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तहलका के साथ खड़े हों

नूतनजीमैं तहलका के साथ हूँ. ठीक है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय में आज साप्ताहिक समाचार पत्रिका ‘तहलका’ के खिलाफ अवमानना याचिका दायर की गयी है. यह भी ठीक है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अधिवक्ता सुशील कुमार मिश्रा की ओर से ‘तहलका’ के खिलाफ दायर याचिका में पत्रिका के खिलाफ स्वत: संज्ञान लेकर कार्रवाई की मांग की गयी है. जानकारी के अनुसार मिश्रा की दलील है कि ‘तहलका’ के 18 दिसंबर 2010 के अंक में उच्च न्यायालय के 35 न्यायाधीशों की तस्वीरें प्रकाशित की गयी हैं और इसमें उनकी ‘मानहानि’ करती टिप्पणियां भी प्रकाशित की गयी हैं. बताया जा रहा है कि न्यायालय द्वारा बुधवार को इस याचिका पर सुनवाई किए जाने की संभावना है.

नूतनजीमैं तहलका के साथ हूँ. ठीक है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय में आज साप्ताहिक समाचार पत्रिका ‘तहलका’ के खिलाफ अवमानना याचिका दायर की गयी है. यह भी ठीक है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अधिवक्ता सुशील कुमार मिश्रा की ओर से ‘तहलका’ के खिलाफ दायर याचिका में पत्रिका के खिलाफ स्वत: संज्ञान लेकर कार्रवाई की मांग की गयी है. जानकारी के अनुसार मिश्रा की दलील है कि ‘तहलका’ के 18 दिसंबर 2010 के अंक में उच्च न्यायालय के 35 न्यायाधीशों की तस्वीरें प्रकाशित की गयी हैं और इसमें उनकी ‘मानहानि’ करती टिप्पणियां भी प्रकाशित की गयी हैं. बताया जा रहा है कि न्यायालय द्वारा बुधवार को इस याचिका पर सुनवाई किए जाने की संभावना है.

मैं नहीं कह पाउंगी कि इस मामले में न्यायालय का क्या रुख रहेगा और न्यायालय क्या निर्णय करेगी. पर जहां तक मेरी बुद्धि जाती है, मैं अपने आप को तहलका के साथ पाती हूँ. 18 दिसंबर 2010 के अंक के ठीक पहले भी तहलका ने अपने 11 दिसंबर 2010 के अंक में इसी से जुड़ा एक खबर प्रकाशित किया था, जिसका शीर्षक था- “Judges hear cases argued by sons. Not good counsel at all”. यह खबर कुणाल मजुमदार द्वारा लिखी गयी थी. यह खबर मूल रूप से उच्चतम न्यायालय के जस्टिस मार्कंडेय काटजू और जस्टिस ज्ञानसुधा मिश्रा द्वारा एक मामले में दिए गए कुछ अत्यंत गंभीर टिप्पणियों के आलोक में लिखी गयी थी. इन दोनों न्यायाधीशगणों ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के दोनों बेंचों में कार्यरत कुछ न्यायाधीशगण के विषय में उनके रिश्तेदारों के सम्बंधित कतिपय कड़ी टिप्पणियां की थीं.

कुणाल मजुमदार की खबर इसी निर्णय को आगे बढाते हुए लिखी गयी थी, जिसमे यह कहा गया था कि ऐसे आठ जज हैं जिनके भाई या पुत्र उसी हाई कोर्ट में वकालत कर रहे हैं, जहां वे जज हैं. इस आर्टिकल में कुछ जजों के लड़कों से बात करने पर उनके द्वारा कोई टिप्पणी नहीं करने की बात लिखी गयी थी और लखनऊ में प्रैक्टिस कर रहे सीएम शुक्ला की इस बारे में एक कड़ी टिप्पणी दी गयी थी. चूँकि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के मद्देनज़र मैंने भी इलाहबाद हाई कोर्ट के लखनऊ बेंच में एक रिट याचिका दायर किया था, अतः कुणाल ने इस खबर में मेरी बात भी लिखी थी जहां मैंने अपने रिट का उद्देश्य बताया था. यह अलग बात है कि बाद में यह रिट उल्‍टे मेरे ही खिलाफ कड़ी टिप्पणी करते हुए खारिज कर दी गयी.

अब अगले अंक में ब्रिजेश पाण्डेय और कुणाल मजुमदार ने पुनः उसी निर्णय की पृष्ठभूमि में इन आठ न्यायाधीशों की जगह अबकी पैंतीस ऐसे जजों के नाम और फोटो प्रकाशित किये हैं जिनके पुत्र, पिता, अन्य निकट सम्बन्धी उसी न्यायालय में कार्यरत हैं. लेखकद्वय ने साफ़ कहा है कि ऐसा कोई नियम नहीं है कि जहां जज हों वहाँ उनके सम्बन्धी काम नहीं करें, पर इस आर्टिकल में खुद पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया वीएन खरे का बयान है कि जैसे ही वे सुप्रीम कोर्ट में आये, उन्होंने पहला काम यह किया कि अपने लड़के को दिल्ली से इलाहाबाद भेज दिया. शायद नैसर्गिक न्याय के नियम- “न्याय सिर्फ होना नहीं चाहिए, न्याय होते हुए दिखना भी चाहिए” और “किसी भी व्यक्ति को अपने मामले में जज नहीं होना चाहिए” इस प्रकार की सोच और ऐसी आवश्यकता के पीछे मुख्य कारण हैं. यह भी दिखता है कि सुप्रीम कोर्ट ने शायद  इन्हीं कारणों से अपने सबसे बड़े हाई कोर्ट के खिलाफ इतनी तल्ख़ टिप्पणी की हो. यह भी काबिलेगौर है कि जब उच्च न्यायालय, इलाहाबद ने इस बारे में पुनर्विचार याचिका दायर की थी तब भी सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी टिप्पणियां वापस लेने की जगह यही कहा- “सभी जानते हैं कि कौन ईमानदार है और कौन बेईमान.”

