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सुभाष पांडेय की गलती मामूली नहीं थी!

सुभाष पांडे जी के साथ तो ऐसा होना ही था। उनकी गलती मामूली नहीं है…। चले थे नीतीश कुमार के खिलाफ लिखने। सच्ची खबर लिखने। हो गया न…। भाई, उन्हें सोचना चाहिए था कि जहां सारी मीडिया नीतीश चालीसा के अलावा कुछ नहीं लिखते दिखाते तो भला उनको क्या सूझा कि…खैर। वे सीनियर थे, सो उनका तबादला हुआ वरना तो कितनों की तो नौकरी खा गए नीतीश बाबू उर्फ सुशासन बाबू। अब आप सोच रहे होंगे कि क्या बकवास लिख रहा है, मगर ये सच्चाई है।

सुभाष पांडे जी के साथ तो ऐसा होना ही था। उनकी गलती मामूली नहीं है…। चले थे नीतीश कुमार के खिलाफ लिखने। सच्ची खबर लिखने। हो गया न…। भाई, उन्हें सोचना चाहिए था कि जहां सारी मीडिया नीतीश चालीसा के अलावा कुछ नहीं लिखते दिखाते तो भला उनको क्या सूझा कि…खैर। वे सीनियर थे, सो उनका तबादला हुआ वरना तो कितनों की तो नौकरी खा गए नीतीश बाबू उर्फ सुशासन बाबू। अब आप सोच रहे होंगे कि क्या बकवास लिख रहा है, मगर ये सच्चाई है।

बड़े अखबार वालों से पता कर सकते हैं। बिहार में पिछले पांच सालों में मीडिया क्षेत्र में अगर सबसे बड़ा काम नीतीश कुमार ने किया है तो वो है मीडिया को अपना बंधुआ मजदूर बनाना और सरकारी विज्ञापन के नाम पर सबको नचाना। विज्ञापन के नाम पर लोगों को डराया-धमकाया जाता है तथा अपने इशारे पर नचाया जाता है। जिसने भी ना नुकुर किया, उसका विज्ञापन बंद। भर्ई बिहार में और विज्ञापन तो मिलने से रहे। भला सरकारी विज्ञापन को कैसे छोड़ा जाए। सो, मालिक और संपादक ने नतमस्तक होना ही उचित समझा या यूं कह सकते हैं कि मिले सुर मेरा तुम्हारा और विज्ञापन मिले तुम्हारा।

भाई पैसा मिलेगा तभी तो गाड़ी आगे चलेगी। शानो-शौकत बढ़ेगी। आलीशान बंगले होंगे और न जाने क्या-क्या। इसलिए शुरू हो गया नीतीश चालीसा और नीतीश का करने लगे झंडा बुलंद। ऐसा नहीं है कि बिहार में विकास नहीं हुआ है, हुआ है, मगर उतना भी नहीं, जितना भाई लोग लिखते हैं। आज भी बिहार में भुखमरी, भ्रष्टाचार, लूट-खसोट और किसी दफ्तर में बिना चढ़ावे के लोग काम तो दूर, देखते भी नहीं हैं। किसी पुलिस स्टेशन में भी पैसे वालों की ही पूछ है। चारो तरफ शराब की दुकान खुल गई। आज भी अमीर-गरीब की खाई है। जातिवाद कभी खत्म नहीं हो सकता। ऐसा नहीं है कि आज ऊंची जाति के लोग नीची जाति के लोग से प्यार करने लगे हैं। आज भी वे नफरत ही करेंगे, मगर मीडिया के भाई लोगों को कुछ नहीं दिखता। नहीं लिखते उन पर। ऐसे में नीतीश बाबू का ग्राफ तो बढेगा ही।

मीडिया को कुछ भी नहीं दिखता। दिखेगा भी कैसे, विकास का चश्मा जो पहन रखा है। इस बार मीडिया के लोगों ने विकास की ऐसी खबर बनाई कि पूछो मत। सारे पेपर और चैनल में होड़ थी कि जो जितना बढिया चालीसा दिखाएगा, उनको जीतने के बाद मेडल और ज्यादा से ज्यादा विज्ञापन मिलेगा। नीतीश कुमार को दुनिया की कोई भी ताकत जीतने से रोक सकता था क्या, जब इतने लोग साथ हों। हुआ भी वैसा ही जो भाई लोग पहले बता दिए थे। मेरे मुताबिक, असली जीत तो है मीडिया की… जय हो मीडिया… जय हो चौथा खंभा…। अब आप कहेंगे कि इतनी सीट कैसे आ गई? भाई लालू के खौफ से बचने के लिए लोगों ने इन्हें जिताया। ये मत कहो कि विकास की गंगा बहने लगी है। ये पब्लिक है सब जानती है। आप की क्या इमेज है, वो भी जानती है। आपकी क्या इज्जत करती है वो आप भी जानते हैं…।

सुभाष पांडेय के तबादले के सवाल पर लौटता हूं। क्या सुभाष पांडेय का तबादला करना ही उचित है। शैलेंद्र दीक्षित को क्यों नहीं निकाल दिया जाता। जिम्मेदारी तो उनकी भी बनती थी। लेकिन उन्हें बख्श दिया गया है, अपने गैंग चलाने के लिए। जय हो जागरण की।

एक पत्रकार

पटना

भड़ास4मीडिया के पास मेल से आई एक चिट्ठी पर आधारित.

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0 Comments

  1. संजय कुमार सिंह

    December 1, 2010 at 12:32 pm

    बिहार में अगर नीतिश वाकई ऐसा कर रहे हैं तो उनके खिलाफ लामबंद होने की जरूरत है। नीतिश ने जिन पत्रकारों का, उनकी जिन खबरों के लिए तबादला कराया है उसे एक पुस्तक / पुस्तिका के रूप में छाप / छपवाकर बिहार में और (बाहर भी) बांटा बेचा जा सकता है। राजनीति के खेल में नीतिश के कई विरोधी मिल जाएंगे जो ऐसे किसी ठोस काम को प्रायोजित भी कर दें। मेरा मानना है कि अगर कोई किसी खबर से चिढ़कर लिखने वाले के खिलाफ कार्रवाई करे / कराए तो उस खबर को इतना छापना – छपवाना चाहिए कि वो फिर ऐसा करना भूल जाए। जागो बिहार के पत्रकारों जागों। सौ सुनार की जगह एक लोहार की लगाओ।

  2. madan kumar tiwary

    December 1, 2010 at 1:34 pm

    यह एक सत्य है । बिहार के पत्रकारों से भगवान बचायें । मगध विश्व विद्यालय में फ़ैले भ्रष्टाचार को मैने उजागर करना शुरु किया और दलाल पत्रकारों के आंखों की किरकीरी बन गया । हालांकि बहुत सारे पत्रकार बंधुओं ने अकेले में विग्यापन के कारण खिलाफ़ में न लिख पाने की मजबूरी स्वीकार की।

  3. keshav mehta

    December 1, 2010 at 8:12 pm

    nitish ji achai sasak sayad ho saktai hai lakin achhai insan kabhi nahi ho saktai kuki jiss aadmi nai apni patni ka khayal nahi kiya ussai taadap tadap kar marnai kai liya akaela chor diya uss aadmi saibihar ki janta kya bharosa karegi….bihar ki yai bidambana hai ki aaj sai 25 saal pahlai jagarnath misra nai lutta phir lalu nai luta or abbb tamasa nitish ka hoga….aagai agai dakhiya hota hai kya.raha bhai patrkaro ka haal to daalalo ki jagah hai ab patrakarita mai naa ki patrkaro ki…

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