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यह विद्रोही अपनी शर्तों पर कविता करेगा

[caption id="attachment_19199" align="alignleft" width="85"]शेष नारायण सिंह शेषजी[/caption]फेसबुक पर एक बहुत ही दिलचस्प बहस चल रही है. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में उनके छात्र जीवन के साथी असरार खां ने जनवादी कवि रमाशंकर यादव विद्रोही के बारे में कुछ ऐसे बयान दे दिए हैं जिन पर विवाद है. जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष चन्द्रशेखर से उनकी तुलना कर देने के बाद कुछ लोगों को नागवार गुज़रा और उन्होंने विद्रोही की कविता पर ही सवाल उठाने शुरू कर दिए. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में 1983 में हुए संघर्ष की कथा में नायकों और खलनायकों का ज़िक्र चल पड़ा और बात विद्रोही की कविता से हट कर छात्र राजनीति की बारीकियों पर केन्द्रित हो गयी.

शेष नारायण सिंह

शेषजी

फेसबुक पर एक बहुत ही दिलचस्प बहस चल रही है. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में उनके छात्र जीवन के साथी असरार खां ने जनवादी कवि रमाशंकर यादव विद्रोही के बारे में कुछ ऐसे बयान दे दिए हैं जिन पर विवाद है. जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष चन्द्रशेखर से उनकी तुलना कर देने के बाद कुछ लोगों को नागवार गुज़रा और उन्होंने विद्रोही की कविता पर ही सवाल उठाने शुरू कर दिए. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में 1983 में हुए संघर्ष की कथा में नायकों और खलनायकों का ज़िक्र चल पड़ा और बात विद्रोही की कविता से हट कर छात्र राजनीति की बारीकियों पर केन्द्रित हो गयी.

मुझे लगता है कि चंद्रशेखर और विद्रोही दोनों उस महान विश्वविद्यालय के छात्र हैं और दोनों की अपनी-अपनी विशिष्टता है. दोनों ने ही अवाम के संघर्ष की गाथा में योगदान किया है. चन्द्रशेखर का हमला सीधा था तो शासक वर्गों के एक मुस्‍टंडे ने उनकी जान ही ले ली और विद्रोही ने कविता के ज़रिये आम आदमी की तकलीफ को आवाज़ देने की कोशिश की, तो अभी तक उनकी सांस चल रही है. इसलिए तुलना की बात यहीं ख़त्म की जानी चाहिए, लेकिन कविता के मैदान में विद्रोही का जवाब नहीं है. उनकी अवधी कविता, ‘जगीर मांगता, जगीर मांगता, कलजुगहा मजूर पूरी सीर मांगता’ खेतिहर-मजदूरों की उस संघर्ष गाथा की अभिव्यक्ति है जिसमें मजूर के दर्द की जो परतें हैं वे उसकी उस हिम्मत की बात को रेखांकित करती हैं. विद्रोही ने इसी दर्द और हिम्मत को बा-आवाज़े बुलंद ऐलान किया है. इसी कविता में विद्रोही बताते हैं अब मजूर अपने पसीने का रेट मांग रहा है. वह ईनाम से संतुष्ट नहीं होने वाला, वह हक की बात करता है.

मैं साहित्य का आलोचाक नहीं हूँ, इस अवधी कविता की साहित्यिक व्याख्या के झेमेले में नहीं पड़ना चाहता, लेकिन मैं इतना जानता हूँ कि अवधी क्षेत्र में किसी भी संघर्ष के अगले दस्ते का गीत बन सकने की ताक़त वाला यह गीत आलोचकों की नज़र से या तो गुज़रा ही नहीं है या उन लोगों का वर्गचरित्र आड़े आ गया होगा और इसे मामूली कविता मानकर भुला दिया गया होगा. जिस दौर में विद्रोही जेएनयू आये थे, उस दौर के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों और प्राध्यापकों ने हिन्दी साहित्य में बहुत ज्यादा योगदान किया है. कविता, आलोचना, कहानी, उपन्यास सभी क्षेत्रों के चोटी के आज के अधिकतर रचनाकार उस दौर में उसी विश्वविद्यालय में रहते थे. विद्रोही की कविताओं के बारे में उस तरह का जिक्र नहीं हुआ जैसा बाकी लोगों का हुआ.

