डॉ. बिनायक सेन से जुड़ा निर्णय पूरे देश में चर्चा में है और कई लोग कई प्रकार से इस पर अपनी टिप्पणी कर रहे हैं. मैं यहाँ इस प्रकरण से जुड़ा एक खास मुद्दा यहाँ उपस्थित करना चाहता हूँ जो सीधे-सीधे पत्रकारों से जुड़ा है. जहां डॉ. सेन के विरुद्ध 97 गवाह गुजरे वहीं उनके पक्ष में ग्यारह गवाह उपस्थित हुए. पत्रकारों के लिए यह गर्व और संतोष का विषय हो सकता है कि इन गवाहों में ज्यादातर पत्रकार थे.
निर्णय की प्रति से प्राप्त जानकारी के अनुसार जो पत्रकार डॉ. सेन के पक्ष में उपस्थित हुए वे थे – दैनिक देशबंधु समाचार के शशांक शर्मा, दैनिक नवभारत के अजित परमार, दैनिक छत्तीसगढ़ के प्रबंध संपादक अनिल झा, दैनिक अंग्रेजी समाचार पत्र हितवाद के संपादक ईवी मुरली और हरिभूमि के उप सम्पादक सुकांत राजपूत. इसके अलावा डॉक्युमेंट्री फिल्ममेकर अजय टीजी तथा अन्य लोग थे.
शशांक शर्मा ने – “पुलिस और सीआरपीएफ जवानों ने ग्रामीणों को घर में घुस कर पीटा और पीयूसीएल की जांच टीम ने दोषी पुलिसकर्मियों पर कार्यवाही की मांग की” (13 जून 2005) तथा “नक्सली नेता अचानक गायब, संगठनों की चिंता बढ़ी” (31 दिसम्बर 2005) के अपने समाचारों का उल्लेख डॉ. सेन की बचत में किया. अजित परमार ने अपने अखबार में “कटगाँव के निर्दोष आदिवासियों पर सुरक्षा जवानों का कहर” (13 जून 2005), “नक्सली समर्थक संगठनों पर कार्यवाही शीघ्र- डीजीपी ” (6 जनवरी 2006) तथा “रोलेट एक्ट की याद दिलाता है जन-सुरक्षा कानून” (26 जून 2006) के अपने समाचारों का उल्लेख किया. अनिल झा ने “जन सुरक्षा कानून सरकार की मनमानी चलाने का तरीका” (30 मार्च 2006) तथा “एक कैदी की चिट्ठी” (16 फरबरी 2007) को प्रस्तुत किया. सुकांत राजपूत ने “नक्सली समर्थकों के खिलाफ कार्यवाही की तैयारी एवं नक्सली नेता विजय को आंध्र प्रदेश पुलिस ले गयी” नामक समाचार (3 जनवरी 2006) पेश किया.
यह अलग बात है कि न्यायालय ने इन गवाहियों पर संज्ञान नहीं लिया क्योंकि इन लोगों ने स्वयं को संवाददाता नहीं होने और वे समाचार स्वयं के द्वारा प्रेस में छापने नहीं देने की बात स्वीकार की, जिससे इनका लाभ डॉ. सेन को नहीं दिया. पर इससे यह स्पष्ट है कि डॉ. बिनायक सेन के बचाव पक्ष की गवाहियों में सबसे पहला स्थान पत्रकारों का था.
लेखक अमिताभ ठाकुर आईपीएस अधिकारी हैं. लखनऊ में पदस्थ हैं. इन दिनों आईआईएम, लखनऊ में अध्ययनरत हैं.












gajju
December 31, 2010 at 5:33 am
AAP KO SOCIAL ACTIVIST AUR MAOIST ME FHARAK KARNAA HONGAA.SOCIAL ACTIVIST KO MAOIST,YAA TERRORIST YAA….ANTI SOCIAL ELEMENTS KAHANE KI ES DESH ME PARAMPARAA HAI.DR.BINAYAK SE SOCIAL ACTIVIST THE.AAP CIVIL SERVICE ME HAI…PATRAKARITAA KARNE KE LIYE DANTEWADA…..JAGDALPUR…..GADCHIROLI JAANA PADENGAA….JASAA VAHA KI JAMINI HAKIKAT KO JAANIYE…AC KE KAMRE ME BAITHKE PATRAKARITAA NAHI KI JAA SAKTI….SAMZE ABHITABHJI
sujit
December 30, 2010 at 5:25 am
AMITABHA JI KYA AAP PATRAKARITAA KI MUKHYA DHARAA ME Q NAHI AATE.AAP JAISE LOGO KI MEDIA ME JARURAT HAI.
विजय झा
December 30, 2010 at 2:16 pm
अमिताभ जी किसकी मार्केटिंग कर रहे है , माओवादी विनायक सेन का या मार्क्सवादी पत्रकारिता का , भारतीय राष्ट्र और समाज के लिए दोनों घातक है, साध्वी प्रज्ञा और विनायक सेन में क्या अंतर है? दोनों ने अपने हाथों से कोई बम – ब्लास्ट नहीं किया, हाँ अपने विचारों से बम ब्लास्टी को मदद किया. तो फिर एक ही अपराध में एक अपराधी और दूसरा निर्दोष कैसे? श्रीमान आप तो कम से कम विनायक सेन का मुल्यांकन देश समाज के कानून से करें ना कि किसी खास विचारधारा द्वारा पोषित विचारों से, और ये जो छद्म पत्रकार विनायक सेन – विनायक सेन चिल्ला रहे है, ये तो पत्रकारिता की आर में एक खास विचारधारा के प्रचारक है, और आप समाज के सबसे पढ़े लिखे वर्ग से ताल्लुक रखते है, तो एक प्रचारक और एक पत्रकार में तो अंतर रखिये न की घालमेल कीजिये, इसी घालमेल का परिणाम ये राष्ट्र भुगत रहा है पता नहीं चलता है की कौन अपराधी है और कौन नेता,
धन्यवाद,
विजय झा
raju
December 30, 2010 at 3:36 pm
विजय झा जी, विनायक सेन के खिलाफ बोलने का हक उसे है, जिसने पांच-दस गरीबों की मदद की हो, दो-चार का इलाज किया, एक-दो को पढ़ाया हो। कौन क्या वादी है, उससे मतलब नहीं। अपनी जिंदगी के कितने वर्ष किसने क्या करते हुए बिताये हैं, यह भी मायने रखता है। डा. विनायक सेन चाहते तो आपके पूज्य डॉक्टर बन सकते थे। नहीं बने। दो-चार अच्छे लोग आपकी विचारधारा के कैम्प में भी होंगे। उन्हें बोलिये न डा. विनायक का विरोध करने को। अच्छा लगेगा। है कोई एक-दो ?