हिंदुस्तान की परंपरा- मरने वाला महान था

राजीवमहान था तो वो जीते-जी भी रहा होगा…अगर जीते जी महान कहते तो क्या वो महानता का टैक्स मांग लेता…? अतुल माहेश्वरी को जानने वाले पत्रकार प्राणियों की संख्या हजारों में न हो लेकिन सैकड़ों में तो है ही, इसमें कोई शक भी नहीं। कुछ बहुत नजदीक से तो कुछ दूर से उन्हें जानते रहे होंगे। अतुल माहेश्वरी के निधन से पहले कभी किसी पत्रकार प्राणी ने न कोई अफसाना लिखा और न ही फलसफा या फसाना। …आज झड़ी लगी हुई है, क्या इन सभी को इसी दिन का इंतजार था?

बहरहाल, कोई भी इंसान न तो सभी के लिए अच्छा हो सकता है और न सभी के लिए बुरा। अतुल माहेश्वरी भी एक इंसान ही थे। उनके अंदर भी अच्छाइयां और बुराइयां दोनों ही थीं। अच्छाई लिखने का तो जैसे कंपटीशन शुरू हो गया है। मगर, मैंने अतुल माहेश्वरी को जैसा देखा-समझा उसी के अनुरूप मेरा ये संस्मरण हैः

हर मीडिया हाउस की तरह खेमेबंदी शुरू से ही अमर उजाला का हिस्सा रही है। मुरारीलाल जी के निधन के बाद अशोक जी का ग्रुप और अतुल जी का ग्रुप सतह पर आ चुका था। प्रबंधन में अशोक अग्रवाल के बाद सबसे ज्यादा अतुल माहेश्वरी ही की चलती थी। इतनी ज्यादा कि अतुल माहेश्वरी कभी-कभी अशोक अग्रवाल के फैसलों को भी पलट देते थे और अशोक अग्रवाल ऐतराज भी जोरदार ढंग से नहीं कर पाते थे।

दोनों परिवारों के भाइयों में बड़ा होने के नाते अमर उजाला में ज्यादातर नौकरियां अशोक अग्रवाल ही देते थे। बरेली में अशोक अग्रवाल के ग्रुप का असर ज्यादा था। अतुल माहेश्वरी की आकांक्षा बरेली अमर उजाला में भी अपनी हैसियत अशोक अग्रवाल के बराबर दिखाने की रहती थी। अशोक अग्रवाल अखबार बनाने वालों यानी जर्नलिस्ट और नॉन जर्नलिस्ट (ऑफिस स्टाफ) को ज्यादा तवज्‍जो देते थे, जबकि अतुल माहेश्वरी अखबार बंटवाने वालों (न्यूज पेपर एजेंट्स) को प्रमुखता देते थे।

दिसंबर 1988 में, प्रादेशिक डेस्क पर अशोक अग्रवाल ने एक सब एडिटर की नियुक्ति की। उन दिनों वनकर्मियों का आंदोलन जोर पकड़ रहा था। नैनीताल-हल्द्वानी डेटलाइन से रोज हेडलाइन छपती थी। नैनीताल-हल्द्वानी के एक एजेंट अतुल माहेश्वरी के खासोखास थे। अतुल माहेशवरी की कृपा से उन्हें जिला संवाददाता का खिताब भी मिला हुआ था। एक दिन रामनगर के संवाददाता ने खबर भेजी कि सरकार से क्षुब्ध वन कर्मियों ने आत्मदाह की कोशिश की। उस दिन नैनीताल-हल्द्वानी की जगह हेडलाइन में रामनगर था। हेडलाइन में रामनगर छपना इन महाश्य को अखर गया। गोकि नैनीताल जिले के पन्नों पर किसी और शहर की डेटलाइन बनना उनकी तौहीन थी।

अतुल माहेश्वरी मेरठ में थे। शिकायत सीधे मेरठ की गई। अतुल माहेश्वरी अपने वायदे के मुताबिक जब बरेली आए तो नैनीताल-हल्द्वानी के संवाददाता/एजेंट महोदय भी बरेली टपके और सीधे अतुल माहेश्वरी के ऑफिस में उतर गए। उस वक्त तक अशोक अग्रवाल और अतुल माहेश्वरी का ऑफिस एक ही था। यूं तो कोई भी संवाददाता बिना बुलाए मुख्यालय नहीं आ सकता था, लेकिन नैनीताल-हल्द्वानी के संवाददाता/एजेंट इस विषय में अपवाद थे। इसलिए संपादकीय में कुछ खास चर्चा नहीं हुई। अतुल माहेश्वरी के कमरे से कॉलवेल की आवाज आई और कुछ देर बाद ही चपरासी नैनीताल-हल्द्वानी की डाक लेकर डेस्क पर हाजिर था। डेस्क प्रभारी ने खबरों का पैकेट सब-एडिटर की तरफ बढ़ा दिया। हर रोज की तरह बड़ी खबर तय करने और जल्दी-जल्दी खबर बनाने का क्रम जारी था।

