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संजीव आचार्य के कमेंट पर लड़की भयभीत हो गई

विजेंदर त्यागी: पीसीआई और मेरी यादें-  पार्ट पांच : प्रभात डबराल का कार्यकाल : चाँद जोशी के बाद प्रभात डबराल और एके धर की टीम विजयी हुई. क्लब में पहाड़ी यानी उत्तराखंड के पत्रकारों की अच्छी खासी संख्या है. प्रभात डबराल अपने व्यवहार से उत्तराखंडियों और अन्य पत्रकारों में बहुत पापुलर थे.

विजेंदर त्यागी: पीसीआई और मेरी यादें-  पार्ट पांच : प्रभात डबराल का कार्यकाल : चाँद जोशी के बाद प्रभात डबराल और एके धर की टीम विजयी हुई. क्लब में पहाड़ी यानी उत्तराखंड के पत्रकारों की अच्छी खासी संख्या है. प्रभात डबराल अपने व्यवहार से उत्तराखंडियों और अन्य पत्रकारों में बहुत पापुलर थे.

वे राष्ट्रीय सहारा के टीवी चैनल के इंचार्ज थे. अरुण कुमार धर पीटीआई में काम करते थे. इसी टीम के कोषाध्यक्ष प्रदीप श्रीवास्तव थे, जो जनसत्ता की हाउसिंग सोसाइटी के भी पदाधिकारी थे. कहते हैं कि तत्‍कालीन आवास मंत्री राम जेठमलानी ने सात नंबर रायसीना रोड प्रेस क्लब को अलाट किया था. परन्तु इसको क्लब के पदाधिकारी गण शादियों के लिए रोज़ के आधार पर किराए पर देने लगे. इसलिए वह सरकार की नज़रों में आ गया था इसी लिए शहरी विकास मंत्रालय ने इसे कैंसिल कर दिया. सात नंबर में ताला डाल दिया और क्लब का सामान निकाल कर बाहर फेंक दिया. इस तालाबंदी वाले दिन प्रभात डबराल और अरुण कुमार धर दिल्ली में नहीं थे. क्लब के लोग संपर्क करते रहे लेकिन इन लोगों का कहीं अता-पता नहीं था. बाद में पता चला कि भारतीय नौसेना के किसी कार्यक्रम में यह लोग समुद्र में डुबकी लगा रहे थे. उधर आवास विकास मंत्रालय ने प्रेस क्लब को डुबो दिया. बाद में जब प्रेस क्लब की जनरल बाडी की बैठक हुई तो वह बहुत ही हंगामेदार थी. सभी एक दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे थे.

संजीव आचार्य : संजीव आचार्य ने चुनाव जीतने के साथ ही अपनी टीम बना ली थी. 5-7 लोग एक साथ घूमने निकलते थे. उन में से उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री ओम प्रकाश श्रीवास्तव के दामाद प्रमोद कुमार भी थे. इस मंडली में रविन्द्र दुबे, रोहन सिंह, महासचिव का लंगोटिया यार कुशाल जीना आदि थे. एक दिन यह सभी अपनी गाड़ी में तेल डलवाने के लिए हुमायूं रोड पर बत्रा जी के पेट्रोल पम्प पर गए. वहीं पर प्रसिद्ध पेंटर मंजीत बावा अपनी शिष्या के साथ पेट्रोल डलवा रहा था. हमारे महासचिव संजीव आचार्य ने ज़ोरदार आवाज़ में पेंटर बावा से कहा कि अबे गंजे-टकले, इस दाने को लेकर कहाँ जा रहा है. इस दाने को दो तीन दिन के लिए मेरे पास छोड़ दे. लड़की भयभीत हो गयी. उसने अपने गुरु से कहा- सर यहाँ से चलिए. ये तो गुंडे लोग हैं. संजीव आचार्य से जब बातचीत हुई तो उसने कहा- “दोस्तों के माहौल में ऐसा कभी-कभी हो जाता है. गुरु आप बताइये कि यह बात आप तक कैसे पहुंची.”

