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अमर सिंह की तीसरी कसम

अमर सिंह: अब किसी बेगानी शादी का अब्दुल्ला दीवाना न बनने की कसम खाई : पश्चाताप की आग में जल कर ‘पापों’ से मुक्ति पाने का सिलसिला जारी रखे हुए हैं अमर सिंह : अपने ब्लाग पर नई पोस्ट में वर्तमान जीवन दर्शन की गूढ़ बातें बताईं : बोले- बड़े लोगों में कभी निजी झगड़ा नहीं होता, सिर्फ महत्वाकांक्षाओं का टकराव होता है और इस ‘युद्ध’ में खुद-ब-खुद सेनापति बन जाते हैं मेरे जैसे अब्दुल्ला दीवाना टाइप लोग :

अमर सिंह: अब किसी बेगानी शादी का अब्दुल्ला दीवाना न बनने की कसम खाई : पश्चाताप की आग में जल कर ‘पापों’ से मुक्ति पाने का सिलसिला जारी रखे हुए हैं अमर सिंह : अपने ब्लाग पर नई पोस्ट में वर्तमान जीवन दर्शन की गूढ़ बातें बताईं : बोले- बड़े लोगों में कभी निजी झगड़ा नहीं होता, सिर्फ महत्वाकांक्षाओं का टकराव होता है और इस ‘युद्ध’ में खुद-ब-खुद सेनापति बन जाते हैं मेरे जैसे अब्दुल्ला दीवाना टाइप लोग :

मैं अब किसी का अब्दुल्ला नहीं बनूंगा

अमर सिंह

“बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना”, एक प्रचलित कहावत है जो कि साठ के दशक में राजकपूर जी की एक फिल्म के गीत के रूप में भी प्रसिद्द हुई थी. कहने को तो यह एक प्रसिद्द गीत का मुखड़ा मात्र या एक प्रचलित कहावत भर ही है, परन्तु इसके अंदर का दिया मर्म कभी-कभी किसी के जीवन का मार्मिक तथ्य बन सकता है. मै जिम्मेदारी से कह सकता हूँ कि ऐसा ही एक अब्दुल्ला मै भी हूँ. जीवन में मेरी किसी से व्यक्तिगत या निजी लड़ाई नहीं रही.

विभिन्न क्षेत्रों के काफी बड़े नामचीन और प्रसिद्ध लोग मेरे निकट रहे या मैं नादान नादानी में समझ बैठा कि मैं उनका बड़ा नजदीकी हूं. जाने अन्जाने मैं उन सबका घोषित अब्दुल्ला बन गया और उनके बिना कहे वह सब कुछ करने लगा, जिससे उन्हें लगे कि, वाह भाई वाह, क्या अब्दुल्ला है! कभी दुबई, कभी सिंगापुर, कभी दिल्ली तो कभी मुम्बई अब्दुल्ला बन कर मैंने जाने अन्जाने बिना किसी कारण के अपने तथाकथित नजदीकियों के बैरियों को ठीक ठाक करने का फैसला ले लिया. एक बड़े अभिनेता से मैंने लोहा लिया, पता चला जिनके कारण ऐसा किया उनका पूरा परिवार उक्त अभिनेता का चरणरज ले रहा है. एक दूसरे अभिनेता की शक्ल देखना बंद कर दिया, पता चला कि हमारे लोग उस अभिनेता के परिवार के मुखिया से सार्वजनिक क्षमायाचना कर रहे हैं.

