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यूपी में नहीं पूछ सकेंगे भ्रष्टाचारी का नाम

डा. नूतन ठाकुर: शासनादेश के जरिए पारदर्शिता पर प्रहार : अन्य लोगों के साथ-साथ पत्रकारों के लिए भी उत्तर प्रदेश से एक बुरी खबर है. सतर्कता विभाग तथा उत्तर प्रदेश सतर्कता अधिष्ठान को जन सूचना अधिनियम 2005 के प्रावधानों के बाहर कर दिया गया है. ऐसा जन सूचना अधिनियम 2005 की धारा 24 की उपधारा 4 के अधीन दी गयी शक्तियों के तहत उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा किया गया है. इस बारे में प्रमुख सचिव, सतर्कता, उत्तर प्रदेश ने शासनादेश जारी कर दिया है.

डा. नूतन ठाकुर: शासनादेश के जरिए पारदर्शिता पर प्रहार : अन्य लोगों के साथ-साथ पत्रकारों के लिए भी उत्तर प्रदेश से एक बुरी खबर है. सतर्कता विभाग तथा उत्तर प्रदेश सतर्कता अधिष्ठान को जन सूचना अधिनियम 2005 के प्रावधानों के बाहर कर दिया गया है. ऐसा जन सूचना अधिनियम 2005 की धारा 24 की उपधारा 4 के अधीन दी गयी शक्तियों के तहत उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा किया गया है. इस बारे में प्रमुख सचिव, सतर्कता, उत्तर प्रदेश ने शासनादेश जारी कर दिया है.

शासनादेश संख्या है 2339/39-4-2010-21/05. इसे  दिनांक 22 सितम्बर 2010 को जारी किया गया है. शासनादेश की एक कापी नीचे संलग्न है. यानी कि अब आप उत्तर प्रदेश में यह नहीं पूछ सकते कि किस-किस अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार सम्बन्धी मामले चल रहे हैं और वे किस सम्बन्ध में हैं. इससे अधिक पारदर्शिता के खिलाफ काम और क्या हो सकता है?

तर्क यह दिया गया  है कि चूँकि इन विभागों में अधिकायियों के विरुद्ध जांच तथा विवेचना चलते रहते हैं और इस प्रकार से सूचना दिए जाने से वे गलत प्रकार से प्रभावित हो सकते हैं.
धारा 24 केंद्र तथा राज्य सरकारों को यह अधिकार प्रदान करता है कि सुरक्षा तथा आसूचना संगठनों को अनुसूची दो में  रख पर उन्हें सूचना के अधिकार के प्रावधानों के बाहर रख सकती है पर इसमें यह बात साफ़ तौर पर लिखा हुआ है कि इसमें भ्रष्टाचार और मानवाधिकार के मामले शामिल नहीं होंगे.

उत्तर प्रदेश सरकार ने इतने स्पष्ट प्रावधान के बावजूद सतर्कता विभाग तथा उत्तर प्रदेश सतर्कता अधिष्ठान को सूचना के अधिकार के बाहर कर दिया है जो सीधे-सीधे सूचना के अधिकार के प्रावधानों से छेड़-छाड़ और खिलवाड़ है. साथ ही यह इस अधिनियम की  मूल भावना पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के भी विरोध में है. प्रदेश के कई आरटीआई संगठनों, जिसमे नेशनल आरटीआई फोरम भी शामिल है, ने उत्तर प्रदेश सरकार के इस आदेश की निंदा की.

फोरम का मानना है कि ऐसे शासनादेश के चलते पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के विरुद्ध स्थिति बन जाती है. इन लोगों ने उत्तर प्रदेश सरकार तथा राज्यपाल से इस आदेश पर पुनर्विचार करते हुए इसे वापस लेने की मांग की हैं. कई संगठनों ने इसके लिए आवश्यकता पड़ने  पर विधिक कार्यवाही भी करने की बात कही है क्योंकि इनका मानना है कि यह कार्य प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था में सीधे तौर पर गलत सन्देश प्रेषित करेगा. औरों के साथ-साथ पत्रकार साथियों को इस शासनादेश से सीधा विपरीत असर पड़ेगा.

