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दुख-दर्द

न्‍याय के लिए पत्रकारों को करना पड़ा अधिकारियों के भ्रष्‍टतंत्र से संघर्ष

गाजीपुर में 9 मार्च को हुए छायाकार पर हमले की घटना के सूत्रधार आबकारी निरीक्षक राजेश यादव व कान्सटेबल विध्यांचल राय को बचाने के लिए अधिकारी और माफियाओं ने जो एकजुटता दिखाई, उससे समाज में जीने वाले सच्चे और ईमानदार लोग के लिए कड़ी चुनौती साबित हुई। दबाव और पैसे की लालच में आकर पुलिस और अधिकारी किस हद तक गिर सकते हैं इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। सभ्य समाज में जीने वाले लोग अब इस बात पर सोचने को मजबूर हो गये है कि आखिर हमारा क्या होगा।

गाजीपुर में 9 मार्च को हुए छायाकार पर हमले की घटना के सूत्रधार आबकारी निरीक्षक राजेश यादव व कान्सटेबल विध्यांचल राय को बचाने के लिए अधिकारी और माफियाओं ने जो एकजुटता दिखाई, उससे समाज में जीने वाले सच्चे और ईमानदार लोग के लिए कड़ी चुनौती साबित हुई। दबाव और पैसे की लालच में आकर पुलिस और अधिकारी किस हद तक गिर सकते हैं इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। सभ्य समाज में जीने वाले लोग अब इस बात पर सोचने को मजबूर हो गये है कि आखिर हमारा क्या होगा।

इस यथार्थ को मैं इसलिए सामने लाना चाहता हूं कि हमारे समाज में रहने वाले लोग, न्याय की उम्मीद करने वाले लोग व्यवस्था पर अपनी आस्था लगाकर न बैठें कि न्याय उन्हें आसानी से मिल जायेगा। उनके साथ कितनी बार मानसिक उत्‍पीड़न किया जाता होगा इसका अंदाजा प्रेस फोटोग्राफर गुलाब राय पर हुए हमले के मामले से आसानी से लगाया जा सकता है।

वाकया यह रहा कि निर्धारित मूल्‍य से 5 रूपये अधिक पर बिक रहे शराब की शिकायत करने डिप्टी सीएमओ प्रशासन डा. आरके मेहरा आबकारी विभाग पहुंचे। वहां उन्‍होंने आबाकरी निरीक्षक राजेश यादव से इसकी शिकायत की। इसी कहासुनी में डा. साहब के कुछ शब्द निरीक्षक व वहां बैठे दबंग ठेकेदारों को नागवार गुजरी। जिस पर तैस में आकर ठेकेदार व विभाग के कुछ कर्मचारी डा. साहब पर टूट पड़े। इसी बीच शोर सुनकर दैनिक समाचार पत्र ‘आज’ के छायाकार गुलाब राय (उम्र 50 वर्ष), जो समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन कवर करने के लिए मुस्‍तैद थे, आबकारी विभाग पहुंच गए। उन्‍होंने अपना कैमरा निकाला और मारपीट की घटना को कैद करने लगे। इसी बीच निरीक्षक की नजर इन पर पड़ी और सारे लोग डा. को छोड़ एकहरे बदन के छायाकार पर टूट पड़े, जिससे छायाकार घायल होकर अचेतावस्था में गिर गये। उनके दो डिजीटल कैमरे व मोबाइल छीन लिए गए।

इसकी जानकारी होने पर अन्य पत्रकार भी मौके पर पहुंच गए। उन्हें भी आबकारी निरीक्षक ने गाली दिया। उसके कहने पर वहां मौजूद ठेकेदार और कर्मचारी दूसरे पत्रकारों के भी कैमरे व माइक छीनने की कोशिश करने लगे। इतने में कोतवाली पुलिस मौके पर पहुंची, पहले डा. को पीटा और उसके बाद उन्‍हें तथा आबकारी विभाग के कांस्‍टेबल विध्याचल राय को साथ लेकर जाने लगी। इस पर आबकारी निरीक्षक भड़क गया। उसने कोतवाल को भी अपने औकात में रहते हुए कांस्‍टेबल छोड़ने की बात कही। इसके बाद कोतवाल आबकारी निरीक्षक को भी बैठाकर कोतवाली लायी। पूरी घटना की जानकारी जब सभी पत्रकार बन्धुओं को हुई तो वे भी कोतवाली पहुंच गए। आबकारी निरीक्षक समेत सभी दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग पर अड़ गए।

