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बरखा और वीर… हमें आपसे सफाई नहीं चाहिए!

मयंक सक्सेनालेख के शीर्षक से ज़रा भी हैरान न हों क्योंकि हम जो नई पीढ़ी से आते हैं, अपनी पिछली पीढ़ी के कुत्सित सचों से अब ज़रा भी हैरान  नहीं होते हैं। हम जानते हैं  कि वो जो कहते हैं, जो दिखते  हैं और जो करते हैं उसमें  एक परस्पर विरोधाभासी अंतर है और हम उनको इसके लिए माफ़ नहीं करते हैं पर उनसे सफाई भी नहीं चाहते हैं। हमें पता है कि मूर्ति पूजन का कोई मतलब नहीं है क्योंकि इन सबकी मूर्तियां समय अपने आप ध्वस्त करता जा रहा है फिर चाहें वो बड़े पत्रकार हों, महान समाजसेवी या फिर वो नेता ही क्यों न हों। और एक ऐसे युग में जब सूचना प्रकाश से तेज़ गति से चलती हो, बरखा दत्त या वीर सांघवी किसी के भी सच हमसे छुपे नहीं रह सकते हैं और हम जानते हैं कि कोई भी जो चीख-चिल्ला कर दूसरों से सवाल पूछ रहा हो, उसके अपने भेद ब्लैक होल सरीखे गहरे हो सकते हैं।

मयंक सक्सेनालेख के शीर्षक से ज़रा भी हैरान न हों क्योंकि हम जो नई पीढ़ी से आते हैं, अपनी पिछली पीढ़ी के कुत्सित सचों से अब ज़रा भी हैरान  नहीं होते हैं। हम जानते हैं  कि वो जो कहते हैं, जो दिखते  हैं और जो करते हैं उसमें  एक परस्पर विरोधाभासी अंतर है और हम उनको इसके लिए माफ़ नहीं करते हैं पर उनसे सफाई भी नहीं चाहते हैं। हमें पता है कि मूर्ति पूजन का कोई मतलब नहीं है क्योंकि इन सबकी मूर्तियां समय अपने आप ध्वस्त करता जा रहा है फिर चाहें वो बड़े पत्रकार हों, महान समाजसेवी या फिर वो नेता ही क्यों न हों। और एक ऐसे युग में जब सूचना प्रकाश से तेज़ गति से चलती हो, बरखा दत्त या वीर सांघवी किसी के भी सच हमसे छुपे नहीं रह सकते हैं और हम जानते हैं कि कोई भी जो चीख-चिल्ला कर दूसरों से सवाल पूछ रहा हो, उसके अपने भेद ब्लैक होल सरीखे गहरे हो सकते हैं।

अब बात  कर लेते हैं मुद्दे पर, तमाम टिप्पणियां आती हैं, कई लोग  बरखा दत्त और वीर सांघवी को अपना आदर्श बताते हुए  निराश दिखते हैं, कुछ  को पत्रकारिता के हाल को देख  कर दुख होता है, कुछ पूरे सिस्टम को ही भ्रष्ट बताते  हैं तो कुछ कहते हैं कि बरखाओं और वीरों का पक्ष भी सुनना चाहिए। पर सवाल है कि क्यों आखिर हम निराश हों, क्यों सिस्टम को कोसें, क्यों हम किसी से सफाई मांगें….क्या हम इतनी समझ नहीं रख सकते हैं कि इस देश मैं, समाज में और समय में क्या क्या हो सकता है? दरअसल इससे भी मज़ेदार बात ये है कि हम ये क्यों न समझें कि बरखाओं और वीरों के पास इन सब के जवाब में कोई तर्क नहीं है लेकिन वो न तो शर्मिंदा हैं और उन्हें इस देश की न्याय व्यवस्था में पूरा भरोसा है कि वो कुछ भी करें कोई उनका कुछ बिगाड़ नहीं पाएगा।

