चैनल है होम शापिंग का। रोज सामान बेचा जाता है इससे।

ईटीवी के मैनेजर ने रिपोर्टरों से कहा- तेल लाओ!

हद है। ये तो एक्स्ट्रीम है। ईटीवी, बिहार-झारखंड के असिस्टेंट मैनेजर (आपरेशन) प्रणब लाल की चिट्ठी पढ़िए। उन्होंने अपने जिला रिपोर्टरों से कहा है कि वे जिला सप्लाई अधिकारी से हर महीने कंट्रोल रेट पर 50 लीटर केरोसिन आयल आफिस यूज के लिए लें। ध्यान दीजिए, कंट्रोल रेट पर दिया जाने वाला यह केरोसिन आयल गरीबी रेखा से नीचे जीवन-बसर करने वाले परिवारों के लिए होता है। ईटीवी के रिपोर्टर आमतौर पर ईमानदार माने जाते हैं। वे अगर इस आदेश का पालन न करते हैं तो मुश्किल, पालन करते हैं तो उन्हें भ्रष्ट जिला सप्लाई अधिकारियों के आगे गिड़गिड़ाना होगा, जी-हुजूरी करनी होगी। जब वे जिला सप्लाई अधिकारी से खुद जनता के हिस्से का केरोसिन जुगाड़ से ले लेंगे तो जिला सप्लाई अधिकारी समेत किसी अन्य अधिकारी के भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज कैसे उठाएंगे?

गुडबॉय दिल्ली

वो जा रहे हैं। हम सबको छोड़कर। दिल्ली छोड़कर। दिल्ली से हारकर। पत्रकारिता छोड़कर। अपने देस। अपने गांव। दिल्ली आए थे करियर बनाने, काफी आगे जाने। पर उनकी गाड़ी ऐसी रुकी की वर्षों बीतने के बाद भी एक जगह से हिली नहीं। वे गुमनाम-से ही रह गए। एक बड़े मीडिया हाउस में दिल्ली में काम कर रहे हैं वो। उनके साथ के लोग जाने कहां-कहां चले गए। पर वे वहीं के वहीं रह गए। उम्र हर साल बढ़ती रही लेकिन पैसे व पद बढ़ने का नाम ही नहीं ले रहे। दिल्ली में किराए पर रहना हो नहीं पा रहा। कम पैसे के कारण परिवार को गांव से नहीं ला पाए। दो बच्चे हैं। इतने कम पैसे में क्या खाते, क्या बिछाते। बच्चों को कैसे पढ़ाते। सो, परिवार गांव में ही रखा। अब तय कर लिया है कि त्रिशंकु बनकर जिंदगी नहीं जीना। आर या पार। फैसला ले लिया। वे सामान पैक करने लगे हैं। दिल्ली छोड़कर कभी भी जा सकते हैं। दिल्ली को गुडबाय कभी भी कह सकते हैं।

बहुत टेंशन में हैं स्टार न्यूज वाले?

स्टार न्यूज में आजकल गजब की हलचल है। तनाव है। कोहराम-सा आलम है। टीआरपी बढ़ाने की जिद है। छंटनी करने की जिद है। आपातकालीन मीटिंग हो रही है। बंदे हड़काए जा रहे हैं। काम करने की घुट्टी पिलाई जा रही है। क्यों न छंटनी कर दी जाए की धमकी सुनाई जा रही है।

पहले खबर भेजो, फिर देंगे वर्जन!

भास्कर के पार्टनर और दैनिक भास्कर, झांसी के मालिक व संपादक महेश प्रसाद अग्रवाल द्वारा भड़ास4मीडिया को दिए गए इंटरव्यू पर रमेश चंद्र अग्रवाल व डीबी कार्प का पक्ष जानने के लिए भड़ास4मीडिया ने भोपाल स्थित डीबी कार्प के मुख्यालय फोन किया तो वहां से कहा गया कि पहले खबर मेल से भेजिए, तब उस पर वर्जन दिया जाएगा। दैनिक भास्कर, भोपाल के कारपोरेट आफिस के लैंड लाइन 0755-3988884 पर भड़ास4मीडिया की तरफ से फोन जाने पर पहले एक आपरेटर ने फोन उठाया। उसे परिचय देने के बाद जब बताया गया कि एक खबर पर रमेश चंद्र अग्रवाल का वर्जन चाहिए तो उसने फौरन फोन कहीं और ट्रांसफर कर दिया।

‘जांच हो तो जेल जाएंगे रमेश चंद्र अग्रवाल’

[caption id="attachment_16454" align="alignnone"]महेश प्रसाद अग्रवालमहेश प्रसाद अग्रवाल[/caption]

भास्कर के मालिकों का झगड़ा फिर सड़क पर आया : भड़ास4मीडिया के साथ रिकार्डेड बातचीत में दैनिक भास्कर, झांसी के मालिक और संपादक महेश प्रसाद अग्रवाल ने किए कई खुलासे : डीबी कार्प के चेयरमैन रमेश चंद्र अग्रवाल पर लगाए कई गंभीर आरोप : सोनिया गांधी के नाम का दुरुपयोग कर सरकारी व मार्केट मशीनरी को प्रभावित किया जा रहा : पिता के फर्जी हस्ताक्षर के जरिए अखबार पर कब्जा जमाया : भास्कर का मालिक कोई एक नहीं बल्कि ‘द्वारिका प्रसाद अग्रवाल एंड ब्रदर्स’ फर्म है : भास्कर ब्रांड नेम मेरे बेटे संजय अग्रवाल के नाम रजिस्टर्ड : भास्कर के नाम पर किसी एक साझीदार द्वारा मार्केट से पैसा उगाहना गलत : विवाद सुलझने तक आईपीओ से आया पैसा कोर्ट या बैंक में सुरक्षित जमा कराएं : अखबार मालिकों में देश को लूटने और एक दूसरे के खिलाफ खबरें न छापने का समझौता :

250 कर्मियों के पेट पर लात मारने के अपराधी हैं ये दो

नीचे के इन दो चेहरों को ध्यान से देखिए। ये टीवी18 ग्रुप के बिजनेस न्यूज चैनलों से करीब ढाई सौ लोगों को बाहर किए जाने के अपराधी हैं। इस देश का कानून इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता क्योंकि देश की सरकारें अब इन्हीं धंधेबाजों के इशारों पर नीतियां बनाती और बिगाड़ती हैं।

टीवी संपादकों, टीआरपी को त्रैमासिक कराओ

सप्ताह 46वां, 8 नवंबर से 14 नवंबर 09 तक : टैम वाले टामियों को कमाते रहना है, अपने धंधे को चमकाते रहना है, सो थोड़े-बहुत अंकों के हेरफेर के साथ हर हफ्ते सो-काल्ड टीआरपी में कमी-बेसी के बारे में बताते रहना है। इन टामियों को किसी डाक्टर ने कहा है कि हर हफ्ते टीआरपी रिपोर्ट जारी करें? अबे, खुद भी चैन से जियो और चैनल वालों को भी थोड़ा चैन कर लेने दो। चैनल वाले कई बेचारे तो आजकल इतने टेंशन में हैं कि परसनल और प्रोफेशनल, दोनों लाइफ बर्बाद होने की स्थिति है। कइयों की तो पहले ही बर्बाद हो चुकी है। टैम वाले अपनी रिपोर्ट को न अर्द्धवार्षिक तो कम से कम त्रैमासिक तो कर ही दें। अखबार वाले कितने सुकून में हैं। छह महीने चैन से अखबार निकालते रहते हैं। भांति-भांति के प्रयोग और फ्लेर-कलवेर घटाते-बढ़ाते रहते हैं। जनता जनार्दन की भी बात कर लेते हैं। पर ये टैम वाले टामी तो टीवी वालों को टीआरपी के अलावा कुछ सोचने ही नहीं देते। भूत-प्रेत, यू-ट्यूब वीडियो की कहानियां, हंसी वाले सीरियल और रोने-गाने-बदन दिखाने वाले रियलिटी शो के जरिए अगर टीआरपी प्राप्त होती है तो अच्छे-खासे छवि वाले न्यूज चैनल भी इन्हीं हथकंडों को अपनाने लगते हैं। इन अच्छे-खासे चैनलों के संपादक जी लोग बस बेचारा बने रहते हैं। या फिर इलेक्ट्रानिक मीडिया की ऐसी-तैसी करने के अभियान में थोड़ा-बहुत अपना भी योगदान देते रहते हैं।

