मैंने खुले शब्दों में गंगेश मिश्र पर उंगली उठाई थी

व्यालोक
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: व्‍यालोक बनने की पूर्व शर्त है शरीर में एक अदद रीढ़ होना : बर्बाद गुलिस्तां करने को बस….. : तो आखिर अभिषेक श्रीवास्तव का भी भास्कर से मोहभंग हो ही गया। वजह, एक बार फिर से वही…। भास्कर दरअसल एक ऐसा संस्थान बन चुका है, जहां यथास्थितिवाद को तो सराहा जा सकता है, लेकिन प्रगतिशीलता, नई सोच और आपकी गत्यात्मकता को नहीं। भास्कर के दिल्ली कार्यालय में हॉट सीट पर ऐसे बुजुर्ग विराजे हैं, जो किसी भी तरह अपनी नौकरी बचाने की ही जुगत में लगे हैं।

खैर, यह उनका अधिकार है और उस पर बात करना लाजिमी नहीं। अभी, ठीक दो महीने पहले यानी 12 दिसंबर को मैंने दैनिक भास्‍कर से इस्तीफा दिया था। अपने इस्तीफे में मैंने श्री श्रवण गर्ग को ससम्मान अपने नौकरी  छोड़ने की वजह बताई थी। मैं गलत नहीं, तो वही स्थितियां और व्यक्ति अभिषेक की रुखसती के वायस बने हैं (हालांकि अभिषेक ने अभी औपचारिक विदा नहीं ली है)। मैंने खुले शब्दों में गंगेश मिश्र पर उंगली उठाई थी, और अब भी उस पर कायम हूं। उनकी संकीर्ण सोच, जातिवाद और क्षेत्रीयतावाद किसी भी नौजवान पत्रकार के लिए स्थितियां  कठिन कर देंगे। वह अपनी एक टीम  बनाते हैं, जो मैथिलीभाषी हो, उनके इलाके का हो और ब्राह्मण हो तो क्या कहना। जो व्यक्ति  किसी की गलती यह कहकर छिपाने का निर्देश देता हो कि अरे  यार, ब्राह्मण का कल्याण होने दो- या फिर, अपने ही यहां का है, बढ़िया हो गया कि उसकी नौकरी लग गई, उसकी सोच का आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं।

भास्कर में मेरी नियुक्ति के पीछे भी वह अपना हाथ बताते हैं- हालांकि सच्चाई ऐसी है नहीं। हां, इसके पहले चौथी दुनिया में उनकी नियुक्ति के पीछे मैं जरूर था और द संडे इंडियन में भी वह मेरे साथ काम कर चुके थे। भास्कर में मेरी नियुक्ति और वेतन में भी उन्होंने घालमेल किया, खैर  वह अवांतर प्रसंग है। सवाल यह मौजूं हैं कि आज मैं क्यों यह सब कह रहा हूं। इसलिए कि मेरे मित्र अभिषेक को शायद आज मेरी पीड़ा समझ  में आ सके। श्री गंगेश मिश्र वह कप्तान हैं, जो भास्कर को डूबता जहाज बनाकर ही मानेंगे। मैं, उसके बाद अश्विनी श्रीवास्‍तव का आना और जाना (एक महीने के भीतर) और अब अभिषेक…. क्या इससे अधिक प्रमाण की जरूरत है। बीच  में क्षेपक के तौर पर अमिताभ पाराशर की नियुक्ति को भी लिया जा सकता है, जिसमें गंगेश मिश्र की बड़ी भूमिका है। मैथिल भी और ब्राह्मण भी।

मैं अपनी बात  जानता हूं और वह यह कि मेरे काम को लेकर गंगेश जी या किसी ने आज तक कुछ नहीं कहा। हां, गंगेश जी ने पग-पग मुझे अपमानित जरूर किया, क्योंकि  मैंने उनकी ठकुरसुहाती नहीं की। उन्होंने मुझसे प्रत्यक्ष  कभी बात नहीं की, पीठ पीछे निंदा जरूर की। मेरे कनिष्ठों तक से, उनसे मुझे खबरें तक दिलवाई और आज भी उनके ऊपर  मेरा भूत इस कदर हावी है कि कार्यालय में मेरी निंदा  से नहीं चूकते।

मैं आज भी अपनी चुप्पी नहीं तोड़ता, लेकिन अभिषेक के जीवन में भास्‍कर अध्‍याय का अंत और गंगेश जी का मुझको लेकर बेवजह भयाक्रांत होना (पीठ पीछे मेरी निंदा करना) ही वह वजह बने, कि बात करनी पड़ी। आज, जब गंगेश  मिश्र अपनी ही साजिशों  के चलते वीरान हो चुके भास्‍कर  के जनरल डेस्‍क पर शाम सात  बजे तक अकेले सब-एडिटरों  की बाट जोहते रहते हैं, तब भी मेरा प्रेत उनका पीछा नहीं छोड़ता और तनाव में उनके मुंह से निकल ही जाता है, ‘बहुत टेंशन है, लगता है कल व्‍यालोक बनना पड़ेगा।’ (यह पिछले शुक्रवार की बात है, शनिवार को उनका ऑफ होता है और छुट्टी के दिन  वह व्‍यालोक बनना चाहते हैं)।

व्‍यालोक बनने का मतलब क्‍या है, यह तो वे ही जानें लेकिन इतना ही आसान अगर यह काम होता तो उन्‍होंने जिस अभिषेक श्रीवास्‍तव  के खिलाफ पहले ही दिन साजिश  कर दी थी, उसी से अपने लड़के  के एडमिशन के लिए चिरौरी करते नजर नहीं आते। इसका तो गवाह मैं खुद हूं। खैर, व्‍यालोक बनने की पूर्व शर्त है शरीर में एक अदद रीढ़ होना। अफसोस, कि भास्‍कर का दिल्‍ली दफ्तर ऐसे रीढविहीनों से भरा पड़ा है।  अंत में, केवल इतना ही कि भास्कर के जहाज के खेवनहार ही जानें उनकी माया।

व्यालोक पाठक

स्वतंत्र पत्रकार

दिल्ली

किसी को नंबर वन से हटाने के लि‍ए काम नहीं कर रहे : श्रवण गर्ग

श्रवण गर्ग
श्रवण गर्ग
हिंदी पत्रका‍रिता जगत में श्रवण गर्ग चर्चित और सम्मानित नाम हैं. लंबे समय से दैनिक भास्कर के संपादक और समूह संपादक के रूप में कार्यरत हैं. पत्रकारिता में लगभग 40 सालों से सक्रि‍य श्रवण गर्ग ने जीवन और पत्रकारिता में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं. कुछ महीनों पहले भडास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के साथ विभिन्न मुद्दों पर उन्होंने बेबाक बातचीत की. पेश है बातचीत के अंश…

-श्रवण जी, आप अपने बारे में बताएं. जन्म कहां हुआ. पढ़ाई लिखाई कहां व कैसे हुई.

–14 मई 1947 को इंदौर में मेरा जन्म हुआ. उस समय मेरे परिवार के लोग इंदौर में आकर बस गए थे. मेरा परिवार मूलरूप से राजस्थान का रहने वाला था. संघर्ष करने वाले लोगों का परिवार था. मेरे पिता जी ने भी राजस्थान से आकर इंदौर में काफी समय तक संघर्ष किया. घर से बिना कुछ लिए आए थे. इंदौर में हमारे बगल में वेद प्रताप वैदिक रहते थे. हमारे और उनके घर के बीच में मात्र एक ही दीवार थी. हमारे कच्चे मकान थे. बहुत संघर्ष था जीवन में. साधारण परिवार से निकला हूं. उस समय बिजली नहीं थी घर में. मेरे पिताजी व्यापार करते थे. मेरी शुरुआती पढ़ाई लिखाई इंदौर में ही हुई. पहले मैंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियर में डिप्लोमा किया. बाद में ग्रेजुएशन किया. इसके बाद मैं १९७१ में दिल्ली आ गया और भारतीय विद्या भवन से पत्रकारिता की पढ़ाई की. यहां अंग्रेजी पत्रकारिता का कोर्स किया. दिल्ली में दस वर्ष कार्य करने के बाद इंदौर चला गया नई दुनिया में. फिर मेरा सेलेक्शन इंग्लैंड में थामसन फाउंडेशन के कोर्स के लिए हो गया. यह तीन महीने का कोर्स था. पूरे हिन्दुस्तान से केवल दो लोगों का सेलेक्शन हुआ था.

-इसका मतलब आप बीच में ही पत्रकारिता छोड़ कर चले गए?

