Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

प्रिंट

डीएनए ने हिम्मत दिखाई

: मुझे चिन्ता इस बात की है कि मीडिया के कारोबार में घुस आए लोग इसे बौद्धिक कर्म से दूर करने की कोशिश में लगे रहते है : डीएनए ने हिम्मत दिखाई और घोषणा करके एडिट पेज बन्द कर दिया। साथ में यह कहा कि इसे बहुत कम लोग पढ़ते हैं, बोरिंग होता है, अपनी ज़रूरत खो चुका है, सिर्फ जगह भरने का काम हो रहा था। आदित्य सिन्हा उत्साही और प्रखर पत्रकार हैं। पर उन्होंने सम्पादकीय पेज हटाने के बारे में जो बातें लिखीं हैं, वे नई नहीं हैं।

: मुझे चिन्ता इस बात की है कि मीडिया के कारोबार में घुस आए लोग इसे बौद्धिक कर्म से दूर करने की कोशिश में लगे रहते है : डीएनए ने हिम्मत दिखाई और घोषणा करके एडिट पेज बन्द कर दिया। साथ में यह कहा कि इसे बहुत कम लोग पढ़ते हैं, बोरिंग होता है, अपनी ज़रूरत खो चुका है, सिर्फ जगह भरने का काम हो रहा था। आदित्य सिन्हा उत्साही और प्रखर पत्रकार हैं। पर उन्होंने सम्पादकीय पेज हटाने के बारे में जो बातें लिखीं हैं, वे नई नहीं हैं।

सम्पादकीय पेज जब शुरू हुए थे, तभी कौन सा बहुत पढ़े जाते थे। वक्त के साथ तमाम चीजें बदलतीं हैं। सम्पादकीय पेज भी बदले। पर अखबारों में विचार और विश्लेषण तत्व पहले से ज्यादा हुआ। आदित्य सिन्हा भी कहते हैं कि विश्लेषण वगैरह रहेंगे। और जब हमारे स्टैंड की ज़रूरत होगी हम पेज 1 पर लिखेंगे। अलबत्ता इतना तय है कि डीएनए ‘एडिटोरियल वी’ यानी ‘हम’ का सामूहिक तत्व नहीं चाहते। साथ ही जनता के सामने खुलकर बोलना नहीं चाहते।

सम्पादकीय पेज ओपीनियन पेज होते हैं। इसमें पाठकों के विचार भी शामिल हैं। टेलीविजन के मुकाबले अखबारों की महत्ता इस ओपीनियन पेज के कारण ही है। अखबारों ने ऑप-एडिट पेज भी इसीलिए शुरू किए थे। इन्हें पढ़ने वाले लोग कम होते हैं। विचार यों भी भारी होते हैं, पर मौके पर वही काम आते हैं। हमारे समाज में ओपीनियन लीडर्स की ज़रूरत हमेशा रहेगी। ओपीनियन लीडर्स तादाद में ज्यादा नहीं होते। पर वे बड़ी संख्या में लोगों को प्रभावित करते हैं।

डीएनए के पाठक सम्पादकीय पेज विहीन अखबार पसंद करें तो किसी को क्या आपत्ति है। यह फैसला केवल सम्पादक का नहीं पूरे संस्थान का होगा। दूसरे यह भी देखना चाहिए कि वैकल्पिक व्यवस्था क्या की गई है। अखबार समय के साथ इवॉल्व करेंगे इसमें दो राय नहीं, पर मुझे चिन्ता इस बात की है कि मीडिया के कारोबार में घुस आए लोग इसे बौद्धिक कर्म से दूर करने की कोशिश में लगे रहते है। वे सफल तो नहीं होंगे, पर कुछ वक्त के लिए पत्रकारिता को चोट तो पहुँचा ही देंगे।

लेखक प्रमोद जोशी वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनकी यह टिप्पणी उनके ब्लाग से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

0 Comments

  1. kuldeepdevd

    February 1, 2011 at 10:19 am

    joshi sir ham logo ko college ke samay padhaya gaya tha ki kabhi toi ne bhi apna editorial page band kar diya tha jisse uska 1 mahine ke andar 25 pratishat vitran band ho gaya tha ya longo ne dusra vikalp apna liya tha. aise me ye bada fasla to hai hi sath hi ye dna ke liye atmaghati bhi ho sakta hai kyoki aisa nahi hai ki sampadkiy page sab log padhe lekin padhne walo ki sankhya bhi kam nahi hai… arobariyo ki nazar me agar varishth patrakaro ke vichar bore hai to kewal criem ki khabro aue rakhi bipasa ko chhap kar akhbar nahi chalaya ja sakta.. warna sab ke hath me aaj porn aue manohar kahaniyo ki kitabo ke alawa kuchh na hota.. aise me yahi kahna hai ki dna ko ek bar fir se apne faisle par vichar karna chahiye..