पत्रकारिता के इन धुरंधरों ने मेरी धुरी काट दी

आकाश श्रीवास्तवछंटनी के शिकार आकाश ने न्यूज वेबसाइट लांच कर एनडीटीवी में भोगे गए अपने दिनों की कहानी बयान की : पिछले दिनों रिसेशन के नाम पर एनडीटीवी प्रबंधन ने इनपुट एडिटर के पद पर काम करने वाले आकाश श्रीवास्तव को संस्थान से बाहर का रास्ता दिखा दिया। इस घटना से आकाश इतने आहत हुए कि उन्होंने कहीं और नौकरी न करने का इरादा कर लिया। खुद आकाश के शब्दों में- ‘पिछले करीब चौदह साल के अनुभवों के बाद अब न्यूज़ चैनलों के दफ्तरों में बायोडाटा लेकर घूमने के लिए हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। चूंकि बगैर किए कुछ होता नहीं इसलिए हमनें भी कुछ करने का निश्चय किया और अपनी एक न्यूज़ वेबसाइट लांच की है जिसका नाम है “थर्ड आई वर्ल्ड न्यूज़”।’ इस वेबसाइट में आकाश ने एनडीटीवी के अपने दिनों पर एक संस्मरण भी लिखा है, जिसका शीर्षक है- ‘एनडीटीवी, एक दुखद अनुभव का अंत’ आकाश का यह संस्मरण आंखें खोलने वाला है और एनडीटीवी के अंदर के माहौल को लेकर कायम कई तरह के भ्रमों को खत्म करने वाला है। आकाश की नई वेबसाइट के बारे में ज्यादा जानकारी से पहले आइए, उनकी आपबीती पढ़ें, जो उनकी अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित है-

शशिशेखर का इमोशनल अत्याचार

शशिशेखर देश के इन दिनों के सबसे चर्चित हिंदी संपादक हैं। खासकर अमर उजाला से छलांग लगाकर हिंदुस्तान के ग्रुप एडिटर बनने के बाद से उनकी लोकप्रियता और चर्चा में जमकर इजाफा हुआ है और हो रहा है। वे समकालीन पत्रकारिता के लिहाज से कंप्लीट पत्रकार और संपादक माने जाते हैं। कहा जाता है कि खबर-लेख लिखने-लिखवाने, न्यूज रूम को व्यवस्थित रखने-रखवाने, न्यूज टीम का कुशल प्रबंधन करने-कराने, संपूर्ण निष्ठा के साथ काम करने-कराने, सिस्टम डेवलप करने-कराने, अखबार के संपूर्ण ग्रोथ का साझीदार बनने और टीम को बनाने में उन्हें महारत हासिल है। वे जहां जो कुछ चाहते हैं, कर लेते हैं और पा लेते हैं। पर एचटी ग्रुप के ‘हिंदुस्तान’ में जाने के बाद उनसे जो उम्मीदें हम जैसों द्वारा कर ली गई थीं, लगता है वे ज्यादा थीं। हालांकि उन्हें वहां गए ज्यादा दिन नहीं हुए इसलिए उनके कार्यकाल के मूल्यांकन जैसा कोई कार्य अभी नहीं किया जा सकता पर विजन-सोच के लिहाज से तो परखा ही जा सकता है। इस मोर्चे पर वे फिलहाल निराश कर रहे हैं।

इन अखबारों पर थूकें ना तो क्या करें!

दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर जैसे मीडिया हाउसों ने इमान-धर्म बेचा : देवत्व छोड़ दैत्याकार बने : पैसे के लिए बिक गए और बेच डाला : पैसे के लिए पत्रकारीय परंपराओं की हत्या कर दी : हरियाणा विधानसभा चुनाव में दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर जैसे देश के सबसे बड़े अखबारों ने फिर अपने सारे कपड़े उतार दिए हैं। जी हां, बिलकुल नंगे हो गए हैं। पत्रकारिता की आत्मा मरती हो, मरती रहे। खबरें बिकती हों, बिकती रहे। मीडिया की मैया वेश्या बन रही हो, बनती रहे। पर इन दोनों अखबारों के लालाओं उर्फ बनियों उर्फ धंधेबाजों की तिजोरी में भरपूर धन पहुंचना चाहिए। वो पहुंच रहा है। इसलिए जो कुछ हो रहा है, इनकी नजर में सब सही हो रहा है। और इस काम में तन-मन से जुटे हुए हैं पगार के लालच में पत्रकारिता कर रहे ढेर सारे बकचोदी करने वाले पुरोधा, ढेर सारे कलम के ढेर हो चुके सिपाही, संपादकीय विभाग के सैकड़ों कनिष्ठ-वरिष्ठ-गरिष्ठ संपादक।

बी4एम की टीआरपी बढ़ाने की रणनीति है यह?

प्रिय यशवंत, विष्णु त्रिपाठी के बारे में खबर पढ़कर बहुत दुख हुआ। यह तो पहले से ही सुना था कि पत्रकारिता में कोई किसी को अच्छा नहीं बोलता, लेकिन यहां तो हद ही पार हो गई। सरेआम किसी पर जातिवादी और क्षेत्रवादी होने का आरोप मढ़ा गया। उसकी तुलना परशुराम से की गई। क्या यह टीआरपी बढ़ाने की रणनीति है या अपनी भड़ास मिटाने की। जागरण में बिहारियों की कमी नहीं और ऐसा भी नहीं कि वहां से बिहारियों को निकालने का अभियान चला रहे हैं त्रिपाठी जी। दरअसल जो लोग काम नहीं करना चाहते और मैनेजमेंट उनकी चापलूसी बर्दाश्त नहीं कर पाता, वे किसी के बारे में कुछ भी अफवाह उड़ा सकते हैं।

दारू का साथ, जिंदगी के उतार-चढ़ाव

[caption id="attachment_15740" align="alignleft"]यशवंत सिंहयशवंत सिंह[/caption]दारूबाजी पर बात हो और मैं न लिखूं, ये भला कैसे हो सकता है। मेरे जीवन में अब जो दो-तीन चीजें बेहद करीब-अजीज हैं, उसमें एक मदिरा भी है। जो बहस शुरू हुई, उसमें सागर साहब और राजेश ने शानदार लिखा। उनका लिखा पढ़ कई बार हंसा, मुस्काया और खुश हुआ। कितने सहज-सरल ढंग से अपनी भावनाओं का इजहार कर लेते हैं ये लोग। दारू की बात चली है तो मुझे याद आ रहे हैं एक संपादक मित्र। उन्हें बताया था कि मैंने छोड़ रखी है। छोड़ने के भावावेग में उनसे भी अपील कर बैठा कि सर, कुछ दिनों के लिए आप भी बंद कर दीजिए, इंटरनल सिस्टम सही हो जाएगा, तब फिर शुरू करिएगा। उनसे बात फोन पर हो रही थी लेकिन उनकी मुखमुद्रा की कल्पना कर पा रहा हूं। वे बड़ी-बड़ी आंखें गोल-गोल नचाते हुए, थोड़ा सांस खींचते छोड़ते हुए और चेहरे पर दर्प का भाव लेते हुए बोले- यशवंत, मेरी अंतिम इच्छा है कि जब मैं मरूं तो दारू पीकर मरूं और मरते वक्त मेरे बगल में दारू रखी हो, इससे अच्छी मौत की कल्पना मैं आज तक नहीं कर पाया। 

मेरा अपना कोई निजी एजेंडा नहीं : शशि

[caption id="attachment_15701" align="alignleft"]शशि शेखरशशि शेखर[/caption]कुछ ही महीनों में हम सब गर्व से कहेंगे कि हम हिंदुस्तानी हैं : मृणालजी का मैं बेहद सम्मान करता हूं : हिंदुस्तान के एडिटर-इन चीफ पद पर शशि शेखर ने ज्वाइन कर लिया है। ज्वाइन करने से ठीक पहले आज सुबह भडास4मीडिया से संक्षिप्त बातचीत में शशि शेखर ने कुछ मुद्दों, आशंकाओं व रणनीतियों पर चर्चा की। उन्होंने सबसे पहली बात यह कही कि- ‘कुछ ही महीने में हम सब गर्व से कहें कि हम सब हिंदुस्तानी हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि हिंदुस्तान में पहले भी कोई क्षेत्रवाद और जातिवाद नहीं था। यह लोगों की फैलाई बात है।

