पत्रकारों के हितों की चिंता उत्तराखंड के मुख्यमंत्री डॉ. निशंक ने हमेशा की है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि डॉ. निशंक के कार्यकाल में पत्र-पत्रिकाओं तथा इलेक्ट्रानिक मीडिया, वेब मीडिया की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है. प्रदेश का पत्रकार कहीं भी कैसे भी संकट में फंसा हो तो मुख्यमंत्री डॉ. निशंक ने उनकी पहले चिंता की है.
कई पत्रकारों के सुख-दुख में वे काम आए हैं और आ रहे हैं. अभी-अभी पिथौरागढ़ के कैलाश मानसरोवर रूट के गुंजी में फंसे पांच पत्रकार अजय शाह, रीमा सिंह, भावना पंचभैया, सुखवीर सिंह, अजित सिंह को हैलीकॉप्टर से रेस्क्यू कर सुरक्षित स्थानों पर लाया गया. स्व. पत्रकार उमेश जोशी के घर पर जाकर उनके परिजनों को न केवल आर्थिक सहायता दी वरन स्वर्गीय जोशी के पुत्र को नौकरी देने का भी आश्वासन दिया. छायाकार श्री विनोद पुंडीर जो कि हृदयाघात से पीड़ित थे तो ढाई लाख रुपये की आर्थिक सहायता तत्काल मुहैया कराकर उनको मौत के मुह में जाने से बचाया. पत्रकार अजय गुलाटी, एमएस जौहर, राजेश देवरानी, वाचस्पति गैरोला को चिकित्सा के लिए तथा दिवंगत पत्रकार कुंवर सिंह नेगी एवं शशिकांत मिश्र के परिजनों को संकट की घड़ी में आर्थिक मदद दी है. ऐसे कई पत्रकारिता से जुड़े लोगों को मुख्यमंत्री निशंक ने मदद की है जिनका मैं यहाँ उल्लेख नहीं करना चाहता. आपको तो खुश होना चाहिए कि प्रदेश को पत्रकारों का पैरोकार एक पत्रकार मुख्यमंत्री मिला है.
मेरे पिछले आलेख पर कुछ बंधुओं ने टिपण्णी करके मेरे पत्रकार होने पर सवाल उठाया था. यदि तर्क व सच्चाई रखना चमचागिरी है तो मुझे ‘चमचा’ कहे जाने में कतई गुरेज़ नहीं. जो लोग मुझे पत्रकार मानने से इंकार कर रहे हैं वे उपरोक्त उल्लिखित नामों को तो पत्रकार मानेंगे जिनकी सहायता डॉ. निशंक ने संकट कि घड़ी में की है? और एक बात और, जिस महानुभाव ‘पत्रकार’ को ‘मुख्यमंत्री पत्रकार’ द्वारा प्रताड़ित किये जाने की खबर आपने भड़ास पर प्रकाशित की, शायद आप भी उनकी असलियत जानते होंगे, यदि नहीं, तो मैं उनका काला चिठ्ठा आपको जल्द ही भेजूंगा. तब आप तय करिए की कौन किसके पीछे पड़ा है.
प्रमोद कुमार
देहरादून, उत्तराखंड












अम्बुज शर्मा
October 1, 2010 at 3:52 am
जो प्रदेश अपने निर्माण के मात्र १० सालों में भ्रष्टाचार के अनगिनत मामलो में फंसा हो , और ये मामले भी किसी विपक्ष ने न उठा कर मीडिया के द्वारा खोले गए हों ऐसे में कोई भी मुख्य मंत्री सबसे पहले अपने खिलाफ हो रहे प्रचार को रोकेगा ही ! इस के लिए एक पत्रकार -मुख्य मंत्री क्या -क्या कर सकता ……….. प्रभुद्ध जनता को बताने की कोई जरुरत नहीं है और नारद तो सब कुछ जानते ही हैं… आप कष्ट न करें…>:(
Sudesh Kumar
October 7, 2010 at 8:25 pm
Pramod Kumarji patrakar hain ya chatukar, main is bat par bahas nahi karna chahta lekin inke alekh ke bad pratikriyaon ka jo daur arambh hua usne ye to sabit kar diya ki Nishank ki lokpriyta se virodhiyon me kitni baukhlahat hai. Aisa pratit hota hai ki virodhiyon ne baukhla kar chhadm namo se pratikriyayen dena bhi arambh kar diya hai
Shobhit Singh
October 7, 2010 at 8:36 pm
Citurjia mamle me ghotale ki bat karne vale patrakar ” Diamond Plastics Industry v/s Andhra Pradesh Govt & others” me mananiya Supreme Court dwara dt. 09.05.97 ke nirnay ko dekhen, jiske anusar BIFR ka adesh Rajya Sarkar sahit sabhi pakshon ke liye badhyakari hai. To kya Pradesh sarkar ko Manniya Sarvochh Nyayalaya ka adesh nahi manna chahiye tha?