डॉ नूतन ठाकुर

संपादक

पीपु्ल्स फोरम, लखनऊ

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0 Comments

  1. [email protected]

    October 8, 2010 at 2:43 am

    andher nagari chaupat raja…. sorry raja nahi rani!!

  2. kranti

    October 8, 2010 at 3:26 am

    Every thing have its pros and cons Mam…

    Kranti

  3. Sanjay Sharma. Editor Weekand Times.

    October 8, 2010 at 3:30 am

    अफसरों की फोज तो इस कानून को लागू ही नहीं करना चाह रही थी. अब सतर्कता विभाग को इस कानून से दूर कर दिया गया है. थोडा बहुत डर अफसरों को इस विभाग से लगता था . अब वो भी ख़तम. यह बात दीगर है कि यह विभाग भी अफसरों के खिलाफ कुछ नहीं करता. जब शिकायत आती है तो सतर्कता विभाग के दरोगा जी अपना हिस्सा मांगने पहुच जाते है और फिर यह जांच सालो चलती रहती है. …

  4. Dr. Vishnu Rajgadia

    October 8, 2010 at 3:55 am

    This is shame. The state government has no right to kill the RTI Act. This is like the illegal rule passed by Nitish Kumar in Bihar. We shall protest it. This is a trend to weaken the RTI Act in slow process

  5. om prakash gaur

    October 8, 2010 at 5:59 pm

    एक बार फिर साबित हो गया है कि देश चलने वालों में भ्रष्टाचारियों का बोलबाला है.
    ओम प्रकाश गौड़ मो-09926453700