आइए, ‘विदाई’ के मर्म को समझें

[caption id="attachment_15668" align="alignleft"]हिंदुस्तान के आज के अंक में मृणाल पांडे के स्तंभ के आखिर में प्रकाशित सूचनाहिंदुस्तान के आज के अंक में मृणाल पांडे के स्तंभ के आखिर में प्रकाशित सूचना[/caption]हिंदुस्तान का आज का अंक और ‘विदाई’ के तीन संदेश : हिंदुस्तान के दिल्ली संस्करण का आज का अंक कई मायनों में ऐतिहासिक है। पूरे अखबार को गंभीरता से देखने पर तीन पन्नों पर एक चीज कामन नजर आती है। वह है- विदाई। पहले पन्ने पर लीड खबर की हेडिंग है : ‘आडवाणी-राजनाथ की विदाई तय‘। पेज नंबर तीन देखकर पता चलता है कि एचटी मीडिया और बिड़ला ग्रुप के पुरोधा केके बिड़ला आज के ही दिन इस दुनिया से विदा हो गए थे। एचटी ग्रुप ने उन्हें स्मरण करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि दी है। एडिट पेज देख पता चलता है कि हिंदुस्तान की प्रमुख संपादक मृणाल पांडे इस अखबार से विदा ले रही हैं।

उपेक्षित रहे न्यूज चैनलों के असल नायक

टिप्पणी : तू मेरी पीठ खुजा, मैं तेरी खुजाऊंगा, वाले अंदाज में टीवी के ढेर सारे पत्रकारों, मालिकों और संपादकों को किसिम-किसिम के एवार्ड दे दिए गए। ये एवार्ड हर साल दिए जाते हैं। एवार्ड उन्हीं लोगों को मिलते हैं जो दिल्ली में रहते हैं। एवार्ड उन्हीं लोगों की झोली में गिरते हैं जो पहले से मशहूर रहते हैं। एवार्ड उन्हीं लोगों को दिए जाते हैं जो शीर्ष पर बैठे होते हैं। देश भर में बिखरे हजारों टीवी रिपोर्टरों और स्ट्रिंगरों को कोई एवार्ड नहीं मिलता। ये हजारों रिपोर्टर और स्ट्रिंगर वैसे तो न्यूज चैनलों की रीढ़ माने जाते हैं लेकिन जब तनख्वाह, पुरस्कार और सम्मान देने की बारी आती है तो इन्हें हमेशा दोयम या एकदम से उपेक्षित रखा जाता है। इनका कोई नाम तक नहीं लेता। इनकी खबरों का जिक्र तक नहीं होता। इनकी मेहनत, साहस और समझ की चर्चा तक नहीं होती। पर चैनल इन्हीं की खबरों से चलते रहते हैं, दौड़ते रहते हैं, भागते रहते हैं।

प्रकाश जावड़ेकर से कोई अपेक्षा करना ज्यादती

[caption id="attachment_15488" align="alignleft"]प्रकाश जावड़ेकरप्रकाश जावड़ेकर[/caption]प्रेस काउंसिल के सदस्य मनोनीत हुए भाजपा प्रवक्ता : भाजपा नेता प्रकाश जावड़ेकर भारतीय प्रेस परिषद (प्रेस काउंसिल आफ इंडिया) के सदस्य बनाए गए हैं। उनका मनोनयन उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने किया। प्रकाश जनवरी 2011 तक प्रेस काउंसिल के सदस्य रहेंगे। 1978 में प्रिंट मीडिया की निगरानी के लिए गठित प्रेस काउंसिल आफ इंडिया अब तक दिखाने का दांत ही साबित हुआ है। एक्शन का अधिकार न होने से पीसीआई के निर्देशों, सलाहों को बड़े अखबार मानते नहीं। इसके चलते धीरे-धीरे पूरी मीडिया से ही प्रेस काउंसिल के नाम से कोई अच्छा-बुरा असर पड़ना बंद हो गया। हाल-फिलहाल, पैसे लेकर खबर प्रकाशित करने के मुद्दे पर पीसीआई के चेयरमैन जीएन रे ने जांच समिति बनाकर दोषी अखबारों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही है। इससे मीडिया के पतन से विचलित बुद्धिजीवियों में एक उम्मीद जगी है। लेकिन पीसीआई द्वारा कोई कार्रवाई वाकई हो पाएगी, यह कह पाना मुश्किल है। प्रकाश जावड़ेकर, जो कि भाजपा के प्रवक्ता भी हैं, पीसीआई में जाकर कोई क्रांति कर पाएंगे, इस संस्था को धारदार बनाने में मदद कर पाएंगे, कम ही उम्मीद है। वजह है उनका मीडिया को मिलाकर चलने वाला स्वभाव, जो कि आमतौर पर पार्टी प्रवक्ताओं का होता है।

बी4एम की मोबाइल एलर्ट सेवा लांच

[caption id="attachment_15260" align="alignleft"]मोबाइल सेवाबी4एम की मोबाइल सेवा की शुरुआत करते पत्रकार जरनैल सिंह.[/caption]मीडिया की खबरों का पर्याय बन चुका भड़ास4मीडिया (बी4एम) अब नए चरण में पहुंच गया है। बी4एम की मोबाइल सेवा शुरू हो चुकी है। मीडिया जगत की बड़ी खबर को एसएमएस के जरिए बी4एम के पाठकों के पास भेजा जाने लगा है। इस सेवा का उदघाटन आज पत्रकार जरनैल सिंह ने किया। बी4एम आफिस में आए जरनैल ने कंप्यूटर पर सेंड बटन क्लिक कर 100 चुनिंदा लोगों तक दो एसएमएस भेजे। पहले एसएमएस में इस सेवा के शुरुआत के बारे में बताया गया। दूसरे में एक ब्रेकिंग न्यूज को प्रसारित किया गया। दोनों एसएमएस यूं हैं-

हे पत्रकार महोदय, तय करो, इस या उस ओर

संवाद-२००९

दिल्ली में पिछले दो दिनों में मीडिया से जुड़े दो बड़े आयोजन हुए। अखबार मालिकों के संगठन इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (आईएनएस) की ओर से होटल ताज में इंडियन न्यूजपेपर कांग्रेस का आयोजन किया गया तो इसके ठीक एक दिन बाद 11 जुलाई को उदयन शर्मा के जन्मदिन पर दिल्ली स्थित कांस्टीट्यूशन क्लब के डिप्टी स्पीकर हाल में संवाद-2009 में लोकसभा चुनाव और मीडिया को सबक विषय पर परिचर्चा आयोजित हुई।

‘देश का मीडिया बाजार की रखैल बन गया’

प्रदीप सौरभ‘मुन्नी मोबाइल’ में पत्रकारिता का भी कच्चा चिट्ठा है : बहुत दिनों बाद हिन्दी वालों के पास एक अलग टेस्ट का हिन्दी उपन्यास आ रहा है। नाम है ‘मुन्नी मोबाइल’। लेखक हैं वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सौरभ। इस उपन्यास में लंदन-शिकागो से लेकर बिहार-यूपी, दिल्ली-एनसीआर, पत्रकारिता-राजनीति, समाज-दंगा, नक्सलवाद-आंदोलन, कालगर्ल-कालसेंटर सब कुछ है। जिन लोगों ने इस उपन्यास के कच्चे रूप (प्रिंट होने से पहले) को पढ़ा है, उनका मानना है कि इस उपन्यास में ‘हिंदी बेस्ट सेलर’ बनने की संभावना है। उपन्यास तो इस महीने के आखिर में छपकर बाजार में आएगा लेकिन भड़ास4मीडिया उपन्यास के प्रकाशक वाणी प्रकाशन के सौजन्य से एक हिस्सा, खासकर वो हिस्सा जो पत्रकारिता से संबंधित है, यहां प्रकाशित कर रहा है। उपन्यास के इस हिस्से में गुजरात दंगों के दौरान मीडिया के रोल और मीडिया की आंतरिक बुनावट पर काफी कुछ कहा-लिखा गया है। तो आइए, ‘मुन्नी मोबाइल’ के एक अंश को पढ़ें-

हिस्सेदारी बेच यारी खत्म करने की बारी

[caption id="attachment_15160" align="alignleft"]जेपीएन-आईएनएमअब साथ-साथ नहीं : जागरण प्रकाशन के सीएमडी महेंद्र मोहन गुप्ता और इंडिपेंडेंट न्यज एंड मीडिया के सीओओ गेविन ओ रेली.[/caption]जागरण प्रकाशन लिमिटेड और इंडिपेंडेंट मीडिया एंड न्यूज के बीच गठजोड़ खत्म होने की ओर : प्रसार और पाठक संख्या के मामले में देश का नंबर वन अखबार दैनिक जागरण प्रकाशित करने वाली कंपनी जागरण प्रकाशन लिमिटेड (जेपीएल) इन दिनों बेहद दबाव में है। जेपीएल में 20 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाली आयरिश मीडिया कंपनी इंडिपेंडेंट न्यूज एंड मीडिया (आईएनएम) अब अपने सभी शेयरों को बेचने पर उतारू हो गई है। इसके पीछे वजह इंडिडेंटेड ग्रुप का कर्ज के बोझ से दबे होना है।

आइए, इस टीवी जर्नलिज्म पर रोएं!