इसी तरह क्लब चलता रहा. संजीव आचार्य के ज़माने में ही क्लब के एक सदस्य रविन्द्र दुबे के साथ एक शाम एक ब्रिटिश महिला पत्रकार क्लब आई. महिला ने वाइन और रविन्द्र दुबे ने व्हिस्की का आर्डर दे दिया. इतने में संजीव आचार्य वहां आकर बैठ गया. क्लब के महासचिव संजीव आचार्य ने अपनी तरफ से तीनों के लिए ड्रिंक्स का आर्डर दे दिया. ड्रिंक्स पीकर ये लोग वहां से दिल्ली पुलिस के पूर्व पीआरओ बख्शी की बेटी की शादी में चले गए. वहां भी सभी साथियों ने शराब पी. वहां से निकल कर सारी मंडली प्रेस क्लब वापस आ गयी. इतने में उस गोरी महिला पत्रकार का ब्वाय फ्रेंड भी आ गया. महासचिव ने उस से पूछा कि आप क्या ड्रिंक्स लेंगे. किसी ने बताया कि बार बंद हो गया है रात ज्यादा बीत गयी है तो महासचिव गुस्सा हो गया और बोला कि मुझे यहाँ कोई भी ड्रिंक्स मना नहीं कर सकता, मैं जनरल सेक्रेटरी हूँ. उसने कहा कि अगर ज़रुरत पड़ी तो आज यहाँ ताले टूटेंगे और शराब आयेगी. और यह गोरी आज मेरे साथ जायेगी. यह कहकर महासचिव ने कहा कि मैं अभी इंतज़ाम करता हूँ. यह कहकर वे कहीं चले गए. इतने में नरेंद्र भल्ला वहां पहुंचे. उन्हों ने रविन्द्र दुबे को समझाया कि पंडित जी आप यहाँ से इस महिला को लेकर निकल लें. दुबे जी अपने साथियों के साथ वहां से निकल गए और गोरों के स्थान जंगपुरा में उन्हें छोड़कर चले गए. महासचिव ने आकर पूछा कि गोरी कहाँ है किसी ने बताया कि दुबे जी उन्हें लेकर चले गए. महासचिव ने गुस्से में कहा कि इस साले कमीने को मैं देख लूँगा. जो भी हो, एक अप्रिय घटना होने से बच गयी.

इसी समय में प्रेस क्लब से पैसा निकाल कर खर्च किया जाने लगा. क्लब का सचिव विजय पाहुजा क्लब से पैसे निकाल कर देते रहे. दोनों की साठ-गाँठ से क्लब लुटता रहा. कुछ दिन बाद यह चर्चा भी खुले आम होने लगी. एक दिन कार्यकारिणी के 13 सदस्यों ने अपने इस्तीफे सौंप दिए. उन लोगों के इस्तीफे बहुत दिन तक प्रेस क्लब के बोर्ड पर लगे रहे. तुरंत ही महासचिव संजीव आचार्य और उनके लंगोटिया यार कुशाल जीना ने भी इस्तीफा दे दिया. उनकी टीम के एक सदस्य नरेंद्र भल्ला ने भी कार्यकारिणी से अपना इस्तीफ़ा दे दिया. इनके एक अन्य साथी प्रमोद कुमार इनका साथ छोड़कर भाग गए, मैं पूरी स्थिति पर नज़र रख रहा था.

क्लब के कर्मचारियों में असंतोष था. इस से क्लब में विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गयी थी. कुछ साथी क्लब के गेट पर ताला डालने की बात करने लगे. मैंने उनसे प्रार्थना की कि ऐसा करने से क्लब की बदनामी होगी. उन्होंने मेरी प्रार्थना स्वीकार कर ली. इस बीच चुने हुए एक सदस्य ने मुझ से कहा कि मैं महासचिव बनना चाहता हूँ. मैं ने उनसे कहा कि आप एक दिन ठहर जाइए मैं मेरठ जा रहा हूँ, कल सायं तक आ जाऊंगा तो परसों 4-5 लोग बैठकर बात कर लेंगे. वहीं हमारे एक मित्र सुभाष भारद्वाज ने मेरी बात सुन ली थी. दूसरे दिन जब मैं मेरठ से आया तो समाचार मिला कि आप जल्दी आइये यहाँ पर दो तीन आदमी लाइब्रेरी में मीटिंग कर रहे हैं. मैं घर से क्लब आया तो देखा कि दो तीन लोग बैठे बात कर रहे हैं और क्लब का सचिव विजय पाहुजा उनके पास खड़ा था. मैं ने पाहुजा से पूछा कि आपने इन लोगों को मीटिंग का रजिस्टर क्यों दिया है, जब कि आपसे कहा गया है कि अब आप कोई कागज़ किसी को नहीं देंगे. इस बात से वहां मौजूद कुछ लोगों से कहा सुनी हो गयी. वह रजिस्टर मिनट्स बुक था. देखने पर पता चला कि पिछले 2 या 3 साल की कार्यवाहियां तो उसमें नोट ही नहीं हैं, जिन्हें पूरा किया जा रहा था. फिर जनरल बाडी की एक हंगामी बैठक हुई.

