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‘यादों में आलोक’ आज : वो होते तो ये होता, वो होते तो वो होता…

आलोक तोमर: आज टाइम निकालिए, दो बजे कांस्टीट्यूशन क्लब पहुंचिए : यादों में आलोक. यही नाम है कार्यक्रम का. आलोक तोमर बहुत जल्द चले गए. अब भी हम जैसे बहुतों को यकीन नहीं कि आलोक जी चले गए. अन्ना हजारे का आंदोलन और उसके बाद चल रहे ड्रामे को देख एक साथी ने फोन कर कहा कि आलोक तोमर जी होते तो जबरदस्त लिखते इस पूरे ड्रामे पे.

आलोक तोमर: आज टाइम निकालिए, दो बजे कांस्टीट्यूशन क्लब पहुंचिए : यादों में आलोक. यही नाम है कार्यक्रम का. आलोक तोमर बहुत जल्द चले गए. अब भी हम जैसे बहुतों को यकीन नहीं कि आलोक जी चले गए. अन्ना हजारे का आंदोलन और उसके बाद चल रहे ड्रामे को देख एक साथी ने फोन कर कहा कि आलोक तोमर जी होते तो जबरदस्त लिखते इस पूरे ड्रामे पे.

इंडिया गेट पर आईआईएमसी के एक छात्र योगेश शीतल ने जब बरखा दत्त को भ्रष्टाचार विरोधी कार्यक्रम करने से रोक कर भागने को मजबूर कर दिया तो किसी ने कमेंट लिखा कि अगर आलोक सर होते तो इस पूरे प्रकरण पर जबरदस्त लिखते. वो होते तो ये होता, वो होते तो वो होता… किसी का महत्व उसके न होने के बाद ही समझ में आता है. उन मुद्दों पर जिन पर बोलना लिखना करियर के लिए बेहद खतरनाक माना जाता है, आलोकजी उन मुद्दों पर ऐसे लिखते बोलते जैसे उन्हें किसी की कुछ परवाह ही न हो. और जिसे किसी की कुछ परवाह न हो, वही सच व साफ बोल सकता है.

दिल्ली मुंबई लखनऊ पटना भोपाल जैसे शहरों में रहने वाले पत्रकारों से यह अपेक्षा करना कि वह लिखने बोलने के मामले में किसी की कोई परवाह नहीं करेंगे, किसी असंभव को साकार करने के खयाली पुलाव पकाने जैसा है. क्योंकि इन महानगरों में पत्रकार बहुत सारे दबावों व अपेक्षाओं में जीते हैं. संस्थान का दबाव, खुद के व परिजनों के सरवाइव करने-कराने का दबाव, सत्ता सरकार का दबाव, आधुनिकतम लाइफस्टाइल जीने का दबाव… ऐसे दबावों से दबे पत्रकारों की कलमें कब दम तोड़ दिया करती हैं, खुद उन पत्रकारों को भी पता नहीं चलता. पर इन दबाओं को धता बताकर और देश के सबसे गरीब आदमी के दर्द व संवेदना से संचालित होकर नंगा और कठोर सच कहने का साहस रखना किसी बहुत जिगरे वाले आदमी का काम होता है. हमारे आलोकजी ऐसे ही थे.

ईटीवी के जगदीश चंद्रा के बार बार प्रेरित करने पर और राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार ईशमधु तलवार व डा. दुष्यंत द्वार आयोजन से जुड़े छोटे-बड़े सभी काम अपने सिर पर ले लेने के कारण मैं आयोजन कराने का साहस जुटा सका. किसी को न्योता भेजा नहीं गया है. सबको भड़ास4मीडिया के जरिए सूचित व निमंत्रित किया गया है. तो, अनुरोध है कि कोई ये न सोचे कि मुझे किसी ने फोन कर आने के लिए नहीं कहा तो मैं भला क्यों जाऊं. यह आम मीडियाकर्मियों की तरफ से आयोजित प्रोग्राम है जिसमें सब शरीक हैं, सब आमंत्रित हैं और सभी आयोजक हैं. ऐसे में मुझे उम्मीद है कि लोग आज दो बजे कांस्टीट्यूशन क्लब (रफी मार्ग पर, आईएनएस के सामने, यूएनआई के बगल में) के डिप्टी स्पीकर हाल में भारी संख्या में आएंगे और आलोक जी से जुड़ी यादों को साझा करेंगे, सुनेंगे, गुनेंगे और बोलेंगे.

और यह बताते हुए खुशी हो रही है कि इस कार्यक्रम में शरीक होने लोग गया और पटना से चलकर दिल्ली पहुंचे हैं. गया से मदन कुमार तिवारी और पटना से विनायक विजेता के दिल्ली आ जाने की सूचना है. इनका कनविक्शन देखकर मैं चकित हूं. आलोक तोमर के प्रति श्रद्धा और प्रशंसा का भाव इनके मन में इतना जबरदस्त है कि इन्होंने खुद अपने खर्चे से दिल्ली यात्रा का प्रोग्राम बना डाला. मुझे उम्मीद है कि आलोकजी की यादों से जुड़े आज के कार्यक्रम में बहुत कुछ ऐसा सुनने देखना को मिलेगा, जिससे आलोक जी के व्यक्तित्व व भारतीय पत्रकारिता के चरित्र की पड़ताल की नई दृष्टि हासिल हो सकेगी.

तो मिलते हैं दो बजे कांस्टीट्यूशन क्लब के डिप्टी स्पीकर हाल में.

अगर अब भी आपको न्योते का इंतजार हो तो आनलाइन इनविटेशन आपके सम्मुख प्रस्तुत है, क्लिक करके पढ़ें— यादों में आलोक : एक आयोजन

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
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0 Comments

  1. Bijender Sharma

    April 23, 2011 at 3:13 am

    aise ayojan har sal hone chaiye

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