समाज में बड़े तबकों पर पहुंचे लोगों का निजी झगड़ा तो होता ही नहीं बल्कि महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति आपूर्ति का लक्ष्य होता है और परस्पर उनके जीवन में आपसी शालीनता का लेन-देन, प्रदर्शन और भाईचारे का विलक्षण और अदभुत आवरण. महत्वाकांक्षाओं एवं स्वार्थ के टकराव के संघर्ष की जिम्मेदारी बड़े लोगों के अब्दुल्लाओं के कन्धों पर होती है. मेरे अब्दुल्ला तुम्हारे अब्दुल्ला से लड़ेंगे, हम तुम साथ-साथ काम करेंगे, खाएंगे, पिएंगे और मंचों पर समाज में शालीनता से एक दूसरे की प्रशंसा करते हुए कहतें मिलेंगे कि “हम साथ साथ हैं”. आने वाले नव वर्ष का मेरा संकल्प है कि मैं अब किसी का अब्दुल्ला नहीं बनूंगा. अब्दुल्ला प्यादा होता है और उसकी नियति पिटना होती है. बहुत पिट चुका हूं और ज्यादा पिटना नहीं चाहता इसलिए अब मैं जीवन भर किसी बेगानी शादी का अब्दुल्ला दीवाना नहीं बनूंगा, चाहे कुछ भी हो.

मेरे एक पुराने मित्र है, चुप रहते है अपना काम करते है और किसी अपने की भी समस्या आए तो कह देते है कि “उधो का ना लेना, ना माधो को कुछ देना”. “अहं ब्रम्हास्मि”, मैं, मैं और केवल मैं, मैंमय जीवन से कुछ लोग उन्हें भले ही आत्म केंद्रित होने या रहने का आरोपी बनाएँ लेकिन साहब ऐसे ही लोग सुख, समृद्धि और शान्ति की संतुष्टि पाते है. समस्या आग है चाहे अपनी हो या या पराए की तो मेरे प्यारे अब्दुल्ला भाइयों समस्या की आग से दूर अपने स्वार्थ के पानी की कीमत समझो नहीं तो हंसी उड़ाकर ज़माना तो यही कहेगा कि…

“बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना,
ऐसे मनमौजी को मुश्किल है समझाना.”

अमर सिंह के ब्लाग से साभार

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0 Comments

  1. यशोवर्धन नायक टीकमगढ़ (एम.पी.)

    November 7, 2010 at 4:11 pm

    अमर सिंह जी ,किसी ने आपको जबरिया तो अब्दुल्ला बनाया नहीं था ,दरअसल आप ही आनन्-फानन में खुद को देश भर में किंग-मेकर के रूप में दिखाना चाहते थे ,अमर सिंह जी ,किसी काम को करना या उसका अनुमोदन करना या उस काम की प्रेरणा देना सामान रूप से “पाप” माना गया है ,आपने ऐसे अनगिनत काम किये होंगे ? लेकिन आपका विधवा-विलाप काफी दिलचस्प लगता है. भले आदमी राजनीति अपार धीरज का खेल है., “रहिमन चुप हो बैठिये ,देख दिनन के फेर ,जब दिन नीके आयेंगे बनत न लागे देर ”

  2. Ramesh

    November 9, 2010 at 3:07 am

    अमर सिंह जी आप भी कम एहसान फरामोश नहीं है, भारत के कई हिस्सों से कई लोग आपको देखने सिंगापोर गए थे आपके इलाज के दौरान, आपने वहां से लौटने के बाद एक का भी धन्यवाद् नहीं किया. गौर से सोचियेगा की किन किन लोगो का नहीं किया तो शायद आपको याद आ जाये की आप भी कम नहीं हैं. इनमे २ पत्रकार भी थे.