  6. thepublicleader.blogspot.com

    October 9, 2010 at 2:02 am

    वैसे भी सूचना का अधिकार-2005 के मामले में राज्य सरकार पूरी तरह से उदासीन है और यहां के नौकरशाह तो खुलेआम कानून की धज्जियां उड़ाते रहते हैं। भ्रष्ट नौकरशाहों के मामले में राज्य सूचना आयोग के बाबू (आयुक्त) भी उनकी ही कक्षा करते हैं। सूचना मांगने वालों को तारीख दर तारीख देकर कानून का उपयोग करने से हतोत्साहित करते हैं। ……केंद्र सरकार भले ही सूचना का अधिकार कानून-2005 लागू कर सरकारी योजनाओँ में भ्रष्टाचार खत्म करने का दावा कर रही हो, लेकिन नौकरशाह केंद्र की इस मंशा को पूरा नहीं करना चाहते हैं। नौकरशाहों की इस करतूत में राज्यों की गैर-कांग्रेसी सरकारें बढ़ चढ़कर हिस्सेदारी कर रही हैं। ऐसा ही कुछ नजारा इन दिनों उत्तर प्रदेश में देखने को मिल रहा है। सूबे में राज्य सूचना आयोग एवं प्रथम अपीलीय अधिकारी गैर जिम्मेदाराना जन सूचना अधिकारियों की ही मदद कर रहें हैं, जिसकी बदौलत ये प्रथम अपीलीय अधिकारियों एवं राज्य सूचना आयोग के आयुक्तों के शो-कॉज नोटिस एवं आदेश के बाद भी आवेदकों को सूचना उपलब्ध नहीं करा रहें हैं। इस हकीकत से रू-ब-रू होने के लिए जब इस संवाददाता ने उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिला में विभिन्न विभागों के जन सूचना अधिकारियों से सूचना मांगी तो नोकरशाहों की करतूत ने सूचना का अधिकार कार्यकर्ताओँ के आरोप को प्रमाणित कर दिया।
    संवाददाता ने बीती साल 27 अगस्त को सोनभद्र के जिला ग्रामीण विकास अभिकरण के जन सूचना अधिकारी से सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 के तहत इंदिरा आवास एवं महामाया आवास से संबंधित सूचना मांगी। मांगी गई सूचना आवेदक (संवाददाता) को निर्धारित समय में प्राप्त नहीं हुई। आवेदक ने विभाग के प्रथम अपीलीय जन सूचना अधिकारी के पास अपील की। फिर भी आवेदक को सूचना प्राप्त नहीं हुई। आवेदक मे बीती नवंबर में राज्य सूचना आयोग के आयोक्त के पास द्वितीय अपील की। अपील स्वीकार करते हुए आयोग ने मई माह में सुनवाई की तारीख निर्धारित की। आयोग ने सुनवाई की तारीख की सूचना संबंधित विभाग के जन सूचना अधिकारी को दिया, लेकिन आवेदक को नहीं दी। सूत्रों से आवेदक को सुनवाई की तारीख की जानकारी हुई। आवेदक ने सुनवाई के दौरान अपना पक्ष रखा। दूसरा पक्ष अनुपस्थित रहा। इसके बाद भी आयुक्त ने सुनवाई के लिए आगामी 29 अक्टूबर की तारीख निर्धारित कर संबंधित जन सूचना अधिकारी को नोटिस जारी करने की बात कही। इससे गैर-जिम्मेदार जन सूचना अधिकारी का मनोबल बल बढ़ गया है और वह सूचना उपलब्ध कराने में रुचि नहीं दिखा रहा है। अगर सूचना मांगने वाले व्यक्ति के खर्च की बात करें तो सोनभद्र से सुनवाई की तारीख पर एक बार उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने में कम से कम पांच सौ रुपये खर्च होते हैं। राज्य सूचना आयोग के आयुक्तों द्वारा तारीख दर तारीख देकर बार-बार आवेदकों को दौड़ाने से गैर-जिम्मेदार जन सूचना अधिकारियों का सूचना नहीं देने का मनोबल बढ़ कहा है, जिसे लोग आयोग द्वारा नौकरशाहों के संरक्षण के रूप में देख रहे हैं। संवाददाता ने बीती साल 27 अगस्त को सोनभद्र के जिला ग्रामीण विकास अभिकरण के जन सूचना अधिकारी से सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 के तहत