मुझे मालूम है, तुम मर नहीं सकते…

[caption id="attachment_19935" align="alignleft" width="74"]आलोक तोमरआलोक तोमर[/caption]ये लेख या संस्मरण या स्मृतिका जो कह लें, कई लोगों के कहने के बाद और खुद के भी कई असफल प्रयासों के बाद लिख रहा हूं क्योंकि 21 मार्च से जितनी भी बार कलम उठाई है हर बार बस आंसू ही निकले हैं… शब्द एक नहीं फूट पाया। अवाक हूं कि आखिर आलोक तोमर कैसे मर सकते हैं? बार-बार खुद को विश्वास दिलाता हूं कि हां अब तात चले गए हैं और उतनी ही बार अवचेतन, चेतन को झिड़क देता है कि क्या बकवास करते हो, भला आलोक तोमर के प्राण लेने का साहस किसमें है.

तुम मेरे आलोक थे

ये कविता मेरे तात (आलोक तोमर) को समर्पित है…तात आप अजीब सी हालत कर गए हैं… आपसे तमाम बार झगड़ा हुआ, बोलचाल भी बंद हुई और आप बीमार भी पड़े पर ऐसी बदहवासी वाली स्थिति कभी नहीं आई… तमाम लोग जिनको आपके बारे में तमाम भ्रम रहे उनसे मैं कभी लड़ा नहीं, क्योंकि वो आपसे कभी मिले ही नहीं थे… तो वो क्या जानते आपके बारे में.

आलोक तोमर की एक कविता

मेरी हालत इस वक़्त आलोक जी के लिए कुछ भी लिख पाने की नहीं है…. आश्चर्य है कि किस तरह इतना बोलने वाला एक शख्स पूरी दुनिया को निःशब्द कर के चला गया है…. पता नहीं क्यों मैं भरोसा नहीं कर पा रहा…. आलोक तोमर कैसे मर सकते हैं…. और क्या उनके न होने पर भी उनके शब्द कानों से कभी दूर हो पाएंगे…. पता नहीं…. ज़्यादा नहीं कह पाऊंगा…

कैंसर नहीं, हार्ट अटैक बना मौत का कारण!

आलोक तोमर को कैंसर परास्त न कर सका. वे तो कैंसर को परास्त करने की पूरी तैयारी कर चुके थे और इसी अभियान के तहत कैंसर वाली गांठ घटकर बेहद मामूली हो चुकी थी. ऐसा कीमियो, रेडियोथिरेपी व इच्छाशक्ति के कारण संभव हुआ. पर अचानक आए हार्ट अटैक ने दिमाग में आक्सीजन के प्रवाह को बाधित कर दिया. इससे ब्रेन हैमरेज हो गया और आलोक तोमर कोमा में चले गए थे.

बरखा और वीर… हमें आपसे सफाई नहीं चाहिए!

मयंक सक्सेनालेख के शीर्षक से ज़रा भी हैरान न हों क्योंकि हम जो नई पीढ़ी से आते हैं, अपनी पिछली पीढ़ी के कुत्सित सचों से अब ज़रा भी हैरान  नहीं होते हैं। हम जानते हैं  कि वो जो कहते हैं, जो दिखते  हैं और जो करते हैं उसमें  एक परस्पर विरोधाभासी अंतर है और हम उनको इसके लिए माफ़ नहीं करते हैं पर उनसे सफाई भी नहीं चाहते हैं। हमें पता है कि मूर्ति पूजन का कोई मतलब नहीं है क्योंकि इन सबकी मूर्तियां समय अपने आप ध्वस्त करता जा रहा है फिर चाहें वो बड़े पत्रकार हों, महान समाजसेवी या फिर वो नेता ही क्यों न हों। और एक ऐसे युग में जब सूचना प्रकाश से तेज़ गति से चलती हो, बरखा दत्त या वीर सांघवी किसी के भी सच हमसे छुपे नहीं रह सकते हैं और हम जानते हैं कि कोई भी जो चीख-चिल्ला कर दूसरों से सवाल पूछ रहा हो, उसके अपने भेद ब्लैक होल सरीखे गहरे हो सकते हैं।

