पिछले साल मई में आलोक जी और सुप्रिया जी से इंदौर में मुलाकात हुई। हम सभी इंदौर प्रेस क्लब की तरफ से आयोजित एक सेमिनार में हिस्सा लेने गए थे। वे दोनों एक ऐसे दंपत्ति के तौर पर दिखे जिनमें जबर्दस्त आपसी समझ थी। देर रात तक सुप्रिया आलोक जी से कहती रहीं कि चलिए उज्जैन के महाकालेश्वर के दर्शन कर आएं, मेरा बड़ा मन है। आलोक जी साथ चल न सके। सुप्रिया जी हमारे साथ चलीं। हम कुल चार पत्रकार थे।
रात 11 से सुबह 8 तक दर्शन के बाद जब लौटे तो मैंने देखा कि एक विशु्द्ध भारतीय पत्नी की तरह सुप्रिया जी में अपने पति की मनोकामना का भाव कितना गहरा था। अब जब आलोक जी नहीं रहे तो सुप्रिया जी के लिए मन भारी हो उठा है। जिस हिम्मत के साथ उन्होंने इस दौर को पार किया है, वह हिम्मत आगे भी बनी रहे। आलोक जी एक यशस्वी पत्रकार के बीच हम सबके बीच हमेशा रहेंगे।
डा. वर्तिका नंदा
Dr Vartika Nanda
Head, Department of Journalism
Lady Shri Ram College, New Delhi
Blog: www.vartikananda.blogspot.com












vishal sharma
March 20, 2011 at 4:45 pm
जिंदगी बस एक उम्मीद भरी डगर है…लेकिन मौत एक हक़ीकत है। लेकिन आख़िर दम तक अपने पसंदीदा क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए मौत से रुबरू होने का नसीब कम लोगों को ही मिलता है। आलोक जी आपका जाना दुखद है लेकिन आपका सफ़र सुकुन भी देता है क्योंकि इसमें ये अहसास छिपा है कि अपनी शर्तों पर भी जिदंगी को बख़ूबी जिया जा सकता है। कलम के इस अद्वितीय सिपाही को पूरे सम्मान और गौरव के साथ भावभीनी श्रद्धाजंलि…. विशाल शर्मा,पत्रकार,(ईटीवी राज.जयपुर)
Khushdeep Sehgal
March 21, 2011 at 7:35 am
अद्भुत आलोक जी को विनम्र श्रद्धांजलि…न जाने क्यों आज धर्मेंद्र की फिल्म सत्यकाम की शिद्दत के साथ याद आ रही है…
जय हिंद…