: जिसके पिता ज्ञात नहीं होते, क्या उनके पिता के पिता भी अज्ञात होते हैं? : इन दिनों हम लोग जब भी जीआरपी के संपर्क में आ रहे हैं, कुछ ऐसा हो रहा है जो कहानी बन जा रही है. पिछले दिनों मेरठ-लखनऊ यात्रा में नूतन ने जीआरपी के कुछ सिपाहियों का एक रूप देखा था तो कल जब हम पुनः मेरठ से लखनऊ आ रहे थे तो एक अलग घटना घटी.
दरअसल लखनऊ रेलवे स्टेशन के जीआरपी थाने में इन्स्पेक्टर जीआरपी लखनऊ साहब के ऑफिस से सटा एक कक्ष है जो आम तौर पर गेस्ट रूम के रूप में इस्तेमाल होता है. इसमें कई सारे सोफे लगे हुए हैं और एक बढ़िया एसी भी लगा है. तमाम आईपीएस अधिकारी और अन्य वरिष्ठ पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारी अकसर चारबाग रेलवे स्टेशन पर ट्रेनों के लिए इन्तेज़ार करते समय इस गेस्ट रूम में आ जाते हैं और आवश्यकतानुसार वहाँ अपनी गाड़ियों अथवा अपने आगंतुक के आने का इन्तेज़ार करते हैं.
कल रात मुझे और नूतन को नौचंदी एक्सप्रेस से लखनऊ से मेरठ आना था और हम जब करीब दस बजे चारबाग रेलवे स्टेशन पहुंचे तो आदत के मुताबिक़ हम भी जीआरपी गेस्टरूम की तरफ बढ़ लिए. इन दिनों चारबाग जीआरपी का बड़ा सुन्दर जीर्णोद्धार हुआ है और पहले जहां बाहर-भीतर एकदम खुला हुआ सा था, अब बाहर से एक दरवाज़ा लगा दिया गया है और हर किसी को उस रास्ते जीआरपी की तरफ जाने की अनुमति नहीं मिलती. हमसे भी वहाँ मौजूद संतरी महोदय ने परिचय पूछा और परिचय प्राप्ति के बाद हमें अंदर जाने दिया. अंदर पहुँचने पर जीआरपी थाने के इन्स्पेक्टर शरद सिंह साहब मिले और उनके दफ्तर के रास्ते हम गेस्टरूम में चले गए. एसी चालू कर दिया गया और हम पति-पत्नी आराम से बैठ कर अपनी ट्रेन के आने का इन्तेज़ार करने लगे. चूँकि मैं भी अपना लैपटॉप हमेशा अपने पास रखता हूँ सो मैंने अपना लैपटॉप निकाल लिया और कुछ लिखने लगा.
अभी मैंने अपना काम शुरू ही किया था कि अचानक बड़ी जोर से आवाज़ आई- “साले, मादर@#.” हम एकदम से घबराए कि यह कौन सी बला आ गयी. फिर उसके बाद तो अनवरत बस यही आवाज़ इन्स्पेक्टर साहब के रूम से आती रही. जिन सज्जन की आवाज़ थी कभी तो वे कहते-“साले मादर#$”, तो कभी कहते-“बेटी#$” और कभी-“साले बहन#%”. फिर जैसे गाने के बोल में शब्द दुहराए जाते हैं कुछ उसी तर्ज़ पर वे फिर इन्ही शब्दों को अलग-अलग अंदाज़ में और अलग-अलग तरीके से बोलते जाते. जो भी व्यक्ति (यदि उन्हें सज्जन कहा जा सकता है तो सज्जन कहूँगा, अन्यथा व्यक्ति शब्द भी ठीक है) यह कह रहे थे वे लगता है किसी टेपरिकॉर्डर की तरह उलझ गए हों और अपनी इन चंद शब्दावलियों से बाहर ही नहीं आ पा रहे हों.
