Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

प्रिंट

जनसत्ता का रायपुर एडिशन बंद, कहीं कोई चर्चा तक नहीं

: एक अखबार की बंदी जब खबर तक न बने : आजकल मीडिया पर कलम चलाना बड़ा शगल बनता जा रहा है। हाल ही में अनिल बंसल की एक खबर पढ़ी जो अफसरों के सौतिया डाह पर थी। पर जितना सौतिया डाह पत्रकारों में है, उतना शायद किसी और प्रोफेशनल के बीच हो। मीडिया में जो घट बढ़ रहा है उसे देखते हुए इंडियन एक्सप्रेस के सहयोगी वीरेन्द्रनाथ भट्ट एक बार बोले- हिंदी में एक साईट बनाना चाह रहा हूँ, नाम रखा है ‘फाड़ डालो डाट काम’, कैसा रहेगा?

: एक अखबार की बंदी जब खबर तक न बने : आजकल मीडिया पर कलम चलाना बड़ा शगल बनता जा रहा है। हाल ही में अनिल बंसल की एक खबर पढ़ी जो अफसरों के सौतिया डाह पर थी। पर जितना सौतिया डाह पत्रकारों में है, उतना शायद किसी और प्रोफेशनल के बीच हो। मीडिया में जो घट बढ़ रहा है उसे देखते हुए इंडियन एक्सप्रेस के सहयोगी वीरेन्द्रनाथ भट्ट एक बार बोले- हिंदी में एक साईट बनाना चाह रहा हूँ, नाम रखा है ‘फाड़ डालो डाट काम’, कैसा रहेगा?

मैंने पूछा- ऐसा नाम क्यों रखा है तो बोले, हिंदी में तो ऐसे ही नाम चल रहे है न जैसे बिच्छू, गोजर -अजगर डाट काम या फिर ‘काट डालो मार डालो डाट काम’ टाइप जिसमें किसका पर कतरा गया, कौन कहा पकड़ा गया जैसी निजी जानकारी और निजी हमले ज्यादा होते हैं। ध्यान आया कुछ साल पहले कुमार आनंद ने हिंदी मीडिया में एक प्रोफेशनल साईट की कमी की तरफ इशारा भी किया था क्योंकि अंग्रेजी में तो काफी प्रोफेशनल ढंग से यह काम हो रहा है पर हिंदी में गला काट और कपड़ा फाड़ प्रतिस्पर्धा में आए दिन किसी न किसी साईट पर कोई न कोई खबरनवीस खबर बना दिया जा रहा है। और खबर भी ऐसी जिसमें खसरा खतौनी से लेकर पुनर्जन्म का ब्यौरा तक मिल जाए।

खैर मुद्दा यह है कि इस सबके बावजूद जनसत्ता अखबार के एक संस्करण की बंदी पर कोई चर्चा नहीं होती। जनसत्ता का रायपुर संस्करण पिछले दिनों बंद हो गया। इसके बंद होने से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से पचास से ज्यादा लोग सड़क पर आ गए हैं। कुछ को भरोसा दिया गया है तो कुछ को भरोसा भी नहीं मिला। इनमें से कुछ पत्रकारों के फोन लगातार आ रहे हैं और वे किसी भी जगह नौकरी चाहते हैं। अचानक नौकरी चली जाए तो कैसे कैसे दिन देखने पड़ते हैं, यह वह लोग ही जानते हैं जिनकी नौकरी कभी गई हो। पर ऐसे लोगों की कोई मदद करना तो दूर, लोग पुराना बही खाता देखकर उस पत्रकार की नौकरी कहीं लग रही हो तो उसमें भी अड़ंगा डालने की कोशिश जरूर करते हैं। यह पत्रकारों की सौतिया डाह का पुराना तरीका है। खैर मूल मुद्दे पर लौटें।