जब विद्रोही अपनी एक कविता में चेतावनी देते हैं कि ‘नाच नाचेगी ऐसे कड़ाही में पूड़ी, खायेगा वही जो हवन से बचेगा’ तो अपने गाँव में बैठे उस शोषण की बारीकी को बात कर रहे होते हैं, जो काफी हाउस वाले आलोचकों और बुद्धिजीवियों की समझ में नहीं आयेगा. इस कविता में सामंती मानसिकता की बखिया भी उधेड़ी गयी है. इस कविता में अवध के ग्रामीण समाज के उस इतिहास को रेखांकित करते हैं, जो त्रिलोचन की समझ में तो आती थी लेकिन बाकी लोगों के लिए वह बरास्ता अनुवाद ही अपनी मंजिल तय करती है.

सर्वहारा के नाम पर साहित्य की खेती करने वालों के उस विशिष्ट वर्ग में विद्रोही की पहुंच नहीं है, जो किसी को भी महान साहित्यकार के रूप में पहचान दिलाती है. उनकी कविता को जेएनयू कैम्पस के बाहर पहुंचाने में विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों ने प्रमुख भूमिका निभाई है, जनवादी कवियों के बीच उनकी कविता की इज़्ज़त भी है. इन छात्रों ने उनकी कुछ कविताओं को यू ट्यूब पर डाल दिया है, जिसके ज़रिये विद्रोही को सुना, देखा जा सकता है, लेकिन गरीब आदमी की पक्षधरता का दावा करने वाली राजनीतिक जमातों और उनके साहित्यिक ढपलीबाजों ने कुछ नहीं किया.

मैं विद्रोही को 1974 से जानता हूँ जब वे मेरे छात्र के रूप में बीए में दाखिल हुए थे. वामपंथी थे, कवि थे और बहुत ही भले आदमी थे. जिस कालेज में विद्रोही पढ़ने गए थे, वह बांयें बाजू के साहित्यकार और कवि स्व. मान बादुर सिंह के गाँव में था. मान बहादुर बहुत पहले से कवितायें करते थे लेकिन उसे उन्होंने कहीं भी छपने के लिए नहीं भेजा था. बाद में उनकी शोहरत देख कर लगा कि वे अच्छे कवि रहे होगें. लेकिन विद्रोही की 1974 की कवितायें जब उनको दिखाई गयीं तो वे बहुत प्रभावित हुए थे और कहा कि विद्रोही की सोच बिलकुल मौलिक है और भाषा बहुत ही दमदार. कादीपुर में मई दिवस के एक जुलूस में विद्रोही की कवितायें पढ़ी और सराही गई थीं.

1979 में वे जेएनयू आ गए और यहाँ सामंती सोच के हर अलंबरदार ने उनका शोषण किया, उनके परिवार को तहस नहस किया और उनको विश्वविद्यालय से बाहर निकाल कर सड़क पर खदेड़ दिया, लेकिन विद्रोही के जीवट का उन्हें अंदाज़ नहीं था. बगावत का यह कवि तब से वहीं सड़क पर डटा हुआ है और आपनी बात को अपनी शर्तों पर कह रहा है. इस काम के लिए उसे अपने शरीर पर अथाह कष्ट झेलने पड़ रहे हैं लेकिन कमज़ोर लोगों की तरह वह आत्महत्या नहीं करेगा, वह जिंदा रहेगा.

लेखक शेष नारायण सिंह देश में हिंदी के जाने-माने स्तंभकार, पत्रकार और टिप्पणीकार हैं.

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0 Comments

  1. ajeet shukla

    January 13, 2011 at 9:27 am

    vidrohi ji ki jijivisha dekhkar aaj bahoot log ummeed se hain. mukhyadhara ki media ko sheela ki jawani dikhti hai kabhi wo vidrohi ji ki jawani dekhey. aha vidrohi youtube par unki kavitayen dekhi jaa sakti hai . ek link yahan hai

    http://www.youtube.com/watch?v=7-zgQ8bbxu4&feature=related

  2. दिनेश चौधरी

    January 13, 2011 at 7:22 am

    शेष नारायण जी, विद्रोही की कुछ कवितायें भी पोस्ट करते तो अच्छा होता..

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