कुछ लोग इस विचार को नकरात्मक ठहरा देंगे  पर दरअसल नकरात्मक क्या है…हम या ये व्यवस्था? मैं बेहद साफगोई से कहता हूं कि अगर नई पीढ़ी के कुछ लोग बरखा दत्त को अपना आदर्श मानते हैं और वीर सांघवी सरीखा पत्रकार बनना चाहते हैं तो कृपया ये सब भूल जाइए। इन दोनो और बल्कि इनके अलावा भी तमाम चमकते चेहरों में केवल ग्लैमर के अलावा कुछ भी नहीं है जो आपको आकर्षित करे….ये सारे चमकते चेहरों की चमक उधार की…घूस की…या दलाली की है। लिप्सा, दोहरे चेहरे और भ्रष्टाचार के अलावा इन्हें किसी भी मामले में आदर्श नहीं माना जा सकता है।

अब बरखा दत्त की बात, अगर मैं सही हूं  तो कुछ ही समय पहले एक अंग्रेज़ी ब्लॉगर चैतन्य कुंते को मानहानि का नोटिस भेज कर बरखा ने सार्वजनिक माफी मांगने पर मजबूर किया था। उस ब्लॉगर की गलती केवल इतनी थी कि उसने बरखा की पत्रकारिता की शैली पर सवाल उठाया था…खैर बात पुरानी है बरखा आज उससे बुरी स्थिति में हैं और देखना मज़ेदार होगा कि क्या इस बार वो कानूनी कार्रवाई करना चाहेंगी। ज़ाहिर है इस बार विधिक सहायता लेना उनके सर पर उल्टा भी पड़ सकता है। खैर वो कहती हैं कि उनकी जो बातचीत नीरा राडिया नाम की सदाचरण की पुतली से सामने आई है वो किसी और परिप्रेक्ष्य में की गई थी। हो सकता है बरखा दत्त अदालत में ये साबित भी कर दें कि वो बातचीत Out of Context थी पर ज़रा एक बार बातचीत के कुछ हिस्से देखिए….

RADIA: Yeah. Listen, the thing is that they need to talk to him directly. That is what the problem is.

BARKHA: Haan so, apparently PM’s really pissed off that they went public.

RADIA: But that’s Baalu’s doing, naa… he was not instructed by Karunanidhi to do that.

BARKHA: Oh, he wasn’t?

RADIA: This is not. He was told to come away and tell Congress that.

BARKHA: And he went public

RADIA: Well, the media… media, the media was standing outside.

BARKHA: Oh God. So now what? What should I tell them? Tell me what should I tell them?

RADIA: I’ll tell you what it is—the problem and I have had a long chat with both his wife and with the daughter right

क्या इस बातचीत से निकलने वाले मतलब एक किशोरवय  भी नहीं समझ सकता है…और फिर  क्या नीरा राडिया नाम की जिन  महिला से बरखा ये और तमाम और गोपनीय जानकारिया साझा कर रही थी वो उनके चैनल की एडीटर इन चीफ या सीईओ थी….या कोई और बड़ी पत्रकार…या केवल गपशप के लिए इस तरह की बातें हो रही थी…आप सबको याद दिलाना चाहूंगा कि ये वो वक्त था जब पूरे देश की मीडिया की निगाहें देश के राजनीतिक नाटक पर लगी थी जो डीएमके और कांग्रेस के बीच चल रहा था….ऐसे में बरखा दत्त अंदरूनी सूचनाएं नीरा राडिया से अगर बांट रही थी तो इसके निहितार्थ क्या बिल्कुल पाक साफ हो सकते हैं…फिर क्यों ये ख़बरे एक संवाददाता के तौर पर उन्होंने अपने चैनल को नहीं दी…क्यों और फिर बरखा दत्त नीरा राडिया से एक आज्ञाकारी कर्मचारी की तरह पूछती हैं कि “Oh God. So now what? What should I tell them? Tell me what should I tell them?” बरखा जी क्या हम सब आपको वाकई ऐसे बेवकूफ लगते हैं?

ये केवल एक संवाद है, ज़रा नीरा राडिया और महाराजाधिराज ए. राजा के बीच के वार्तालाप पर ग़ौर करिए,

RADIA: Hi! I got a message from Barkha Dutt just now.

RAJA: Huh?

RADIA: Barkha Dutt

RAJA: What does she say?

RADIA: She says… that she has been following up the story with Prime Minister’s Office tonight. In fact, she was the one who told me that Sonia Gandhi went there. She says that he [the PM, presumably] has no problem with you, but he has a problem with Baalu.

