Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

कहिन

जनसत्ता, प्रभाष जोशी और आलोक तोमर

आज आलोक जी हम लोगों के बीच नहीं हैं, उनके गुरु और संरक्षक प्रभाष जोशी जी भी नहीं हैं और यदि सच पूछा जाए तो वह जनसत्ता अखबार भी नहीं है, जो एक समय हुआ करता था और जिसे हम “जनसत्ता” अखबार के रूप में जानते और मानते थे. इसके साथ ही यह बात भी सही है कि यद्यपि प्रभाष जी ने और आलोक जी ने जनसत्ता के पहले और बाद में बहुत कुछ किया, लेकिन कुछ ऐसा संयोग और कुछ ऐसी केमिस्ट्री रही कि यदि इन दोनों लोगों के लिए किसी एक शब्द का प्रयोग करना हो तो सबसे पहले जेहन में यही आता है-“जनसत्ता”.

आज आलोक जी हम लोगों के बीच नहीं हैं, उनके गुरु और संरक्षक प्रभाष जोशी जी भी नहीं हैं और यदि सच पूछा जाए तो वह जनसत्ता अखबार भी नहीं है, जो एक समय हुआ करता था और जिसे हम “जनसत्ता” अखबार के रूप में जानते और मानते थे. इसके साथ ही यह बात भी सही है कि यद्यपि प्रभाष जी ने और आलोक जी ने जनसत्ता के पहले और बाद में बहुत कुछ किया, लेकिन कुछ ऐसा संयोग और कुछ ऐसी केमिस्ट्री रही कि यदि इन दोनों लोगों के लिए किसी एक शब्द का प्रयोग करना हो तो सबसे पहले जेहन में यही आता है-“जनसत्ता”.

मैं आज इस अदम्य साहस और हिम्मत के धनी, अपने पेशे के प्रति अप्रतिम रूप से ईमानदार और शब्दों और वाक्यों के नायाब रचयिता आलोक जी के हम लोगों के बीच से अचानक चले जाने और एक बहुत बड़ी संख्या में अपने इष्ट-मित्रों तथा प्रशंसकों को पूरी तरह बेसहारा छोड़ देने के मौके पर इन तीन शब्दों के साथ से उभर कर आने वाली सामूहिक ध्वनि को एक बार फिर से सुनने की कोशिश करूँगा.

वैसे तो जनसत्ता, प्रभाष जोशी और आलोक तोमर तीन अलग-अलग चीज़ें नज़र आती हैं, पर यदि हम थोड़ी सी भी गहराई में जाएँ तो तुरंत पाते हैं कि ये तीनों एक ही थे. बल्कि यह कहा जाए कि इनमें से एक के बिना दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती तो शायद बहुत गलत नहीं होगा. ऐसा नहीं ही प्रभाष जोशी जनसत्ता के पहले पत्रकारिता नहीं करते थे. वे 1983 में जनसत्ता की स्थापना के बहुत पहले से ही पत्रकारिता में आ चुके थे, बल्कि उन्होंने अपने पत्रकार जीवन की शुरुआत नयी दुनिया से की थी. इसी तरह आलोक तोमर के लिए भी जनसत्ता पहला अखबार नहीं था, वे स्वदेश और यूएनआई में काम कर चुके थे. इनके अलावा यह भी नहीं था कि जनसत्ता हिंदी का कोई पहला अखबार हो. पर पता नहीं क्या संयोग रहा और क्या बात हुई कि जनसत्ता ने भारत में, और खास कर हिंदी जगत में, पत्रकारिता के मायने ही बदल दिए. इस काम में जिन दो लोगों का अप्रतिम योगदान रहा वे थे प्रभाष जोशी और आलोक तोमर.