अब ऐसे में यदि तहलका किसी प्रकार की विपरीत टिप्पणी करने या किसी न्यायाधीश को व्यक्तिगत तौर पर दोषी ठहराने की कोशिश की जगह मात्र कुछ तथ्य प्रस्तुत कर रहा है, तो मैं उसे किसी भी तरह से गलत नहीं मानती. बल्कि मैं उसे पूरी तरह से एक अच्छे उद्देश्य के लिए जनता के समक्ष तथ्यों को प्रस्तुत करने के लिए किया गया एक सद्प्रयास मानती हूँ ,जिसकी हमारे देश को नितांत जरूरत है. इस प्रकार के तथ्यों को जानना इस देश के नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है. बाकी निर्णय लेना और अपना मंतव्य बनाना आम आदमी का काम है. जहां तक मैं तहलका के इस आर्टिकल को समझ पायी हूँ, इसमें उसने किसी भी प्रकार से उच्च न्यायालय की गरिमा पर प्रहार करने या उसे अवमानित करने की कोई भी कोशिश नहीं की गयी है.

ऐसे में मैं मानती हूँ कि तहलका के इस हिम्मत को और उसके प्रयास को सराहा जाना चाहिए और हम सभी पत्रकार साथियों को अपनी पूरी शक्ति के साथ तहलका और उसके इन दोनों पत्रकारों के साथ रहना चाहिए, जिन्होंने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है और बाकी पत्रकारों के लिए भी न्यायपालिका से जुड़े सुरुचिपूर्ण और सोद्देश्यपूर्ण आलेख और आर्टिकल लिखने का मार्ग प्रशस्त किया है. मेरी जितनी भी ताकत और शक्ति है, मैं पूरी तरह तहलका के साथ हूँ और उसे इस काम के लिए सलाम करती हूँ.

डॉ नूतन ठाकुर,

संपादक,

पीपल’स फोरम, लखनऊ

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0 Comments

  1. pranjali

    December 22, 2010 at 9:38 am

    mai bhi apki baat se puntah sahmat hu nutan ji akhir nyaypalika me vyapt brastachar par pakash dalne par kyu itna ho halla hota hai.ek reporter nayaypalika par kuch bhi likhne ke pahle hazar baar sochta aur salah leta hai.kabhi to ye divar nichi karni hogi.

  2. SANJEEV SHARMA

    December 22, 2010 at 10:11 am

    Hum Tehelka ke Sath hai or Rahenge Bhi….. Naye Ki Devi Ka Hum Samaan Karte Hai Umeed Hi Nahin Pura Vishvas Hai Faisala TEHELKA ke Paksh Main Hoga…

  3. ruby

    December 22, 2010 at 12:20 pm

    kya nutanji kam se kaam logo se jankari le liya kijiye apne krvikram rao ka mahima mandan karke apna kad chota kar liyaa. ye saab partakarita ke mahaan dalle hai madam kaha hai aap

  4. 2147483647

    December 22, 2010 at 2:08 pm

    I m agree with you

  5. Raakshas

    December 22, 2010 at 4:02 pm

    I think that this whole hullabaloo about Allahabad High Court judges has started after it has given Ramjanmabhoomi verdict in favour of Hindus. Why has Supreme Court judges not opened their mouths for so many years? Why has their conscience stirred suddenly one fine day. As for Tehelka, the less said the better. These bastards are in cahoot with left wing media and anti hindu politicians to rake up the muck for their own purpose. This is just another example of stealth jihad.

  6. rajeshwar singh

    December 22, 2010 at 4:47 pm

    अब आया है ऊँट पहाड़ के नीचे !
    सही गलत का फैसला तो अब अदालत करेगी…
    पत्रकारिता का यह अर्थ कदापि नहीं है कि गलत बात का भी पत्रकारिता के नाम पर समर्थन किया जाए. आदरणीय मैडम आप ही खड़ी रहें तहलका के साथ,
    हम तो खड़े हैं सच के साथ

  7. raju

    December 22, 2010 at 4:58 pm

    मैं भी पूरी तरह से तहलका के साथ हूं। सच लिखना चाहिए, जरूर लिखना चाहिए और जोरदार तरीके से लिखना चाहिए..;चाहे वह जज हो, या बैरिस्‍टर। न्‍यायपालिका का भ्रष्‍टाचार छुपाये नहीं छुपेगा। पानी सिर से बहुत ऊपर चला गया है। एक एफिडेविट में भी घूस चलता है। हर शै बिकाऊ है। कन्‍टेम्‍प्‍ट ऑफ कोर्ट के प्रावधान को अगले 20 साल तक निष्‍प्रभावी कर देना चाहिए।

  8. mohan bhatt

    December 25, 2010 at 2:14 pm

    nutan ji sach likne main taklife uthani hi padati hai…………….tehelka ko is ka puran anubhaw hai……janha tak saath khade hone ki baat hai to ye bataiye ki kana kiya hoga…………….

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