बैठी रहीं, पुलिसिया गुंडों के बीच, रात भर…

justice for मांयुवा और प्रतिभाशाली पत्रकार मयंक सक्सेना ने थाने में कैद मां के बारे में सोचते हुए एक कविता लिखी है. इन दिनों यूएनआई टीवी, दिल्ली में कार्यरत मयंक ने ‘justice for मां’ कंपेन से खुद को जोड़ते हुए इस मामले से संबंधित सभी खबरों, तस्वीरों, वीडियो को अपने सभी परिचितों के पास मेल से भेजा है और ‘justice for मां’ कंपेन से जुड़ने का आग्रह किया है. मयंक की कविता इस प्रकार है-

 

कुठियाला जी, हम सब आपके इरादे जानते हैं

भोपाल से आ रही आवाज़ें यहां दिल्ली से लेकर देहरादून, कोलकाता से कानपुर और रांची से रायपुर तक हम सभी पूर्व छात्रों के कानों में पिघलते लोहे सी भर रही हैं। इस बात से हममें से कम लोग ही असहमत होंगे कि हम सब पूर्व छात्रों के लिए भोपाल दूसरी मातृभूमि और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय दूसरे घर सरीखा है। एक परिवार में हमने जीवन का आरम्भ किया।

पीपली लाइव : राकेश हम तुम्हें नहीं बचा पाए…

मयंक सक्सेनाउस वक्त तक मैं भूल चुका था कि मैं फिल्म देख रहा हूं, कुछ कुछ ऐसा लगने लगा था कि मैं भी उस भीड़ का हिस्सा हूं जो नत्था के घर के बाहर जुटी हुई थी. अब वो आम ग्रामीण हों. या मीडियावाले. उनमें से कोई एक बन कर मैं कहानी का हिस्सा बनता जा रहा था. शुरुआत में कई घटनाक्रमों पर लगातार हंसता रहा पर एक दृश्य में राकेश अपनी मोटरसाइकिल रोक कर मिट्टी खोदते बूढ़े़ का नाम पूछता है. और जवाब आते ही जैसे शरीर झनझना जाता है. तुरंत ‘गोदान’ आंखों के सामने से चलती जाती है. किसान से मजदूर हो जाने की व्यथा.

सबसे सच्चा आदमी उम्र भर बोलता रहा झूठ…

पत्रकारिता में ढेर सारे क्लर्क टाइप लोग आ गए हैं जो यस सर यस सर करने के अलावा और आंख-नाक के सीध में चलने के सिवा, कुछ नहीं जानते, और न करते हैं, और न ही कर सकते हैं. पर पत्रकारिता तो फक्कड़पन का नाम है. आवारगी का पर्याय है. सोच, समझ, संवेदना का कमाल है.

व्याख्यान बनाम मुकुल शिवपुत्र

[caption id="attachment_17717" align="alignleft" width="71"]मयंकमयंक[/caption]माहौल में एक आवाज़ गूंज रही थी और अंतस में कुछ चलचित्र से चल रहे थे…. पहली बार प्रभाष जी के घर पर था… उन्हीं पुस्तकों के बीच में बैठा जहां कई बार प्रभाष जी को कई बार बाईट देते… लाइव या तस्वीरों में देखा था… कागद कारे पढ़ते हुए कई बार जिस व्यक्ति के व्यवहार के बारे में कल्पनाएं की थी…. वो सामने थे और कुछ भी अलग नहीं था जैसे लिखते थे वैसे ही थे वो…

माखनलाल में बिना प्रवेश परीक्षा प्रवेश!

कुलपति का तुगलकी फरमान : भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय इस मायने में अनूठा संस्थान रहा है कि एक तो ये अकेला पत्रकारिता को समर्पित विश्वविद्यालय है, और दूसरा कि यहां से निकले पत्रकार देसी खुशबू लिए होते हैं. उन्हें भाषा के साथ साथ आम आदमी के मुद्दों और सरोकारों की समझ होती है। वर्तिका नंदा के शब्दों में कहें तो यहां परीकथा के किरदार…गुड्डे और गुड़िया पढ़ने नहीं आते हैं जैसा कि दिल्ली स्थित संस्थानों में आपको मिलेगा।