  2. रजनीश

    February 1, 2011 at 4:00 pm

    डीएनए अखबार ने आज से संपादकीय पेज की समाप्ति की घोषणा कर दी। काफी अजीब भी है और दुखद भी। मुझे याद है अपने स्कूल कालेज के दिनों में अक्सर लोग-बाग कहा करते बेटा बीच का पेज यानि संपादकीय जरुर पढ़ना। संपादकीय पेज न केवल अखबार की आत्मा होती बल्कि अखबार का दृष्टिकोण और किसी मुद्दे पर उसकी खरी खरी होती , साथ ही पाठकों की प्रतिक्रिया का भी मंच होता। संपादकीय के अंत की ये शुरुआत युवा होने और बनने के दंभ और दौर के बीच बुजुर्गियत की मौत सरीखा है ।डीएनए इसे प्रोग्रेस और इवोल्व होने के प्रोसेस का हिस्सा मानती है और साथ ही अपने इस फैसले से पाठकों की रजामंदी पर भी कांफीडेंट है। मुझे नही पता आखिर किस सर्वे का रिजल्ट है यह और न ही अपने पहले पन्ने की सबसे बड़ी खबर पर उसने इसका आभास दिया है। लेकिन एक सवाल जो मौजूं है वो ये कि पाठकों की इस अखबार से आपत्ति और विरोध क्या केवल एडिटोरियल तक ही सीमित थी ? और सबसे बड़ा सवाल ये है कि मीडिया अब क्या केवल मीडियम के रुप में ही सीमित होकर रह जाएगी…

  3. umesh shukla

    February 1, 2011 at 4:34 pm

    Pramod joshiji ne bahut sahi likha hai ki media ke karobar me ghus aaye kuch log ise baudhik karm se door karne me lage rahate hain. aise hi log sampadak rahate huye bhi kuch likhne ka sahas nahi juta pate hain, darte rahte hain ki kalai na khul jaaye.joshiji ki baat hi aage sahi sabit hogi, isme koi do rai nahi hai.

  4. bhnwesher

    March 14, 2011 at 11:16 am

    I can expresess my feeling only int his way…………………
    D;D;D;D;D;D;D;D;D;D;D;D;D;D;D;D;D;D;D;D;D;D;D;D;D;D;D;D;D;D;D;D

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास तक खबर सूचनाएं जानकारियां मेल करें : [email protected]

भड़ास के वाट्सअप चैनल से जुड़ें और नवीनतम खबरें पाएं : Bhadas Whatsapp

भड़ास लीगल टीम : किसी किस्म की लीगल हेल्प के लिए संपर्क करें- Bhadas Legal Team

You May Also Like

Uncategorized

भड़ास4मीडिया डॉट कॉम तक अगर मीडिया जगत की कोई हलचल, सूचना, जानकारी पहुंचाना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. इस पोर्टल के लिए भेजी...

Uncategorized

भड़ास4मीडिया का मकसद किसी भी मीडियाकर्मी या मीडिया संस्थान को नुकसान पहुंचाना कतई नहीं है। हम मीडिया के अंदर की गतिविधियों और हलचल-हालचाल को...

हलचल

[caption id="attachment_15260" align="alignleft"]बी4एम की मोबाइल सेवा की शुरुआत करते पत्रकार जरनैल सिंह.[/caption]मीडिया की खबरों का पर्याय बन चुका भड़ास4मीडिया (बी4एम) अब नए चरण में...

Uncategorized

मीडिया से जुड़ी सूचनाओं, खबरों, विश्लेषण, बहस के लिए मीडिया जगत में सबसे विश्वसनीय और चर्चित नाम है भड़ास4मीडिया. कम अवधि में इस पोर्टल...