दूसरी तरफ पीसीएस कैडर के सभी अधिकारी आबकारी निरीक्षक को बचाने के लिए उसके पक्ष में लामबन्द होकर समझौते की पैरवी में आने लगे। इसके बाद पुलिस द्वारा मुकदमा दर्ज करने में हीलाहवाली का सिलसिला जारी हो गया। कोतवाली में पत्रकारों द्वारा पुलिस प्रशासन के खिलाफ नारे लगने लगे। आबकारी निरीक्षक के लिए बिसलेरी की बोतल व चाय की व्यवस्था भी करायी जाने लगी। अपर पुलिस अधीक्षक के साथ अन्य कई अधिकारी भी समझौते पर जोर देने लगे। डा. मेहरा भी दबाव के चलते अपने खिलाफ हुए सभी कारनामों को भूल गये और मुख्य चिकित्साधिकारी डा. प्रदीप सिंह, मुख्य चिकित्साधीक्षक डा. बीजेपी सिन्हा भी आबकारी निरीक्षक के विरूद्व कोई कार्यवाही करने का साहस नही जुटा पाये। दबाव में काम कर रही पुलिस ने गुलाब राय के तहरीर पर पहले आईपीसी की धारा 323, 392 जैसे गैरजमानती में मुकदमा पंजीकृत किया।

एफआईआर दर्ज होने के बाद आबकारी अमला व समाज के दलाली संगठनों ने पत्रकारों व पुलिस पर जोर आजमाइश शुरू कर दी। पत्रकारों की एकजुटता पर तो उनका कोई जोर नहीं चला, परन्तु पुलिस प्रशासन को अपने धनबल एवं एप्रोच बल से काबू कर लिया और एफआईआर की मूल धारा पुलिस अधीक्षक व आईजी के हस्तक्षेप से धारा 392 को 356 में तब्दील कर दी गयी। जिससे माननीय न्यायालय में निरीक्षक व कांस्‍टेबल की जमानत हो सके। जनपद के सभी बड़े क्रिमनल केस के अधिवक्ताओं को पत्रकारों की पैरवी करने से मना कर दिया गया। धनबल व बाहुबल वाले शराब के सभी बड़े ठेकेदार, आबकारी अधिकारी, पुलिस व अन्य अधिकारी अपनी अपनी आन-बान-शान मान कर तानाशाह व निरंकुश निरीक्षक व कर्मचारी के बचाओ अभियान में कूद पड़े। जो समाज में एक चर्चा का विषय बन गयी और पत्रकारों के लिए बड़ी चुनौती खड़ी हो गयी।

इसके बावजूद दोनों की जमानत खारिज कराने के लिए पत्रकार एवं अधिवक्ता हृदय नरायण सिंह ने इनकी सारी बातें, कारनामें मुख्य दण्डाधिकारी के समक्ष खोल कर रख दीं। पत्रकारों की एकजुटता देख बचाव पक्ष के वकीलों के पसीने छूटने लगे। न्यायिक अधिकारियों को भी परीक्षा के दौर से गुजनता पड़ा। इस‍के लिए उन्‍होंने कई न्यायिक अधिकारियों से अपने निर्वतन कक्ष में राय मशवरा किया। इसके पश्चात आईपीसी की धारा 392 जोड़कर रात 8 बजे केस की अगली तारीख 10 मार्च डालकर अभियुक्त आबकारी निरीक्षक व कांस्‍टेबल को जेल भेजा गया। आज के इस सामाजिक न्यायहित की बात करने वाले इन अधिकारियों के चेहरे अन्दर से कितने घिनौने हैं, इसका अन्दाजा समाज के सभ्य नागरिकों को नहीं होता है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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