एक वीडियो, जो है भड़ास4मीडिया के पास, जिसमें छिपा है टीवी पत्रकारिता का एक ऐसा भयावह सच, जिसे जान-देख-पढ़ आप सिहर जाएंगे, सिर पर हाथ रख खुद से पूछेंगे- किस समाज में रहते हैं हम! खुद से कहेंगे- क्या यही है चौथा खंभा? दूसरों को समझाएंगे- मीडिया वालों से बच के रहना रे बाबा!


दिल्ली के बड़े पत्रकार और एसपी की याद

[caption id="attachment_15121" align="alignnone"]सवाल-जवाबसवाल पूछने वाली लड़की (बिलकुल बाएं, मंच की ओर मुंह किए) को जवाब देकर समझाते मशहूर पत्रकार राम बहादुर राय. साथ में मंचासीन हैं ‘चौथी दुनिया’ के प्रधान संपादक संतोष भारतीय.[/caption]

सुरेंद्र प्रताप उर्फ एसपी को याद करने दिल्ली में 27 जून दिन शनिवार, दोपहर 3 बजे, पत्रकारों की जो जुटान हुई, उसके बिखरने का वक्त था। ऐलान भी कर दिया गया। तभी एक लड़की मंच की तरफ आती है। कुछ कहने की इजाजत मांगती है। संचालक ने सभी से अनुरोध किया- प्लीज रुक जाइए, इनकी भी सुन जाइए। और वह लड़की बोली। जो जहां जिस मुद्रा में था, रुका। कुछ ने उसके सवाल करने के जज्बे को सराहा। कुछ ने जवाब देने की कोशिश की। लेकिन बिखरती सभा को कितनी देर संभाला जा सकता था, सो, सब लोग चले गए। लड़की भी सवाल को दिमाग में चकरघिन्नी की तरह घुमाते सवाल की तरह चली गई। उसे जवाब न मिला। मिलना भी न था।

अखबार मालिक नहीं झुकता है तो झेलता है

प्रो. निशीथ रायप्रो. निशीथ राय के पीछे पड़ी माया सरकार : सरकारी आवास खाली करने का तुगलकी फरमान : यूपी के एक तेवरदार अखबार के मालिक निशीथ राय सत्ता के निशाने पर बने हुए हैं। सच बोलने-लिखने की जिद का खामियाजा उन्हें लगातार भुगतना पड़ रहा है। लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाले अखबार डेली न्यूज ऐक्टिविस्ट (डीएनए) के चेयरमैन प्रो. निशीथ राय सरकार की पंगेबाजी, उत्पीड़न और दमन से लड़ते हुए कई बार कोर्ट की शरण ले चुके हैं, पर सरकार के आगे झुके एक बार भी नहीं। सत्ता को न झुकना हमेशा से बुरा लगता रहा है, और आज भी लग रहा है। अखबार जब बिजनेस बढ़ाने के माध्यम बन गए हों, सत्ता से सांठगांठ कर लाभ-दाम कमाने के उपक्रम बन चुके हों, ऐसे में कोई अखबार लाभ, प्रलोभन, बिजनेस को लात मार सिर्फ जनपक्षधर खबरों को अपना एजेंडा माने और उसे ही जिए तो उसे, सबको सत्ता के चरणों में देखने के आदी सत्ताधीशों का कोपभाजन तो बनना ही पड़ेगा।

एडिटर को आदेश- बिजनेस हेड को रिपोर्ट करें!

सोचिए, संपादक किसे रिपोर्ट करता होगा? आप कहेंगे- प्रधान संपादक को, सीईओ को, मैनेजिंग एडिटर को, मैनेजिंग डायरेक्टर को, चेयरमैन को या इनमें से किसी को भी। और, आपका कहना ठीक भी है। ऐसा अपने मीडिया में चलता है। लेकिन संपादक अपने बिजनेस हेड को रिपोर्ट करे, यह थोड़ी अजीब बात है। है न! कहां संपादक और कहां बिजनेस हेड। दोनों के अलग-अलग काम। दोनों के अलग-अलग विधान। दोनों के अलग-अलग तेवर। दोनों के अलग-अलग कलेवर। दोनों के अलग-अलग अंदाज। दोनों के अलग-अलग सरोकार। लेकिन इस बाजारवादी व्यवस्था में शेर और बकरी, दोनों एक साथ एक घाट पर पानी पीने लगे हैं। इस मार्केट इकोनामी में शेर सियार को रिपोर्ट करता दिख सकता है तो कहीं सियार हाथी का शिकार करते हुए मिल सकता है। वजह, तीन तिकड़म से माल कमाकर मालामाल करने वाला बंदा सबसे बड़ा अधिकारी मान लिया गया है। अन्य उद्योगों की तरह मीडिया में भी सबका माई-बाप रेवेन्यू हो गया है। यही वजह है कि विचार-समाचार से लेकर अचार बेचने वाले तक, सभी आजकल सुबह-शाम राग ‘सबसे बड़ा रुपैय्या भैया’ गाते हुए मिल जाएंगे। सबके सब रेवेन्यू की छतरी तले आने लगे हैं। रेवेन्यू की ‘जय गान’ कर नंबर बढ़ाने लगे हैं। कुछ लोग देर से ना-नुकुर के बाद शरमाते-सकुचाते रेवेन्यू की छतरी तले आ रहे हैं तो कुछ दौड़ते, जीभ लपलपाते भागे चले आ रहे हैं। इतनी सब कथा-कहानी के बाद अब आते हैं मूल खबर पर।

राष्ट्रीय संस्करण उर्फ जागरण का बड़ा भाई

[caption id="attachment_14990" align="alignnone"]डमीऱाष्ट्रीय संस्करण : लांचिंग से ठीक एक दिन पहले की डमी[/caption]

जागरण समूह का बहुप्रतीक्षित राष्ट्रीय संस्करण आज लांच कर दिया गया लेकिन यह देखने और पढ़ने के लिए सभी लोगों के लिए उपलब्ध नहीं है। अगर आप अपने हाकर से जागरण के राष्ट्रीय संस्करण के बारे में पूछेंगे तो वो कुछ नहीं बताएगा क्योंकि उसे इस बारे में न तो कुछ पता है और न ही बताया गया है। दरअसल, इस ‘प्रीमियम प्रोडक्ट’ को बेचने की अभी स्ट्रेटजी नहीं बनी है।

जी न्यूज से कहिए- बंधु, आप भी जरा सोचिए!

सप्ताह 22वां, 24 मई से 30 मई 2009 तक : टैम वालों ने जी न्यूज की ऐसी दशा बना दी है कि अब जी वालों से ही पूछने का दिल हो रहा है कि ”हे भाई, हम लोगों से कब तक सोचवाते रहेंगे, जरा आप लोग भी तो सोचने का कष्ट करिए। आप लोगों को आखिर टैम वालों ने इतना नीचे क्यों गिरा दिया? क्या टैम वालों को महीने की फीस नहीं दी थी या इन बाजार बाबाओं को मैनेज करने में कहीं चूक हो गई? जो भी हो, जरा सोचिए।” 22वें हफ्ते में टैम के आंकड़े बताते हैं कि एनडीटीवी इंडिया ने जी न्यूज को फाइनली पीट दिया है। जी न्यूज छठें नंबर का न्यूज चैनल हो चुका है। पांचवें नंबर पर कब्जा जमा लिया है एनडीटीवी इंडिया ने और आईबीएन7 चौथे नंबर का चालाक चैनल बनकर उभरा है। जी न्यूज को पिछले ही हफ्ते आईबीएन7 ने पीछे कर दिया था।

