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कौन बनेगा करोड़पति शुरू हो रहा है, तुम वहां ज्‍वाइन करो

सुनकर विश्वास नहीं होता कि आलोक तोमर जी अब हमारे बीच नहीं रहे। उनकी बीमारी के बारे में दो-तीन महीने पहले ही पता चला था, लेकिन दिल्ली में रहते हुए भी उनसे नहीं मिल पाया। इसका मुझे बेहद अफसोस है और अपनी असुरक्षा, भय और अनिश्चितता वाली नौकरी पर खीझ भी कि उनके लिए वक्त नहीं निकाल पाया।

सुनकर विश्वास नहीं होता कि आलोक तोमर जी अब हमारे बीच नहीं रहे। उनकी बीमारी के बारे में दो-तीन महीने पहले ही पता चला था, लेकिन दिल्ली में रहते हुए भी उनसे नहीं मिल पाया। इसका मुझे बेहद अफसोस है और अपनी असुरक्षा, भय और अनिश्चितता वाली नौकरी पर खीझ भी कि उनके लिए वक्त नहीं निकाल पाया।

 

आलोक जी कम से कम ऐसे तो नहीं थे। उनके पास जब भी जाता था तो चार्ज हो जाता था। वह बहुत हिम्मत बढ़ाते थे। बहुत कम शब्दों में पत्रकारिता की सीख भी देते थे, और पीठ ठोंककर चिंतामुक्त करते हुए मस्ती से काम करने की प्रेरणा देते थे। ऐसे बडे़ भाई का अगर मैं खुद को उनका शिष्य भी कहूं तो कम ही है। हालांकि पिछले पांच-छह सालों से हमारी उनसे ज्यादा मुलाकात नहीं हो पाई, लेकिन उनका प्यार और आर्शीवाद हमेशा जेहन में रहा।

लगभग छह महीने पहले सीएनईबी न्यूज चैनल की दफ्तर में उनसे मिलने गया था। तब मुझे उनकी तबीयत खराब होने की भनक तक नहीं थी। इस समय भी मैं इसी लोभ से उनसे मिलने गया था कि शायद उस चैनल में भाई साहब मेरे लिए भी कोई व्यवस्था कर देंगे। चूंकि बहुत दिनों बाद मिला था इसलिए बातें तो बहुत हुई मगर अपनी नौकरी के बारे में बोलने की हिम्मत नहीं जुटा सका। हालांकि उन्होंने मेरे परिवार और बच्चों की कुशलता के बारे में पूछा और कहा भी कि कोई परेशानी तो नहीं है सुशील? जीवन ठीक-ठाक चल रहा है न! यह तो उनके स्वभाव की एक बानगी है। वह बहुत ही उदार, साहसी और खुद्दार थे।

अमर उजाला से मेरी नौकरी गई थी तो एक दिन मुंह लटकाकर मैं उनके पास चला गया था। उन्होंने कहा था, क्या बात है, परेशान क्यों हो? तो मैंने कहा था कि अमर उजाला में हमारे चीफ रिपोर्टर ने मेरी नौकरी ले ली। उन्होंने वजह भी नहीं पूछा था और कहा था, चिंता मत करो। हफ्ते-दस दिनों में तुम्हारी व्यवस्था कर देंगे। तब तक हमारे लिए कुछ लिखना शुरू कर दो। उन दिनों वह पायनियर हिंदी साप्ताहिक का काम देख रहे थे। लेकिन इस बीच दैनिक जागरण के डेस्क पर मेरा चयन अभी खुलने वाले हिसार संस्करण के लिए हो गया था। जब यह खबर मैंने उनको सुनाई तो उन्होंने कहा था कि कहां जाओगे दिल्ली से बाहर? तुम्हारे बच्चे यहीं रहते हैं, तुम मजबूरी में जा रहे हो। मैं तुम्हें परसों फोन करता हूं। ऐसा ही हुआ, परसों फोन आया कि तुम जागरण छोड़कर मेरे पास आ जाओ। उन्होंने कहा कि टीवी पर अभिनेता अमिताभ बच्चन का एक गेम शो कौन बनेगा करोड़पति शुरू होने वाला है। तुम स्क्रिप्‍ट और रिसर्च के लिए वहां ज्वाइन करो। मेरी बात सिनर्जी कम्युनिकेशन के सिद्धार्थ बसु से हो गई है।

मैं सीवी लेकर उनके पास गया। सच में मेरी नौकरी लग गई। साढे़ चार हजार के बजाय अब वहां साढे़ सात हजार में नौकरी लगी थी। सन 2000 में मेरे लिए यह कम सैलेरी नहीं थी। मैं बहुत खुश हुआ था। आलोक जी बेहद मददगार इंसान थे। वह अपने व्यस्ततम समय में भी लोगों की मदद के लिए समय निकाल लेते थे। खासकर नए और युवा पत्रकारों के लिए वह हमेशा आगे रहते थे। उनके साथ ढेर सारी यादें जुड़ी हैं, जिसे एकबार में याद करना कठिन है। उनके चले जाने का मुझे बेहद अफसोस है। ऐसा लगता है, जैसे हमारी व्यक्तिगत क्षति हुई है। वह कितने खुद्दार थे, इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपनी बीमारी का जिक्र भी सरेआम नहीं किया। किसी से कोई मदद नहीं मांगी। वह असल में किसी को दुख नहीं देना चाहते थे। हम सबको छोड़कर गए भी, तो होली के दिन। एकतरफ जब लोग होली के रंगों और शोर-शराबे में डूबे रहते हैं, अखबार-टीवी पर होली का जश्न रहता है, ऐसे में उनका चुपचाप निकल जाना भी उनके किसी त्याग और खुद्दारी से कम नहीं। मैं उनकी इस खुद्दारी को सलाम करता हूं। उनकी दिवंगत आत्मा को हृदय से प्रणाम करता हूं और उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। ऐसे समय में उनके परिवार को ईश्वर दुख सहने शक्ति और शांति प्रदान करें।

लेखक सुशील देव दिल्‍ली में पत्रकारिता करते हैं तथा आलोक तोमर से भी जुड़े रहे हैं.

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0 Comments

  1. Sanjay Poddar (Raj Express)

    March 25, 2011 at 1:21 pm

    sach kehna ka sahas sirf aap me hai, all the best & god bless your:)

  2. Manoj Sinha

    March 26, 2011 at 7:42 am

    sushil, your attachment with late shri alok tomar is well known but you have rightly paid the tribute this great departed soul. I agree there are some good human being in every field, even in this field of journalism, thanks, manoj sinha

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