यह फ्रेंचाइजी संस्करण था जिसे करीब एक दशक पहले इंडियन एक्सप्रेस ने मुझे निकालने की जिम्मेदारी दी थी। क्योंकि इस संस्करण को शुरू करने का प्रस्ताव मेरा ही था और तब मैं छत्तीसगढ़ में इंडियन एक्सप्रेस के संवाददाता की जिम्मेदारी निभा रहा था। जब जनसत्ता निकालने का फैसला हुआ तब इंडियन एक्सप्रेस की ख़बरों को भेजने के साथ जनसत्ता की तैयारिया भी शुरू हुई। करीब दर्जन भर सम्पादकीय सहयोगियों को जनसत्ता की भाषा और तेवर का प्रशिक्षण दिया गया। जनसत्ता के कई नए पुराने सहयोगियों को इस सिलसिले में रायपुर बुलाया भी गया।

आलोक तोमर से लेकर सत्य प्रकाश त्रिपाठी जैसे वरिष्ठ लोग रायपुर आए और सहयोगियों को काफी कुछ सिखाया। प्रभाष जोशी जी से मैंने पहले अंक के लिए विशेष सम्पादकीय लिखने का अनुरोध किया था जो समय पर आ गया था। किसी वजह से वे खुद इसके समारोह में नहीं पहुँच पाए थे। पर जनसत्ता के इस समारोह से ही तत्कालीन मुख्यमंत्री अजित जोगी से जो टकराव शुरू हुआ वह उनके सत्ता से जाने तक जारी रहा। पर उनके जाने से पहले मुझे भी इस टकराव की कीमत चुकानी पड़ी और उसी वजह से मैं उत्तर प्रदेश में हूँ। पर अखबार ने उस दौर में धाक तो जमा ही दी थी।

राजकुमार सोनी, अनिल पुसदकर, राजनारायण मिश्र, अनुभूति, संजीत त्रिपाठी और भारती यादव जैसे प्रतिभाशाली पत्रकारों के बूते पर ही हमने तब सत्ता के खिलाफ मोर्चा खोला था। पर फ्रेंचायजी प्रबंधन सत्ता से टकराव लेने की स्थिति में नहीं था क्योंकि उसके खिलाफ कई मामले दर्ज कराए जा रहे थे। नतीजतन, उसने घुटने टेक दिए और फिर कई संपादक आए और जनसत्ता का वह तेवर जाता रहा जिससे शुरुआत की गई थी। एक संपादक तो दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान से आने वाली ख़बरों को हटवाकर कुछ खास किस्म की खबरें लगवाने लगा। जनसंपर्क पत्रकारिता के चलते अखबार की साख ख़त्म हो गई। यह बात जनसत्ता से जुड़े लोग ही मुझे बताते रहे। फिर भी जैसे और अखबार निकल रहे हैं, वैसे यह भी निकल रहा था।

बाद में मुझे अपनी उस गलती का भी अहसास हुआ जिसमें इंडियन एक्सप्रेस यूनियन की एक बैठक में मैंने जब विवेक गोयनका को जनसत्ता के फ्रेंचायाजी संस्करण शुरू करने का सुझाव दिया था ताकि आर्थिक दिक्कतों से उबारा जा सके। पर मैं यह भूल गया कि किसी भी राज्य में मझोले किस्म के व्यवसाई सत्ता से टकराव नहीं झेल सकते हैं क्योंकि उनके व्यावसायिक हित प्रभावित होते हैं। ऐसे में एक्सप्रेस समूह के फ्रेंचायजी के प्रयोग नाकाम हुए।

रायपुर का जनसत्ता आर्थिक दिक्कतों की वजह से नहीं बंद हुआ है, यह जरूर ध्यान रखना चाहिए। पर जनसत्ता या किसी भी अखबार का कोई भी संस्करण बंद हो तो खलता है। जो लोग आज हिंदी की बात कर रहे हैं, प्रभाष जोशी और उनके अखबार की बात करते हैं, उन्हें भी इस बारे में सोचना चाहिए। टाइम्स आफ इंडिया ने मुनाफे के बावजूद अपने हिंदी के संस्करण बंद किये पर उस दौर में घाटे के बावजूद एक्सप्रेस समूह ने जनसत्ता को चलाए रखा। पर अब हालात बदल चुके हैं। ऐसे में जनसत्ता के संस्करण का बंद होना खलता है। उम्मीद है जनसत्ता का रायपुर संस्करण किसी तरह फिर से शुरू हो और जो लोग अचानक सड़क पर आ गए है उन्हें सहारा मिले।

लेखक अंबरीश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. जनसत्ता के उत्तर प्रदेश के ब्यूरो चीफ हैं. बेबाक लिखने और बोलने के लिए जाने जाते हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग विरोध से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है. अंबरीशजी के लिखे इस राइटअप को भी पढ़ सकते हैं- प्रभाष जोशी के जन्मदिन पर एक साथी का रिटायर होना

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

0 Comments

  1. raghav

    July 22, 2011 at 7:39 am

    bhadas par chha gaye ambrish kumar!!!! aap to neta chune gaye ji!!!