–नहीं, नहीं! वहां मैं पत्रकार की हैसियत से ही गया था. वहां पर लगभग तीन महीने रहा. दिल्ली में रहते हुए 197२ में प्रभाष जी ने मैंने और अनुपम मिश्र ने मिलकर एक किताब लिखी. जो चंबल घाटी के डाकुओं के जेपी के समक्ष समर्पण पर थी. किताब का शीर्षक था- ‘चंबल की बंदूकें गांधी के चरणों में.’ उस समय यह किताब बहुत चर्चित रही थी. इसके बाद 1974 में मैं पटना चला गया. वहां जयप्रकाश जी के साथ बिहार मूवमेंट में साल भर रहा. वहां भी मैं पत्रकार की हैसियत से ही गया था. मुझे बिहार मूवमेंट के कवरेज के लिए दिल्ली से भेजा गया था, पर जेपी ने वही रोक लिया. फिर मैंने जो किताब लिखी, वो ही एक अधिकृत पुस्तक है बिहार आंदोलन पर. पुस्तक का नाम है- ‘बिहार आंदोलन एक सिंहावलोकन.’ इसके बाद 74 के अंत में मैं दिल्ली आ गया. फिर प्रभाष जी के साथ जुड़ गया. उस समय हमलोग ‘प्रजानीति’ अखबार निकालते थे इंडियन एक्सप्रेस से. उसमें प्रभाष जी, अनुपम, उदयन शर्मा, मंगलेश डबराल और बहुत सारे लोग थे. इमरजेंसी आई तो प्रजानीति बंद हो गया. 1976 में ‘प्रजानीति’ को ‘आसपास’ में कनवर्ट कर दिया गया. इसमें फिल्म और साहित्य को प्रमुखता दी गई. कुछ समय बाद ‘आसपास’ भी बंद हो गया. इसके बाद 1976  में ही मैं अंग्रेजी पत्रकारिता में चला गया और इंडियन एक्सप्रेस के अंग्रेेजी दैनिक फाइनेंसियल एक्सप्रेस से जुड़ गया.

-आपने प्रभाष जी के अलावा किन-किन लोगों के साथ काम किया ?

–प्रभाष जी के साथ मैंने कई सालों तक काम किया है. भवानी प्रसाद मिश्र जी के साथ काम किया है. हिन्दी में जितने बड़े नाम हो सकते हैं, उन सबके साथ काम किया है. प्रभाष जी के साथ एक तो संबंध यह रहा कि वो भी इंदौर के थे और मैं भी इंदौर का था. हम लोग इंदौर से ही जुड़े रहे. 1962-63 से लिखना शुरू कर दिया था मैंने. मैं 1971 में दिल्ली में आकर प्रभाष जी के साथ जुड़ा. दिल्ली में राजघाट स्थित गांधी स्मारकनिधि पर मेरी मुलाकात प्रभाष जी से हुई. मैं, प्रभाष जी और अनुपम मिश्र तीनों साथ काम करते थे. जब डाकुओं के सरेण्डर का मामला हुआ, तब मैं चम्बल घाटी में चला गया. वहां तीन महीने तक मैं रहा.

-आपकी पढ़ाई-लिखाई बाइलिंग्वल थी ?

-बाइलिंग्वल तो हुई पर, बहुत मेहनत करनी पड़ी पत्रकारिता में बने रहने के लिए. हिन्दी-अंग्रेजी के अलावा जब गुजराती का दिव्य भास्कर लांच हुआ, तो गुजराती सीखने का मौका मिला. सीखने का काम चलता रहता है। अभी भी चल रहा है। मैं मानता हूं कि कभी भी सीखना बंद नहीं करना चाहिए.

-आपने पत्रकारिता में आंदोलन का दौर देखा है, आंदोलन कवर भी किया. आजकल आंदोलन का दौर नहीं है. समस्याएं छुपाई जाती हैं. इस पर आपको कैसा लगता है?

-देखिए, जब चीजें बदलती हैं तो वो टुकड़े-टुकड़े में नहीं बदलती हैं. ऐसा नहीं होता है कि कपड़े तो आप बहुत आधुनिक ढंग के पहन रहे हैं पर अंदर  बनियान वही पुराने स्टाइल का दर्जी का सिला हुआ है. आप हर एक चीज को बदलते हैं.  सिस्टम जब बदलता है, तो  सारी चीजें एक साथ बदलतीं हैं. पूरी पत्रकारिता बदल रही है. मुझे उससे कोई निराशा भी नहीं होती है. दुख क्यों व्यक्त करें. जिन लोगों ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी, वे लोग आजादी के बाद देश की हालत देखकर कहते हैं : क्या हम इसी के लिए आजादी की लड़ाई लड़े थे? मेरा ये मानना है कि हर चीज में अगर आप अच्छाई देखना शुरू कर दें तो उम्मीद कायम रहेगी. ये मानें कि सोलह पन्ने का, बीस पन्ने का, आठ पन्ने का या जो भी अखबार है, उनमें कुछ कोने तो ऐसे हैं जिसमें आप ईमानदारी से पत्रकारिता कर सकते हैं. पत्रकार जगत में, चाहे जितना लोग कहते हैं कि खराबी आ गई है, मैं खराबी नहीं देखता हूं. मैं अपने आस-पास हमेशा अच्छे पत्रकारों को टटोलने की कोशिश करता हूं. मैं ज्यादा से ज्यादा अच्छे पत्रकारों को ही सामने लाने की कोशिश करता हूं. गलती से जो खराब लोग आ गए हैं, उनको भी डांट-डपट कर या समझा कर अच्छा काम करवाया जा सकता है. आपने अभी बातचीत के दौरान कि कहा कि दिल्ली में दैनिक भास्कर अखबार अच्छा निकल रहा है. ये अखबार वही पत्रकार साथी निकाल रहे हैं, जहां कभी खराब अखबार निकलता था. ऐसा नहीं है कि मैंने पुराने लोगों को निकाल के फेंक दिया है और बाहर से पूरी नई खेप खरीदकर लाया हूं, ऐसा कुछ नहीं किया है. दो चार लोग नए आए होंगे जो छोडक़र गए होंगे उनके एवज में. पुराना वही स्टाफ है, हमारा बेसिक स्ट्रक्चर वही है. मेरे हिसाब से पत्रकारिता में जो कमी है वो ये है कि जब एक एडिटर कहीं जाता है या कोई पत्रकार सीनियर लेबल पर कहीं जाता है तो वो अपने साथ साथ पत्रकारों की पूरी खेप लेकर जाता है. ये ठेकेदार की मानसिकता होती है कि सारा कुछ मेरा होगा. मेरे हिसाब से यह सब चलता नहीं है. अगर आप अच्छे पत्रकार हैं तो आप पुराने लोगों से ही बढिय़ा काम करा सकते हैं.

-जीवन में सबसे ज्यादा सुख कब मिला, सबसे ज्यादा संतोष कब मिला?

–मैं जब विनोबा जी के मूवमेंट के लिए काम करता था और बिहार में घूमता था या देश के गांवों में घूमता था या जेपी के साथ जब मैं पूरे बिहार का दौरा करता था. वहां मैं जगह जगह लोगों को देखता था कि वे किस तरह लोकनायक के प्रति समर्पित हैं. जब मुझे लगता था कि मैं जेपी के साथ खड़ा हूं, जेपी के साथ गाड़ी में बैठा हूं या जेपी के साथ घूम रहा हूं या बिनोवा जी से बात कर रहा हूं. उस वक्त मुझे लगता था कि यह जिंदगी की सबसे बड़ी उपलब्धि है. महानायकों के साथ और कुछ ऐसे लोगों के साथ रहने का वो जो सुख था, वह सबसे बड़ा सुख था और ताकत भी. मुझे लगता है कि मैं अगर पत्रकारिता में ईमानदारी के साथ बना हुआ हूं या निष्पक्ष पत्रकारिता कर रहा हूं और पिछले चालीस-बयालीस सालों में भी अगर कोई दाग मुझ पर नहीं लगा है, मुझे संस्थान में इज्जत मिली है तो इसका बहुत बड़ा कारण उन लोगों का साथ रहा है.

-जीवन में कभी कुछ अवसाद के पल भी रहे होंगे, जब आप मानसिक रूप से परेशान हुए हों?

