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डिजाल्व होती तस्वीरों के बीच बाल वेश्‍यावृत्ति

उत्‍कर्ष“मां सुनाओ मुझे वो कहानी, जिसमें राजा न हो ना हो रानी… जो हमारी तुम्हारी कथा हो, जो सभी के दिलों की व्यथा हो… गंध जिसमें भरी हो धरा की, बात जिसमें न हो अप्सरा की… हो न परियां जहां आसमानी, मां सुनाओ मुझे वो कहानी।”…सिर्फ यही लाइने गूंज रही है। तबसे जबसे कि उन्होंने मुझे बाल वेश्‍यावृत्ति पर लिखने को कहा। एक ऐसी कहानी सुनाना जिसमें कहानी जैसा तो कुछ है भी नहीं। भला सूनी आंखों में सितारे झिलमिलाते दिखाई देंगे? अगर यही कन्ट्रास्ट नहीं बन पायेगा तो कहानी कैसे बनेगी? खैर..। विरोधाभास, उलझन, हताशा के बीच से शुरुआत ऐसे ही हो सकती है।

उत्‍कर्ष“मां सुनाओ मुझे वो कहानी, जिसमें राजा न हो ना हो रानी… जो हमारी तुम्हारी कथा हो, जो सभी के दिलों की व्यथा हो… गंध जिसमें भरी हो धरा की, बात जिसमें न हो अप्सरा की… हो न परियां जहां आसमानी, मां सुनाओ मुझे वो कहानी।”…सिर्फ यही लाइने गूंज रही है। तबसे जबसे कि उन्होंने मुझे बाल वेश्‍यावृत्ति पर लिखने को कहा। एक ऐसी कहानी सुनाना जिसमें कहानी जैसा तो कुछ है भी नहीं। भला सूनी आंखों में सितारे झिलमिलाते दिखाई देंगे? अगर यही कन्ट्रास्ट नहीं बन पायेगा तो कहानी कैसे बनेगी? खैर..। विरोधाभास, उलझन, हताशा के बीच से शुरुआत ऐसे ही हो सकती है।

उत्तर प्रदेश और बिहार की सीमा को बांटती गंगा नदी के तट पर एक बलिया जिला है। यहां की माटी ने बडे़ सपूत पैदा किए। बाबू सम्पूर्णानन्द, जेपी, चित्तू पाण्डेय और भी कई। इसी बलिया जिले के मुख्य बाजार चौक से लगती सड़क पर है गुदड़ी बाजार। ये जो गुदड़ी बाजार है यही वो जगह है जहां बाल वेश्‍यावृत्ति शीर्षक वाली पेन्टिंग के रंगों से मुलाकात हुई। ये रंग भी बड़े मायावी हैं। तस्वीर में तो होठों पर चटक गुलाबी, गालों पर सुर्ख, हाथ-पैरों में रक्तिम और कपड़ों के चटक रंग खिले-खिले से होते हैं। मगर इनसे बने इन्द्रजाल में जब प्रवेश होता है तो सहसा किसी तिलस्मी प्रभाव से ये फीके पड़ जाते हैं। ये तिलिस्म अहसास का फर्क दिखाता है।

गुदड़ी बाजार का इलाका शुरू होते ही कई एहसास होने लगते है। एक एहसास ये भी होता है कि आप उत्तर भारत के एक छोटे श्‍ाहर से निकलकर भारतीय विविधता के किसी शोरूम में पहुंच गए हों। बंगाली, मुस्लिम, पंजाबी, मराठी और हां नेपाली भी। ये सभी मूल यहां लाइन से खड़े दिखाई देते हैं। दो मंजिले भवनों की कतारों के हर मंजिल, हर सीढ़ी पर लिपी-पुती एक काया। चमकीले-भड़कीले कपड़े। अश्‍लील इशारों की भाषा। ये शहर की बदनाम बस्ती है।

इस बाजार की एक और खासियत है। ये जो बिकने के लिए खड़ी हैं उनके हाव-भाव भले ही चमकीले-चटकीले दिखाई दें पर आंखों में झांककर देखिए। सारी हकीकत सामने आ जाती है। खीज, चिढ़, चिन्ता, झुंझलाहट, हताशा, निराशा इन सभी नाशुक्रे शब्दों के मायने आपको इन आंखों में दिखाई दे जाएंगे। और एक जो चीज सबसे अधिक खटकती है, वो है वक्त से पहले लगातार हाशिए पर जाती हुई संवेदना। जी हां इन आकृतियों में 80 प्रतिशत के लगभग 16 से कम उम्र वालियां हैं।

