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हिमालय की संस्‍कृति से परिचित करा रहे हैं पत्रकार शंकर

राजजातअपने उद्भव काल से ही हिमालय और उसके इर्द-गिर्द मानव समाज की बसावट बाकी समाजों के लिए कई रूपों में कौतूहल व आश्चर्य से कम नहीं रहा है। हिमालय की पर्वत श्रृंखलाएं मानव समाज के लिए चुनौती भी पेश करती रहीं हैं। समय के साथ मनुष्य ने हिमालय की हैरान करने वाली चोटियों पर चढ़ाई कर अपने साहस और क्षमता का प्रदर्शन भी किया। हिमालय से गहरे तक जुड़े समाजों में अपने इसी साहस के बूते बाकी देशज समाजों से भिन्न अपनी तरह के सांस्कृतिक रिश्ते भी मेले-उत्सव के रूप में अस्तित्व में आए।.

राजजातअपने उद्भव काल से ही हिमालय और उसके इर्द-गिर्द मानव समाज की बसावट बाकी समाजों के लिए कई रूपों में कौतूहल व आश्चर्य से कम नहीं रहा है। हिमालय की पर्वत श्रृंखलाएं मानव समाज के लिए चुनौती भी पेश करती रहीं हैं। समय के साथ मनुष्य ने हिमालय की हैरान करने वाली चोटियों पर चढ़ाई कर अपने साहस और क्षमता का प्रदर्शन भी किया। हिमालय से गहरे तक जुड़े समाजों में अपने इसी साहस के बूते बाकी देशज समाजों से भिन्न अपनी तरह के सांस्कृतिक रिश्ते भी मेले-उत्सव के रूप में अस्तित्व में आए।.

उत्तराखंड के मध्य हिमालयी क्षेत्र में ‘नंदा राजजात’ नाम से हर बारहवें साल होने वाली विराट साहसिक यात्रा में इसकी झलक देखी जा सकती है। दुनियाभर में अपनी तरह के इस अनोखे सांस्कृतिक व साहसिक उत्सव से परिचित कराते हुए पत्रकार शंकर भाटिया ने राजजात के सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व के साथ अपने यात्रा वृतांत को आधार बनाते हुए एक बेहतरीन पुस्तक लिखी है। यह किताब इस लिहाज से भी अहम है कि वर्ष 2012 में हिमालय की ओर मीलों पैदल यात्रा फिर शुरू होनी है। भाटिया बताते हैं कि कैसे दो दशक पहले तक दलित व महिलाओं के लिए हिमालय की यह साहसिक यात्रा सवर्ण व पितृसत्तात्मक समाज के अपने धार्मिक दुराग्रहों के चलते वर्जित मानी जाती रही, पर समय के साथ आए बदलाव अब इस यात्रा के साथ भी देखे जा सकते हैं। अब दलित व महिलाएं इस साहसिक व धार्मिक यात्रा में बिना रोक-टोक के शरीक हो रहीं हैं। इसे हिमालयी समाज में आए बदलाव से जोड़कर देखा जा सकता है।

हार्ड बॉन्ड बाइंडिंग आकार में 228 पृष्ठों की इस किताब में लेखक ने वर्ष 2000 की राजजात यात्रा को एक पत्रकार के तौर पर देखते हुए संकलित किया है। नंदा अर्थात शिव की पत्नी को अपने मायके से ससुराल यानी कैलाश पहुंचाने की परम्परा उत्तराखंड में राजजात के रूप में मनाई जाती है। पार्वती यानी गौरा का स्थानीय रूप नंदा मध्य हिमालय के समाज में व्यापक तौर पर पूजा जाता है। माना जाता है कि नंदा को कैलाश के लिए विदा करने की यह यात्रा आठवीं सदी में शुरू हुई। हिमालयी समाज ने नंदा से जो रिश्ता कायम किया, वह किसी देवी से ज्यादा बेटी के रूप में भावनात्मकता की डोर से अधिक बंधा हुआ है। यही वजह है कि यहां नंदा लोगों के लिए देवी भी है तो उससे ज्यादा बेटी के रूप में ज्यादा गहरे तक उससे जुड़ाव है।

पुस्तक की प्रस्तावना में भाटिया लिखते हैं कि मनुष्य और देवता का ऐसा अनोखा रिश्ता दुनिया में संभवतः और कहीं देखने को नहीं मिलता। पहाड़ में नंदा के साथ महिलाएं भावनात्मक रूप से ज्यादा जुड़ी हुई हैं। ससुराल से मायके की ओर प्रस्थान करने के यात्रा बिंदु के तौर पर महिलाएं खुदको इससे अपने को जोड़कर देखतीं हैं। राजजात से गहरे से जुड़े पर्वतीय समाज की महिलाओं के बीच गाए जाने वाले जागरों में इसे आसानी से समझा जा सकता है। परम्परा के अनुसार यह प्रत्येक बारह वर्ष में आयोजित होने वाली यात्रा है, लेकिन विभिन्न वजहों से कभी-कभी यह यात्रा 25 साल के अंतराल में भी हुई। ऐसा होने के पीछे धार्मिक और सामाजिक कारण भी रहे हैं। माना जाता है कि जब नंदा को कैलाश भेजने का समय आता है तो क्षेत्र में चार सींग वाला बकरा पैदा होता है। इसके साथ ही यात्रा का आयोजन होता है और यही इस यात्रा का आकर्षण भी माना जाता है। हालांकि राजजात अब परम्परा से आगे बढ़कर सांस्कृतिक और साहसिक पर्यटन के रूप में पहचान बना रही है।

इस लिहाज से वर्ष 2000 में संपन्न हुई राजजात उल्लेखनीय रही है। मानव कंकालों को लेकर अब तक रहस्य बना रूपकुंड भी जो इस यात्रा का एक अहम पड़ाव है, उसके विषय में पुस्तक में अहम जानकारी दी गई है। यह इस यात्रा का आकर्षण बढ़ा देता है। हिमालय को करीब से देखने और 17500 फीट ऊंचे दर्रे तक पहुंचने के दौरान लेखक ने अपने अनुभव को बेहतरीन फोटोग्राफी के साथ 23 पड़ावों के साथ 164 मील लम्बी इस यात्रा को पुस्तक रूप दिया है। साहसिक पर्यटन व सांस्कृतिक तौर पर इस अनोखी यात्रा को समझने के इच्छुक लोगों के लिए यह किताब एक बेहतरीन जरिया है।

लेखक दीपक आजाद हाल-फिलहाल तक दैनिक जागरण, देहरादून में कार्यरत थे. इन दिनों स्वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं.

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