ये वही  नीरा राडिया हैं जो बरखा दत्त से भी बात कर रही थी और फिर  वो सारा ज्ञान जो बरखा दत्त इनको प्रदान कर रही थी, उसे  ये ए. राजा से साझा कर रही थीं। ऐसे में बरखा दत्त या तो ये ही नकार दें कि ये आवाज़  उनकी है (जो फॉरेंसिक जांच में साफ हो जाएगा) या फिर कोई तर्क न दें….और वो दे भी नहीं रही हैं…बल्कि हर मौके पर चीखने वाली, वीरांगना आज इतनी असहाय हो गई हैं कि खुद कुछ बोलने की जगह अपने संस्थान को आगे कर दिया….ये वही संस्थान हैं जो मंदी के नाम पर छंटनी करने में ज़रा देर नहीं लगाते, और आज किसी बड़े की पोल खुली है तो कर्मचारी हित के नाम पर मानहानि की धमकी दे रहे हैं। ज़ाहिर है इनको पता है कि इस लोकतंत्र में केवल बड़ों को लूट की छूट है, छोटों को सांस लेने की भी आवाज़ करने की आज़ादी नहीं है। वी द पीपल कहने वाली बरखा और उनके जैसे तमाम केवल एक धंधे में लगे हैं….वो जनता को सपने बेचते हैं और स्टूडियो से बाहर आ कर जनता के सपनों को बेच देते हैं। और बरखा क्योंकि कहानी इतनी साफ है कि और सफाई की गुंजाइश नहीं है इसलिए या तो ये टेप ही फ़र्ज़ी साबित हो जाए….नहीं तो हमें आपकी सफाई नहीं चाहिए।

अब बात  वीर सांघवी की, वीर सांघवी का टेप सुनते हुए मैं  कई बार बहुत जो़र से हंसा और कई बार बिल्कुल तरस  आया कि इतना हट्टा कट्टा  दिखने वाला शख्स और इतना दबंग माने जाने वाला पत्रकार क्या वाकई इतना दयनीय है। उस टेप में वाकई नीरा राडिया वीर सांघवी को डिक्टेट कर रही हैं कि उन्हें अपने एक तथाकथित लाबीइंग करने वाले लेख में क्या लिखना है और क्या नहीं। देखिए टेप में एक जगह किस तरह दोनो बात करते हैं,

RADIA: But basically, the point is what has happened as far as the High Court is concerned is a very painful thing for the country because what is done is against national interest.

VIR: Okay.

RADIA: I think that’s the underlying message.

VIR: Okay. That message we will do. That allocation of resources which are scarce national resources of a poor country cannot be done in this arbitrary fashion to benefit a few rich people.

RADIA: That’s right.

VIR: Yeah. That message we will get across, but what other points do we need to make?

ये बातचीत साफ दिखाती है कि वीर सांघवी तो जैसे नीरा राडिया के बिल्कुल  इशारों पर एक लेख या साक्षात्कार कर रहे हों, और यकीन न हो तो आगे देखिए कि किस तरह वीर सांघवी ये तक कह देते हैं कि मुकेश अंबानी को पूरा साक्षात्कार रिहर्सल कर के देना होगा,

VIR: Mukesh can talk straight, can say things. You can rehearse. You can work out a script in advance. You can go exactly according to the script. Anil can’t do any of those things, no?

RADIA: Right. But we can do that, no?

VIR: Yeah.

RADIA:Yeah?

VIR: But Mukesh has to be on board. He has to sort of realise. It has to be fully scripted.

RADIA: No, that’s what I mean. I think that’s what he’s asking me.

VIR: Yes, it has to be fully scripted.

RADIA: He is saying is that, ‘Look Niira’, that ‘I don’t want anything extempore.’

VIR: No, it has to be fully scripted. I have to come in and do a run through with him before.

RADIA: Yeah, yeah.

VIR: We have to rehearse it before the cameras come in.