-बिल्कुल रहे हैं. अवसाद के बहुत सारे पल रहे हैं. मैं जब इंदौर में फ्री प्रेस में काम करता था. 83 में ज्वाइन किया. 86 तक काम किया. पता नहीं किस गलतफहमी के चलते मैनेजमेंट ने मेरा ट्रांसफर कर दिया. पनिशमेंट के तौर पर. उस वक्त मेरे बच्चे बहुत छोटे-छोटे थे. तनख्वाह भी बहुत कम मिलती थी. उस उसम लगता था कैसे करेंगे, कैसे जियेंगे. तुरंत अगले दिन भोपाल में एमपी क्रॉनिकल की नौकरी मिल गई. पत्नी और बच्चों को लेकर मैं भोपाल चला गया. फिर 1986 से 1989 तक एमपी क्रॉनिकल अखबार में काम किया. उसको बहुत अच्छा अखबार बना दिया हमने. 1989 में फिर फ्री प्रेस वाले पीछे पड़ गए कि आपको एडिटर बनकर आना पड़ेगा. उनके आग्रह को देखते हुए इस अखबार के साथ फिर जुड़ गया. इसके साथ मैंने 1991 तक काम किया. फ्री प्रेस के लोगों ने एक बार फिर कहा कि साहब हमारी आपकी बनती नहीं है, आप हमारा अखबार छोड़ दीजिए. मैंने तत्काल यह अखबार छोड़ दिया. इसके बाद मैं काफी डिप्रेशन में भी रहा. ये जो मौका आता है जिंदगी में कि आप एक नौकरी में हैं और वो छूट गई. आप दूसरी नौकरी ढूंढ रहे हैं. ये एक मुश्किल दौर होता है. ऐसे में एक व्यक्ति के तौर पर और एक पत्रकार के तौर पर आप किस तरह का व्यवहार करते हैं, ये आपकी सबसे बड़ी पहचान है. नौकरी में रहते हुए आप तमाम तरह के नेगोसिएशन कर सकते हैं. पर नौकरी में ना रहते हुए या ट्रांजिशन पीरियड में थोड़ा मुश्किल होता है. ऐसे ट्रांजिशन पीरियड मेरी जिंदगी में कई बार आ चुके हैं.

-भास्कर में भी कभी ट्रांजिशन पीरियड आया, जब आप परेशान हुए हों?

–भास्कर में भी एक ट्रांजिशन फेज आया था, मैंने इस्तीफा दे दिया था. पर मैनेजमेंट ने रोका तो मैं रुक गया. मेरा मानना है कि हमलोगों को जिंदगी में हर चीज हर स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए. मैं इस चीज से बिल्कुल भी सहमत नहीं हूं कि पत्रकारिता खराब हो गई है या पत्रकार भ्रष्ट हो गए हैं. मुझे लगता है कि पत्रकारिता की लीडरशिप में कमी आई है, उस जमाने के जो लीडर हुआ करते थे, वो असल मायने में प्रेरणा के पुंज हुआ करते थे. उस तरह के लोग आजकल कम हो गए हैं. फिर भी, आज पत्रकारिता बढ़ रही है आगे, इसका विस्तार हो रहा है.

-आपने जीवन में कई उपलब्धियां हासिल की हैं, इनके पीछे किसकी प्रेरणा रही है. आप किसको अपना आदर्श मानते हैं?

–मेरे माता-पिता ही मेरी प्रेरणा हैं. उन लोगों ने मेरे लिए काफी ज्यादा संघर्ष किया. वो मुझे इंजीनियर बनाना चाहते थे पर मेरा मन नहीं लगा. सौ-डेढ़ सौ की नौकरी करने पत्रकारिता में चले आए इधर. कलकत्ता में अच्छी भली इंजीनियरिंग की सरकारी नौकरी मिली थी, उसे 67 में छोड़ कर इंदौर आ गया. अन्य लोग, जिनस मैं प्रभावित हुआ, उनको गिनाने के लिए काफी पीछे जाना पड़ेगा. काफी चीजों को खंगालना पड़ेगा. पर निश्चित रूप से जयप्रकाश नारायण एक व्यक्तित्व हैं, राजेन्द्र माथुर हैं. ये दो लोग स्पष्ट तौर पर मुझे काफी रोमांचित करते रहे हैं. मुझे महात्मा गांधी के जीवन से काफी प्रेरणा और ताकत मिलती है. जितना ज्यादा मैं उनके बारे में जानने की कोशिश करता हूं, हर बार उतना ही कोई ना कोई नया पक्ष उभर कर सामने आ जाता है. इसके अलावा डॉ. राम मनोहर लोहिया से मैं बहुत प्रभावित रहा. एक व्यक्तित्व हैं अटल बिहारी वाजपेयी. कोई ना कोई चीज इन लोगों की मुझे प्रभावित करती रही.

-एक समय था जब आप सरकारी नौकरी में थे. उस क्षण अचानक ऐसा क्या हुआ जो आप सरकारी नौकरी छोडकर आंदोलन में चले आए?

–ऐसा नहीं था सीधे आंदोलन में चला आया. कलकत्ता में मेरा मन नहीं लगता था. 1967 की बात है. उस समय मैं बीस साल का ही था. घर से दूर, मां-बाप से दूर रहने में दिक्कत होती थी, होम सिकनेस महसूस करता था. ऐसा लगता था घर के पास जो भी मिलेगा वही कर लेंगे. यह कोई आंदोलन के चलते नहीं था. मैं इसे कोई सैद्धान्तिक कवर नहीं देना चाहता. उस उम्र में तो ऐसा रहता भी नहीं है. अब तो ऐसे हो गया है कि हम कहीं भी जाने को तैयार रहते हैं.

-आपको कौन-कौन से अभिनेता-अभिनेत्री प्रभावित करते हैं?

–हां, बहुत फिल्में देखता था. देवानंद काफी प्रभावित करते थे. देवानंद की जो फिल्में उन दिनों आतीं थीं, वो बहुत अच्छी होती थीं. अभिनेत्रियों में नूतन बहुत पसंद थी. परफॉर्मेंस और करेक्टर के साथ इन्वॉल्वमेंट में ये दोनों बहुत अच्छे कलाकार थे. आम भारतीयों के प्रतिनिधि थे ये दोनों लोग.

-जीवन की पहली फिल्म आपने कैसे देखी, घरवालों की सहमति से या चोरी से?

–पहली फिल्म तो चोरी छिपे देखी थी. कई फिल्में चोरी-छिपे देखी हैं. घर वाले बहुत सीधे होते हैं. वो कई सारे छोटे-मोटे अपराधों को छुपा लेते हैं. घरवालों के न होने का बहुत बड़ा अभाव इसलिए है कि आपकी गल्तियों को एक स्थिति के बाद छुपाने वाला कोई नहीं बचता है, उनको ढंकने वाला कोई नहीं बचता है. सब घर वालों को याद करते हैं.

-आप जिस प्रोफेशन में हैं, उसमें रहकर आप घरवालों को ज्यादा समय नहीं दे पाते होंगे ?

-हां, कई बार लगता भी है कि घरवालों को ज्यादा समय नहीं दिया. माता-पिता को समय ही नहीं दे पाया. यहां तक कि मैं बच्चों को भी टाइम नहीं दे पाया. रात को देर से घर जाता था, उस वक्त बच्चे सोए हुए मिलते थे. जब देर से उठता था तब तक बच्चे स्कूल जा चुके होते थे. मेरी मुलाकात तभी हो पाती थी, जब सुबह घर में आने के बाद उन्हें पढऩे के लिए उठाता था. अब तो बच्चे दूर चले गए मुझसे. बेटी ऑस्ट्रेलिया में है, बेटा चेन्नई में है. इस वक्त मेरे दोनों बच्चे अपने पैरों पर खड़े हैं और काफी सफल हैं. इस बात का मुझे काफी गर्व है.

-दोनों बच्चे किस प्रोफेशन में हैं?

-बेटा कुणाल इंजीनियर है. उसने पहले ही प्रयास में आईआईटी प्रवेश परीक्षा पास कर लिया. उसे अच्छी रैंक मिल गई. अच्छी ब्रांच भी मिल गई. अभी वो चेन्नई में बहुत अच्छी नौकरी कर रहा है. बेटी ऑस्ट्रेलिया में डॉक्टर है, ओरल सर्जन है. मेलबोर्न के अच्छे हॉस्पीटल में काम कर रही है. मेरे दामाद भी डॉक्टर हैं. कुछ लोगों का मानना है कि ईमानदारी से आप कुछ भी एचीव नहीं कर सकते. मेरा मानना है कि ईमानदारी से आप सब कुछ एचीव कर सकते हैं. एचीवमेंट के मायने सबके लिए अलग-अलग होते हैं.

-आपकी निगाह में आपकी कमियां क्या हैं?

-मेरे अंदर बहुत कमियां हैं. क्रोध करना अपने आप में बहुत बड़ी कमी है. किसी की गल्तियों पर बहुत गुस्सा आता है. कोई झूठ बोले तो बहुत गुस्सा आता है, गलत काम करे तो गुस्सा आता है. खाने पीने का कोई खास शौक नहीं, मैं शराब नहीं पीता. मांस-अंडा नहीं खाता. मेरे कोई खास खर्चे भी नही हैं. मुझे अच्छे कपड़े पहनने का और घूमने-फिरने का शौक जरूर है.

-आपके करियर के अलावा आपका कोई ऐसा सपना है या कोई ऐसी फैन्टसी जो पूरी न हो पाई हो?

