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नौनिहाल के कारण किसान आंदोलन विशेषज्ञ बन गए ओमकार चौधरी

[caption id="attachment_18075" align="alignleft" width="71"]नौनिहालनौनिहाल[/caption]:  भाग -40 : जिस तरह से रिपोर्टिंग हुई उससे किसान आंदोलन एक बीट बन गया : नौनिहाल ने एक बार मंगलजी से कहा कि मेरठ के बाहर की बीट की खबरें कवर करने के लिए मेरठ से रिपोर्टर भेजे जाएं। स्ट्रिंगर वहां की सामान्य खबरें भेजें। पर बड़ी खबरें, खासकर बीट की खबरें अपने रिपोर्टर ही करें। मंगलजी समझे नहीं। ‘मने, आप जरा विस्तार से बताइये। कहना क्या चाहते हैं?’

नौनिहाल

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भाग -40 : जिस तरह से रिपोर्टिंग हुई उससे किसान आंदोलन एक बीट बन गया : नौनिहाल ने एक बार मंगलजी से कहा कि मेरठ के बाहर की बीट की खबरें कवर करने के लिए मेरठ से रिपोर्टर भेजे जाएं। स्ट्रिंगर वहां की सामान्य खबरें भेजें। पर बड़ी खबरें, खासकर बीट की खबरें अपने रिपोर्टर ही करें। मंगलजी समझे नहीं। ‘मने, आप जरा विस्तार से बताइये। कहना क्या चाहते हैं?’

‘जैसे सरधना और मवाना हैं। हापुड़ और हस्तिनापुर हैं। मुजफ्फरनगर और सहारनपुर हैं। इनमें से कहीं पर हमारे रिपोर्टर हैं, तो कहीं पर स्ट्रिंगर हैं। वहां की आम खबरें वे भेजते ही हैं। पर अगर कोई बड़ी घटना घट जाये, तो उसे कवर करने के लिए मेरठ से अपने रिपोर्टर भेजे जा सकते हैं।’

‘लेकिन ऐसा करने पर हमारे वहां के रिपोर्टरों को बुरा नहीं लगेगा?’

‘बुरा क्यों लगेगा?’

‘आखिर पूरे साल और सालों-साल तो कवरेज वही करते हैं। जाहिर है, किसी बड़ी घटना की कवरेज भी वही करना चाहेंगे। उनके लिए वह बड़ा अवसर होगा। उन्हें यह नहीं लगेगा कि जब कोई बड़ी घटना घटी, तो उनसे मौका छीन लिया गया।’

‘मैं कोई उनसे मौका छीनने की बात थोड़े ही कर रहा हूं। यह तो उनकी सुविधा के लिए ही होगा।’

‘वो कैसे?’

‘पहले हमें मेरठ में कोई स्पर्धा नहीं थी। अब हमारे सामने अमर उजाला की स्पर्धा है। आस-पास के शहरों की रोजाना की घटनाओं के अलावा हमें वहां की बड़ी घटनाओं पर भी नजर रखनी चाहिए। अगर ऐसी कोई घटना घटी, तो हमारा कवरेज अमर उजाला और दिल्ली के अखबारों से बेहतर होना चाहिए। हमें इसकी योजना बनाकर काम करना चाहिए।’

‘मने हमारे पास इतना मैन पावर कहां है, जो हम अपने रिपोर्टर मेरठ से बाहर भेजें?’

‘सोच लीजिए मंगलजी, जरा जोर जरूर पड़ेगा, पर अखबार की पौ-बारह हो जायेगी।’

‘पर किसे भेज सकते हैं यहां से?’