रामोजी राव का नाम बदनाम कर रहे मैनेजर

भड़ास4मीडिया पर पिछले वर्ष एक खबर प्रकाशित की गई थी, जिसका शीर्षक था- नौकरी छोड़ा तो अब 75 हजार रुपये जुर्माना भरो! खबर में बताया गया था कि ईटीवी में जो पत्रकार नौकरी शुरू करते हैं तो उनसे किस तरह ढेर-सारे नियम-कानूनों से युक्त एक बांड भरवाया जाता है और तय समयावधि से पहले नौकरी छोड़ने के बाद बांड के नियम-शर्तों के आधार पर ईटीवी प्रबंधन पत्रकार से 75000 रुपये जुर्माना मांगता है। ईटीवी की यह अमानवीय पालिसी अब भी नहीं बदली है। इन अलोकतांत्रिक सेवा-शर्तों के एक भुक्तभोगी ने अपनी पीड़ा का बयान भड़ास ब्लाग पर किया है। क्या कोई बंधुआ मजदूरी की इस प्रथा को रोक सकता है? शीर्षक से प्रकाशित पोस्ट में भुक्तभोगी पत्रकार ने ईटीवी प्रबंधन द्वारा नौकरी छोड़ने के बाद वसूली के लिए भेजे गए धमकी भरे मेल और नौकरी ज्वाइन करते समय भरवाए गए बांड की शर्तों को उजागर किया है।

गिल्लो के प्रेमी पत्रकार की पटना से आई पाती

[caption id="attachment_14887" align="alignleft"]पातीगिल्लो और आशू का प्रेम : दृश्य एक[/caption]कोई पागलपन तो कोई नशा कहता है पर प्यार तो प्यार है। गिल्लो और उनकी मुस्कराहट किसी को भी पागल कर दे, मेरी बिसात क्या! यदि थोड़ा सब्र और इंतजार करने का जज्बा हो तो इनसे आपको भी प्यार हो सकता है। खुशखबरी ये है कि गिल्लो के परिवार में 35 नए मेहमान आये हैं और अब रोटी या बिस्कुट गिल्लो अपने तो खाती ही हैं, बच्चों के लिए भी ले जाती हैं। इस लोकतंत्र के महापर्व में मुझे भी थोड़ी कम फुर्सत मिल रही है। उपर से गर्मी की वजह से गिल्लो भी ज्यादा देर अपने घर में रहना पसंद करती हैं। लेकिन कितना भी कम समय हो, दिल वहीं खींचकर ले जाता है। नहीं जाने पर मन जाने कैसा-कैसा होने लगता है। क्या करें, प्यार न समय देखता है और न दिन।

उठने से पहले ही शांत हो गईं ‘लहरें’

‘लहरें’ के चैनल हेड समेत 13 पत्रकारों का इस्तीफा,  इंडिया न्यूज से जुड़े : देश के पहले 24×7 बालीवुड न्यूज चैनल ‘लहरें’ ने लांच होने से पहले ही दम तोड़ दिया है। इस फिल्मी न्यूज चैनल के साथ दर्जनों लोग जुड़े लेकिन अब सभी इधर-उधर हो चुके हैं। ज्यादातर लोग अपने-अपने संस्थानों से इस्तीफा देकर इस नए न्यूज चैनल के साथ अपना भविष्य संवारने के लिए जुड़े थे। लेकिन मीडियाकर्मियों का भविष्य तब संवरता जब चैनल का अपना कोई भविष्य बन पाता। इस चैनल के साझीदारों के बीच झगड़े के चलते ‘लहरें’ की पूरी टीम को जाना पड़ा है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार ‘लहरें’ के ज्यादातर लोगों की छंटनी की जा चुकी है। जो लोग बचे, वे दो हिस्से में विभक्त हो गए हैं। करीब दर्जन भर लोग ‘लहरें’ की साझीदार कंपनी टीवी9 के साथ हो लिए हैं। वहीं एक दर्जन अन्य मीडियाकर्मी इंडिया न्यूज के साथ जुड़ चुके हैं।

दिल्ली का एक दिन का स्थानीय संपादक

[caption id="attachment_14749" align="alignleft"]प्रिंटलाइन23 अप्रैल 2009 की दैनिक हिंदुस्तान, दिल्ली की प्रिंटलाइन में स्थानीय संपादक के रूप में दिनेश जुयाल का नाम[/caption]दिल्ली ने बहुतों को बनते-बिगड़ते-उजड़ते-बसते देखा है। ‘कुर्सी मद’ में चूर रहने वालों की कुर्सी खिसकने पर उनके दर-दर भटकने के किस्से और दो जून की रोजी-रोटी के लिए परेशान लोगों द्वारा वक्त बदलने पर दुनिया को रोटी बांटने के चर्चे इसी दिल्ली में असल में घटित होते रहे हैं। दिल्ली के दिल में जो बस जाए, उसे दिल्ली बसा देती है। दिल्ली की नजरों से जो गिर जाए, दिल्ली उसे भगा देती है। दिल्ली में स्थायित्व नहीं है। दिल्ली में राज भोगने के मौके किसी के लिए एक दिन के हैं तो किसी [caption id="attachment_14750" align="alignright"]प्रिंटलाइन24 अप्रैल 2009 की दैनिक हिंदुस्तान, दिल्ली की प्रिंटलाइन में स्थानीय संपादक के रूप में प्रमोद जोशी का नाम[/caption]के लिए सौ बरस तक हैं, बस, दिल्ली को जो सूट कर जाए। पर यहां बात हम राजे-महाराजाओं या नेताओं की नहीं करने जा रहे। बात करने जा रहे हैं हिंदी पत्रकारिता की। क्या ऐसा हो सकता है कि दिल्ली से दूर किसी संस्करण के स्थानीय संपादक का नाम उसी अखबार के राष्ट्रीय राजधानी के एडिशन में बतौर स्थानीय संपादक सिर्फ एक दिन के लिए छप जाए? ऐसा मजेदार वाकया हुआ है और यह हुआ है वाकयों के लिए मशहूर दैनिक हिंदुस्तान में। जी हां, दैनिक हिंदुस्तान, दिल्ली का 23 अप्रैल 2009 का अंक देखिए। इसके अंतिम पेज पर बिलकुल नीचे प्रिंटलाइन पर जाइए। इसमें स्थानीय संपादक का नाम प्रमोद जोशी नहीं लिखा मिलेगा। वहां नाम लिखा मिलेगा दिनेश जुयाल का। दिनेश जुयाल भी दैनिक हिंदुस्तान में हैं और स्थानीय संपादक हैं, लेकिन वे दिल्ली के नहीं बल्कि देहरादून संस्करण के स्थानीय संपादक हैं। 23 अप्रैल को जिन पत्रकारों की निगाह प्रिंटलाइन पर पड़ी, वे सभी चौंके थे।

वीरेन डंगवाल ने अमर उजाला को नमस्ते कहा

[caption id="attachment_14696" align="alignnone"]वीरेन डंगवालवीरेन डंगवाल[/caption]मशहूर कवि और वरिष्ठ पत्रकार वीरेन डंगवाल ने अमर उजाला, बरेली के स्थानीय संपादक पद से इस्तीफा दे दिया है। पिछले 27 वर्षों से अमर उजाला के ग्रुप सलाहकार, संपादक और अभिभावक के तौर पर जुड़े रहे वीरेन डंगवाल का इससे अलग हो जाना न सिर्फ अमर उजाला बल्कि हिंदी पत्रकारिता के लिए भी बड़ा झटका है। मनुष्यता, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र में अटूट आस्था रखने वाले वीरेन डंगवाल ने इन आदर्शों-सरोकारों को पत्रकारिता और अखबारी जीवन से कभी अलग नहीं माना। वे उन दुर्लभ संपादकों में से हैं जो सिद्धांत और व्यवहार को अलग-अलग नहीं जीते। वीरेन ने इस्तीफा भी इन्हीं प्रतिबद्धताओं के चलते दिया।

पैसे लेकर चुनावी खबर छापने में जागरण फंसा

[caption id="attachment_14681" align="alignnone"]घोसी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रहे भाजपा प्रत्याशी राम इकबाल सिंहघोसी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रहे भाजपा प्रत्याशी राम इकबाल सिंह[/caption]
खास खबर :
प्रत्याशियों से पैसे लेकर इकतरफा चुनावी खबरें, विश्लेषण और रिपोर्ट छापने के मामले ने नया मोड़ तब ले लिया जब उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के घोसी लोकसभा क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी राम इकबाल सिंह ने दैनिक जागरण के खिलाफ प्रेस काउंसिल आफ इंडिया से लिखित शिकायत कर दी। इस शिकायत में उन्होंने विस्तार से बताया है कि दैनिक जागरण किस तरह से कांग्रेस प्रत्याशी डा. सुधा राय को विजयी बना रहा है और उनके कवरेज का बायकाट किया हुआ है। लिखित शिकायत में राम इकबाल सिंह ने उन खबरों की हेडिंग भी गिनाई है, जो डा. सुधा राय के पक्ष में प्रकाशित की गई हैं। राम इकबाल का कहना है कि उनके समर्थन में जब भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं की सभा होती है, तो वो खबरें भी प्रकाशित नहीं की जातीं। उल्टे उन्हें हराने के लिए नकारात्मक खबरें ‘न नेता न संगठन, रिश्तेदारों के भरोसे चुनावी प्रबन्धन’ शीर्षक से प्रकाशित की जाती हैं।