और ये सब सामने  आने के बाद वीर सांघवी अपने ब्लॉग पर क्या लिखते  हैं, क्या सफाई देते हैं इससे कतई कोई फ़र्क नहीं पड़ता  है। अगर वो पाक साफ़ हैं  और सारे आरोप झूठे हैं तो आएं कानूनी अखाड़े में और लड़ें मुकदमा पर ज़ाहिर है वहां भी इन सबको सज़ा मिलना मुश्किल ही है। इनकी सज़ा केवल यही है कि ये हमारे सामने आकर सफाई देने का साहस ही न कर पाएं….ये जनता का सामना करने की हिम्मत ही न कर पाएं….ये जानें और समझें कि जनता और इनके प्रशंसक सब इनका सच जानते हैं….और इसीलिए उनको किसी तरह की सफाई देने का कोई मतलब नहीं है।

बरखा और वीर  कोई अपवाद नहीं हैं न  अपनी तरह के अकेले हैं, ये अलग बात है कि वो इस प्रकरण के बाद अलग थलग पड़ जाएं।  एक और बड़ा और कड़वा सच ये है कि तमाम समाचार पत्रों और चैनलों के पास ये सारा सच और इसके सबूत पहले से मौजूद थे पर किसी ने भी इतना नैतिक साहस नहीं दिखाया कि इस ख़बर को उठाता। कुछ महीने पहले जब पहली बार ये मामला उठातो तो इन लोगों का नाम सामने आते ही एनडीटीवी समेत ज़्यादातर चैनलों ने ये ख़बर ही गिरा दी….किसी की इतनी तक हिम्मत नहीं हुई कि कोई बिना नाम लिए ही ये कह देता कि दो बड़े पत्रकारों की भी भूमिका संदिग्ध है।

जो लोग  बरखा और वीर की चुप्पी पर सवाल उटा रहे हैं उनसे केवल एक निवेदन है कि उनसे किसी सच की उम्मीद न करें, उनसे सफाई न मांगे….क्या आपको अपने बुद्धि और विवेक पर भरोसा नहीं है….क्या आपने टेप नहीं सुने हैं या आप बदलते समय के कड़वे सचों से वाकिफ़ नहीं हैं। कैसे कोई आम आदमी की, किसान की और गरीब की आवाज़ उठाने की बात करने वाला इंसान करोड़ों कमा सकता है….कैसे कोई देश के आम आदमी को अपनी बपौती मान सकता है….और कब तक हम ठगे जाते रहेंगे…नेताओं….पत्रकारों और ढोंगी समाजसेवियों के ढोंग से….दरअसल ये समय हमें रोज़ शर्मसार ज़रूर करता है, कई ऐसे सचों से रूबरू कराता है जो सुनना हम में से कोई नहीं चाहता है…पर सच कहें तो इस समय की सबसे बड़ी खासियत यही है कि कोई भी शख्स कितना भी बड़ा क्यों न हो, वो महान और पवित्र होने का दावा नहीं कर सकता, उसके सच सामने ज़रूर आएंगे….और इसी लिए बरखा और वीर हमें आपसे कोई सफाई नहीं चाहिए…..

शब्द..
भाव…..
मात्रा……
छंद……….
कविता………
जहां से नहीं थी
आशा
वहीं से देखो
फूट रहे हैं
क्रोध…
शोभ…
द्रोह……
विद्रोह….
ध्वंस हुई हैं
सदियों से पूजित
मूर्तियां
देखो युग के
प्रतिमान
टूट रहे हैं

(मई में पहली बार बरखा दत्त और वीर सांघवी के किस्से चर्चा में आने के बाद,  और हाथ में इनके नाम वाले दस्तावेज़ आने के बाद ये कविता लिखी गई थी।)

लेखक मयंक सक्सेना युवा और प्रतिभाशाली पत्रकार हैं. माखनलाल से पत्रकारिता की डिग्री लेने के बाद कुछ दिनों तक यायावरी की. जी न्यूज से जुड़कर करियर की शुरुआत की. वहां से सीएनईबी पहुंचे और फिर नौकरी छोड़कर कई महीने विचरण करते रहे. इन दिनों यूएनआई टीवी के साथ जुड़े हुए हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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0 Comments

  1. purnendu shukla

    November 20, 2010 at 9:54 am

    dusron ke muhn men mike thoons dene wale dusaron ko manhani ka dar dikhate hain.sharm bhi nahi aati inko ki tamam loge ab bhi inko apna aadarsh samajhte hain.

  2. Sheeba

    November 20, 2010 at 10:35 am

    A writing asking for a new paradigm to understand social ethics.
    Kudos!