जनसत्ता जब शुरू हुआ था उस समय प्रभाष जोशी पत्रकारिता में एक अच्छी पारी खेल चुके थे और पूरी तरह स्थापित हो गए थे. 47 वर्ष की अवस्था थी उनकी उस समय, जब जनसत्ता दुनिया के सामने आया था, उस उम्र से मात्र चार साल कम जब आलोक जी ने दुनिया को अलविदा कह दिया है. इसके विपरीत आलोक तोमर की उम्र 22 साल की थी, अपनी युवावस्था की शुरुआत. इन दोनों की जोड़ी में कुछ ऐसी खास बात थी कि मिलते ही दोनों ने तहलका मचाना शुरू कर दिया था. कुछ ऐसा संयोग रहा कि उसी समय अखबार के शुरू होने के एक वर्ष में सिख दंगा हो गया, जिसमें पहली बार सत्ता पर नंगा खेल खेलने का आरोप खुल कर सामने आया.

जो आज बातें गुजरात के सन्दर्भ में अक्सर कह दी जाती हैं और गुजरात दंगे का भूत लाख कोशिशों के बावजूद नहीं उतर पा रहे है, उसकी पहली बानगी और मिसाल दिल्ली में चौरासी के सिख दंगों में दिखी थी, जब उस समय सरकार के कई ताकतवर लोगों पर सीधे-सीधे नग्न तरीके से सत्ता के प्रभाव का दुरुपयोग करने की बात सामने आई थी. शायद इसमें बहुत कुछ सत्ता के जोर पर दब गया होता यदि उस समय दिल्ली में जनसत्ता, प्रभाष जोशी और आलोक तोमर की तिगड़ी नहीं होती. जोश, हौसले, हिम्मत, साहस और सच के प्रति अप्रतिम आकर्षण से लबरेज आलोक तोमर नामक उस युवा पत्रकार ने पूरी दिल्ली में घूम-घूम कर ऐसी खबरें लायीं और उन्हें आग से बुझी ऐसी शब्दावली में ढाल दिया, जिसने पूरे देश भर में तूफ़ान मचा दिया.

इतिहास इस बात का भी गवाह है कि यदि उस समय जनसत्ता में प्रभाष जोशी नहीं होते तो आलोक तोमर चाहे लाख कोशिश कर लेते, उनकी लिखी बहुत सारी ख़बरें कभी अखबार का मुंह देख ही नहीं पातीं, क्योंकि उन पर इन ख़बरों को नहीं लिखने को ले कर बहुत सारे दवाब पड़ते रहे, जिन्हें वे अपनी हिम्मत और बेबाकी के साथ दरकिनार करते रहे. आज भी आलोक जी की लिखी हुई वे तमाम खबरें उस समय के लोगों के जेहन में तरोताजा हैं, जब वे अपनी अद्भुत लेखनी से दिल दहलाने वाले ऐसे सच को उजागर करते थे जिसे सुन कर रूह काँप जाए और अपराध करने वालों के सीने पर सांप लोटने लगे. तभी तो आज आलोक जी की मृत्यु के अवसर पर “हिंदुस्तान” में उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए तरुण कुमार तरुण यह कहते हैं- ‘जनसत्ता’ में 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़ी उनकी खबरों में पाठक वर्ग की खास रुचि हुआ करती थी. उन्होंने इन दंगों के स्याह सच को बेपर्द किया. दिल्ली की गलियों और सड़कों पर मौत के मंजर को उन्होंने कलमबद्ध कर प्रशासन की नाकामी का पर्दाफाश किया.” मैं तरुण जी से पूरी तरह सहमत हूँ क्योंकि उस समय मैं स्वयं कक्षा बारह के छात्र के रूप में जनसत्ता अखबार पढ़ने को बेचैन रहता था.