इंदिरा आवास एवं महामाया आवास से संबंधित सूचना मांगी। मांगी गई सूचना आवेदक (संवाददाता) को निर्धारित समय में प्राप्त नहीं हुई। आवेदक ने विभाग के प्रथम अपीलीय जन सूचना अधिकारी के पास अपील की। फिर भी आवेदक को सूचना प्राप्त नहीं हुई। आवेदक मे बीती नवंबर में राज्य सूचना आयोग के आयोक्त के पास द्वितीय अपील की। अपील स्वीकार करते हुए आयोग ने मई माह में सुनवाई की तारीख निर्धारित की। आयोग ने सुनवाई की तारीख की सूचना संबंधित विभाग के जन सूचना अधिकारी को दिया, लेकिन आवेदक को नहीं दी। सूत्रों से आवेदक को सुनवाई की तारीख की जानकारी हुई। आवेदक ने सुनवाई के दौरान अपना पक्ष रखा। दूसरा पक्ष अनुपस्थित रहा। इसके बाद भी आयुक्त ने सुनवाई के लिए आगामी 29 अक्टूबर की तारीख निर्धारित कर संबंधित जन सूचना अधिकारी को नोटिस जारी करने की बात कही। इससे गैर-जिम्मेदार जन सूचना अधिकारी का मनोबल बल बढ़ गया है और वह सूचना उपलब्ध कराने में रुचि नहीं दिखा रहा है। अगर सूचना मांगने वाले व्यक्ति के खर्च की बात करें तो सोनभद्र से सुनवाई की तारीख पर एक बार उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने में कम से कम पांच सौ रुपये खर्च होते हैं। राज्य सूचना आयोग के आयुक्तों द्वारा तारीख दर तारीख देकर बार-बार आवेदकों को दौड़ाने से गैर-जिम्मेदार जन सूचना अधिकारियों का सूचना नहीं देने का मनोबल बढ़ कहा है, जिसे लोग आयोग द्वारा नौकरशाहों के संरक्षण के रूप में देख रहे हैं। राज्य सूचना आयोग के आयुक्तों की इन करतूतों की वजह से जन सूचना अधिकारियों का मनोबल इस कदर बढ़ गया है कि वो आयोग अथवा प्रथम अपीलीय अधिकारियों के आदेश के बाद भी आवेदकों को सूचना नहीं उपलब्ध कराते हैं।
    संवाददाता ने उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सोनभद्र स्थित क्षेत्रीय कार्यालय के जन सूचना अधिकारी कालिका सिंह से बीती 21 अप्रैल को सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 के तहत सूचनाएं मांगी, लेकिन उन्होंने निर्धारित अवधि में सूचना उपलब्ध नहीं कराई। संवाददाता ने विभाग के प्रथम अपीलीय जन सूचना अधिकारी के पास अपील दाखिल की। इसके बाद प्रार्थी को बीती 16 जून को छायाप्रति के लिए आवश्यक धनराशि जमा कर सूचना प्राप्त करने की सूचना प्राप्त हुई। साथ ही कुछ बिंदुओं की गलत सूचना दी गई। संवाददाता ने विभाग के प्रथम अपीलीय जन सूचना अधिकारी के पास अपील दाखिल की। अपील को स्वीकार करते हुए प्रथम अपीलीय जन सूचना अधिकारी ने बीती 20 अगस्त को सुनवाई के लिए दोनों पक्षों को उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने को कहा। निर्धारित तिथि पर संवाददाता ने प्रथम अपीलीय अधिकारी के समक्ष अपना पक्ष रखा, दूसरा पक्ष अनुपस्थित रहा। प्रथम अपीलीय जन सूचना अधिकारी ने बीती 20 अगस्त को जन सूचना अधिकारी कालिका सिंह को आदेश दिया कि आदेश प्राप्ति के दस दिनों के भीतर संवाददाता को पूरी सूचना उपलब्ध करा दें। इसके बाद भी संवाददाता को सूचना उपलब्ध नहीं कराई गयी। वहीं, संवाददाता द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 के उल्लघंन की अपील पर जन सूचना अधिकारी को दंडित करने की अपील पर प्रथम अपीलीय जन सूचना अधिकारी द्वारा कोई आदेश जारी नहीं किया गया, जिससे विभाग द्वारा जन सूचना अधिकारी को संरक्षण मिलने की आशंका है।