  3. devika

    November 20, 2010 at 1:23 pm

    Sometimes it feels disgusting to be part of such journalism…jab corruption k baare mein batane wale khud hi ghotalon mein phase honge to bakiyon ka to kya kehna…..dr was a time whn barkha was even my ideal..thanks shes nt anymore….hope we young aspirants also do not fall in the same trap…

  4. Rupesh

    November 20, 2010 at 2:35 pm

    Dalal Ratna …
    Dalal Vibhushan…..
    Dalal Bhushan ….
    Dalal Shri …..
    26 January ko Makhaul-Tantra divas aane wala hai. Pathakon se sujhaav aamantrit hain.

  5. kumar harsh

    November 20, 2010 at 4:29 pm

    badhia likha mayank. good words.

  6. madan kumar tiwary

    November 20, 2010 at 4:39 pm

    भाई मेरे मैने अपने ब्लाग पर बहुत कुछ लिखा है और बहुत बडी हस्ती के बारे में लिखा है। मुझपे केस करो पता चलेगा । मैने सुब्रतों के माम्ले मे लिखा था जिनके अपने मकान शीशे के होते है वो दुसरों के मकान पर पत्थर नहीं फ़ेंका करतें। जैसी एक जुटता २ जी के माम्ले में दिख रही वह आपात काल के विरोध की शुरुआती दौर जैसा है। अंतर इतना सा है कि इस बार कमान हम पत्रकारों नें संभाली है।
    मदन कुमार तिवारी
    समीर तकिया
    गया ( बिहार )

    ०९४३१२६७०२७
    http://www.madantiwary.blogspot.com

  7. Adhi

    November 20, 2010 at 6:40 pm

    उन्हें आदत है सच बुलाने की…सच भुलाने की…बरगलाने की…।

  8. Indian

    November 20, 2010 at 7:29 pm

    मयंक, आपकी लेखन शैली बड़ी सुघड़ है… आपकी लेखन-प्रतिभा इस लेख में बखूबी झलकी है….
    क्या खूब लिखा है आपने… “अब बात वीर सांघवी की, वीर सांघवी का टेप सुनते हुए मैं कई बार बहुत जो़र से हंसा और कई बार बिल्कुल तरस आया कि इतना हट्टा कट्टा दिखने वाला शख्स और इतना दबंग माने जाने वाला पत्रकार क्या वाकई इतना दयनीय है। उस टेप में वाकई नीरा राडिया वीर सांघवी को डिक्टेट कर रही हैं कि उन्हें अपने एक तथाकथित लाबीइंग करने वाले लेख में क्या लिखना है और क्या नहीं। देखिए टेप में एक जगह किस तरह दोनो बात करते हैं”
    आपकी इन पंक्तियों को पढ़ने के बाद मैंने वह लेख पढ़ा, जो वीर संघवी ने नीरा राडिया से हुई उस बातचीत के बाद ही लिखा होगा… लेकिन वो डिक्टेटेड पंक्तियाँ कहाँ छिप गयीं, यह मैं समझ नहीं पाया… आपने तो शायद अब तक यह लेख पढ़ा नहीं होगा…. इसलिए जरा नीचे दिये इस लिंक पर जायें..

    http://www.virsanghvi.com/CounterPoint-ArticleDetail.aspx?ID=342

    और फिर अपनी धारदार लेखनशैली में बतायें कि यह देखो प्रमाण — ये सारी बातें नीरा मैडम ने डिक्टेट करायी थीं और विनम्र आज्ञाकारी की तरह से वीर संघवी ने लिख दीं…
    और हाँ, आपके बारे में ज्यादा जानता नहीं, अज्ञान के लिए क्षमा करेंगे… लेकिन क्या आपने कभी रिपोर्टिंग की है… खास कर ऐसी रिपोर्टिंग जिसमें आपको अनेक विरोधी पक्षों की बातें सुन कर कुछ लिखना होता है? शायद नहीं की होगी… जिन लोगों ने की है, वे वीर और बरखा प्रसंग पर कुछ नहीं बोल रहे, क्योंकि जनता बौराई हुई है। केवल राजदीप ने खुल कर बरखा के समर्थन में कुछ कहा है, बावजूद इसके कि वे एनडीटीवी छोड़ने के बाद उसका प्रतिद्वंद्वी चैनल खड़ा करके उसे एनडीटीवी से भी आगे ले जा चुके हैं…
    खैर, इंतजार रहेगा आपके अगले ओजस्वी लेख का…