इसी बीच अतुल माहेश्वरी ने फिर कॉलवेल बजाई और सब एडिटर को तलब किया। नैनीताल-हल्द्वानी के संवाददाता/एजेंट महोदय अतुल माहेश्वरी के साथ ही बैठे थे। सामान्य शिष्टाचार स्वीकार करने के बाद अतुल माहेश्वरी ने हेडलाइन में रामनगर को डेटलाइन बनाने की वजह सब एडिटर से मालूम की। वजह जानने के बाद वो थोड़ा झेंपे, उनकी झेंप को संवाददाता/एजेंट महोदय ने भी नोटिस किया और बर्वल-नॉन बर्वल ऐसा नोशन दिया कि अतुल माहेश्वरी, उस बेचारे सब एडिटर पर टूट पड़े। अब दोनों का एक सवाल था- रामनगर बड़ा है या हल्द्वानी…? हल्द्वानी ही बड़ा होगा… सब एडिटर का “होगा” शब्द को अतुल माहेश्वरी ने हथियार बना लिया। अमर उजाला में सब एडिटर बनने की चाह रखने वाले की योग्यता “इनसाइकलोपीडिया” बता डाली। अतुल माहेश्वरी का हुक्म था कि सब एडिटर “हल्द्वानी ही बड़ा होगा…” कहने के लिए संवाददाता/एजेंट महोदय से माफी मांगे और माफीनामा लिख कर भी दे। उस वक्त अतुल माहेश्वरी का स्वर इतना भारी और ऊंचा था कि सभी लोग काम छोड़ कर देखने लगे कि आखिर माजरा क्या है।

शाब्दिक माफी से बात नहीं बनी। सब एडिटर ने लिखित माफीनामा देने से इनकार कर दिया। इनकार इसलिए कि उस सब एडिटर को गुमान था कि वो अशोक अग्रवाल के ग्रुप का है और अशोक अग्रवाल बरेली लौटने पर अपने आदमी को बचा ही लेंगे। उसे ये भी गलतफहमी थी कि हेडलाइंस से लेकर जनवाणी तक का चयन तो डेस्क प्रभारी की सहमति से होता है। अगर कोई गलती मानी भी जाती है तो सब एडिटर से पहले डेस्क प्रभारी को भी सजा मिलेगी। चूंकि डेस्क प्रभारी अशोक अग्रवाल के बहुत नजदीकी लोगों में से एक थे अतुल माहेश्वरी भी उन्हें सम्मान के साथ डाक्टर साहब पुकारते थे, इसलिए दोनों में किसी को भी सजा की आशंका खत्म हो चुकी थी।

हाउस की पॉलिसी के तहत महीने की सात तारीख को सभी की तनख्वाह डेस्क पर या बैंक में पहुंच चुकी थी। निरीह उपसंपादक को एकाउंटस में बुलाकर उस दिन तक फुल एंड फाइनल का पैकेट बना कर थमा दिया गया। उसके करियर को इस तरह फांसी के फंदे पर किसने और क्यों चढ़ाया? अतुल जी का आदेश है, एकाउंटेंट का जबाब था, एकाउंटेंट ने आगे जोड़ा- आप चाहो तो अशोक जी के आने तक फुल एंड फाइनल पर साइन मत करो।

अशोक अग्रवाल आए… उन्होंने अतुल माहेश्वरी से बात करने का आश्वान भी दिया… फिर जबाब दिया लाल्ला तू मेरठ चला जा, अतुल से माफी मांग ले वो ही कुछ कर सकेगा तेरे मामले में…!!!

अतुल माहेश्वरी के झूठे अहंकारी फरमान की बलि चढ़े भविष्य के शव को उस बेचारे पैदल पत्रकार ने कई महीनों तक अपने ही कंधों पर ढोया… बरेली से शुरू हुए बनारस के एक नामी-गिरामी अखबार में महीनों बेगारी की…तब कहीं जाकर आठ सौ रुपये महीना की पगार पर फिर से जीवन शुरू किया…

अतुल माहेश्वरी की तस्बीर के ये दो पहलू हैं… पहला जिसे अपना कह दिया उसके लिए स्याह-सफेद कुछ नहीं। दूसरा, अपने अहंकार के आड़े आने वाले शख्स को जड़ से खत्म कर देने का दुस्साहस…!!!