बीच-बीच में एकरसता को तोड़ने के लिए ‘भोंस#$वाले’ शब्द का भी समुचित प्रयोग करते या फिर ‘हरा#’ शब्द का. उन्होंने एक बड़ी अजीब काम भी किया. कभी तो वे सामने वाले व्यक्ति को कहते- “साले हरा#” और कभी उसे कहते -”साले, हरा# की औलाद.” अब यहाँ एक विधिक और तात्विक प्रश्न अवश्य ही उपस्थित हो जाता है कि क्या एक ही व्यक्ति एक साथ हरा# भी हो सकता है और हरा# की औलाद भी. जहां तक मैं हरामी शव्द का शाब्दिक अर्थ जानता हूँ इसका मतलब होता है वह जिसके पिता का पक्का पता-ठिकाना न हो, अर्थात एक तरह से लावारिस. इसके विपरीत हरामी की औलाद वह हुए जिनके पिता के पिता की निश्चित जानकारी ना हो. इन्स्पेक्टर साहब के रूम में बैठे जो व्यक्ति अबाध गति से धाराप्रवाह गाली दे रहे थे वे इस तरह की दुविधा की स्थिति पैदा कर दे रहे थे जहां एक ही व्यक्ति एक साथ ऐसे आदमी बन जा रहे थे जिनके पिता ज्ञात ना हों और जिनके पिता के पिता भी ज्ञात ना हों.
वैसे इस बात से इतर यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है और हमारे समाज के लिए सोचने लायक है कि यदि किसी व्यक्ति के पिता का नाम निश्चित ज्ञात नहीं तो इसमें उसका क्या दोष है. आखिर लावारिस शब्द या उसका और भी बिगड़ा हुआ स्वरुप ‘हरामी’ शब्द अपने आप में गाली क्यों हो? क्या इसमें किसी आदमी का दोष है या उसकी खता है कि उसके पिता का नाम उसे निश्चित तौर पर ज्ञात नहीं है? मैं समझता हूँ यह एक ऐसा विचारणीय प्रश्न है जिस पर समाज को मंथन अवश्य करना चाहिए और इस तरह से जो भी व्यक्ति पहले से ही बिना पिता के हो, उसे सांत्वना और सहानुभूति के भाव देने की जगह उसके जले पर नमक छिडकने का काम नहीं करना ही उचित होगा. पर जब तक ऐसा सर्वमान्य रूप में नहीं हो रहा है तब तक किसी व्यक्ति को मात्र इसीलिए कि वह एक पुलिस थाने में आया है अथवा संभवतः पकड़ कर लाया गया है, धाराप्रवाह बिना ज्ञात पिता और बिना ज्ञात पिता के पिता वाला बताना और इसके अतिरिक्त तमाम प्रकार की अन्य दूषित शब्दावलियों से विभूषित करना भी मुझे कुछ अजीब सा ही लगा. शायद गलत भी.
यहाँ मुझे यह भी याद आया कि जब मैं खुद पुलिस विभाग में नया-नया आया था तो और कुछ सीखा या नहीं सीखा, गाली देना जरूर सीख गया. माँ, बहन की गालियाँ ऐसे धडल्ले बोलता जैसे पेट से सीख कर आया होऊं. फिर यहाँ मौका भी रहता. जिसे चाहो, जो चाहो कह दो. कौन रोकने वाला है? मैंने भी इस तरह अपनी जुबान खूब गन्दी की. कई बार तो बिला-वजह ही. जहां मुझे लगता कि मैं बहुत बड़ा तुर्रमखान बन रहा हूँ और मेरी गालियों के गोलों से लोग थर्रा रहे हैं वहीँ कभी-कभार मुझे ऐसा बोलते सुन कर मेरे घर वाले, मेरे माता-पिता और मेरी पत्नी बहुत ही अफ़सोस जताते और इसके प्रति पूर्ण असहमति जताते.
मैंने बहुत बाद में समझा कि मैं यह बेवकूफी ही कर रहा हूँ क्योंकि इस तरह के बोल बोलने से कोई डरता-डराता तो है नहीं, अपनी जुबान बिलावजह जरूर खराब होती जाती है. अभी करीब दो साल पहले अचानक एक दिन मैंने कोई गाली दी, मेरी पत्नी ने मुझे टोका और मैंने भी जोश में कह दिया कि आज से कोई गाली नहीं दूँगा. बहुत अधिक मेहनत लगी अपनी बिगड़ी आदत सुधारने और अपने मन पर नियंत्रण करने में, पर विश्वास मानिए कि तब से अब तक मेरे मुंह से गाली लगभग ना के बराबर निकलती है.