एक अन्य पत्र घोसी लोकसभा सीट के एक निर्वाचन अभिकर्ता संतोष सिंह ने चुनाव आयोग के घोसी सीट के चुनाव पर्यवेक्षक को लिखा है। इसमें उन्होंने दैनिक जागरण के अलावा दैनिक हिंदुस्तान पर भी प्रत्याशी विशेष से प्रभावित होकर पक्षपातपूर्ण तरीके से चुनावी खबरें प्रकाशित करने का आरोप लगाया है।

ये दोनों पत्र नीचे हू-ब-हू प्रकाशित किए जा रहे हैं…

मेरे दुखी पत्रकार साथी, न बनिए सर्कस का हाथी

सर, आजकल मैं बहुत परेशान हूं। नौकरी तो कर रहा हूं लेकिन सही सेलरी और सही पद से दूर हूं। अन्य जगहों पर कोशिश की पर सभी मंदी की बात कह रहे। आईबीएन7 और जी, यूपी में सेलेक्शन हुआ, पर हाथ में कुछ न आया। सिर्फ निराशा मिल रही है। सात साल से एक ही जगह काम करने से मेरी इमेज भी डाउन हो गई है। साथ ही, मेरी किस्मत भी कुछ अच्छी नहीं है। मेरे जूनियर अच्छे जगहों पर, बड़े पदों काम कर रहे हैं। समझ में नहीं आता है किधर जाऊं?एक पत्रकार, दिल्ली।

एचटी से मुकदमा लड़ने में आपका साथ चाहिए

Yashwant Singhकारपोरेट मीडिया, न्यू मीडिया, होईकोर्ट, न्याय, अपील

मूर्ख दिवस की देर रात जो बातें दिमाग को परेशान किए थीं, 2 अप्रैल की सुबह सोकर उठा तो वही चुहल कर रहीं थीं- बंधु, निकल ले हाईकोर्ट की तरफ, मुकदमा लड़ने। पत्नी आईं और बोलीं- आज तो आपको कोर्ट जाना है। मैं भी मुस्कराया, बोला- पूड़ी तरकारी बांध दो, मुकदमा देर तक खिंचा तो दोपहर में कोर्ट में ही पेट पूजा कर लूंगा, उसी तरह, जैसे, हम लोगों के खानदान वाले करते थे। इतना सुनते ही वे चहंक उठीं।

भड़ास पर खबरें न प्रकाशित करने देने का अनुरोध खारिज

एचटी मीडिया बनाम भड़ास4मीडिया : सुनवाई की अगली तारीख 24 जुलाई

शैलबाला-प्रमोद जोशी प्रकरण से संबंधित खबरें भारत के नंबर वन मीडिया न्यूज पोर्टल भड़ास4मीडिया पर पब्लिश किए जाने के खिलाफ एचटी मीडिया और प्रमोद जोशी द्वारा दिल्ली हाईकोर्ट में दायर केस की पहली सुनवाई आज हुई। वादी एचटी मीडिया और प्रमोद जोशी की तरफ से दायर केस में भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह और तीन अन्य को प्रतिवादी बनाया गया है। हाईकोर्ट में दर्ज इस केस संख्या सीएस (ओएस) 332/2009 की सुनवाई हाईकोर्ट के कोर्ट नंबर 24 में विद्वान न्यायाधीश अनिल कुमार ने की।

मुफ्त में दारू-लड़की मिल जाए, यही इनका संपादकीय

 देरी के लिए माफी। वादे के अनुसार, ‘पत्रकारिता के पापी‘ शीर्षक से एक महिला पत्रकार द्वारा भेजे गए संस्मरण को यहां हूबहू प्रकाशित किया जा रहा है। इसमें कई जगह गालियां हैं और कुछ एडल्ट कंटेंट भी। इसे संपादित नहीं किया गया है ताकि आप इस महिला पत्रकार की भावना, पीड़ा, मजबूरी, दुख, हालात को संपूर्णता के साथ समझ सकें। उन्होंने अपना नाम आर. बिभा प्रकाशित करने को कहा है। मेल आईडी देने से मना किया है। संस्मरण के आगे का पार्ट लेखिका ने अभी भेजा नहीं है। -संपादक

एचटी ग्रुप ने यशवंत समेत 5 पर किया मुकदमा

दैनिक हिंदुस्तान, दिल्ली के वरिष्ठ स्थानीय संपादक प्रमोद जोशी द्वारा वरिष्ठ पत्रकार शैलबाला से दुर्व्यवहार किए जाने के मामले में नया मोड़ तब आ गया जब एचटी मीडिया और प्रमोद जोशी ने संयुक्त रूप से दिल्ली हाईकोर्ट में मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया। सूत्रों के अनुसार शैलबाला के अलावा जिन तीन लोगों को कोर्ट में आरोपी बनाया गया है, उनके नाम हैं- यशवंत सिंह (भड़ास4मीडिया), राजीव रंजन नाग (वरिष्ठ पत्रकार) और अनिल तिवारी (पूर्व एचटी कर्मी)। बताया जाता है कि मानहानि के एवज में एचटी ग्रुप और प्रमोद जोशी ने लाखों रुपये की मांग की है। भड़ास4मीडिया प्रतिनिधि ने प्रमोद जोशी से जब मुकदमे के बाबत फोन पर बात की तो उन्होंने शैलबाला, यशवंत, राजीव और अनिल पर मुकदमा किए जाने की बात को कुबूल किया और इसे संस्थान की रूटीन कार्यवाही का हिस्सा करार दिया।

‘हजारों पत्रकारों की आवाज बनना बी4एम की जीत’

भड़ास4मीडियाभारतीय मीडिया की खबरों का नंबर वन पोर्टल बनने पर भड़ास4मीडिया को देश भर से बधाइयां मिल रही हैं। शुभकामनाएं दी जा रही हैं। सुझाव आ रहे हैं। फोन, एसएमएस व मेल का ताता लगा हुआ है। कुछ टिप्पणियों को प्रकाशित किया जा रहा है, भेजने वालों का नाम-पता हटा कर। -एडिटर


भाई, सिर्फ आठ माह के छोटे से लम्हे में खुद के माद्दा, भगवान और दोस्त-दुश्मनों के हौसले से मिली तरक्की निःसंदेह बहुत बड़ी है. बधाई स्वीकारो.

स्ट्रिंगर का दुख और गिल्लो रानी का सुख

गिल्लो रानीआप पढ़े-लिखे हैं, विचारवान हैं, लेखक हैं, ईमानदार व सीधे-साधे हैं तो पत्रकारिता की बात छोड़िए, इस दुनिया में जीने में आपका दम निकलेगा। दुखों के दंश से गुजरना होगा। दर्द को दवा मानकर जीना होगा। कुछ यही हाल आशुतोष का है। वे पटना  के पत्रकार हैं। मनुष्यों की नगरी में मनुष्यों द्वारा मिला दुख जब बढ़ जाता है तो वो गैर-मनुष्यों के पास चले जाते हैं। उनकी प्रिय गिल्लो रानी न सिर्फ उनका स्वागत करती हैं बल्कि उनके देह पर कूद-फांद कर दुख-दर्द हर लेती हैं।

इंदौर यात्रा : जहाज, दारू, दिग्गज और विमर्श

इंदौर भ्रमण : यशवंत सिंहभाषायी पत्रकारिता महोत्सव में जाने के लिए न्योता मुझे भी मिला था। सात मार्च की सुबह 4 बजे का एलार्म मोबाइल में सेट कर रखा था। पांच बजे हवाई अड्डे के लिए निकल पड़ा। आटो से हवाई अड्डे पहुंचते-पहुंचते सिर में कंपकंपी घुस चुकी थी। दिल्ली का मौसम दिन में बेहद गर्म हो चुका है पर तड़के ठंड का वजूद ठीकठाक होगा, इसका अंदाजा नहीं था। हवाई अड्डे पर औपचारिकताओं के क्रम में लाइन में खड़ा था। प्रेस क्लब आफ इंडिया के महासचिव पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ दिखे तो हाथ हिला अभिवादन किया।

पत्रकारिता के पापियों का खुलासा करेंगी एक जर्नलिस्ट

पत्रकारिता के पापी” – एक महिला पत्रकार के संस्मरण

एक सुंदर लड़की। एंकर बनने का सपना। थोड़े से संपर्क और ढेर सारा उत्साह। निकल पड़ी। एक प्रदेश की राजधानी पहुंची। वहां उसकी एंकर सहेली वेट कर रही थी। गले मिली। आगे बढ़ी………. और अगले एक हफ्ते में ही वो सुंदर लड़की पत्रकारिता की काली कोठरी में कैद हो गई। वहशी संपादकों, रिपोर्टरों, कैमरामैनों के जाल में फंस गई। इन लोगों को चाहिए दारू और देह। इसी को पाने के लिए पत्रकारिता की दुकान सजा रखी थी।

मुझे सपरिवार इच्छा मृत्यु की इजाजत दो!