  3. shravan shukla

    November 9, 2010 at 9:35 am

    yashovarman ji bilkul sahi kaha hai aapne..poorn sahmat hoon mai

  4. anami sharan babal

    November 12, 2010 at 9:37 am

    sholey ka ek damdar dilogue h tera kya hoga kalia? yehi hal ahne thakur amar singh ki ho gayi h ki sare log muskurate huye puchh raha h ki amar tera kya hua mulayam ki cycle se girne se pahle to aisa hangama khada kar rakha tha mano pura aasman hi utha lenge magar darte darte mulayam bhaiya ne jab amar ko apni cycle se phek hi diya to thakur sahab ki pol hi khul gayi ki ye kewal garjane wale badal h samajwadi mukhota ko khatre me dal kar mulayam bhaiya bhi rahat
    lene lage sp se nikale jane se pahle tamjham khada karne wale thakur as ko bhi
    ye guman na tha ki ;nikale jane ke bad itni buri halat ho jayegi aaj we na ghar ke hai na ghat ke hi rah gaye apni ruswaie par tp amar bhaiya ko bhi yakin na tha dusro par tana marte sherp shayrt se ban chhodte 2 we khud ban se ghayal ho gaye thakur ka sp se kya hate filmi taro sitaro ka mela b gayab ho gaya amar babu ko bigboss ke ghar me entry nahi milne se kamse kam mujhe vvvgam hua ki kamse kam inko parde par dekhne ka jo ej mauka milta wo b nahi mila apne amar babu bhale ye kah kar man ke gam ko gam kare ki we ab abdulla nahi banege to pyare amar babu ye suna kise rahe hai kingmaker bante bante abdulla diwana to dur ki kaudi koie apko bulana b nahi chahta umar me chhota hone ke karan bin mange ek free me salah de hi de rha hu ki apan mulayam bhaiya b apki yarah hi dil ka saf aur nam ki tarah hi mulayam h unse mafi mang kar fir se sp me ghus jao apne dekha pura rampuri mulayam ke pet me utar dene wale azam babu rampur wale ki fir sp me dhum dham se wapsi ho gayi fir aap to mulayam se itne karib rahe h ki logo ko ye bharam hone laga tha ki aap yadav ho ya mulayam thakur ? bhaiya chhodo guman aur yehi mauka h ki sp me fir se ghuso andar ka raj free me hi bata de raha hu ki jitni apko sp ki jarurat h usse b jyada apki jaruray mumu bhaiya ko apki h bas aksar mauka chukne wale thakur amar singh is bar mauka mat chuko warna ghar ki shadi me begana abdulla b nahi ban ya rah paoge apne thakur sahab bhale hi apse kam mila hu par kya kare amar babu apke poet wala mood h mujhe sabse pyara h aur mera kavi hi ajkal gam me h yehi gam h

    Sunday, 07 November 2010 13:36 अमर सिंह भड़ास4मीडिया – कहिन
    : अब किसी बेगानी शादी का अब्दुल्ला दीवाना न बनने की कसम खाई : पश्चाताप की आग में जल कर ‘पापों’ से मुक्ति पाने का सिलसिला जारी रखे हुए हैं अमर सिंह : अपने ब्लाग पर नई पोस्ट में वर्तमान जीवन दर्शन की गूढ़ बातें बताईं : बोले- बड़े लोगों में कभी निजी झगड़ा नहीं होता, सिर्फ महत्वाकांक्षाओं का टकराव होता है और इस ‘युद्ध’ में खुद-ब-खुद सेनापति बन जाते हैं मेरे जैसे अब्दुल्ला दीवाना टाइप लोग :

    मैं अब किसी का अब्दुल्ला नहीं बनूंगा

    – अमर सिंह –

    “बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना”, एक प्रचलित कहावत है जो कि साठ के दशक में राजकपूर जी की एक फिल्म के गीत के रूप में भी प्रसिद्द हुई थी. कहने को तो यह एक प्रसिद्द गीत का मुखड़ा मात्र या एक प्रचलित कहावत भर ही है, परन्तु इसके अंदर का दिया मर्म कभी-कभी किसी के जीवन का मार्मिक तथ्य बन सकता है. मै जिम्मेदारी से कह सकता हूँ कि ऐसा ही एक अब्दुल्ला मै भी हूँ. जीवन में मेरी किसी से व्यक्तिगत या निजी लड़ाई नहीं रही.