  2. rajbali

    July 22, 2011 at 9:43 am

    bahut dukhad bat hai ab tyo logon ko rahul dev ke pas hi jana chahiye. vahi madada kar sakte hain . grup editor hain. badi naukree bhi hai. fir vo to purane jansattai bhi to hain. vo jaroor help karenge. aage badhe, kam ho jayega,. aameen

  3. tarkesh kumar ojha

    July 22, 2011 at 4:01 pm

    bari chati hai hindi patrakarita ki
    tarkesh kumar ojha
    kharagpur(west bengal)
    contact)_ 09434453934

  4. Sanjeet Tripathi

    July 22, 2011 at 8:14 pm

    मुझे शुरु से गर्व ही रहा कि मै जनसत्ता रायपुर की लॉंचिंग टीम का हिस्सा रहा, उस टीम का जिसने जोगी सरकार को परेशान कर रखा था। लेकिन अखबार कुछेक दशक से संपादक की बजाय मैनेजमेंट चलाते हैं उसी का असर रहा कि मुझे अंबरीश जी के चले जाने के बाद जनसत्ता रायपुर छोड़ना पड़ा। बाद मे सुनने में आया कि वे ही पत्रकार जो जनसत्ता में रहते हुए जोगी सरकार के खिलाफ माहौल बना रहे थे, अंबरीश जी के जाने के बाद उसी जोगी सरकार के नुमांदों से लिफाफा बटोरने में लग गए थे।, ऐसे में जो हश्र शुरु हुआ, अंत में कुछेक दिन पहले एक बंधु का फोन आया कि आज से अपना अखबार बंद हो रहा है। हालांकि उससे दो महीने पहले ही खबर लग गई थी कि कौन सी खबर हटाकर कौन सी सी खबर लगाई थी संपादक और सलाहकार ने भोपाल डेटलाइन से, जिसके कारण इंदियन एक्स्प्रेस ग्रुप्को 6 करोड़ की नोटिस पहुंची और जहां से बैकग्राउंड बना इस संस्करण के बंद होने का। लेकिन दिल से दुख हुआ इसे बंद होता देखकर। काश इंडियन एक्स्प्रेस ग्रुप खुद रायपुर से संस्करण शुरु करे

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास तक खबर सूचनाएं जानकारियां मेल करें : [email protected]

भड़ास के वाट्सअप चैनल से जुड़ें और नवीनतम खबरें पाएं : Bhadas Whatsapp

भड़ास लीगल टीम : किसी किस्म की लीगल हेल्प के लिए संपर्क करें- Bhadas Legal Team

You May Also Like

Uncategorized

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम तक अगर मीडिया जगत की कोई हलचल, सूचना, जानकारी पहुंचाना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. इस पोर्टल के लिए भेजी...

Uncategorized

भड़ास4मीडिया का मकसद किसी भी मीडियाकर्मी या मीडिया संस्थान को नुकसान पहुंचाना कतई नहीं है। हम मीडिया के अंदर की गतिविधियों और हलचल-हालचाल को...

हलचल

[caption id="attachment_15260" align="alignleft"]बी4एम की मोबाइल सेवा की शुरुआत करते पत्रकार जरनैल सिंह.[/caption]मीडिया की खबरों का पर्याय बन चुका भड़ास4मीडिया (बी4एम) अब नए चरण में...

Uncategorized

मीडिया से जुड़ी सूचनाओं, खबरों, विश्लेषण, बहस के लिए मीडिया जगत में सबसे विश्वसनीय और चर्चित नाम है भड़ास4मीडिया. कम अवधि में इस पोर्टल...