कल जब अचानक गालियों की इस रिमझिम फुहार में भींगना पड़ा तो मुझे अपने भी बेवकूफी भरे दिन याद आ गए और इस बात के लिए नूतन को बहुत धन्यवाद भी दिया कि उसने मुझे इस तरह की हरकतों से दूर करने में मदद की. साथ ही उस पूरी बातचीत के दौरान मैंने यह भी अनुभव किया कि जो भी सज्जन लगातार गाली दे रहे थे, उन्हें भले यह लग रहा हो कि उनकी गालियाँ गोली का काम कर रही हैं पर दूसरे पक्ष की प्रतिक्रिया सुन कर यही लग रहा था कि उसे इससे कोई फर्क पड़ता नहीं जान रहा. वे पुलिस के सज्जन लगातार माँ, बहन, बेटी, भोंस#$, हरा#% शब्दों की छटा बिखेरे हुए थे और उस व्यक्ति से किसी मोबाईल फोन, किसी सिम कार्ड और गुडगाँव से सम्बंधित कोई बात कर रहे थे पर वह व्यक्ति था कि जैसे इन सभी गंदे शब्दों को बड़ी आसानी से पचा ले रहा हो और पूरी तरह आराम से हो.
हाँ, बगल के कक्ष में बैठे मेरी और नूतन की स्थिति बड़ी असहज जरूर हो गयी थी क्योंकि गालियों की लगातार बौछार कुछ अजीब सी लग रही थी. मन करता था कि एक बार जा कर कह दूँ कि भाईसाहब, यह तमाशा या तो बंद कर दीजिए, या करना इतना ही जरूरी हो तो कहीं और कर लीजिए पर फिर सोचता था कि मैं वहाँ किसी आधिकारिक पोजीशन में तो हूँ नहीं. कहीं वहाँ मौजूद पुलिसवालों को मेरी बात बुरी लगे या फिर उनकी स्थिति खराब हो. पर कुल मिला कर करीब बीस मिनट का यह गाली-शास्त्र ऐसा रहा जिसे भूलना मेरे लिए निश्चित तौर पर मुश्किल होगा.
मजेदार बात यह भी हुई कि जब हम वहाँ से हटे और ट्रेन में बैठे तो नूतन ने मुझसे कहा-“वे पुलिस वाले सामने वाले आदमी को इतनी बार मादर#$ पुकार रहे थे कि मुझे तो एक बार मन हुआ कि पुलिसवालों से पूछ ही लूँ कि भाईसाहब क्या इनका नाम मादर#$ है पर मैंने सोचा कि पता नहीं उस समय कौन किस तरह से प्रतिक्रिया करे.”
इस पूरी घटना से एक तो जहां मुझे खुद के गाली देने से मुक्त होने की बात पर खुशी हुई वहीँ यह भी लगा कि शायद हमारे देश में पुलिस विभाग में उचित वर्ताव पर काफी कुछ ट्रेनिंग की जरूरत है. मैंने कुछ दिनों पहले ब्रिटेन की अपनी यात्रा में वहाँ के एक पुलिस स्टेशन में देखा था कि कैसे वहाँ के पुलिस वाले बड़े आराम से मुलजिम को सामने बैठा कर बात करते रहते हैं और इसी बातचीत से तमाम जानकारियाँ हासिल कर लेने में सफल होते हैं. इसके विपरीत शायद हम वातावरण को तो बहुत अधिक प्रदूषित करते हैं पर हमारा सजा दिलाने का दर उस देश की तुलना में बहुत ही कम है. कल की इस घटना के बाद से एक बार पुनः मुझे पुलिस में बुनियादी बदलाव, बर्ताव में परिवर्तन, ट्रेनिंग की जरूरत और साइंटिफिक इन्वेस्टीगेशन पर जोर का महत्त्व समझ में आया जहां किसी पुलिसवाले को अपनी जुबान गन्दी करने की जरूरत नहीं होती और बेहतर परिणाम भी निकलते हैं.