    विभिन्न क्षेत्रों के काफी बड़े नामचीन और प्रसिद्ध लोग मेरे निकट रहे या मैं नादान नादानी में समझ बैठा कि मैं उनका बड़ा नजदीकी हूं. जाने अन्जाने मैं उन सबका घोषित अब्दुल्ला बन गया और उनके बिना कहे वह सब कुछ करने लगा, जिससे उन्हें लगे कि, वाह भाई वाह, क्या अब्दुल्ला है! कभी दुबई, कभी सिंगापुर, कभी दिल्ली तो कभी मुम्बई अब्दुल्ला बन कर मैंने जाने अन्जाने बिना किसी कारण के अपने तथाकथित नजदीकियों के बैरियों को ठीक ठाक करने का फैसला ले लिया. एक बड़े अभिनेता से मैंने लोहा लिया, पता चला जिनके कारण ऐसा किया उनका पूरा परिवार उक्त अभिनेता का चरणरज ले रहा है. एक दूसरे अभिनेता की शक्ल देखना बंद कर दिया, पता चला कि हमारे लोग उस अभिनेता के परिवार के मुखिया से सार्वजनिक क्षमायाचना कर रहे हैं.

    समाज में बड़े तबकों पर पहुंचे लोगों का निजी झगड़ा तो होता ही नहीं बल्कि महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति आपूर्ति का लक्ष्य होता है और परस्पर उनके जीवन में आपसी शालीनता का लेन-देन, प्रदर्शन और भाईचारे का विलक्षण और अदभुत आवरण. महत्वाकांक्षाओं एवं स्वार्थ के टकराव के संघर्ष की जिम्मेदारी बड़े लोगों के अब्दुल्लाओं के कन्धों पर होती है. मेरे अब्दुल्ला तुम्हारे अब्दुल्ला से लड़ेंगे, हम तुम साथ-साथ काम करेंगे, खाएंगे, पिएंगे और मंचों पर समाज में शालीनता से एक दूसरे की प्रशंसा करते हुए कहतें मिलेंगे कि “हम साथ साथ हैं”. आने वाले नव वर्ष का मेरा संकल्प है कि मैं अब किसी का अब्दुल्ला नहीं बनूंगा. अब्दुल्ला प्यादा होता है और उसकी नियति पिटना होती है. बहुत पिट चुका हूं और ज्यादा पिटना नहीं चाहता इसलिए अब मैं जीवन भर किसी बेगानी शादी का अब्दुल्ला दीवाना नहीं बनूंगा, चाहे कुछ भी हो.

    मेरे एक पुराने मित्र है, चुप रहते है अपना काम करते है और किसी अपने की भी समस्या आए तो कह देते है कि “उधो का ना लेना, ना माधो को कुछ देना”. “अहं ब्रम्हास्मि”, मैं, मैं और केवल मैं, मैंमय जीवन से कुछ लोग उन्हें भले ही आत्म केंद्रित होने या रहने का आरोपी बनाएँ लेकिन साहब ऐसे ही लोग सुख, समृद्धि और शान्ति की संतुष्टि पाते है. समस्या आग है चाहे अपनी हो या या पराए की तो मेरे प्यारे अब्दुल्ला भाइयों समस्या की आग से दूर अपने स्वार्थ के पानी की कीमत समझो नहीं तो हंसी उड़ाकर ज़माना तो यही कहेगा कि…

    “बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना,
    ऐसे मनमौजी को मुश्किल है समझाना.”

    अमर सिंह के ब्लाग से साभार

  5. anamisharanbabal

    November 13, 2010 at 5:23 am

    hi ammu bhaiya, apko b4m ms dekhkar vvvg lsgsbt aap apni dukhda ka vilao kajna band kare thakur as apne apni badbolapan aur shero shayrie se kam khurafat nahi machaye ho sp chhodne se pahle is tarah ka mahol bana diya tha mano sp me bhuchal aa jayega bt kath ki handi dobara nahj chadhti thakur as aap khud joker ban gaye par bt rajniti me sab kuchh chalta h jai azam babu mulayam ko garia ke fir se vaoas aa skteto fir aapki bat dusri h mulayam bhaiya ke langot tak aap bhitar ghuse ho to ye bahri drama kya thakur sahab mulayam ko apki aapse jyada jarurat h aur dada is bau mat chuko kyoki old is not gold in journalism, politics samjhe thakur sahab

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