ये कम उम्रवालियां यहां क्यों? यहां कैसे? ये सवाल दिमाग में कीड़े की तरह रेंगने लगा है। ये कौन लोग हैं जो इन्हें यहां तक ले के आए? ये कौन हैं जो यहां बाजार में सजकर बैठ गए? ये कौन हैं जो इन्हें खरीदने आते हैं? कौन… कौन… कौन? इको होती आवाज जबरदस्ती धकेल देती है उत्तर तलाशने वाले सांप-सीढी के खेल में। कल्पनाषक्ति अब तर्क ढूंढ़ने में लग पड़ी है। अब शुरू होगी पूरी फिल्म की एडिटिंग का सिलसिला। गुदड़ी बाजार की तस्वीर को डिजाल्व करती एक तस्वीर उभर रही है। एक आठ-नौ साल की बच्ची अपने परिवार के साथ खेल रही है। एक टिपिकल फैमिली सीन। वो जो पिता या चाचा या भाई है, वो बड़ी मासूमियत से बच्ची को प्यार कर रहा है। सहसा बच्ची दौड़ती हुई फ्रेम से बाहर हो जाती है। वो मुड़ कर देखती भी नहीं (शायद वक्त न मिला हो) शेष परिवार उदास। तस्वीर फिर डिजाल्व होती है।

नई तस्वीर उभर रही है। बच्ची के साथ एक आदमी है वो कहीं सौप रहा है उसे। सुपर इम्पोज होकर ढेर सारे नोट बिखर जाते हैं। अब नई तस्वीर उभरती है। बच्ची दो मंजिले मकान की सीढी़ पर अपनी उम्र की स्वाभाविकता से परे कपड़े पहनकर खड़ी है। फिर आदमी आता है। बातें अस्फुट स्वरों में। सीढ़ियां चढ़ते हैं दोनों। दरवाजा बन्द होता है और थोड़ी देर बाद खुलता है तो बच्ची के चेहरे पर कुछ झुर्रियां दिखती हैं। कोई आकर उसे पाउडर से ढकता है। फिर सीढ़ी। ये एक जैसे ही फ्रेम लगातार बनने लगते हैं। मेरे मन की उलझन अब बढ़ने लगी है। तस्वीरों के डिजाल्व होने की प्रक्रिया बरदाश्त से बाहर हो रही है। पूरी ताकत से झटका दे कर मैं इससे बाहर आता हूं। सब कुछ पीछे छूट गया है मगर एक चीज समझ में नहीं आ रही। हर तस्वीर में जो आदमी था वो एक ही कपड़े क्यों पहने था? वो कौन है जो हर तस्वीर में परिवार, दलाल और ग्राहक की अलग अलग भूमिका निभा रहा था, लेकिन उसके हाव-भाव और आकृति एक जैसी ही दीखती थी? इतना जाना पहचाना क्यों लग रहा था? अब लगता है कि यदि इस क्यों का जवाब ढूंढ लिया जाए तो पहले वाले कौन? कैसे? का जवाब मिल जाएगा।

लेखक उत्कर्ष सिन्हा फितरत से यायावर हैं तो मिजाज से समाजकर्मी. वर्तमान में दैनिक लोकमत, लखनऊ के प्रमुख संवाददाता हैं. किसान आन्दोलन सहित लोकतान्त्रिक अधिकारों के लिए चल रहे जन आन्दोलनों में शिरकत करते रहते हैं. एमिटी यूनिवर्सिटी में अतिथि प्रोफ़ेसर के तौर पर छात्रों को मानवाधिकार का पाठ पढ़ाते हैं.

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0 Comments

  1. Renu Dholpuria

    December 27, 2010 at 5:39 am

    hello sir………. mujhe nhi lagta apko mere appreciation ki jarurat h lekin apne jo likha wo sahi h hi sath ache achon ki aatma jhinjhodne wala…… desh mein aisi ya esse milti julti kitni stories h jinka hum jawab talashne ki koshish karte hain. lekin jawab fir bhin adhura sa hi lagta h…………………

  2. ..XYZ..