इस पर नौनिहाल ने कई नाम सुझाये। उनमें से कुछ मंगलजी ने माने, कुछ नहीं माने। लेकिन मेरठ से बाहर जाकर कवरेज करने का पहला मौका मिला अभय गुप्त को। सहारनपुर में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सभा थी। वहां के रिपोर्टर को बेशक यह अच्छा नहीं लगा हो, पर उन्होंने अभयजी का जोरदार स्वागत किया। अभयजी ने भी उनसे कहा कि बंधु, मैं बस भाषण की कवरेज करूंगा। आप बाकी सब लिख पेलिये। तो मुख्य समाचार अभयजी का छपा और झलकियां वहां के संवाददाता की।

इससे जागरण, मेरठ में एक नयी परंपरा शुरू हो गयी। गंगा की बाढ़ की कवरेज हस्तिनापुर जाकर विश्वेश्वर ने की। ओपी सक्सेना ने आस-पास जाकर कई साहित्यकारों के इंटरव्यू कर लिये। अनिल त्यागी ने किसानों और खेती पर कई समाचार किये। पर सबसे बड़ा काम किया ओमकार चौधरी ने। ये वो समय था, जब कई साल कम वर्षा के कारण फसलें हल्की रह गयी थीं। गंगा-यमुना के दोआबे के कारण मेरठ और उसके आप-पास के जिलों में अकाल भले ही नहीं पड़ा था, पर किसानों की हालत खस्ता थी। फसलें अच्छी नहीं हुई थीं। ऐसे में किसानों के लिए ट्यूबवैल के बिजली के बिल भरना कठिन हो गया था। सरकार पर बिल माफी का दबाव बढ़ रहा था। पर सरकार नहीं मान रही थी। मुजफ्फरनगर के एक गांव में बिल अदा न करने वाले किसानों के कनेक्शन काटने के लिए बिजली विभाग के कर्मचारी पुलिस लेकर गये। उन्हें ग्रामीणों ने बंधक बना लिया।

… बस, वहीं से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में महेन्द्र सिंह टिकैत के किसान आंदोलन की शुरुआत हो गयी। नौनिहाल ने कुछ ही दिन पहले मंगलजी को सुझाया था कि आसपास के क्षेत्रों में बड़ी घटनाओं की कवरेज के लिए मेरठ से रिपोर्टर भेजे जायें। वह बात उनके ध्यान में थी ही। अभय गुप्त चीफ रिपोर्टर थे। इस आंदोलन को वे कवर करना चाहते थे। ओमकार चौधरी ने अपनी ग्रामीण पृष्ठ भूमि का हवाला देकर यह इस कवरेज का पहल की। मेरठ-सरधना रोड पर स्थित दबथुवा गांव के ओमकार के टिकैत और जाट खापों के अन्य नेताओं से अच्छे संबंध थे। उसी को मंगलजी ने यह जिम्मेदारी सौंपी। जब तक यह आंदोलन चला, ओमकार इसके लिए ‘जागरण’ का घुमंतू संवाददाता रहा। आंदोलन इतना बड़ा था कि उसे कवर करने के लिए न सिर्फ दिल्ली के अखबारों के रिपोर्टर आये, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया की भी इस पर नजर थी। दिल्ली से बीबीसी के मार्क टुली भी आकर इसे कवर कर रहे थे।

हर महीने की 17 तारीख को टिकैत के गांव सिसौली में भारतीय किसान यूनियन की मीटिंग होती थी। ओमकार और फोटोग्राफर गजेन्द्र सिंह उस मीटिंग में जाते। पूरी मीटिंग कवर करते। उस कवरेज से ग्रामीण क्षेत्रों में जागरण का प्रसार काफी बढ़ गया। यहां तक कि जब दिल्ली के अखबारों के संवाददाता टिकैत से मिलते, तो वे उनसे कहते कि जागरण जैसी ही खबर छापना। वैसे टिकैत मनमौजी किस्म के किसान नेता रहे हैं। किसी से भी न डरने वाले, किसी के भी सामने न झुकने वाले। ओमकार ने उन्हें इतना कवर किया कि वह टिकैत और किसान आंदोलन का विशेषज्ञ बन गया। यहां तक कि दूसरे अखबारों के संवाददाता उसी से अंदरूनी खबरें लेने की ताक में रहते।