कुलदीप शर्माकुलदीप द्वारा मौत मांगने के एक साल मार्च महीने में पूरे होंगे। उन्हें अब तक न तो ‘मौत’ मिली और न जीने लायक छोड़ा गया।  भारतीय लोकतंत्र के स्तंभों-खंभों ने उन्हें कोमा-सी स्थिति में रख छोड़ा है।  कुलदीप मीडियाकर्मी हैं। इंदौर में हैं। ‘नई दुनिया’ से जुड़े रहे हैं। प्रबंधन ने कुलदीप से इस्तीफा देने को कहा था। उन्होंने नई नौकरी न ढूंढ पाने की मजबूरी बताई थी। प्रबंधन ने उनका तबादला कर दिया। बीमार पिता को छोड़ दूसरे शहर में नौकरी करने जाने में असमर्थ रहे कुलदीप। सो, कुलदीप ने रहम की गुहार लगाई।

न्यूज चैनलों का कंटेंट लीडर है इंडिया टीवी : कापड़ी

विनोद कापड़ी‘हिन्दी न्यूज का सही लीडर पैदा हो चुका है’ : ‘दर्शकों के लिए खबरों का मतलब सिर्फ इंडिया टीवी’ : ‘इंडिया टीवी लीडर है, लीडर किसी को फॉलो नहीं करता’ : हमें हर न्यूज चैनल कॉपी करने की कोशिश कर रहा’ : ‘टीवी में खबरों का दौर एक बार फिर लौट आया है’ : ‘यह यकीनन खबरों की जीत है, हम खबरों के सप्ताह में जीते हैं’ : ‘आलोचकों से निवेदन, वे स्वस्थ आलोचना करें’ : ‘गलती पर उंगली उठाएं तो अच्छाई पर पीठ भी थपथपाएं’

शुक्रिया मीडियाकर्मियों, लड़ने और जीतने के लिए

शुक्रिया दोस्तों। केंद्र सरकार जिस काले कानून को लाने वाली थी, उसे अब किसी कीमत पर नहीं लाएगी। ऐसा भरोसा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश के टीवी न्यूज चैनलों के संपादकों को एक मीटिंग में दिया। प्रधानमंत्री ने सफाई दी कि सरकार मीडिया पर लगाम लगाने की कोई कोशिश आगे भी नहीं करेगी। प्रधानमंत्री के बयान और आश्वासन के बाद टीवी न्यूज चैनलों के संपादकों और काले कानून के खिलाफ संघर्ष कर रहे पत्रकारों की अलग-अलग बैठकों में आंदोलन वापस लेने का ऐलान किया गया। भड़ास4मीडिया देश भर के मीडियाकर्मियों को इस आंदोलन में तन-मन-वचन से साथ देने के लिए तहेदिल से थैंक्यू कहता है और उम्मीद करता है कि आफत के ऐसे मौकों पर हमारी एकजुटता सदा बनी रहेगी।

इस पूरे मामले पर ज्यादा जानकारी व अन्य विश्लेषणों के लिए इन लिंक पर क्लिक कर सकते हैं—

15 जनवरी के दिन मीडियाकर्मियों को क्या करना चाहिए?

देश के कई जिलों से सैकड़ों पत्रकारों ने भड़ास4मीडिया को मेल भेजकर जानना चाहा है कि 15 जनवरी के दिन वे किस तरह से विरोध दर्ज कराएं? कुछ पत्रकारों का कहना है कि वे जिस पत्रकार संगठन के सदस्य हैं, उसने विरोध दर्ज कराने के लिए किसी तरह का कोई आह्वान नहीं किया है। ऐसे लोगों से सिर्फ यही कहा जा सकता है कि यह मामला किसी पत्रकार संगठन या मीडिया के किसी खास हिस्से का नहीं है। यह हर मीडियाकर्मी और हर आजादी पसंद नागरिक का मामला है। आप संपादक हों, ट्रेनी हों या पत्रकारिता के छात्र हों, 15 जनवरी के दिन निजी तौर पर या सामूहिक तौर पर, जो भी विकल्प उपलब्ध हो, काला दिवस मनाना चाहिए। काला दिवस मनाने का यह मतलब कतई नहीं है कि हम काम पर न जाएं। पढ़ाई-लिखाई के साथ लड़ाई लड़ने के लिए नीचे लिखे तरीकों में से किसी एक को आजमा सकते हैं-

आइए, विरोध करें ताकि हम मुंह दिखा सकें

  • मीडिया के लिए प्रस्तावित काले कानून का विरोध
  • 15 जनवरी को दिन में 12 बजे जंतर-मंतर पहुंचे
  • काली पट्टियां बांध काला दिवस मनाने का ऐलान

मीडिया की आजादी फिर खतरे में है। केंद्र और राज्य सरकारों ने मीडिया को गुलाम बनाने की कोशिशें अतीत में भी कई बार की लेकिन इन साजिशों को मीडियाकर्मियों और लोकतंत्र में आस्था रखने वालों ने सफल नहीं होने दिया। एक बार फिर ऐसा ही संकट का समय हमारे करीब आ चुका है। काला कानून तैयार है। कार्यकाल खत्म होने से ठीक पहले केंद्र सरकार इस कानून को लागू करने के मंसूबे बनाए है। यह कानून संसद के जरिए नहीं, चुपचाप बनाया जा रहा है।

मिस्टर टांगड़ा के टांग अड़ाने से भड़के मिस्टर रोनेदो

अगड़म-बगड़म : मंदी की मार से ‘भरोसा भारत परिवार’ भी अब अछूता नहीं है। हालांकि इसके चेयरमैन ‘नवव्रत राम भरोसा’ ने अपने ‘ध्यानयोगियों’ को यह भरोसा दिलाया था कि उनके यहां कोई भी छंटनी नहीं की जाएगी लेकिन आंतरिक सूत्र बताते हैं कि तकरीबन ढाई सौ लोगों की सूची तैयार कर ली गई है। इऩ लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा। इतना ही नहीं, टीआरपी की रेस में टंगड़ी खाकर काफी नीचे लुढ़के पड़े इसके राष्ट्रीय चैनल ‘हमारा वक्त’ में नया झगड़ा शुरू हो गया है। शायद यह ‘वक्त’ चैनल के लिए सबसे बुरा ‘वक्त’ है। दरअसल एक दो शुक्रवार पहले इस चैनल के हेड ‘धनंजय टांगड़ा’ ने अपने राष्ट्रीय ब्यूरो के संवाददाताओं की आपातकालीन बैठक ली।

मंत्री, पार्टी, पत्रकार, शराब, स्टिंग, प्रसारण, जांच, कार्रवाई

Sting Operationहरिद्वार प्रेस क्लब के अध्यक्ष आदेश त्यागी ने फर्जी स्टिंग के जरिए उत्तराखंड के कैबिनेट मंत्री दिवाकर भट्ट को ब्लैकमेल करने के आरोप में आज तक के स्थानीय प्रतिनिधि संजय आर्य को क्लब की सदस्यता से निष्कासित कर दिया  और चार अन्य पत्रकारों को निलंबित कर उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया है। ये चार पत्रकार हैं- रामनरेश यादव, रुपेश शर्मा, मनोज सेठी और आशीष मिश्रा। हरिद्वार प्रेस क्लब में शिकायत खुद मंत्री दिवाकर भट्ट ने दर्ज कराई थी।

कपाड़िया साहब कोई आम मीडियाकर्मी तो हैं नहीं !