  7. thepublicleader.blogspot.com

    October 9, 2010 at 2:04 am

    वैसे भी सूचना का अधिकार-2005 के मामले में राज्य सरकार पूरी तरह से उदासीन है और यहां के नौकरशाह तो खुलेआम कानून की धज्जियां उड़ाते रहते हैं। भ्रष्ट नौकरशाहों के मामले में राज्य सूचना आयोग के बाबू (आयुक्त) भी उनकी ही कक्षा करते हैं। सूचना मांगने वालों को तारीख दर तारीख देकर कानून का उपयोग करने से हतोत्साहित करते हैं। ……..केंद्र सरकार भले ही सूचना का अधिकार कानून-2005 लागू कर सरकारी योजनाओँ में भ्रष्टाचार खत्म करने का दावा कर रही हो, लेकिन नौकरशाह केंद्र की इस मंशा को पूरा नहीं करना चाहते हैं। नौकरशाहों की इस करतूत में राज्यों की गैर-कांग्रेसी सरकारें बढ़ चढ़कर हिस्सेदारी कर रही हैं। ऐसा ही कुछ नजारा इन दिनों उत्तर प्रदेश में देखने को मिल रहा है। सूबे में राज्य सूचना आयोग एवं प्रथम अपीलीय अधिकारी गैर जिम्मेदाराना जन सूचना अधिकारियों की ही मदद कर रहें हैं, जिसकी बदौलत ये प्रथम अपीलीय अधिकारियों एवं राज्य सूचना आयोग के आयुक्तों के शो-कॉज नोटिस एवं आदेश के बाद भी आवेदकों को सूचना उपलब्ध नहीं करा रहें हैं। इस हकीकत से रू-ब-रू होने के लिए जब इस संवाददाता ने उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिला में विभिन्न विभागों के जन सूचना अधिकारियों से सूचना मांगी तो नोकरशाहों की करतूत ने सूचना का अधिकार कार्यकर्ताओँ के आरोप को प्रमाणित कर दिया।
    संवाददाता ने बीती साल 27 अगस्त को सोनभद्र के जिला ग्रामीण विकास अभिकरण के जन सूचना अधिकारी से सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 के तहत इंदिरा आवास एवं महामाया आवास से संबंधित सूचना मांगी। मांगी गई सूचना आवेदक (संवाददाता) को निर्धारित समय में प्राप्त नहीं हुई। आवेदक ने विभाग के प्रथम अपीलीय जन सूचना अधिकारी के पास अपील की। फिर भी आवेदक को सूचना प्राप्त नहीं हुई। आवेदक मे बीती नवंबर में राज्य सूचना आयोग के आयोक्त के पास द्वितीय अपील की। अपील स्वीकार करते हुए आयोग ने मई माह में सुनवाई की तारीख निर्धारित की। आयोग ने सुनवाई की तारीख की सूचना संबंधित विभाग के जन सूचना अधिकारी को दिया, लेकिन आवेदक को नहीं दी। सूत्रों से आवेदक को सुनवाई की तारीख की जानकारी हुई। आवेदक ने सुनवाई के दौरान अपना पक्ष रखा। दूसरा पक्ष अनुपस्थित रहा। इसके बाद भी आयुक्त ने सुनवाई के लिए आगामी 29 अक्टूबर की तारीख निर्धारित कर संबंधित जन सूचना अधिकारी को नोटिस जारी करने की बात कही। इससे गैर-जिम्मेदार जन सूचना अधिकारी का मनोबल बल बढ़ गया है और वह सूचना उपलब्ध कराने में रुचि नहीं दिखा रहा है। अगर सूचना मांगने वाले व्यक्ति के खर्च की बात करें तो सोनभद्र से सुनवाई की तारीख पर एक बार उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने में कम से कम पांच सौ रुपये खर्च होते हैं। राज्य सूचना आयोग के आयुक्तों द्वारा तारीख दर तारीख देकर बार-बार आवेदकों को दौड़ाने से गैर-जिम्मेदार जन सूचना अधिकारियों का सूचना नहीं देने का मनोबल बढ़ कहा है, जिसे लोग आयोग द्वारा नौकरशाहों के संरक्षण के रूप में देख रहे हैं। संवाददाता ने बीती साल 27 अगस्त को सोनभद्र के जिला ग्रामीण विकास अभिकरण के जन सूचना अधिकारी से सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 के तहत इंदिरा आवास एवं महामाया आवास