वरिष्ठ पत्रकार योगेन्द्र बाली अध्यक्षता के लिए बैठे थे. मैं ने उनसे कहा – ‘बाली जी, आप नीचे बैठकर कार्यवाही को देखें. यहाँ पर घपला है, आप इन लोगों के चक्कर में न पड़ें. आप हमारे बुज़ुर्ग हैं.’ फिर केपी श्रीवास्तव को अध्यक्षता करने के लिए आमंत्रित किया गया. काफी हो हल्ला हुआ. कुछ लोग मेरे ऊपर शब्द रूपी बाणों की बौछार कर रहे थे. अंत में मैंने सभी को बताया कि मैं जो भी कर रहा हूँ अपने मित्र विनोद शर्मा के कहने से कर रहा हूँ. विनोद शर्मा, मैं, हांडू और जसविंदर जस्सी चार ऐसे लोग थे, जो विनोद शर्मा के कहने से क्लब से माफिया को हटाने के लिए आये थे. हम में से दो मर गए हैं, दो बचे हैं. विनोद शर्मा हल्ला मचाने वालों के साथ बैठे थे. गर्दन झुकाए बैठे रहे, कुछ नहीं बोले. इस पर लोगों ने कहा कि पूरी कमेटी को भंग कर दिया जाए और इन्क्वायरी कमेटी बनायी जाए. इन्क्वायरी कमेटी में लोगों ने अपने-अपने नाम दिए. किसी ने उनका नाम प्रपोज नहीं किया. सुभाष भारद्वाज ने मेरा नाम प्रपोज किया.

इसी मीटिंग को बुलाने के लिए 300 सदस्यों के हस्ताक्षर वाली लिस्ट दी गयी थी. 11 सदस्यों की कमेटी बनी. कमेटी के कई सदस्य तो कहीं न कहीं कुछ मामलों में लिप्त थे. कमेटी की बैठकें चलती गयीं. कुछ लोग तो कमेटी छोड़कर भाग गए. मेरी गैर मौजूदगी में संजय राय नाम का मेंबर चेयरमैन से डे टू डे कमेटी का इंचार्ज बनने के लिए लिखवा कर लाया. हम लोग जब जांच कर रहे थे तो विनोद शर्मा के खिलाफ मुकुल शुक्ल का पत्र आया. जिसकी इन्क्वायरी हुई थी. आरोप था कि विनोद शर्मा और संजीव आचार्य ने मिलकर मुकुल शुक्ल को मारा था. मैंने जब यह पत्र चेयरमैन केपी श्रीवास्तव को दिया तो विनोद शर्मा आग बबूला हो गए और मीटिंग से उठकर चले गए. दो-चार दिन के बाद उनके बेटे की मौत हो गयी. विनोद शर्मा को रात को इसकी सूचना मिली तो उन्हों ने कहा कि मेरा बेटा तो मेरे बगल में सोया हुआ है. परन्तु जब लाइट खोलकर देखा तो बेटा वहाँ नहीं था. इसके बाद विनोद शर्मा किसी मीटिंग में नहीं आये. जब हम लोगों ने क्लब को संभाला तो स्थिति दयनीय थी, आटा तक नहीं था.

इस बीच मैं ने सभी कर्मचारियों की बैठक बुला कर उनसे अनुरोध किया कि हम आप लोगों को तनख्‍वाह देंगे लेकिन खाना नहीं देंगे. सभी मान गए और हस्ताक्षर करके दे दिया. फिर क्लब से करीब 450 मेंबर हटाये गए, क्योंकि उन्हों ने दसियों साल से क्लब का पैसा नहीं दिया था और क्लब में आते नहीं थे. उसी दिन से उधार खाना मिलना बंद कर दिया गया. क्लब में पैसा आना शुरू हो गया, क्लब चलने लगा. पता चला कि क्लब के किचन का लाइसेंस नहीं था. मैं ने जाकर लाइसेंस बनवाया. फायर ब्रिगेड से आग की सेफ्टी का लाइसेंस बनवाया. 2-3 साल से बाकी नई दिल्ली नगरपालिका के बिलों का भुगतान शुरू हुआ. क्लब सही व्यवस्था में आ गया था, हम लोग खाने और शराब की कीमतों में कमी करने वाले थे, परन्तु केपी श्रीवास्तव ने अपनी दो-तीन लोगों की एक कोटरी बना ली थी. संजय राय गलत बिलों के चक्कर में फंस गए और इस्तीफ़ा देकर भाग गए. अंत में हम दो तीन लोग बचे थे. कोटरी से चुनावों की घोषणा कर दी. चुनाव हुए. हम में से कोई आदमी चुनाव नहीं लड़ा था, क्योंकि मैं ने प्रस्ताव रखा था कि कमेटी का कोई सदस्य चुनाव नहीं लडे़गा.