–ऐसा लगता है कि जिन्दगी में बहुत कुछ अचीव करना था पर कर नहीं पाया. अभी भी बहुत कुछ अचीव करना बाकी है. मुझे लगता है कि जीवन में इतना लिखने के बावजूद कोई अच्छी किताब नहीं दे पाया, नहीं लिख पाया. इतना सोचता हूं पर पता नहीं लिखता क्यों नही हूं. बहुत सारे काम हैं जो मैं कर सकता था पर नहीं किए मैंने. कभी लगता है कि गांवों से कनेक्ट होना चाहिए, जैसे- जयप्रकाशजी करते थे. मैं कनेक्ट होता भी हूं हालांकि इसका तरीका थोड़ा बदल दिया है. जो लोग काम करते हैं, मैं उनको समय देता हूं. उनके बीच में जाकर बैठता हूं, उनकी चीजों को भास्कर में जगह देता हूं. उनको प्रमोट करता हूं और कोशिश करता हूं कि आर्थिक रूप से मदद करूं. कोशिश करता हूं ऐसे लोगों को लेखक और पत्रकार बनाऊं. अगर आप चाहें तो बहुत कुछ कर सकते हैं.

-इस समय की पत्रकारिता में कोई ऐसा नाम जो आपको लगता हो कि अच्छा काम कर रहे हैं?

–बहुत लोग बहुत अच्छा काम कर रहे हैं. छोटे-छोटे अखबारों में निश्चित रूप से बहुत लोग लगे हुए हैं और बहुत अच्छा काम कर रहे हैं. कई बार बहुत अच्छा लिखते भी हैं. ऐसे बहुत से पत्रकार मिलते हैं जो काफी कुछ करना चाहते हैं पर उन्हें मौके नहीं मिलते, उनको मौके की तलाश करनी पड़ती है. मुझे इस बात का बहुत दुख होता है कि मैं बहुत चीजें करने की स्थिति में नही हूं. मेरी कल्पना का एक आदर्श अखबार है. मैं वो निकालना चाहता हूं, पता नहीं वो कब निकलेगा. मुझे लगता है कि हिन्दी में एक बहुत अच्छा अखबार निकाला जा सकता है और बहुत सारे अच्छे पत्रकार उपस्थित हैं, जो मौकों की तलाश में हैं. उनको साथ में जोड़ा जा सकता है.

-जीवन में क्या कभी ऐसा मौका भी आया जब किसी ने आपसे विश्वासघात किया हो ?

–इसका लेखा-जोखा मैं रखना नहीं चाहता, लेकिन इन बातों का सबक मैंने ऐसे लिया कि इससे घबराकर आप लोगों की मदद करना मत छोडि़ए. ऐसा होता है कि कई बार आप लोगों की मदद करते हैं. आप उनको आगे बढाते हैं फिर आपको लगता है कि आपने तो गलत आदमी को आगे बढ़ा दिया है. इसमें कई लोगों का रिजल्यूशन होता है कि इस काम को बंद कर देना चाहिए जबकि मेरी धारणा यह होती है कि इस काम को कभी बंद नहीं करना चाहिए. मेरा मानना है कि एक्सीडेंट हो जाने के बाद भी यात्रा करना बंद नहीं की जाती है.

-आपने अपने रिटायरमेंट की कोई तारीख तय की है?

–रिटायरमेंट का मतलब अगर ये है कि काम बंद कर दिया जाए, पूरी तरह से घर पर बैठ जाएं तो मेरी जिंदगी में ऐसा कुछ आने वाला नहीं है. मैं हमेशा कुछ न कुछ करता ही रहूंगा. मैं जानता हूं कि कई सारी चीजें हैं, जो मैं करना चाहता हूं और मैं जानता हूं कि वो कैसे की जाती हैं. उसके लिए आप कहीं भी बैठ के कुछ भी कर सकते हैं. इसके लिए हमेशा किसी संस्थान का होना जरूरी नहीं है. मेरे कोई ज्यादा खर्चे नहीं हैं. मुझे याद है 1971 में जब मैं दिल्ली आया था तो मुझे काफी कम रुपये मिलते थे. तीन सौ बीस रुपए महीने का मिलता था. अनुपम और प्रभाष जी बगल में रहते थे. तब भी काम चल जाता था.

-कभी जीवन में ऐसी स्थितियां आईं कि आपको ऐसा लगा हो कि आपने एक गलत पेशा चुन लिया?

–ऐसा कभी कुछ नहीं सोचा. जीवन में बस एक ही मकसद था, कुछ अच्छा काम करना. मैं लंबे समय तक सर्वोदय आंदोलन में रहा. उस वक्त बस ऐसा लगता था मानो क्रांति आने ही वाली है. सब कुछ बदलने वाला है. दरअसल आपको अलग-अलग कालखंडों में अलग-अलग व्यक्ति बनने की इच्छा होती है.

-आजकल पेड न्यूज की बहुत बात हो रही है. पेड न्यूज को लेकर क्या कभी भास्कर में कोई डिबेट हुई?

-पेड न्यूज को लेकर सारे संस्थनों में डिबेट होती है. भास्कर में भी होती है. भास्कर में कहीं लोकल लेवल पर ऐसा हुआ होगा किसी ने कुछ किया हो, लेकिन बाद में जब यह मैनेजमेंट के संज्ञान में आया तो बंद हो गया. देखिए, ये बहुत बड़ा संस्थान है और कई कई जगहों पर अलग-अलग लोग अलग-अलग दबावों में कुछ न कुछ करते रहते हैं. हां, अगर कहीं गलत होने की सूचना मिलती है तो उसे प्रबंधन ठीक करता है.

-हिन्दी के कुछ मालिकों का कहना है कि अंग्रेजी के अखबारों में पेड न्यूज बहुत पहले से था, लेकिन उनके बारे में कोई चर्चा नहीं हो रही थी?

–मैं एक चीज बताऊं आपको, मुझे तो पता ही नहीं चलता कि खबरों में कितना पेड है, कितना अनपेड है. मैंने चर्चा की थी कि ये जो विदेशी समाचार एजेंसियों से हम खबर उठाते हैं, इसमें जो भी एजेंसी वाले भेजते हैं, हम छाप देते हैं. हमको कुछ पता ही नहीं है कि उनकी किस तरह के इरादे हैं और वो किस इन्टेंशन से खबर छाप भेज रहे हैं. किसी राजनेता को बदनाम करने के लिए या किसी देश को बदनाम करने के लिए या दो देशों के बीच युद्ध कराने के लिए. हम इसको कभी कंसीडर ही नहीं करते कि ये भी पेड न्यूज हो सकती है. पेड न्यूज को लेकर हमारी जो सोच का दायरा है उसको बहुत सीमित कर लिया गया है. यहां पर लोग संसद में तो सवाल पूछने तक के लिए पैसे देते हैं, पर हम कभी उस पर सवाल नहीं उठाते. वो जो दस लोगों का स्टिंग हुआ था, उनमें से एक आदमी फिर चुनकर आ गया संसद में. पेड न्यूज का संसार अलग किस्म का है. इसे आप केवल अखबारों तक ही सीमित न रखें. ये तो फिल्मों में, खबरों में है और कहा जा रहा है कि दूध में से पानी को अलग करके दिखाइये. ये एक सिस्टम है जिसमें विज्ञापन एजेंसिया हैं, बड़े-बड़े कॉरपोरेट आफिस हैं. अमेरिका में तो आप पायेंगे कि बड़े-बड़े फर्मों के मालिक अखबारों और रेडियो स्टेशनों के मालिक हैं. सिगरेट बनाने वाली कंपनियां, खिलौने बनाने वाली कंपनियां, शराब बनाने वाली कंपनियां इसमें शामिल हैं. ये लोग अखबार के पन्नों को स्पेस की तरह से देखते हैं, बेसिक डिफरेंस ये है.  पेड न्यूज का मुद्दा मेरे सामने कभी नहीं आया. मुझे कभी मेरे मालिकों ने इस बारे में कुछ कहा भी नहीं. सब कुछ के बावजूद अखबार अच्छा काम कर रहे हैं. मैं अपनी भूमिका से खुश हूं.

-आपने पत्रकारिता में अभी तक लगभग कितने लोगों को चांस दिया होगा?

–पत्रकारिता में बहुत लोगों को चांस दिया है. बहुत लोगों को जॉब दिया है. सबसे अच्छी बात तो ये है कि सारे लोग अभी तक मुझसे जुड़े हुए हैं.

-आपने लव मैरिज की थी या अरेंज मैरिज?

–मैं अपनी पत्नी के पिताजी के साथ इंदौर के निकट कस्तूरबा गांधी राष्ट्रीय ट्रस्ट में काम करता था. हमारी शादी होनी थी, सो हो गई. इसे प्रेम विवाह नहीं कहेंगे. प्रेम विवाह तो लडक़ा-लडक़ी तय करके करते हैं. बहुत ही साधारण तरीके से हम दोनों की शादी हो गई. मेरे पास तो उस जमाने में अतिरिक्त कपड़े भी नहीं होते थे. शादी के समय अपने कजिन ब्रदर से मांग कर कपड़े पहने थे. पैसे भी नहीं थे, शायद उधार लिए थे मैने कुछ. मेरी शादी 1976 में हुई थी, वो भी एक चर्चा का विषय है. ये एक इन्टरकास्ट मैरिज थी. उस जमाने में.