से संबंधित सूचना मांगी। मांगी गई सूचना आवेदक (संवाददाता) को निर्धारित समय में प्राप्त नहीं हुई। आवेदक ने विभाग के प्रथम अपीलीय जन सूचना अधिकारी के पास अपील की। फिर भी आवेदक को सूचना प्राप्त नहीं हुई। आवेदक मे बीती नवंबर में राज्य सूचना आयोग के आयोक्त के पास द्वितीय अपील की। अपील स्वीकार करते हुए आयोग ने मई माह में सुनवाई की तारीख निर्धारित की। आयोग ने सुनवाई की तारीख की सूचना संबंधित विभाग के जन सूचना अधिकारी को दिया, लेकिन आवेदक को नहीं दी। सूत्रों से आवेदक को सुनवाई की तारीख की जानकारी हुई। आवेदक ने सुनवाई के दौरान अपना पक्ष रखा। दूसरा पक्ष अनुपस्थित रहा। इसके बाद भी आयुक्त ने सुनवाई के लिए आगामी 29 अक्टूबर की तारीख निर्धारित कर संबंधित जन सूचना अधिकारी को नोटिस जारी करने की बात कही। इससे गैर-जिम्मेदार जन सूचना अधिकारी का मनोबल बल बढ़ गया है और वह सूचना उपलब्ध कराने में रुचि नहीं दिखा रहा है। अगर सूचना मांगने वाले व्यक्ति के खर्च की बात करें तो सोनभद्र से सुनवाई की तारीख पर एक बार उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने में कम से कम पांच सौ रुपये खर्च होते हैं। राज्य सूचना आयोग के आयुक्तों द्वारा तारीख दर तारीख देकर बार-बार आवेदकों को दौड़ाने से गैर-जिम्मेदार जन सूचना अधिकारियों का सूचना नहीं देने का मनोबल बढ़ कहा है, जिसे लोग आयोग द्वारा नौकरशाहों के संरक्षण के रूप में देख रहे हैं। राज्य सूचना आयोग के आयुक्तों की इन करतूतों की वजह से जन सूचना अधिकारियों का मनोबल इस कदर बढ़ गया है कि वो आयोग अथवा प्रथम अपीलीय अधिकारियों के आदेश के बाद भी आवेदकों को सूचना नहीं उपलब्ध कराते हैं।
    संवाददाता ने उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सोनभद्र स्थित क्षेत्रीय कार्यालय के जन सूचना अधिकारी कालिका सिंह से बीती 21 अप्रैल को सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 के तहत सूचनाएं मांगी, लेकिन उन्होंने निर्धारित अवधि में सूचना उपलब्ध नहीं कराई। संवाददाता ने विभाग के प्रथम अपीलीय जन सूचना अधिकारी के पास अपील दाखिल की। इसके बाद प्रार्थी को बीती 16 जून को छायाप्रति के लिए आवश्यक धनराशि जमा कर सूचना प्राप्त करने की सूचना प्राप्त हुई। साथ ही कुछ बिंदुओं की गलत सूचना दी गई। संवाददाता ने विभाग के प्रथम अपीलीय जन सूचना अधिकारी के पास अपील दाखिल की। अपील को स्वीकार करते हुए प्रथम अपीलीय जन सूचना अधिकारी ने बीती 20 अगस्त को सुनवाई के लिए दोनों पक्षों को उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने को कहा। निर्धारित तिथि पर संवाददाता ने प्रथम अपीलीय अधिकारी के समक्ष अपना पक्ष रखा, दूसरा पक्ष अनुपस्थित रहा। प्रथम अपीलीय जन सूचना अधिकारी ने बीती 20 अगस्त को जन सूचना अधिकारी कालिका सिंह को आदेश दिया कि आदेश प्राप्ति के दस दिनों के भीतर संवाददाता को पूरी सूचना उपलब्ध करा दें। इसके बाद भी संवाददाता को सूचना उपलब्ध नहीं कराई गयी। वहीं, संवाददाता द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 के उल्लघंन की अपील पर जन सूचना अधिकारी को दंडित करने की अपील पर प्रथम अपीलीय जन सूचना अधिकारी द्वारा कोई आदेश जारी नहीं किया गया, जिससे विभाग द्वारा जन सूचना अधिकारी को संरक्षण मिलने की आशंका है।

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