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”दिल्‍ली में साली हवा भी कम हो गई है”

यकीन तो नहीं होता लेकिन यकीन करना पड़ेगा. हमारे बीच अब आलोक तोमर नहीं रहे. अभी पिछले माह फरवरी को मैं अबंरीश जी के साथ उनके घर गया था. घर पहुंचने के बाद आलोकजी ने यह अहसास ही नहीं होने दिया कि वे बीमार चल रहे हैं. उनकी आवाज धीमी और फंसी हुई सी जरूर थी लेकिन चमचमाते दिनों को याद करने के दौरान उनकी आंखों में जो चमक चढ़-उतर रही थी, उसके बाद मुझे यकीन हो गया था कि चाहे जो भी हो आलोकजी अपनी जीवंतता के साथ लंबे समय तक हमारे बीच मौजूद रहेंगे ही.

यकीन तो नहीं होता लेकिन यकीन करना पड़ेगा. हमारे बीच अब आलोक तोमर नहीं रहे. अभी पिछले माह फरवरी को मैं अबंरीश जी के साथ उनके घर गया था. घर पहुंचने के बाद आलोकजी ने यह अहसास ही नहीं होने दिया कि वे बीमार चल रहे हैं. उनकी आवाज धीमी और फंसी हुई सी जरूर थी लेकिन चमचमाते दिनों को याद करने के दौरान उनकी आंखों में जो चमक चढ़-उतर रही थी, उसके बाद मुझे यकीन हो गया था कि चाहे जो भी हो आलोकजी अपनी जीवंतता के साथ लंबे समय तक हमारे बीच मौजूद रहेंगे ही.

आलोकजी एक पुरानी सी शाल ओढ़कर अपने कम्प्‍यूटर के सामने बैठे हुए थे. अबंरीशजी और उनके बीच तमाम विषयों पर बातचीत होती रही. मैं लगातार उनको देखता रहा और कमरे का मुआयना करता रहा. मेरे बेमतलब के मुआयने के बाद भी एक बात जो मुझे समझ में आयी वह यह थी कि आलोकजी ने लिखने के साथ-साथ पढ़ना भी जारी रखा था. आमतौर पर स्थापित पत्रकार जब केवल लिखते हैं तो दूसरों को पढ़ना छोड़ देते हैं, लेकिन आलोकजी के साथ ऐसा नहीं था.

इस बीच जब तबांकू से संबंधित एक कार्यक्रम के लिए आलोक जी ने अबंरीश कुमार को अपील लिखवाई तो बात ही बात में आलोकजी ने कह दिया- अरे मौत को रोज तो बुलाता हूं लेकिन उसकी हिम्मत ही नहीं होती. मेरी घर की देहरी लांघने की. कमबख्त दरवाजे से ही लौट जाती है. भाभीजी ने यह सुन लिया था. वे रो पड़ी थी. उन्हें रोते देख आलोकजी ने उन्हें बहुत प्यार भरी डांट भी पिलाई थी. इस डांट में कहीं चुपचाप यह भी शामिल था कि आलोक की जीवन संगिनी होकर रोती हो.. हिश्श.. हट.

जब हम छोटे थे और पत्रकारिता की एबीसीडी सीखने की जुगत में लगे हुए थे, तभी हमारे सीनियर हमें यह बताते थे कि यदि कभी आलोकजी की रिपोर्टिंग पढ़ने मिले तो जरूर पढ़ें. जब अबंरीश कुमार जनसत्ता ( छत्तीसगढ़) के संपादक बने तो एक दिन आलोकजी को प्रत्यक्ष देखने उनके साथ देर तक बातचीत करने का अवसर भी मिला. जब प्रदेश में जोगी की सरकार थी, तब एक रोज उनका छत्तीसगढ़ आना हुआ था.

एक होटल के कमरे में जब मैंने उन्हें श्वास लेने के लिए इनहेलर करते देखा तो तकलीफ हुई थी. बातों ही बातों में जब मैंने उन्हें टोका तो उन्होंने भी बात को टालने के लिए कह दिया- अरे राजकुमार दिल्ली में साली हवा भी कम हो गई है. बस ये समझ ले आदत हो गई है. काफी दिनों के बाद पता चला कि वे कैंसर से जूझ रहे हैं. अभी दो दिन पहले अबंरीशजी ने ही सूचना दी थी कि आलोकजी की तबीयत फिर से खराब हो गई है. होली के दिन अबंरीशजी ने मुझे फिर बताया कि … यह सूचना पहली सूचना से ज्यादा दुखद थी. पत्रकारिता में भाषा के स्तर पर नए मुहावरों को गढ़ने में आलोकजी ने जो भूमिका निभाई उसकी पूर्ति तो अब शायद ही पाए. मेरी श्रद्धाजंलि.

लेखक राज कुमार सोनी छत्तीसगढ़ में तहलका के प्रमुख संवाददाता है.

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