नई दिल्ली. पत्रकार और सांसद एचके दुआ ने कहा है कि खबरों की साख बनाचे के लिए लोग प्रतिरोध का रास्ता अपनाएं. पत्रकारिता और लोकतंत्र बचाने के लिए लंबी लड़ाई लड़नी होगी. पत्रकार प्रभाष जोशी ने जिंदगी के आखिरी दिनों में इसकी शुरुआत कर दी थी. वे गाजियाबाद के वसुंधरा में स्थित मेवाड़ संस्थान में आयोजित प्रभाष जोशी की पहली बरसी पर बोल रहे थे. यह आयोजन प्रभाष परंपरा न्यास और मेवाड़ संस्थान ने किया.
मंचस्थ लोगों ने प्रभाष जोशी की तस्वीर पर फूल चढ़ाए और दीप प्रज्ज्वलित किए. इस मौके पर उनकी पत्नी उषा जोशी भी मौजूद थीं. दुआ ने प्रभाष जोशी के साथ जुड़े अपने अंतरंग संबंधों के प्रसंग सुनाए. उन्होंने कहा कि प्रभाष जोशी को हमेशा इसलिए याद किया जायेगा क्योंकि वे हर समय किसी बड़े मिशन पर लगे होते थे और उसे सफल बना देते थे. वे पत्रकारिता के ऐसे शिखर थे जो गांधी और विनोबा से प्रेरित थे. उन्हें भारतीय संस्कृति की गहरी समझ थी. वे देश व समाज से जुड़े बड़े सवालों से भी जूझते थे.
दुआ ने कहा कि आजादी के बाद की दो घटनाओं का उन पर खासा असर रहा. पहली घटना थी आपातकाल की घोषणा और दूसरा बाबरी मस्जिद का गिरना. पहली ने लोकतंत्र को हानि पहुंचाई तो दूसरे ने समाज को बांटा. इन दोनों प्रवृत्तियों के खिलाफ प्रभाष जोशी ने अपनी कलम को तलवार बनाया. इस मौके पर काली खबरों की कहानी का लोकार्पण दुआ ने किया. इसका संपादन राम बहादुर राय ने किया है. इसमें प्रेस परिषद की वह रिपोर्ट भी है, जो दबा दी गई.
इसी मौके पर एक और पुस्तक प्रभाष जोशी की जीवनी का लोकार्पण डा. नामवर सिंह ने किया. इसके लेखक संत समीर हैं. आयोजन की अध्यक्षता डा. नामवर सिंह ने की. उन्होंने अपील की कि पत्रकार प्रभाष जोशी की तरह निर्भीक बनें. वे हमारे पुरखे हो गए हैं. हम उन्हें सिर्फ स्मरण ही नहीं करें बल्कि उनके नाम का दीपक अपने काम से जलाएं, तभी हिन्दुस्तान के गरीबों की लड़ाई सफलता की मंजिल पा सकती है.
लोकार्पण के बाद प्रभाष जोशी को याद करने वालों में प्रणंजय गुहा ठाकुरता ने चिंता जताई कि आज खबर और विज्ञापन में फर्क मिट जाने से पत्रकारिता को गंभीर खतरा हो गया है. श्रवण गर्ग ने कहा कि फिर भी पत्रकारिता पर हमें भरोसा करना चाहिए. हालांकि बहुत कुछ गलत हो रहा है. साभार : जनसत्ता












manish
November 15, 2010 at 2:12 pm
yah kya paid news hai .
yashovardhan nayak tikamgarh.
November 17, 2010 at 3:59 am
बड़े अखबारों में आजकल एक चलन चल गया है .हर जिले या बड़े शहर की गतिविधिया दो अथवा चार रंगीन पेजों में अलग से छपती है .इन्हें कलेक्ट करने का कम उस जिले के ब्यूरो चीफ तथा उनके सहयोगी करते है ,इन्ही पन्नो पर प्रति माह लाखो के विज्ञापन छपते है.ब्यूरो-साहब की सबसे बड़ी योग्यता यही होती है ,कि वे अधिकतम कितना विज्ञापन समेटते है.धीरे-धीरे ब्यूरो “दलाल” सिस्टम का हिस्सा बन जाता है .उसका काम कलेक्टर की जी-हुजूरी कर विज्ञापन की जुगाड़ करना रह जाता है , इसका समाधान यह हो सकता है,कि दस लाख रूपये तक कि स्वदेशी-तकनीक वाली कलर-आफसेट मशीने विकसित की जावे और उन्हें आसन किश्तों पर पत्रकारों को उपलब्ध कराया जावे ,ताकि पत्रकार मालिको की गुलामी से मुक्त होकर स्थानीय स्तर पर अख़बार छाप सकें .
dhanish sharma
November 17, 2010 at 6:04 am
kisi na to socha hai.