प्रणय मोहन का जिंदादिल मिजाज़ ही उसके बिछड़ने का सबसे बड़ा दुःख है… बेलौस बातें करने वाला प्यारा इंसान… ज़िन्दगी को अपनी शर्तों पर चलाने की जिद मगर इमोशनल ब्लैकमेल होने के लिए सबसे उपयुक्त किरदार… और बहुतों ने उसके साथ यही किया. जिन साथियों को आगे बढ़ाने के लिए प्रणय ने अपने संबंधों को दांव पर लगाने में देरी नहीं की, उन्होंने काम होने के बाद प्रणय को किनारे करने में बिलकुल देरी नहीं की.
इन्हीं दुखों की वजह से वो हैदराबाद चला गया था. लोगों ने सोचा मनमौजीपन में गया पर असल वजह कुछ दोस्तों की हरकतें थीं, जो उसे हमेशा कचोटती रहती थी. मेरे लोकमत ज्वाइन करने की खबर भड़ास पर आने के बाद उसका फोन आया बधाई के लिए, लंबी बातें हुयी फिर बोला लखनऊ जून में आऊंगा कुछ प्लान करना है, फिर शनिवार को उसके पिता जी का फोन आया बोले… तुम तो दोस्त हो प्रणय के उसको समझा के लखनऊ की तरफ ले आओ, हमारी उम्र अब ऐसी है की उसे हमारे साथ रहना चाहिए.
मैंने वादा किया उनसे की जून में वो आएगा तो यही रूकने का जुगाड़ कर लूँगा… और रविवार को भाई सिद्धार्थ कलहंस के फोन ने किस्सा ही खत्म कर दिया… प्रणय आज लखनऊ आ रहा है. मगर सिर्फ याद बनकर.
लेखक उत्कर्ष सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट हैं. वे लखनऊ में लोकमत से जुड़े हुए हैं.












bhimmanohar
April 25, 2011 at 1:37 pm
bahut dukh hota aise khabar padkar par imandari se khaunga is field me rona jyada hai…..