अतुल माहेश्वरी के बहाने गुरु तुल्य बीरेन डंगवाल जी से भी कुछ कहने की इच्छा है। अपनी उम्र का तीस साल से ज्यादा समय डंगवाल जी ने अमर उजाला के साथ जिया है। वो अमर उजाला की एक यूनिट के घोषित संपादक भी रहे हैं (घोषित संपादक इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि उदय जी ने अमर उजाला को पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पहाड़ों का प्रतिनिधि समाचार पत्र बनाया। किताबों में लिखी बात पर कोई विश्वास करे या न करे लेकिन अमर उजाला में छपे शब्दों को लोग ब्रह्म लेख मानते थे- अखबार की ऐसी विश्वसनीयता उन्होंने स्थापित की, लेकिन वो संपादक नहीं बन पाए। वो सहायक संपादक ही रहे और यहीं सेवानिवृत भी हो गए)। डंगवाल सर, आपने अतुल माहेश्वरी को कभी सिखाया खबर कैसे लिखी जाती है… अतुल माहेश्वरी से कभी कहा, चलो अपने रिपोर्टर के साथ आप भी मेरठ के दंगों की लाइव रिपोर्टिंग करो।

डंगवाल सर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पहाड़ों के विकास में अमर उजाला के योगदान को कोई भी नकार नहीं सकता। आपने अमर उजाला के इस योगदान पर कभी कोई गोष्ठी सेमिनार, सभा या सम्मेलन करवाया। सेवानिवृत्ति के बावजूद देश-विदेश के कई शिक्षा संस्थानों में आपकी तूती बोलती है… आपने कहीं भी अमर उजाला के प्रतिमानों का अध्याय जुड़वाने की कोशिश की। अगर एक अखबार को व्यवसाय की तरह चलाना-बढ़ाना ही पत्रकारिता के तमाम प्रतिमान गढ़ना है, तो सुब्रत राय ने अमर उजाला और अतुल माहेश्वरी से ज्यादा बड़े-बड़े प्रतिमान गढ़े हैं। सुब्रत राय के साथ ओपी श्रीवास्तव आज भी पहले छोटे भाई की हैसियत रखते हैं। उनके बाद जयब्रत राय का नंबर आता है। सुब्रत राय ने किसी को व्यवसाय से बेदखल भी नहीं किया है। क्या सुब्रत राय और उनके मीडिया हाउस की तारीफ में कसीदे गढ़ने पर आपको आपत्ति होगी।

उन तमाम बाहरी लोगों में से एक मैं भी हूं जो पिता मुरारी लाल और बेटे अतुल माहेश्वरी दोनों की रस्म उठावनी में शामिल हुआ। मुरारी लाल जी के निधन के समय अशोक-अतुल-राजुल और बाकी भाइयों में फर्क करना मुश्किल था… अतुल की उठावनी में अशोक अग्रवाल बेगानों की तरह रस्म पंडाल में दूर एक कुर्सी पर बैठे रहे… अतुल माहेश्वरी से इतने दूर रहना पड़ेगा… आठ जनवरी 1989 को मुरारीलाल जी के निधन के बाद ये तो किसी ने सोचा भी न था…!!

लेखक राजीव शर्मा एस-1 न्यूज चैनल में डायरेक्टर न्यूज के पद पर कार्यरत हैं.

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Comments on “हिंदुस्तान की परंपरा- मरने वाला महान था

  • sudhir.gautam says:

    आम तौर पर मृत्यु और उसके बाद संस्मरणों, श्रद्धांजलियों का दौर का दौर ऐसा चलता है मानों मरने वाले से जिन्दा बचे हुओ के लिखित या मौखिक करार हों की…
    सच को झूठ लिखकर पेश करेंगे ऐसे, झूठ सच का भी बाप नजर आएगा.
    आप बस एक बार मर के जरा देखें “सर”, कसीदे पढने का ये शौक संवर जाएगा.
    खैर हमारे जैसा की परम्परा है, चाहे जो भी हो, जो नहीं रहा वो अच्छा था, जब तक था, नहीं रहने लायक था, इसी भड़ास पर स्वनामधन्य प्रभु चावला के सुपुत्र अंकुर चावला के साथ कंपनी लॉ बोर्ड (सीएलबी) रिश्वत कांड में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा अतुल माहेश्वरी के खिलाफ चार्जशीट वाली खबर भी थी, इसी में मौत और कसीदे भी हैं. सच चाहे जो भी हो आपका ये लेख पर्याप्त है, समझने के लिए.

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  • vivek bajpai says:

    सच को बयां करने वाला लेख लिखने के लिए आपको धन्यवाद लेकिन इस महान भारत की परंपरा ही बन गई है कि मरने के बाद लोगों की कुछ ज्यादा ही अच्छाइयां याद आने लगती हैं। या यूं कहें कि बुराइयां भी अच्छाइयों में तब्दील होकर नजर आने लगती हैं। हालांकि ये लिखकर मैं दिवंगत आत्मा को कोई कष्ट नहीं पहुंचाना चाहता हूं। विवेक वाजपेयी टीवी पत्रकार

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