  9. Indian

    November 20, 2010 at 7:40 pm

    मयंक, आपकी लेखन शैली बड़ी सुघड़ है… आपकी लेखन-प्रतिभा इस लेख में बखूबी झलकी है….
    क्या खूब लिखा है आपने… “अब बात वीर सांघवी की, वीर सांघवी का टेप सुनते हुए मैं कई बार बहुत जो़र से हंसा और कई बार बिल्कुल तरस आया कि इतना हट्टा कट्टा दिखने वाला शख्स और इतना दबंग माने जाने वाला पत्रकार क्या वाकई इतना दयनीय है। उस टेप में वाकई नीरा राडिया वीर सांघवी को डिक्टेट कर रही हैं कि उन्हें अपने एक तथाकथित लाबीइंग करने वाले लेख में क्या लिखना है और क्या नहीं। देखिए टेप में एक जगह किस तरह दोनो बात करते हैं”
    आपकी इन पंक्तियों को पढ़ने के बाद मैंने वह लेख पढ़ा, जो वीर संघवी ने नीरा राडिया से हुई उस बातचीत के बाद ही लिखा होगा… लेकिन वो डिक्टेटेड पंक्तियाँ कहाँ छिप गयीं, यह मैं समझ नहीं पाया… आपने तो शायद अब तक यह लेख पढ़ा नहीं होगा…. इसलिए जरा नीचे दिये इस लिंक पर जायें..

    http://www.virsanghvi.com/CounterPoint-ArticleDetail.aspx?ID=342

    और फिर अपनी धारदार लेखनशैली में बतायें कि यह देखो प्रमाण — ये सारी बातें नीरा मैडम ने डिक्टेट करायी थीं और विनम्र आज्ञाकारी की तरह से वीर संघवी ने लिख दीं…
    और हाँ, आपके बारे में ज्यादा जानता नहीं, अज्ञान के लिए क्षमा करेंगे… लेकिन क्या आपने कभी रिपोर्टिंग की है… खास कर ऐसी रिपोर्टिंग जिसमें आपको अनेक विरोधी पक्षों की बातें सुन कर कुछ लिखना होता है? शायद नहीं की होगी… जिन लोगों ने की है, वे वीर और बरखा प्रसंग पर कुछ नहीं बोल रहे, क्योंकि जनता बौराई हुई है। केवल राजदीप ने खुल कर बरखा के समर्थन में कुछ कहा है, बावजूद इसके कि वे एनडीटीवी छोड़ने के बाद उसका प्रतिद्वंद्वी चैनल खड़ा करके उसे एनडीटीवी से भी आगे ले जा चुके हैं…
    खैर, इंतजार रहेगा आपके अगले ओजस्वी लेख का…

  10. dhanish

    November 21, 2010 at 2:24 am

    sub chalta hai bhai.

  11. मयंक सक्सेना

    November 21, 2010 at 11:34 am

    श्रीमान इंडियन जी,
    आप लगते तो तथाकथित वरिष्ठ पत्रकार हैं…फिर आखिर किस वजह से कोई डर जो छद्म नाम से टिप्पणी की…अगर टिप्पणी का शौक है तो पहचान ज़ाहिर करने का साहस भी पैदा करें….खैर प्रशंसा के लिए साधुवाद…और सुघड़ लेख की बात करूं तो कतई मैं सुघड़ नहीं लिखता….क्योंकि सुघड़ लिखने के लिए योजनाबद्ध लिखना होता है…और मैं वीर सांघवी की तरह स्क्रिप्टेड पत्रकारिता नहीं करता…जिस लेख का आप हवाला दे रहे हैं क्या आपने उससे जुड़े पूरे टेप्स सुने हैं…और रही बात दोनो पक्षों का मत लेने के सिद्धांत की तो आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि मैं भी चूंकि एक रिपोर्टर हूं इसलिए मुझे इस सिद्धांत के बारे में भली भांति पता है….खैर उस वार्तालाप से कुछ हिस्से फिर कोट कर देता हूं और बताइएगा कि ये किस सिद्धांत और दोनो पक्षों से बात करने के तहत कहे गए हैं….कि सांघवी साहब कहते हैं कि वो मुकेश अम्बानी को पूरी स्क्रिप्ट रटा देंगे…
    VIR: But Mukesh has to be on board. He has to sort of realise. It has to be fully scripted.
    RADIA: No, that’s what I mean. I think that’s what he’s asking me.
    VIR: Yes, it has to be fully scripted.
    RADIA: He is saying is that, ‘Look Niira’, that ‘I don’t want anything extempore.’
    VIR: No, it has to be fully scripted. I have to come in and do a run through with him before.
    RADIA: Yeah, yeah.
    VIR: We have to rehearse it before the cameras come in.
    और एक बात इंडियन साहब….वरिष्ठों के काले सच सामने हैं सो ऐसे में अगर आप पहचान छुपा कर टिप्पणी करेंगे तो आपको उन्हीं वरिष्ठों या उनके हितैषियों में न गिन लिया जाए जो पत्रकारिता को पतितकारिता बनाए हुए हैं….जय हो तथाकथित वरिष्ठ पत्रकारों की….