प्रभाष जोशी और आलोक तोमर की यह जोड़ी सिर्फ सिख दंगे तक ही नहीं रही, बल्कि उनके अनन्य मेल ने न जाने कितने सारे ऐसे राज़ समाज के सामने बेपर्दा कर दिए जिन्हें उनके करने वाले बड़ी चतुराई के साथ शातिराना ढंग से सिमटा लेना चाहते थे. ना जाने कितने ही वर्षों तक गुरु-शिष्य के साथ का यह सिलसिला चलता रहा पर जैसा हर अच्छे चीज़ के साथ होता है, एक समय ऐसा भी आ गया जब लगने लगा था कि शायद अब पहले वाली बात नहीं रही. फिर इसी बीच 1995 में प्रभाष जी जनसत्ता से औपचारिक रूप से रिटायर हो गए, यद्यपि वे इस अखबार के चीफ एडिटोरियल एडवाइजर बने रहे थे. चूँकि आलोक जी की मेधा और क्षमता को सही ढंग से और सही रूप में सामने लाने के लिए प्रभाष जोशी जैसे एक बहुत ही मजबूत स्तंभ की निरंतर जरूरत थी, इसीलिए इस अवधि में आलोक जी कुछ लड़खड़ाए भी, परेशान भी हुए. यह अलग बात है कि अपनी आदत और अपने नैसर्गिक गुणों के मुताबिक़ आलोक जी ने एक बार पुनः अपना रास्ता स्वयं बना लिया और उस पर काफी सफल भी रहे. पर मुझे लगता है कि यदि आलोक जी को एक बार फिर 1983 वाले जनसत्ता में प्रभाष जी के साथ काम करने का अवसर मिलता तो शायद इसके लिए बाकी सब कुछ सहर्ष छोड़ने को तैयार रहते.

आज जब आलोक जी नहीं है, प्रभाष जोशी साहब नहीं है तब इन दोनों की याद और इन दोनों का पारस्परिक साहचर्य एवं आपसी लगाव पहले से भी अधिक लोगों को याद आता है. यह एक पत्रकार के रूप में इन दोनों महान शख्सियत के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है कि अपनी खबरों के अलावा वे स्वयं में भी हमेशा एक खबर रहे, जिसमें इन दोनों के साथ और जनसत्ता के हाथ का हमेशा योगदान रहा. बाकी तमाम लोगों की तरह उन दिनों मैं भी उस जनसत्ता, उस प्रभाष जोशी और उस आलोक तोमर का दीवाना था. मैं कभी भी आलोक जी के बहुत अधिक व्यक्तिगत ताल्लुक में नहीं रहा, हाँ पिछले एक साल से उनसे फोन के माध्यम से संपर्क जरूर बना था. पर वे मेरे जैसे ना जाने कितने लोगों के दिलों में निरंतर बसे रहेंगे, प्रभाष जोशी और जनसत्ता को अपने साथ लिए.

अमिताभ ठाकुर

वरिष्ठ पुलिस अधिकारी

मेरठ

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास तक खबर सूचनाएं जानकारियां मेल करें : [email protected]

भड़ास के वाट्सअप चैनल से जुड़ें और नवीनतम खबरें पाएं : Bhadas Whatsapp

भड़ास लीगल टीम : किसी किस्म की लीगल हेल्प के लिए संपर्क करें- Bhadas Legal Team

You May Also Like

Uncategorized

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम तक अगर मीडिया जगत की कोई हलचल, सूचना, जानकारी पहुंचाना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. इस पोर्टल के लिए भेजी...

Uncategorized

भड़ास4मीडिया का मकसद किसी भी मीडियाकर्मी या मीडिया संस्थान को नुकसान पहुंचाना कतई नहीं है। हम मीडिया के अंदर की गतिविधियों और हलचल-हालचाल को...

हलचल

[caption id="attachment_15260" align="alignleft"]बी4एम की मोबाइल सेवा की शुरुआत करते पत्रकार जरनैल सिंह.[/caption]मीडिया की खबरों का पर्याय बन चुका भड़ास4मीडिया (बी4एम) अब नए चरण में...

Uncategorized

मीडिया से जुड़ी सूचनाओं, खबरों, विश्लेषण, बहस के लिए मीडिया जगत में सबसे विश्वसनीय और चर्चित नाम है भड़ास4मीडिया. कम अवधि में इस पोर्टल...