-यह अजीब-सी बात है, आपकी इन्टरकास्ट मैरिज थी पर लव मैरिज नहीं, ऐसा कैसे हुआ?

-ऐसी कोई बात नहीं है. मेरे ससुर और उनके परिवार के लोग गांधीवादी थे. उन्हें लगा कि लडक़ा अच्छा है, सो कर दी शादी.

-आजकल ऑनर किलिंग का दौर चल रहा है, आपको क्या लगता है, आपने उस जमाने में जो मुहिम चलाई थी, वो कमजोर थी?

–हमने तो बहुत मुहिम चलाई थी. डॉ. वैदिक के साथ दहेज विरोधी आंदोलन चलाया था हमने. हम दहेज मांगने वाले लोगों के खिलाफ धरने देते थे. उस समय हम पंद्रह-सोलह साल के थे. इस दिशा में तो बहुत काम किया है. हर जमाने में कुछ अच्छे लोग निकलते हैं, वो चीजों को ठीक कर देते हैं. आनर किलिंग के खिलाफ भी लोग सक्रिय हो गए हैं.

-ऐसी बातें सामने आ रही हैं कि भास्कर में श्रवण जी को साइड लाइन किया जा रहा है? उन्हें दिल्ली तक ही सीमित कर दिया गया है और अब नए लोगों को उभारा जा रहा है?

–बहुत अच्छी बात है. मुझे इस बारे में पता नहीं है. पर अगर ऐसा है तो मुझे कोई परेशानी नहीं है और होनी भी नहीं चाहिए. आप जीवन भर स्टेज पर क्यों रहना चाहते हैं? भूमिकाएं बदलते रहना चाहिए और नए लोगों को आप क्यों नहीं जिम्मेदारी देंगे? जब तक नए लोग जिम्मेदारी नहीं लेंगे तब तक मेरी इज्जत कैसे होगी. अब तक जिन कामों को मैं करता रहा हूं, उसे नए लोग करेंगे और अगर वो परफॉर्म करेंगे तब संस्थान को अच्छा लाभ होगा. तब एक कंपेटिटिव स्ट्रेटेजी बनेगी कि भाई साहब ये बेहतर काम कर रहे हैं. मेरा मूल्यांकन करने के लिए भी बहुत जरूरी है कि नए लोग आएं. साइडलाइन जैसी तो कोई चीज नहीं है. अगर आपमें अपने आप को कायम रखने की ताकत है तो तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी आप अपने आपको कायम रख सकते हैं. अगर संस्थान को मेरी जरूरत है ही नहीं, तो फिर दिल्ली में भी क्यों होनी चाहिए. दिल्ली में तो सबसे ज्यादा काम है. दिल्ली में तो मेरी जो प्रोफाइल है उसमें मैं संस्थान को रीप्रेजेंट कर रहा हूं.

-क्या आपको भगवान पर भरोसा है? आप आस्तिक हैं या नास्तिक?

–मुझे बहुत भरोसा है भगवान पर. मैं आस्तिक हूं. मैं बहुत आध्यात्मिक हूं. मैं असल में बहुत भावुक और सरल आदमी हूं. मैं कोई ऐसी पिक्चर, जिसमें किसी पर अत्याचार हो रहा हो, नहीं देख पाता हूं. वहां से भाग जाता हूं. पता नहीं क्यों ऐसा होता है. शायद ज्यादा संवेदनशीलता के कारण.

-इस वक्त ऐसा कोई नेता है जो आपको पसंद हो?

–राहुल गांधी. बेसिकली वो एक ईमानदार आदमी हैं. उनके चेहरे पर ईमानदारी दिखती है. वो आदमी बेईमान नजर नहीं आता है. उसने अपने इर्द-गिद जिन लोगों को खड़ा किया है वो भी काफी ईमानदार हैं. और वो जिन लोगों को प्रमोट कर रहे हंै, वो भी ईमानदार हैं. मेरे हिसाब से ये एक बड़ी चीज है कि हमारे इर्द-र्गिद ऐसे लोग जमा हो रहे हैं, जिनसे हम कुछ उम्मीद कर सकते हैं.

-आपको यह कब तक लगता है कि आप भास्कर के लिए जागरण का नंबर वन छीन लेंगे?

–हम किसी को नंबर वन से हटाने के लिए काम नहीं कर रहे हैं. हां, पर हम खुद को नंबर वन बनाने के लिए काम कर रहे हैं. हमारे समूह की लाइन है कि हम दूसरों की लकीर को छोटा नहीं करते हम अपनी लकीर को बड़ा करते हैं.

-ऑफिस और घर परिवार के अलावा ऐसी कौन सी चीज है, जिसे करके आपके अन्तरमन को सुख मिलता हो?

–मुझे संगीत का बहुत शौक है. वोकल, इंस्ट्रूमेंटल, गजल आदि सुनना अच्छा लगता है. अच्छी फिल्में देखने का शौक है. खाने का शौक है. पर्यटन और फोटोग्राफी का बहुत शौक है. बहुत फोटोग्राफी की है मैंने. जहां भी जाता हूं अपना कैमरा साथ लेकर जाता हूं. अभी अमेरिका गया था, वहां से एक कैमरा लेकर आया हूं. मैं फोटोग्राफ्स की एडिटिंग कर सकता हूं. अच्छे फोटोग्राफ्स को एप्रीशिएट भी करता हूं. मुझे कविताएं लिखने का भी बहुत शौक है.

-अपना लिखा हुआ कुछ सुनाना चाहेंगे?

–इससे पहले कि रवाना करो तुम हवाओं को ढूंढने के लिए मुझे,
मैं दबे पांव लौट कर समा जाना चाहता हूं
ओस से भीगी हुई तुम्हारी पलकों में,
पता है मुझे, गुलाब वहां रख छोड़ा है तुमने अभी भी,
खय्याम की रूबाइयों  के पन्नों में,
जिसे नजरें चुरा कर तुम्हारी,
रख दिया था,
तुम्हारे ही जूड़े से चुराकर मैंने.

-सर, आपको बहुत-बहुत धन्यवाद जो आपने इतना समय दिया.

-धन्यवाद यशवंतजी.

संजीव क्षितिज का दिल्ली हुआ ट्रांसफर

दैनिक भास्कर, भोपाल से सूचना है कि वहां कार्यरत संजीव क्षितिज का तबादला दिल्ली कर दिया गया है. संजीव भास्कर में पिछले तीन वर्षों से हैं. उनका पद कार्यकारी संपादक का है. परिवार के दिल्ली में होने के कारण संजीव क्षितिज भी दिल्ली आना चाहते थे.

सूत्रों के मुताबिक संजीव क्षितिज ने दिल्ली में दैनिक भास्कर कार्यालय में काम शुरू कर दिया है. वे दैनिक भास्कर के साप्ताहिक परिशिष्ट सबरंग का काम देखेंगे. वे समूह संपादक श्रवण गर्ग को रिपोर्ट करेंगे. संजीव क्षितिज भास्कर से पहले अमर उजाला समेत कई बड़े अखबारों व पत्रिकाओं में बड़े पदों पर काम कर चुके हैं.

पत्रकारिता और लोकतंत्र को बचाने के लिए लड़नी होगी लंबी लड़ाई : दुआ

नई दिल्‍ली. पत्रकार और सांसद एचके दुआ ने कहा है कि खबरों की साख बनाचे के लिए लोग प्रतिरोध का रास्‍ता अपनाएं. पत्रकारिता और लोकतंत्र बचाने के लिए लंबी लड़ाई लड़नी होगी. पत्रकार प्रभाष जोशी ने जिंदगी के आखिरी दिनों में इसकी शुरुआत कर दी थी. वे गाजियाबाद के वसुंधरा में स्थित मेवाड़ संस्‍थान में आयोजित प्रभाष जोशी की पहली बरसी पर बोल रहे थे. यह आयोजन प्रभाष परंपरा न्‍यास और मेवाड़ संस्‍थान ने किया.

मंचस्‍थ लोगों ने प्रभाष जोशी की तस्‍वीर पर फूल चढ़ाए और दीप प्रज्‍ज्‍वलित किए. इस मौके पर उनकी पत्‍नी उषा जोशी भी मौजूद थीं. दुआ ने प्रभाष जोशी के साथ जुड़े अपने अंतरंग संबंधों के प्रसंग सुनाए. उन्‍होंने कहा कि प्रभाष जोशी को हमेशा इसलिए याद किया जायेगा क्‍योंकि वे हर समय किसी बड़े मिशन पर लगे होते थे और उसे सफल बना देते थे. वे पत्रकारिता के ऐसे शिखर थे जो गांधी और विनोबा से प्रेरित थे. उन्‍हें भारतीय संस्‍कृति की गहरी समझ थी. वे देश व समाज से जुड़े बड़े सवालों से भी जूझते थे.