मंदी की मार खाए कपाड़िया साहब नई पारी महाराष्ट्र के प्रमुख दैनिक लोकमत के साथ शुरू करेंगे। अभी तक वे उस वेंचर के सर्वेसर्वा हैं जो मंदी की बलि चढ़ गया। यह वेंचर है जागरण समूह और टीवी 18 ग्रुप के मिल-जुल कर देश भर में बिजनेस अखबार निकालने का। कपाड़िया इस वेंचर के सीईओ और एमडी हैं। पर यह वेंचर मूर्त रूप न ले सका। मंदी की आंधी चल पड़ी। कहने को तो यह वेंचर केवल पोस्टपोन किया गया है लेकिन सूत्र बताते हैं कि इसे पूरी तरह कैंसिल कर दिया गया है। भर्ती किए जा चुके सैकड़ों लोगों को बाय-बाय बोलकर बेरोजगार कर दिया गया।

चैनल में भूत, नहले पर दहला, ये लो ठन गई!

अगड़म-बगड़म : भूत- इस साल धूमधाम से लांच हुए और बाद में तेजी से धड़ाम हुए एक न्यूज चैनल में काम करने वालों के बीच इन दिनों एक अफवाह जमकर फैली हुई है। यह अफवाह भूत की है। कहा जा रहा है कि चैनल के बेसमेंट से एक अजीब सी आवाज आती रहती है। तरह-तरह की आवाजें अधिकतर रात में ही आती हैं। इससे कई लोगों में डर बैठ गया है। बताया जाता है कि आफिस की जगह पर पहले जूतों की फैक्ट्री थी। इसमें आग लग गई थी। कई मजदूर जल गए थे। अब यहां बसमेंट में ताला लग गया है। यहीं से आवाजें आती हैं।  कई लोग यहां तक कहते हैं कि इन भूतों के चलते ही चैनल लगातार अस्थिर है। हो सकता है निकट भविष्य में प्रबंधन के लोग ओझा-सोखा के साथ यहां झाड़-फूंक कराएं।

टाइम्स समूह ने 1400 लोगों से नाता तोड़ा!

खबर है कि टाइम्स आफ इंडिया सहित इस ग्रुप की सभी मीडिया कंपनियों के कुल 1400 लोगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है! सूत्रों के अनुसार पिछले दिनों टाइम्स प्रबंधन ने पूरे ग्रुप का एक सर्वे कराकर खर्चे बचाने के लिए अतिरिक्त स्टाफ से मुक्ति पाने के लिए सर्वे कराया। बताया जाता है कि कुल 2500 लोगों की एक लिस्ट बनाई गई जिन्हें फालतू स्टाफ माना गया है।

मंदी के मारे मीडिया हाउसों के पत्रकार बने बेचारे

मंदी की मार से बचने के नाम पर किए जा रहे उपायों से मीडिया इंडस्ट्री में हजारों पत्रकारों को बेकार होना पड़ा है। भड़ास4मीडिया के पास मीडिया संस्थानों से छन छन कर आ रही सूचनाओं से पता चलता है कि स्थिति विकट हो चली है। हर मीडिया हाउस अपने सरवाइवल के लिए और मंदी की कथित आंधी से उबरने के लिए मैन पावर में कटौती का मंत्र अपनाए है। इससे हर रोज सैकड़ों लोगों की रोजी-रोटी छिन रही है। पता चला है कि इंडिया न्यूज ने अपने मुंबई आफिस को बंद करते हुए 30 से 35 लोगों को टाटा बाय बाय बोल दिया है। जी स्पोर्ट्स से 25 लोग निकाले गए हैं। ई 24 के मुंबई से संचालन को बंद कर इसे दिल्ली शिफ्ट किया जा रहा है। सहारा के चैनलों से कई जर्नलिस्टों को बाहर किए जाने की सूचना है। ईटीवी ने नया फरमान जारी किया है। ये सभी खबरें अब विस्तार से-

देश हित में काम किया तो चली गई नौकरी

Ashok Kumarराज ठाकरे के खिलाफ आंदोलन का खामियाजा युवा पत्रकार अशोक कुमार को भुगतना पड़ा। अमर उजाला, अलीगढ़ की नौकरी चली गई। राज की राजनीति के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान पर निकले अशोक व साथियों ने अलीगढ़, लखनऊ, सुल्तानपुर, इलाहाबाद, बनारस, गोरखपुर, सलेमपुर, पटना, मेरठ और दिल्ली की यात्रा पूरी कर ली है। इन जगहों पर युवाओं के हस्ताक्षर मांग पत्र पर लिए। इसमें राज की पार्टी को चुनाव न लड़ने देने व उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाने की मांग की गई है।

नौकरी छोड़ा तो अब 75 हजार रुपये जुर्माना भरो !!

ईटीवी में काम करने वाले मीडियाकर्मी हर कदम पर हैरान-परेशान रहते हैं। दूसरों के दुख-दर्द को दुनिया के सामने लाने-बताने-दिखाने वाले ये पत्रकार अपने प्रबंधन के पीड़ित बन जाते हैं। चतुर प्रबंधन इन्हें इस कदर जालिम नियम-कानूनों में कैद रखता है कि ये अपना हक तक मांगने की जुर्रत नहीं कर पाते। कुछ लोगों ने भड़ास4मीडिया को जब इस बारे में जानकारी दी तो एक टीम ने पूरे मामले की छानबीन की। इसके बाद जो कहानी सामने आई वो इस बड़े मीडिया हाउस पर बड़े काले धब्बे की तरह है। कुछ दस्तावेज भड़ास4मीडिया टीम के हाथ लगे हैं। इनमें से एक को प्रकाशित किया जा रहा है। यह दस्तावेज शोषण की पूरी कहानी बयान करता है। इससे पता चलता है कि ईटीवी मैनेजमेंट दास प्रथा के जमाने के नियम-कानूनों में अपने कर्मचारियों को जकड़े रहता है।

टीआरपी के बहाने नकवी, शाजी और कापड़ी

टीवी और टीआरपी

इस बार टीआरपी के बहाने टाप थ्री न्यूज चैनलों के साथ-साथ इनके न्यूज लीडरों की भी बात होगी ताकि हमारे पाठक और उनके दर्शक न्यूज चैनलों के साथ-साथ उसके पीछे के चेहरों के बारे में भी राय-समझ बना सकें। स्टार न्यूज बीते (12 अक्टूबर से 18 अक्टूबर 2008) हफ्ते भले ही नंबर दो पर पहुंच गया हो लेकिन दर्शकों के दिल में इसने नंबर वन न्यूज चैनल जैसी पोजीशन बना ली है।

नान-न्यूज के जरिए आज तक की नंबर वन की कुर्सी बरकरार रखने की मुहिम ज्यादा दिनों तक सफल होती नहीं दिख रही है। कई बार उसे नान-न्यूज के उस्ताद इंडिया टीवी से मुंहकी खानी पड़ी।

कई चैनलों में सेलरी संकट, दीपावली होगी काली

कहीं कंपनी के दिवालिया होने के आसार,  कहीं नई-पुरानी कंपनी की नीतियों में तकरार और कहीं आर्थिक मंदी की मार- अंततः भुगत रहा है पत्रकार। वायस आफ इंडिया, लाइव इंडिया और आईटीएन–  इन तीनों जगहों पर कार्यरत पत्रकार अपने दुर्भाग्य पर आंसू बहा रहे हैं। वायस आफ इंडिया को लेकर इतनी तरह की खबरें, सूचनाएं और अफवाह मीडिया मार्केट में पसरी हुई है कि अगर उन सभी पर कान दिया जाए तो उससे एक ‘कंप्लीट न्यूज पैकेज’ तैयार हो सकता है। संक्षेप में बस इतना कि वीओआई प्रबंधन लाचारी की उस चरम स्थिति में है जिसमें ‘क्या करें, क्या न करें’ तय करना मुश्किल हो रहा है। रीयल स्टेट बिजनेस में भारी मंदी और अन्य कई वजहों से त्रिवेणी समूह के आगे दिवालिया होने की स्थिति आन खड़ी हुई है।

दिल्ली में नवजात नई दुनिया को तगड़ा झटका

किसी अखबार की मूल पूंजी क्या होती है? उसकी विश्वसनीयता। तभी तो कई पीढ़ियों तक लोग एक ही अखबार को घर में मंगाते रहते हैं। लंबे समय तक अखबार को परखने के बाद पाठक जब अखबार को अपना लेता है तब उसकी सूचनाओं पर आंख मूंद कर भरोसा करने लगता है। बदले में अखबार भी अपनी विश्वसनीयता का ध्यान रखत