    December 27, 2010 at 9:54 am

    Laajawab ! Bahut khub likha ! Marm aur shabaab ke shaukeen logon ki talaash ! Sanskaar ki baat karne waale is Desh mein Bachchiyion ke sharir kee maang karne waalon ki kami nahi ! Duniya ke is sabse puraane peshe ki tootee , Hindustaan mein har jagah bolti hai ! Saudaagar bhi hain aur Saamaan bhi !
    Pata nahi is desh mein kis tarah ke SANSKAARON KA DHINDHORA PEETA JATA HAI ?

  3. Niraj Bahadur Pal

    December 28, 2010 at 11:47 am

    Par sabse badi samasya yah hai ki is kaun ka jabab dhundhna hi sabse badi mashakkat sabit hoti hai, yeh sirf Gudri Bazar ki kahani nahi hai bhaiya balki pure desh mein ya yun kahein har chhote bade sahar mein khi na kahin kisi na kisi roop mein yeh Gudri bazar apna dera jamayein baithe hain, ab sabse bada sawal yeh aata hai ki yeh kaise bhala kaise apna pair jamate hain? Jawab bada kathin hai lekin ansuljha??????????????????? Bilkul nahi…………………….shayad in bazaaron ke jamne mein kahin humara hi hath to nahi, yeh manavta ki kali kothri ki deewarein hain bhaiya……………….jo rah rah kar apne hi banni shuru ho jati hain, aur jab humein ehsas hota hai bhrbhara ke tut kar gir jati hain, lekin tab tak kafi der ho jati hai aur hum apne man ko ” AB PACHHTAYE HOT KYA JAB CHIRIYA CHUG GAYI KHET” Kahkar tassalli dene lagte hain lekin kya isse samasya hal hone wali hai?????????????????????????????????

    Shayad isiliye apki yeh line sahsa kuchh jada hi jeevant lagne lagti hai aur shayad uttar bhi isi line mein hai

    ” सब कुछ पीछे छूट गया है मगर एक चीज समझ में नहीं आ रही। हर तस्वीर में जो आदमी था वो एक ही कपड़े क्यों पहने था? वो कौन है जो हर तस्वीर में परिवार, दलाल और ग्राहक की अलग अलग भूमिका निभा रहा था, लेकिन उसके हाव-भाव और आकृति एक जैसी ही दीखती थी? इतना जाना पहचाना क्यों लग रहा था?”

    parantu agar hum dhundhna chahein to aur in gudri bazaron ko mitana chahein to…………………….shayad lakho kaliyan ek naye khule aakash mein sans le payengi……………………….

  4. madan kumar tiwary

    December 28, 2010 at 5:36 pm

    उत्कर्ष भाई उसी बलिया का मैं रहनेवाला हूं। उस गुदडी बाज़ार में अच्छे -अच्छे लोगों का घर भी है। लेकिन वह भी कुछ नही करते। वहां अब बार भी खुल गये हैं। घाट का रास्ता भी वही है। जहां ददरी मेला लगता है और छ्ठ का अर्क चढाया जाता है। लेकिन एक बात बोलता हूं , यह समस्या पुरे देश की है। हर जगह , चाहे वह दिल्ली का जीबी रोड हो या गया का सराय महल्ला। बंदिश और कानूनन रोक से समस्या का निदान नही हो सकता। तलास करो, क्या कारण हैं। मेरी समझ से गरीबी सबसे बडा कारण हैं, वरना जो उम्र प्यार के लिये बलिदान होने की होती है, उस उम्र में एक लडकी पैसे के लिये नही बिक सकती । गरीबी हटा दो। चाहे जैसे भी हो। हम आप एक बात पर सहमत हो जायें कि हर हाल में भ्रष्ट नेता , अफ़सर को बेनकाब करेंगें , तो उसी क्षण गरीबी दुर हो जायेगी । लेकिन ऐसा होगा नही। इसे हीं सिस्टम कहते हैं । उसने सबको चोर बना दिया है। अंतर सिर्फ़ बडे और छोटे चोर का है।

  5. Harish Upadhyay

    December 29, 2010 at 7:41 am

    Bahut Bahut Shubhkamnaye… aise muddey zaroor uthao…Ek Prashna Antim Baar Gudri bazar kab gaye the ?

  6. Lenin

    December 30, 2010 at 4:04 am

    Great debate

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