इन्क्वायरी कमेटी को चार्टर्ड एकाउंट ने बताया कि क्लब का सचिव विजय पाहुजा, महासचिव संजीव आचार्य और लेखाधिकारी शर्मा क्लब को इस हालात में लाने के लिए ज़िम्मेदार हैं. वैसे पहले तो उसने अध्यक्ष एआर विग का नाम भी लिया था. बाद में सभी को नोटिस देकर उनके जवाब मांगे. उसके बाद विजय पाहुजा और लेखाधिकारी का इस्तीफ़ा आ गया. फिर इन सभी को बुलाकर इनके बयान लिए गए. सारी कार्यवाही और कागजात नई चुनी हुई कमेटी को सौंप दिए गए. बाद में चुनाव हुए तो एआर विग और चित्रिता सान्याल क्रमशः अध्यक्ष और महासचिव चुन लिए गए. चित्रिता सान्याल 11 वोटों से विजयी रहीं, लेकिन बाद में जिन लोगों ने चेक देकर पात्रता पायी थी, उन में से 14 के चेक बाउंस हो गए. इस कमेटी में महासचिव चित्रिता और एआर विग की नहीं बनती थी. दोनों ही क्लब को लूटना चाहते थे. एक्जीक्यूटिव ने साढ़े तीन लाख क्लब की रिपेयरिंग के लिए मंज़ूर किया. परन्तु वहां तो साढ़े तेरह लाख खर्च किये गए. 5 लाख का आख़िरी चेक रोक दिया गया.

पता चला कि ठेकेदार तो महासचिव का मामा है. चेक रोके जाने के खिलाफ ठेकेदार ने मुक़दमा कर दिया. केस आज भी अदालत में चल रहा है. एक दिन चित्रिता सान्याल और उनके पति ने इन्क्वायरी कमेटी के सदस्य चेरियन का गला पकड़ा और महासचिव चित्रिता सान्याल ने कहा, ‘आई विल फक यू’. फिर उन्हें  खींच कर हाल में लाईं और माफी मंगवाई. कुछ लोग कहते हैं कि चेरियन गिडगिडा रहे थे. उनकी तरफ से कोई नहीं बोल सका. क्योंकि महासचिव ने अपना आतंक कम्युनिस्ट लाबी की वजह से बना रखा था. अध्यक्ष एआर विग ने मैनजिंग कमेटी में प्रस्ताव पास करा कर चित्रिता सान्याल को क्लब से निकाल दिया. और अवतार सिंह, जो दूरदर्शन में कर्मचारी होते हुए भी 4 मकान  के मालिक हैं,  को महासचिव का चार्ज दे दिया. चित्रिता सान्याल कोर्ट गयीं और अपनी बहाली का आदेश लाईं और महासचिव बन गयीं. अब चुनाव का समय था. चित्रिता सान्याल ने चुनाव की तारीख निश्चित की और सर्कुलर जारी कर दिया. ऐसी स्थिति किसी संस्था में नहीं आई जैसी प्रेस क्लब में आ गयी थी. जब चुनाव हुए तो राहुल जलाली और पुष्पेन्द्र कुलश्रेष्ठ की टीम जीत गयी.

…जारी…

इसके ठीक पहले का पार्ट चार पढ़ने के लिए क्लिक करें- स्टेट्समैन अखबार के पत्रकार एमएल कोतरू अपने घर में बार चलाते थे

लेखक विजेंदर त्यागी देश के जाने-माने फोटोजर्नलिस्ट हैं और खरी-खरी बोलने-कहने-लिखने के लिए चर्चित हैं. पिछले चालीस साल से बतौर फोटोजर्नलिस्ट विभिन्न मीडिया संगठनों के लिए कार्यरत रहे. कई वर्षों तक फ्रीलांस फोटोजर्नलिस्ट के रूप में काम किया और आजकल ये अपनी कंपनी ब्लैक स्टार के बैनर तले फोटोजर्नलिस्ट के रूप में सक्रिय हैं. ”The legend and the legacy : Jawaharlal Nehru to Rahul Gandhi” नामक किताब के लेखक भी हैं विजेंदर त्यागी. यूपी के सहारनपुर जिले में पैदा हुए विजेंदर मेरठ विवि से बीए करने के बाद फोटोजर्नलिस्ट के रूप में सक्रिय हुए. विजेंदर त्यागी को यह गौरव हासिल है कि उन्होंने जवाहरलाल नेहरू से लेकर अभी के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तस्वीरें खींची हैं. वे एशिया वीक, इंडिया एब्राड, ट्रिब्यून, पायनियर, डेक्कन हेराल्ड, संडे ब्लिट्ज, करेंट वीकली, अमर उजाला, हिंदू जैसे अखबारों पत्र पत्रिकाओं के लिए काम कर चुके हैं. विजेंदर त्यागी से संपर्क 09810866574 के जरिए किया जा सकता है.

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