लेखक अमिताभ आईपीएस अधिकारी हैं और इन दिनों मेरठ में आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा में पदस्थ हैं.












Harishankar Shahi
September 15, 2011 at 4:17 am
भाई साहब पुलिस और गालियों का सदैव से ककहरा और विद्यार्थी का साथ रहा है. नर्सरी के बच्चे जिस रफ़्तार से अक्षर रटते हैं वैसे ही हमारी रक्षक और हममे से ही निकल कर वहां पहुंची गालियाँ रटती है. बिना गालियों और चार लाठी मारने की बात करने वाली पुलिस की कल्पना शायद अब कवि भी भारत में ना कर पाएं.
यह भी विडंबना है कि रक्षक मानी जाने वाली पुलिस से रक्षा के हेतुक की उम्मीद अब शायद ही कोई विरला भारतीय करता हो. हाँ अप्रवासी भारतीय कर सकते हैं क्योंकि उन्होंने दूसरी पुलिस देखी होगी. भारतीय जनमानस इन रक्षको के इन रक्षा स्त्रोत (गाली और लाठी) से स्वयं आतंकित रहता है.
Bishwajeet
September 15, 2011 at 6:25 am
Good article sir…we should really learn from western cops.
Satya Siladitya Kar
September 15, 2011 at 6:39 am
Interesting read… Liked it very much, especially the first line… wonderful beginning which sets the tone. Best wishes!
anoop trivedi
September 15, 2011 at 6:41 am
पुलिस के गाली शास्त्र के अन्दर छुपे कथित अपराधियों के प्रति भय समाप्त करने की सोच और सच लिखने के लिए साधुवाद, निश्चित ही आपका ये लेख अन्य पुलिस व् अन्य गाली शास्त्र के महारथियों को शायद सद्बुधी मिले .
anoop trivedi
September 15, 2011 at 6:42 am
पुलिस के गाली शास्त्र के अन्दर छुपे कथित अपराधियों के प्रति भय समाप्त करने की सोच और सच लिखने के लिए साधुवाद, निश्चित ही आपका ये लेख अन्य पुलिस व् अन्य गाली शास्त्र के महारथियों को शायद सद्बुधि मिले .
shishpal singh
September 15, 2011 at 8:08 am
Amitabh jee Aap jasa Insan kam hi milata hai, me Aap ki bhavna ka samjhta hu parichi hona ka karan, police ma five persent hi Achchs log hai
shishpal singh Jansatta reporter noida. ghaziabad u p
Shalini Garg
September 15, 2011 at 8:31 am
Amitabhji,
aapko badhai, aapki ye buri aadat jati rahi.
ajit yadav
September 15, 2011 at 9:22 am
aap sahi hai vah din door nahi jab aap kisi police station par jayege..aur apko sunna pade..aaiye mahoday namaskar..mai aapki kya madad kar sakata hoo…lekin abhi thoda samay lagega ..aane vali nayi poudh..mere batch se new aarakchi..new mba recruits..mera svapn pura hoga…not hundred but kafi had tak change hoga…gali dene vale gali khane vale dono jagruk ho rahe hai..dono milkar gali ka namonisan mita dege…jai hind
Surendra Mishra
September 15, 2011 at 9:32 am
Sir ji Apne Jis hakikat ka darde dil bayan Kiya hai yah aadikal se aaj tak chali aa rahi pulice system ki hakikat hai. aajkal log policewalo se kyon katrate hai ! Kyonki kya jane kab ye wardiwale kiski pagdi uchhal de. Aaj ke samaj ka koi civilized person inse nahi ulajhhna chahata hai. kair aap bhi police samaj ke abhinn ang hai. Ishko sudharne ki ek EMANDAR KOSHISH JAROOR KIJIYE. THANKS.
prashant
September 15, 2011 at 2:54 pm
अमिताभ जी, दोष उस व्यक्ति का नहीं है, जो गाली दे रहा है. दोष उस सिस्टम का है जो अंग्रेजों के जाने के बाद भी हमने पाले रखा. नैतिकता गई चूल्हे में. समरथ को नहिं दोष गुसांई.