दुआ ने कहा कि आजादी के बाद की दो घटनाओं का उन पर खासा असर रहा. पहली घटना थी आपातकाल की घोषणा और दूसरा बाबरी मस्जिद का गिरना. पहली ने लोकतंत्र को हानि पहुंचाई तो दूसरे ने समाज को बांटा. इन दोनों प्रवृत्तियों के खिलाफ प्रभाष जोशी ने अपनी कलम को तलवार बनाया. इस मौके पर काली खबरों की कहानी का लोकार्पण दुआ ने किया. इसका संपादन राम बहादुर राय ने किया है. इसमें प्रेस परिषद की वह रिपोर्ट भी है, जो दबा दी गई.

इसी मौके पर एक और पुस्‍तक प्रभाष जोशी की जीवनी का लोकार्पण डा. नामवर सिंह ने किया. इसके लेखक संत समीर हैं. आयोजन की अध्‍यक्षता डा. नामवर सिंह ने की. उन्‍होंने अपील की कि पत्रकार प्रभाष जोशी की तरह निर्भीक बनें. वे हमारे पुरखे हो गए हैं. हम उन्‍हें सिर्फ स्‍मरण ही नहीं करें बल्कि उनके नाम का दीपक अपने काम से जलाएं, तभी हिन्‍दुस्‍तान के गरीबों की लड़ाई सफलता की मंजिल पा सकती है.

लोकार्पण के बाद प्रभाष जोशी को याद करने वालों में प्रणंजय गुहा ठाकुरता ने चिंता जताई कि आज खबर और विज्ञापन में फर्क मिट जाने से पत्रकारिता को गंभीर खतरा हो गया है. श्रवण गर्ग ने कहा कि फिर भी पत्रकारिता पर हमें भरोसा करना चाहिए. हालांकि बहुत कुछ गलत हो रहा है.   साभार : जनसत्‍ता

दुनिया का नंबर वन मीडिया हाउस बनेगा भास्कर!

: बहुत तेज स्पीड में दौड़ रहा भास्कर समूह : कई एडिशन लांच करने की घोषणा : भटिंडा संस्करण लांच : नागौर व इटारसी एडिशन लांच होंगे : कई लोगों ने ज्वाइन किया : पुरस्कारों,  सेमिनारों व बड़े आयोजनों के जरिए भास्कर ब्रांड को अति-लोकप्रिय बनाने की मुहिम : गैर-मीडिया उद्यमों में भी फहरा रहा है कमाई का झंडा : जागरण समेत सभी मीडिया हाउसों को मात देने का इरादा : दुनिया का नंबर वन मीडिया हाउस बनने का सपना :

भास्कर समूह वाकई दिन दुनी रात चौगुनी गति से आगे बढ़ रहा है. बाजार के खेल में पारंगत हो चुका यह समूह कंटेंट, मार्केटिंग, बिजनेस, सरकुलेशन, अन्य उद्यमों के क्षेत्र में रोज कुछ न कुछ नया व बड़ा काम कर रहा है. बानगी के तौर पर आपको यहां कुछ खबरें दी जा रही हैं जो बीते हफ्ते में घटित हुई और अगले हफ्तों में घटित होगी.

दैनिक भास्कर का पिछले दिनों भटिंडा एडिशन लांच हो गया. शारदा चेतन इस यूनिट को देख रहे हैं. अनिल भारद्वाज, पुरुषोत्तम, बरिंदर, अमन, दुर्गेश, अखिलेश, अंकुर, कुमार आदि लोग इस यूनिट के हिस्से हैं. कई लोगों का लुधियाना एडिशन से तबादला किया गया है. स्टेट हेड कमलेश सिंह की देखरेख में संस्करण की लांचिंग हुई. यह संस्करण फरीदपुर, फिरोजपुर, मोंगा, संगरूर, बरनाला, भटिंडा, मुक्तसर आदि इलाकों को कवर करेगा.

भास्कर ने इसे अपना 50वां एडिशन बताया है. भास्कर प्रबंधन जमशेदपुर, धनबाद से भी एडिशन शुरू करने जा रहा है. भास्कर ग्रुप का दावा है कि अगले साल के अंत तक भास्कर के 60 संस्करण हो जाएंगे. तब दैनिक भास्कर विश्व में सबसे ज्यादा संस्करणों वाला अखबार समूह बन जाएगा.

उधर खबर आई है कि भास्कर का नागौर संस्करण 18 सितंबर को लांच होने जा रहा है. निदेशक सुधीर अग्रवाल ने एक समारोह में यह घोषणा की. नागौर एडिशन की तैयारी कर ली गई है. नई भर्तियां हो गई हैं. काम शुरू हो गया है. भास्‍कर, जोधपुर के मोहन मोटमानी को यहां का इंचार्ज बनाया गया है. केकड़ी के पत्रकार कमलेश केसोट ने भी दैनिक भास्‍कर ज्‍वाइन कर लिया है. कमलेश नागौर में बतौर रिपोर्टर काम करेंगे. कमलेश इससे पहले पत्रिका में भी रह चुके हैं और हाल फिलहाल इंडिया टुडे समूह के लिए उदयपुर में काम कर रहे थे.

एक अन्य जानकारी के अनुसार दैनिक भास्कर का इटारसी संस्करण 19 सितंबर को लांच किया जाएगा. इसके जरिए इटारसी, होशंगाबाद, हरदा और बेतूल इलाके कवर होंगे. इटारसी भास्कर के यूनिट हेड शैलेंद्र दीक्षित को बनाया गया है. एडिटर अतुल गुप्ता होंगे. सरकुलेशन हेड के रूप में संदीप सिंह और प्रोडक्शन हेड प्रताप सिंह बनाए गए हैं. एकाउंड विभाग का काम राकेश शर्मा के जिम्मे होगा.

उधर, सूचना है कि भेल को दैनिक भास्कर पॉवर लिमिटेड के मुख्य प्लांट पैकेज के लिए छत्तीसगढ़ के जंजगिर जिले के बारादरहा में 600-600 मेगावाट वाले कोयला आधारित दो ऊर्जा संयंत्रों की आपूर्ति व स्थापित करने का 2,665 करोड़ रुपये का ठेका मिला है. कंपनी द्वारा जारी बयान के मुताबिक इस लोकेशन पर भेल को बॉयलर, भाप टर्बाइन व टर्बो जनरेटर के लिए डिजाइन, इंजीनियरिंग, एमएफआर, सप्लाई, इरेक्शन समेत इस संयंत्र को अत्याधुनिक सुविधाओं युक्त बनाने की जिम्मेदारी संभालनी है.

नई दिल्ली के त्रिवेणी सभागार में पिछले दिनों दैनिक भास्कर व भास्कर फाउंडेशन की ओर से हिंदी दिवस के मौके पर सेमिनार का आयोजन किया गया.  सेमिनार का विषय था- अंग्रेजी का बढ़ता प्रभाव और हिंदी प्रिंट मीडिया की भूमिका. सेमिनार भाषणों के बदले जीवंत संवाद की शैली में चला और वक्ता और श्रोता इसमें भागीदार थे. इसमें भास्कर समूह के चेयरमैन रमेशचंद्र अग्रवाल, दैनिक भास्कर के समूह संपादक श्रवण गर्ग,  केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी, प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह, आईबीएन-18 नेटवर्क के प्रधान संपादक राजदीप सरदेसाई, संस्कृत व स्पैनिश के विद्वान ऑस्कर पुजोल, यूपीएससी के सदस्य व लेखक-आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल कवि और दिल्ली हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष अशोक चक्रधर ने भाषण दिया. भास्कर फाउंडेशन के संजय गंजू ने धन्यवाद ज्ञापन किया. इस प्रकार भास्कर समूह ने हिंदी दिवस पर एक बड़े कार्यक्रम का आयोजन कर ब्रांडिंग के लिहाज से और आम हिंदी पाठकों में अपने प्रभाव को बढ़ाने सफलता हासिल की.