लेकिन इसके बावजूद जागरण प्रशासन ने इस खास कवरेज के लिए ओमकार और गजेन्द्र को कुछ भी सुविधा नहीं दी। उन्हें रोडवेज की बस से आना-जाना होता। फिर डग्गामार बस से सिसौली जाते। इसी तरह वापसी होती। लौटकर ओमकार खबर लिखने में जुट जाता और गजेन्द्र डार्क रूम में जाकर फोटो डेवलप करने में। ओमकार की खबर लिखने की गति बहुत तेज थी। खबर के नोट्स लेने का उसका तरीका भी नायाब था। उसके पास हमेशा छोटी सी नोटबुक होती। जेबी डायरी। उसके हर पेज पर बहुत बारीक अक्षरों में वह तेजी से नोट्स लेता। उससे भी तेजी से उन नोट्स के आधार पर खबर लिखता। ऐसी पचासों जेबी डायरियां थीं उसके पास। एक भर जाती, तो उसे अलमारी में रखकर दूसरी इस्तेमाल करता। वही डायरियां उसके रेफरेंस के रूप में काम आतीं। याददाश्त इतनी तेज कि कोई पुरानी घटना देखने के लिए एकदम सही डायरी निकाल लेता।

अब ओमकार डायरियां तेजी से भरने लगीं। किसान आंदोलन की रिपोर्टिंग उसने जिस जोश और संजीदगी से की, वह एक मिसाल बन गयी। किसान आंदोलन न्यूज कवरेज की एक ‘बीट’ बन गया। अमर उजाला ने कई रिपोर्टरों से यह काम कराया। लेकिन जागरण का एक ही रिपोर्टर था- ओमकार चौधरी। दिल्ली के अखबारों के रिपोर्टर भी आकर आंदोलन कवर करने लगे। बीबीसी तक पर इसकी खबर आने लगी।

ओमकार की ये खबरें रोज छपती थीं। संपादकीय पेज पर लेख भी छपे। फिर दिल्ली के मीडिया से ओमकार के पास मांग आने लगी। ओमकार अब किसान आंदोलन विशेषज्ञ बन गया। दिल्ली के पत्रकार ओमकार से टिकैत के अगले रुख के बारे में पूछने लगे। दिल्ली के अखबार उससे अपने यहां लिखने को कहने लगे। वह अखबारों में तो लिख नहीं सकता था, पर दिल्ली प्रेस की पत्रिका ‘अभय भारती’ में लिखने लगा। कई कवर स्टोरी लिखीं। परेशनाथ खुद उससे कहकर ये स्टोरी लिखवाते थे।

मंगलजी खुश थे। उनका प्रयोग सफल रहा था। जागरण का सर्कुलेशन बढ़ गया। खासकर ग्रामीण इलाकों में। जागरण में छपी खबरों को किसान आंदोलन की सही और सच्ची खबरें माना जाने लगा। मंगलजी ने इसके नौनिहाल का दिल से धन्यवाद दिया। यह सोच दरअसल नौनिहाल की ही थी। वे हमेशा समय से आगे सोचते थे। अपने वक्त से दो-तीन दशक आगे थे। जो वे तब सोचा करते थे, वह आज भी नया लगता है। आज की पत्रकारिता के सकारात्मक पहलुओं में वे जितने फिट बैठते, नकारात्मक पहलुओं में उतने ही अनफिट!

भुवेंद्र त्‍यागी

भुवेंद्र त्‍यागी

लेखक भुवेन्द्र त्यागी को नौनिहाल का शिष्य होने का गर्व है. वे नवभारत टाइम्स, मुम्बई में चीफ सब एडिटर पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क  [email protected]  के जरिए किया जा सकता है.

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