  12. garima

    November 21, 2010 at 12:42 pm

    Mayank, jis bebaki se tumne sach ko parosa hai vo wakai kabile tarif hai… aur jaha tak in naam chin patrakaro ka sawla hai tp ye to vo naam hai jo khul ke samne aa gaye.. pehle bhi aise kai bade patrakaro ke naam samne jpo ab bhi sachche patrakaar hone ka dambh bharte hai per vo khud bhi jaante ki vo sirf 2 bade clients ki bich ki kdai hai… kuch aise shabd hai jo in bade patrakaro ko suit karte hai (jo ab reh nahi gaye), per maryada me nahi aate so nahi use kar rahi hu. muhim jaari rakho.. per dhyan rahe ek level per pahuchne ke baad aksar bade patrakar isi ferhist me shamil ho jaate hia..

  13. sharvan shukla

    November 21, 2010 at 2:56 pm

    inki sachchai cistaar se atane ke lie thanx…

  14. विष्णु तिवारी

    November 23, 2010 at 3:34 pm

    सूचना प्रौद्योगिकी का कमाल है. कल तक जो बातें दबी छिपी रहती थीं वे अब सामनें आ रही हैं. मसला यह है की प्रवर्तन निदेशालय के “किसी और” प्रयोजन के लिये नीरा राडिया के फोन सरकारी इजाजत के साथ टेप करवाये थे. किसे पता था कि खोदा पहाड़ और निकली चुहिया की जगह लोमड़ी (FOX) निकल आयेगी. खैर, तो रिकार्डिग के सारे टेप आयकर विभाग को बिना सुने भेज दिये गये. बस, वहीं कोई राष्ट्रभक्त था जिसने आपके हमारे लिये और भारत की जनता के लिये ये रिकार्डिंग निकाल बाहर की. भारत की जनता को सुनाइये. अपनी वॉल पर साझा करिये. सबको बताइये की क्या बला है यह अबला बरखा दत्त, यह वीर वीर सांघवी और गंदी बाद करने वाला प्रभु चावला. इसके जैसे बाकी और बिचौलियों के भी भेद इसी तरह खोलिए. टेप में कई और लोमड़ी हैं.

  15. Babita Asthana

    November 25, 2010 at 12:33 pm

    बरखा और वीर… हमें आपसे सफाई नहीं चाहिए! kiyonki safai dene se paap nahi dhul sakte….Mayank iss zordar n U.P. ki bhasha mai “DHANSU” lekh k liye badhai…
    or ek baat mai un mahashay k liye likhna chahungi jinhone comment karke ye kaha hai ki mayank क्या आपने कभी रिपोर्टिंग की है… खास कर ऐसी रिपोर्टिंग जिसमें आपको अनेक विरोधी पक्षों की बातें सुन कर कुछ लिखना होता है? शायद नहीं की होगी..जिन लोगों ने की है, वे वीर और बरखा प्रसंग पर कुछ नहीं बोल रहे… to mahoday ji (Varishth patrkar ji) mai aapko yah kahana chahungi ki agar koi reporter Scripted reporting karta hai to use reporting chhod kar programming join kar lena chahiye, media mai patrakarita ke alava bhi kai vikalp hain….

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