दैनिक भास्कर समूह ने इंडिया प्राइड अवार्डस शुरू कर दिया है. इस एवार्ड के जरिए भास्कर ग्रुप एक तीर से कई निशाने साध रहा है. विज्ञापन देने वाली बड़ी बड़ी कंपनियों, समूहों, बैंकों, व्यक्तियों को ओबलाइज करने के साथ-साथ उनके काम को रिकागनाइज करने का प्रयास किया है भास्कर ग्रुप ने. इस तरह भास्कर ब्रांड की सर्वोच्च स्तर पर सर्वाधिक स्वीकार्यता के लिए ग्रुप ने नायाब कदम उठाया है. इस वर्ष इंडिया प्राइड अवार्ड्स के लिए केंद्र सरकार के पीएसयू के साथ-साथ राज्य सरकार के पीएसयू भी चुने गए. वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने पुरस्कार बांटे. वित्त मंत्री ने देश की अर्थव्यवस्था में अहम् योगदान देने वाली पीएसयू कंपनियों के सम्मान के लिए पिछले साल शुरू किए गए इंडिया प्राइड अवार्डस के लिए दैनिक भास्कर समूह की सराहना की, उन्होंने विभिन्न वर्गो और श्रेणियों में विजेता रही कंपनियों और अधिकारियों को भी बधाई दी. दैनिक भास्कर समूह के चेयरमैन रमेशचंद्र अग्रवाल, दैनिक भास्कर समूह के प्रबंध संपादक यतीश राजावत ने पुरस्कार समारोह को संबोधित किया. इस बार स्टेट बैंक के चेयरमैन ओपी भट्ट को लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार प्रदान किया गया है. केंद्रीय पीएसयू को कंज्यूमर इंडस्ट्री, नान फाइनेंसियल, बैंकिंग, एनर्जी एंड पावर, हैवी इंडस्ट्रीज, मेटल एंड मिनरल्स, आयल एंड गैस, परिवहन, इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट, कारपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी और इंडिया इमेज इनहांसमेंट श्रेणी के तहत पुरस्कार दिए गए. राज्यों की पीएसयू को कृषि, इलेक्ट्रिसिटी एंड पावर, इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट और कारपोरेट सोशल रिस्पांसबिलिटी श्रेणी के तहत अवार्डस दिए गए. इनके अलावा कुछ विशेष पुरस्कार भी दिए गए. इनकी श्रेणी थी बेस्ट सर्विस ब्रांड, बिजनेस भास्कर ग्रोथ लीडर, एडिटर्स स्पेशल अवार्ड फोर इंक्लूसिव ग्रोथ, बेस्ट कंज्यूमर कनेक्ट -आईटी, इमर्जिग पीएसयू और चेयरमैन अवार्ड फॉर फाइनेंसियल कैटलिस्ट ऑफ द ईयर.

ये तो वे खबरें, सूचनाएं, जानकारियां हैं जो आम हो चुकी हैं. पर बहुत कुछ ऐसा भी है जिसे भास्कर ग्रुप ने उदघाटित नहीं किया है. अंदर ही अंदर तैयारियां चल रही हैं. भास्कर समूह की जो तीव्र गति है, तेज स्पीड है, उससे पता चलता है कि वह सभी मीडिया हाउसों को मात देने की तैयारी में है. जागरण समूह के सामने वाकई बहुत बड़ा सवाल पैदा हो चुका है कि आखिर इतनी तेज गति से चल रहे भास्कर समूह से कैसे वह नंबर वन की गद्दी बचा पाएगा.

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह की रिपोर्ट

विस्मयकारी है आलोक मेहता का कथन

एसएन विनोद: पत्रकारिता नहीं, पत्रकार बिक रहे-3 : नई दुनिया के आलोक मेहता की आशावादिता और दैनिक भास्कर के श्रवण गर्ग का सवाल चिन्हित किया जाना आवश्यक है। आलोक मेहता का यह कथन कि ”पेड न्यूज कोई नई बात नहीं है, लेकिन इससे दुनिया नष्ट नहीं हो जाएगी”, युवा पत्रकारों के लिए शोध का विषय है। निराशाजनक है। उन्हें तो यह बताया गया है और वे देख भी रहे हैं कि ‘पेड न्यूज’ की शुरुआत नई है।

हाल के वर्षों में, विशेषत: चुनावों के दौरान, इसकी मौजूदगी देखी गई है। पहले ऐसा नहीं होता था। आश्चर्य है कि एक ओर जब मीडिया घरानों के इस पतन पर अंकुश के उपाय ढूंढऩे के गंभीर प्रयास हो रहे हैं, पत्रकारीय मूल्यों और विश्वसनीयता के रक्षार्थ संघर्षरत पत्रकार और इससे जुड़े लोग आंदोलन की तैयारी में हैं, आलोक मेहता कह रहे हैं कि इससे दुनिया नहीं नष्ट हो जाएगी। विस्मयकारी है उनका यह कथन।

दुनिया नष्ट होगी या नहीं इसकी भविष्यवाणी तो नहीं की जा सकती किन्तु अगर ‘पेड न्यूज’ का सिलसिला जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं जब मीडिया की पवित्र दुनिया अवश्य नष्ट हो जाएगी। पत्रकारीय ईमानदारी, मूल्य, सिद्धांत व सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पण की आभा से युक्त चेहरे गुम हो जाएंगे, नजर आएंगे तो सीने पर कलंक का तमगा लगाए दागदार स्याह चेहरे। इनकी गिनती मीडिया की दुनिया के नुमाइंदों के रूप में नहीं होगी। ये पहचाने जाएंगे रिश्वतखोर के रूप में, दलाल के रूप में और समाज-देशद्रोही के रूप में। निश्चय ही तब पत्रकारीय दुनिया नष्ट हो जाएगी।

वैसे आलोक मेहता समाज पर भरोसा रखने की बात अवश्य कहते हैं लेकिन जब सामाजिक सरोकारों से दूर पत्रकार धन के बदले खबर बनाने लगें, अखबार ‘मास्ट हेड’ से लेकर ‘प्रिन्ट लाइन’ तक के स्थान बेचने लगें, बल्कि नीलाम करने लगें, संपादक पत्रकारीय दायित्व से इतर निज स्वार्थ पूर्ति करने लगें, मालिक ‘देश पहले’ की भावना को रौंद कर सिर्फ स्वहित की चिंता करने लगें तब समाज हम पर भरोसा क्यों और कैसे करेगा? सभी के साथ गुड़ी-गुड़ी और खबरों में बने रहने के लिए सार्वजनिक मंचों से अच्छे-अच्छे शब्दों का इस्तेमाल समाज के साथ छल है। पेशे के साथ छल है। कर्तव्य और अपेक्षित कर्म के विपरीत ऐसा आचरण पवित्र पत्रकारिता के साथ बलात्कार है। कम से कम पत्रकार, वरिष्ठ पत्रकार, कर्म और वचन में समान तो दिखें।

‘दैनिक भास्कर’ के श्रवण गर्ग ने आशंका व्यक्त की है कि ‘पेड न्यूज’ का मामला उठाकर कुछ दबाने की कोशिश की जा रही है। पूरे मीडिया जगत पर यह एक अत्यंत ही गंभीर आरोप है। इसका खुलासा जरूरी है। बेहतर हो गर्ग स्वयं खुलकर बताएं कि ‘पेड न्यूज’ की आड़ में मीडिया क्या दबा रहा है। श्रवण गर्ग ने एक विस्मयकारी सवाल यह उठाया है कि अगर आज देश में आपातकाल लग जाए तो हमारी भूमिका क्या रहेगी। विचित्र सवाल है यह। निश्चय ही गर्ग का आशय इंदिरा गांधी के आंतरिक आपातकाल से है।

आश्चर्य है कि उन्हें यह कैसे नहीं मालूम कि संविधान में संशोधन के बाद 1975 सरीखा कुख्यात आपातकाल लगाया जाना अब लगभग असंभव है। थोड़ी देर के लिए गर्ग के इस काल्पनिक सवाल को स्वीकार भी कर लिया जाए तो मैं जानना चाहूंगा कि वे पत्रकारों की भूमिका को लेकर शंका जाहिर कर रहे हैं तो क्यों? अगर गर्ग का इशारा उस कड़वे सच की ओर है जिसने तब के आपातकाल के दौरान अधिकांश पत्रकारों को रेंगते हुए देखा है, तब मैं चाहूंगा कि गर्ग उन पत्रकारों की याद कर लें जिन्होंने खुलकर आपातकाल का विरोध किया था, रेंगना तो दूर तब की शक्तिशाली प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सत्ता को सड़कों-चौराहों तक पर चुनौती दी थी और 19 महीने तक जेलों में बंद रहे। संख्या में कम होने के बावजूद उन पत्रकारों ने पत्रकारीय दायित्व और मूल्यों को मोटी रेखा से चिन्हित कर दिया था। उनमें से अनेक आज भी सक्रिय हैं। गर्ग उनसे मिल लें, उनके सवाल का जवाब मिल जाएगा।

उनकी एक अन्य जिज्ञासा तो और भी विस्मयकारी है। समझ में नहीं आता कि श्रवण ने यह कैसे पूछ लिया कि हम आज आपातकाल में नहीं जी रहे हैं क्या? पत्रकारिता के विद्यार्थी निश्चय ही अचंभित होंगे। किस आपातकाल की ओर इशारा कर रहे हैं गर्ग? सीधा-सपाट उत्तर तो यही होगा कि आपातकाल की स्थिति में न तो वाणी, न ही कलम गर्ग की तरह बोलने व लिखने के लिए आजाद होती। एक अवसर पर श्रवण गर्ग, अप्रत्यक्ष ही सही, ‘पेड न्यूज’ का समर्थन कर चुके हैं। कुछ दिनों पूर्व दिल्ली में युवा पत्रकारों के एक समूह को संबोधन के दौरान उन्होंने ‘पेड न्यूज’ के पक्ष में सफाई देते हुए कहा था कि आर्थिक मंदी के दौर में मीडिया घरानों ने इसका सहारा लिया था। अपने तर्क के पक्ष में उन्होंने शाकाहारी उस व्यक्ति का उदाहरण दिया था जो राह भटक जाने के बाद भूख की हालत में उपलब्ध मांस खाने को तैयार हो जाता है। इससे बड़ा कुतर्क और क्या हो सकता है।

