पिछले दिनों टाटा समूह के सर्वेसर्वा रतन टाटा ने यह कह कर सनसनी फैला दी थी की उनसे एयरलाइंस व्यवसाय में कदम रखने के दौरान किसी केन्द्रीय मंत्री ने रिश्वत की मांग की थी जो उन्होंने नहीं दी और उसी के कारण टाटा सन्स (टाटा समूह की वास्तविक कंपनी) ने एयरलाइंस के कारोबार से तौबा कर ली. हालाँकि मीडिया में इस खबर के आने के बाद रतन टाटा ने अपनी और से सफाई भी दी की उनसे किसी मंत्री ने सीधे तौर पर रिश्वत नहीं मांगी थी.
खैर, रतन टाटा ने इस बात का जिक्र इतने लम्बे अवधि के बाद क्यों किया, ये तो वही जानें. स्टील, बिजली, चाय, गाड़ी से लेकर होटल के कारोबार और दुनिया जहां तक बनाने वाले रतन टाटा और उनकी कंपनी टाटा सन्स का हिन्दुस्तान की अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा हाथ है. जाहिर है रतन टाटा के इस बयान के बाद राष्ट्रीय मीडिया खासकर टेलीविजन पत्रकारिता ने इसे बड़ी गंभीरता से लिया और अपने स्तर से इस पड़ताल में जुट गए की आखिर किसके कार्यकाल में रतन टाटा से घूस मांगी गयी.
कुछ दिन बीतने के बाद स्पेक्ट्रम घोटाले की खबर आयी और साथ ही सत्ता, व्यवसाय और पत्रकारों के बीच चलने वाली दलाली की खबर भी आयी. अब मीडिया के चौंकने की बारी थी. जो मीडिया पद्म विभूषण रतन टाटा के शान में कसीदे पढ़ रहा था जब उसे इस बात की भनक लगी की कॉर्पोरेट जगत की दलाल नीरा राडिया के साथ रतन टाटा का सीधा सम्बन्ध है और राडिया-टाटा की आपस में हुई लगातार बातों का प्रमाण जब मीडिया के हाथ लगा तो बडों-बड़ों के पसीने छूट गए. हिन्दुस्तान सहित चीन, यूरोप और कई अमेरिकन देशों में फैले टाटा के कारोबार का सच लोगों के सामने आना शुरू हो गया.
मीडिया को हाथ लगे टेप के अनुसार नीरा राडिया टाटा के फायदे के लिए नीतियों को प्रभावित करने और उन्हें बदलवाने का काम करती थी. यानि टाटा की पूरी दाल ही काली थी. मतलब साफ़ था कि जिस टाटा घराने को आम लोगों कि राय में बेदाग और ईमानदार व्यवसायी समूह माना जाता है यह बस उपरी चेहरा है जबकि सच्चाई कुछ और इशारा कर रही है. झारखण्ड में भी टाटा के जमीन लीज का मुद्दा काफी चर्चित रहा था और उस समय भी काफी हो हल्ला हुआ था कि टाटा को दिए गए जमीन को दुबारे लीज में दिए जाने से कुछ मंत्रियों को आर्थिक लाभ दिया गया है. परन्तु टाटा की छवि को देखते हुए उस समय इसे गीत का साउंड इफेक्ट समझा गया था. अब तो यह मामला जांच के दायरे में है. रतन टाटा के नीरा राडिया से किस प्रकार के रिश्ते हैं, यह तो जाँच के बाद ही पता चलेगा. परन्तु एक सवाल जरूर है कि क्या रतन टाटा झूठ बोल रहे हैं?
लेखक अनंत झा पिछले एक दशक से झारखंड की पत्रकारिता में सक्रिय हैं. प्रिंट और इलेक्ट्रानिक, दोनों मीडिया में काम करने का अनुभव है. इन दिनों यायावरी कर रहे हैं.












JAI KUMAR JHA
November 26, 2010 at 3:22 pm
रतन टाटा जैसे लोगों की वजह से देश के ज्यादातर मंत्री,जनप्रतिनिधि भ्रष्ट और गद्दार बन चुके हैं इस देश और समाज के……देश के ज्यादातर उद्योगपति इस देश में फैले शर्मनाक स्तर के भ्रष्टाचार,अराजकता और कुव्यवस्था के लिए दोषी हैं……इस सबको सजा मिलनी चाहिए…..
DEEPAK KASHYAP
November 26, 2010 at 6:58 pm
IT’LL BE UNEXPECTED IF IT IS TRUE.
yashovardhan nayak
November 27, 2010 at 1:08 am
गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है ,कि “समरथ को नहीं दोष गुंसाई ” टाटा का नाम इस देश में सम्पन्नता का पर्याय माना जाता है.वर्तमान युग में “चवन्नी” के “चार रूपये” बनाने कि कला को ही व्यापार का “सूत्र-वाक्य” माना जाता है.फिर इस बात के कोई मायने नहीं रह जाते कि”उस चार रूपये में से कितने किस-किस को बांटे गए ? अब सभी सुविधाभोगी हो गए ,कोई “गाँधी जी बनना नहीं चाहता” ,सब अपने पड़ोस में “गाँधी जी” चाहते है. यशोवर्धन नायक ,विनोदकुंज तिराहा, झाँसी रोड,टीकमगढ़ (मध्य-प्रदेश )पिन -472001 सम्पर्क -09893111310
Arvind
November 27, 2010 at 7:19 am
aapke jaise log kisi ke baare me kuchch bhe kah sakte ho ab to sudhar jao…
संजय कुमार सिंह
November 27, 2010 at 6:01 pm
रतना टाटा पर इस तरह कीचड़ उछालने से पहले उनके बारे में (टाटा संस्थान के बारे में) जान-पढ़ लेना उचित रहेगा। नीरा राडिया टाटा घराने के लिए जनसंपर्क के काम करती हैं और उसके पैसे पाती हैं। राजा मामले में टाटा से उनकी बातचीत का अंश मैंने नहीं पढ़ा/सुना है। इसलिए उस मुद्दे पर कुछ नहीं कह सकता। पर टाटा ने जब विमान सेवा शुरू करने का प्रस्ताव रखा था और उसमें काफी देर होने के बाद जब वापस लिया था तो यही कहा था कि पैसे मांगे जा रहे हैं और वे पैसे देकर कारोबार नहीं करेगे। पुराने लोगों को यह बात याद होगी। अनंत झा की तरह मैंने भी पत्रकारिता (झारखंड /जमशेदपुर से ही) शुरू की थी तो टाटा संस्थान के खिलाफ खूब लिखा था पर दुनिया देखने के बाद पता चला कि टाटा की तरह कारोबार करना और टिके रहना सबके बूते की बात नहीं है। यह दीगर है कि न्यूनतम मजदूरी से भी वंचित पत्रकारों के लिए टाटा से लोहा लेना बहुत आसान है क्योंकि अव्वल तो हिन्दी की खबरों पर वहां से प्रतिक्रिया आती नहीं और आती है तो अंग्रेजी में और मेरे जैसे लोग यह तर्क देकर उसे नहीं छपने देते / छापते कि छपने के लिए होता तो अखबार पत्रिका की भाषा में होता !