सभी जानते हैं कि ‘पेड न्यूज’ की शुरुआत तब हुई थी जब देश में आर्थिक मंदी जैसा कुछ भी नहीं था। अखबारों ने निर्वाचन आयोग द्वारा उम्मीदवारों के लिए निर्धारित चुनावी खर्च की सीमा को चकमा देने के लिए उम्मीदवारों के साथ मिलकर ‘पेड न्यूज’ का रास्ता निकाला था। जाहिर है कि इसका सारा लेन-देन ‘नंबर दो’ अर्थात् कालेधन से हुआ। दो नंबर की कमाई से अपना घर भरने वाले राजनीतिकों की चर्चा व्यर्थ होगी, ऐसे काले धन के लेन-देन को प्रोत्साहित करने वाले पत्र और पत्रकारों को इस पवित्र पेशे में रहने का कोई हक नहीं। स्वयं नैतिकता बेच दूसरों को नैतिकता नहीं सिखाई जा सकती। यह तो ऐलानिया बेईमानों को संरक्षण-प्रश्रय देना हुआ। निश्चय ही यह पत्रकारिता नहीं है। ईमानदार, पवित्र पत्रकारिता तो कतई नहीं!

…जारी…

लेखक एसएन विनोद वरिष्ठ पत्रकार हैं.

सब बिकता है तो खबरें क्यों न बेचें : वैदिक

कारपोरेट हाउस जैसा चाहते हैं, पैसा देकर अखबार में वैसा छपवाते हैं- जस्टिस जीएन रे : अकेला अखबार अपने को पवित्र नहीं कर सकता क्योंकि समाज में बुराई के प्रति सहनशीलता विकसित हो गई है- अभय छजलानी : पेड न्यूज सिर्फ चुनाव तक सीमित नहीं है, हर दिन पैसा ले-देकर खबरें छप रही हैं- श्रवण गर्ग :  

यह बात सही है कि मीडिया में पेड न्यूज जैसे मामलों का चलन बढ़ा है और इसे रोकने के लिए मीडिया को आत्मावलोकन करना होगा। पेज न्यूज के दौर में नईदुनिया जैसे कुछ अखबार मौजूद हैं जिन्होंने आज भी अपने मानदंड कायम रखे हैं। यह बात भारतीय प्रेस परिषद (पीसीआई) के अध्यक्ष न्यायमूर्ति जीएन रे ने इंदौर में कही। इंदौर प्रेस क्लब में ‘पत्रकारिता के समक्ष चुनौतियां’ विषय पर आयोजित परिसंवाद में रे ने कहा कि बाजारीकरण के दौर ने पेड पत्रकारिता को बढ़ावा दिया है। उन्होंने नईदुनिया का उदाहरण देते हुए कहा कि आज तक नईदुनिया पर किसी ने उंगली नहीं उठाई। उन्होंने कहा, आज कारपोरेट हाउस जैसा चाहते हैं, अखबार में पैसा देकर वैसा छपवा लेते हैं। इससे पत्रकारिता के मूल्यों में गिरावट आई है।

नईदुनिया संपादकीय बोर्ड के अध्यक्ष अभय छजलानी ने कहा कि पत्रकारिता को विकृत करने के लिए समाज भी काफी हद तक जिम्मेदार है। पेड न्यूज जैसे मामलों को रोकने के लिए पत्रकार की शुद्धता, अखबार की शुद्धता और समाज की शुद्धता का त्रिकोण बनाना जरूरी है। अकेला अखबार अपने को पवित्र नहीं कर सकता क्योंकि समाज में बुराई के प्रति सहनशीलता विकसित हो गई है। उन्होंने कहा, समाज जिससे पीड़ित नहीं होता, वैसी शुद्धता के साथ अखबार निकालना आज अव्यावहारिक है।

वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने कहा कि आज जब सब चीज बिक रही है तो खबरें क्यों न बेची जाए। पेड न्यूज को विज्ञापन की तरह छापने में कोई बुराई नहीं, लेकिन विज्ञापन को खबर की तरह छापने में बुराई है।

वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने कहा कि हम पेज न्यूज जैसे संवेदनशील मुद्दे को बादाम-पिस्ता की तरह चबाना चाहते हैं जबकि यह मामला गंभीर है। पेज न्यूज सिर्फ चुनाव तक सीमित नहीं है, हर दिन पैसा ले-देकर खबरें छप रही हैं। खासकर राजनीतिक खबरों में यही हो रहा है। गर्ग ने कहा कि पेड न्यूज की रोकथाम के लिए कानून बनाना चाहिए। अपराधी को सजा दी जाए।

कल्पेश नेशनल एडिटर और यतीश मैनेजिंग एडिटर बने

श्रवण गर्ग ग्रुप एडिटर पद पर बने रहेंगे : नवनीत गुर्जर राजस्थान के नए स्टेट हेड : लोकसभा चुनाव बीतने के तुरंत बाद भास्कर प्रबंधन ने कंटेंट व ब्रांड को और बेहतर करने की कवायद के तहत कई बड़े बदलावों को अंजाम दिया है। कल्पेश याज्ञनिक जो अब तक दैनिक भास्कर, राजस्थान के स्टेट हेड हुआ करते थे, उन्हें भास्कर समूह का नेशनल एडिटर बना दिया गया है। भास्कर समूह के हिंदी बिजनेस अखबार ‘बिजनेस भास्कर’ के संपादक यतीश राजावत को प्रमोट कर भास्कर समूह का मैनेजिंग एडिटर बना दिया गया है। श्रवण गर्ग बतौर ग्रुप एडिटर पहले की तरह ही पूरे ग्रुप के लीडर बने रहेंगे पर अब वे रुटीन के कामकाज की बजाय नीतिगत व अन्य महत्वपूर्ण कार्यों को मुकाम तक पहुंचाने में जुटेंगे। कंटेंट संबंधी रूटीन के सभी कार्यों को कल्पेश और यतीश के बीच बांट दिया गया है। 

दैनिक भास्कर, राजस्थान का नया स्टेट हेड जयपुर संस्करण के स्थानीय संपादक नवनीत गुर्जर को बनाया गया है। नए आरई की नियुक्ति तक नवनीत स्टेट हेड का दायित्व निभाने के साथ-साथ जयपुर संस्करण भी देखते रहेंगे। यतीश राजावत भी नई जिम्मेदारी के साथ-साथ बिजनेस भास्कर के सर्वेसर्वा बने रहेंगे। ज्ञात हो कि पिछले कई माह से नए ग्रुप एडिटर के बतौर यतीश राजावत और कल्पेश याज्ञनिक का नाम उछाला जा रहा था और श्रवण गर्ग के इस्तीफे की अफवाहें भी फैलाई जा रही थी। इन बहुप्रतीक्षित बदलावों के बाद अब सभी तरह के अफवाहों पर विराम लग गया है।

प्रबंधन ने युवा व प्रतिभावान टीम लीडरों को आगे बढ़ाने की अपनी पुरानी नीति के तहत ही यतीश राजावत और कल्पेश याज्ञनिक को नई और बड़ी जिम्मेदारियां दी हैं। यतीश और कल्पेश, दोनों ही लोग अब भास्कर समूह के मुख्यालय भोपाल में बैठने लगे हैं। यतीश ने तीन दिन पहले तो कल्पेश ने कल भोपाल में नए कार्यभार को संभाल लिया। बताया जा रहा है कि कंटेंट संबंधी जितने भी (प्लानिंग, एक्जीक्यूशन, स्पेशल पेज…आदि) काम हैं, वे सब कल्पेश याज्ञनिक देखेंगे। भास्कर समूह के भोपाल स्थित एडिटोरियल कारपोरेट हेडक्वार्टर को भी कल्पेश याज्ञनिक के अधीन कर दिया गया है। यतीश राजावत के कार्य के बारे में अभी कुछ स्पष्ट तौर पर पता नहीं चल पाया है लेकिन सूत्रों का कहना है कि भास्कर समूह के मैनेजिंग डायरेक्टर सुधीर अग्रवाल के कई कार्यों को यतीश राजावत को सौंप दिया गया है। यतीश एमडी के कार्यों में हाथ बंटाने के अलावा एमडी द्वारा सौंपे गए विशेष मामलों को देखेंगे।